श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1131–1140

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1131–1140

पृष्ठ 1131

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मृगैश्च विविधाकारैर्हाहाभूतमचेतनम् ।

शिखरं तस्य शैलस्य मथितं दीनदर्शनम् ॥ १८ ॥

उस समय नाना प्रकारके जीव- जन्तुओंका आर्तनाद चारों ओर फैल रहा था, मानो पर्वतका वह अचेतन शिखर स्वयं ही हाहाकार कर रहा हो । उस तेजसे दग्ध हो जाने के कारण वह पर्वतशिखर बड़ा दयनीय दिखायी देता था ॥ १८ ॥

स तु वह्निर्महाज्वालो दग्ध्वा सर्वमशेषतः ।

विष्णोः समीप आगम्य पादौ शिष्यवदस्पृशत् ॥ १ ९ ॥

बड़ी- बड़ी लपटोंवाली उस आगने समस्त पर्वत - शिखरको दग्ध करके भगवान् विष्णु ( श्रीकृष्ण) के समीप आकर जैसे शिष्य गुरुके चरण छूता है, उसी प्रकार उनके दोनों चरणोंका स्पर्श किया और उन्हींमें वह विलीन हो गयी ॥ १ ९ ॥

ततो विष्णुर्गिरिं दृष्ट्वा निर्दग्धमरिकर्शनः ।

सौम्यैर्दृष्टिनिपातैस्तं पुनः प्रकृतिमानयत् ॥ २० ॥

तदनन्तर शत्रुसूदन श्रीकृष्णने उस पर्वतको दग्ध हुआ देखकर अपनी सौम्य दृष्टि डाली और उसे पुनः प्रकृतावस्थामें पहुँचा दिया -पहलेकी भाँति हरा- भरा कर दिया ॥ २० ॥

तथैव स गिरिर्भूयः प्रपुष्पितलताद्रुमः ।

सपक्षिगणसंघुष्टः सश्वापदसरीसृपः ॥ २१ ॥

वह पर्वत फिर पहलेकी ही भाँति खिली हुई लताओं और वृक्षोंसे सुशोभित होने लगा ।

वहाँ पक्षी चहचहाने लगे । वहाँ हिंसक पशु और सर्प आदि जीव -जन्तु जी उठे ॥ २१ ॥

( सिद्धचारणसंघैश्च प्रसन्नैरुपशोभितः । मत्तवारणसंयुक्तो नानापक्षिगणैर्युतः II ) सिद्धों और चारणोंके समुदाय प्रसन्न होकर उस पर्वतकी शोभा बढ़ाने लगे । वह स्थान पुनः मतवाले हाथियों और नाना प्रकारके पक्षियोंसे सम्पन्न हो गया ॥

तमद्भुतमचिन्त्यं च दृष्ट्वा मुनिगणस्तदा ।

विस्मितो हृष्टरोमा च बभूवास्राविलेक्षणः ॥ २२ ॥

इस अद्भुत और अचिन्त्य घटनाको देखकर ऋषियोंका समुदाय विस्मित और रोमांचित हो उठा । उन सबके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भर आये ॥ २२ ॥

ततो नारायणो दृष्ट्वा तानृषीन् विस्मयान्वितान् ।

प्रश्रितं मधुरं स्निग्धं पप्रच्छ वदतां वरः ॥ २३ ॥

वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने उन ऋषियोंको विस्मयविमुग्ध हुआ देख विनय और स्नेहसे युक्त मधुर वाणीमें पूछा— ॥ २३ ॥

किमर्थमृषिपूगस्य त्यक्तसङ्गस्य नित्यशः ।

निर्ममस्यागमवतो विस्मयः समुपागतः ॥ २४ ॥

पृष्ठ 1132

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‘ महर्षियो! ऋषिसमुदाय तो आसक्ति और ममतासे रहित है! सबको शास्त्रोंका ज्ञान है, फिर भी आपलोगोंको आश्चर्य क्यों हो रहा है? ॥ २४ ॥

एतन्मे संशयं सर्वे याथातथ्यमनिन्दिताः ।

ऋषयो वक्तुमर्हन्ति निश्चितार्थं तपोधनाः ॥ २५ ॥

‘ तपोधन ऋषियो! आप सब लोग सबके द्वारा प्रशंसित हैं, अतः मेरे इस संशयको निश्चित एवं यथार्थ- रूपसे बतानेकी कृपा करें' ॥ २५ ॥

ऋषय ऊचुः

भवान् विसृजते लोकान् भवान् संहरते पुनः ।

भवान् शीतं भवानुष्णं भवानेव च वर्षति ॥ २६ ॥

ऋषियोंने कहा — भगवन्! आप ही संसारको बनाते और आप ही पुनः उसका संहार करते हैं । आप ही सर्दी, आप ही गर्मी और आप ही वर्षा करते हैं ॥ २६ ॥

पृथिव्यां यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।

तेषां पिता त्वं माता त्वं प्रभुः प्रभव एव च ॥ २७ ॥

इस पृथ्वीपर जो भी चराचर प्राणी हैं, उनके पिता- माता, प्रभु और उत्पत्तिस्थान भी आप ही हैं ॥

एवं नो विस्मयकरं संशयं मधुसूदन ।

त्वमेवार्हसि कल्याण वक्तुं वह्नेर्विनिर्गमम् ॥ २८ ॥

मधुसूदन! आपके मुखसे अग्निका प्रादुर्भाव हमारे लिये इस प्रकार विस्मयजनक हुआ है । हम संशयमें पड़ गये हैं । कल्याणमय श्रीकृष्ण! आप ही इसका कारण बताकर हमारे संदेह और विस्मयका निवारण कर सकते हैं ॥ २८ ॥

ततो विगतसंत्रासा वयमप्यरिकर्शन ।

यच्छ्रुतं यच्च दृष्टं नस्तत् प्रवक्ष्यामहे हरे ॥ २ ९ ॥

शत्रुसूदन हरे! उसे सुनकर हम भी निर्भय हो जायँगे और हमने जो आश्चर्यकी बात देखी या सुनी है, उसका हम आपके सामने वर्णन करेंगे ॥ २ ९ ॥ वासुदेव उवाच

एतद् वै वैष्णवं तेजो मम वक्त्राद् विनिःसृतम् ।

कृष्णवर्त्मा युगान्ताभो येनायं मथितो गिरिः ॥ ३० ॥

श्रीकृष्ण बोले- मुनिवरो! मेरे मुखसे यह मेरा वैष्णव तेज प्रकट हुआ था; जिसने प्रलयकालकी अग्निके समान रूप धारण करके इस पर्वतको दग्ध कर डाला था ॥ ३० ॥

ऋषयश्चार्तिमापन्ना जितक्रोधा जितेन्द्रियाः ।

भवन्तो व्यथिताश्चासन् देवकल्पास्तपोधनाः ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1133

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उसी तेजसे आप- जैसे तपस्याके धनी, देवोपम शक्तिशाली, क्रोधविजयी और जितेन्द्रिय ऋषि भी पीड़ित और व्यथित हो गये थे ॥ ३१ ॥

व्रतचर्यापरीतस्य तपस्विव्रतसेवया ।

मम वह्निः समुद्भूतो न वै व्यथितुमर्हथ ॥ ३२ ॥

मैं व्रतचर्यामें लगा हुआ था, तपस्वी जनोंके उस व्रतका सेवन करनेसे मेरा तेज ही

अग्निरूपमें प्रकट हुआ था । अतः आपलोग उससे व्यथित न हों ॥ ३२ ॥

व्रतं चर्तुमिहायातस्त्वहं गिरिमिमं शुभम् ।

पुत्रं चात्मसमं वीर्ये तपसा लब्धुमागतः ॥ ३३ ॥

मैं तपस्याद्वारा अपने ही समान वीर्यवान् पुत्र पानेकी इच्छासे व्रत करनेके लिये इस मंगलकारी पर्वतपर आया हूँ ॥ ३३ ॥

ततो ममात्मा यो देहे सोऽग्निर्भूत्वा विनिःसृतः ।

गतश्च वरदं द्रष्टुं सर्वलोकपितामहम् ॥ ३४ ॥

मेरे शरीरमें स्थित प्राण ही अग्निके रूपमें बाहर निकलकर सबको वर देनेवाले सर्वलोक- पितामह ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये उनके लोकमें गया था ॥ ३४ ॥

तेन चात्मानुशिष्टो मे पुत्रत्वे मुनिसत्तमाः ।

तेजसोऽर्धेन पुत्रस्ते भवितेति वृषध्वजः ॥ ३५ ॥

मुनिवरो! उन ब्रह्माजीने मेरे प्राणको यह संदेश देकर भेजा है कि साक्षात् भगवान् शंकर अपने तेजके आधे भागसे आपके पुत्र होंगे ॥ ३५ ॥

सोऽयं वह्निरुपागम्य पादमूले ममान्तिकम् ।

शिष्यवत् परिचर्यार्थं शान्तः प्रकृतिमागतः ॥ ३६ ॥

वही यह अग्निरूपी प्राण मेरे पास लौटकर आया है और निकट पहुँचनेपर शिष्यकी भाँति परिचर्या करनेके लिये उसने मेरे चरणोंमें प्रणाम किया है । इसके बाद शान्त होकर वह अपनी पूर्वावस्थाको प्राप्त हो गया है ॥ ३६ ॥

एतदेव रहस्यं वः पद्मनाभस्य धीमतः ।

मया प्रोक्तं समासेन न भीः कार्या तपोधनाः ॥ ३७ ॥

तपोधनो! यह मैंने आपलोगोंके निकट बुद्धिमान् भगवान् विष्णुका गुप्त रहस्य संक्षेपसे बताया है । आपलोगोंको भय नहीं मानना चाहिये ॥ ३७ ॥

सर्वत्र गतिरव्यग्रा भवतां दीर्घदर्शनात् ।

तपस्विव्रतसंदीप्ता ज्ञानविज्ञानशोभिताः ॥ ३८ ॥

आपलोगोंकी गति सर्वत्र है, उसका कहीं भी प्रतिरोध नहीं है; क्योंकि आपलोग दूरदर्शी हैं । तपस्वी जनोंके योग्य व्रतका आचरण करनेसे आपलोग देदीप्यमान हो रहे हैं तथा ज्ञान और विज्ञान आपकी शोभा बढ़ा रहे हैं ॥ ३८ ॥

यच्छ्रुतं यच्च वो दृष्टं दिवि वा यदि वा भुवि ।

पृष्ठ 1134

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आश्चर्यं परमं किंचित् तद् भवन्तो ब्रुवन्तु मे ॥ ३ ९ ॥ इसलिये मेरी प्रार्थना है कि यदि आपलोगोंने इस पृथ्वीपर या स्वर्गमें कोई महान् आश्चर्यकी बात देखी या सुनी हो तो उसको मुझे बतलाइये ॥ ३ ९ ॥

तस्यामृतनिकाशस्य वाङ्मधोरस्ति मे स्पृहा ।

भवद्भिः कथितस्येह तपोवननिवासिभिः ॥ ४० ॥

आपलोग तपोवनमें निवास करनेवाले हैं, इस जगत्में आपके द्वारा कथित अमृतके समान मधुर वचन सुननेकी इच्छा मुझे सदा बनी रहती है ॥ ४० ॥

यद्यप्यहमदृष्टं वो दिव्यमद्भुतदर्शनम् ।

दिवि वा भुवि वा किंचित् पश्याम्यमरदर्शनाः ॥ ४१ ॥

प्रकृतिः सा मम परा न क्वचित् प्रतिहन्यते ।

न चात्मगतमैश्वर्यमाश्चर्यं प्रतिभाति मे ॥ ४२ ॥

श्रद्धेयः कथितो ह्यर्थः सज्जनश्रवणं गतः ।

चिरं तिष्ठति मेदिन्यां शैले लेख्यामिवार्पितम् ॥ ४३ ॥

महर्षियो! आपका दर्शन देवताओंके समान दिव्य है । यद्यपि द्युलोक अथवा पृथिवीमें जो दिव्य एवं अद्भुत दिखायी देनेवाली वस्तु है, जिसे आपलोगोंने भी नहीं देखा है, वह सब मैं प्रत्यक्ष देखता हूँ। सर्वज्ञता मेरा उत्तम स्वभाव है । वह कहीं भी प्रतिहत नहीं होता तथा मुझमें जो ऐश्वर्य है, वह मुझे आश्चर्यरूप नहीं जान पड़ता तथापि सत्पुरुषोंके कानोंमें पड़ा हुआ कथित विषय विश्वासके योग्य होता है और वह पत्थरपर खिंची हुई लकीरकी भाँति इस पृथ्वीपर बहुत दिनोंतक कायम रहता है ॥ ४१–४३ ॥

तदहं सज्जनमुखान्निःसृतं तत्समागमे ।

कथयिष्याम्यहमहो बुद्धिदीपकरं नृणाम् ॥ ४४ ॥

अतः मैं आप साधु - संतोंके मुखसे निकले हुए वचनको मनुष्योंकी बुद्धिका उद्दीपक ( प्रकाशक ) मानकर उसे सत्पुरुषोंके समाजमें कहूँगा ॥ ४४ ॥

ततो मुनिगणाः सर्वे विस्मिताः कृष्णसंनिधौ ।

नेत्रैः पद्मदलप्रख्यैरपश्यंस्त जनार्दनम् ॥ ४५ ॥

यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्णके समीप बैठे हुए सभी ऋषियोंको बड़ा विस्मय हुआ । वे कमलदलके समान खिले हुए नेत्रोंसे उनकी ओर देखने लगे ॥ ४५ ॥

वर्धयन्तस्तथैवान्ये पूजयन्तस्तथापरे ।

वाग्भिरृग्भूषितार्थाभिः स्तुवन्तो मधुसूदनम् ॥ ४६ ॥

कोई उन्हें बधाई देने लगा, कोई उनकी पूजा- प्रशंसा करने लगा और कोई ऋग्वेदकी अर्थयुक्त ऋचाओंद्वारा उन मधुसूदनकी स्तुति करने लगा ॥ ४६ ॥

ततो मुनिगणाः सर्वे नारदं देवदर्शनम् ।

तदा नियोजयामासुर्वचने वाक्यकोविदम् ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 1135

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तदनन्तर उन सभी मुनियोंने बातचीत करनेमें कुशल देवदर्शी नारदको भगवान्की बातचीतका उत्तर देनेके लिये नियुक्त किया ॥ ४७ ॥

मुनय ऊचुः

यदाश्चर्यमचिन्त्यं च गिरौ हिमवति प्रभो ।

अनुभूतं मुनिगणैस्तीर्थयात्रापरैर्मुने ॥ ४८ ॥

तद् भवानृषिसंघस्य हितार्थं सर्वमादितः ।

यथा दृष्टं हृषीकेशे सर्वमाख्यातुमर्हसि ॥ ४ ९ ॥

मुनि बोले – प्रभो! मुने! तीर्थयात्रापरायण मुनियोंने हिमालय पर्वतपर जिस अचिन्त्य आश्चर्यका दर्शन एवं अनुभव किया है, वह सब आप आरम्भसे ही ऋषिसमूहके हितके लिये भगवान् श्रीकृष्णको बताइये ॥ ४८-४९ ॥

एवमुक्तः स मुनिभिर्नारदो भगवान् मुनिः ।

कथयामास देवर्षिः पूर्ववृत्तामिमां कथाम् ॥ ५० ॥

मुनियोंके ऐसा कहनेपर देवर्षि भगवान् नारदमुनिने यह पूर्वघटित कथा कही ॥ ५० ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३ ९ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ९ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५१ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1136

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चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुनः प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव- पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना भीष्म उवाच

ततो नारायणसुहृन्नारदो भगवानृषिः ।

शङ्करस्योमया सार्धं संवादं प्रत्यभाषत ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर श्रीनारायणके सुहृद् भगवान् नारदमुनिने शंकरजीका पार्वतीके साथ जो संवाद हुआ था, उसे बताना आरम्भ किया ॥ १ ॥

नारद उवाच

तपश्चचार धर्मात्मा वृषभाङ्कः सुरेश्वरः ।

पुण्ये गिरौ हिमवति सिद्धचारणसेविते ॥ २ ॥

नानौषधियुते रम्ये नानापुष्पसमाकुले ।

अप्सरोगणसंकीर्णे भूतसंघनिषेविते ॥ ३ ॥

नारदजीने कहा- भगवन्! जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते है, जो नाना प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न तथा भाँति- भाँतिके फूलोंसे व्याप्त होनेके कारण रमणीय जान पड़ता है, जहाँ झुंड की - झुंड अप्सराएँ भरी रहती हैं और भूतोंकी टोलियाँ निवास करती हैं; उस परम पवित्र हिमालयपर्वतपर धर्मात्मा देवाधिदेव भगवान् शंकर तपस्या कर रहे थे ॥ २-३ ॥

तत्र देवो मुदा युक्तो भूतसंघशतैर्वृतः ।

नानारूपैर्विरूपेश्च दिव्यैरद्भुतदर्शनैः ॥ ४ ॥

उस स्थानपर महादेवजी सैकड़ों भूतसमुदायोंसे घिरे रहकर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करते थे । उन भूतोंके रूप नाना प्रकारके एवं विकृत थे, किन्हीं - किन्हींके रूप दिव्य एवं अद्भुत दिखायी देते थे ॥ ४ ॥

सिंहव्याघ्रगजप्रख्यैः सर्वजातिसमन्वितैः ।

क्रोष्टुकद्वीपिवदनैर्ऋक्षर्षभमुखैस्तथा ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1137

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कुछ भूतोंकी आकृति सिंहों, व्याघ्रों एवं गजराजोंके समान थी । उनमें सभी जातियोंके प्राणी सम्मिलित थे । कितने ही भूतोंके मुख सियारों, चीतों, रीछों और बैलोंके समान थे ॥ ५ ॥

उलूकवदनैर्भीमैर्वृकश्येनमुखैस्तथा ।

नानावर्णैर्मृगमुखैः सर्वजातिसमन्वितैः ॥ ६ ॥

कितने ही उल्लू - जैसे मुखवाले थे । बहुत- से भयंकर भूत भेड़ियों और बाजोंके समान मुख धारण करते थे । और कितनोंके मुख हरिणोंके समान थे । उन सबके वर्ण अनेक प्रकारके थे तथा वे सभी जातियोंसे सम्पन्न थे ॥ ६ ॥

किंनरैर्यक्षगन्धर्वै रक्षो भूतगणैस्तथा ।

दिव्यपुष्पसमाकीर्णं दिव्यज्वालासमाकुलम् ॥ ७ ॥

दिव्यचन्दनसंयुक्तं दिव्यधूपेन धूपितम् ।

तत् सदो वृषभाङ्कस्य दिव्यवादित्रनादितम् ॥ ८ ॥

मृदङ्गपणवोद्धुष्टं शङ्खभेरीनिनादितम् ।

नृत्यद्भिर्भूतसंघैश्च बर्हिणैश्च समन्ततः ॥ ९ ॥

इनके सिवा बहुत - से किन्नरों, यक्ष, गन्धर्वों, राक्षसों तथा भूतगणोंने भी महादेवजीको घेर रखा था । भगवान् शंकरकी वह सभा दिव्य पुष्पोंसे आच्छादित, दिव्य तेजसे व्याप्त, दिव्य चन्दनसे चर्चित और दिव्य धूपकी सुगन्धसे सुवासित थी । वहाँ दिव्य वाद्योंकी ध्वनि गूँजती रहती थी । मृदंग और पणवका घोष छाया रहता था । शंख और भेरियोंके नाद सब ओर व्याप्त हो रहे थे । चारों ओर नाचते हुए भूतसमुदाय और मयूर उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ७ – ९ ॥

प्रनृत्ताप्सरसं दिव्यं देवर्षिगणसेवितम् ।

दृष्टिकान्तमनिर्देश्यं दिव्यमद्भुतदर्शनम् ॥ १० ॥

वहाँ अप्सराएँ नृत्य करती थीं, वह दिव्य सभा देवर्षियोंके समुदायोंसे शोभित, देखनेमें मनोहर, अनिर्वचनीय, अलौकिक और अद्भुत थी ॥ १० ॥

स गिरिस्तपसा तस्य गिरिशस्य व्यरोचत ।

स्वाध्यायपरमैर्विप्रैर्ब्रह्मघोषो निनादितः ॥ ११ ॥

भगवान् शंकरकी तपस्यासे उस पर्वतकी बड़ी शोभा हो रही थी । स्वाध्यायपरायण ब्राह्मणोंकी वेद- ध्वनि वहाँ सब ओर गूँज रही थी ॥ ११ ॥

षट्पदैरुपगीतैश्च माधवाप्रतिमो गिरिः ।

तन्महोत्सवसंकाशं भीमरूपधरं ततः ॥ १२ ॥

दृष्ट्वा मुनिगणस्यासीत् परा प्रीतिर्जनार्दन । माधव! वह अनुपम पर्वत भ्रमरोंके गीतोंसे अत्यन्त सुशोभित हो रहा था । जनार्दन! वह स्थान अत्यन्त भयंकर होनेपर भी महान् उत्सवसे सम्पन्न -सा प्रतीत होता था । उसे देखकर

पृष्ठ 1138

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मुनियोंके समुदायको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ मुनयश्च महाभागाः सिद्धाश्चैवोर्ध्वरेतसः ॥ १३ ॥

मरुतो वसवः साध्या विश्वेदेवाः सवासवाः ।

यक्षा नागाः पिशाचाश्च लोकपाला हुताशनाः ॥ १४ ॥

वाताः सर्वे महाभूतास्तत्रैवासन् समागताः । महान् सौभाग्यशाली मुनि, ऊर्ध्वरेता सिद्धगण, मरुद्गण, वसुगण, साध्यगण, इन्द्रसहित विश्वेदेवगण, यक्ष और नाग, पिशाच, लोकपाल, अग्नि, समस्त वायु और प्रधान भूतगण वहाँ आये हुए थे ॥ १३-१४ ॥ ऋतवः सर्वपुष्पैश्च व्यकिरन्त महाद्भुतैः ॥ १५ ॥

ओषध्यो ज्वलमानाश्च द्योतयन्ति स्म तद् वनम् । ऋतुएँ वहाँ उपस्थित हो सब प्रकारके अत्यन्त अद्भुत पुष्प बिखेर रही थीं । ओषधियाँ प्रज्वलित हो उस वनको प्रकाशित कर रही थीं ॥ १५ ॥

विहङ्गाश्च मुदा युक्ताः प्रानृत्यन् व्यनदंश्च ह ॥ १६ ॥

गिरिपृष्ठेषु रम्येषु व्याहरन्तो जनप्रियाः । वहाँके रमणीय पर्वतशिखरोंपर लोगोंको प्रिय लगनेवाली बोली बोलते हुए पक्षी प्रसन्नतासे युक्त हो नाचते और कलरव करते थे ॥ १६३ ॥

तत्र देवो गिरितटे दिव्यधातुविभूषिते ॥ १७ ॥

पर्यङ्क इव विभ्राजन्नुपविष्टो महामनाः । दिव्य धातुओंसे विभूषित पर्यंकके समान उस पर्वतशिखरपर बैठे हुए महामना महादेवजी बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ १७३ ॥

व्याघ्रचर्माम्बरधरः सिंहचर्मोत्तरच्छदः ॥ १८ ॥

व्यालयज्ञोपवीती च लोहिताङ्गदभूषणः ।

हरिश्मश्रुर्जटी भीमो भयकर्ता सुरद्विषाम् ॥ १ ९ ॥

अभयः सर्वभूतानां भक्तानां वृषभध्वजः । उन्होंने व्याघ्रचर्मको ही वस्त्रके रूपमें धारण कर रखा था । सिंहका चर्म उनके लिये उत्तरीय वस्त्र ( चादर) का काम देता था । उनके गलेमें सर्पमय यज्ञोपवीत शोभा दे रहा था । वे लाल रंगके बाजूबंदसे विभूषित थे । उनकी मूँछ काली थी, मस्तकपर जटाजूट शोभा पाता था । वे भीमस्वरूप रुद्र देवद्रोहियोंके मनमें भय उत्पन्न करते थे । अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण करनेवाले वे भगवान् शिव भक्तों तथा सम्पूर्ण भूतोंके भयका निवारण करते थे ॥ १८-१९ ॥ दृष्ट्वा महर्षयः सर्वे शिरोभिरवनिं गताः ॥ २० ॥

( गीर्भिः परमशुद्धाभिस्तुष्टुवुश्च मनोहरम् ॥ )

पृष्ठ 1139

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विमुक्ताः सर्वपापेभ्यः क्षान्ता विगतकल्मषाः । भगवान् शंकरका दर्शन करके उन सभी महर्षियोंने पृथ्वीपर सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया और परम शुद्ध वाणीद्वारा उनकी मनोहर स्तुति की। वे सभी ऋषि सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त, क्षमाशील और कल्मषरहित थे ॥ तस्य भूतपतेः स्थानं भीमरूपधरं बभौ ॥ २१ ॥

अप्रधृष्यतरं चैव महोरगसमाकुलम् । भगवान् भूतनाथका वह भयानक स्थान बड़ी शोभा पा रहा था । वह अत्यन्त दुर्धर्ष और बड़े - बड़े सर्पोंसे भरा हुआ था ॥ २१३ ॥

क्षणेनैवाभवत् सर्वमद्भुतं मधुसूदन ॥ २२ ॥

तत् सदो वृषभाङ्कस्य भीमरूपधरं बभौ । मधुसूदन! वृषभध्वजका वह भयानक सभास्थल क्षणभरमें अद्भुत शोभा पाने लगा ॥ २२३ ॥

तमभ्ययाच्छैलसुता भूतस्त्रीगणसंवृता ॥ २३ ॥

हरतुल्याम्बरधरा समानव्रतधारिणी ।

बिभ्रती कलशं रौक्मं सर्वतीर्थजलोद्भवम् ॥ २४ ॥

उस समय भूतोंकी स्त्रियोंसे घिरी हुई गिरिराज -नन्दिनी उमा सम्पूर्ण तीर्थोंके जलसे भरा हुआ सोनेका कलश लिये उनके पास आयीं । उन्होंने भी भगवान् शंकरके समान ही वस्त्र धारण किया था । वे भी उन्हींकी भाँति उत्तम व्रतका पालन करती थीं ॥ २३-२४ ॥ गिरिस्रवाभिः सर्वाभिः पृष्ठतोऽनुगता शुभा ।

पुष्पवृष्ट्याभिवर्षन्ती गन्धैर्बहुविधैस्तथा ।

सेवन्ती हिमवत्पार्श्वं हरपार्श्वमुपागमत् ॥ २५ ॥

उनके पीछे - पीछे उस पर्वतसे गिरनेवाली सभी नदियाँ चल रही थीं । शुभलक्षणा पार्वती

फूलोंकी वर्षा करती और नाना प्रकारकी सुगन्ध बिखेरती हुई भगवान् शिवके पास आयीं ।

वे भी हिमालयके पार्श्वभागका ही सेवन करती थीं ॥ २५ ॥

ततः स्मयन्ती पाणिभ्यां नर्मार्थं चारुहासिनी ।

हरनेत्रे शुभे देवी सहसा सा समावृणोत् ॥ २६ ॥

आते ही मनोहर हास्यवाली देवी उमाने मनोरंजन या हास- परिहासके लिये मुसकराकर अपने दोनों हाथोंसे सहसा भगवान् शंकरके दोनों नेत्र बंद कर लिये ॥

संवृताभ्यां तु नेत्राभ्यां तमोभूतमचेतनम् ।

निर्होमं निर्वषट्कारं जगद् वै सहसाभवत् ॥ २७ ॥

उनके दोनों नेत्रोंके आच्छादित होते ही सारा जगत् सहसा अन्धकारमय, चेतनाशून्य तथा होम और वषट्कारसे रहित हो गया ॥ २७ ॥

जनश्च विमनाः सर्वोऽभवत् त्राससमन्वितः ।

पृष्ठ 1140

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निमीलिते भूतपतौ नष्टसूर्य इवाभवत् ॥ २८ ॥

सब लोग अनमने हो गये, सबके ऊपर त्रास छा गया । भूतनाथके नेत्र बंद कर लेनेपर इस संसारकी वैसी ही दशा हो गयी, मानो सूर्यदेव नष्ट हो गये हैं ॥ २८ ॥

ततो वितिमिरो लोकः क्षणेन समपद्यत ।

ज्वाला च महती दीप्ता ललाटात् तस्य निःसृता ॥ २ ९ ॥

तदनन्तर क्षणभरमें सारे जगत्का अन्धकार दूर हो गया । भगवान् शिवके ललाटसे अत्यन्त दीप्तिशालिनी महाज्वाला प्रकट हो गयी ॥ २ ९ ॥

तृतीयं चास्य सम्भूतं नेत्रमादित्यसंनिभम् ।

युगान्तसदृशं दीप्तं येनासौ मथितो गिरिः ॥ ३० ॥

उनके ललाटमें आदित्यके समान तेजस्वी तीसरे नेत्रका आविर्भाव हो गया । वह नेत्र प्रलयाग्निके समान देदीप्यमान हो रहा था । उस नेत्रसे प्रकट हुई ज्वालाने उस पर्वतको जलाकर मथ डाला ॥ ३० ॥

ततो गिरिसुता दृष्ट्वा दीप्ताग्निसदृशेक्षणम् ।

हरं प्रणम्य शिरसा ददर्शायतलोचना ॥ ३१ ॥

तब महादेवजीको प्रज्वलित अग्निके सदृश तीसरे नेत्रसे युक्त हुआ देख गिरिराजनन्दिनी विशाललोचना उमाने सिरसे प्रणाम करके उनकी ओर चकित दृष्टिसे देखा ॥ ३१ ॥

दह्यमाने वने तस्मिन् ससालसरलद्रुमे ।

सचन्दनवरे रम्ये दिव्यौषधिविदीपिते ॥ ३२ ॥

साल और सरल आदि वृक्षोंसे युक्त, श्रेष्ठ चन्दन- वृक्षसे सुशोभित तथा दिव्य ओषधियोंसे प्रकाशित उस रमणीय वनमें आग लग गयी थी और वह सब ओरसे जल रहा था ॥ ३२ ॥

मृगयूथैर्द्रुतैर्भीतैर्हरपार्श्वमुपागतैः ।

शरणं चाप्यविन्दद्भिस्तत् सदः संकुलं बभौ ॥ ३३ ॥

भयभीत मृगोंके झुंडोंको जब कहीं भी शरण न मिली, तब वे भागते हुए महादेवजीके पास आ पहुँचे । उनसे वह सारा सभास्थल भर गया और उसकी अपूर्व शोभा होने लगी ॥ ३३ ॥

ततो नभस्पृशज्वालो विद्युल्लोलाग्निरुल्बणः ।

द्वादशादित्यसदृशो युगान्ताग्निरिवापरः ॥ ३४ ॥

वहाँ लगी हुई आगकी लपटें आकाशको चूम रही थीं । विद्युत्के समान चंचल हुई वह आग बड़ी भयानक प्रतीत हो रही थी, वह बारह सूर्योंके समान प्रकाशित होकर दूसरी प्रलयाग्निके समान प्रतीत होती थी ॥ ३४ ॥

क्षणेन तेन निर्दग्धो हिमवानभवन्नगः ।