श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 111–120
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120
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कुरुष्वैतां पूर्वशीर्षां भवांश्चोदङ्मुखः शुचिः ।
स च तत् कृतवान् शूद्रः सर्वं यदृषिरब्रवीत् ॥ ३१ ॥
' तुम इस कुशकी चटाईका अग्रभाग तो पूर्व दिशाकी ओर करो और स्वयं शुद्ध होकर उत्तराभिमुख बैठो । ' ऋषिने जो-जो कहा, शूद्रने वह सब किया ॥ ३१ ॥
यथोपदिष्टं मेधावी दर्भार्घ्यादि यथातथम् ।
हव्यकव्यविधिं कृत्स्नमुक्तं तेन तपस्विना ॥ ३२ ॥
बुद्धिमान् शूद्रने कुश, अर्घ्य आदि तथा हव्य -कव्यकी विधि- सब कुछ उन तपस्वी मुनिके उपदेशके अनुसार ठीक- ठीक किया ॥ ३२ ॥
ऋषिणा पितृकार्ये च स च धर्मपथे स्थितः ।
पितृकार्ये कृते चापि विसृष्टः स जगाम ह ॥ ३३ ॥
ऋषिके द्वारा पितृकार्य विधिवत् सम्पन्न हो जानेपर वे ऋषि शूद्रसे विदा लेकर चले गये और वह शूद्र धर्ममार्गमें स्थित हो गया ॥ ३३ ॥
अथ दीर्घस्य कालस्य स तप्यन् शूद्रतापसः ।
वने पञ्चत्वमगमत् सुकृतेन च तेन वै ॥ ३४ ॥
अजायत महाराजवंशे स च महाद्युतिः । तदनन्तर दीर्घकालतक तपस्या करके वह शूद्र तपस्वी वनमें ही मृत्युको प्राप्त हुआ और उसी पुण्यके प्रभावसे एक महान् राजवंशमें महातेजस्वी बालकके रूपमें उत्पन्न हुआ ॥ ३४ ॥
तथैव स ऋषिस्तात कालधर्ममवाप ह ॥ ३५ ॥
पुरोहितकुले विप्र आजातो भरतर्षभ ।
एवं तौ तत्र सम्भूतावुभौ शूद्रमुनी तदा ॥ ३६ ॥
क्रमेण वर्धितौ चापि विद्यासु कुशलावुभौ ॥ ३७ ॥
तात! इसी प्रकार वे ऋषि भी कालधर्म- मृत्युको प्राप्त हुए । भरतश्रेष्ठ! वे ही ऋषि दूसरे जन्ममें उसी राजवंशके पुरोहितके कुलमें उत्पन्न हुए । इस प्रकार वह शूद्र और वे मुनि दोनों ही वहाँ उत्पन्न हुए, क्रमशः बढ़े और सब प्रकारकी विद्याओंमें निपुण हो गये ॥
अथर्ववेदे वेदे च बभूवर्षिः सुनिष्ठितः ।
कल्पप्रयोगे चोत्पन्ने ज्योतिषे च परं गतः ॥ ३८ ॥
सांख्ये चैव परा प्रीतिस्तस्य चैवं व्यवर्धत । वे ऋषि वेद और अथर्ववेदके परिनिष्ठित विद्वान् हो गये । कल्पप्रयोग और ज्योतिषमें भी पारंगत हुए। सांख्यमें भी उनका परम अनुराग बढ़ने लगा ॥ ३८३ ॥
पितर्युपरते चापि कृतशौचस्तु पार्थिव ॥ ३ ९ ॥ अभिषिक्तः प्रकृतिभी राजपुत्रः स पार्थिवः ।
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नरेश! पिताके परलोकवासी हो जानेपर शुद्ध होनेके पश्चात् मन्त्री और प्रजा आदिने मिलकर उस राजकुमारको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ अभिषिक्तेन स ऋषिरभिषिक्तः पुरोहितः ॥ ४० ॥
राजाने अभिषिक्त होनेके साथ ही उस ऋषिका भी पुरोहितके पदपर अभिषेक कर दिया ॥ ४० ॥
स तं पुरोधाय सुखमवसद् भरतर्षभ ।
राज्यं शशास धर्मेण प्रजाश्च परिपालयन् ॥ ४१ ॥
भरतश्रेष्ठ! ऋषिको पुरोहित बनाकर वह राजा सुखपूर्वक रहने और धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए राज्यका शासन करने लगा ॥ ४१ ॥
पुण्याहवाचने नित्यं धर्मकार्येषु चासकृत् ।
उत्स्मयन् प्राहसच्चापि दृष्ट्वा राजा पुरोहितम् ॥ ४२ ॥
जब पुरोहितजी प्रतिदिन पुण्याहवाचन करते और निरन्तर धर्मकार्यमें संलग्न रहते, उस समय राजा उन्हें देखकर कभी मुसकराते और कभी जोर- जोरसे हँसने लगते थे ॥ ४२ ॥
एवं स बहुशो राजन् पुरोधसमुपाहसत् ।
लक्षयित्वा पुरोधास्तु बहुशस्तं नराधिपम् ॥ ४३ ॥
उत्स्मयन्तं च सततं दृष्ट्वासौ मन्युमाविशत् । राजन्! इस प्रकार अनेक बार राजाने पुरोहितका उपहास किया । पुरोहितने जब अनेक बार और निरन्तर उस राजाको अपने प्रति हँसते और मुसकराते लक्ष्य किया, तब उनके मनमें बड़ा खेद और क्षोभ हुआ ॥ अथ शून्ये पुरोधास्तु सह राज्ञा समागतः ॥ ४४ ॥
कथाभिरनुकूलाभी राजानं चाभ्यरोचयत् । तदनन्तर एक दिन पुरोहितजी राजासे एकान्तमें मिले और मनोनुकूल कथाएँ सुनाकर राजाको प्रसन्न करने लगे ॥ ४४ ॥
ततोऽब्रवीन्नरेन्द्रं स पुरोधा भरतर्षभ ॥ ४५ ॥
वरमिच्छाम्यहं त्वेकं त्वया दत्तं महाद्युते ॥ ४६ ॥
भरतश्रेष्ठ! फिर पुरोहित राजासे इस प्रकार बोले— ' महातेजस्वी नरेश! मैं आपका दिया हुआ एक वर प्राप्त करना चाहता हूँ' ॥ ४५-४६ ॥ राजोवाच
वराणां ते शतं दद्यां किं बतैकं द्विजोत्तम ।
स्नेहाच्च बहुमानाच्च नास्त्यदेयं हि मे तव ॥ ४७ ॥
राजाने कहा —द्विजश्रेष्ठ! मैं आपको सौ वर दे सकता हूँ । एककी तो बात ही क्या । आपके प्रति मेरा जो स्नेह और विशेष आदर है, उसे देखते हुए मेरे पास आपके लिये कुछ
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भी अदेय नहीं है ॥ ४७ ॥
पुरोहितउवाच
एकं वै वरमिच्छामि यदि तुष्टोऽसि पार्थिव ।
प्रतिजानीहि तावत् त्वं सत्यं यद् वद नानृतम् ॥ ४८ ॥
पुरोहितने कहा - पृथ्वीनाथ! यदि आप प्रसन्न हों तो मैं एक ही वर चाहता हूँ । आप पहले यह प्रतिज्ञा कीजिये कि ' मैं दूँगा । ' इस विषयमें सत्य कहिये, झूठ न बोलिये ॥ ४८ ॥
भीष्म उवाच
बाढमित्येव तं राजा प्रत्युवाच युधिष्ठिर ।
यदि ज्ञास्यामि वक्ष्यामि अजानन् न तु संवदे ॥ ४ ९ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तब राजाने उत्तर दिया– ' बहुत अच्छा । यदि मैं जानता होऊँगा तो अवश्य बता दूँगा और यदि नहीं जानता होऊँगा तो नहीं बताऊँगा' ॥ ४ ९ ॥ पुरोहितउवाच
पुण्याहवाचने नित्यं धर्मकृत्येषु चासकृत् ।
शान्तिहोमेषु च सदा किं त्वं हससि वीक्ष्य माम् ॥ ५० ॥
पुरोहितजीने कहा- महाराज! प्रतिदिन पुण्याह- वाचनके समय तथा बारंबार धार्मिक कृत्य कराते समय एवं शान्तिहोमके अवसरोंपर आप मेरी ओर देखकर क्यों हँसा करते हैं? ॥ ५० ॥
सव्रीडं वै भवति हि मनो मे हसता त्वया ।
कामया शापितो राजन् नान्यथा वक्तुमर्हसि ॥ ५१ ॥
आपके हँसनेसे मेरा मन लज्जित- सा हो जाता है । राजन्! मैं शपथ दिलाकर पूछ रहा
हूँ, आप इच्छानुसार सच- सच बताइये । दूसरी बात कहकर बहलाइयेगा मत ॥ ५१ ॥
सुव्यक्तं कारणं ह्यत्र न ते हास्यमकारणम् ।
कौतूहलं मे सुभृशं तत्त्वेन कथयस्व मे ॥ ५२ ॥
आपके इस हँसनेमें स्पष्ट ही कोई विशेष कारण जान पड़ता है । आपका हँसना बिना किसी कारणके नहीं हो सकता । इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है; अतः आप यथार्थ रूपसे यह सब कहिये ॥ ५२ ॥
राजोवाच
एवमुक्ते त्वया विप्र यदवाच्यं भवेदपि ।
अवश्यमेव वक्तव्यं शृणुष्वैकमना द्विज ॥ ५३ ॥
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राजाने कहा — विप्रवर! आपके इस प्रकार पूछनेपर तो यदि कोई न कहने योग्य बात
हो तो उसे भी अवश्य ही कह देना चाहिये । अतः आप मन लगाकर सुनिये ॥ ५३ ॥
पूर्वदेहे यथा वृत्तं तन्निबोध द्विजोत्तम ।
जातिं स्मराम्यहं ब्रह्मन्नवधानेन मे शृणु ॥ ५४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! जब हमने पूर्वजन्ममें शरीर धारण किया था, उस समय जो घटना घटित हुई थी, उसे सुनिये । ब्रह्मन्! मुझे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण है । आप ध्यान देकर मेरी बात सुनिये ॥ ५४ ॥
शूद्रोऽहमभवं पूर्वं तापसो भृशसंयुतः ।
ऋषिरुग्रतपास्त्वं च तदाभूद् द्विजसत्तम ॥ ५५ ॥
विप्रवर! पहले जन्ममें मैं शूद्र था । फिर बड़ा भारी तपस्वी हो गया । उन्हीं दिनों आप उग्र तप करनेवाले श्रेष्ठ महर्षि थे ॥ ५५ ॥
प्रीयता हि तदा ब्रह्मन् ममानुग्रहबुद्धिना ।
पितृकार्ये त्वया पूर्वमुपदेशः कृतोऽनघ ॥ ५६ ॥
निष्पाप ब्रह्मन्! उन दिनों आप मुझसे बड़ा प्रेम रखते थे; अतः मेरे ऊपर अनुग्रह करनेके विचारसे आपने पितृकार्यमें मुझे आवश्यक विधिका उपदेश किया था ॥ ५६ ॥
बृस्यां दर्भेषु हव्ये च कव्ये च मुनिसत्तम ।
एतेन कर्मदोषेण पुरोधास्त्वमजायथाः ॥ ५७ ॥
मुनिश्रेष्ठ! कुशके चट कैसे रखे जायँ? कुशा कैसे बिछायी जाय? हव्य और कव्य कैसे समर्पित किये जायँ? इन्हीं सब बातोंका आपने मुझे उपदेश दिया था । इसी कर्मदोषके कारण आपको इस जन्ममें पुरोहित होना पड़ा ॥ ५७ ॥
अहं राजा च विप्रेन्द्र पश्य कालस्य पर्ययम् ।
मत्कृतस्योपदेशस्य त्वयावाप्तमिदं फलम् ॥ ५८ ॥
विप्रेन्द्र! यह कालका उलट- फेर तो देखिये कि मैं तो शूद्रसे राजा हो गया और मुझे ही उपदेश करनेके कारण आपको यह फल मिला ॥ ५८ ॥
एतस्मात् कारणाद् ब्रह्मन् प्रहसे त्वां द्विजोत्तम ।
न त्वां परिभवन् ब्रह्मन् प्रहसामि गुरुर्भवान् ॥ ५ ९ ॥
द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मन्! इसी कारणसे मैं आपकी ओर देखकर हँसता हूँ । आपका अनादर करनेके लिये मैं आपकी हँसी नहीं उड़ाता हूँ; क्योंकि आप मेरे गुरु हैं ॥
विपर्ययेण मे मन्युस्तेन संतप्यते मनः ।
जातिं स्मराम्यहं तुभ्यमतस्त्वां प्रहसामि वै ॥ ६० ॥
यह जो उलट - फेर हुआ है, इससे मुझको बड़ा खेद है और इसीसे मेरा मन संतप्त रहता है । मैं अपनी और आपकी भी पूर्वजन्मकी बातोंको याद करता हूँ; इसीलिये आपकी ओर देखकर हँस देता हूँ ॥ ६० ॥
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एवं तवोग्रं हि तप उपदेशेन नाशितम् ।
पुरोहितत्वमुत्सृज्य यतस्व त्वं पुनर्भवे ॥ ६१ ॥
आपकी उग्र तपस्या थी, वह मुझे उपदेश देनेके कारण नष्ट हो गयी । अतः आप पुरोहितका काम छोड़कर पुनः संसार- सागरसे पार होनेके लिये प्रयत्न कीजिये ॥ ६१ ॥
इतस्त्वमधमामन्यां मा योनिं प्राप्स्यसे द्विज ।
गृह्यतां द्रविणं विप्र पूतात्मा भव सत्तम ॥ ६२ ॥
ब्रह्मन्! साधुशिरोमणे! कहीं ऐसा न हो कि आप इसके बाद दूसरी किसी नीच योनिमें पड़ जायँ । अतः विप्रवर! जितना चाहिये धन ले लीजिये और अपने अन्तःकरणको पवित्र बनानेका प्रयत्न कीजिये ॥ ६२ ॥
भीष्म उवाच
ततो विसृष्टो राज्ञा तु विप्रो दानान्यनेकशः ।
ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं भूमिं ग्रामांश्च सर्वशः ॥ ६३ ॥
भीष्मजी कहते हैं – युधिष्ठिर! तदनन्तर राजासे विदा लेकर पुरोहितने बहुत -से
ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दिये । धन, भूमि और ग्राम भी वितरण किये ॥ ६३ ॥
कृच्छ्राणि चीर्त्वा च ततो यथोक्तानि द्विजोत्तमैः ।
तीर्थानि चापि गत्वा वै दानानि विविधानि च ॥ ६४ ॥
उस समय श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके बताये अनुसार उन्होंने अनेक प्रकारके कृच्छ्रव्रत किये और तीर्थोंमें जाकर नाना प्रकारकी वस्तुएँ दान कीं ॥ ६४ ॥
दत्वा गाश्चैव विप्रेभ्यः पूतात्माभवदात्मवान् ।
तमेव चाश्रमं गत्वा चचार विपुलं तपः ॥ ६५ ॥
ब्राह्मणोंको गोदान करके पवित्रात्मा होकर उन मनस्वी ब्राह्मणने फिर उसी आश्रमपर जाकर बड़ी भारी तपस्या की ॥ ६५ ॥
ततः सिद्धिं परां प्राप्तो ब्राह्मणो राजसत्तम ।
सम्मतश्चाभवत् तेषामाश्रमे तन्निवासिनाम् ॥ ६६ ॥
नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर परम सिद्धिको प्राप्त होकर वे ब्राह्मण देवता उस आश्रममें रहनेवाले समस्त साधकोंके लिये सम्माननीय हो गये ॥ ६६ ॥
एवं प्राप्तो महत्कृच्छ्रमृषिः सन्नृपसत्तम ।
ब्राह्मणेन न वक्तव्यं तस्माद् वर्णावरे जने ॥ ६७ ॥
नृपशिरोमणे! इस प्रकार वे ऋषि शूद्रको उपदेश देनेके कारण महान् कष्टमें पड़ गये; इसलिये ब्राह्मणको चाहिये कि वह नीच वर्णके मनुष्यको उपदेश न दे ॥ ६७ ॥
( वर्जयेदुपदेशं च सदैव ब्राह्मणो नृप । उपदेशं हि कुर्वाणो द्विजः कृच्छ्रमवाप्नुयात् ।
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नरेश्वर! ब्राह्मणको चाहिये कि वह कभी शूद्रको उपदेश न दे; क्योंकि उपदेश करनेवाला ब्राह्मण स्वयं ही संकटमें पड़ जाता है ॥ नेषितव्यं सदा वाचा द्विजेन नृपसत्तम । न च प्रवक्तव्यमिह किंचिद् वर्णावरे जने ॥ ) नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मणको अपनी वाणीद्वारा कभी उपदेश देनेकी इच्छा ही नहीं करनी चाहिये । यदि करे भी तो नीच वर्णके पुरुषको तो कदापि कुछ उपदेश न दे ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्त्रयो वर्णा द्विजातयः ।
एतेषु कथयन् राजन् ब्राह्मणो न प्रदुष्यति ॥ ६८ ॥
राजन्! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य -ये तीन वर्ण द्विजाति कहलाते हैं । इन्हें उपदेश देनेवाला ब्राह्मण दोषका भागी नहीं होता है ॥ ६८ ॥
तस्मात् सद्भिर्न वक्तव्यं कस्यचित् किंचिदग्रतः ।
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य दुर्ज्ञेया ह्यकृतात्मभिः ॥ ६ ९ ॥
इसलिये सत्पुरुषोंको कभी किसीके सामने कोई उपदेश नहीं देना चाहिये; क्योंकि धर्मकी गति सूक्ष्म है । जिन्होंने अपने अन्तःकरणको शुद्ध एवं वशीभूत नहीं कर लिया है, उनके लिये धर्मकी गतिको समझना बहुत ही कठिन है ॥ ६ ९ ॥
तस्मान्मीनेन मुनयो दीक्षां कुर्वन्ति चादृताः ।
दुरुक्तस्य भयाद् राजन् नाभाषन्ते च किंचन ॥ ७० ॥
राजन्! इसीलिये ऋषि- मुनि मौनभावसे ही आदरपूर्वक दीक्षा देते हैं । कोई अनुचित बात मुँहसे न निकल जाय, इसीके भयसे वे कोई भाषण नहीं देते हैं ॥
धार्मिका गुणसम्पन्नाः सत्यार्जवसमन्विताः ।
दुरुक्तवाचाभिहितैः प्राप्नुवन्तीह दुष्कृतम् ॥ ७१ ॥
धार्मिक, गुणवान् तथा सत्य- सरलता आदि गुणोंसे सम्पन्न पुरुष भी शास्त्रविरुद्ध अनुचित वचन कह देनेके कारण यहाँ दुष्कर्मके भागी हो जाते हैं ॥ ७१ ॥
उपदेशो न कर्तव्यः कदाचिदपि कस्यचित् ।
उपदेशाद्धि तत् पापं ब्राह्मणः समवाप्नुयात् ॥ ७२ ॥
ब्राह्मणको चाहिये कि वह कभी किसीको उपदेश न करे; क्योंकि उपदेश करनेसे वह शिष्यके पापको स्वयं ग्रहण करता है ॥ ७२ ॥
विमृश्य तस्मात् प्राज्ञेन वक्तव्यं धर्ममिच्छता ।
सत्यानृतेन हि कृत उपदेशो हिनस्ति हि ॥ ७३ ॥
अतः धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले विद्वान् पुरुषको बहुत सोच - विचारकर बोलना चाहिये; क्योंकि साँच और झूठमिश्रित वाणीसे किया गया उपदेश हानिकारक होता है ॥ ७३ ॥
वक्तव्यमिह पृष्टेन विनिश्चित्य विनिश्चयम् ।
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स चोपदेशः कर्तव्यो येन धर्ममवाप्नुयात् ॥ ७४ ॥
यहाँ किसीके पूछनेपर बहुत सोच- विचारकर शास्त्रका जो सिद्धान्त हो वही बताना चाहिये तथा उपदेश वह करना चाहिये जिससे धर्मकी प्राप्ति हो ॥ ७४ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातमुपदेशकृते मया ।
महान् क्लेशो हि भवति तस्मान्नोपदिशेदिह ॥ ७५ ॥
उपदेशके सम्बन्धमें मैंने ये सब बातें तुम्हें बतायी हैं । अनधिकारीको उपदेश देनेसे
महान् क्लेश प्राप्त होता है । इसलिये यहाँ किसीको उपदेश न दे ॥ ७५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शूद्रमुनिसंवादे दशमोऽध्यायः ॥
१० ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शूद्र और मुनिका संवादविषयक दसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १० ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ७७ श्लोक हैं )
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एकादशोऽध्यायः लक्ष्मीके निवास करने और न करने योग्य पुरुष, स्त्री और स्थानोंका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
कीदृशे पुरुषे तात स्त्रीषु वा भरतर्षभ ।
श्रीः पद्मा वसते नित्यं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा – तात! भरतश्रेष्ठ! कैसे पुरुषमें और किस तरहकी स्त्रियोंमें लक्ष्मी नित्य निवास करती हैं? पितामह! यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्णयिष्यामि यथावृत्तं यथाश्रुतम् ।
रुक्मिणी देवकीपुत्रसंनिधौ पर्यपृच्छत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! इस विषयमें एक यथार्थ वृत्तान्तको मैंने जैसा सुना है, उसीके अनुसार तुम्हें बता रहा हूँ। देवकीनन्दन श्रीकृष्णके समीप रुक्मिणीदेवीने साक्षात् लक्ष्मीसे जो कुछ पूछा था, वह मुझसे सुनो ॥ २ ॥
नारायणस्याङ्कगतां ज्वलन्तीं दृष्ट्वा श्रियं पद्मसमानवर्णाम् । कौतूहलाद् विस्मितचारुनेत्रा पप्रच्छ माता मकरध्वजस्य ॥ ३ ॥
भगवान् नारायणके अङ्कमें बैठी हुई कमलके समान कान्तिवाली लक्ष्मीदेवीको अपनी प्रभासे प्रकाशित होती देख जिसके मनोहर नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे थे, उन प्रद्युम्नजननी रुक्मिणीदेवीने कौतूहलवश लक्ष्मीसे पूछा- ॥ ३ ॥
कानीह भूतान्युपसेवसे त्वं संतिष्ठसे कानिव सेवसे त्वम् । तानि त्रिलोकेश्वरभूतकान्ते तत्त्वेन मे ब्रूहि महर्षिकन्ये ॥ ४ ॥
' महर्षि भृगुकी पुत्री तथा त्रिलोकीनाथ भगवान् नारायणकी प्रियतमे! देवि! तुम इस जगत्में किन प्राणियोंपर कृपा करके उनके यहाँ रहती हो? कहाँ निवास करती हो और किन- किनका सेवन करती हो? उन सबको मुझे यथार्थरूपसे बताओ ' ॥ ४ ॥
एवं तदा श्रीरभिभाष्यमाणा देव्या समक्षं गरुडध्वजस्य ।
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उवाच वाक्यं मधुराभिधानं मनोहरं चन्द्रमुखी प्रसन्ना ॥ ५ ॥
रुक्मिणीके इस प्रकार पूछनेपर चन्द्रमुखी लक्ष्मीदेवीने प्रसन्न होकर भगवान् गरुडध्वजके सामने ही मीठी वाणीमें यह वचन कहा ॥ ५ ॥
श्रीरुवाच वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने । अक्रोधने देवपरे कृतज्ञे जितेन्द्रिये नित्यमुदीर्णसत्त्वे ॥ ६ ॥
लक्ष्मी बोलीं- देवि! मैं प्रतिदिन ऐसे पुरुषमें निवास करती हूँ जो सौभाग्यशाली, निर्भीक, कार्यकुशल, कर्मपरायण, क्रोधरहित, देवाराधनतत्पर, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय तथा बढ़े हुए सत्त्वगुणसे युक्त हो ॥ ६ ॥
नाकर्मशीले पुरुषे वसामि न नास्तिके साङ्करिके कृतघ्ने । न भिन्नवृत्ते न नृशंसवर्णे न चापि चौरे न गुरुष्वसूये ॥ ७ ॥
जो पुरुष अकर्मण्य, नास्तिक, वर्णसंकर, कृतघ्न, दुराचारी, क्रूर, चोर तथा गुरुजनोंके दोष देखनेवाला हो, उसके भीतर मैं निवास नहीं करती हूँ ॥ ७ ॥
ये चाल्पतेजोबलसत्त्वमानाः क्लिश्यन्ति कुप्यन्ति च यत्र तत्र । न चैव तिष्ठामि तथाविधेषु नरेषु संगुप्तमनोरथेषु ॥ ८ ॥
जिनमें तेज, बल, सत्त्व और गौरवकी मात्रा बहुत थोड़ी है, जो जहाँ - तहाँ हर बातमें खिन्न हो उठते हैं, जो मनमें दूसरा भाव रखते हैं और ऊपरसे कुछ और ही दिखाते हैं, ऐसे मनुष्योंमें मैं निवास नहीं करती हूँ ॥ ८ ॥
यश्चात्मनि प्रार्थयते न किञ्चिद् यश्च स्वभावोपहतान्तरात्मा । तेष्वल्पसंतोषपरेषु नित्यं नरेषु नाहं निवसामि सम्यक् ॥ ९ ॥
जो अपने लिये कुछ नहीं चाहता, जिसका अन्तःकरण मूढ़तासे आच्छन्न है, जो थोड़ेमें ही संतोष कर लेते हैं, ऐसे मनुष्योंमें मैं भलीभाँति नित्य निवास नहीं करती हूँ ॥ स्वधर्मशीलेषु च धर्मवित्सु
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वृद्धोपसेवानिरते च दान्ते । कृतात्मनि क्षान्तिपरे समर्थे क्षान्तासु दान्तासु तथाऽबलासु ॥ १० ॥
सत्यस्वभावार्जवसंयुतासु वसामि देवद्विजपूजिकासु । जो स्वभावतः स्वधर्मपरायण, धर्मज्ञ, बड़े - बूढ़ोंकी सेवामें तत्पर, जितेन्द्रिय, मनको वशमें रखनेवाले, क्षमाशील और सामर्थ्यशाली हैं, ऐसे पुरुषोंमें तथा क्षमाशील एवं जितेन्द्रिय अबलाओंमें भी मैं निवास करती हूँ। जो स्त्रियाँ स्वभावतः सत्यवादिनी तथा सरलतासे संयुक्त हैं, जो देवताओं और द्विजोंकी पूजा करनेवाली हैं, उनमें भी मैं निवास करती हूँ ॥ १०३ ॥
( अबन्ध्यकालेषु सदा दानशौचरतेषु च ।
ब्रह्मचर्यतपोज्ञानगोद्विजातिप्रियेषु च ॥
जो अपने समयको कभी व्यर्थ नहीं जाने देते, सदा दान एवं शौचाचारमें तत्पर रहते हैं, जिन्हें ब्रह्मचर्य, तपस्या, ज्ञान, गौ और द्विज परम प्रिय हैं, ऐसे पुरुषोंमें मैं निवास करती हूँ ॥ वसामि स्त्रीषु कान्तासु देवद्विजपरासु च । विशुद्धगृहभाण्डासु गोधान्याभिरतासु च ॥ ) जो स्त्रियाँ कमनीय गुणोंसे युक्त, देवताओं तथा ब्राह्मणोंकी सेवामें तत्पर, घरके बर्तन- भाँड़ोंको शुद्ध तथा स्वच्छ रखनेवाली एवं गौओंकी सेवा तथा धान्यके संग्रहमें तत्पर होती हैं, उनमें भी मैं सदा निवास करती हूँ ॥ प्रकीर्णभाण्डामनवेक्ष्यकारिणीं सदा च भर्तुः प्रतिकूलवादिनीम् ॥ ११ ॥
परस्य वेश्माभिरतामलज्जा- मेवंविधां तां परिवर्जयामि । जो घरके बर्तनोंको सुव्यवस्थित रूपसे न रखकर इधर- उधर बिखेरे रहती हैं, सोच-समझकर काम नहीं करती हैं, सदा अपने पतिके प्रतिकूल ही बोलती हैं, दूसरोंके घरोंमें घूमने - फिरनेमें आसक्त रहती हैं और लज्जाको सर्वथा छोड़ बैठती हैं, उनको मैं त्याग देती || पापामचोक्षामवलेहिनीं च व्यपेतधैर्यां कलहप्रियां च ॥ १२ ॥
निद्राभिभूतां सततं शयाना- मेवंविधां तां परिवर्जयामि ।