श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1881–1890
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1881–1890
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दीपवृक्षैश्च सौवर्णैरभीक्ष्णमुपशोभितः ।
गुहानिर्झरदेशेषु दिवाभूतो बभूव ह ॥ ७ ॥
वृक्षके आकारमें सजाये हुए सोनेके दीप उस स्थानकी शोभाको और भी उद्दीप्त कर रहे थे । वहाँकी गुफाओं और झरनोंके स्थानोंमें दिनके समान प्रकाश हो रहा था ॥ ७ ॥
पताकाभिर्विचित्राभिः सघण्टाभिः समन्ततः ।
पुम्भिः स्त्रीभिश्च संघुष्टः प्रगीत इव चाभवत् ॥ ८ ॥
चारों ओर विचित्र पताकाएँ फहरा रही थीं, उनमें बँधी हुई घण्टियाँ बज रही थीं और स्त्रियों तथा पुरुषोंके सुमधुर शब्द वहाँ व्याप्त हो रहे थे । इससे वह पर्वत संगीतमय-सा-प्रतीत हो रहा था ॥ ८ ॥
अतीव प्रेक्षणीयोऽभून्मेरुर्मुनिगणैरिव ।
मत्तानां हृष्टरूपाणां स्त्रीणां पुंसां च भारत ॥ ९ ॥
गायतां पर्वतेन्द्रस्य दिवस्पृगिव निःस्वनः । जैसे मुनिगणोंसे मेरुकी शोभा होती है, उसी प्रकार द्वारकावासियोंके समागमसे वह पर्वत अत्यन्त दर्शनीय हो गया था । भरतनन्दन! उस पर्वतराजके शिखरपर हर्षोन्मत्त होकर गाते हुए स्त्री- पुरुषोंका सुमधुर शब्द मानो स्वर्गलोकतक व्याप्त हो रहा था ॥ ९ ३ ॥ प्रमत्तमत्तसम्मत्तक्ष्वेडितोत्क्रुष्टसंकुलः ॥ १० ॥
तथा किलकिलाशब्दैर्भूधरोऽभून्मनोहरः । कुछ लोग क्रीडा आदिमें आसक्त होकर दूसरे कार्योंकी ओर ध्यान नहीं देते थे, कितने ही हर्षसे मतवाले हो रहे थे, कुछ लोग कूदते - फाँदते, उच्च स्वरसे कोलाहल करते और किलकारियाँ भरते थे । इन सभी शब्दोंसे गूँजता हुआ पर्वत परम मनोहर जान पड़ता था ॥ १०३ ॥
विपणापणवान् रम्यो भक्ष्यभोज्यविहारवान् ॥ ११ ॥
वस्त्रमाल्योत्करयुतो वीणावेणुमृदङ्गवान् ।
सुरामैरेयमिश्रेण भक्ष्यभोज्येन चैव ह ॥ १२ ॥
दीनान्धकृपणादिभ्यो दीयमानेन चानिशम् ।
बभौ परमकल्याणो महस्तस्य महागिरेः ॥ १३ ॥
उस महान् पर्वतपर होनेवाला वह महोत्सव परम मंगलमय प्रतीत होता था । वहाँ दूकानें और बाजार लगी थीं । भक्ष्यभोज्य पदार्थ यथेष्ट रूपसे प्राप्त होते थे । सब ओर घूमने - फिरनेकी सुविधा थी । वस्त्रों और मालाओंके ढेर लगे थे । वीणा, वेणु और मृदंग बज रहे थे । इन सबके कारण वहाँकी रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी । वहाँ दीनों, अन्धों और अनाथोंके लिये निरन्तर सुरा- मैरेयमिश्रित भक्ष्यभोज्य पदार्थ दिये जाते थे ॥ ११–१३ ॥
पुण्यावसथवान् वीर पुण्यकृद्भिर्निषेवितः ।
विहारो वृष्णिवीराणां महे रैवतकस्य ह ॥ १४ ॥
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सनगो वेश्मसंकीर्णो देवलोक इवाबभौ । वीरवर! उस पर्वतपर प्रण्यानुष्ठानके लिये बहुत- से गृह और आश्रम बने थे, जिनमें पुण्यात्मा पुरुष निवास करते थे । रैवतक पर्वतके उस महोत्सवमें वृष्णिवंशी वीरोंका विहार-स्थल बना हुआ था । वह गिरिप्रदेश बहुसंख्यक गृहोंसे व्याप्त होनेके कारण देवलोकके समान शोभा पाता था ॥ १४३ ॥
तदा च कृष्णसांनिध्यमासाद्य भरतर्षभ ॥ १५ ॥
( स्तुवन्त्यन्तर्हिता देवा गन्धर्वाश्च सहर्षिभिः । भरतश्रेष्ठ! उस समय देवता, गन्धर्व और ऋषि अदृश्यरूपसे श्रीकृष्णके निकट आकर उनकी स्तुति करने लगे ॥ १५ ॥
देवगन्धर्वा ऊचुः
साधकः सर्वधर्माणामसुराणां विनाशकः ।
त्वं स्रष्टा सृज्यमाधारं कारणं धर्मवेदवित् ॥
त्वया यत् क्रियते देव न जानीमोऽत्र मायया ।
केवलं त्वाभिजानीमः शरणं परमेश्वरम् ॥
ब्रह्मादीनां च गोविन्द सांनिध्यं शरणं नमः ॥
देवता और गन्धर्व बोले- भगवन्! आप समस्त धर्मोंके साधक और असुरोंके विनाशक हैं । आप ही स्रष्टा, आप ही सृज्य जगत् और आप ही उसके आधार हैं । आप ही सबके कारण तथा धर्म और वेदके ज्ञाता हैं । देव! आप अपनी मायासे जो कुछ करते हैं, हमलोग उसे नहीं जान पाते हैं । हम केवल आपको जानते हैं । आप ही सबके शरणदाता और परमेश्वर हैं । गोविन्द! आप ब्रह्मा आदिको भी सामीप्य और शरण प्रदान करनेवाले हैं । आपको नमस्कार है ॥ वैशम्पायन उवाच इति स्तुतेऽमानुषैश्च पूजिते देवकीसुते । ) शक्रसद्मप्रतीकाशो बभूव स हि शैलराट् । वैशम्पायनजी कहते हैं - इस प्रकार मानवेतर प्राणियों – देवताओं और गन्धर्वोंद्वारा जब देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी स्तुति और पूजा की जा रही थी, उस समय वह पर्वतराज रैवतक इन्द्रभवनके समान जान पड़ता था ॥ १५३ ॥
ततः सम्पूज्यमानः स विवेश भवनं शुभम् ॥ १६ ॥
गोविन्दः सात्यकिश्चैव जगाम भवनं स्वकम् । तदनन्तर सबसे सम्मानित हो भगवान् श्रीकृष्णने अपने सुन्दर भवनमें प्रवेश किया और सात्यकि भी अपने घरमें गये ॥ १६३ ॥
विवेश च प्रहृष्टात्मा चिरकालप्रवासतः ॥ १७ ॥
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कृत्वा नसुकरं कर्म दानवेष्विव वासवः । जैसे इन्द्र दानवोंपर महान् पराक्रम प्रकट करके आये हों, उसी प्रकार दुष्कर कर्म करके दीर्घकालके प्रवाससे प्रसन्नचित्त होकर लौटे हुए भगवान् श्रीकृष्णने अपने भवनमें प्रवेश किया ॥ १७३ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण अपने पिता - माता आदिको महाभारतका वृत्तान्त सुना रहे हैं उपायान्तं तु वार्ष्णेयं भोजवृष्ण्यन्धकास्तथा ॥ १८ ॥
अभ्यगच्छन् महात्मानं देवा इव शतक्रतुम् । जैसे देवता देवराज इन्द्रकी अगवानी करते हैं, उसी प्रकार भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके यादवोंने अपने निकट आते हुए महात्मा श्रीकृष्णका आगे बढ़कर स्वागत किया ॥ १८३ ॥
स तानभ्यर्च्य मेधावी पृष्ट्वा च कुशलं तदा ।
अभ्यवादयत प्रीतः पितरं मातरं तदा ॥ १ ९ ॥
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मेधावी श्रीकृष्णने उन सबका आदर करके उनका कुशल- समाचार पूछा और प्रसन्नतापूर्वक अपने माता- पिताके चरणों में प्रणाम किया ॥ १ ९ ॥
ताभ्यां स सम्परिष्वक्तः सान्त्वितश्च महाभुजः ।
उपोपविष्टैः सर्वैस्तैर्वृष्णिभिः परिवारितः ॥ २० ॥
उन दोनोंने उन महाबाहु श्रीकृष्णको अपनी छाती से लगा लिया और मीठे वचनोंद्वारा उन्हें सान्त्वना दी । इसके बाद सभी वृष्णिवंशी उनको घेरकर आस- पास बैठ गये ॥ २१ ॥
स विश्रान्तो महातेजाः कृतपादावनेजनः ।
कथयामास तत्सर्वं पृष्टः पित्रा महाहवम् ॥ २१ ॥
महातेजस्वी श्रीकृष्ण जब हाथ- पैर धोकर विश्राम कर चुके, तब पिताके पूछनेपर उन्होंने उस महायुद्धकी सारी घटना कह सुनायी ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि कृष्णस्य द्वारकाप्रवेशे एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकाप्रवेशविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल २४३ श्लोक हैं ) FUN OFard
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षष्टितमोऽध्यायः वसुदेवजीके पूछनेपर श्रीकृष्णका उन्हें महाभारत- युद्धका वृत्तान्त संक्षेपसे सुनाना वसुदेव उवाच
श्रुतवानस्मि वार्ष्णेय संग्रामं परमाद्भुतम् ।
नराणां वदतां तत्र कथं वा तेषु नित्यशः ॥ १ ॥
वसुदेवजीने पूछा – वृष्णिनन्दन! मैं प्रतिदिन बातचीतके प्रसंगमें लोगोंके मुँहसे सुनता आ रहा हूँ कि महाभारत युद्ध बड़ा अद्भुत हुआ था। इसलिये पूछता हूँ कि कौरवों और पाण्डवोंमें किस तरह युद्ध हुआ? ॥ १ ॥
त्वं तु प्रत्यक्षदर्शी च रूपज्ञश्च महाभुज ।
तस्मात् प्रब्रूहि संग्रामं याथातथ्येन मेऽनघ ॥ २ ॥
महाबाहो! तुम तो उस युद्धके प्रत्यक्षदर्शी हो और उसके स्वरूपको भी भलीभाँति जानते होः अतः अनघ! मुझसे उस युद्धका यथार्थ वर्णन करो ॥ २ ॥
यथा तदभवद् युद्धं पाण्डवानां महात्मनाम् ।
भीष्मकर्णकृपद्रोणशल्यादिभिरनुत्तमम् ॥ ३ ॥
महात्मा पाण्डवोंका भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य और शल्य आदिके साथ जो परम उत्तम युद्ध हुआ था, वह किस तरह हुआ? ॥ ३ ॥
अन्येषां क्षत्रियाणां च कृतास्त्राणामनेकशः ।
नानावेषाकृतिमतां नानादेशनिवासिनाम् ॥ ४ ॥
दूसरे- दूसरे देशोंमें निवास करनेवाले, भाँति - भाँतिकी वेशभूषा और आकृतिवाले जो अस्त्र-- विद्यामें निपुण बहुसंख्यक क्षत्रिय वीर थे, उन्होंने भी किस प्रकार युद्ध किया था? ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षः पित्रा मातुस्तदन्तिके ।
शशंस कुरुवीराणां संग्रामे निधनं यथा ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - माताके निकट पिताके इस प्रकार पूछनेपर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण कौरव वीरोंके संग्राममें मारे जानेका वह प्रसंग यथावत् रूपसे सुनाने लगे ॥ ५ ॥
वासुदेव उवाच अत्यद्भुतानि कर्माणि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।
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बहुलत्वान्न संख्यातुं शक्यान्यब्दशतैरपि ॥ ६ ॥
श्रीकृष्णने कहा - पिताजी! महाभारत युद्धमें काममें आनेवाले मनस्वी क्षत्रिय वीरोंके कर्म बड़े अद्भुत हैं । वे इतने अधिक हैं कि यदि विस्तारके साथ उनका वर्णन किया जाय तो सौ वर्षोंमें भी उनकी समाप्ति नहीं हो सकती ॥ ६ ॥
प्राधान्यतस्तु गदतः समासेनैव मे शृणु ।
कर्माणि पृथिवीशानां यथावदमरद्युते ॥ ७ ॥
अतः देवताओंके समान तेजस्वी तात! मैं मुख्य- मुख्य घटनाओंको ही संक्षेपसे सुना रहा हूँ, आप उन भूपतियोंके कर्म यथावत् रूपसे सुनिये ॥ ७ ॥
भीष्मः सेनापतिरभूदेकादशचमूपतिः ।
कौरव्यः कौरवेन्द्राणां देवानामिव वासवः ॥ ८ ॥
जैसे इन्द्र देवताओंकी सेनाके स्वामी हैं, उसी प्रकार कुरुकुलतिलक भीष्म भी श्रेष्ठ
कौरववीरोंके सेनापति बनाये गये थे । वे ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके संरक्षक थे ॥ ८ ॥
शिखण्डी पाण्डुपुत्राणां नेता सप्तचमूपतिः ।
बभूव रक्षितो धीमान् श्रीमता सव्यसाचिना ॥ ९ ॥
पाण्डवोंके सेनानायक शिखण्डी थे, जो सात अक्षौहिणी सेनाओंका संचालन करते थे ।
बुद्धिमान् शिखण्डी श्रीमान् सव्यसाची अर्जुनके द्वारा सुरक्षित थे ॥ ९ ॥
तेषां तदभवद् युद्धं दशाहानि महात्मनाम् ।
कुरूणां पाण्डवानां च सुमहल्लोमहर्षणम् ॥ १० ॥
उन महामनस्वी कौरवों और पाण्डवोंमें दस दिनोंतक महान् रोमांचकारी युद्ध हुआ ॥ १० ॥
ततः शिखण्डी गाङ्गेयं युध्यमानं महाहवे ।
जघान बहुभिर्बाणैः सह गाण्डीवधन्वना ॥ ११ ॥
फिर दसवें दिन शिखण्डीने महासमरमें जूझते हुए गंगानन्दन भीष्मको गाण्डीवधारी अर्जुनकी सहायतासे बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बहुत घायल कर दिया ॥ ११ ॥
अकरोत् स ततः कालं शरतल्पगतो मुनिः ।
अयनं दक्षिणं हित्वा सम्प्राप्ते चोत्तरायणे ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् भीष्मजी बाणशय्यापर पड़ गये । जबतक दक्षिणायन रहा है, वे मुनिव्रतका पालन करते हुए शरशय्यापर सोते रहे हैं । दक्षिणायन समाप्त होकर उत्तरायणके आनेपर ही उन्होंने मृत्यु स्वीकार की है ॥ १२ ॥
ततः सेनापतिरभूद् द्रोणोऽस्त्रविदुषां वरः ।
प्रवीरः कौरवेन्द्रस्य काव्यो दैत्यपतेरिव ॥ १३ ॥
तदनन्तर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आचार्य द्रोण कौरवपक्षके सेनापति बनाये गये । वे कौरवराजकी सेनाके प्रमुख वीर थे, मानो दैत्यराज बलिकी सेनाके प्रधान संरक्षक
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शुक्राचार्य हों ॥ १३ ॥
अक्षौहिणीभिः शिष्टाभिर्नवभिर्द्विजसत्तमः ।
संवृतः समरश्लाघी गुप्तः कृपवृषादिभिः ॥ १४ ॥
उस समय मरनेसे बची हुई नौ अक्षौहिणी सेना उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ी थी । वे स्वयं तो युद्धका हौसला रखते ही थे, कृपाचार्य और कर्ण भी सदा उनकी रक्षा करते रहते थे ॥ १४ ॥
धृष्टद्युम्नस्त्वभून्नेता पाण्डवानां महास्त्रवित् ।
गुप्त भीमेन मेधावी मित्रेण वरुणो यथा ॥ १५ ॥
इधर महान् अस्त्रवेत्ता धृष्टद्युम्न पाण्डवसेनाके अधिनायक हुए । जैसे मित्र वरुणकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार भीमसेन मेधावी धृष्टद्युम्नकी रक्षा करने लगे ॥ १५ ॥
सच सेनापरिवृतो द्रोणप्रेप्सुर्महामनाः ।
पितुर्निकारान् संस्मृत्य रणे कर्माकरोन्महत् ॥ १६ ॥
पाण्डवसेनासे घिरे हुए महामनस्वी वीर धृष्टद्युम्नने द्रोणके द्वारा अपने पिताके अपमानका स्मरण करके उन्हें मार डालनेके लिये युद्धमें बड़ा भारी पराक्रम दिखाया ॥ १६ ॥
तस्मिंस्ते पृथिवीपाला द्रोणपार्षतसंगरे ।
नानादिगागता वीराः प्रायशो निधनं गताः ॥ १७ ॥
धृष्टद्युम्न और द्रोणके उस भीषण संग्राममें नाना दिशाओंसे आये हुए भूपाल अधिक संख्यामें मारे गये ॥ १७ ॥
दिनानि पञ्च तद् युद्धमभूत् परमदारुणम् ।
ततो द्रोणः परिश्रान्तो धृष्टद्युम्नवशं गतः ॥ १८ ॥
उन दोनोंका वह परम दारुण युद्ध पाँच दिनोंतक चलता रहा । अन्तमें द्रोणाचार्य बहुत थक गये और धृष्टद्युम्नके वशमें पड़कर मारे गये ॥ १८ ॥
ततः सेनापतिरभूत् कर्णो दौर्योधने बले ।
अक्षौहिणीभिः शिष्टाभिर्वृतः पञ्चभिराहवे ॥ १ ९ ॥
तत्पश्चात् दुर्योधनकी सेनामें कर्णको सेनापति बनाया गया, जो मरनेसे बची हुए पाँच अक्षौहिणी सेनाओंसे घिरकर युद्धके मैदानमें खड़ा था ॥ १ ९ ॥
तिस्रस्तु पाण्डुपुत्राणां चम्वो बीभत्सुपालिताः ।
हतप्रवीरभूयिष्ठा बभूवुः समवस्थिताः ॥ २० ॥
उस समय पाण्डवोंके पास तीन अक्षौहिणी सेनाएँ शेष थीं, जिनकी रक्षा अर्जुन कर रहे थे । उनमें बहुत - से प्रमुख वीर मारे गये थे; फिर भी वे युद्धके लिये डटी हुई थीं ॥ २० ॥
ततः पार्थं समासाद्य पतङ्ग इव पावकम् ।
पञ्चत्वमगमत् सौतिर्द्वितीयेऽहनि दारुणः ॥ २१ ॥
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कर्ण दो दिनतक युद्ध करता रहा । वह बड़े क्रूर स्वभावका था । जैसे पतंग जलती आगमें कूदकर जल मरता है, उसी प्रकार वह दूसरे दिनके युद्धमें अर्जुनसे भिड़कर मारा गया ॥ २१ ॥
हते कर्णे तु कौरव्या निरुत्साहा हतौजसः ।
अक्षौहिणीभिस्तिसृभिर्मद्रेशं पर्यवारयन् ॥ २२ ॥
कर्णके मारे जानेपर कौरव हतोत्साह होकर अपनी शक्ति खो बैठे और मद्रराज शल्यको सेनापति बनाकर उन्हें तीन अक्षौहिणी सेनाओंसे सुरक्षित रखकर उन्होंने युद्ध आरम्भ किया ॥ २२ ॥
हतवाहनभूयिष्ठाः पाण्डवाऽपि युधिष्ठिरम् ।
अक्षौहिण्या निरुत्साहाः शिष्टया पर्यवारयन् ॥ २३ ॥
पाण्डवोंके भी बहुत - से वाहन नष्ट हो गये थे । उनमें भी अब युद्धविषयक उत्साह नहीं रह गया था तो भी वे शेष बची हुई एक अक्षौहिणी सेनासे घिरे हुए युधिष्ठिरको आगे करके शल्यका सामना करनेके लिये बढ़े ॥ २३ ॥
अवधीन्मद्रराजानं कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
तस्मिंस्तदार्धदिवसे कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ २४ ॥
कुरुराज युधिष्ठिरने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके दोपहर होते -होते मद्रराज शल्यको मार गिराया ॥ २४ ॥
हते शल्ये तु शकुनिं सहदेवो महामनाः ।
आहर्तारं कलेस्तस्य जघानामितविक्रमः ॥ २५ ॥
शल्यके मारे जानेपर अमित पराक्रमी महामना सहदेवने कलहकी नींव डालनेवाले शकुनिको मार दिया ॥ २५ ॥
निहते शकुनी राजा धार्तराष्ट्रः सुदुर्मनाः ।
अपाक्रामद् गदापाणिर्हतभूयिष्ठसैनिकः ॥ २६ ॥
शकुनिकी मृत्यु हो जानेपर राजा दुर्योधनके मनमें बड़ा दुःख हुआ । उसके बहुत- से सैनिक युद्धमें मार डाले गये थे । इसलिये वह अकेला ही हाथमें गदा लेकर रणभूमिसे भाग निकला ॥ २६ ॥
तमन्वधावत् संक्रुद्धो भीमसेनः प्रतापवान् ।
ह्रदे द्वैपायने चापि सलिलस्थं ददर्श तम् ॥ २७ ॥
इधरसे अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए प्रतापी भीमसेनने उसका पीछा किया और द्वैपायन नामक सरोवरमें पानीके भीतर छिपे हुए दुर्योधनका पता लगा लिया ॥ २७ ॥
हतशिष्टेन सैन्येन समन्तात् परिवार्य तम् ।
अथोपविविशुर्हृष्टा ह्रदस्थं पञ्च पाण्डवाः ॥ २८ ॥
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तदनन्तर हर्षमें भरे हुए पाँचों पाण्डव मरनेसे बची हुई सेनाके द्वारा उसपर चारों ओरसे घेरा डालकर तालाबमें बैठे हुए दुर्योधनके पास जा पहुँचे ॥ २८ ॥
विगाह्य सलिलं त्वाशु वाग्बाणैर्भृशविक्षतः ।
उत्थाय स गदापाणिर्युद्धाय समुपस्थितः ॥ २ ९ ॥
उस समय भीमसेनके वाग्बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर दुर्योधन तुरंत पानीसे बाहर निकला और हाथमें गदा ले युद्धके लिये उद्यत हो पाण्डवोंके पास आ गया ॥ २ ९ ॥
ततः स निहतो राजा धार्तराष्ट्रो महारणे ।
भीमसेनेन विक्रम्य पश्यतां पृथिवीक्षिताम् ॥ ३० ॥
तत्पश्चात् उस महासमरमें सब राजाओंके देखते- देखते भीमसेनने पराक्रम करके धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनको मार डाला ॥ ३० ॥
ततस्तत् पाण्डवं सैन्यं प्रसुप्तं शिबिरे निशि ।
निहतं द्रोणपुत्रेण पितुर्वधममृष्यता ॥ ३१ ॥
इसके बाद रातके समय जब पाण्डवोंकी सेना अपनी छावनीमें निश्चिन्त सो रही थी, उसी समय द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने अपने पिताके वधको न सह सकनेके कारण आक्रमण किया और सबको मार गिराया ॥ ३१ ॥
हतपुत्रा हतबला हतमित्रा मया सह ।
युयुधानसहायेन पञ्च शिष्टास्तु पाण्डवाः ॥ ३२ ॥
उस समय पाण्डवोंके पुत्र, मित्र और सैनिक सब मारे गये । केवल मेरे और सात्यकिके साथ पाँचों पाण्डव शेष रह गये हैं ॥ ३२ ॥
सहैव कृपभोजाभ्यां द्रौणिर्युद्धादमुच्यत ।
युयुत्सुश्चापि कौरव्यो मुक्तः पाण्डवसंश्रयात् ॥ ३३ ॥
कौरवोंके पक्षमें कृपाचार्य और कृतवर्माके साथ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा युद्धसे जीवित बचा है । कुरुवंशी युयुत्सु भी पाण्डवोंका आश्रय लेनेके कारण बच गये हैं ॥ ३३ ॥
निहते कौरवेन्द्रे तु सानुबन्धे सुयोधने ।
विदुरः संजयश्चैव धर्मराजमुपस्थितौ ॥ ३४ ॥
बन्धु- बान्धवोंसहित कौरवराज दुर्योधनके मारे जानेपर विदुर और संजय धर्मराज युधिष्ठिरके आश्रयमें आ गये हैं ॥ ३४ ॥
एवं तदभवद् युद्धमहान्यष्टादश प्रभो ।
यत्र ते पृथिवीपाला निहताः स्वर्गमावसन् ॥ ३५ ॥
प्रभो! इस प्रकार अठारह दिनोंतक वह युद्ध हुआ है । उसमें जो राजा मारे गये हैं, वे स्वर्गलोकमें जा बसे हैं ॥ ३५ ॥
वैशम्पायन उवाच
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शृण्वतां तु महाराज कथां तां लोमहर्षणाम् ।
दुःखशोकपरिक्लेशा वृष्णीनामभवंस्तदा ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज! रोंगटे खड़े कर देनेवाली उस युद्ध- वार्ताको सुनकर वृष्णिवंशी लोग दुःख- शोकसे व्याकुल हो गये ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वासुदेववाक्ये षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥
इस प्रकारश्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णद्वारा युद्धवृत्तान्तका कथनविषयक साठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ६० ॥
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