श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 991–1000

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 991–1000

पृष्ठ 991

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एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना भीष्म उवाच

एवमुक्तः प्रत्युवाच तं मुनिं जनमेजयः ।

गह्यं भवान् गर्हयते निन्द्यं निन्दति मां पुनः ॥ १ ॥

धिक्कार्यं मां धिक्कुरुते तस्मात् त्वाहं प्रसादये । भीष्मजी कहते हैं - राजन्! मुनिवर इन्दोतके ऐसा कहनेपर जनमेजयने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया — ' मुने! मैं घृणा और तिरस्कारके योग्य हूँ; इसीलिये आप मेरा तिरस्कार करते हैं । मैं निन्दाका पात्र हूँ; इसीलिये बार- बार मेरी निन्दा करते हैं । मैं धिक्कारने और दुतकारनेके ही योग्य हूँ; इसीलिये आपकी ओरसे मुझे धिक्कार मिल रहा है और इसीलिये मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ ॥ १३ ॥

सर्वं हीदं दुष्कृतं मे ज्वलाम्यग्नाविवाहितः ॥ २ ॥

स्वकर्माण्यभिसंधाय नाभिनन्दति मे मनः । ‘ यह सारा पाप मुझमें मौजूद है; अतः मैं चिन्तासे उसी प्रकार जल रहा हूँ, मानो किसीने मुझे आगके भीतर रख दिया हो । अपने कुकर्मोंको याद करके मेरा मन स्वतः प्रसन्न नहीं हो रहा है ॥ २३ ॥

प्राप्य घोरं भयं नूनं मया वैवस्वतादपि ॥ ३ ॥

तत्तु शल्यमनिर्हृत्य कथं शक्ष्यामि जीवितुम् ।

सर्वं मन्युं विनीय त्वमभि मां वद शौनक ॥ ४ ॥

' निश्चय ही मुझे यमराजसे भी घोर भय प्राप्त होनेवाला है, यह बात मेरे हृदयमें काँटेकी भाँति चुभ रही है । अपने हृदयसे इसको निकाले बिना मैं कैसे जीवित रह सकूँगा? अतः शौनकजी! आप समस्त क्रोधका त्याग करके मुझे उद्धारका कोई उपाय बताइये ॥ ३-४ ॥

महानासं ब्राह्मणानां भूयो वक्ष्यामि साम्प्रतम् ।

अस्तुशेषं'कुलस्यास्य मा पराभूदिदं कुलम् ॥ ५ ॥

‘ मैं ब्राह्मणोंका महान् भक्त रहा हूँ; इसीलिये इस समय पुनः आपसे निवेदन करता हूँ कि मेरे इस कुलका कुछ भाग अवश्य शेष रहना चाहिये । समूचे कुलका पराभव या विनाश नहीं होना चाहिये ॥ ५ ॥

न हि नो ब्रह्मशप्तानां शेषं भवितुमर्हति ।

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स्तुतीरलभमानानां संविदं वेदनिश्चितान् ॥ ६ ॥

निर्विद्यमानः सुभृशं भूयो वक्ष्यामि शाश्वतम् ।

भूयश्चैवाभिरक्षन्तु निर्धनान् निर्जना इव ॥ ७ ॥

'ब्राह्मणोंके शाप दे देनेपर हमारे कुलका कुछ भी शेष नहीं रह जायगा । हम अपने पापके कारण न तो समाजमें प्रशंसा पा रहे हैं न सजातीय बन्धुओंके साथ एकमत ही हो रहे हैं; अतः अत्यन्त खेद और विरक्तिको प्राप्त होकर हम पुनः वेदोंका निश्चयात्मक ज्ञान रखनेवाले आप - जैसे ब्राह्मणोंसे सदा यही कहेंगे कि जैसे निर्जन स्थानमें रहनेवाले योगीजन पापी पुरुषोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आपलतो अपनी दयासे ही हम -जैसे दुखी मनुष्योंकी रक्षा करें ॥ ६-७ ॥

न ह्ययज्ञा अमुं लोकं प्राप्नुवन्ति कथञ्चन ।

आपातान् प्रतितिष्ठन्ति पुलिन्दशबरा इव ॥ ८ ॥

‘ जो क्षत्रिय अपने पापके कारण यज्ञके अधिकारसे वंचित हो जाते हैं, वे पुलिन्दों और शबरोंके समान नरकोंमें ही पड़े रहते हैं । किसी प्रकार परलोकमें उत्तम गतिको नहीं पाते ॥ ८ ॥

अविज्ञायैव मे प्रज्ञां बालस्येव स पण्डितः ।

ब्रह्मन् पितेव पुत्रस्य प्रीतिमान् भव शौनक ॥ ९ ॥

‘ब्रह्मन्! शौनक! आप विद्वान् हैं और मैं मूर्ख | आप मेरी बालबुद्धिपर ध्यान न देकर जैसे पिता पुत्रपर स्वभावतः संतुष्ट होता है, उसी प्रकार मुझपर भी प्रसन्न होइये ' ॥ ९ ॥

शौनक उवाच

किमाश्चर्यं यदप्राज्ञो बहु कुर्यादसाम्प्रतम् ।

इति वै पण्डितो भूत्वा भूतानां नानुकुप्यते ॥ १० ॥

शौनकने कहा – यदि अज्ञानी मनुष्य अयुक्त कार्य भी कर बैठे तो इसमें कौन - सी आश्चर्यकी बात है; अतः इस रहस्यको जाननेवाले बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह प्राणियोंपर क्रोध न करे ॥ १० ॥

प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोच्य शोचते जनात् ।

जगतीस्थानिवाद्रिस्थः प्रज्ञया प्रतिपत्स्यति ॥ ११ ॥

जो विशुद्ध बुद्धिकी अट्टालिकापर चढ़कर स्वयं शोकसे रहित हो दूसरे दुखी मनुष्योंके लिये शोक करता है, वह अपने ज्ञानबलसे सब कुछ उसी प्रकार जान लेता है, जैसे पर्वतकी चोटीपर खड़ा हुआ मनुष्य उस पर्वतके आस- पासकी भूमिपर रहनेवाले सब लोगोंको देखता रहता है ॥ ११ ॥

न चोपलभ्यते तेन न चाश्चर्याणि कुर्वते ।

निर्विण्णात्मा परोक्षो वा धिक्कृतः पूर्वसाधुषु ॥ १२ ॥

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जो प्राचीन श्रेष्ठ पुरुषोंसे विरक्त हो उनके दृष्टिपथसे दूर रहता है तथा उनके द्वारा धिक्कारको प्राप्त होता रहता है, उसे ज्ञानकी उपलब्धि नहीं होती है और ऐसे पुरुष के लिये दूसरे लोग आश्चर्य भी नहीं करते हैं ॥ १२ ॥

विदितं भवतो वीर्यं माहात्म्यं वेद आगमे ।

कुरुष्वेह यथाशान्ति ब्रह्मा शरणमस्तु ते ॥ १३ ॥

तुम्हें ब्राह्मणोंकी शक्तिका ज्ञान है । वेदों और शास्त्रोंमें जो उनकी महिमा उपलब्ध होती है, उसका भी पता है; अतः तुम शान्तिपूर्वक ऐसा प्रयत्न करो, जिससे ब्राह्मणजाति तुम्हें शरण दे सके ॥ १३ ॥

तद् वै पारत्रिकं तात ब्राह्मणानामकुप्यताम् ।

अथवा तप्यसे पापे धर्ममेवानुपश्य वै ॥ १४ ॥

तात! क्रोधरहित ब्राह्मणोंकी सेवाके लिये जो कुछ किया जाता है वह पारलौकिक लाभका ही हेतु होता है । अथवा यदि तुम्हें पापके लिये पश्चात्ताप होता है तो तुम निरन्तर धर्मपर ही दृष्टि रक्खो ॥ १४ ॥

जनमेजय उवाच

अनुतप्ये च पापेन न च धर्मं विलोपये ।

बुभूषं भजमानं च प्रीतिमान् भव शौनक ॥ १५ ॥

जनमेजयने कहा— शौनक! मुझे अपने पापके कारण बड़ा पश्चात्ताप होता है, अब मैं धर्मका कभी लोप नहीं करूँगा । मुझे कल्याण प्राप्त करनेकी इच्छा है; अतः आप मुझ भक्तपर प्रसन्न होइये ॥ १५ ॥

शौनक उवाच छित्त्वां दम्भं च मानं च प्रीतिमिच्छामि ते नृप 1 सर्वभूतहितं तिष्ठ धर्मं चैव प्रतिस्मरन् ॥ १६ ॥

शौनक बोले — नरेश्वर! मैं तुम्हें तुम्हारे दम्भ और अभिमानका नाश करके तुम्हारा प्रिय करना चाहता हूँ । तुम धर्मका निरन्तर स्मरण रखते हुए समस्त प्राणियोंके हितका साधन करो ॥ १६ ॥

न भयान्न च कार्पण्यान्न लोभात् त्वामुपाह्वये ।

तां मे दैवीं गिरं सत्यां शृणु त्वं ब्राह्मणैः सह ॥ १७ ॥

राजन्! मैं भयसे, दीनतासे और लोभसे भी तुम्हें अपने पास नहीं बुलाता हूँ । तुम इन ब्राह्मणोंके सहित दैवीवाणीके समान मेरी यह सच्ची बात कान खोलकर सुन लो ॥ १७ ॥

सोऽहं न केनचिच्चार्थी त्वां च धर्मादुपाह्वये ।

क्रोशतां सर्वभूतानां हाहा धिगिति जल्पताम् ॥ १८ ॥

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मैं तुमसे कोई वस्तु लेनेकी इच्छा नहीं रखता । यदि समस्त प्राणी मुझे खोटी -खरी सुनाते रहें, हाय-हाय मचाते रहें और धिक्कार देते रहें तो भी उनकी अवहेलना करके मैं तुम्हें केवल धर्मके कारण निकट आनेके लिये आमन्त्रित करता हूँ ॥ १८ ॥

वक्ष्यन्ति मामधर्मज्ञं त्यक्ष्यन्ति सुहृदो जनाः ।

ता वाचः सुहृदः श्रुत्वा संज्वरिष्यन्ति मे भृशम् ॥ १ ९ ॥

मुझे लोग अधर्मज्ञ कहेंगे । मेरे हितैषी सुहृद् मुझे त्याग देंगे तथा तुम्हें धर्मोपदेश देनेकी बात सुनकर मेरे सुहृद् मुझपर अत्यन्त रोषसे जल उठेंगे ॥ १ ९ ॥

केचिदेव महाप्राज्ञाः प्रतिज्ञास्यन्ति तत्त्वतः ।

जानीहि मत्कृतं तात ब्राह्मणान् प्रति भारत ॥ २० ॥

तात! भारत! कोई - कोई महाज्ञानी पुरुष ही मेरे अभिप्रायको यथार्थरूपसे समझ सकेंगे । ब्राह्मणोंके प्रति भलाई करनेके लिये ही मेरी यह सारी चेष्टा है । यह तुम अच्छी तरह जान लो ॥ २० ॥

यथा ते मत्कृते क्षेमं लभन्ते ते तथा कुरु ।

प्रतिजानीहि चाद्रोहं ब्राह्मणानां नराधिप ॥ २१ ॥

ब्राह्मणलोग मेरे कारण जैसे भी सकुशल रहें, वैसा ही प्रयत्न तुम करो । नरेश्वर! तुम मेरे सामने यह प्रतिज्ञा करो कि अब मैं ब्राह्मणोंसे कभी द्रोह नहीं करूँगा ॥ २१ ॥

जनमेजय उवाच

नैव वाचा न मनसा पुनर्जातु न कर्मणा ।

द्रोग्धास्मि ब्राह्मणान् विप्र चरणावपि ते स्पृशे ॥ २२ ॥

जनमेजयने कहा – विप्रवर! मैं आपके दोनों चरण छूकर शपथपूर्वक कहता हूँ कि मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी ब्राह्मणोंसे द्रोह नहीं करूँगा ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि इन्द्रोतपारिक्षितीये एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें इन्द्रोत और पारिक्षितका संवाद विषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५१ ॥

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द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुनः अपने राज्यमें प्रवेश शौनक उवाच

तस्मात् तेऽहं प्रवक्ष्यामि धर्ममावृतचेतसे ।

श्रीमान् महाबलस्तुष्टः स्वयं धर्ममवेक्षसे ॥ १ ॥

शौनकने कहा — राजन्! तुमने ऐसी प्रतिज्ञा की है, इससे जान पड़ता है कि तुम्हारा मन पापकी ओरसे निवृत्त हो गया है; इसलिये मैं तुम्हें धर्मका उपदेश करूँगा; क्योंकि तुम

श्रीसम्पन्न, महाबलवान् और संतुष्टचित हो । साथ ही स्वयं धर्मपर दृष्टि रखते हो ॥

पुरस्ताद् दारुणो भूत्वा सुचित्रतरमेव तत् ।

अनुगृह्णाति भूतानि स्वेन वृत्तेन पार्थिवः ॥ २ ॥

राजा पहले कठोर स्वभावका होकर पीछे कोमल भावका अवलम्बन करके जो अपने सद्व्यवहारसे समस्त प्राणियों पर अनुग्रह करता है, वह अत्यन्त आश्चर्यकी ही बात है ॥ २ ॥

कृत्स्नं नूनं स दहति इति लोको व्यवस्यति ।

यत्र त्वं तादृशो भूत्वा धर्ममेवानुपश्यसि ॥ ३ ॥

चिरकालतक तीक्ष्ण स्वभावका आश्रय लेनेवाला राजा निश्चय ही अपना सब कुछ जलाकर भस्म कर डालता है, ऐसी लोगोंकी धारणा है; परंतु तुम वैसे होकर भी जो धर्मपर ही दृष्टि रख रहे हो, यह कम आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ३ ॥

हित्वा तु सुचिरं भक्ष्यं भोज्यांश्च तप आस्थितः ।

इत्येतदभिभूतानामद्भुतं जनमेजय ॥ ४ ॥

जनमेजय! तुम जो दीर्घकालसे भक्ष्य- भोज्य आदि पदार्थोंका परित्याग करके तपस्यामें लगे हुए हो, यह पापसे अभिभूत हुए मनुष्योंके लिये अद्भुत बात है ॥

योऽदुर्लभो भवेद् दाता कृपणो वा तपोधनः ।

अनाश्चर्यं तदित्याहुर्नातिदूरेण वर्तते ॥ ५ ॥

यदि धन- सम्पन्न पुरुष दानी हो एवं कृपण या दरिद्र मनुष्य तपस्याका धनी हो जाय तो इसे आश्चर्यकी बात नहीं मानते हैं; क्योंकि ऐसे पुरुषोंका दान और तपसे सम्पन्न होना अधिक कठिन नहीं है ॥ ५ ॥

एतदेव हि कार्पण्यं समग्रमसमीक्षितम् ।

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यच्चेत् समीक्षयैव स्याद् भवेत् तस्मिंस्ततो गुणः ॥ ६ ॥

यदि सारी बातोंपर पूर्वापर विचार न करके कोई कार्य आरम्भ किया जाय तो यही कायरतापूर्ण दोष है और यदि भलीभाँति आलोचना करके कोई कार्य हो तो यही उसमें गुण माना जाता है ॥ ६ ॥

यज्ञो दानं दया वेदाः सत्यं च पृथिवीपते ।

पञ्चैतानि पवित्राणि षष्ठं सुचरितं तपः ॥ ७ ॥

पृथ्वीनाथ! यज्ञ, दान, दया, वेद, और सत्य – ये पाँचों पवित्र बताये गये हैं । इनके साथ अच्छी तरह आचरणमें लाया हुआ तप भी छठा पवित्र कर्म माना गया है ॥ ७ ॥

तदेव राज्ञां परमं पवित्रं जनमेजय ।

तेन सम्यग्गृहीतेन श्रेयांसं धर्ममाप्स्यसि ॥ ८ ॥

जनमेजय! राजाओंके लिये ये छहों वस्तुएँ परम पवित्र हैं । इन्हें भलीभाँति आचरणमें लानेपर तुम श्रेष्ठतम धर्मको प्राप्त कर लोगे ॥ ८ ॥

पुण्यदेशाभिगमनं पवित्रं परमं स्मृतम् ।

अत्राप्युदाहरन्तीमां गाथां गीतां ययातिना ॥ ९ ॥

पुण्य तीर्थोंकी यात्रा करना भी परम पवित्र माना गया है । इस विषयमें विज्ञ पुरुष राजा ययातिकी गायी हुई इस गाथाका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ९ ॥

यो मर्त्यः प्रतिपद्येत आयुर्जीवितमात्मनः ।

यज्ञमेकान्ततः कृत्वा तत् संन्यस्य तपश्चरेत् ॥ १० ॥

जो मनुष्य अपने लिये दीर्घ जीवनकी इच्छा रखता है, वह यत्नपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान करके फिर उसे त्यागकर तपस्यामें लग जाय ॥ १० ॥

पुण्यमाहुः कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात् सरस्वतीम् ।

सरस्वत्याश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथूदकम् ॥ ११ ॥

कुरुक्षेत्रको पवित्र तीर्थ बताया गया । कुरुक्षेत्रसे अधिक पवित्र सरस्वती नदी है, उससे भी अधिक पवित्र उसके भिन्न- भिन्न तीर्थ हैं । उन तीर्थोंमें भी दूसरोंकी अपेक्षा पृथूदक तीर्थको श्रेष्ठ कहा गया है ॥ ११ ॥

यत्रावगाह्य पीत्वा च नैनं श्वोमरणं तपेत् ।

महासरः पुष्कराणि प्रभासोत्तरमानसे ॥ १२ ॥

कालोदकं च गन्तासि लब्धायुर्जीविते पुनः ।

सरस्वतीदृषद्वत्योः संगमो मानसः सरः ॥ १३ ॥

उसमें स्नान करने और उसका जल पीनेसे मनुष्यको कल ही होनेवाली मृत्युका भय नहीं सताता अर्थात् वह कृतकृत्य हो जाता है । इस कारण मरनेसे नहीं डरता । यदि तुम महासरोवर पुष्कर, प्रभास, उत्तर मानस, कालोदक, दृषद्वती और सरस्वतीके संगम तथा

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मानसरोवर आदि तीर्थोंमें जाकर स्नान करोगे तो तुम्हें पुनः अपने जीवनके लिये दीर्घायु प्राप्त होगी ॥ १२-१३ ॥

स्वाध्यायशीलः स्थानेषु सर्वेषु समुपस्पृशेत् ।

त्यागधर्मः पवित्राणां संन्यासं मनुरब्रवीत् ॥ १४ ॥

सभी तीर्थस्थानोंमें स्वाध्यायशील होकर स्नान करे । मनुने कहा है कि सर्वत्यागरूप संन्यास सम्पूर्ण पवित्र धर्मोंमें श्रेष्ठ है ॥ १४ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथाः सत्यवता कृताः ।

यथा कुमारः सत्यो वै नैव पुण्यो न पापकृत् ॥ १५ ॥

इस विषयमें भी सत्यवान् द्वारा निर्मित हुई इन गाथाओंका उदाहरण दिया जाता है । जैसे बालक रण - द्वेषसे शून्य होनेके कारण सदा सत्यपरायण ही रहता है । न तो वह पुण्य करता है और न पाप ही । इसी प्रकार प्रत्येक श्रेष्ठ पुरुषको भी होना चाहिये ॥ १५ ॥

न ह्यस्ति सर्वभूतेषु दुःखमस्मिन् कुतः सुखम् ।

एवं प्रकृतिभूतानां सर्वसंसर्गयायिनाम् ॥ १६ ॥

त्यजतां जीवितं श्रेयो निवृत्ते पुण्यपापके । इस संसारके सम्पूर्ण प्राणियोंमें जब दुःख ही नहीं है, तब सुख कहाँसे हो सकता है? यह सुख और दुःख दोनों ही प्रकृतिस्थ प्राणियोंके धर्म हैं, जो कि सब प्रकारके संसर्गदोषको स्वीकार करके उनके अनुसार चलते हैं । जिन्होंने ममता और अहंकार आदिके साथ सब कुछ त्याग दिया है, जिनके पुण्य और पाप सभी निवृत्त हो चुके हैं, ऐसे पुरुषोंका जीवन ही कल्याणमय है ॥ १६३ ॥

यत्त्वेव राज्ञो ज्यायिष्ठं कार्याणां तद् ब्रवीमि ते ॥ १७ ॥

बलेन संविभागैश्च जय स्वर्गं जनेश्वर ।

यस्यैव बलमोजश्च स धर्मस्य प्रभुर्नरः ॥ १८ ॥

अब मैं राजाके कार्योंमें जो सबसे श्रेष्ठ है, उसका वर्णन करता हूँ। जनेश्वर! तुम धैर्ययुक्त बल और दानके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त करो । जिसके पास बल और ओज है, वही मनुष्य धर्माचरणमें समर्थ होता है ॥ १७-१८ ॥

ब्राह्मणानां सुखार्थं हि त्वं पाहि वसुधां नृप ।

यथैवैतान् पुराऽऽक्षैप्सीस्तथैवैतान् प्रसादय ॥ १ ९ ॥

नरेश्वर! तुम ब्राह्मणोंको सुख पहुँचानेके लिये ही सारी पृथ्वीका पालन करो । जैसे पहले इन ब्राह्मणोंपर आक्षेप किया था, वैसे इन सबको अपने सद्बर्तावसे प्रसन्न करो ॥ १ ९ ॥ अपि धिक्क्रियमाणोऽपि त्यज्यमानोऽप्यनेकधा ।

आत्मनो दर्शनाद् विप्रान्न हन्तास्मीति मार्गय ।

घटमानः स्वकार्येषु कुरु निःश्रेयसं परम् ॥ २० ॥

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वे बार- बार तुम्हें धिक्कारें और फटकारकर दूर हटा दें तो भी उनमें आत्मदृष्टि रखकर तुम यही निश्चय करो कि अब मैं ब्राह्मणोंको नहीं मारूंगा । अपने कर्तव्यपालनके लिये पूरी चेष्टा करते हुए परम कल्याणका साधन करो ॥ २० ॥

हिमाग्निघोरसदृशो राजा भवति कश्चन ।

लांगलाशनिकल्पो वा भवेदन्यः परंतप ॥ २१ ॥

परंतप! कोई राजा बर्फके समान शीतल होता है, कोई अग्निके समान ताप देनेवाला होता है, कोई यमराजके समान भयानक जान पड़ता है, कोई घास- फूसका मूलोच्छेद करनेवाले हलके समान दुष्टोंका समूल उन्मूलन करनेवाला होता है तथा कोई पापा-चारियोंपर अकस्मात् वज्रके समान टूट पड़ता है ॥ २१ ॥

न विशेषेण गन्तव्यमविच्छिन्नेन वा पुनः ।

न जातु नाहमस्मीति सुप्रसक्तमसाधुषु ॥ २२ ॥

कभी मेरा अभाव नहीं हो जाय, ऐसा समझकर राजाको चाहिये कि दुष्ट पुरुषोंका संग कभी न करे। न तो उनके किसी विशेष गुणपर आकृष्ट हो, न उनके साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध स्थापित करे और न उनमें अत्यन्त आसक्त ही हो ॥ २२ ॥

विकर्मणा तप्यमानः पापाद् विपरिमुच्यते ।

नैतत् कार्यं पुनरिति द्वितीयात् परिमुच्यते ॥ २३ ॥

यदि कोई शास्त्रविरुद्ध कर्म बन जाय तो उसके लिये पश्चात्ताप करनेवाला पुरुष पापसे मुक्ता हो जाता है । यदि दूसरी बार पाप बन जाय तो ' अब फिर ऐसा काम नहीं करूँगा ' ऐसी प्रतिज्ञा करनेसे वह पापमुक्त हो सकता है ॥ २३ ॥

करिष्ये धर्ममेवेति तृतीयात् परिमुच्यते ।

शुचिस्तीर्थान्यनुचरन् बहुत्वात्परिमुच्यते ॥ २४ ॥

‘ आजसे केवल धर्मका ही आचरण करूँगा' ऐसा नियम लेनेसे वह तीसरी बारके पापसे छुटकारा पा जाता है और पवित्र तीर्थोंमें विचरण करनेवाला पुरुष अनेक बारके किये हुए बहुसंख्यक पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २४ ॥

कल्याणमनुकर्तव्यं पुरुषेण बुभूषता ।

ये सुगन्धीनि सेवन्ते तथागन्धा भवन्ति ते ॥ २५ ॥

ये दुर्गन्धीनि सेवते तथागन्धा भवन्ति ते ।

तपश्चर्यापरः सद्यः पापाद् विपरिमुच्यते ॥ २६ ॥

सुखकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषको कल्याणकारी कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये । जो सुगन्धित पदार्थोंका सेवन करते हैं, उनके शरीरसे सुगन्ध निकलती है और जो सदा दुर्गन्धका सेवन करते हैं, वे अपने शरीरसे दुर्गन्ध ही फैलाते हैं । जो मनुष्य तपस्यामें तत्पर होता है, वह तत्काल सारे पापोंसे मुक्ता हो जाता है ॥ २५-२६ ॥ संवत्सरमुपास्याग्निमभिशस्तः प्रमुच्यते ।

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त्रीणि वर्षाण्युपास्याग्निं भ्रूणहा विप्रमुच्यते ॥ २७ ॥

लगातार एक वर्षतक अग्निहोत्र करनेसे कलंकित पुरुष अपने ऊपर लगे हुए कलंकसे छूट जाता है । तीन वर्षोंतक अग्निकी उपासना करनेसे भ्रूणहत्यारा भी पापमुक्त हो जाता ॥ २७ ॥

महासरः पुष्कराणि प्रभासोत्तरमानसे ।

अभ्येत्य योजनशतं भ्रूणहा विप्रमुच्यते ॥ २८ ॥

महासरोवर पुष्कर, प्रभास तीर्थ तथा उत्तर मानसरोवर आदि तीर्थोंमें सौ योजनतककी पैदल यात्रा करनेसे भी भ्रूणहत्याके पापसे छुटकारा मिल जाता है ॥ २८ ॥

यावतः प्राणिनो हन्यात् तज्जातीयांस्तु तावतः ।

प्रमीयमानानुन्मोच्य प्राणिहा विप्रमुच्यते ॥ २ ९ ॥

प्राणियोंकी हत्या करनेवाला मनुष्य जितने प्राणियोंका वध करता है, उसी जातिके उतने ही प्राणियोंको मृत्युसे छुटकारा दिला दे अर्थात् उनको मरनेके संकटसे छुड़ा दे तो वह उनकी हत्याके पापसे मुक्त हो जाता है ॥ २ ९ ॥

अपि चाप्सु निमज्जेत जपेस्त्रिरघमर्षणम् ।

यथाश्वमेधावभृथस्तथा तन्मनुरब्रवीत् ॥ ३० ॥

यदि मनुष्य तीन बार अघमर्षणका जप करते हुए जलमें गोता लगावे तो उसे अश्वमेधयज्ञमें अवभृथस्नान करनेका फल मिलता है, ऐसा मनुजीने कहा है ॥ ३० ॥

तत् क्षिप्रं नुदते पापं सत्कारं लभते तथा ।

अपि चैनं प्रसीदन्ति भूतानि जडमूकवत् ॥ ३१ ॥

वह अघमर्षण मन्त्रका जप करनेवाला मनुष्य शीघ्र ही अपने सारे पापोंको दूर कर देता है और उसे सर्वत्र सम्मान प्राप्त होता है । सब प्राणी जड एवं मूकके समान उसपर प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ३१ ॥

बृहस्पतिं देवगुरुं सुरासुराः सर्वे समेत्याभ्यनुयुज्य राजन् । धर्म्यं फलं वेत्थ फलं महर्षे तथैव तस्मिन्नरके पारलोक्ये ॥ ३२ ॥

उभे तु यस्य सदृशे भवेतां किंस्वित् तयोस्तत्र जयोऽथ न स्यात् । आचक्ष्व नः पुण्यफलं महर्षे कथं पापं नुदते धर्मशीलः ॥ ३३ ॥

राजन्! एक समय सब देवताओं और असुरोंने बड़े आदरके साथ देवगुरु बृहस्पतिके निकट जाकर पूछा— ' महर्षे! आप धर्मका फल जानते हैं। इसी प्रकार परलोकमें जो पापोंके फलस्वरूप नरकका कष्ट भोगना पड़ता है, वह भी आपसे अज्ञात नहीं है, परंतु

पृष्ठ 1000

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जिस योगीके लिये सुख और दुःख दोनों समान हैं, वह उन दोनोंके कारणरूप पुण्य और पापको जीत लेता है या नहीं । महर्षे! आप हमारे समक्ष पुण्यके फलका वर्णन करें और यह भी बतावें कि धर्मात्मा पुरुष अपने पापोंका नाश कैसे करता है? ' ॥ ३२-३३ ॥ बृहस्पतिरुवाच कृत्वा पापं पूर्वमबुद्धिपूर्वं पुण्यानि चेत्कुरुते बुद्धिपूर्वम् । स तत् पापं नुदते कर्मशीलो वासो यथा मलिनं क्षारयुक्तम् ॥ ३४ ॥

बृहस्पतिजीने कहा – यदि मुनष्य पहले बिना जाने पाप करके फिर जान - बूझकर पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करता है तो वह सत्कर्मपरायण पुरुष अपने पापको उसी प्रकार दूर कर देता है, जैसे क्षार ( सोडा, साबुन आदि) लगानेसे कपड़े का मैल छूट जाता है ॥ ३४ ॥

पापं कृत्वाभिमन्येत नाहमस्मीति पूरुषः ।

तच्चिकीर्षति कल्याणं श्रद्दधानोऽनसूयकः ॥ ३५ ॥

मनुष्यको चाहिये कि वह पाप करके अहंकार न प्रकट करे – हेकड़ी न दिखावे, अपितु श्रद्धापूर्वक दोषदृष्टिका परित्याग करके कल्याणमय धर्मके अनुष्ठानकी इच्छा करे ॥ ३५ ॥

छिद्राणि विवृतान्येव साधूनां चावृणोति यः ।

यः पापं पुरुषः कृत्वा कल्याणमभिपद्यते ॥ ३६ ॥

जो मनुष्य श्रेष्ठ पुरुषोंके खुले हुए छिद्रोंको ढकता है अर्थात् उनके प्रकट हुए दोषोंको भी छिपानेकी चेष्टा करता है तथा जो पाप करके उससे विरत हो कल्याणमय कर्ममें लग जाता है, वे दोनों ही पापरहित हो जाते हैं ॥ ३६ ॥

यथाऽऽदित्यः प्रातरुद्यंस्तमः सर्वं व्यपोहति ।

कल्याणमाचरन्नेवं सर्वपापं व्यपोहति ॥ ३७ ॥

जैसे सूर्य प्रातःकाल उदित होकर सारे अन्धकारको नष्ट कर देता है उसी प्रकार शुभकर्मका आचरण करनेवाला पुरुष अपने सभी पापोंका अन्त कर देता है ॥ ३७ ॥

भीष्मउवाच

एवमुक्त्वा तु राजानमिन्द्रोतो जनमेजयम् ।

याजयामास विधिवत् वाजिमेधेन शौनकः ॥ ३८ ॥

भीष्मजी कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर शौनक इन्द्रोतने राजा जनमेजयसे विधिपूर्वक अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराया ॥ ३८ ॥

ततः स राजा व्यपनीतकल्मषः श्रेयोवृतः प्रज्वलिताग्निरूपवान् । विवेश राज्यं स्वममित्रकर्षणो