श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1551–1560

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1551–1560

पृष्ठ 1551

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शर- शय्यापर पड़े भीष्मकी युधिष्ठिरसे बातचीत

पृष्ठ 1552

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( भीष्मस्वर्गारोहणपर्व) सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः भीष्मके अन्त्येष्टि - संस्कारकी सामग्री लेकर युधिष्ठिर आदिका उनके पास जाना और भीष्मका श्रीकृष्ण आदिसे देहत्यागकी अनुमति लेते हुए धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरको कर्तव्यका उपदेश देना वैशम्पायन उवाच

ततः कुन्तीसुतो राजा पौरजानपदं जनम् ।

पूजयित्वा यथान्यायमनुजज्ञे गृहान् प्रति ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! हस्तिनापुरमें जानेके बाद कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिरने नगर और जनपदके लोगोंका यथोचित सम्मान करके उन्हें अपने - अपने घर जानेकी आज्ञा दी ॥ १ ॥

सान्त्वयामास नारीश्च हतवीरा हतेश्वराः ।

विपुलैरर्थदानैः स तदा पाण्डुसुतो नृपः ॥ २ ॥

इसके बाद जिन स्त्रियोंके पति और वीर पुत्र युद्धमें मारे गये थे, उन सबको बहुत - सा धन देकर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने धैर्य बँधाया ॥ २ ॥

सोऽभिषिक्तो महाप्राज्ञः प्राप्य राज्यं युधिष्ठिरः ।

अवस्थाप्य नरश्रेष्ठः सर्वाः स्वप्रकृतीस्तथा ॥ ३ ॥

द्विजेभ्यो गुणमुख्येभ्यो नैगमेभ्यश्च सर्वशः ।

प्रतिगृह्याशिषो मुख्यास्तथा धर्मभृतां वरः ॥ ४ ॥

महाज्ञानी और धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने राज्याभिषेक हो जानेके पश्चात् अपना राज्य पाकर मन्त्री आदि समस्त प्रकृतियोंको अपने - अपने पदपर स्थापित करके वेदवेत्ता एवं गुणवान् ब्राह्मणोंसे उत्तम आशीर्वाद ग्रहण किया ॥ ३-४ ॥

उषित्वा शर्वरीः श्रीमान् पञ्चाशन्नगरोत्तमे ।

समयं कौरवाग्रयस्य सस्मार पुरुषर्षभः ॥ ५ ॥

पचास राततक उस उत्तम नगरमें निवास करके श्रीमान् पुरुषप्रवर युधिष्ठिरको कुरुकुल- शिरोमणि भीष्मजीके बताये हुए समयका स्मरण हो आया ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1553

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स निर्ययौ गजपुराद् याजकैः परिवारितः ।

दृष्ट्वा निवृत्तमादित्यं प्रवृत्तं चोत्तरायणम् ॥ ६ ॥

उन्होंने यह देखकर कि सूर्यदेव दक्षिणायनसे निवृत्त हो गये और उत्तरायणपर आ गये, याजकोंसे घिरकर हस्तिनापुरसे बाहर निकले ॥ ६ ॥

घृतं माल्यं च गन्धांश्च क्षौमाणि च युधिष्ठिरः ।

चन्दनागुरुमुख्यानि तथा कालीयकान्यपि ॥ ७ ॥

प्रस्थाप्य पूर्वं कौन्तेयो भीष्मसंस्करणाय वै ।

माल्यानि च वरार्हाणि रत्नानि विविधानि च ॥ ८ ॥

कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने भीष्मजीका दाह- संस्कार करनेके लिये पहले ही घृत, माल्य, गन्ध, रेशमी वस्त्र, चन्दन, अगुरु, काला चन्दन, श्रेष्ठ पुरुषके धारण करनेयोग्य मालाएँ तथा नाना प्रकारके रत्न भेज दिये थे ॥ ७-८ ॥

धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य गान्धारीं च यशस्विनीम् ।

मातरं च पृथां धीमान् भ्रातॄंश्च पुरुषर्षभान् ॥ ९ ॥

जनार्दनेनानुगतो विदुरेण च धीमता ।

युयुत्सुना च कौरव्यो युयुधानेन वा विभो ॥ १० ॥

विभो! कुरुकुलनन्दन बुद्धिमान् युधिष्ठिर राजा धृतराष्ट्र, यशस्विनी गान्धारी देवी, माता कुन्ती तथा पुरुषप्रवर भाइयोंको आगे करके पीछेसे भगवान् श्रीकृष्ण, बुद्धिमान् विदुर, युयुत्सु तथा सात्यकिको साथ लिये चल रहे थे ॥ ९ -१० ॥

महता राजभोगेन पारिबर्हेण संवृतः ।

स्तूयमानो महातेजा भीष्मस्याग्नीननुव्रजन् ॥ ११ ॥

वे महातेजस्वी नरेश विशाल राजोचित उपकरण तथा वैभवके भारी ठाट - बाटसे सम्पन्न थे, उनकी स्तुतिकी जा रही थी और वे भीष्मजीके द्वारा स्थापित की हुई त्रिविध अग्नियोंको आगे रखकर स्वयं पीछे - पीछे चल रहे थे ॥ ११ ॥

निश्चक्राम पुरात् तस्माद् यथा देवपतिस्तथा ।

आससाद कुरुक्षेत्रे ततः शान्तनवं नृपः ॥ १२ ॥

वे देवराज इन्द्रकी भाँति अपनी राजधानीसे बाहर निकले और यथासमय कुरुक्षेत्रमें शान्तनुनन्दन भीष्मजीके पास जा पहुँचे ॥ १२ ॥

उपास्यमानं व्यासेन पाराशर्येण धीमता ।

नारदेन च राजर्षे देवलेनासितेन च ॥ १३ ॥

राजर्षे! उस समय वहाँ पराशरनन्दन बुद्धिमान् व्यास, देवर्षि नारद और असित देवल ऋषि उनके पास बैठे थे ॥ १३ ॥

हतशिष्टैर्नृपैश्चान्यैर्नानादेशसमागतैः ।

रक्षिभिश्च महात्मानं रक्ष्यमाणं समन्ततः ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1554

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नाना देशोंसे आये हुए नरेश, जो मरनेसे बच गये थे, रक्षक बनकर चारों ओरसे महात्मा भीष्मकी रक्षा करते थे ॥ १४ ॥

शयानं वीरशयने ददर्श नृपतिस्ततः ।

ततो रथादवातीर्य भ्रातृभिः सह धर्मराट् ॥ १५ ॥

धर्मराज राजा युधिष्ठिर दूरसे ही बाणशय्यापर सोये हुए भीष्मजीको देखकर भाइयोंसहित रथसे उतर पड़े ॥ १५ ॥

अभिवाद्याथ कौन्तेयः पितामहमरिंदम द्वैपायनादीन् विप्रांश्च तैश्च प्रत्यभिनन्दितः ॥ १६ ॥

शत्रुदमन नरेश! कुन्तीकुमारने सबसे पहले पितामहको प्रणाम किया । उसके बाद व्यास आदि ब्राह्मणोंको मस्तक झुकाया । फिर उन सबने भी उनका अभिनन्दन किया ॥ १६ ॥

ऋत्विग्भिर्ब्रह्मकल्पैश्च भ्रातृभिः सह धर्मजः ।

आसाद्य शरतल्पस्थमृषिभिः परिवारितम् ॥ १७ ॥

अब्रवीद् भरतश्रेष्ठं धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

भ्रातृभिः सह कौरव्यः शयानं निम्नगासुतम् ॥ १८ ॥

तदनन्तर कुरुनन्दनके धर्मपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ब्रह्माजीके समान तेजस्वी ऋत्विजों, भाइयों तथा ऋषियोंसे घिरे और बाण- शय्यापर सोये हुए भरतश्रेष्ठ गंगापुत्र भीष्मजीसे भाइयोंसहित इस प्रकार बोले- ॥ १७-१८ ॥

युधिष्ठिरोऽहं नृपते नमस्ते जाह्नवीसुत ।

शृणोषि चेन्महाबाहो ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १ ९ ॥

‘ गंगानन्दन! नरेश्वर! महाबाहो! मैं युधिष्ठिर आपकी सेवामें उपस्थित हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ। यदि आपको मेरी बात सुनायी देती हो तो आज्ञा दीजिये कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ १ ९ ॥

प्राप्तोऽस्मि समये राजन्नग्नीनादाय ते विभो ।

आचार्यान् ब्राह्मणांश्चैव ऋत्विजो भ्रातरश्च मे ॥ २० ॥

‘ राजन्! प्रभो! आपकी अग्नियों और आचार्यों, ब्राह्मणों तथा ऋत्विजोंको साथ लेकर मैं अपने भाइयोंके साथ ठीक समयपर आ पहुँचा हूँ ॥ २० ॥

पुत्रश्च ते महातेजा धृतराष्ट्रो जनेश्वरः ।

उपस्थितः सहामात्यो वासुदेवश्च वीर्यवान् ॥ २१ ॥

' आपके पुत्र महातेजस्वी राजा धृतराष्ट्र भी अपने मन्त्रियोंके साथ उपस्थित हैं और महापराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण भी यहाँ पधारे हुए हैं ॥ २१ ॥

हतशिष्टाश्च राजानः सर्वे च कुरुजांगलाः ।

तान् पश्य नरशार्दूल समुन्मीलय लोचने ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1555

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‘ पुरुषसिंह! युद्धमें मरनेसे बचे हुए समस्त राजा और कुरुजांगल देशकी प्रजा भी उपस्थित है । आप आँखें खोलिये और इन सबको देखिये ॥ २२ ॥

यच्चेह किंचित् कर्तव्यं तत्सर्वं प्रापितं मया ।

यथोक्तं भवता काले सर्वमेव च तत् कृतम् ॥ २३ ॥

‘ आपके कथनानुसार इस समयके लिये जो कुछ संग्रह करना आवश्यक था, वह सब जुटाकर मैंने यहाँ पहुँचा दिया है । सभी उपयोगी वस्तुओंका प्रबन्ध कर लिया गया है ' ॥ २३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु गाङ्गेयः कुन्तीपुत्रेण धीमता ।

ददर्श भारतान् सर्वान् स्थितान् सम्परिवार्य ह ॥ २४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! परम बुद्धिमान् कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर गंगानन्दन भीष्मजीने आँखें खोलकर अपनेको सब ओरसे घेरकर खड़े हुए सम्पूर्ण भरतवंशियोंको देखा ॥ २४ ॥

ततश्च तं बली भीष्मः प्रगृह्य विपुलं भुजम् ।

उद्यन्मेघस्वरो वाग्मी काले वचनमब्रवीत् ॥ २५ ॥

फिर प्रवचनकुशल बलवान् भीष्मने युधिष्ठिरकी विशाल भुजा हाथमें लेकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें यह समयोचित वचन कहा- ॥ २५ ॥

दिष्ट्या प्राप्तोऽसि कौन्तेय सहामात्यो युधिष्ठिर ।

परिवृत्तो हि भगवान् सहस्रांशुर्दिवाकरः ॥ २६ ॥

‘ कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! सौभाग्यकी बात है कि तुम मन्त्रियोंसहित यहाँ आ गये । सहस्र किरणोंसे सुशोभित भगवान् सूर्य अब दक्षिणायनसे उत्तरायणकी ओर लौट चुके हैं ॥ २६ ॥

अष्टपञ्चाशतं रात्र्यः शयानस्याद्य मे गताः ।

शरेषु निशिताग्रेषु यथा वर्षशतं तथा ॥ २७ ॥

‘ इन तीखे अग्रभागवाले बाणोंकी शय्यापर शयन करते हुए आज मुझे अट्ठावन दिन हो गये; किंतु ये दिन मेरे लिये सौ वर्षोंके समान बीते हैं ॥ २७ ॥

माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः सौम्यो युधिष्ठिर ।

त्रिभागशेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति ॥ २८ ॥

' युधिष्ठिर! इस समय चान्द्रमासके अनुसार माघका महीना प्राप्त हुआ है । इसका यह शुक्लपक्ष चल रहा है, जिसका एक भाग बीत चुका है और तीन भाग बाकी है ( शुक्लपक्षसे मासका आरम्भ माननेपर आज माघ शुक्ला अष्टमी प्रतीत होती है ) ' ॥ २८ ॥

एवमुक्त्वा तु गाङ्गेयो धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ।

पृष्ठ 1556

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धृतराष्ट्रमथामन्त्र्य काले वचनमब्रवीत् ॥ २९ ॥

धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर गंगानन्दन भीष्मने धृतराष्ट्रको पुकारकर उनसे यह समयोचित वचन कहा— ॥ २ ९ ॥ भीष्म उवाच

राजन् विदितधर्मोऽसि सुनिर्णीतार्थसंशयः ।

बहुश्रुता हि ते विप्रा बहवः पर्युपासिताः ॥ ३० ॥

भीष्मजी बोले – राजन्! तुम धर्मको अच्छी तरह जानते हो । तुमने अर्थतत्त्वका भी भलीभाँति निर्णय कर लिया है । अब तुम्हारे मनमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है; क्योंकि तुमने अनेक शास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाले बहुत से विद्वान् ब्राह्मणोंकी सेवा की है— उनके सत्संगसे लाभ उठाया है ॥ ३० ॥

वेदशास्त्राणि सर्वाणि धर्मांश्च मनुजेश्वर ।

वेदांश्च चतुरः सर्वान् निखिलेनानुबुद्धयसे ॥ ३१ ॥

मनुजेश्वर! तुम चारों वेदों, सम्पूर्ण शास्त्रों और धर्मोंका रहस्य पूर्णरूपसे जानते और समझते हो ॥ ३१ ॥

न शोचितव्यं कौरव्य भवितव्यं हि तत् तथा ।

श्रुतं देवरहस्यं ते कृष्णद्वैपायनादपि ॥ ३२ ॥

कुरुनन्दन! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये । जो कुछ हुआ है, वह अवश्यम्भावी था । तुमने श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यासजीसे देवताओंका रहस्य भी सुन लिया है ( उसीके अनुसार महाभारतयुद्धकी सारी घटनाएँ हुई हैं ) ॥ ३२ ॥

यथा पाण्डोः सुता राजंस्तथैव तव धर्मतः ।

तान् पालय स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतान् ॥ ३३ ॥

ये पाण्डव जैसे राजा पाण्डुके पुत्र हैं, वैसे ही धर्मकी दृष्टिसे तुम्हारे भी हैं । ये सदा गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहते हैं । तुम धर्ममें स्थित रहकर अपने पुत्रोंके समान ही इनका पालन करना ॥ ३३ ॥

धर्मराजो हि शुद्धात्मा निदेशे स्थास्यते तव ।

आनृशंस्यपरं ह्येनं जानामि गुरुवत्सलम् ॥ ३४ ॥

धर्मराज युधिष्ठिरका हृदय बहुत ही शुद्ध है । ये सदा तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहेंगे । मैं जानता हूँ, इनका स्वभाव बहुत ही कोमल है और ये गुरुजनोंके प्रति बड़ी भक्ति रखते हैं ॥ ३४ ॥

तव पुत्रा दुरात्मानः क्रोधलोभपरायणाः ।

ईर्ष्याभिभूता दुर्वृत्तास्तान् न शोचितुमर्हसि ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 1557

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तुम्हारे पुत्र बड़े दुरात्मा, क्रोधी, लोभी, ईर्ष्याके वशीभूत तथा दुराचारी थे । अतः उनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥ ३५ ॥

वैशम्पायनउवाच

एतावदुक्त्वा वचनं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् ।

वासुदेवं महाबाहुमभ्यभाषत कौरवः ॥ ३६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मनीषी धृतराष्ट्रसे ऐसा वचन कहकर कुरुवंशी भीष्मने महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा ॥ ३६ ॥

भीष्म उवाच

भगवन् देवदेवेश सुरासुरनमस्कृत ।

त्रिविक्रम नमस्तुभ्यं शङ्खचक्रगदाधर ॥ ३७ ॥

भीष्मजी बोले- भगवन्! देवदेवेश्वर! देवता और असुर सभी आपके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं । अपने तीन पगोंसे त्रिलोकीको नापनेवाले तथा शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले नारायणदेव! आपको नमस्कार है ॥ ३७ ॥

वासुदेवो हिरण्यात्मा पुरुषः सविता विराट् ।

जीवभूतोऽनुरूपस्त्वं परमात्मा सनातनः ॥ ३८ ॥

आप वासुदेव, हिरण्यात्मा, पुरुष, सविता, विराट्, अनुरूप, जीवात्मा और सनातन परमात्मा हैं ॥ ३८ ॥

त्रायस्व पुण्डरीकाक्ष पुरुषोत्तम नित्यशः ।

अनुजानीहि मां कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ॥ ३ ९ ॥

कमलनयन श्रीकृष्ण! पुरुषोत्तम! वैकुण्ठ! आप सदा मेरा उद्धार करें । अब मुझे जानेकी आज्ञा दें ॥ ३ ९ ॥

रक्ष्याश्च ते पाण्डवेया भवान् येषां परायणम् ।

उक्तवानस्मि दुर्बुद्धिं मन्दं दुर्योधनं तदा ॥ ४० ॥

‘ यतः कृष्णस्ततो धर्मो ' यतो धर्मस्ततो जयः ।

वासुदेवेन तीर्थेन पुत्र संशाम्य पाण्डवैः ॥ ४१ ॥

संधानस्य परः कालस्तवेति च पुनः पुनः ।

न च मे तद् वचो मूढः कृतवान् स सुमन्दधीः ।

घातयित्वेह पृथिवीं ततः स निधनं गतः ॥ ४२ ॥

प्रभो! आप ही जिनके परम आश्रय हैं, उन पाण्डवोंकी सदा आपको रक्षा करनी चाहिये । मैंने दुर्बुद्धि एवं मन्द दुर्योधनसे कहा था कि ' जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, उसी पक्षकी जय होगी; इसलिये बेटा दुर्योधन! तुम भगवान् श्रीकृष्णकी सहायतासे पाण्डवोंके साथ सन्धि कर लो । यह सन्धिके लिये बहुत उत्तम अवसर आया

पृष्ठ 1558

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है । ' इस प्रकार बार- बार कहनेपर भी उस मन्दबुद्धि मूढने मेरी वह बात नहीं मानी और सारी पृथ्वीके वीरोंका नाश कराकर अन्तमें वह स्वयं भी कालके गालमें चला गया ॥ ४० –४२ ॥

त्वां तु जानाम्यहं देवं पुराणमृषिसत्तमम् ।

नरेण सहितं देव बदर्यां सुचिरोषितम् ॥ ४३ ॥

देव! मैं आपको जानता हूँ। आप वे ही पुरातन ऋषि नारायण हैं, जो नरके साथ चिरकालतक बदरिकाश्रममें निवास करते रहे हैं ॥ ४३ ॥

तथा मे नारदः प्राह व्यासश्च सुमहातपाः ।

नरनारायणावेतौ सम्भूतौ मनुजेष्विति ॥ ४४ ॥

देवर्षि नारद तथा महातपस्वी व्यासजीने भी मुझसे कहा था कि ये श्रीकृष्ण और और नर हैं, जो मानव--:शरीरमें अवतीर्णअर्जुन साक्षात् भगवान् नारायण हुए हैं ॥ ४४ ॥ स मां त्वमनुजानीहि कृष्ण मोक्ष्ये कलेवरम् ।

त्वयाहं समनुज्ञातो गच्छेयं परमां गतिम् ॥ ४५ ॥

श्रीकृष्ण! अब आप आज्ञा दीजिये, मैं इस शरीरका परित्याग करूँगा । आपकी आज्ञा मिलनेपर मुझे परम गतिकी प्राप्ति होगी ॥ ४५ ॥

वासुदेव उवाच

अनुजानामि भीष्म त्वां वसून् प्राप्नुहि पार्थिव ।

न तेऽस्ति वृजिनं किंचिदिहलोके महाद्युते ॥ ४६ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा - पृथ्वीपालक महातेजस्वी भीष्मजी! मैं आपको ( सहर्ष) आज्ञा देता हूँ । आप वसुलोकको जाइये। इस लोकमें आपके द्वारा अणुमात्र भी पाप नहीं हुआ है ॥ ४६ ॥

पितृभक्तोऽसि राजर्षे मार्कण्डेय इवापरः ।

तेन मृत्युस्तव वशे स्थितो भृत्य इवानतः ॥ ४७ ॥

राजर्षे! आप दूसरे मार्कण्डेयके समान पितृभक्त हैं; इसलिये मृत्यु विनीत दासीके समान आपके वशमें हो गयी है ॥ ४७ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु गाङ्गेयः पाण्डवानिदमब्रवीत् ।

धृतराष्ट्रमुखांश्चापि सर्वांश्च सुहृदस्तथा ॥ ४८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भगवान्के ऐसा कहनेपर गंगानन्दन भीष्मने पाण्डवों तथा धृतराष्ट्र आदि सभी सुहृदोंसे कहा— ॥ ४८ ॥

प्राणानुत्स्रष्टुमिच्छामि तत्रानुज्ञातुमर्हथ ।

सत्येषु यतितव्यं वः सत्यं हि परमं बलम् ॥ ४ ९ ॥

पृष्ठ 1559

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‘ अब मैं प्राणोंका परित्याग करना चाहता हूँ । तुम सब लोग इसके लिये मुझे आज्ञा दो । तुम्हें सदा सत्य धर्मके पालनका प्रयत्न करते रहना चाहिये; क्योंकि सत्य ही सबसे बड़ा बल है ॥ ४ ९ ॥

आनृशंस्यपरैर्भाव्यं सदैव नियतात्मभिः ।

ब्रह्मण्यैर्धर्मशीलैश्च तपोनित्यैश्च भारताः ॥ ५० ॥

‘ भरतवंशियो! तुमलोगोंको सबके साथ कोमलताका बर्ताव करना, सदा अपने मन और इन्द्रियोंको अपने वशमें रखना तथा ब्राह्मणभक्त, धर्मनिष्ठ एवं तपस्वी होना चाहिये ' ॥ ५० ॥

इत्युक्त्वा सुहृदः सर्वान् सम्परिष्वज्य चैव ह ।

पुनरेवाब्रवीद् धीमान् युधिष्ठिरमिदं वचः ॥ ५१ ॥

ब्राह्मणाश्चैव ते नित्यं प्राज्ञाश्चैव विशेषतः ।

आचार्या ऋत्विजश्चैव पूजनीया जनाधिप ॥ ५२ ॥

ऐसा कहकर बुद्धिमान् भीष्मजीने अपने सब सुहृदोंको गले लगाया और युधिष्ठिरसे पुनः इस प्रकार कहा- 'युधिष्ठिर! तुम्हें सामान्यतः सभी ब्राह्मणोंकी विशेषतः विद्वानोंकी और आचार्य तथा ऋत्विजोंकी सदा ही पूजा करनी चाहिये' ॥ ५१-५२ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि भीष्मस्वर्गारोहणपर्वणि दानधर्मे सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत भीष्मस्वर्गारोहणपर्वमेंदानधर्मविषयक एक सौ सरसठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १६७ ॥

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पृष्ठ 1560

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अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः भीष्मजीका प्राणत्याग, धृतराष्ट्र आदिके द्वारा उनका दाह- संस्कार, कौरवोंका गंगाके जलसे भीष्मको जलांजलि देना, गंगाजीका प्रकट होकर पुत्रके लिये शोक करना और श्रीकृष्णका उन्हें समझाना वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा कुरून् सर्वान् भीष्मः शान्तनवस्तदा ।

तूष्णीं बभूव कौरव्यः स मुहूर्तमरिंदम ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - शत्रुदमन जनमेजय! समस्त कौरवोंसे ऐसा कहकर कुरुश्रेष्ठ शान्तनुनन्दन भीष्मजी दो घड़ीतक चुपचाप पड़े रहे ॥ १ ॥

धारयामास चात्मानं धारणासु यथाक्रमम् ।

तस्योर्ध्वमगमन् प्राणाः संनिरुद्धा महात्मनः ॥ २ ॥

तदनन्तर वे मनसहित प्राणवायुको क्रमशः भिन्न- भिन्न धारणाओंमें स्थापित करने लगे । इस तरह यौगिक क्रियाद्वारा रोके हुए महात्मा भीष्मजीके प्राण क्रमशः ऊपर चढ़ने लगे ॥ २ ॥

इदमाश्चर्यमासीच्च मध्ये तेषां महात्मनाम् ।

सहितैर्ऋषिभिः सर्वैस्तदा व्यासादिभिः प्रभो ॥ ३ ॥

यद्यन्मुञ्चति गात्रं हि स शान्तनुसुतस्तदा ।

तत् तद् विशल्यं भवति योगयुक्तस्य तस्य वै ॥ ४ ॥

प्रभो! उस समय वहाँ एकत्र हुए सभी संत- महात्माओंके बीच एक बड़े आश्चर्यकी घटना घटी । व्यास आदि सब महर्षियोंने देखा कि योगयुक्त हुए शान्तनुनन्दन भीष्मके प्राण उनके जिस - जिस अंगको त्यागकर ऊपर उठते थे, उस - उस अंगके बाण अपने - आप निकल जाते और उनका घाव भर जाता था ॥ ३-४ ॥

क्षणेन प्रेक्षतां तेषां विशल्यः सोऽभवत् तदा ।

तद् दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे वासुदेवपुरोगमाः ॥ ५ ॥

सह तैर्मुनिभिः सर्वैस्तदा व्यासादिभिर्नृप । नरेश्वर! इस प्रकार सबके देखते -देखते भीष्मजीका शरीर क्षणभरमें बाणोंसे रहित हो गया । यह देखकर व्यास आदि समस्त मुनियोंसहित भगवान् श्रीकृष्ण आदिको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ५३ ॥

संनिरुद्धस्तु तेनात्मा सर्वेष्वायतनेषु च ॥ ६ ॥