श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1891–1900
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1891–1900
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एकषष्टितमोऽध्यायः श्रीकृष्णका सुभद्राके कहनेसे वसुदेवजीको अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनाना वैशम्पायन उवाच
कथयन्नेव तु तदा वासुदेवः प्रतापवान् ।
महाभारतयुद्धं तत्कथान्ते पितुरग्रतः ॥ १ ॥
अभिमन्योर्वधं वीरः सोऽत्यक्रामन्महामतिः ।
अप्रियं वसुदेवस्य मा भूदिति महामतिः ॥ २ ॥
मा दौहित्रवधं श्रुत्वा वसुदेवो महात्ययम् ।
दुःखशोकाभिसंतप्तो भवेदिति महामतिः ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! प्रतापी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण जब पिताके सामने महाभारतयुद्धका वृत्तान्त सुना रहे थे, उस समय उन्होंने उस कथाके बीचमें जान - बूझकर अभिमन्युवधका वृत्तान्त छोड़ दिया । परम बुद्धिमान् वीर श्रीकृष्णने सोचा, पिताजी अपने नातीकी मृत्युका महान् अमंगलजनक समाचार सुनकर कहीं दुःख - शोकसे
संतप्त न हो उठें । इनका अप्रिय न हो जाय । इसीसे वह प्रसंग नहीं सुनाया ॥ १–३ ॥
सुभद्रा तु तमुत्क्रान्तमात्मजस्य वधं रणे ।
आचक्ष्व कृष्ण सौभद्रवधमित्यपतद् भुवि ॥ ४ ॥
परन्तु सुभद्राने जब देखा कि मेरे पुत्रके निधनका समाचार इन्होंने नहीं सुनाया, तब उसने याद दिलाते हुए कहा – ' भैया! मेरे अभिमन्युके वधकी बात भी तो बता दो । ' इतना कहकर वह मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ४ ॥
तामपश्यन्निपतितां वसुदेवः क्षितौ तदा ।
दृष्ट्वैव च पपातोर्व्यां सोऽपि दुःखेन मूर्च्छितः ॥ ५ ॥
वसुदेवजीने बेटी सुभद्राको पृथ्वीपर गिरी हुई देखा । देखते ही वे भी दुःखसे मूर्च्छित हो धरतीपर गिर पड़े ॥ ५ ॥
ततः स दौहित्रवधदुःखशोकसमाहतः ।
वसुदेवो महाराज कृष्णं वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ६ ॥
महाराज! तदनन्तर दौहित्रवधके दुःख- शोकसे आहत हो वसुदेवजीने श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— ॥ ६ ॥
ननु त्वं पुण्डरीकाक्ष सत्यवाग् भुवि विश्रुतः ॥ ७ ॥
यद् दौहित्रवधं मेऽद्य न ख्यापयसि शत्रुहन् ।
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तद् भागिनेयनिधनं तत्त्वेनाचक्ष्व मे प्रभो ॥ ८ ॥
' बेटा कमलनयन! तुम तो इस भूतलपर सत्यवादीके रूपमें प्रसिद्ध हो । शत्रुसूदन! फिर क्या कारण है कि आज तुम मुझे मेरे नातीके मारे जानेका समाचार नहीं बता रहे हो । प्रभो! अपने भानजेके वधका वृत्तान्त तुम मुझे ठीक- ठीक बताओ ॥ ७-८ ॥
सदृशाक्षस्तव कथं शत्रुभिर्निहतो रणे ।
दुर्मरं बत वार्ष्णेय कालेऽप्राप्ते नृभिः सह ॥ ९ ॥
यत्र मे हृदयं दुःखाच्छतधा न विदीर्यते । ‘ वृष्णिनन्दन! अभिमन्युकी आँखें ठीक तुम्हारे ही समान सुन्दर थीं । हाय! वह रणभूमिमें शत्रुओंद्वारा कैसे मारा गया? जान पड़ता है, समय पूरा होनेके पहले मनुष्यके लिये मरना अत्यन्त कठिन होता है, तभी तो यह दारुण समाचार सुनकर भी दुःखसे मेरे हृदयके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते हैं ॥ ९ ३ ॥ किमब्रवीत् त्वां संग्रामे सुभद्रां मातरं प्रति ॥ १० ॥
मां चापि पुण्डरीकाक्ष चपलाक्षः प्रियो मम ।
आहवं पृष्ठतः कृत्वा कच्चिन्न निहतः परैः ॥ ११ ॥
कच्चिन्मुखं न गोविन्द तेनाजौ विकृतं कृतम् । ' पुण्डरीकाक्ष! संग्राममें अभिमन्युने तुमको और अपनी माता सुभद्राको क्या संदेश दिया था? चंचल नेत्रोंवाला वह मेरा प्यारा नाती मेरे लिये क्या संदेश देकर मरा था? कहीं वह युद्धमें पीठ दिखाकर तो शत्रुओंके हाथसे नहीं मारा गया? गोविन्द! उसने युद्धमें भयके कारण अपना मुख विकृत तो नहीं कर लिया था ॥ १०-११ ॥ स हि कृष्ण महातेजाः श्लाघन्निव ममाग्रतः ॥ १२ ॥
बालभावेन विनयमात्मनोऽकथयत् प्रभुः । ‘ श्रीकृष्ण! वह महातेजस्वी और प्रभावशाली बालक अपने बालस्वभावके कारण मेरे सामने विनीतभावसे अपनी वीरताकी प्रशंसा किया करता था ॥ १२३ ॥
कच्चिन्न निकृतो बालो द्रोणकर्णकृपादिभिः ॥ १३ ॥
धरण्यां निहतः शेते तन्ममाचक्ष्व केशव ।
स हि द्रोणं च भीष्मं च कर्णं च बलिनां वरम् ॥ १४ ॥
स्पर्धते स्म रणे नित्यं दुहितुः पुत्रको मम । ‘ मेरी बेटीका वह लाड़ला अभिमन्यु रणभूमिमें सदा द्रोणाचार्य, भीष्म तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ कर्णके साथ भी लोहा लेनेका हौसला रखता था । कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि द्रोण, कर्ण और कृपाचार्य आदिने मिलकर उस बालकको कपटपूर्वक मार डाला हो और इस प्रकार धोखेसे मारा जाकर धरतीपर सो रहा हो । केशव! यह सब मुझे बताओ ' ॥ १३-१४ || एवंविधं बहु तदा विलपन्तं सुदुःखितम् ॥ १५ ॥
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पितरं दुःखिततरो गोविन्दो वाक्यमब्रवीत् । इस प्रकार पिताको अत्यन्त दुःखित होकर बहुत विलाप करते देख श्रीकृष्ण स्वयं भी बहुत दुःखी हो गये और उन्हें सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले – ॥ १५३ ॥
न तेन विकृतं वक्त्रं कृतं संग्राममूर्धनि ॥ १६ ॥
न पृष्ठतः कृतश्चापि संग्रामस्तेन दुस्तरः । ‘ पिताजी! अभिमन्युने संग्राममें आगे रहकर शत्रुओं का सामना किया । उसने कभी भी
अपना मुख विकृत नहीं किया । उस दुस्तर युद्धमें उसने कभी पीठ नहीं दिखायी ॥ १६३ ॥
निहत्य पृथिवीपालान् सहस्रशतसंघशः ॥ १७ ॥
खेदितो द्रोणकर्णाभ्यां दौःशासनिवशं गतः । ‘ लाखों राजाओंके समूहोंको मारकर द्रोण और कर्णके साथ युद्ध करते - करते जब वह बहुत थक गया, उस समय दुःशासनके पुत्रके द्वारा मारा गया ॥ १७३ ॥
एको ह्येकेन सततं युध्यमाने यदि प्रभो ॥ १८ ॥
न स शक्येत संग्रामे निहन्तुमपि वज्रिणा । ‘ प्रभो! यदि निरन्तर उसे एक -एक वीरके साथ ही युद्ध करना पड़ता तो रणभूमिमें वज्रधारी इन्द्र भी उसे नहीं मार सकते थे ( परन्तु वहाँ तो बात ही दूसरी हो गयी ) ॥ १८३ || समाहृते च संग्रामात् पार्थे संशप्तकैस्तदा ॥ १ ९ ॥ पर्यवार्यत संक्रुद्धैः स द्रोणादिभिराहवे । ‘ अर्जुन संशप्तकोंके साथ युद्ध करते हुए संग्राम- भूमिसे बहुत दूर हट गये थे । इस अवसरसे लाभ उठाकर क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्य आदि कई वीरोंने मिलकर उस बालकको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १ ९ ३ ॥ ततः शत्रुवधं कृत्वा सुमहान्तं रणे पितः ॥ २० ॥
दौहित्रस्तव वार्ष्णेय दौःशासनिवशं गतः । ' वृष्णिकुल भूषण पिताजी! तो भी शत्रुओंका बड़ा भारी संहार करके आपका वह दौहित्र युद्धमें दुःशासन- कुमारके अधीन हुआ ॥ २० ॥
नूनं च स गतः स्वर्गं जहि शोकं महामते ॥ २१ ॥
न हि व्यसनमासाद्य सीदन्ति कृतबुद्धयः । ‘ महामते! अभिमन्यु निश्चय ही स्वर्गलोकमें गया है; अतः आप उसके लिये शोक न कीजिये । पवित्र बुद्धिवाले साधु पुरुष संकटमें पड़नेपर भी इतने खिन्न नहीं होते हैं ॥ २१३ || द्रोणकर्णप्रभृतयो येन प्रतिसमासिताः ॥ २२ ॥
रणे महेन्द्रप्रतिमाः स कथं नाप्नुयाद् दिवम् ।
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‘ जिसने इन्द्रके समान पराक्रमी द्रोण, कर्ण आदि वीरोंका युद्धमें डटकर सामना किया है, उसे स्वर्गकी प्राप्ति कैसे नहीं होगी? ॥ २२३ ॥
स शोकं जहि दुर्धर्ष मा च मन्युवशं गमः ॥ २३ ॥
शस्त्रपूतां हि स गतिं गतः परपुरंजयः । ' दुर्धर्ष वीर पिताजी! इसलिये आप शोक त्याग दीजिये! शोकके वशीभूत न होइये । शत्रुओंके नगरपर विजय पानेवाला वीरवर अभिमन्यु शस्त्राघातसे पवित्र हो उत्तम गतिको प्राप्त हुआ है ॥ २३ ॥
तस्मिंस्तु निहते वीरे सुभद्रेयं स्वसा मम ॥ २४ ॥
दुःखार्ताथ सुतं प्राप्य कुररीव ननाद ह ।
द्रौपदीं च समासाद्य पर्यपृच्छत दुःखिता ॥ २५ ॥
आर्ये क्व दारकाः सर्वे द्रष्टुमिच्छामि तानहम् । ‘ उस वीरके मारे जानेपर मेरी यह बहिन सुभद्रा दुःखसे आतुर हो पुत्रके पास जाकर कुररीकी भाँति विलाप करने लगी और द्रौपदीके पास जाकर दुःखमग्न हो पूछने लगी -'आर्ये! सब बच्चे कहाँ हैं? मैं उन सबको देखना चाहती हूँ' ॥ २४-२५३ ॥ अस्यास्तु वचनं श्रुत्वा सर्वास्ताः कुरुयोषितः ॥ २६ ॥
भुजाभ्यां परिगृह्यैनां चुक्रुशुः परमार्तवत् ॥ २७ ॥
'इसकी बात सुनकर कुरुकुलकी सारी स्त्रियाँ इसे दोनों हाथोंसे पकड़कर अत्यन्त आर्त- सी होकर करुण विलाप करने लगीं ॥ २६-२७ ॥
उत्तरां चाब्रवीद् भद्रे भर्ता स क्व नु ते गतः ।
क्षिप्रमागमनं मह्यं तस्य त्वं वेदयस्व ह ॥ २८ ॥
' सुभद्राने उत्तरासे भी पूछा- ' भद्रे! तुम्हारा पति वह अभिमन्यु कहाँ चला गया? तुम शीघ्र उसे मेरे आगमनकी सूचना दो ॥ २८ ॥
ननु नामाद्य वैराटि श्रुत्वा मम गिरं सदा ।
भवनान्निष्पतत्याशु कस्मान्नाभ्येति ते पतिः ॥ २ ९ ॥
'विराटकुमारी! जो सदा मेरी आवाज सुनकर शीघ्र घरसे निकल पड़ता था, वही तुम्हारा पति आज मेरे पास क्यों नहीं आता है? ॥ २ ९ ॥
अभिमन्यो कुशलिनो मातुलास्ते महारथाः ।
कुशलं चाब्रुवन् सर्वे त्वां युयुत्सुमिहागतम् ॥ ३० ॥
‘ अभिमन्यो! तुम्हारे सभी महारथी मामा सकुशल हैं और युद्धकी इच्छासे यहाँ आये हुए तुमसे उन सबने तुम्हारा कुशल- समाचार पूछा है ॥ ३० ॥
आचक्ष्व मेऽद्य संग्रामं यथापूर्वमरिंदम ।
कस्मादेवं विलपतीं नाद्येह प्रतिभाषसे ॥ ३१ ॥
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‘ शत्रुदमन! पहलेकी भाँति आज भी तुम मुझे युद्धकी बात बताओ । मैं इस प्रकार विलाप करती हूँ तो भी आज यहाँ तुम मुझसे बात क्यों नहीं करते हो? ' ॥ ३१ ॥
एवमादि तु वार्ष्णेय्यास्तस्यास्तत्परिदेवितम् ।
श्रुत्वा पृथा सुदुःखार्ता शनैर्वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ३२ ॥
सुभद्रे वासुदेवेन तथा सात्यकिना रणे ।
पित्रा च लालितो बालः स हतः कालधर्मणा ॥ ३३ ॥
‘ सुभद्राका इस प्रकार विलाप सुनकर अत्यन्त दुःखसे आतुर हुई बुआ कुन्तीने शनैः-शनैः उसे समझाते हुए कहा – ' सुभद्रे! वासुदेव, सात्यकि और पिता अर्जुन–तीनों जिसका बहुत लाड़ - प्यार करते थे, वह बालक अभिमन्यु कालधर्मसे मारा गया है ( उसकी आयु पूरी हो गयी, इसलिये मृत्युके अधीन हुआ है ) ॥ ३२-३३ ॥
ईदृशो मर्त्यधर्मोऽयं मा शुचो यदुनन्दिनि ।
पुत्रो हि तव दुर्धर्षः सम्प्राप्तः परमां गतिम् ॥ ३४ ॥
‘ यदुनन्दिनि! मृत्युलोकमें जन्म लेनेवाले मनुष्योंका धर्म ही ऐसा है— उन्हें एक- न- एक दिन मृत्युके वशमें होना ही पड़ता है, इसलिये शोक न करो । तुम्हारा दुर्जय पुत्र परम गतिको प्राप्त हुआ है ॥ ३४ ॥
कुले महति जातासि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।
मा शुचश्चपलाक्षं त्वं पद्मपत्रनिभेक्षणे ॥ ३५ ॥
“ बेटी! कमलदललोचने! तुम महात्मा क्षत्रियोंके महान् कुलमें उत्पन्न हुई हो; अतः तुम अपने चंचल नेत्रोंवाले पुत्रके लिये शोक न करो ॥ ३५ ॥
उत्तरां त्वमवेक्षस्व गुर्विणीं मा शुचः शुभे ।
पुत्रमेषा हि तस्याशु जनयिष्यति भाविनी ॥ ३६ ॥
" शुभे! तुम्हारी बहू उत्तरा गर्भवती है, तुम उसीकी ओर देखो, शोक न करो । वह भाविनी उत्तरा शीघ्र ही अभिमन्युके पुत्रको जन्म देगी ” ॥ ३६ ॥
एवमाश्वासयित्वैनां कुन्ती यदुकुलोद्वह ।
विहाय शोकं दुर्धर्षं श्राद्धमस्य ह्यकल्पयत् ॥ ३७ ॥
' यदुकुलभूषण पिताजी! इस प्रकार सुभद्राको समझा-बुझाकर दुस्तर शोकको त्यागकर कुन्तीने उसके श्राद्धकी तैयारी करायी ॥ ३७ ॥
समनुज्ञाप्य धर्मज्ञं राजानं भीममेव च ।
यमौ यमोपमौ चैव ददौ दानान्यनेकशः ॥ ३८ ॥
' धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिर और भीमसेनको आदेश देकर तथा यमके समान पराक्रमी नकुल सहदेवको भी आज्ञा देकर कुन्तीदेवीने अभिमन्युके उद्देश्यसे अनेक प्रकारके दान दिलाये ॥ ३८ ॥
ततः प्रदाय बह्वीर्गा ब्राह्मणाय यदूद्वह ।
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समाहृष्य तु वार्ष्णेयी वैराटीमब्रवीदिदम् ॥ ३ ९ ॥ ‘ यदुकुलभूषण! तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको बहुत- सी गौएँ दान देकर कुन्तीने विराटकुमारी उत्तरासे कहा— ॥ ३ ९ ॥
वैराटि नेह संतापस्त्वया कार्यो ह्यनिन्दिते ।
भर्तारं प्रति सुश्रोणि गर्भस्थं रक्ष वै शिशुम् ॥ ४० ॥
‘ अनिन्द्य गुणोंवाली विराटराजकुमारी! अब तुम्हें यहाँ पतिके लिये संताप नहीं करना चाहिये । सुन्दरि! तुम्हारे गर्भमें जो अभिमन्युका बालक है, उसकी रक्षा करो ' ॥ ४० ॥
एवमुक्त्वा ततः कुन्ती विरराम महाद्युते ।
तामनुज्ञाप्य चैवेमां सुभद्रां समुपानयम् ॥ ४१ ॥
‘महाद्युते! ऐसा कहकर कुन्तीदेवी चुप हो गयीं । उन्हींकी आज्ञासे मैं इस सुभद्रा देवीको साथ लाया हूँ ॥ ४१ ॥
एवं स निधनं प्राप्तो दौहित्रस्तव मानद ।
संतापं त्यज दुर्धर्ष मा च शोके मनः कृथाः ॥ ४२ ॥
‘ मानद! इस प्रकार आपका दौहित्र अभिमन्यु मृत्युको प्राप्त हुआ है । दुर्धर्ष वीर! आप संताप छोड़ दें और मनको शोकमग्न न करें' ॥ ४२ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वसुदेवसान्त्वने एकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें वसुदेवको सान्त्वनाविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥
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द्विषष्टितमोऽध्यायः वसुदेव आदि यादवोंका अभिमन्युके निमित्त श्राद्ध करना तथा व्यासजीका उत्तरा और अर्जुनको समझाकर युधिष्ठिरको अश्वमेधयज्ञ करनेकी आज्ञा देना वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु पुत्रस्य वचः शूरात्मजस्तदा ।
विहाय शोकं धर्मात्मा ददौ श्राद्धमनुत्तमम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपने पुत्र श्रीकृष्णकी बात सुनकर शूरपुत्र धर्मात्मा वसुदेवजीने शोक त्याग दिया और अभिमन्युके लिये परम उत्तम श्राद्धविषयक दान दिया ॥ १ ॥
तथैव वासुदेवश्च स्वस्रीयस्य महात्मनः ।
दयितस्य पितुर्नित्यमकरोदौर्ध्वदेहिकम् ॥ २ ॥
इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने भी अपने महामनस्वी भानजे अभिमन्युका, जो उनके पिता वसुदेवजीका सदा ही परम प्रिय रहा, श्राद्धकर्म सम्पन्न किया ॥ २ ॥
षष्टिं शतसहस्राणि ब्राह्मणानां महौजसाम् ।
विधिवद् भोजयामास भोज्यं सर्वगुणान्वितम् ॥ ३ ॥
उन्होंने साठ लाख महातेजस्वी ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक सर्वगुणसम्पन्न उत्तम अन्न भोजन कराया ॥ ३ ॥
आच्छाद्य च महाबाहुर्धनतृष्णामपानुदत् ।
ब्राह्मणानां तदा कृष्णस्तदभूल्लोमहर्षणम् ॥ ४ ॥
महाबाहु श्रीकृष्णने उस समय ब्राह्मणोंको वस्त्र पहनाकर इतना धन दिया, जिससे
उनकी धनविषयक तृष्णा दूर हो गयी । यह एक रोमांचकारी घटना थी ॥ ४ ॥
सुवर्णं चैव गाश्चैव शयनाच्छादनानि च ।
दीयमानं तदा विप्रा वर्धतामिति चाब्रुवन् ॥ ५ ॥
ब्राह्मणलोग सुवर्ण, गौ, शय्या और वस्त्रका दान पाकर अभ्युदय होनेका आशीर्वाद देने लगे ॥ ५ ॥
वासुदेवोऽथ दाशार्हो बलदेवः ससात्यकिः ।
अभिमन्योस्तदा श्राद्धमकुर्वन् सत्यकस्तदा ॥ ६ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण, बलदेव, सत्यक और सात्यकिने भी उस समय अभिमन्युका श्राद्ध किया ॥ ६ ॥
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अतीव दुःखसंतप्ता न शमं चोपलेभिरे ।
तथैव पाण्डवा वीरा नगरे नागसाह्वये ॥ ७ ॥
नोपागच्छन्त वै शान्तिमभिमन्युविनाकृताः । वे सबके सब अत्यन्त दुःखसे संतप्त थे । उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी । उसी प्रकार हस्तिनापुरमें वीर पाण्डव भी अभिमन्युसे रहित होकर शान्ति नहीं पाते थे ॥ ७३ ॥
सुबहूनि च राजेन्द्र दिवसानि विराटजा ॥ ८ ॥
नाभुङ्क्त पतिदुःखार्ता तदभूत् करुणं महत् ।
कुक्षिस्थ एव तस्याथ गर्भो वै सम्प्रलीयत ॥ ९ ॥
राजेन्द्र! विराटकुमारी उत्तराने पतिके दुःखसे आतुर हो बहुत दिनोंतक भोजन ही नहीं किया । उसकी वह दशा बड़ी ही करुणाजनक थी । उसके गर्भका बालक उदरहीमें पड़ा-पड़ा क्षीण होने लगा ॥ ८ - ९ ॥
आजगाम ततो व्यासो ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा ।
समागम्याब्रवीद् धीमान् पृथां पृथुललोचनाम् ॥ १० ॥
उत्तरां च महातेजाः शोकः संत्यज्यतामयम् ।
भविष्यति महातेजाः पुत्रस्तव यशस्विनि ॥ ११ ॥
उसकी इस दशाको दिव्य दृष्टिसे जानकर महान् तेजस्वी बुद्धिमान् महर्षि व्यास वहाँ आये और विशाल नेत्रोंवाली कुन्ती तथा उत्तरासे मिलकर उन्हें समझाते हुए इस प्रकार बोले — ‘ यशस्विनि उत्तरे! तुम यह शोक त्याग दो। तुम्हारा पुत्र महातेजस्वी होगा ॥ १०-११ ॥
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प्रभावाद् वासुदेवस्य मम व्याहरणादपि ।
पाण्डवानामयं चान्ते पालयिष्यति मेदिनीम् ॥ १२ ॥
‘ भगवान् श्रीकृष्णके प्रभावसे और मेरे आशीर्वादसे वह पाण्डवोंके बाद सम्पूर्ण पृथ्वीका पालन करेगा' ॥ १२ ॥
धनंजयं च सम्प्रेक्ष्य धर्मराजस्य शृण्वतः ।
व्यासो वाक्यमुवाचेदं हर्षयन्निव भारत ॥ १३ ॥
भारत! तत्पश्चात् व्यासजीने धर्मराज युधिष्ठिरको सुनाते हुए अर्जुनकी ओर देखकर उनका हर्ष बढ़ाते हुए- से कहा— ॥ १३ ॥
पौत्रस्तव महाभागो जनिष्यति महामनाः ।
पृथ्वीं सागरपर्यन्तां पालयिष्यति धर्मतः ॥ १४ ॥
तस्माच्छोकं कुरुश्रेष्ठ जहि त्वमरिकर्शन ।
विचार्यमत्र न हि ते सत्यमेतद् भविष्यति ॥ १५ ॥
‘ कुरुश्रेष्ठ! तुम्हें महान् भाग्यशाली और महामनस्वी पौत्र होनेवाला है, जो समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका धर्मतः पालन करेगा; अतः शत्रुसूदन! तुम शोक त्याग दो । इसमें कुछ विचार
करनेकी आवश्यकता नहीं है । मेरा यह कथन सत्य होगा ॥ १४-१५ ॥
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यच्चापि वृष्णिवीरेण कृष्णेन कुरुनन्दन ।
पुरोक्तं तत् तथा भावि मा तेऽत्रास्तु विचारणा ॥ १६ ॥
‘ कुरुनन्दन! वृष्णिवंशके वीर पुरुष भगवान् श्रीकृष्णने पहले जो कुछ कहा है, वह सब वैसा ही होगा । इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥
विबुधानां गतो लोकानक्षयानात्मनिर्जितान् ।
न स शोच्यस्त्वया वीरो न चान्यैः कुरुभिस्तथा ॥ १७ ॥
‘ वीर अभिमन्यु अपने पराक्रमसे उपार्जित किये हुए देवताओंके अक्षय लोकोंमें गया है; अतः उसके लिये तुम्हें या अन्य कुरुवंशियोंको क्षोभ नहीं करना चाहिये' ॥ १७ ॥
एवं पितामहेनोक्तो धर्मात्मा स धनंजयः ।
त्यक्त्वा शोकं महाराज हृष्टरूपोऽभवत् तदा ॥ १८ ॥
महाराज! अपने पितामह व्यासजीके द्वारा इस प्रकार समझाये जानेपर धर्मात्मा अर्जुनने शोक त्यागकर संतोषका आश्रय लिया ॥ १८ ॥
पितापि तव धर्मज्ञ गर्भे तस्मिन् महामते ।
अवर्धत यथाकामं शुक्लपक्षे यथा शशी ॥ १ ९ ॥
धर्मज्ञ! महामते! उस समय तुम्हारे पिता परीक्षित् शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति यथेष्ट वृद्धि पाने लगे ॥ १ ९ ॥
ततः संचोदयामास व्यासो धर्मात्मजं नृपम् ।
अश्वमेधं प्रति तदा ततः सोऽन्तर्हितोऽभवत् ॥ २० ॥
तदनन्तर व्यासजीने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञ करनेके लिये आज्ञा दी और स्वयं वहाँसे अदृश्य हो गये ॥ २० ॥
धर्मराजोऽपि मेधावी श्रुत्वा व्यासस्य तद् वचः ।
वित्तस्यानयने तात चकार गमने मतिम् ॥ २१ ॥
तात! व्यासजीका वचन सुनकर बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरने धन लानेके लिये हिमालयकी यात्रा करनेका विचार किया ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वासुदेवसान्त्वने द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णकी सान्त्वनाविषयक बासठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥