श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1911–1920
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1911–1920
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उपलब्ध हुए ॥ १४-१५ ॥
उद्धारयामास तदा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
तेषां रक्षणमप्यासीन्महान् करपुटस्तथा ॥ १६ ॥
धर्मराज युधिष्ठिरने उस समय उन सब बर्तनोंको भूमि खोदकर निकलवाया । उन्हें रखनेके लिये बड़ी - बड़ी संदूकें लायी गयी थीं ॥ १६ ॥
नद्धं च भाजनं राजंस्तुलार्धमभवन्नृप ।
वाहनं पाण्डुपुत्रस्य तत्रासीत् तु विशाम्पते ॥ १७ ॥
राजन्! एक- एक संदूकमें बंद किये हुए बर्तनोंका बोझ आधा-आधा भार होता था । प्रजानाथ! उन सबको ढोनेके लिये पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके वाहन भी वहाँ उपस्थित थे ॥ १७ ॥
षष्टिरुष्ट्रसहस्राणि शतानि द्विगुणा हयाः ।
वारणाश्च महाराज सहस्रशतसम्मिताः ॥ १८ ॥
शकटानि रथाश्चैव तावदेव करेणवः ।
खराणां पुरुषाणां च परिसंख्या न विद्यते ॥। १ ९ ॥
महाराज! साठ हजार ऊँट, एक करोड़ बीस लाख घोड़े, एक लाख हाथी, एक लाख रथ, एक लाख छकड़े और उतनी ही हथिनियाँ थीं । गधों और मनुष्योंकी तो गिनती ही नहीं थी ॥ १८-१९ ॥
एतद् वित्तं तदभवद् यदुद्दध्रे युधिष्ठिरः ।
षोडशाष्टौ चतुर्विंशत्सहस्रं भारलक्षणम् ॥ २० ॥
एतेष्वादाय तद् द्रव्यं पुनरभ्यर्च्य पाण्डवः ।
महादेवं प्रति ययौ पुरं नागाह्वयं प्रति ॥ २१ ॥
द्वैपायनाभ्यनुज्ञातः पुरस्कृत्य पुरोहितम् । युधिष्ठिरने वहाँ जितना धन खुदवाया था, वह सोलह करोड़ आठ लाख और चौबीस हजार भार सुवर्ण था । उन्होंने उपर्युक्त सब वाहनोंपर धन लदवाकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने पुनः महादेवजीका पूजन किया और व्यासजीकी आज्ञा लेकर पुरोहित धौम्य मुनिको आगे करके हस्तिनापुरको प्रस्थान किया ॥ २०-२१३ ॥
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गोयुते गोयुते चैव न्यवसत् पुरुषर्षभः ॥ २२ ॥
सा पुराभिमुखा राजन्नुवाह महती चमूः ।
कृच्छ्राद् द्रविणभारार्ता हर्षयन्ती कुरूद्वहान् ॥ २३ ॥
राजन्! वे वाहनोंपर बोझ अधिक होनेके कारण दो- दो कोसपर मुकाम देते जाते थे । द्रव्यके भारसे कष्ट पाती हुई वह विशाल सेना उन कुरुश्रेष्ठ वीरोंका हर्ष बढ़ाती हुई बड़ी कठिनाईसे नगरकी ओर उस धनको ले जा रही थी ॥ २२-२३ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि द्रव्यानयने पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमेंद्रव्यका आनयनविषयक पैंसठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
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षट्षष्टितमोऽध्यायः श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें आगमन और उत्तराके मृत बालकको जिलानेके लिये कुन्तीकी उनसे प्रार्थना वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु वासुदेवोऽपि वीर्यवान् ।
उपायाद् वृष्णिभिः सार्धं पुरं वारणसाह्वयम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इसी बीचमें परम पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण भी वृष्णिवंशियोंको साथ लेकर हस्तिनापुर आ गये ॥ १ ॥
समयं वाजिमेधस्य विदित्वा पुरुषर्षभः ।
यथोक्तो धर्मपुत्रेण प्रव्रजन् स्वपुरीं प्रति ॥ २ ॥
उनके द्वारका जाते समय धर्मपुत्र युधिष्ठिरने जैसी बात कही थी, उसके अनुसार अश्वमेध यज्ञका समय निकट जानकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण पहले ही उपस्थित हो गये ॥ २ ॥
रौक्मिणेयेन सहितो युयुधानेन चैव ह ।
चारुदेष्णेन साम्बेन गदेन कृतवर्मणा ॥ ३ ॥
सारणेन च वीरेण निशठेनोल्मुकेन च । उनके साथ रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न, सात्यकि, चारुदेष्ण, साम्ब, गद, कृतवर्मा, सारण, वीर निशठ और उल्मुक भी थे ॥ ३३ ॥
बलदेवं पुरस्कृत्य सुभद्रासहितस्तदा ॥ ४ ॥
द्रौपदीमुत्तरां चैव पृथां चाप्यवलोककः ।
समाश्वासयितुं चापि क्षत्रिया निहतेश्वराः ॥ ५ ॥
वे बलदेवजीको आगे करके सुभद्राके साथ पधारे थे । उनके शुभागमनका उद्देश्य था द्रौपदी, उत्तरा और कुन्तीसे मिलना तथा जिनके पति मारे गये थे, उन सभी क्षत्राणियोंको आश्वासन देना — धीरज बँधाना ॥ ४-५ ॥
तानागतान् समीक्ष्यैव धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
प्रत्यगृह्णाद् यथान्यायं विदुरश्च महामनाः ॥ ६ ॥
उनके आगमनका समाचार सुनते ही राजा धृतराष्ट्र और महामना विदुरजी खड़े हो गये और आगे बढ़कर उन्होंने उन सबका विधिवत् स्वागत- सत्कार किया ॥ ६ ॥
तत्रैव न्यवसत् कृष्णः स्वर्चितः पुरुषोत्तमः ।
विदुरेण महातेजास्तथैव च युयुत्सुना ॥ ७ ॥
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विदुर और युयुत्सुसे भलीभाँति पूजित हो महातेजस्वी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण वहीं रहने लगे ॥ ७ ॥
वसत्सु वृष्णिवीरेषु तत्राथ जनमेजय ।
जज्ञे तव पिता राजन् परिक्षित् परवीरहा ॥ ८ ॥
जनमेजय! उन वृष्णिवीरोंके वहाँ निवास करते समय ही तुम्हारे पिता शत्रुवीरहन्ता परीक्षित्का जन्म हुआ था ॥ ८ ॥
स तु राजा महाराज ब्रह्मास्त्रेणावपीडितः ।
शवो बभूव निश्चेष्टो हर्षशोकविवर्धनः ॥ ९ ॥
महाराज! वे राजा परीक्षित् ब्रह्मास्त्रसे पीड़ित होनेके कारण चेष्टाहीन मुर्देके रूपमें उत्पन्न हुए, अतः स्वजनोंका हर्ष और शोक बढ़ानेवाले हो गये थे* ॥ ९ ॥
हृष्टानां सिंहनादेन जनानां तत्र निःस्वनः ।
प्रविश्य प्रदिशः सर्वाः पुनरेव व्युपारमत् ॥ १० ॥
पहले पुत्र-जन्मका समाचार सुनकर हर्षमें भरे हुए लोगोंके सिंहनादसे एक महान् कोलाहल सुनायी पड़ा, जो सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रविष्ट हो पुनः शान्त हो गया ॥ १० ॥
ततः सोऽतित्वरः कृष्णो विवेशान्तःपुरं तदा ।
युयुधानद्वितीयो वै व्यथितेन्द्रियमानसः ॥ ११ ॥
इससे भगवान् श्रीकृष्णके मन और इन्द्रियोंमें व्यथा - सी उत्पन्न हो गयी । वे सात्यकिको साथ ले बड़ी उतावलीसे अन्तः पुरमें जा पहुँचे ॥ ११ ॥
ततस्त्वरितमायान्तीं ददर्श स्वां पितृष्वसाम् ।
क्रोशन्तीमभिधावेति वासुदेवं पुनः पुनः ॥ १२ ॥
वहाँ उन्होंने अपनी बुआ कुन्तीको बड़े वेगसे आती देखा, जो बारंबार उन्हींका नाम लेकर ‘ वासुदेव! दौड़ो - दौड़ो' की पुकार मचा रही थी ॥ १२ ॥
पृष्ठतो द्रौपदीं चैव सुभद्रां च यशस्विनीम् ।
सविक्रोशं सकरुणं बान्धवानां स्त्रियो नृप ॥ १३ ॥
राजन्! उनके पीछे द्रौपदी, यशस्विनी सुभद्रा तथा अन्य बन्धु -बान्धवोंकी स्त्रियाँ भी थीं, जो बड़े करुण स्वरसे बिलख - बिलखकर रो रही थीं ॥ १३ ॥
ततः कृष्णं समासाद्य कुन्तिभोजसुता तदा ।
प्रोवाच राजशार्दूल बाष्पगद्गदया गिरा ॥ १४ ॥
नृपश्रेष्ठ! उस समय श्रीकृष्णके निकट पहुँचकर कुन्तिभोजकुमारी कुन्ती नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई गद्गद वाणीमें बोली- ॥ १४ ॥
वासुदेव महाबाहो सुप्रजा देवकी त्वया ।
त्वं नो गतिः प्रतिष्ठा च त्वदायत्तमिदं कुलम् ॥ १५ ॥
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‘ महाबाहु वसुदेव- नन्दन! तुम्हें पाकर ही तुम्हारी माता देवकी उत्तम पुत्रवाली मानी जाती हैं । तुम्हीं हमारे अवलम्ब और तुम्हीं हमलोगोंके आधार हो । इस कुलकी रक्षा तुम्हारे ही अधीन है ॥ १५ ॥
यदुप्रवीर योऽयं ते स्वस्रीयस्यात्मजः प्रभो ।
अश्वत्थाम्ना हतो जातस्तमुज्जीवय केशव ॥ १६ ॥
‘ यदुवीर! प्रभो! यह जो तुम्हारे भानजे अभिमन्युका बालक है, अश्वत्थामाके अस्त्रसे
मरा हुआ ही उत्पन्न हुआ है । केशव! इसे जीवन-दान दो ॥ १६ ॥
त्वया ह्येतत् प्रतिज्ञातमैषीके यदुनन्दन ।
अहं संजीवयिष्यामि मृतं जातमिति प्रभो ॥ १७ ॥
‘ यदुनन्दन! प्रभो! अश्वत्थामाने जब सींकके बाणका प्रयोग किया था, उस समय तुमने यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं उत्तराके मरे हुए बालकको भी जीवित कर दूँगा ॥ १७ ॥
सोऽयं जातो मृतस्तात पश्यैनं पुरुषर्षभ ।
उत्तरां च सुभद्रां च द्रौपदीं मां च माधव ॥ १८ ॥
'तात! वही यह बालक है, जो मरा हुआ ही पैदा हुआ है । पुरुषोत्तम! इसपर अपनी कृपादृष्टि डालो । माधव! इसे जीवित करके ही उत्तरा, सुभद्रा और द्रौपदीसहित मेरी रक्षा करो ॥ १८ ॥
धर्मपुत्रं च भीमं च फाल्गुनं नकुलं तथा ।
सहदेवं च दुर्धर्ष सर्वान् नस्त्रातुमर्हसि ॥ १ ९ ॥
' दुर्धर्ष वीर! धर्मपुत्र युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी भी रक्षा करो । तुम हम सब लोगोंका इस संकटसे उद्धार करनेयोग्य हो ॥ १ ९ ॥
अस्मिन् प्राणाःसमायत्ताः पाण्डवानां ममैव च ।
पाण्डोश्च पिण्डो दाशार्ह तथैव श्वशुरस्य मे ॥ २० ॥
‘ मेरे और पाण्डवोंके प्राण इस बालकके ही अधीन हैं । दशार्हकुलनन्दन! मेरे पति पाण्डु तथा श्वशुर विचित्रवीर्यके पिण्डका भी यही सहारा है ॥ २० ॥
अभिमन्योश्च भद्रं ते प्रियस्य सदृशस्य च ।
प्रियमुत्पादयाद्य त्वं प्रेतस्यापि जनार्दन ॥ २१ ॥
‘ जनार्दन! तुम्हारा कल्याण हो । जो तुम्हें अत्यन्त प्रिय और तुम्हारे ही समान परम सुन्दर था, उस परलोकवासी अभिमन्युका भी प्रिय करो - उसके इस बालकको जिला दो ॥ २१ ॥
उत्तरा हि पुरोक्तं वै कथयत्यरिसूदन ।
अभिमन्योर्वचः कृष्ण प्रियत्वात् तन्न संशयः ॥ २२ ॥
' शत्रुसूदन श्रीकृष्ण! मेरी बहूरानी उत्तरा अभिमन्युकी पहलेकी कही हुई एक बात अत्यन्त प्रिय होनेके कारण बार- बार दुहराया करती है । उस बातकी यथार्थतामें तनिक भी
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संदेह नहीं है ॥ २२ ॥
अब्रवीत् किल दाशार्ह वैराटीमार्जुनिस्तदा ।
मातुलस्य कुलं भद्रे तव पुत्रो गमिष्यति ॥ २३ ॥
गत्वा वृष्ण्यन्धककुलं धनुर्वेदं ग्रहीष्यति ।
अस्त्राणि च विचित्राणि नीतिशास्त्रं च केवलम् ॥ २४ ॥
‘दाशार्ह! अभिमन्युने उत्तरासे कभी स्नेहवश कहा था -" कल्याणी! तुम्हारा पुत्र मेरे मामाके यहाँ जायगा - वृष्णि एवं अन्धकोंके कुलमें जाकर धनुर्वेद, नाना प्रकारके विचित्र अस्त्र- शस्त्र तथा विशुद्ध नीतिशास्त्रकी शिक्षा प्राप्त करेगा" ॥ २३-२४ ॥
इत्येतत् प्रणयात् तात सौभद्रः परवीरहा ।
कथयामास दुर्धर्षस्तथा चैतन्न संशयः ॥ २५ ॥
‘ तात! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दुर्धर्ष वीर सुभद्राकुमारने जो प्रेमपूर्वक यह बात कही थी, यह निस्संदेह सत्य होनी चाहिये ॥ २५ ॥
तास्त्वां वयं प्रणम्येह याचामो मधुसूदन ।
कुलस्यास्य हितार्थं तं कुरु कल्याणमुत्तमम् ॥ २६ ॥
' मधुसूदन! इस कुलकी भलाईके लिये हम सब लोग तुम्हारे पैरों पड़कर भीख माँगती हैं, इस बालकको जिलाकर तुम कुरुकुलका सर्वोत्तम कल्याण करो ' ॥ २६ ॥
एवमुक्त्वा तु वार्ष्णेयं पृथा पृथुललोचना ।
उच्छ्रित्य बाहू दुःखार्ता ताश्चान्याः प्रापतन् भुवि ॥ २७ ॥
श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर विशाललोचना कुन्ती दोनों बाँहें ऊपर उठाकर दुःखसे आर्त हो
पृथ्वीपर गिर पड़ी । दूसरी स्त्रियोंकी भी यही दशा हुई ॥ २७ ॥
अब्रुवंश्च महाराज सर्वाः सास्राविलेक्षणाः ।
स्वस्त्रीयो वासुदेवस्य मृतो जात इति प्रभो ॥ २८ ॥
समर्थ महाराज! उन सबकी आँखोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी और वे सभी रो-रोकर कह रही थीं कि ‘ हाय! श्रीकृष्णके भानजेका बालक मरा हुआ पैदा हुआ ' ॥ २८ ॥
एवमुक्ते ततः कुन्तीं पर्यगृह्णाज्जनार्दनः ।
भूमौ निपतितां चैनां सान्त्वयामास भारत ॥ २९ ॥
भरतनन्दन! उन सबके ऐसा कहनेपर जनार्दन श्रीकृष्णने कुन्तीदेवीको सहारा देकर बैठाया और पृथ्वीपर पड़ी हुई अपनी बुआको वे सान्त्वना देने लगे ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि परीक्षिज्जन्मकथने षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें परीक्षित्के जन्मका वर्णनविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
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* पहले तो पुत्र-जन्मके समाचारसे सबको अपार हर्ष हुआ; किंतु उनमें जीवनका कोई चिह्न न देख् शोकका समुद्र उमड़ पड़ा ।
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सप्तषष्टितमोऽध्यायः परीक्षित्को जिलानेके लिये सुभद्राकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना वैशम्पायन उवाच
उत्थितायां पृथायां तु सुभद्रा भ्रातरं तदा ।
दृष्ट्वा चुक्रोश दुःखार्ता वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! कुन्तीदेवीके बैठ जानेपर सुभद्रा अपने भाई श्रीकृष्णकी ओर देखकर फूट-फूटकर रोने लगी और दुःखसे आर्त होकर यों बोली - ॥ १ ॥
पुण्डरीकाक्ष पश्य त्वं पौत्रं पार्थस्य धीमतः ।
परिक्षीणेषु कुरुषु परिक्षीणं गतायुषम् ॥ २ ॥
‘ भैया कमलनयन! तुम अपने सखा बुद्धिमान् पार्थके इस पौत्रकी दशा तो देखो । कौरवोंके नष्ट हो जानेपर इसका जन्म हुआ; परंतु यह भी गतायु होकर नष्ट हो गया ॥ २ ॥
का द्रोणपुत्रेण भीमसेनार्थमुद्यता ।
सोत्तरायां निपतिता विजये मयि चैव ह ॥ ३ ॥
‘ द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने भीमसेनको मारनेके लिये जो सींकका बाण उठाया था, वह उत्तरापर, तुम्हारे सखा विजयपर और मुझपर गिरा है ॥ ३ ॥
सेयं विदीर्णे हृदये मयि तिष्ठति केशव ।
यन्न पश्यामि दुर्धर्ष सहपुत्रं तु तं प्रभो ॥ ४ ॥
' दुर्धर्ष वीर केशव! प्रभो! वह सींक मेरे इस विदीर्ण हुए हृदयमें आज भी कसक रही है; क्योंकि इस समय मैं पुत्रसहित अभिमन्युको नहीं देख पाती हूँ ॥ ४ ॥
किं नु वक्ष्यति धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
भीमसेनार्जुनौ चापि माद्रवत्याः सुतौ च तौ ॥ ५ ॥
श्रुत्वाभिमन्योस्तनयं जातं च मृतमेव च ।
मुषिता इव वार्ष्णेय द्रोणपुत्रेण पाण्डवाः ॥ ६ ॥
‘ अभिमन्युका बेटा जन्म लेनेके साथ ही मर गया— इस बातको सुनकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर क्या कहेंगे? भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीकुमार नकुल सहदेव भी क्या सोचेंगे? श्रीकृष्ण! आज द्रोणपुत्रने पाण्डवोंका सर्वस्व लूट लिया ॥ ५-६ ॥
अभिमन्युः प्रियः कृष्ण भ्रातॄणां नात्र संशयः ।
ते श्रुत्वा किं नु वक्ष्यन्ति द्रोणपुत्रास्त्रनिर्जिताः ॥ ७ ॥
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' श्रीकृष्ण! अभिमन्यु पाँचों भाइयोंको अत्यन्त प्रिय था- इसमें संशय नहीं है । उसके पुत्रकी यह दशा सुनकर अश्वत्थामाके अस्त्रसे पराजित हुए पाण्डव क्या कहेंगे? ॥ ७ ॥
भवितातः परं दुःखं किं तदन्यज्जनार्दन ।
अभिमन्योः सुतात् कृष्ण मृताज्जातादरिंदम ॥ ८ ॥
‘ शत्रुसूदन! जनार्दन! श्रीकृष्ण! अभिमन्यु - जैसे वीरका पुत्र मरा हुआ पैदा हो, इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है? ॥ ८ ॥
साहं प्रसादये कृष्ण त्वामद्य शिरसा नता ।
पृथेयं द्रौपदी चैव ताः पश्य पुरुषोत्तम ॥ ९ ॥
' पुरुषोत्तम! श्रीकृष्ण! आज मैं तुम्हारे चरणोंपर मस्तक रखकर तुम्हें प्रसन्न करना चाहती हूँ । बूआ कुन्ती और बहिन द्रौपदी भी तुम्हारे पैरोंपर पड़ी हुई हैं । इन सबकी ओर देखो ॥ ९ ॥
यदा द्रोणसुतो गर्भान् पाण्डूनां हन्ति माधव ।
तदा किल त्वया द्रौणिः क्रुद्धेनोक्तोऽरिमर्दन ॥ १० ॥
' शत्रुमर्दन माधव! जब द्रोणपुत्र अश्वत्थामा पाण्डवोंके गर्भकी भी हत्या करनेका प्रयत्न कर रहा था, उस समय तुमने कुपित होकर उससे कहा था ॥ १० ॥
अकामं त्वां करिष्यामि ब्रह्मबन्धो नराधम ।
अहं संजीवयिष्यामि किरीटितनयात्मजम् ॥ ११ ॥
‘ब्रह्मबन्धो! नराधम! मैं तेरी इच्छा पूर्ण नहीं होने दूँगा । अर्जुनके पौत्रको अपने प्रभावसे जीवित कर दूँगा ॥ ११ ॥
इत्येतद् वचनं श्रुत्वा जानानाहं बलं तव ।
प्रसादये त्वां दुर्धर्ष जीवतामभिमन्युजः ॥ १२ ॥
' भैया! तुम दुर्धर्ष वीर हो । मैं तुम्हारी उस बातको सुनकर तुम्हारे बलको अच्छी तरह जानती हूँ । इसीलिये तुम्हें प्रसन्न करना चाहती हूँ । तुम्हारे कृपा प्रसादसे अभिमन्युका यह पुत्र जीवित हो जाय ॥ १२ ॥
यद्येतत् त्वं प्रतिश्रुत्य न करोषि वचः शुभम् ।
सकलं वृष्णिशार्दूल मृतां मामवधारय ॥ १३ ॥
‘ वृष्णिवंशके सिंह! यदि तुम ऐसी प्रतिज्ञा करके अपने मंगलमय वचनका पूर्णतः पालन नहीं करोगे तो यह समझ लो, सुभद्रा जीवित नहीं रहेगी- मैं अपने प्राण दे दूँगी ॥ १३ ॥
अभिमन्योः सुतो वीर न संजीवति यद्ययम् ।
जीवति त्वयि दुर्धर्ष किं करिष्याम्यहं त्वया ॥ १४ ॥
' दुर्धर्ष वीर! यदि तुम्हारे जीते - जी अभिमन्युके इस बालकको जीवनदान न मिला तो तुम मेरे किस काम आओगे ॥ १४ ॥
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संजीवयैनं दुर्धर्ष मृतं त्वमभिमन्युजम् ।
सदृशाक्षसुतं वीर सस्यं वर्षन्निवाम्बुदः ॥ १५ ॥
‘ अजेय वीर! जैसे बादल पानी बरसाकर सूखी खेतीको भी हरी- भरी कर देता है, उसी प्रकार तुम अपने ही समान नेत्रवाले अभिमन्युके इस मरे हुए पुत्रको जीवित कर दो ॥ १५ ॥
त्वं हि केशव धर्मात्मा सत्यवान् सत्यविक्रमः ।
स तां वाचमृतां कर्तुमर्हसि त्वमरिंदम ॥ १६ ॥
' शत्रुदमन केशव! तुम धर्मात्मा, सत्यवादी और सत्यपराक्रमी हो; अतः तुम्हें अपनी कही हुई बातको सत्य कर दिखाना चाहिये ॥ १६ ॥
इच्छन्नपि हि लोकांस्त्रीन् जीवयेथा मृतानिमान् ।
किं पुनर्दयितं जातं स्वस्रीयस्यात्मजं मृतम् ॥ १७ ॥
'तुम चाहो तो मृत्युके मुखमें पड़े हुए तीनों लोकोंको जिला सकते हो, फिर अपने भानजेके इस प्यारे पुत्रको, जो मर चुका है, जीवित करना तुम्हारे लिये कौन बड़ी बात है ॥ १७ ॥
प्रभावज्ञास्मि ते कृष्ण तस्मात् त्वां याचयाम्यहम् ।
कुरुष्व पाण्डुपुत्राणामिमं परमनुग्रहम् ॥ १८ ॥
' श्रीकृष्ण! मैं तुम्हारे प्रभावको जानती हूँ । इसीलिये तुमसे याचना करती हूँ । इस बालकको जीवनदान देकर तुम पाण्डवोंपर यह महान् अनुग्रह करो ॥ १८ ॥
स्वसेति वा महाबाहो हतपुत्रेति वा पुनः ।
प्रपन्ना मामियं चेति दयां कर्तुमिहार्हसि ॥ १ ९ ॥
' महाबाहो! तुम यह समझकर कि यह मेरी बहिन है अथवा जिसका बेटा मारा गया है, वह दुखिया है अथवा शरणमें आयी हुई एक दयनीय अबला है, मुझपर दया करने योग्य हो ' ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सुभद्रावाक्ये सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सुभद्राका वचनविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥