श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1921–1930
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1921–1930
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अष्टषष्टितमोऽध्यायः श्रीकृष्णका प्रसूतिकागृहमें प्रवेश, उत्तराका विलाप और अपने पुत्रको जीवित करनेके लिये प्रार्थना वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु राजेन्द्र केशिहा दुःखमूर्च्छितः ।
तथेति व्याजहारोच्चैर्ह्रादयन्निव तं जनम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजेन्द्र! सुभद्राके ऐसा कहनेपर केशिहन्ता केशव दुःखसे व्याकुल हो उसे प्रसन्न करते हुए- से उच्च स्वरमें बोले- ' बहिन! ऐसा ही होगा' ॥ १ ॥
वाक्येनैतेन हि तदा तं जनं पुरुषर्षभः ।
ह्लादयामास स विभुर्धर्मार्तं सलिलैरिव ॥ २ ॥
जैसे धूपसे तपे हुए मनुष्यको जलसे नहला देनेपर बड़ी शान्ति मिल जाती है, उसी प्रकार पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने इस अमृतमय वचनके द्वारा सुभद्रा तथा अन्तःपुरकी दूसरी स्त्रियोंको महान् आह्लाद प्रदान किया ॥ २ ॥
ततः स प्राविशत् तूर्णं जन्मवेश्म पितुस्तव ।
अर्चितं पुरुषव्याघ्र सितैर्माल्यैर्यथाविधि ॥ ३ ॥
पुरुषसिंह! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही तुम्हारे पिताके जन्मस्थान-सूतिकागारमें गये; जो सफेद फूलोंकी मालाओंसे विधिपूर्वक सजाया गया था ॥ ३ ॥
अपां कुम्भैः सुपूर्णैश्च विन्यस्तैः सर्वतोदिशम् ।
घृतेन तिन्दुकालातैः सर्षपैश्च महाभुज ॥ ४ ॥
महाबाहो! उसके चारों ओर जलसे भरे हुए कलश रखे गये थे । घीसे तर किये हुए तेन्दुक नामक काष्ठके कई टुकड़े जल रहे थे तथा यत्र- तत्र सरसों बिखेरी गयी थी ॥ ४ ॥
अस्त्रैश्च विमलैर्न्यस्तैः पावकैश्च समन्ततः ।
वृद्धाभिश्चापि रामाभिः परिचारार्थमावृतम् ॥ ५ ॥
दक्षैश्च परितो धीर भिषग्भिः कुशलैस्तथा । धैर्यशाली राजन्! उस घरके चारों ओर चमकते हुए तेज हथियार रखे गये थे और सब ओर आग प्रज्वलित की गयी थी । सेवाके लिये उपस्थित हुई बूढ़ी स्त्रियोंने उस स्थानको घेर रखा था तथा अपने - अपने कार्यमें कुशल चतुर चिकित्सक भी चारों ओर मौजूद थे ॥ ५३ || ददर्श च स तेजस्वी रक्षोघ्नान्यपि सर्वशः ॥ ६ ॥
द्रव्याणि स्थापितानि स्म विधिवत् कुशलैर्जनैः ।
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तेजस्वी श्रीकृष्णने देखा कि व्यवस्थाकुशल मनुष्योंद्वारा वहाँ सब ओर राक्षसोंका निवारण करनेवाली नाना प्रकारकी वस्तुएँ विधिपूर्वक रखी गयी थीं ॥ ६३ ॥
तथायुक्तं च तद् दृष्ट्वा जन्मवेश्म पितुस्तव ॥ ७ ॥
हृष्टोऽभवद् हृषीकेशः साधु साध्विति चाब्रवीत् । तुम्हारे पिताके जन्मस्थानको इस प्रकार आवश्यक वस्तुओंसे सुसज्जित देख भगवान् श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए और ' बहुत अच्छा ' कहकर उस प्रबन्धकी प्रशंसा करने लगे ॥ ७ ¾ ॥ तथा ब्रुवति वार्ष्णेये प्रहृष्टवदने तदा ॥ ८ ॥
द्रौपदी त्वरिता गत्वा वैराटीं वाक्यमब्रवीत् । जब भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्नमुख होकर उसकी सराहना कर रहे थे, उसी समय द्रौपदी बड़ी तेजीके साथ उत्तराके पास गयी और बोली-I ॥ ८३ ॥
अयमायाति ते भद्रे श्वशुरो मधुसूदनः ॥ ९ ॥
पुराणर्षिरचिन्त्यात्मा समीपमपराजितः । ‘ कल्याणि! यह देखो, तुम्हारे श्वशुरतुल्य, अचिन्त्य- स्वरूप, किसीसे पराजित न होनेवाले, पुरातन ऋषि भगवान् मधुसूदन तुम्हारे पास आ रहे हैं' ॥ ९ ३ ॥ सापि बाष्पकलां वाचं निगृह्याश्रूणि चैव ह ॥ १० ॥
सुसंवीताभवद् देवी देववत् कृष्णमीयुषी ।
सा तथा दूयमानेन हृदयेन तपस्विनी ॥ ११ ॥
दृष्ट्वा गोविन्दमायान्तं कृपणं पर्यदेवयत् । यह सुनकर उत्तराने अपने आँसुओंको रोककर रोना बंद कर दिया और अपने सारे शरीरको वस्त्रोंसे ढक लिया । श्रीकृष्णके प्रति उसकी भगवद्बुद्धि थी; इसलिये उन्हें आते देख वह तपस्विनी बाला व्यथित हृदयसे करुणविलाप करती हुई गद्गद - कण्ठसे इस प्रकार बोली- ॥ १०-११३ ॥
पुण्डरीकाक्ष पश्यावां बालेन हि विनाकृतौ ।
अभिमन्युं च मां चैव हतौ तुल्यं जनार्दन । १२ ॥
‘ कमलनयन! जनार्दन! देखिये, आज मैं और मेरे पति दोनों ही संतानहीन हो गये । आर्यपुत्र तो युद्धमें वीरगतिको प्राप्त हुए हैं; परंतु मैं पुत्रशोकसे मारी गयी । इस प्रकार हम दोनों समान रूपसे ही कालके ग्रास बन गये ॥ १२ ॥
वार्ष्णेय मधुहन् वीर शिरसा त्वां प्रसादये ।
द्रोणपुत्रास्त्रनिर्दग्धं जीवयैनं ममात्मजम् ॥ १३ ॥
‘ वृष्णिनन्दन! वीर मधुसूदन! मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर आपका कृपाप्रसाद प्राप्त करना चाहती हूँ । द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके अस्त्रसे दग्ध हुए मेरे इस पुत्रको जीवित कर
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दीजिये ॥ १३ ॥
यदि स्म धर्मराज्ञा वा भीमसेनेन वा पुनः ।
त्वया वा पुण्डरीकाक्ष वाक्यमुक्तमिदं भवेत् ॥ १४ ॥
अजानतीमिषीकेयं जनित्रीं हन्त्विति प्रभो ।
अहमेव विनष्टा स्यां नैतदेवंगते भवेत् ॥ १५ ॥
‘ प्रभो! पुण्डरीकाक्ष! यदि धर्मराज अथवा आर्य भीमसेन या आपने ही ऐसा कह दिया होता कि यह सींक इस बालकको न मारकर इसकी अनजान माताको ही मार डाले, तब
केवल मैं ही नष्ट हुई होती । उस दशामें यह अनर्थ नहीं होता ॥ १४-१५ ॥
गर्भस्थस्यास्य बालस्य ब्रह्मास्त्रेण निपातनम् ।
कृत्वा नृशंसं दुर्बुद्धिर्द्रौणिः किं फलमश्रुते ॥ १६ ॥
‘हाय! इस गर्भके बालकको ब्रह्मास्त्रसे मार डालनेका क्रूरतापूर्ण कर्म करके दुर्बुद्धि द्रोणपुत्र अश्वत्थामा कौन- सा फल पा रहा है ॥ १६ ॥
सा त्वां प्रसाद्य शिरसा याचे शत्रुनिबर्हणम् ।
प्राणांस्त्यक्ष्यामि गोविन्द नायं संजीवते यदि ॥ १७ ॥
‘ गोविन्द! आप शत्रुओंका संहार करनेवाले हैं । मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर आपको प्रसन्न करके आपसे इस बालकके प्राणोंकी भीख माँगती हूँ । यदि यह जीवित नहीं हुआ तो मैं भी अपने प्राण त्याग दूँगी ॥ १७ ॥
अस्मिन् हि बहवः साधो ये ममासन् मनोरथाः ।
ते द्रोणपुत्रेण हताः किं नु जीवामि केशव ॥ १८ ॥
'साधुपुरुष केशव! इस बालकपर मैंने जो बड़ी- बड़ी आशाएँ बाँध रखी थीं, द्रोणपुत्र
अश्वत्थामाने उन सबको नष्ट कर दिया । अब मैं किसलिये जीवित रहूँ? ॥ १८ ॥
आसीन्मम मतिः कृष्ण पुत्रोत्सङ्गा जनार्दन ।
अभिवादयिष्ये हृष्टेति तदिदं वितथीकृतम् ॥ १ ९ ॥
'श्रीकृष्ण! जनार्दन! मेरी बड़ी आशा थी कि अपने इस बच्चेको गोदमें लेकर मैं प्रसन्नतापूर्वक आपके चरणोंमें अभिवादन करूँगी; किंतु अब वह व्यर्थ हो गयी ॥ १ ९ ॥
चपलाक्षस्य दायादे मृतेऽस्मिन् पुरुषर्षभ ।
विफला मे कृताः कृष्ण हृदि सर्वे मनोरथाः ॥ २० ॥
' पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण! चंचल नेत्रोंवाले पतिदेवके इस पुत्रकी मृत्यु हो जानेसे मेरे हृदयके सारे मनोरथ निष्फल हो गये ॥ २० ॥
चपलाक्षः किलातीव प्रियस्ते मधुसूदन ।
सुतं पश्य त्वमस्यैनं ब्रह्मास्त्रेण निपातितम् ॥ २१ ॥
'मधुसूदन! सुनती हूँ कि चंचल नेत्रोंवाले अभिमन्यु आपको बहुत ही प्रिय थे । उन्हींका
बेटा आज ब्रह्मास्त्रकी मारसे मरा पड़ा है । आप इसे आँख भरकर देख लीजिये ॥ २१ ॥
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कृतघ्नोऽयं नृशंसोऽयं यथास्य जनकस्तथा ।
यः पाण्डवीं श्रियं त्वक्त्वा गतोऽद्य यमसादनम् ॥ २२ ॥
‘ यह बालक भी अपने पिताके ही समान कृतघ्न और नृशंस है, जो पाण्डवोंकी राजलक्ष्मीको छोड़कर आज अकेला ही यमलोक चला गया ॥ २२ ॥
मया चैतत् प्रतिज्ञातं रणमूर्धनि केशव ।
अभिमन्यौ हते वीर त्वामेष्याम्यचिरादिति ॥ २३ ॥
‘ केशव! मैंने युद्धके मुहानेपर यह प्रतिज्ञा की थी कि ' मेरे वीर पतिदेव! यदि आप मारे गये तो मैं शीघ्र ही परलोकमें आपसे आ मिलूँगी ॥ २३ ॥
तच्च नाकरवं कृष्ण नृशंसा जीवितप्रिया ।
इदानीं मां गतां तत्र किं नु वक्ष्यति फाल्गुनिः ॥ २४ ॥
' परंतु श्रीकृष्ण! मैंने उस प्रतिज्ञाका पालन नहीं किया । मैं बड़ी कठोरहृदया हूँ । मुझे पतिदेव नहीं, ये प्राण ही प्यारे हैं । यदि इस समय मैं परलोकमें जाऊँ तो वहाँ अर्जुनकुमार मुझसे क्या कहेंगे? ' ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तरावाक्ये अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तराका वाक्यविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६८ ॥
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एकोनसप्ततितमोऽध्यायः उत्तराका विलाप और भगवान् श्रीकृष्णका उसके मृत बालकको जीवन -दान देना वैशम्पायन उवाच
सैवं विलप्य करुणं सोन्मादेव तपस्विनी ।
उत्तरा न्यपतद् भूमौ कृपणा पुत्रगृद्धिनी ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! पुत्रका जीवन चाहनेवाली तपस्विनी उत्तरा उन्मादिनी- सी होकर इस प्रकार दीनभावसे करुण विलाप करके पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ १ ॥
तां तु दृष्ट्वा निपतितां हतपुत्रपरिच्छदाम् ।
चुक्रोश कुन्ती दुःखार्ता सर्वाश्च भरतस्त्रियः ॥ २ ॥
जिसका पुत्ररूपी परिवार नष्ट हो गया था, उस उत्तराको पृथ्वीपर पड़ी हुई देख दुःखसे आतुर हुई कुन्तीदेवी तथा भरतवंशकी सारी स्त्रियाँ फूट- फूटकर रोने लगीं ॥ २ ॥
मुहूर्तमिव राजेन्द्र पाण्डवानां निवेशनम् ।
अप्रेक्षणीयमभवदार्तस्वनविनादितम् ॥ ३ ॥
राजेन्द्र! दो घड़ीतक पाण्डवोंका वह भवन आर्तनादसे गूँजता रहा । उस समय उसकी ओर देखते नहीं बनता था ॥ ३ ॥
सा मुहूर्तं च राजेन्द्र पुत्रशोकाभिपीडिता ।
कश्मलाभिहता वीर वैराटी त्वभवत् तदा ॥ ४ ॥
वीर राजेन्द्र! पुत्रशोकसे पीड़ित वह विराटकुमारी उत्तरा उस समय दो घड़ीतक मूर्च्छामें पड़ी रही ॥ ४ ॥
प्रतिलभ्य तु सा संज्ञामुत्तरा भरतर्षभ ।
अङ्कमारोप्य तं पुत्रमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! थोड़ी देर बाद उत्तरा जब होशमें आयी, तब उस मरे हुए पुत्रको गोदमें लेकर यों कहने लगी-— ॥ ५ ॥
धर्मज्ञस्य सुतः स त्वमधर्मं नावबुध्यसे ।
यस्त्वं वृष्णिप्रवीरस्य कुरुषे नाभिवादनम् ॥ ६ ॥
' बेटा! तू तो धर्मज्ञ पिताका पुत्र है । फिर तेरे द्वारा जो अधर्म हो रहा है, उसे तू क्यों नहीं समझता? वृष्णिवंशके श्रेष्ठ वीर भगवान् श्रीकृष्ण सामने खड़े हैं तो भी तू इन्हें प्रणाम क्यों नहीं करता? ॥ ६ ॥
पुत्र गत्वा मम वचो ब्रूयास्त्वं पितरं त्विदम् ।
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दुर्मरं प्राणिनां वीर कालेऽप्राप्ते कथंचन ॥ ७ ॥
याहं त्वया विनाद्येह पत्या पुत्रेण चैव ह ।
मर्तव्ये सति जीवामि हतस्वस्तिरकिंचना ॥ ८ ॥
‘ वत्स! परलोकमें जाकर तू अपने पितासे मेरी यह बात कहना- ' वीर! अन्तकाल आये बिना प्राणियोंके लिये किसी तरह भी मरना बड़ा कठिन होता है । तभी तो मैं यहाँ आप - जैसे पति तथा इस पुत्रसे बिछुड़कर भी जब कि मुझे मर जाना चाहिये, अबतक जी
रही हूँ; मेरा सारा मंगल नष्ट हो गया है । मैं अकिंचन हो गयी हूँ ' ॥
अथवा धर्मराज्ञाहमनुज्ञाता महाभुज ।
भक्षयिष्ये विषं घोरं प्रवेक्ष्ये वा हुताशनम् ॥ ९ ॥
‘ महाबाहो! अब मैं धर्मराजकी आज्ञा लेकर भयानक विष खा लूँगी अथवा प्रज्वलित अग्निमें समा जाऊँगी ॥ ९ ॥
अथवा दुर्मरं तात यदिदं मे सहस्रधा ।
पतिपुत्रविहीनाया हृदयं न विदीर्यते ॥ १० ॥
'तात! जान पड़ता है, मनुष्यके लिये मरना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि पति और पुत्रसे हीन होनेपर भी मेरे इस हृदयके हजारों टुकड़े नहीं हो रहे हैं ॥ १० ॥
उत्तिष्ठ पुत्र पश्येमं दुःखितां प्रपितामहीम् ।
आर्तामुपप्लुतां दीनां निमग्नां शोकसागरे ॥ ११ ॥
‘ बेटा! उठकर खड़ा हो जा । देख! ये तेरी परदादी ( कुन्ती) कितनी दुखी हैं । ये तेरे लिये आर्त, व्यथित एवं दीन होकर शोकके समुद्रमें डूब गयी हैं ॥ ११ ॥
आर्यां च पश्य पाञ्चालीं सात्वतीं च तपस्विनीम् ।
मां च पश्य सुदुःखार्तां व्याधविद्धां मृगीमिव ॥ १२ ॥
‘ आर्या पांचाली ( द्रौपदी ) की ओर देख, अपनी दादी तपस्विनी सुभद्राकी ओर दृष्टिपात कर और व्याधके बाणोंसे बिंधी हुई हरिणीकी भाँति अत्यन्त दुःखसे आर्त हुई मुझ अपनी माँको भी देख ले ॥ १२ ॥
उत्तिष्ठ पश्य वदनं लोकनाथस्य धीमतः ।
पुण्डरीकपलाशाक्षं पुरेव चपलेक्षणम् ॥ १३ ॥
' बेटा! उठकर खड़ा हो जा और बुद्धिमान् जगदीश्वर श्रीकृष्णके कमलदलके समान नेत्रोंवाले मुखारविन्दकी शोभा निहार, ठीक उसी तरह जैसे पहले मैं चंचल नेत्रोंवाले तेरे पिताका मुँह निहारा करती थी ' ॥ १३ ॥
एवं विप्रलपन्तीं तु दृष्ट्वा निपतितां पुनः ।
उत्तरां तां स्त्रियं सर्वाः पुनरुत्थापयंस्ततः ॥ १४ ॥
इस प्रकार विलाप करती हुई उत्तराको पुनः पृथ्वीपर पड़ी देख सब स्त्रियोंने उसे फिर उठाकर बिठाया ॥ १४ ॥
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उत्थाय च पुनर्धैर्यात् तदा मत्स्यपतेः सुता ।
प्राञ्जलिः पुण्डरीकाक्षं भूमावेवाभ्यवादयत् ॥ १५ ॥
पुनः उठकर धैर्य धारण करके मत्स्यराजकुमारीने पृथ्वीपर ही हाथ जोड़कर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम किया ॥ १५ ॥
श्रुत्वा स तस्या विपुलं विलापं पुरुषर्षभः ।
उपस्पृश्य ततः कृष्णो ब्रह्मास्त्रं प्रत्यसंहरत् ॥ १६ ॥
उसका महान् विलाप सुनकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने आचमन करके अश्वत्थामाके चलाये हुए ब्रह्मास्त्रको शान्त कर दिया ॥ १६ ॥
प्रतिजज्ञे च दाशार्हस्तस्य जीवितमच्युतः ।
अब्रवीच्च विशुद्धात्मा सर्वं विश्रावयन् जगत् ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् विशुद्ध हृदयवाले और कभी अपनी महिमासे विचलित न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने उस बालकको जीवित करनेकी प्रतिज्ञा की और सम्पूर्ण जगत्को सुनाते हुए इस प्रकार कहा— ॥ १७ ॥
न ब्रवीम्युत्तरे मिथ्या सत्यमेतद् भविष्यति ।
एष संजीवयाम्येनं पश्यतां सर्वदेहिनाम् ॥ १८ ॥
' बेटी उत्तरा! मैं झूठ नहीं बोलता । मैंने जो प्रतिज्ञा की है, वह सत्य होकर ही रहेगी । देखो, मैं समस्त देहधारियोंके देखते - देखते अभी इस बालकको जिलाये देता हूँ ॥ १८ ॥
नोक्तपूर्वं मया मिथ्या स्वैरेष्वपि कदाचन ।
न च युद्धात् परावृत्तस्तथा संजीवतामयम् ॥ १ ९ ॥
' मैंने खेल- कूदमें भी कभी मिथ्या भाषण नहीं किया है और युद्धमें पीठ नहीं दिखायी है । इस शक्तिके प्रभावसे अभिमन्युका यह बालक जीवित हो जाय ॥ १ ९ ॥
यथा मे दयितो धर्मो ब्राह्मणश्च विशेषतः ।
अभिमन्योः सुतो जातो मृतो जीवत्वयं तथा ॥ २० ॥
' यदि धर्म और ब्राह्मण मुझे विशेष प्रिय हों तो अभिमन्युका यह पुत्र, जो पैदा होते ही मर गया था, फिर जीवित हो जाय ॥ २० ॥
यथाहं नाभिजानामि विजये तु कदाचन ।
विरोधं तेन सत्येन मृतो जीवत्वयं शिशुः ॥ २१ ॥
‘ मैंने कभी अर्जुनसे विरोध किया हो, इसका स्मरण नहीं है; इस सत्यके प्रभावसे यह मरा हुआ बालक अभी जीवित हो जाय ॥ २१ ॥
यथा सत्यं च धर्मश्च मयि नित्यं प्रतिष्ठितौ ।
तथा मृतः शिशुरयं जीवतादभिमन्युजः ॥ २२ ॥
‘ यदि मुझमें सत्य और धर्मकी निरन्तर स्थिति बनी रहती हो तो अभिमन्युका यह मरा हुआ बालक जी उठे ॥ २२ ॥
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यथा कंसश्च केशी च धर्मेण निहतौ मया ।
तेन सत्येन बालोऽयं पुनः संजीवतामयम् ॥ २३ ॥
‘ मैंने कंस और केशीका धर्मके अनुसार वध किया है, इस सत्यके प्रभावसे यह बालक फिर जीवित हो जाय ' ॥ २३ ॥
इत्युक्तो वासुदेवेन स बालो भरतर्षभ ।
शनैः शनैर्महाराज प्रास्पन्दत सचेतनः ॥ २४ ॥
भरतश्रेष्ठ! महाराज! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर उस बालकमें चेतना आ गयी ।
वह धीरे - धीरे अंग- संचालन करने लगा ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि परिक्षित्संजीवने एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें परिक्षित्को जीवनदानविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ९ ॥ Papa
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सप्ततितमोऽध्यायः श्रीकृष्णद्वारा राजा परिक्षित्का नामकरण तथा पाण्डवोंका हस्तिनापुरके समीप आगमन वैशम्पायन उवाच
ब्रह्मास्त्रं तु यदा राजन् कृष्णेन प्रतिसंहृतम् ।
तदा तद् वेश्म त्वत्पित्रा तेजसाभिविदीपितम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! भगवान् श्रीकृष्णने जब ब्रह्मास्त्रको शान्त कर दिया, उस समय वह सूतिकागृह तुम्हारे पिताके तेजसे देदीप्यमान होने लगा ॥ १ ॥
ततो रक्षांसि सर्वाणि नेशुस्त्यक्त्वा गृहं तु तत् ।
अन्तरिक्षे च वागासीत् साधु केशव साध्विति ॥ २ ॥
फिर तो बालकोंका विनाश करनेवाले समस्त राक्षस उस घरको छोड़कर भाग गये । इसी समय आकाशवाणी हुई- ' केशव! तुम्हें साधुवाद! तुमने बहुत अच्छा कार्य किया ' ॥ २ ॥
तदस्त्रं ज्वलितं चापि पितामहमगात् तदा ।
ततः प्राणान् पुनर्लेभे पिता तव नरेश्वर ॥३ ॥
साथ ही वह प्रज्वलित ब्रह्मास्त्र ब्रह्मलोकको चला गया । नरेश्वर! इस तरह तुम्हारे पिताको पुनर्जीवन प्राप्त हुआ ॥ ३ ॥
व्यचेष्टत च बालोऽसौ यथोत्साहं यथाबलम् ।
बभूवुर्मुदिता राजंस्ततस्ता भरतस्त्रियः ॥ ४ ॥
राजन्! उत्तराका वह बालक अपने उत्साह और बलके अनुसार हाथ- पैर हिलाने लगा, यह देख भरतवंशकी उन सभी स्त्रियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४ ॥
ब्राह्मणान् वाचयामासुर्गोविन्दस्यैव शासनात् ।
ततस्ता मुदिताः सर्वाः प्रशशंसुर्जनार्दनम् ॥ ५ ॥
उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराया । फिर वे सब आनन्दमग्न होकर श्रीकृष्णके गुण गाने लगीं ॥ ५ ॥
स्त्रियो भरतसिंहानां नावं लब्ध्वेव पारगाः ।
कुन्ती द्रुपदपुत्री च सुभद्रा चोत्तरा तथा ॥ ६ ॥
स्त्रियश्चान्या नृसिंहानां बभूवुर्हृष्टमानसाः ।
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जैसे नदीके पार जानेवाले मनुष्योंको नाव पाकर बड़ी खुशी होती है, उसी प्रकार भरतवंशी वीरोंकी वे स्त्रियाँ-कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरा एवं नरवीरोंकी स्त्रियाँ उस बालकके जीवित होनेसे मन -ही- मन बहुत प्रसन्न हुईं ॥ ६१३ ॥
तत्र मल्ला नटाश्चैव ग्रन्थिकाः सौख्यशायिकाः ॥ ७ ॥
सूतमागधसंघाश्चाप्यस्तुवंस्तं जनार्दनम् ।
कुरुवंशस्तवाख्याभिराशीर्भिर्भरतर्षभ ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मल्ल, नट, ज्यौतिषी, सुखका समाचार पूछनेवाले सेवक तथा सूतों और मागधोंके समुदाय कुरुवंशकी स्तुति और आशीर्वादके साथ भगवान् श्रीकृष्णका गुणगान करने लगे ॥ ७-८ ॥
उत्थाय तु यथाकालमुत्तरा यदुनन्दनम् ।
अभ्यवादयत प्रीता सह पुत्रेण भारत ॥ ९ ॥
भरतनन्दन! फिर प्रसन्न हुई उत्तरा यथासमय उठकर पुत्रको गोदमें लिये हुए यदुनन्दन श्रीकृष्णके समीप आयी और उन्हें प्रणाम किया ॥ ९ ॥
तस्य कृष्णो ददौ हृष्टो बहुरत्नं विशेषतः ।
तथान्ये वृष्णिशार्दूला नाम चास्याकरोत् प्रभुः ॥ १० ॥
पितुस्तव महाराज सत्यसंधो जनार्दनः । भगवान् श्रीकृष्णने भी प्रसन्न होकर उस बालकको बहुत- से रत्न उपहारमें दिये । फिर अन्य यदुवंशियोंने भी नाना प्रकारकी वस्तुएँ भेंट कीं । महाराज! इसके बाद सत्यप्रतिज्ञ भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हारे पिताका इस प्रकार नामकरण किया ॥ १०३ ॥
परिक्षीणे कुले यस्माज्जातोऽयमभिमन्युजः ॥ ११ ॥
परिक्षिदिति नामास्य भवत्वित्यब्रवीत् तदा । 'कुरुकुलके परिक्षीण हो जानेपर यह अभिमन्युका बालक उत्पन्न हुआ है । इसलिये
इसका नाम परिक्षित् होना चाहिये। ' ऐसा भगवान्ने कहा ॥ ११३ ॥
सोऽवर्धत यथाकालं पिता तव जनाधिप ॥ १२ ॥
मनःप्रह्लादनश्चासीत् सर्वलोकस्य भारत । नरेश्वर! इस प्रकार नामकरण हो जानेके बाद तुम्हारे पिता परिक्षित् कालक्रमसे बड़े होने लगे । भारत! वे सब लोगोंके मनको आनन्दमग्न किये रहते थे ॥ १२३ ॥
मासजातस्तु ते वीर पिता भवति भारत ॥ १३ ॥
अथाजग्मुः सुबहुलं रत्नमादाय पाण्डवाः । वीर भरतनन्दन! जब तुम्हारे पिताकी अवस्था एक महीनेकी हो गयी, उस समय पाण्डवलोग बहुत - सी रत्नराशि लेकर हस्तिनापुरको लौटे ॥ १३३ ॥
तान् समीपगतान् श्रुत्वा निर्ययुर्वृष्णिपुङ्गवाः ॥ १४ ॥