श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 101–110
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110
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नवमोऽध्यायः ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको दान देनेकी महिमा युधिष्ठिर उवाच
ब्राह्मणानां तु ये लोकाः प्रतिश्रुत्य पितामह ।
न प्रयच्छन्ति मोहात् ते के भवन्ति महाद्युते ॥ १ ॥
एतन्मे तत्त्वतो ब्रूहि धर्मं धर्मभृतां वर ।
प्रतिश्रुत्य दुरात्मानो न प्रयच्छन्ति ये नराः ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी पितामह! जो लोग ब्राह्मणोंको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर मोहवश नहीं देते जो दुरात्मा दानका संकल्प करके भी दान नहीं देते वे क्या होते हैं? यह धर्मका विषय मुझे यथार्थरूपसे बताइये ॥ १-२ ॥ भीष्म उवाच
यो न दद्यात् प्रतिश्रुत्य स्वल्पं वा यदि वा बहु ।
आशास्तस्य हताः सर्वाः क्लीबस्येव प्रजाफलम् ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! जो थोड़ा या अधिक देनेकी प्रतिज्ञा करके उसे नहीं देता है, उसकी सभी आशाएँ वैसे ही नष्ट हो जाती हैं जैसे नपुंसककी संतानरूपी फलविषयक आशा ॥ ३ ॥
यां रात्रिं जायते जीवो यां रात्रिं च विनश्यति ।
एतस्मिन्नन्तरे यद् यत् सुकृतं तस्य भारत ॥ ४ ॥
यच्च तस्य हुतं किंचिद् दत्तं वा भरतर्षभ ।
तपस्तप्तमथो वापि सर्वं तस्योपहन्यते ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! जीव जिस रातको जन्म लेता है और जिस रातको उसकी मौत होती है— इन दोनों रात्रियोंके बीचमें जीवनभर वह जो-जो पुण्यकर्म करता है, भरतश्रेष्ठ! उसने आजीवन जो कुछ होम, दान तथा तप किया होता है, उसका वह सब कुछ उस प्रतिज्ञा- भंगके पापसे नष्ट हो जाता है ॥ ४-५ ॥
अथैतद्वचनं प्राहुर्धर्मशास्त्रविदो जनाः ।
निशम्य भरतश्रेष्ठ बुद्ध्या परमयुक्तया ॥ ६ ॥
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भरतश्रेष्ठ! धर्मशास्त्रके ज्ञाता मनुष्य अपनी परम योगयुक्त बुद्धिसे विचार करके यह उपर्युक्त बात कहते हैं ॥ ६ ॥
अपि चोदाहरन्तीमं धर्मशास्त्रविदो जनाः ।
अश्वानां श्यामकर्णानां सहस्रेण स मुच्यते ॥ ७ ॥
धर्मशास्त्रोंके विद्वान् यह भी कहते हैं कि प्रतिज्ञा- भंगका पाप करनेवाला पुरुष एक हजार श्यामकर्ण घोड़ोंका दान करनेसे उस पापसे मुक्त होता है ॥ ७ ॥
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
शृगालस्य च संवादं वानरस्य च भारत ॥ ८ ॥
भारत! इस विषयमें विज्ञ पुरुष सियार और वानरके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ८ ॥
तौ सखायौ पुरा ह्यास्तां मानुषत्वे परंतप ।
अन्यां योनिं समापन्नौ शार्गालीं वानरीं तथा ॥ ९ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! मनुष्य जन्ममें जो दोनों पहले एक-दूसरेके मित्र थे, वे ही दूसरे जन्ममें सियार और वानरकी योनिमें प्राप्त हो गये ॥ ९ ॥
ततः परासून् खादन्तं शृगालं वानरोऽब्रवीत् ।
श्मशानमध्ये सम्प्रेक्ष्य पूर्वजातिमनुस्मरन् ॥ १० ॥
किं त्वया पापकं पूर्वं कृतं कर्म सुदारुणम् ।
यस्त्वं श्मशाने मृतकान् पूतिकानत्सि कुत्सितान् ॥ ११ ॥
तदनन्तर एक दिन सियारको मरघटमें मुर्दे खाता देख वानरने पूर्व जन्मका स्मरण करके पूछा — ‘ भैया! तुमने पहले जन्ममें कौन- सा भयंकर पाप किया था, जिससे तुम मरघटमें घृणित एवं दुर्गन्धयुक्त मुर्दे खा रहे हो? ' ॥ १०-११ ॥
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एवमुक्तः प्रत्युवाच शृगालो वानरं तदा ।
ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुत्य न मया तदुपाहृतम् ॥ १२ ॥
तत्कृते पापकीं योनिमापन्नोऽस्मि प्लवङ्गम ।
तस्मादेवंविधं भक्ष्यं भक्षयामि बुभुक्षितः ॥ १३ ॥
वानरके इस प्रकार पूछनेपर सियारने उसे उत्तर दिया-' भाई वानर! मैंने ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके वह वस्तु उसे नहीं दी थी । इसीके कारण मैं इस पापयोनिमें आ पड़ा हूँ और उसी पापसे भूखा होनेपर मुझे इस तरहका घृणित भोजन करना पड़ता है ' ॥ १२-१३ ॥ भीष्मउवाच
शृगालो वानरं प्राह पुनरेव नरोत्तम ।
किं त्वया पातकं कर्म कृतं येनासि वानरः ॥ १४ ॥
भीष्मजी कहते हैं - नरश्रेष्ठ! इसके बाद सियारने वानरसे पुनः पूछा — ' तुमने कौन-सा पाप किया था? जिससे वानर हो गये? ' ॥ १४ ॥
वानर उवाच सदा चाहं फलाहारो ब्राह्मणानां प्लवङ्गमः ।
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तस्मान्न ब्राह्मणस्वं तु हर्तव्यं विदुषा सदा ।
समं विवादो मोक्तव्यो दातव्यं स प्रतिश्रुतम् ॥ १५ ॥
वानरने कहा- मैं सदा ब्राह्मणोंका फल चुराकर खाया करता था; इसी पापसे वानर हुआ । अतः विज्ञ पुरुषको कभी ब्राह्मणका धन नहीं चुराना चाहिये । उनके साथ कभी झगड़ा नहीं करना चाहिये और उनके लिये जो वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा की गयी हो, वह अवश्य दे देनी चाहिये ॥ १५ ॥
भीष्म उवाच
इत्येतद् ब्रुवतो राजन् ब्राह्मणस्य मया श्रुतम् ।
कथां कथयतः पुण्यां धर्मज्ञस्य पुरातनीम् ॥ १६ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! यह कथा मैंने एक धर्मज्ञ ब्राह्मणके मुखसे सुनी है; जो प्राचीनकालकी पवित्र कथाएँ सुनाता था ॥ १६ ॥
श्रुतश्चापि मया भूयः कृष्णस्यापि विशाम्पते ।
कथां कथयतः पूर्वं ब्राह्मणं प्रति पाण्डव ॥ १७ ॥
प्रजानाथ! पाण्डुनन्दन! फिर मैंने यही बात भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे भी सुनी थी; जब कि वे पहले किसी ब्राह्मणसे ऐसी ही कथा कह रहे थे ॥ १७ ॥
न हर्तव्यं विप्रधनं क्षन्तव्यं तेषु नित्यशः ।
बालाश्च नावमन्तव्या दरिद्राः कृपणा अपि ॥ १८ ॥
ब्राह्मणका धन कभी नहीं चुराना चाहिये । वे अपराध करें तो भी सदा उनके प्रति क्षमाभाव ही रखना चाहिये । वे बालक, दरिद्र अथवा दीन हों तो भी उनका अनादर नहीं करना चाहिये ॥ १८ ॥
एवमेव च मां नित्यं ब्राह्मणाः संदिशन्ति वै ।
प्रतिश्रुत्य भवेद् देयं नाशा कार्या द्विजोत्तमे ॥ १ ९ ॥
ब्राह्मणलोग भी मुझे सदा यही उपदेश दिया करते थे कि प्रतिज्ञा कर लेनेपर वह वस्तु ब्राह्मणको दे ही देनी चाहिये । किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणकी आशा भंग नहीं करनी चाहिये ॥ १ ९ ॥
ब्राह्मणो ह्याशया पूर्वं कृतया पृथिवीपते ।
सुसमिद्धो यथा दीप्तः पावकस्तद्विधः स्मृतः ॥ २० ॥
पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणको पहले आशा दे देनेपर वह समिधासे प्रज्वलित हुई अग्निके समान उद्दीप्त हो उठता है ॥
यं निरीक्षेत संक्रुद्ध आशया पूर्वजातया ।
प्रदहेच्च हि तं राजन् कक्षमक्षय्यभुग् यथा ॥ २१ ॥
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राजन्! पहलेकी लगी हुई आशा भंग होनेसे अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण जिसकी ओर देख लेता है, उसे उसी प्रकार जलाकर भस्म कर डालता है, जैसे अग्नि सूखी लकड़ी अथवा तिनकोंके बोझको जला देती है ॥ २१ ॥
स एव हि यदा तुष्टो वचसा प्रतिनन्दति ।
भवत्यगदसंकाशो विषये तस्य भारत ॥ २२ ॥
भारत! वही ब्राह्मण जब आशापूर्तिसे संतुष्ट होकर वाणीद्वारा राजाका अभिनन्दन करता है — उसे आशीर्वाद देता है, तब उसके राज्यके लिये वह चिकित्सकके तुल्य हो जाता है ॥ २२ ॥
पुत्रान् पौत्रान् पशूंश्चैव बान्धवान् सचिवांस्तथा ।
पुरं जनपदं चैव शान्तिरिष्टेन पोषयेत् ॥ २३ ॥
तथा उस दाताके पुत्र - पौत्र, बन्धु- बान्धव, पशु, मन्त्री, नगर और जनपदके लिये वह शान्तिदायक बनकर उन्हें कल्याणका भागी बनाता और उन सबका पोषण करता है ॥ २३ ॥
एतद्धि परमं तेजो ब्राह्मणस्येह दृश्यते ।
सहस्रकिरणस्येव सवितुर्धरणीतले ॥ २४ ॥
इस पृथ्वीपर ब्राह्मणका उत्कृष्ट तेज सहस्र किरणोंवाले सूर्यदेवके समान दृष्टिगोचर होता है ॥ २४ ॥
तस्माद् दातव्यमेवेह प्रतिश्रुत्य युधिष्ठिर ।
यदीच्छेच्छोभनां जातिं प्राप्तुं भरतसत्तम ॥ २५ ॥
भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! इसलिये जो उत्तम योनिमें जन्म लेना चाहता हो, उसे ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा की हुई वस्तु अवश्य दे डालनी चाहिये ॥ २५ ॥
ब्राह्मणस्य हि दत्तेन ध्रुवं स्वर्गो ह्यनुत्तमः ।
शक्यः प्राप्तुं विशेषेण दानं हि महती क्रिया ॥ २६ ॥
ब्राह्मणको दान देनेसे निश्चय ही परम उत्तम स्वर्गलोकको विशेष रूपसे प्राप्त किया जा सकता है; क्योंकि दान महान् पुण्यकर्म है ॥ २६ ॥
इतो दत्तेन जीवन्ति देवताः पितरस्तथा ।
तस्माद् दानानि देयानि ब्राह्मणेभ्यो विजानता ॥ २७ ॥
इस लोकमें ब्राह्मणको दान देनेसे देवता और पितर तृप्त होते हैं; इसलिये विद्वान् पुरुष ब्राह्मणको अवश्य दान दे ॥ २७ ॥
महद्धि भरतश्रेष्ठ ब्राह्मणस्तीर्थमुच्यते ।
वेलायां न तु कस्यांचिद् गच्छेद् विप्रो ह्यपूजितः ॥ २८ ॥
भरतश्रेष्ठ! ब्राह्मण महान् तीर्थ कहे जाते हैं; अतः वे किसी भी समय घरपर आ जायँ तो बिना सत्कार किये उन्हें नहीं जाने देना चाहिये ॥ २८ ॥
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शृगालवानरसंवादे नवमोऽध्यायः ॥९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सियार और वानरका संवादविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
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दशमोऽध्यायः अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा युधिष्ठिरउवाच
मित्रसौहार्दयोगेन उपदेशं करोति यः ।
जात्याधरस्य राजर्षेर्दोषस्तस्य भवेन्न वा ॥ १ ॥
एतदिच्छामि तत्त्वेन व्याख्यातुं वै पितामह ।
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य यत्र मुह्यन्ति मानवाः ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! यदि कोई मित्रता या सौहार्दके सम्बन्धसे किसी नीच जातिके मनुष्यको उपदेश देता है तो उस राजर्षिको दोष लगेगा या नहीं? मैं इस बातको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ । आप इसका विशदरूपसे विवेचन करें; क्योंकि धर्मकी गति सूक्ष्म है, जहाँ मनुष्य मोहमें पड़ जाते हैं ॥ १-२ ॥ भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्यामि शृणु राजन् यथाक्रमम् ।
ऋषीणां वदतां पूर्वं श्रुतमासीत् यथा पुरा ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! इस विषयमें पूर्वकालमें ऋषियोंके मुखसे जैसा मैंने सुना है, उसी क्रमसे बताऊँगा, तुम ध्यान देकर सुनो ॥ ३ ॥
उपदेशो न कर्तव्यो जातिहीनस्य कस्यचित् ।
उपदेशे महान् दोष उपाध्यायस्य भाष्यते ॥ ४ ॥
किसी भी नीच जातिके मनुष्यको उपदेश नहीं देना चाहिये । उसे उपदेश देनेपर उपदेशक आचार्यके लिये महान् दोष बताया जाता है ॥ ४ ॥
निदर्शनमिदं राजन् शृणु मे भरतर्षभ ।
दुरुक्तवचने राजन् यथापूर्वं युधिष्ठिर ॥ ५ ॥
भरतभूषण राजा युधिष्ठिर! इस विषयमें एक दृष्टान्त सुनो, जो दुःखमें पड़े हुए एक नीच जातिके पुरुषको उपदेश देनेसे सम्बन्धित है ॥ ५ ॥
ब्रह्माश्रमपदे वृत्तं पार्श्वे हिमवतः शुभे ।
तत्राश्रमपदं पुण्यं नानावृक्षगणायुतम् ॥ ६ ॥
हिमालयके सुन्दर पार्श्वभागमें, जहाँ बहुत- से ब्राह्मणोंके आश्रम बने हुए हैं, यह वृत्तान्त घटित हुआ था । उस प्रदेशमें एक पवित्र आश्रम है जहाँ नाना प्रकारके हरे - भरे वृक्ष शोभा पाते हैं ॥ ६ ॥
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नानागुल्मलताकीर्णं मृगद्विजनिषेवितम् ।
सिद्धचारणसंयुक्तं रम्यं पुष्पितकाननम् ॥ ७ ॥
नाना प्रकारकी लता - बेलें वहाँ छायी हुई हैं । मृग और पक्षी उस आश्रमका सेवन करते हैं । सिद्ध और चारण वहाँ सदा निवास करते हैं । उस रमणीय आश्रमके आस- पासका वन सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित है ॥ ७ ॥
व्रतिभिर्बहुभिः कीर्णं तापसैरुपसेवितम् ।
ब्राह्मणैश्च महाभागैः सूर्यज्वलनसंनिभैः ॥ ८ ॥
बहुत- से व्रतपरायण तपस्वी उस आश्रमका सेवन करते हैं । कितने ही सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी महाभाग ब्राह्मण वहाँ भरे रहते हैं ॥ ८ ॥
नियमव्रतसम्पन्नैः समाकीर्णं तपस्विभिः ।
दीक्षितैर्भरतश्रेष्ठ यताहारैः कृतात्मभिः ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! नियम और व्रतसे सम्पन्न, तपस्वी, दीक्षित, मिताहारी और जितात्मा मुनियोंसे वह आश्रम भरा रहता है ॥ ९ ॥
तपोऽध्ययनघोषैश्च नादितं भरतर्षभ ।
वालखिल्यैश्च बहुभिर्यतिभिश्च निषेवितम् ॥ १० ॥
भरतभूषण! वहाँ सब ओर वेदाध्ययनकी ध्वनि गूँजती रहती है । बहुत- से वालखिल्य एवं संन्यासी उस आश्रमका सेवन करते हैं ॥ १० ॥
तत्र कश्चित् समुत्साहं कृत्वा शूद्रो दयान्वितः ।
आगतो ह्याश्रमपदं पूजितश्च तपस्विभिः ॥ ११ ॥
उसी आश्रममें कोई दयालु शूद्र बड़ा उत्साह करके आया । वहाँ रहनेवाले तपस्वी ऋषियोंने उसका बड़ा आदर - सत्कार किया ॥ ११ ॥
तांस्तु दृष्ट्वा मुनिगणान् देवकल्पान् महौजसः ।
विविधां वहतो दीक्षां सम्प्राहृष्यत भारत ॥ १२ ॥
भरतनन्दन! उस आश्रमके महातेजस्वी देवोपम मुनियोंको नाना प्रकारकी दीक्षा धारण किये देख उस शूद्रको बड़ा हर्ष हुआ ॥ १२ ॥
अथास्य बुद्धिरभवत् तपस्ये भरतर्षभ ।
ततोऽब्रवीत् कुलपतिं पादौ संगृह्य भारत ॥ १३ ॥
भारत! भरतभूषण! उसके मनमें वहाँ तपस्या करनेका विचार उत्पन्न हुआ; अतः उसने कुलपतिके पैर पकड़कर कहा— ॥ १३ ॥
भवत्प्रसादादिच्छामि धर्मं वक्तुं द्विजर्षभ ।
तन्मां त्वं भगवन् वक्तुं प्रव्राजयितुमर्हसि ॥ १४ ॥
' द्विजश्रेष्ठ! मैं आपकी कृपासे धर्मका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ । अतः भगवन्! आप मुझे विधिवत् संन्यासीकी दीक्षा दे दें ' ॥ १४ ॥
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वर्णावरोऽहं भगवन् शूद्रो जात्यास्मि सत्तम ।
शुश्रूषां कर्तुमिच्छामि प्रपन्नाय प्रसीद मे ॥ १५ ॥
‘ भगवन्! साधुशिरोमणे! मैं वर्णोंमें सबसे छोटा शूद्र जातिका हूँ और यहीं रहकर संतोंकी सेवा करना चाहता हूँ; अतः मुझ शरणागतपर आप प्रसन्न हों' ॥ १५ ॥
कुलपतिरुवाच
न शक्यमिह शूद्रेण लिङ्गमाश्रित्य वर्तितुम् ।
आस्यतां यदि ते बुद्धिः शुश्रूषानिरतो भव ॥ १६ ॥
शुश्रूषया पराँल्लोकानवाप्स्यसि न संशयः ॥ १७ ॥
कुलपतिने कहा —इस आश्रममें कोई शूद्र संन्यासका चिह्न धारण करके नहीं रह सकता । यदि तुम्हारा विचार यहाँ रहनेका हो तो यों ही रहो और साधु - महात्माओंकी सेवा करो । सेवासे ही तुम उत्तम लोक प्राप्त कर लोगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १६-१७ ॥ भीष्म उवाच
एवमुक्तस्तु मुनिना स शूद्रोऽचिन्तयन्नृप ।
कथमत्र मया कार्यं श्रद्धा धर्मपरा च मे ॥ १८ ॥
भीष्मजी कहते हैं— नरेश्वर! मुनिके ऐसा कहनेपर शूद्रने सोचा, यहाँ मुझे क्या करना चाहिये? मेरी श्रद्धा तो संन्यास - धर्मके अनुष्ठानके लिये ही है ॥ १८ ॥
विज्ञातमेवं भवतु करिष्ये प्रियमात्मनः ।
गत्वाऽऽश्रमपदाद् दूरमुटजं कृतवांस्तु सः ॥ १ ९ ॥
अच्छा, एक बात समझमें आयी । शूद्रके लिये ऐसा ही विधान हो तो रहे । मैं तो वही करूँगा जो मुझे प्रिय लगता है - ऐसा विचारकर उसने उस आश्रमसे दूर जाकर एक पर्णकुटी बना ली ॥ १ ९ ॥
तत्र वेदीं च भूमिं च देवतायतनानि च ।
निवेश्य भरतश्रेष्ठ नियमस्थोऽभवन्मुनिः ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँ यज्ञके लिये वेदी, रहनेके लिये स्थान और देवालय बनाकर मुनिकी भाँति नियमपूर्वक रहने लगा ॥ २० ॥
अभिषेकांश्च नियमान् देवतायतनेषु च ।
बलिं च कृत्वा हुत्वा च देवतां चाप्यपूजयत् ॥ २१ ॥
वह तीनों समय नहाता, नियमोंका पालन करता, देव-स्थानोंमें पूजा चढ़ाता, अग्निमें आहुति देता और देवताकी पूजा करता था ॥ २१ ॥
संकल्पनियमोपेतः फलाहारो जितेन्द्रियः ।
नित्यं संनिहिताभिस्तु ओषधीभिः फलैस्तथा ॥ २२ ॥
अतिथीन् पूजयामास यथावत् समुपागतान् ।
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एवं हि सुमहान् कालो व्यत्यक्रामत तस्य वै ॥ २३ ॥
वह मानसिक संकल्पोंका नियन्त्रण (चित्तवृतियोंका निरोध) करते हुए फल खाकर रहता और इन्द्रियोंको काबूमें रखता था । उसके यहाँ जो अन्न और फल उपस्थित रहता, उन्हींके द्वारा प्रतिदिन आये हुए अतिथियोंका यथोचित सत्कार करता था । इस प्रकार रहते उस शूद्र मुनिको बहुत समय बीत गया ॥
अथास्य मुनिरागच्छत् संगत्या वै तमाश्रमम् ।
सम्पूज्य स्वागतेनर्षिं विधिवत् समतोषयत् ॥ २४ ॥
एक दिन एक मुनि सत्संगकी दृष्टिसे उसके आश्रमपर पधारे । उस शूद्रने विधिवत् स्वागत - सत्कार करके ऋषिका पूजन किया और उन्हें संतुष्ट कर दिया ॥
अनुकूलाः कथाः कृत्वा यथागतमपृच्छत ।
ऋषिः परमतेजस्वी धर्मात्मा संशितव्रतः ॥ २५ ॥
एवं सुबहुशस्तस्य शूद्रस्य भरतर्षभ ।
सोऽगच्छदाश्रममृषिः शूद्रं द्रष्टुं नरर्षभ ॥ २६ ॥
भरतभूषण नरश्रेष्ठ! तत्पश्चात् उसने अनुकूल बातें करके उनके आगमनका वृत्तान्त पूछा । तबसे कठोर व्रतका पालन करनेवाले वे परम तेजस्वी धर्मात्मा ऋषि अनेक बार उस शूद्रके आश्रमपर उससे मिलनेके लिये आये ॥ २५-२६ ॥
अथ तं तापसं शूद्रः सोऽब्रवीद् भरतर्षभ ।
पितृकार्यं करिष्यामि तत्र मेऽनुग्रहं कुरु ॥ २७ ॥
भरतश्रेष्ठ! एक दिन उस शूद्रने उन तपस्वी मुनिसे कहा- ' मैं पितरोंका श्राद्ध करूँगा । आप उसमें मुझपर अनुग्रह कीजिये ' ॥ २७ ॥
बाढमित्येव तं विप्र उवाच भरतर्षभ ।
शुचिर्भूत्वा स शूद्रस्तु तस्यर्षेः पाद्यमानयत् ॥ २८ ॥
भरतभूषण नरेश! तब ब्राह्मणने ' बहुत अच्छा' कहकर उसका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया । तत्पश्चात् शूद्र नहा- धोकर शुद्ध हो उन ब्रह्मर्षिके पैर धोनेके लिये जल ले आया ॥ २८ ॥
अथ दर्भांश्च वन्यांश्च ओषधीर्भरतर्षभ ।
पवित्रमासनं चैव बृसीं च समुपानयत् ॥ २ ९ ॥
भरतर्षभ! तदनन्तर वह जंगली कुशा, अन्न आदि ओषधि, पवित्र आसन और कुशकी चटाई ले आया ॥
अथ दक्षिणमावृत्य बृसीं चरमशैर्षिकीम् ।
कृतामन्यायतो दृष्ट्वा तं शूद्रमृषिरब्रवीत् ॥ ३० ॥
उसने दक्षिण दिशामें ले जाकर ब्राह्मणके लिये पाश्चिमाग्र चटाई बिछा दी । यह शास्त्रके विपरीत अनुचित आचार देखकर ऋषिने शूद्रसे कहा— ॥ ३० ॥