श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1121–1130
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1121–1130
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सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः दानसे स्वर्गलोकमें जानेवाले राजाओंका वर्णन युधिष्ठिरउवाच दानेन वर्ततेत्याह तपसा चैव भारत ।
तदेतन्मे मनोदुःखं व्यपोह त्वं पितामह ।
किंस्वित् पृथिव्यां ह्येतन्मे भवान् शंसितुमर्हति ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- भरतनन्दन! पितामह! आप कहते हैं कि दान और तप दोनोंसे ही मनुष्य स्वर्गमें जाता है, परंतु मेरे मनमें संशयजनित दुःख हो रहा है। आप इसका निवारण कीजिये । इस पृथ्वीपर दान और तपमेंसे कौन-सा साधन श्रेष्ठ है, यह बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
शृणु यैर्धर्मनिरतैस्तपसा भावितात्मभिः ।
लोका ह्यसंशयं प्राप्ता दानपुण्यरतैर्नृपैः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले जिन धर्मात्मा राजाओंने दान - पुण्यमें तत्पर रहकर निःसन्देह बहुत - से उत्तम लोक प्राप्त किये हैं, उनके नाम बता रहा हूँ, सुनो ॥ २ ॥
सत्कृतश्च तथाऽऽत्रेयः शिष्येभ्यो ब्रह्म निर्गुणम् ।
उपदिश्य तदा राजन् गतो लोकाननुत्तमान् ॥ ३ ॥
राजन्! लोकसम्मानित महर्षि आत्रेय अपने शिष्योंको निर्गुण ब्रह्मका उपदेश देकर उत्तम लोकोंमें गये हैं ॥ ३ ॥
शिबिरौशीनरः प्राणान् प्रियस्य तनयस्य च ।
ब्राह्मणार्थमुपाकृत्य नाकपृष्ठमितो गतः ॥ ४ ॥
उशीनरकुमार शिवि अपने प्यारे पुत्रके प्राणोंको ब्राह्मणके लिये निछावर करके यहाँसे स्वर्गलोकमें चले गये ॥
प्रतर्दनः काशिपतिः प्रदाय तनयं स्वकम् ।
ब्राह्मणायातुलां कीर्तिमिह चामुत्र चाश्नुते ॥ ५ ॥
काशीके राजा प्रतर्दनने अपने प्यारे पुत्रको ब्राह्मणकी सेवामें अर्पित कर दिया, जिसके कारण उन्हें इस लोकमें अनुपम कीर्ति मिली और परलोकमें भी वे अक्षय आनन्दका उपभोग कर रहे हैं ॥ ५ ॥
रन्तिदेवश्च सांकृत्यो वसिष्ठाय महात्मने ।
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अर्घ्यं प्रदाय विधिवल्लेभे लोकाननुत्तमान् ॥ ६ ॥
संकृतिके पुत्र राजा रन्तिदेवने महात्मा वसिष्ठ मुनिको विधिवत् अर्घ्यदान किया, जिससे उन्हें श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति हुई ॥ ६ ॥
दिव्यं शतशलाकं च यज्ञार्थं काञ्चनं शुभम् ।
छत्रं देवावृधो दत्त्वा ब्राह्मणायास्थितो दिवम् ॥ ७ ॥
देवावृध नामक राजा यज्ञमें सोनेकी सौ तीलियोंवाले सुन्दर दिव्य छत्रका ब्राह्मणको दान करके स्वर्ग- लोकको प्राप्त हुए हैं ॥ ७ ॥
भगवानम्बरीषश्च ब्राह्मणायामितौजसे ।
प्रदाय सकलं राष्ट्रं सुरलोकमवाप्तवान् ॥ ८ ॥
ऐश्वर्यशाली राजा अम्बरीष अमित तेजस्वी ब्राह्मणको अपना सारा राज्य सौंपकर देवलोकको प्राप्त हुए ॥ ८ ॥
सावित्रः कुण्डलं दिव्यं यानं च जनमेजयः ।
ब्राह्मणाय च गा दत्त्वा गतो लोकाननुत्तमान् ॥ ९ ॥
सूर्यपुत्र कर्ण अपना दिव्य कुण्डल देकर तथा महाराजा जनमेजय ब्राह्मणको सवारी और गौ दान करके उत्तम लोकोंमें गये हैं ॥ ९ ॥
वृषादर्भिश्च राजर्षी रत्नानि विविधानि च ।
रम्यांश्चावसथान् दत्त्वा द्विजेभ्यो दिवमागतः ॥ १० ॥
राजर्षि वृषादर्भिने ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न तथा रमणीय गृह प्रदान करके स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त किया है ॥ १० ॥
निमी राष्ट्रं च वैदर्भिः कन्यां दत्त्वा महात्मने ।
अगस्त्याय गतः स्वर्गं सपुत्रपशुबान्धवः ॥ ११ ॥
विदर्भके पुत्र राजा निमि अगस्त्य मुनिको अपनी कन्या और राज्यका दान करके पुत्र, पशु और बान्धवोंसहित स्वर्गलोकमें चले गये ॥ ११ ॥
जामदग्न्यश्च विप्राय भूमिं दत्त्वा महायशाः ।
रामोऽक्षयांस्तथा लोकान् जगाम मनसोऽधिकान् ॥ १२ ॥
महायशस्वी जमदग्निनन्दन परशुरामजीने ब्राह्मणको भूमिदान करके उन अक्षय लोकोंको प्राप्त किया है, जिन्हें पानेकी मनमें कल्पना भी नहीं हो सकती ॥ १२ ॥
अवर्षति च पर्जन्ये सर्वभूतानि देवराट् ।
वसिष्ठो जीवयामास येन यातोऽक्षयां गतिम् ॥ १३ ॥
एक बार संसारमें वर्षा न होनेपर मुनिवर वसिष्ठजीने समस्त प्राणियोंको जीवन दान दिया था, जिससे उन्हें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति हुई ॥ १३ ॥
रामो दाशरथिश्चैव हुत्वा यज्ञेषु वै वसु ।
स गतो ह्यक्षयाँल्लोकान् यस्य लोके महद् यशः ॥ १४ ॥
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दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामचन्द्रजी यज्ञोंमें प्रचुर धनकी आहुति देकर संसारमें अपने महान् यशकी स्थापना करके अक्षय लोकोंमें चले गये ॥ १४ ॥
कक्षसेनश्च राजर्षिर्वसिष्ठाय महात्मने ।
न्यासं यथावत् संन्यस्य जगाम सुमहायशाः ॥ १५ ॥
महायशस्वी राजर्षि कक्षसेन महात्मा वसिष्ठको अपना सर्वस्व समर्पण करके स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ १५ ॥
करन्धमस्य पौत्रस्तु मरुत्तोऽविक्षितः सुतः ।
कन्यामांगिरसे दत्त्वा दिवमाशु जगाम सः ॥ १६ ॥
करन्धमके पौत्र, अविक्षित्के पुत्र महाराज मरुत्तने अंगिराके पुत्र संवर्तको कन्यादान करके शीघ्र ही स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया ॥ १६ ॥
ब्रह्मदत्तश्च पाञ्चाल्यो राजा धर्मभृतां वरः ।
निधिं शङ्खमनुज्ञाप्य जगाम परमां गतिम् ॥ १७ ॥
पाञ्चालदेशके राजा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मदत्तने ब्राह्मणको शंखनामक निधि प्रदान करके परम गति प्राप्त कर ली थी ॥ १७ ॥
राजा मित्रसहश्चैव वसिष्ठाय महात्मने ।
मदयन्तीं प्रियां भार्यां दत्त्वा च त्रिदिवं गतः ॥ १८ ॥
राजा मित्रसह महात्मा वसिष्ठ मुनिको अपनी प्यारी पत्नी मदयन्ती सेवाके लिये देकर स्वर्गलोकमें चले गये ॥ १८ ॥
मनोः पुत्रश्च सुद्युम्नो लिखिताय महात्मने ।
दण्डमुद्धृत्य धर्मेण गतो लोकाननुत्तमान् ॥ १ ९ ॥
मनुपुत्र राजा सुद्युम्न महात्मा लिखितको धर्मतः दण्ड देकर परम उत्तम लोकोंमें गये ॥ १ ९ ॥
सहस्रचित्योः राजर्षिः प्राणानिष्टान् महायशाः ।
ब्राह्मणार्थे परित्यज्य गतो लोकाननुत्तमान् ॥ २० ॥
महान् यशस्वी राजर्षि सहस्रचित्य ब्राह्मणके लिये अपने प्यारे प्राणोंकी बलि देकर श्रेष्ठ लोकोंमें गये हैं ॥
सर्वकामैश्च सम्पूर्णं दत्त्वा वेश्म हिरण्मयम् ।
मौद्गल्याय गतः स्वर्गं शतद्युम्नो महीपतिः ॥ २१ ॥
महाराजा शतद्युम्नने मौद्गल्य नामक ब्राह्मणको समस्त कामनाओंसे परिपूर्ण सुवर्णमय गृह दान देकर स्वर्ग प्राप्त किया है ॥ २१ ॥
भक्ष्यभोज्यस्य च कृतान् राशयः पर्वतोपमान् ।
शाण्डिल्याय पुरा दत्त्वा सुमन्युर्दिवमास्थितः ॥ २२ ॥
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राजा सुमन्युने भक्ष्य, भोज्य पदार्थोंके पर्वत-जैसे कितने ही ढेर लगाकर उन्हें
शाण्डिल्यको दान दिया था । जिससे उन्होंने स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त कर लिया ॥
नाम्ना च द्युतिमान् नाम शाल्वराजो महाद्युतिः ।
दत्त्वा राज्यमृचीकाय गतो लोकाननुत्तमान् ॥ २३ ॥
महातेजस्वी शाल्वराज द्युतिमान् महर्षि ऋचीकको राज्य देकर सर्वोत्तम लोकोंमें चले गये ॥ २३ ॥
मदिराश्वश्च राजर्षिर्दत्त्वा कन्यां सुमध्यमाम् ।
हिरण्यहस्ताय गतो लोकान् देवैरधिष्ठितान् ॥ २४ ॥
राजर्षि मदिराश्व अपनी सुन्दरी कन्या विप्रवर हिरण्यहस्तको देकर देवताओंके लोकमें चले गये ||
लोमपादश्च राजर्षिः शान्तां दत्त्वा सुतां प्रभुः ।
ऋष्यशृङ्गाय विपुलैः सर्वैः कामैरयुज्यत ॥ २५ ॥
प्रभावशाली राजर्षि लोमपादने मुनिवर ऋष्यशृंगको अपनी शान्ता नामवाली कन्या दान की थी, इससे उनकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्णरूपसे सफल हुईं ॥ २५ ॥
कौत्साय दत्त्वा कन्यां तु हंसीं नाम यशस्विनीम् ।
गतोऽक्षयानतो लोकान् राजर्षिश्च भगीरथः ॥ २६ ॥
राजर्षि भगीरथ अपनी यशस्विनी कन्या हंसीका कौत्स ऋषिको दान करके अक्षय लोकोंमें गये हैं ॥ २६ ॥
दत्त्वा शतसहस्रं तु गवां राजा भगीरथः ।
सवत्सानां कोहलाय गतो लोकाननुत्तमान् ॥ २७ ॥
राजा भगीरथने कोहल नामक ब्राह्मणको एक लाख सवत्सा गौएँ दान कीं, जिससे उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हुई ॥ २७ ॥
एते चान्ये च बहवो दानेन तपसा च ह ।
युधिष्ठिर गताः स्वर्गं विवर्तन्ते पुनः पुनः ॥ २८ ॥
युधिष्ठिर! ये तथा और भी बहुत- से राजा दान और तपस्याके प्रभावसे बारंबार स्वर्गलोकको जाते और पुनः वहाँसे इस लोकमें लौट आते हैं ॥ २८ ॥
तेषां प्रतिष्ठिता कीर्तिर्यावत् स्थास्यति मेदिनी ।
गृहस्थैर्दानतपसा यैर्लोका वै विनिर्जिताः ॥ २ ९ ॥
जिन गृहस्थोंने दान और तपस्याके बलसे उत्तम लोकोंपर विजय पायी है, उनकी कीर्ति इस लोकमें तबतक प्रतिष्ठित रहेगी, जबतक कि यह पृथ्वी स्थिर रहेगी ॥ २ ९ ॥
शिष्टानां चरितं ह्येतत् कीर्तितं मे युधिष्ठिर ।
दानयज्ञप्रजासर्गेरेते हि दिवमास्थिताः ॥ ३० ॥
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युधिष्ठिर! यह शिष्ट पुरुषोंका चरित्र बताया गया है । ये सब नरेश दान, यज्ञ और संतानोत्पादन करके स्वर्गमें प्रतिष्ठित हुए हैं ॥ ३० ॥
दत्त्वा तु सततं तेऽस्तु कौरवाणां धुरन्धर ।
दानयज्ञक्रियायुक्ता बुद्धिर्धर्मोपचायिनी ॥ ३१ ॥
कौरवधुरंधर! तुम भी सदा दान करते रहो । तुम्हारी बुद्धि दान और यज्ञकी क्रियामें संलग्न हो धर्मकी उन्नति करती रहे ॥ ३१ ॥
यत्र ते नृपशार्दूल संदेहो वै भविष्यति ।
श्वः प्रभाते हि वक्ष्यामि संध्या हि समुपस्थिता ॥ ३२ ॥
नृपश्रेष्ठ! अब तुम्हें जिस विषयमें संदेह होगा, उसे मैं कल सबेरे बताऊँगा; क्योंकि इस समय संध्याकाल उपस्थित है ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १३७ ॥
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अष्टत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः पाँच प्रकारके दानोंका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं ते भवतस्तात सत्यव्रतपराक्रम ।
दानधर्मेण महता ये प्राप्तास्त्रिदिवं नृपाः ॥ १ ॥
( दूसरे दिन प्रातःकाल) युधिष्ठिरने पूछा- सत्यव्रती और पराक्रमसम्पन्न तात! दानजनित महान् धर्मके प्रभावसे जो - जो नरेश स्वर्गलोकमें गये हैं, उन सबका परिचय मैंने आपके मुखसे सुना है ॥ १ ॥
इमांस्तु श्रोतुमिच्छामि धर्मान् धर्मभृतां वर ।
दानं कतिविधं देयं किं तस्य च फलं लभेत् ॥ २ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पितामह! अब मैं दानके सम्बन्धमें इन धर्मोंको सुनना चाहता हूँ कि दानके कितने भेद हैं? और जो दान दिया जाता है, उसका क्या फल मिलता है? ॥ २ ॥
कथं केभ्यश्च धर्म्यं च दानं दातव्यमिष्यते ।
कैः कारणैः कतिविधं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ३ ॥
कैसे और किन लोगोंको धर्मके अनुसार दान देना अभीष्ट है? किन कारणोंसे देना चाहिये? और दानके कितने भेद हो जाते हैं? यह सब मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
शृणु तत्त्वेन कौन्तेय दानं प्रति ममानघ ।
यथा दानं प्रदातव्यं सर्ववर्णेषु भारत ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा – निष्पाप कुन्तीकुमार! भरतनन्दन! दानके सम्बन्धमें मैं यथार्थरूपसे जो कुछ कहता हूँ, सुनो । सभी वर्णोंके लोगोंको दान किस प्रकार करना चाहिये - यह बता रहा हूँ ॥ ४ ॥
धर्मादर्थाद् भयात् कामात् कारुण्यादिति भारत ।
दानं पञ्चविधं ज्ञेयं कारणैर्यैर्निबोध तत् ॥ ५ ॥
भारत! धर्म, अर्थ, भय, कामना और दया – इन पाँच हेतुओंसे दानको पाँच प्रकारका जानना चाहिये । अब जिन कारणोंसे दान देना उचित है, उनको सुनो ॥
इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ।
ऽनसूयता इति दानं प्रदातव्यं ब्राह्मणेभ्योऽ ॥ ६ ॥
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दान करनेवाला मनुष्य इहलोकमें कीर्ति और परलोकमें सर्वोत्तम सुख पाता है । इसलिये ईर्ष्यारहित होकर मनुष्य ब्राह्मणोंको अवश्य दान दे ( यह धर्ममूलक दान है ) ॥ ६ ॥
ददाति वा दास्यति वा मह्यं दत्तमनेन वा ।
इत्यर्थिभ्यो निशम्यैव सर्वं दातव्यमर्थिने ॥ ७ ॥
‘ ये दान देते हैं, ये दान देंगे अथवा इन्होंने मुझे दान दिया है ' याचकोंके मुखसे ये बातें सुनकर अपनी कीर्तिकी इच्छासे प्रत्येक याचकको उसकी इच्छाके अनुसार सब कुछ देना चाहिये ( यह अर्थमूलक दान है ) ॥ ७ ॥
नास्याहं न मदीयोऽयं पापं कुर्याद् विमानितः ।
इति दद्याद् भयादेव दृढं मूढाय पण्डितः ॥ ८ ॥
'न मैं इसका हूँ न यह मेरा है तो भी यदि इसको कुछ न दूँ तो अपमानित होकर मेरा अनिष्ट कर डालेगा । ' इस भयसे ही विद्वान् पुरुष जब किसी मूर्खको दान दे तो यह भयमूलक दान है ॥ ८ ॥
प्रियो मेऽयं प्रियो s स्याहमिति सम्प्रेक्ष्य बुद्धिमान् ।
वयस्यायैवमक्लिष्टं दानं दद्यादतन्द्रितः ॥ ९ ॥
' यह मेरा प्रिय है और मैं इसका प्रिय हूँ' यह विचारकर बुद्धिमान् मनुष्य आलस्य छोड़कर अपने मित्रको प्रसन्नतापूर्वक दान दे ( यह कामनामूलक दान है ) ॥ ९ ॥
दीनश्च याचते चायमल्पेनापि हि तुष्यति ।
इति दद्याद् दरिद्राय कारुण्यादिति सर्वथा ॥ १० ॥
' यह बेचारा बड़ा गरीब है और मुझसे याचना कर रहा है। थोड़ा देनेसे भी संतुष्ट हो जायगा । ' यह सोचकर दरिद्र मनुष्यके लिये सर्वथा दयावश दान देना चाहिये ॥ १० ॥
इति पञ्चविधं दानं पुण्यकीर्तिविवर्धनम् ।
यथाशक्त्या प्रदातव्यमेवमाह प्रजापतिः ॥ ११ ॥
यह पाँच प्रकारका दान पुण्य और कीर्तिको बढ़ानेवाला है । यथाशक्ति सबको दान देना चाहिये । ऐसा प्रजापतिका कथन है ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३८ ॥
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एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः तपस्वी श्रीकृष्णके पास ऋषियोंका आना, उनका प्रभाव देखना और उनसे वार्तालाप करना युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
आगमैर्बहुभिः स्फीतो भवान् नः प्रवरे कुले ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — महाप्राज्ञ पितामह! आप हमारे श्रेष्ठ कुलमें सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशिष्ट विद्वान् और अनेक आगमोंके ज्ञानसे सम्पन्न हैं ॥ १ ॥
त्वत्तो धर्मार्थसंयुक्तमायत्यां च सुखोदयम् ।
आश्चर्यभूतं लोकस्य श्रोतुमिच्छाम्यरिंदम ॥ २ ॥
शत्रुदमन! मैं आपके मुखसे अब ऐसे विषयका वर्णन सुनना चाहता हूँ, जो धर्म और अर्थसे युक्त, भविष्यमें सुख देनेवाला और संसारके लिये अद्भुत हो ॥ २ ॥
अयं च कालः सम्प्राप्तो दुर्लभो ज्ञातिबान्धवैः ।
शास्ता च न हि नः कश्चित् त्वामृते पुरुषर्षभ ॥ ३ ॥
पुरुषप्रवर! हमारे बन्धु -बान्धवोंको यह दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ है । हमारे लिये आपके सिवा दूसरा कोई समस्त धर्मोंका उपदेश करनेवाला नहीं है ॥ ३ ॥
यदि तेऽहमनुग्राह्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ ।
वक्तुमर्हसि नः प्रश्नं यत् त्वां पृच्छामि पार्थिव ॥ ४ ॥
अनघ! यदि भाइयोंसहित मुझपर आपका अनुग्रह हो तो पृथ्वीनाथ! मैं आपसे जो प्रश्न पूछता हूँ, उसका हम सब लोगोंके लिये उत्तर दीजिये ॥ ४ ॥
अयं नारायणः श्रीमान् सर्वपार्थिवसम्मतः ।
भवन्तं बहुमानेन प्रश्रयेण च सेवते ॥ ५ ॥
सम्पूर्ण नरेशोंद्वारा सम्मानित ये श्रीमान् भगवान् नारायण श्रीकृष्ण बड़े आदर और विनयके साथ आपकी सेवा करते हैं ॥ ५ ॥
अस्य चैव समक्षं त्वं पार्थिवानां च सर्वशः ।
भ्रातॄणां च प्रियार्थं मे स्नेहाद् भाषितुमर्हसि ॥ ६ ॥
इनके तथा इन भूपतियोंके सामने मेरा और मेरे भाइयोंका सब प्रकारसे प्रिय करनेके लिये इस पूछे हुए विषयका सस्नेह वर्णन कीजिये ॥ ६ ॥
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भगवान् श्रीकृष्णकी तपस्या वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा स्नेहादागतसम्भ्रमः ।
भीष्मो भागीरथीपुत्र इदं वचनमब्रवीत् ॥ ७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर स्नेहके आवेशसे युक्त हो गंगापुत्र भीष्मने यह बात कही ॥ ७ ॥
भीष्म उवाच
अहं ते कथयिष्यामि कथामतिमनोहराम् ।
अस्य विष्णोः पुरा राजन् प्रभावो यो मया श्रुतः ॥ ८ ॥
यश्च गोवृषभाङ्कस्य प्रभावस्तं च मे शृणु ।
रुद्राण्याः संशयो यश्च दम्पत्योस्तं च मे शृणु ॥ ९ ॥
भीष्मजी बोले- बेटा! अब मैं तुम्हें एक अत्यन्त मनोहर कथा सुना रहा हूँ । राजन्! पूर्वकालमें इन भगवान् नारायण और महादेवजीका जो प्रभाव मैंने सुन रखा है, उसको
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तथा पार्वतीजीके संदेह करनेपर शिव और पार्वतीमें जो संवाद हुआ था, उसको भी बता रहा हूँ, सुनो ॥ ८ - ९ ॥
व्रतं चचार धर्मात्मा कृष्णो द्वादशवार्षिकम् ।
दीक्षितं चागतौ द्रष्टुमुभौ नारदपर्वतौ ॥ १० ॥
पहलेकी बात है, धर्मात्मा भगवान् श्रीकृष्ण बारह वर्षोंमें समाप्त होनेवाले व्रतकी दीक्षा लेकर (एक पर्वतके ऊपर) कठोर तपस्या कर रहे थे । उस समय उनका दर्शन करनेके लिये नारद और पर्वत— ये दोनों ऋषि वहाँ पधारे ॥ १० ॥
कृष्णद्वैपायनश्चैव धौम्यश्च जपतां वरः ।
देवलः काश्यपश्चैव हस्तिकाश्यप एव च ॥ ११ ॥
अपरे चर्षयः सन्तो दीक्षादमसमन्विताः ।
शिष्यैरनुगताः सिद्धैर्देवकल्पैस्तपोधनैः ॥ १२ ॥
इनके सिवा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ धौम्य, देवल, काश्यप, हस्तिकाश्यप तथा अन्य साधु- महर्षि जो दीक्षा और इन्द्रियसंयमसे सम्पन्न थे, अपने देवोपम, तपस्वी एवं सिद्ध शिष्योंके साथ वहाँ आये ॥ ११-१२ ॥
तेषामतिथिसत्कारमर्चनीयं कुलोचितम् ।
देवकीतनयः प्रीतो देवकल्पमकल्पयत् ॥ १३ ॥
देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने बड़ी प्रसन्नताके साथ देवोचित उपचारोंसे उन महर्षियोंका अपने कुलके अनुरूप आतिथ्य-सत्कार किया ॥ १३ ॥
हरितेषु सुवर्णेषु बर्हिष्केषु नवेषु च ।
उपोपविविशुः प्रीता विष्टरेषु महर्षयः ॥ १४ ॥
भगवान्के दिये हुए हरे और सुनहरे रंगवाले कुशोंके नवीन आसनोंपर वे महर्षि प्रसन्नतापूर्वक विराजमान हुए ॥
कथाश्चक्रुस्ततस्ते तु मधुरा धर्मसंहिताः ।
राजर्षीणां सुराणां च ये वसन्ति तपोधनाः ॥ १५ ॥
तदनन्तर वे राजर्षियों, देवताओं और जो तपस्वी मुनि वहाँ रहते थे, उनके सम्बन्धमें धर्मयुक्त मधुर कथाएँ कहने लगे ॥ १५ ॥
ततो नारायणं तेजो व्रतचर्येन्धनोत्थितम् ।
वक्त्रान्निःसृत्य कृष्णस्य वह्निरद्भुतकर्मणः ॥ १६ ॥
सोऽग्निर्ददाह तं शैलं सद्रुमं सलताक्षुपम् ।
सपक्षिमृगसंघातं सश्वापदसरीसृपम् ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् व्रतचर्यारूपी ईंधनसे प्रज्वलित हुआ भगवान् नारायणका तेज अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णके मुखारविन्दसे निकलकर अग्निरूपमें प्रकट हो वृक्ष, लता, झाड़ी, पक्षी, मृगसमुदाय, हिंसक जन्तु तथा सर्पोंसहित उस पर्वतको जलाने लगा ॥ १६-१७ ॥