श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 971–980
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 971–980
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चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः कबूतरद्वारा अपनी भार्याका गुणगान तथा पतिव्रता स्त्रीकी प्रशंसा भीष्म उवाच
अथ वृक्षस्य शाखायां विहङ्गः ससुहृज्जनः ।
दीर्घकालोषितो राजंस्तत्र चित्रतनूरुहः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! उस वृक्षकी शाखापर बहुत दिनोंसे एक कबूतर अपने
सुहृदोंके साथ निवास करता था । उसके शरीरके रोएँ चितकबरे थे ॥ १ ॥
तस्य कल्यगता भार्या चरितुं नाभ्यवर्तत ।
प्राप्तां च रजनीं दृष्ट्वा स पक्षी पर्यतप्यत ॥ २ ॥
उसकी पत्नी सबेरेसे ही चारा चुगनेके लिये गयी थी, जो लौटकर नहीं आयी । अब रात हुई देख वह कबूतर उसके लिये बहुत संतप्त होने लगा ॥ २ ॥
वातवर्षं महच्चासीन्न चागच्छति मे प्रिया ।
किं नु तत् कारणं येन साद्यापि न निवर्तते ॥ ३ ॥
कबूतर दुखी होकर इस प्रकार विलाप करने लगा - ' अहो! आज बड़ी भारी आँधी और वर्षा हुई है; किंतु अबतक मेरी प्यारी भार्या लौटकर नहीं आयी । ऐसा कौन - सा कारण हो गया, जिससे वह अभीतक नहीं लौट सकी है ॥ ३ ॥
अपि स्वस्ति भवेत् तस्याः प्रियाया मम कानने ।
तया विरहितं हीदं शून्यमद्य गृहं मम ॥ ४ ॥
‘ क्या इस वनमें मेरी प्रिया कुशलसे होगी? उसके बिना आज मेरा यह घर —यह घोंसला सूना लग रहा है ॥
पुत्रपौत्रवधूभृत्यैराकीर्णमपि सर्वतः ।
भार्याहीनं गृहस्थस्य शून्यमेव गृहं भवेत् ॥ ५ ॥
' पुत्र, पौत्र, पतोहू तथा अन्य भरण- पोषणके योग्य कुटुम्बीजनोंसे भरा होनेपर भी गृहस्थका घर उसकी पत्नीके बिना सूना ही रहता है ॥ ५ ॥
न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते ।
गृहं तु गृहिणीहीनमरण्यसदृशं मतम् ॥ ६ ॥
‘ वास्तवमें घरको घर नहीं कहते, घरवालीका ही नाम घर है । घरवालीके बिना जो घर होता है, उसे जंगलके समान ही माना गया है ॥ ६ ॥
यदि सा रक्तनेत्रान्ता चित्राङ्गी मधुरस्वरा ।
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अद्य नायाति मे कान्ता न कार्यं जीवितेन मे ॥ ७ ॥
‘ जिसके नेत्रोंके प्रान्तभाग कुछ- कुछ लाल हैं, अंग चितकबरे हैं और स्वरमें अद्भुत मिठास भरा है, वह मेरी प्राणवल्लभा यदि आज नहीं आ रही है तो मुझे इस जीवनसे क्या प्रयोजन है? ॥ ७ ॥
न भुङ्क्ते मय्यभुङ्क्ते या नास्नाते स्नाति सुव्रता ।
नातिष्ठत्युपतिष्ठेत शेते च शयिते मयि ॥ ८ ॥
'वह उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पतिव्रता थी, इसलिये मुझे भोजन कराये बिना भोजन नहीं करती, नहलाये बिना स्नान नहीं करती, मुझे बैठाये बिना बैठती नहीं तथा मेरे सो जानेपर ही शयन करती थी ॥ ८ ॥
हृष्टे भवति सा हृष्टा दुःखिते मयि दुःखिता ।
प्रोषिते दीनवदना क्रुद्धे च प्रियवादिनी ॥ ९ ॥
' मेरे प्रसन्न रहनेपर वह हर्षसे खिल उठती थी और मेरे दुखी होनेपर वह स्वयं भी दुःखमें डूब जाती थी । जब मैं बाहर जाने लगता तो उसके मुखपर दीनता छा जाती थी और जब कभी मुझे क्रोध आता, तब मीठी- मीठी बातें करके शान्त कर देती थी ॥ ९ ॥
पतिव्रता पतिगतिः पतिप्रियहिते रता ।
यस्य स्यात् तादृशी भार्या धन्यः स पुरुषो भुवि ॥ १० ॥
' वह बड़ी पतिव्रता थी । पतिके सिवा दूसरी कोई उसकी गति नहीं थी । वह सदा ही पतिके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहती थी । जिसको ऐसी पत्नी प्राप्त हुई हो, वह पुरुष इस पृथ्वीपर धन्य है ॥ १० ॥
सा हि श्रान्तं क्षुधार्तं च जानीते मां तपस्विनी ।
अनुरक्ता स्थिरा चैव भक्ता स्निग्धा यशस्विनी ॥ ११ ॥
‘ वह तपस्विनी यह जानती है कि मैं थका, माँदा और भूखसे पीड़ित हूँ, सो भी न जाने क्यों नहीं आ रही है? मेरे प्रति उसका अत्यन्त अनुराग है, उसकी बुद्धि स्थिर है, वह यशस्विनी भार्या मेरे प्रति स्नेह रखनेवाली तथा मेरी परम भक्त है ॥ ११ ॥
वृक्षमूलेऽपि दयिता यस्य तिष्ठति तद् गृहम् ।
प्रासादोऽपि तया हीनः कान्तार इति निश्चितम् ॥ १२ ॥
' वृक्षके नीचे भी जिसकी पत्नी साथ हो, उसके लिये वही घर है और बहुत बड़ी अट्टालिका भी यदि स्त्रीसे रहित है तो वह निश्चय ही दुर्गम गहन वनके समान है ॥
धर्मार्थकामकालेषु भार्या पुंसः सहायिनी ।
विदेशगमने चास्य सैव विश्वासकारिका ॥। १३ ॥
' पुरुषके धर्म, अर्थ और कामके अवसरोंपर उसकी पत्नी ही उसकी मुख्य सहायिका होती है । परदेश जानेपर भी वही उसके लिये विश्वसनीय मित्रका काम करती है ॥ १३ ॥
भार्या हि परमो ह्यर्थः पुरुषस्येह पठ्यते ।
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असहायस्य लोकेऽस्मिंल्लोकयात्रासहायिनी ॥ १४ ॥
' पुरुषकी प्रधान सम्पत्ति उसकी पत्नी ही कही जाती है । इस लोकमें जो असहाय है, उसे भी लोक- यात्रामें सहायता देनेवाली उसकी पत्नी ही है ॥ १४ ॥
तथा रोगाभिभूतस्य नित्यं कृच्छ्रगतस्य च ।
नास्ति भार्यासमं किंचिन्नरस्यार्तस्य भेषजम् ॥ १५ ॥
' जो पुरुष रोगसे पीड़ित हो और बहुत दिनोंसे विपत्तिमें फँसा हो, उस पीड़ित मनुष्यके लिये भी स्त्रीके समान दूसरी कोई ओषधि नहीं है ॥ १५ ॥
नास्ति भार्यासमो बन्धुर्नास्ति भार्यासमा गतिः ।
नास्ति भार्यासमो लोके सहायो धर्मसंग्रहे ॥ १६ ॥
‘ संसारमें स्त्रीके समान कोई बन्धु नहीं है, स्त्रीके समान कोई आश्रय नहीं है और स्त्रीके समान धर्मसंग्रहमें सहायक भी दूसरा कोई नहीं है ॥ १६ ॥
यस्य भार्या गृहे नास्ति साध्वी च प्रियवादिनी ।
अरण्यं तेन गन्तव्यं यथारण्यं तथा गृहम् ॥ १७ ॥
‘जिसके घरमें साध्वी और प्रिय वचन बोलने वाली भार्या नहीं है, उसे तो वनमें चला जाना चाहिये; क्योंकि उसके लिये जैसा घर है, वैसा ही वन ' ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि भार्याप्रशंसायां चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पत्नीकी प्रशंसाविषयक एक सौचौवालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १४४ ॥
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पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः कबूतरीका कबूतरसे शरणागत व्याधकी सेवाके लिये प्रार्थना भीष्म उवाच
एवं विलपतस्तस्य श्रुत्वा तु करुणं वचः ।
गृहीता शकुनिघ्नेन कपोती वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस तरह विलाप करते हुए कबूतरका वह करुणायुक्त वचन सुनकर बहेलियेके कैदमें पड़ी हुई कबूतरीने कहा ॥ १ ॥
कपोत्युवाच
अहोऽतीव सुभाग्याहं यस्या मे दयितः पतिः ।
असतो वा सतो वापि गुणानेवं प्रभाषते ॥ २ ॥
कबूतरी बोली - अहो! मेरा बड़ा सौभाग्य है कि मेरे प्रियतम पतिदेव इस प्रकार मेरे गुणोंका, वे मुझमें हों या न हों, गान कर रहे हैं ॥ २ ॥
न सा स्त्री ह्यभिमन्तव्या यस्यां भर्ता न तुष्यति ।
भर्तरि नारीणां तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ ३ ॥
उस स्त्रीको स्त्री ही नहीं समझना चाहिये, जिसका पति उससे संतुष्ट नहीं रहता है ।
पतिके संतुष्ट रहनेसे स्त्रियोंपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट रहते हैं ॥ ३ ॥
अग्निसाक्षिकमित्येव भर्ता वै दैवतं परम् ।
दावाग्निनेव निर्दग्धा सपुष्पस्तबका लता ॥ ४ ॥
भस्मीभवति सा नारी यस्या भर्ता न तुष्यति । अग्निको साक्षी बनाकर स्त्रीका जिसके साथ विवाह हो गया, वही उसका पति है और वही उसके लिये परम देवता है। जिसका पति संतुष्ट नहीं रहता, वह नारी दावानलसे दग्ध हुई पुष्पगुच्छोंसहित लताके समान भस्म हो जाती ॥ इति संचिन्त्य दुःखार्ता भर्तारं दुःखितं तदा ॥ ५ ॥
कपोती लुब्धकेनापि गृहीता वाक्यमब्रवीत् । ऐसा सोचकर दुःखसे पीड़ित हो व्याधके कैदमें पड़ी हुई कबूतरीने अपने दुःखित पतिसे उस समय इस प्रकार कहा- ॥ ५३ ॥
हन्त वक्ष्यामि ते श्रेयः श्रुत्वा तु कुरु तत् तथा ॥ ६ ॥
शरणागतसंत्राता भव कान्त विशेषतः ।
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‘ प्राणनाथ! मैं आपके कल्याणकी बात बता रही हूँ, उसे सुनकर आप वैसा ही कीजिये । इस समय विशेष प्रयत्न करके एक शरणागत प्राणीकी रक्षा कीजिये ॥ ६३ ॥
एष शाकुनिकः शेते तव वासं समाश्रितः ॥ ७ ॥
शीतार्तश्च क्षुधार्तश्च पूजामस्मै समाचर ।
‘ यह व्याध आपके निवास स्थानपर आकर सर्दी और भूखसे पीड़ित होकर सो रहा है ।
आप इसकी यथोचित सेवा कीजिये ॥ ७३ ॥
यो हि कश्चिद् द्विजं हन्याद् गां च लोकस्य मातरम् ॥ ८ ॥
शरणागतं च यो हन्यात् तुल्यं तेषां च पातकम् । ‘ जो कोई पुरुष ब्राह्मणकी, लोकमाता गायकी तथा शरणागतकी हत्या करता है, उन तीनोंको समानरूपसे पातक लगता है ॥ ८३ ॥
अस्माकं विहिता वृत्तिः कापोती जातिधर्मतः ॥ ९ ॥
सा न्याय्याऽऽत्मवता नित्यं त्वद्विधेनानुवर्तितुम् । ‘ भगवान्ने जातिधर्मके अनुसार हमारी कापोतीवृत्ति बना दी है । आप जैसे मनस्वी पुरुषको सदा ही उस वृत्तिका पालन करना उचित है ॥ ९ ३ ॥ यस्तु धर्मं यथाशक्ति गृहस्थो ह्यनुवर्तते ॥ १० ॥
स प्रेत्य लभते लोकानक्षयानिति शुश्रुम । ‘ जो गृहस्थ यथाशक्ति अपने धर्मका पालन करता है, वह मरनेके पश्चात् अक्षय लोकोंमें जाता है, ऐसा हमने सुन रखा है ॥ १०३ ॥
स त्वं संतानवानद्य पुत्रवानसि च द्विज ॥ ११ ॥
तत् स्वदेहे दयां त्यक्त्वा धर्मार्थों परिगृह्य च ।
पूजामस्मै प्रयुङ्क्ष्व त्वं प्रीयेतास्य मनो यथा ॥ १२ ॥
‘ पक्षिप्रवर! आप अब संतानवान् और पुत्रवान् हो चुके हैं । अतः आप अपनी देहपर दया न करके धर्म और अर्थपर ही दृष्टि रखते हुए इस बहेलियेका ऐसा सत्कार करें, जिससे इसका मन प्रसन्न हो जाय ॥
मत्कृते मा च संतापं कुर्वीथास्त्वं विहङ्गम ।
शरीरयात्राकृत्यर्थमन्यान् दारानुपैष्यसि ॥ १३ ॥
‘ विहंगम! आप मेरे लिये संताप न करें । आपको अपनी शरीरयात्राका निर्वाह करनेके लिये दूसरी स्त्री मिल जायेगी ॥ १३ ॥
इति सा शकुनी वाक्यं पञ्जरस्था तपस्विनी ।
अतिदुःखान्विता प्रोक्त्वा भर्तारं समुदैक्षत ॥ १४ ॥
इस प्रकार पिंजड़ेमें पड़ी हुई वह तपस्विनी कबूतरी पतिसे यह बात कहकर अत्यन्त दुखी हो पतिके मुँहकी ओर देखने लगी ॥ १४ ॥
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कपोतं प्रति कपोतीवाक्ये पञ्चचचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कबूतरके प्रति कबूतरीका वाक्यविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४५ ॥
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षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः कबूतरके द्वारा अतिथि सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग भीष्म उवाच
स पत्न्या वचनं श्रुत्वा धर्मयुक्तिसमन्वितम् ।
हर्षेण महता युक्तो वाक्यं व्याकुललोचनः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! पत्नीकी वह धर्मके अनुकूल और युक्तियुक्त बात सुनकर
कबूतरको बड़ी प्रसन्नता हुई । उसके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये ॥ १ ॥
तं वै शाकुनिकं दृष्ट्वा विधिदृष्टेन कर्मणा ।
स पक्षी पूजयामास यत्नात् तं पक्षिजीविनम् ॥ २ ॥
उस पक्षीने पक्षियोंकी हिंसासे ही जीवन-निर्वाह करनेवाले उस बहेलियेकी ओर देखकर शास्त्रीय विधिके अनुसार यत्नपूर्वक उसका पूजन किया ॥ २ ॥
उवाच स्वागतं तेऽद्य ब्रूहि किं करवाणि ते ।
संतापश्च न कर्तव्यः स्वगृहे वर्तते भवान् ॥ ३ ॥
और बोला — ' आज आपका स्वागत है । बोलिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? आपको संताप नहीं करना चाहिये, आप इस समय अपने ही घरमें हैं ॥ ३ ॥
तद् ब्रवीतु भवान् क्षिप्रं किं करोमि किमिच्छसि ।
प्रणयेन ब्रवीमि त्वां त्वं हि नः शरणागतः ॥ ४ ॥
‘ अतः शीघ्र बताइये, आप क्या चाहते हैं? मैं आपकी क्या सेवा करूँ? मैं बड़े प्रेमसे पूछ रहा हूँ; क्योंकि आप हमारे घर पधारे हैं ॥ ४ ॥
अरावप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते ।
छेत्तुमप्यागते छायां नोपसंहरते द्रुमः ॥ ५ ॥
‘ यदि शत्रु भी घरपर आ जाय तो उसका उचित आदर- सत्कार करना चाहिये । जो काटनेके लिये आया हो, उसके ऊपरसे भी वृक्ष अपनी छाया नहीं हटाता ॥ ५ ॥
शरणागतस्य कर्तव्यमातिथ्यं हि प्रयत्नतः ।
पञ्चयज्ञप्रवृत्तेन गृहस्थेन विशेषतः ॥ ६ ॥
‘ यों तो घरपर आये हुए अतिथिका सभीको यत्नपूर्वक आदर- सत्कार करना चाहिये; परंतु पंचयज्ञके अधिकारी गृहस्थका यह प्रधान धर्म है ॥ ६ ॥
पञ्चयज्ञांस्तु यो मोहान्न करोति गृहाश्रमे ।
तस्य नायं न च परो लोको भवति धर्मतः ॥ ७ ॥
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जो मोहवश गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी पञ्चमहायज्ञोंका अनुष्ठान नहीं करता, उसके लिये धर्मके अनुसार न तो यह लोक प्राप्त होता है और न परलोक ही ॥ ७ ॥
तद् ब्रूहि मां सुविश्रब्धो यत् त्वं वाचा वदिष्यसि ।
तत् करिष्याम्यहं सर्वं मा त्वं शोके मनः कृथाः ॥ ८ ॥
‘ अतः तुम पूर्ण विश्वास रखकर मुझसे अपनी बात बताओ, तुम अपने मुँहसे जो कुछ कहोगे, वह सब मैं करूंगा; अतः तुम मनमें शोक न करो ' ॥ ८ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा शकुनेर्लुब्धकोऽब्रवीत् ।
बाधते खलु मे शीतं संत्राणं हि विधीयताम् ॥ ९ ॥
कबूतरकी यह बात सुनकर व्याधने कहा - ' इस समय मुझे सर्दीका कष्ट है; अतः इससे बचानेका कोई उपाय करो ' ॥ ९ ॥
एवमुक्तस्ततः पक्षी पर्णान्यास्तीर्य भूतले ।
यथाशक्त्या हि पर्णेन ज्वलनार्थं द्रुतं ययौ ॥ १० ॥
उसके ऐसा कहनेपर पक्षीने पृथ्विीपर बहुत - से पत्ते लाकर रख दिये और आग लानेके लिये अपने पंखोंद्वारा यथाशक्ति बड़ी तेजीसे उड़ान लगायी ॥ १० ॥
स गत्वाङ्गारकर्मान्तं गृहीत्वाग्निमथागमत् ।
ततः शुष्केषु पर्णेषु पावकं सोऽप्यदीपयत् ॥ ११ ॥
वह लुहारके घर जाकर आग ले आया और सूखे पत्तोंपर रखकर उसने वहाँ अग्नि प्रज्वलित कर दी ॥
स संदीप्तं महत् कृत्वा तमाह शरणागतम् ।
प्रतापय सुविश्रब्धः स्वगात्राण्यकुतोभयः ॥ १२ ॥
इस प्रकार आगको बहुत प्रज्वलित करके कबूतरने शरणागत अतिथिसे कहा — ‘ भाई! अब तुम्हें कोई भय नहीं है । तुम निश्चिन्त होकर अपने सारे अंगोंको आगसे तपाओ ' ॥ १२ ॥
स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा लुब्धो गात्राण्यतापयत् ।
अग्निं प्रत्यागतप्राणस्ततः प्राह विहङ्गमम् ॥ १३ ॥
तब उस व्याधने ' बहुत अच्छा ' कहकर अपने सारे अंगोंको तपाया । अग्निका सेवन
करके उसकी जानमें जान आयी। तब वह कबूतरसे कुछ कहनेको उद्यत हुआ ॥ १३ ॥
हर्षेण महताऽऽविष्टो वाक्यं व्याकुललोचनः ।
तथेमं शकुनिं दृष्ट्वा विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १४ ॥
शास्त्रीय विधिसे सत्कार पा उसने बड़े हर्षमें भरकर डबडबायी हुई आँखोंसे कबूतरकी ओर देखकर कहा— ॥ १४ ॥
दत्तमाहारमिच्छामि त्वया क्षुद् बाधते हि माम् ।
स तद्वचः प्रतिश्रुत्य वाक्यमाह विहङ्गमः ॥ १५ ॥
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न मेऽस्ति विभवो येन नाशयेयं क्षुधां तव ।
उत्पन्नेन हि जीवामो वयं नित्यं वनौकसः ॥ १६ ॥
संचयो नास्ति चास्माकं मुनीनामिव भोजने । ' भाई! अब मुझे भूख सता रही है; इसलिये तुम्हारा दिया हुआ कुछ भोजन करना चाहता हूँ । ' उसकी बात सुनकर कबूतर बोला- ' भैया! मेरे पास सम्पत्ति तो नहीं है, जिससे मैं तुम्हारी भूख मिटा सकूँ । हमलोग वनवासी पक्षी हैं । प्रतिदिन चुगे हुए चारेसे ही जीवन निर्वाह करते हैं । मुनियोंके समान हमारे पास कोई भोजन का संग्रह नहीं रहता है' ॥ १५-१६३ ॥ इत्युक्त्वा तं तदा तत्र विवर्णवदनोऽभवत् ॥ १७ ॥
कथं नु खलु कर्तव्यमिति चिन्तापरस्तदा ।
बभूव भरतश्रेष्ठ गर्हयन् वृत्तिमात्मनः ॥ १८ ॥
ऐसा कहकर कबूतरका मुख कुछ उदास हो गया । वह इस चिन्तामें पड़ गया कि अब मुझे क्या करना चाहिये? भरतश्रेष्ठ! वह अपनी कापोती वृत्तिकी निन्दा करने लगा ॥ १७-१८ ॥
मुहूर्ताल्लब्धसंज्ञस्तु स पक्षी पक्षिघातिनम् ।
उवाच तर्पयिष्ये त्वां मुहूर्तं प्रतिपालय ॥ १ ९ ॥
थोड़ी देरमें उसे कुछ याद आया और उस पक्षीने बहेलिये से कहा - ' अच्छा, थोड़ी देरतक ठहरिये । मैं आपकी तृप्ति करूँगा' ॥ १ ९ ॥
इत्युक्त्वा शुष्कपर्णैस्तु समुज्ज्वाल्य हुताशनम् ।
हर्षेण महताऽऽविष्टः स पक्षी वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥
ऐसा कहकर उसने सूखे पत्तोंसे पुनः आग प्रज्वलित की और बड़े हर्षमें भर कर व्याधसे कहा- ॥ २० ॥
ऋषीणां देवतानां च पितॄणां च महात्मनाम् ।
श्रुतः पूर्वं मया धर्मो महानतिथिपूजने ॥ २१ ॥
' मैंने ऋषियों, देवताओं, पितरों तथा महात्माओंके मुखसे पहले सुना है कि अतिथिकी पूजा करनेमें महान् धर्म है ॥ २१ ॥
कुरुष्वानुग्रहं सौम्य सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।
निश्चिता खलु मे बुद्धिरतिथिप्रतिपूजने ॥ २२ ॥
‘ सौम्य! अतः मैंने भी आज अतिथिकी उत्तम पूजा करनेका निश्चय कर लिया है । आप
मुझे ही ग्रहण करके मुझपर कृपा कीजिये । यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ' ॥ २२ ॥
ततः कृतप्रतिज्ञो वै स पक्षी प्रहसन्निव ।
तमग्निं त्रिः परिक्रम्य प्रविवेश महामतिः ॥ २३ ॥
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ऐसा कहकर अतिथि - पूजनकी प्रतिज्ञा करके उस परम बुद्धिमान् पक्षीने तीन बार अग्निदेवकी परिक्रमा की, और हँसते हुए- से आगमें प्रवेश किया ॥ २३ ॥
अग्निमध्ये प्रविष्टं तु लुब्धो दृष्ट्वा तु पक्षिणम् ।
चिन्तयामास मनसा किमिदं वै मया कृतम् ॥ २४ ॥
पक्षीको आगके भीतर घुसा हुआ देख व्याध मन - ही - मन चिन्ता करने लगा कि मैंने यह क्या कर डाला? ॥ २४ ॥
अहो मम नृशंसस्य गर्हितस्य स्वकर्मणा ।
अधर्मः सुमहान् घोरो भविष्यति न संशयः ॥ २५ ॥
अहो! अपने कर्मसे निन्दित हुए मुझ क्रूरकर्मा व्याधके जीवनमें यह सबसे भयंकर और महान् पाप होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २५ ॥
एवं बहुविधं भूरि विललाप स लुब्धकः ।
गर्हयन् स्वानि कर्माणि द्विजं दृष्ट्वा तथागतम् ॥ २६ ॥
इस प्रकार कबूतरकी वैसी अवस्था देखकर अपने कर्मोंकी निन्दा करते हुए उस व्याधने अनेक प्रकारकी बातें कहकर बहुत विलाप किया ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कपोतलुब्धकसंवादे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कबूतर और व्याधका संवादविषयक एक सौछियालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १४६ ॥
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