श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 2231–2240
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2231–2240
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सर्वं च शूद्रसंस्पृष्टमपवित्रं न संशयः ॥ भरतनन्दन! मैंने जो विद्याके चौदह पवित्र स्थान पूर्णतया बताये हैं, वे तीनों लोकोंके कल्याणके लिये प्रकट हुए हैं। अतः शूद्रको इनका स्पर्श नहीं करना चाहिये । युधिष्ठिर! शूद्रके सम्पर्कमें आनेवाली सभी वस्तुएँ अपवित्र हो जाती हैं, इसमें संशय नहीं है ॥
लोके त्रीण्यपवित्राणि पञ्चामेध्यानि भारत ।
श्वा च शूद्रःश्वपाकश्च अपवित्राणि पाण्डव ॥
भारत! इस संसारमें तीन अपवित्र और पाँच अमेध्य हैं । पाण्डुनन्दन! कुत्ता, शूद्र और श्वपाक ( चाण्डाल) – ये तीन अपवित्र होते हैं ॥ गायकः कुक्कुटो यूपो ह्युदक्या वृषलीपतिः ।
पञ्चैते स्युरमेध्याश्च स्प्रष्टव्या न कदाचन ।
स्पृष्ट्वैतानष्ट वै विप्रः सचैलो जलमाविशेत् ॥
तथा अश्लील गायक, मुर्गा, जिसमें वध करनेके लिये पशुओंको बाँधा जाय वह खम्भा, रजस्वला स्त्री और वृषल जातिकी स्त्रीसे ब्याह करनेवाला द्विज - ये पाँच अमेध्य माने गये हैं; इनका कभी भी स्पर्श नहीं करना चाहिये । यदि ब्राह्मण इन आठोंमेंसे किसीका स्पर्श कर ले तो वस्त्रसहित जलमें प्रवेश करके स्नान करे ॥
मद्भक्तान् शूद्रसामान्यादवमन्यन्ति ये नराः ।
नरकेष्वेव तिष्ठन्ति वर्षकोटिं नराधमाः ॥
जो मनुष्य मेरे भक्तोंका शुद्र जातिमें जन्म होनेके कारण अपमान करते हैं, वे नराधम करोड़ों वर्षतक नरकोंमें निवास करते हैं ॥
चण्डालमपि मद्भक्तं नावमन्येत बुद्धिमान् ।
अवमानात् पतन्त्येव नरके रौरवे नराः ॥
अतः चाण्डाल भी यदि मेरा भक्त हो तो बुद्धिमान् पुरुषको उसका अपमान नहीं करना चाहिये । अपमान करनेसे मनुष्यको रौरव नरकमें गिरना पड़ता है ॥
मम भक्तस्य भक्तेषु प्रीतिरभ्यधिका मम ।
तस्मान्मद्भक्तभक्ताश्च पूजनीया विशेषतः ॥
जो मनुष्य मेरे भक्तोंके भक्त होते हैं, उनपर मेरा विशेष प्रेम होता है, इसलिये मेरे भक्तके भक्तोंका विशेष सत्कार करना चाहिये ॥
कीटपक्षिमृगाणां च मयि संन्यस्यचेतसाम् ।
ऊर्ध्वामेव गतिं विद्धि किं पुनर्ज्ञानिनां नृणाम् ॥
मुझमें चित्त लगानेपर कीड़े, पक्षी और पशु भी ऊर्ध्वगतिको ही प्राप्त होते हैं, फिर ज्ञानी मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ॥
पत्रं वाप्यथवा पुष्पं फलं वाप्यप एव वा ।
ददाति मम शूद्रो यच्छिरसा धारयामि तत् ॥
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मेरा भक्त शूद्र भी यदि पत्र, पुष्प, फल अथवा जल ही अर्पण करे तो मैं उसे सिरपर धारण करता हूँ ॥
वेदोक्तेनैव मार्गेण सर्वभूतहृदि स्थितम् ।
मामर्चयन्ति ये विप्रा मत्सायुज्यं व्रजन्ति ते ॥
जो ब्राह्मण सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें विराजमान मुझ परमेश्वरका वेदोक्त रीतिसे पूजन करते हैं, वे मेरे सायुज्यको प्राप्त होते हैं ॥
मद्भक्तानां हितायैव प्रादुर्भावः कृतो मया ।
प्रादुर्भावकृता काचिदर्चनीया युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! मैं अपने भक्तोंका हित करनेके लिये ही अवतार धारण करता हूँ; अतः मेरे प्रत्येक अवतार- विग्रहका पूजन करना चाहिये ॥
आसामन्यतमां मूर्तिं यो मद्भक्त्या समर्चति ।
तेनैव परितुष्टोऽहं भविष्यामि न संशयः ॥
जो मनुष्य मेरे अवतार- विग्रहोंमेंसे किसी एककी भी भक्तिभावसे आराधना करता है, उसके ऊपर मैं निःसंदेह प्रसन्न होता हूँ ॥ मृदा च मणिरत्नैश्च ताम्रेण रजतेन च ।
कृत्वा प्रतिकृतिं कुर्यादर्चनां काञ्चनेन वा ।
पुण्यं दशगुणं विद्यादेतेषामुत्तरोत्तरम् ॥
मिट्टी, ताँबा, चाँदी, स्वर्ण अथवा मणि एवं रत्नोंकी मेरी प्रतिमा बनवाकर उसकी पूजा करनी चाहिये । इनमें उत्तरोत्तर मूर्तियोंकी पूजासे दसगुना अधिक पुण्य समझना चाहिये ॥ जयकामो भवेद् राजा विद्याकामो द्विजोत्तमः ।
वैश्यो वा धनकामस्तु शूद्रः सुखफलप्रियः ।
सर्वकामाः स्त्रियो वापि सर्वान् कामानवाप्नुयुः ॥
यदि ब्राह्मणको विद्याकी, क्षत्रियको युद्धमें विजयकी, वैश्यको धनकी, शूद्रको सुखरूप फलकी तथा स्त्रियोंको सब प्रकारकी कामना हो तो ये सब मेरी आराधनासे अपने सभी मनोरथोंको प्राप्त कर सकते हैं ॥ युधिष्ठिरउवाच
कीदृशानां तु शूद्राणां नानुगृह्णासि चार्चनम् ।
उद्वेगस्तव कस्माद्धि तन्मे ब्रूहि सुरेश्वर ॥
युधिष्ठिरने पूछा — देवेश्वर! आप किस तरहके शूद्रोंकी पूजा नहीं स्वीकार करते तथा आपको कौन - सा कार्य बुरा लगता है? यह मुझे बतलाइये ॥ श्रीभगवानुवाच अव्रतेनाप्यभक्तेन स्पृष्टां शूद्रेण चार्चनाम् ।
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तां वर्जयामि राजेन्द्र श्वपाकविहितामिव ॥ श्रीभगवान्ने कहा — राजन्! जो व्रतका पालन न करनेवाला और मेरा भक्त नहीं है, उस शूद्रकी स्पर्श की हुई पूजाको मैं कुत्ता पकानेवाले चाण्डालकी की हुई समझकर त्याग देता हूँ ॥
नन्वहं शङ्करश्चापि गावो विप्रास्तथैव च ।
अश्वत्थोऽमररूपं हि त्रयमेतद् युधिष्ठिर ॥
एतत्त्रयं हि मद्भक्तो नावमन्येत कर्हिचित् । युधिष्ठिर! गौ, ब्राह्मण और पीपलका वृक्ष – ये तीनों देवरूप हैं । इन्हें मेरा और भगवान् शंकरका स्वरूप समझना चाहिये । मेरे भक्त पुरुषको उचित है कि वह इन तीनोंका कभी अपमान न करे ॥
अश्वत्थो ब्राह्मणा गावो मन्मयास्तारयन्ति हि ।
तस्मादेतत् प्रयत्नेन त्रयं पूजय पाण्डव ॥
पाण्डुनन्दन! मेरे स्वरूप होनेके कारण पीपल, ब्राह्मण और गौ – ये तीनों मनुष्यका उद्धार करनेवाले हैं, इसलिये तुम यत्नपूर्वक इन तीनोंकी पूजा किया करो ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )
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[ भगवान्के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन ] युधिष्ठिर उवाच
देशान्तरगते विप्रे संयुक्ते कालधर्मणा ।
शरीरनाशे सम्प्राप्ते कथं प्रेतत्वकल्पना ॥
युधिष्ठिरने पूछा – भगवन्! यदि कोई ब्राह्मण परदेश गया हो और वहीं कालकी प्रेरणासे उसका शरीर नष्ट हो जाय तो उसकी प्रेतक्रिया ( अन्त्येष्टि- संस्कार ) किस प्रकार सम्भव है? ॥ श्रीभगवानुवाच
श्रूयतामाहिताग्नेस्तु तथाभूतस्य संस्क्रिया ।
पालाशवृन्दैः प्रतिमा कर्तव्या कल्पचोदिता ॥
श्रीभगवान्ने कहा- राजन्! यदि किसी अग्निहोत्री ब्राह्मणकी इस प्रकार मृत्यु हो जाय तो उसका संस्कार करनेके लिये प्रेतकल्पमें बताये अनुसार उसकी काष्ठमयी प्रतिमा बनवानी चाहिये । वह काष्ठ पलाशका ही होना उचित है ॥
त्रीणि षष्टिशतान्याहुरस्थीन्यस्य युधिष्ठिर ।
तेषां विकल्पना कार्या यथाशास्त्रं विनिश्चितम् ॥
युधिष्ठिर! मनुष्यके शरीरमें तीन सौ साठ हड्डियाँ बतायी गयी हैं । उन सबकी शास्त्रोक्त रीतिसे कल्पना करके उस प्रतिमाका दाह करना चाहिये ॥ युधिष्ठिर उवाच
विशेषतीर्थं सर्वेषामशक्तानामनुग्रहात् ।
भक्तानां तारणार्थं तु वक्तुमर्हसि धर्मतः ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! जो भक्त तीर्थयात्रा करनेमें असमर्थ हों, उन सबको तारनेके लिये कृपया किसी विशेष तीर्थका धर्मानुसार वर्णन कीजिये ॥ श्रीभगवानुवाच
पावनं सर्वतीर्थानां सत्यं गायन्ति सामगाः ।
सत्यस्य वचनं तीर्थमहिंसा तीर्थमुच्यते ॥
श्रीभगवान्ने कहा — राजन्! सामवेदका गायन करनेवाले विद्वान् कहते हैं कि सत्य सब तीर्थोंको पवित्र करनेवाला है । सत्य बोलना और किसी जीवकी हिंसा न करना — ये तीर्थ कहलाते हैं ॥
तपस्तीर्थं दया तीर्थं शीलं तीर्थं युधिष्ठिर ।
अल्पसंतोषकं तीर्थं नारी तीर्थं पतिव्रता ॥
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युधिष्ठिर! तप, दया, शील, थोड़ेमें संतोष करना - ये सद्गुण भी तीर्थरूपमें ही हैं तथा पतिव्रता नारी भी तीर्थ है ॥
संतुष्टो ब्राह्मणस्तीर्थं ज्ञानं वा तीर्थमुच्यते ।
मद्भक्ताः सततं तीर्थं शङ्करस्य विशेषतः ॥
संतोषी ब्राह्मण और ज्ञानको भी तीर्थ कहते हैं । मेरे भक्त सदैव तीर्थरूप हैं और शंकरके भक्त विशेषतया तीर्थ हैं ॥ यतयस्तीर्थमित्येवं विद्वांसस्तीर्थमुच्यते शरण्यपुरुषस्तीर्थमभयं तीर्थमुच्यते ॥ संन्यासी और विद्वान् भी तीर्थ कहे जाते हैं । दूसरोंको शरण देनेवाले पुरुष भी तीर्थ हैं । जीवोंको अभय दान देना भी तीर्थ ही कहलाता है ॥
त्रैलोक्येऽस्मिन् निरुद्विग्नो न बिभेमि कुतश्चन ।
न दिवा यदि वा रात्रावुद्वेगः शूद्रलङ्घनात् ॥
मैं तीनों लोकोंमें उद्वेगशून्य हूँ। दिन हो या रात, मुझे कभी किसीसे भी भय नहीं होता; किंतु शूद्रका मर्यादा - भंग करना मुझे बुरा लगता है ॥
न भयं देवदैत्येभ्यो रक्षोभ्यश्चैव मे नृप ।
शूद्रवक्त्राच्च्युतं ब्रह्म भयं तु मम सर्वदा ॥
राजन्! देवता, दैत्य और राक्षसोंसे भी मैं नहीं डरता । परंतु शूद्रके मुखसे जो वेदका उच्चारण होता है, उससे मुझे सदा ही भय बना रहता है ॥
तस्मात् सप्रणवं शूद्रो मन्नामापि न कीर्तयेत् ।
प्रणवं हि परं लोके ब्रह्म ब्रह्मविदो विदुः ॥
इसलिये शूद्रको मेरे नामका भी प्रणवके साथ उच्चारण नहीं करना चाहिये, क्योंकि वेदवेत्ता विद्वान् इस संसारमें प्रणवको सर्वोत्कृष्ट वेद मानते हैं ॥ द्विजशुश्रूषणं धर्मः शूद्राणां भक्तितो मयि । शूद्र मुझमें भक्ति रखते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवा करे – यही उनका परम धर्म है ॥
द्विजशुश्रूषया शूद्रः परं श्रेयोऽधिगच्छति ।
द्विजशुश्रूषणादन्यन्नास्ति शूद्रस्य निष्कृतिः ॥
द्विजोंकी सेवासे ही शूद्र परम कल्याणके भागी होते हैं । इसके सिवा उनके उद्धारका दूसरा कोई उपाय नहीं है ॥ सृष्ट्वा पितामहः शूद्रमभिभूतं तु तामसैः ।
द्विजशुश्रूषणं धर्मं शूद्राणां तु प्रयुक्तवान् ।
नश्यन्ति तामसा भावाः शूद्रस्य द्विजभक्तितः ॥
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ब्रह्माजीने शूद्रोंको तामस गुणोंसे युक्त उत्पन्न करके उनके लिये द्विजोंकी सेवारूप धर्मका उपदेश किया । द्विजोंकी भक्तिसे शूद्रके तामस भाव नष्ट हो जाते हैं ॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतं मूर्ध्ना गृह्णामि शूद्रतः ॥
शूद्र भी यदि भक्तिपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल अथवा जल अर्पण करता है तो मैं उसके भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहारको सादर शीश चढ़ाता हूँ ॥
अग्रजो वापि यः कश्चित् सर्वपापसमन्वितः ।
यदि मां सततं ध्यायेत् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
सम्पूर्ण पापोंसे युक्त होनेपर भी यदि कोई ब्राह्मण सदा मेरा ध्यान करता रहता है तो वह अपने सम्पूर्ण पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥
विद्याविनयसम्पन्ना ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
मयि भक्तिं न कुर्वन्ति चाण्डालसदृशा हि ते ॥
विद्या और विनयसे सम्पन्न तथा वेदोंके पारंगत विद्वान् होनेपर भी जो ब्राह्मण मुझमें भक्ति नहीं करते, वे चाण्डालके समान हैं ॥
वृथा दानं वृथा तप्तं वृथा चेष्टं वृथा हुतम् ।
वृथाऽऽतिभ्यं च तत् तस्य यो न भक्तो मम द्विजः ॥
जो द्विज मेरा भक्त नहीं है, उसके दान, तप, यज्ञ, होम और अतिथि - सत्कार — ये सब व्यर्थ हैं ॥
स्थावरे जङ्गमे वापि सर्वभूतेषु पाण्डव ।
समत्वेन यदा कुर्यान्मद्भक्तो मित्रशत्रुषु ॥
पाण्डुनन्दन! जब मनुष्य समस्त स्थावर- जंगम प्राणियोंमें एवं मित्र और शत्रुमें समान दृष्टि कर लेता है, उस समय वह मेरा सच्चा भक्त होता है ॥
आनृशंस्यमहिंसा च यथा सत्यं तथाऽऽर्जवम् ।
अद्रोहश्चैव भूतानां मद्गतानां व्रतं नृप ॥
राजन्! क्रूरताका अभाव, अहिंसा, सत्य, सरलता तथा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना -यह मेरे भक्तोंका व्रत है ॥
नम इत्येव यो ब्रूयान्मद्भक्तं श्रद्धयान्वितः ।
तस्याक्षयाऽभवँल्लोकाःश्वपाकस्यापि पार्थिव ॥
पृथ्वीनाथ! जो मनुष्य मेरे भक्तको श्रद्धापूर्वक नमस्कार करता है, वह चाण्डाल ही क्यों न हो, उसे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥
किं पुनर्ये यजन्ते मां सदारं विधिपूर्वकम् ।
मद्भक्ता मद्गतप्राणाः कथयन्तश्च मां सदा ॥
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फिर जो साक्षात् मेरे भक्त हैं, जिनके प्राण मुझमें ही लगे रहते हैं तथा जो सदा मेरे ही नाम और गुणोंका कीर्तन करते रहते हैं, वे यदि लक्ष्मीसहित मेरी विधिवत् पूजा करते हैं तो उनकी सद्गतिके विषयमें क्या कहना है? ॥
बहुवर्षसहस्राणि तपस्तपति यो नरः ।
नासौ पदमवाप्नोति मद्भक्तैर्यदवाप्यते ॥
अनेकों हजार वर्षोंतक तपस्या करनेवाला मनुष्य भी उस पदको प्राप्त नहीं होता, जो मेरे भक्तोंको अनायास ही मिल जाता है ॥
मामेव तस्माद् राजेन्द्र ध्यायन् नित्यमतन्द्रितः ।
अवाप्स्यसि ततः सिद्धिं द्रक्ष्यत्येव परं पदम् ॥
इसलिये राजेन्द्र! तुम सदा सजग रहकर निरन्तर मेरा ही ध्यान करते रहो, इससे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी और तुम निश्चय ही परम पदका साक्षात्कार कर सकोगे ॥
ऋग्वेदेनैव होता च यजुषाध्वर्युरेव च ।
सामवेदेन चोद्गाता पुण्येनाभिष्टुवन्ति माम् ॥
अथर्वशिरसा चैव नित्यमाथर्वणा द्विजाः ।
स्तुवन्ति सततं ये मां ते वै भागवताः स्मृताः ॥
जो होता बनकर ऋग्वेदके द्वारा, अध्वर्यु होकर यजुर्वेदके द्वारा, उद्गाता बनकर परम पवित्र सामवेदके द्वारा मेरा स्तवन करते हैं तथा अथर्ववेदीय द्विजोंके रूपमें जो अथर्ववेदके द्वारा हमेशा मेरी स्तुति किया करते हैं, वे भगवद्भक्त माने गये हैं ॥
वेदाधीनाः सदा यज्ञा यज्ञाधीनास्तु देवताः ।
देवताः ब्राह्मणाधीनास्तस्माद् विप्रास्तु देवताः ॥
यज्ञ सदा वेदोंके अधीन हैं और देवता यज्ञों तथा ब्राह्मणोंके अधीन होते हैं, इसलिये ब्राह्मण देवता हैं ॥
अनाश्रित्योच्छ्रयं नास्ति मुख्यमाश्रयमाश्रयेत् ।
रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ॥
किसीका सहारा लिये बिना कोई ऊँचे नहीं चढ़ सकता, अतः सबको किसी प्रधान आश्रयका सहारा लेना चाहिये । देवतालोग भगवान् रुद्रके आश्रयमें रहते हैं, रुद्र ब्रह्माजीके आश्रित हैं ॥
ब्रह्मा मामाश्रितो राजन् नाहं कंचिदुपाश्रितः ।
ममाश्रयो न कश्चित् तु सर्वेषामाश्रयो ह्यहम् ॥
ब्रह्माजी मेरे आश्रयमें रहते हैं, किंतु मैं किसीके आश्रित नहीं हूँ । राजन्! मेरा आश्रय
कोई नहीं है । मैं ही सबका आश्रय हूँ ॥
एवमेतन्मया प्रोक्तं रहस्यमिदमुत्तमम् ।
धर्मप्रियस्य ते नित्यं राजन्नेवं समाचर ॥
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राजन्! इस प्रकार ये उत्तम रहस्यकी बातें मैंने तुम्हें बतायी हैं, क्योंकि तुम धर्मके प्रेमी हो । अब तुम इस उपदेशके ही अनुसार सदा आचरण करो ॥
इदं पवित्रमाख्यानं पुण्यं वेदेन सम्मितम् ।
यः पठेन्मामकं धर्ममहन्यहनि पाण्डव ॥
धर्मोऽपि वर्धते तस्य बुद्धिश्चापि प्रसीदति ।
पापक्षयमुपेत्यैवं कल्याणं च विवर्धते ॥
यह पवित्र आख्यान पुण्यदायक एवं वेदके समान मान्य है । पाण्डुनन्दन! जो मेरे बताये हुए इस वैष्णव- धर्मका प्रतिदिन पाठ करेगा, उसके धर्मकी वृद्धि होगी और बुद्धि निर्मल । साथ ही उसके समस्त पापोंका नाश होकर परम कल्याणका विस्तार होगा ॥
एतत् पुण्यं पवित्रं च पापनाशनमुत्तमम् ।
श्रोतव्यं श्रद्धया युक्तैः श्रोत्रियैश्च विशेषतः ॥
यह प्रसंग परम पवित्र, पुण्यदायक, पापनाशक और अत्यन्त उत्कृष्ट है । सभी मनुष्योंको, विशेषतः श्रोत्रिय विद्वानोंको श्रद्धाके साथ इसका श्रवण करना चाहिये ॥
श्रावयेद् यस्त्विदं भक्त्या प्रयतोऽथ शृणोति वा ।
स गच्छेन्मम सायुज्यं नात्र कार्या विचारणा ॥
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसे सुनाता और पवित्रचित्त होकर सुनता है, वह मेरे सायुज्यको प्राप्त होता है, इसमें कोई शंका नहीं है ॥
यश्चेमं श्रावयेच्छ्राद्धे मद्भक्तो मत्परायणः ।
पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदाभूतसम्प्लवम् ॥
मेरी भक्तिमें तत्पर रहनेवाला जो भक्त पुरुष श्राद्धमें इस धर्मको सुनाता है, उसके पितर इस ब्रह्माण्डके प्रलय होनेतक सदा तृप्त बने रहते हैं ॥ वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा भागवतान् धर्मान् साक्षाद् विष्णोर्जगद्गुरोः ।
प्रहृष्टमनसो भूत्वा चिन्तयन्तोऽद्भुताः कथाः ॥
ऋषयः पाण्डवाश्चैव प्रणेमुस्तं जनार्दनम् ।
पूजयामास गोविन्दं धर्मपुत्रः पुनः पुनः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! साक्षात् विष्णुस्वरूप जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे भागवत- धर्मोंका श्रवण करके इस अद्भुत प्रसंगपर विचार करते हुए ऋषि और पाण्डवलोग बहुत प्रसन्न हुए और सबने भगवान्को प्रणाम किया । धर्मनन्दन युधिष्ठिरने तो बारंबार गोविन्दका पूजन किया ॥
देवा ब्रह्मर्षयः सिद्धा गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।
ऋषयश्च महात्मानो गुह्यका भुजगास्तथा ॥
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बालखिल्या महात्मानो योगिनस्तत्त्वदर्शिनः ।
तथा भगवताश्चापि पञ्चकालमुपासकाः ॥
कौतूहलसमायुक्ता भगवद्भक्तिमागताः ।
श्रुत्वा तु परमं पुण्यं वैष्णवं धर्मशासनम् ॥
विमुक्तपापाः पूतास्ते संवृत्तास्तत्क्षणेन तु । देवता, ब्रह्मर्षि, सिद्ध, गन्धर्व, अप्सराएँ, ऋषि, महात्मा, गुह्यक, सर्प, महात्मा बालखिल्य, तत्त्वदर्शी योगी तथा पञ्चयाम उपासना करनेवाले भगवद्भक्त पुरुष, जो अत्यन्त उत्कण्ठित होकर उपदेश सुननेके लिये पधारे थे, इस परम पवित्र वैष्णव - धर्मका
उपदेश सुनकर तत्क्षण निष्पाप एवं पवित्र हो गये । सबमें भगवद्भक्ति उमड़ आयी ॥
प्रणम्य शिरसा विष्णुं प्रतिनन्द्य च ताः कथाः ॥
फिर उन सबने भगवान्के चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और उनके उपदेशकी प्रशंसा की ॥ द्रष्टारो द्वारकायां वै वयं सर्वे जगद्गुरुम् ।
इति प्रहृष्टमनसो ययुर्देवगणैः सह ।
सर्वे ऋषिगणा राजन् ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ॥
फिर ‘ भगवन्! अब हम द्वारकामें पुनः आप जगद्गुरुका दर्शन करेंगे । ' यों कहकर सब ऋषि प्रसन्नचित्त हो देवताओंके साथ अपने - अपने स्थानको चले गये ॥ गतेषु तेषु सर्वेषु केशवः केशिहा हरिः ।
सस्मार दारुकं राजन् स च सात्यकिना सह ।
समीपस्थोऽभवत् सूतो याहि देवेति चाब्रवीत् ॥
राजन्! उन सबके चले जानेपर केशिनिषूदन भगवान् श्रीकृष्णने सात्यकिसहित दारुकको याद किया । सारथि दारुक पास ही बैठा था, उसने निवेदन किया — ‘ भगवन्! रथ तैयार है, पधारिये ॥ ' ततो विषण्णवदनाः पाण्डवाः पुरुषोत्तमम् ।
अञ्चलिं मूर्ध्नि संधाय नेत्रैरश्रुपरिप्लुतैः ।
पिबन्तः सततं कृष्णां नोचुरार्ततरास्तदा ॥
यह सुनकर पाण्डवोंका मुँह उदास हो गया । उन्होंने हाथ जोड़कर सिरसे लगाया और वे आँसूभरे नेत्रोंसे पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी ओर एकटक देखने लगे, किंतु अत्यन्त दुखी होनेके कारण उस समय कुछ बोल न सके ॥
कृष्णोऽपि भगवान् देवः पृथामामन्त्र्य चार्तवत् ।
धृतराष्ट्रं च गान्धारीं विदुरं द्रौपदीं तथा ॥
कृष्णद्वैपायनं व्यासमृषीनन्यांश्च मन्त्रिणः । सुभद्रामात्मजयुतामुत्तरां स्पृश्य पाणिना ।
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निर्गत्य वेश्मनस्तस्मादारुरोह तदा रथम् ॥ देवेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण भी उनकी दशा देखकर दुखी- से हो गये और उन्होंने कुन्ती, धृतराष्ट्र, गान्धारी, विदुर, द्रौपदी, महर्षि व्यास और अन्यान्य ऋषियों एवं मन्त्रियोंसे बिदा लेकर सुभद्रा तथा पुत्रसहित उत्तराकी पीठपर हाथ फेरा और आशीर्वाद देकर वे उस राजभवन से बाहर निकल आये और रथपर सवार हो गये ॥
वाजिभिः शैब्यसुग्रीवमेघपुष्पबलाहकैः ।
युक्तं तु ध्वजभूतेन पतगेन्द्रेण धीमता ॥
उस रथमें शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामवाले चार घोड़े जुते हुए थे तथा बुद्धिमान् गरुड़का ध्वज फहरा रहा था ॥ अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः ।
अपास्य चाशु यन्तारं दारुकं सूतसत्तमम् ।
अभीषून् प्रतिजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा ॥
उस समय कुरुदेशके राजा युधिष्ठिर भी प्रेमवश भगवान्के पीछे - पीछे स्वयं भी रथपर जा बैठे और तुरंत ही श्रेष्ठ दारुकको सारथिके स्थानसे हटाकर उन्होंने घोड़ोंकी बागडोर अपने हाथमें ले ली ॥
उपारुह्यार्जुनश्चापि चामरव्यजनं शुभम् ।
रुक्मदण्डं बृहन्मूर्ध्नि दुधावाभिप्रदक्षिणम् ॥
फिर अर्जुन भी रथपर आरूढ़ हो स्वर्णदण्डयुक्त विशाल चँवर हाथमें लेकर दाहिनी ओरसे भगवान्के मस्तकपर हवा करने लगे ॥
तथैव भीमसेनोऽपि रथमारुह्य वीर्यवान् ।
छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम् ॥
इसी प्रकार महाबली भीमसेन भी रथपर जा चढ़े और भगवान्के ऊपर छत्र लगाये खड़े हो गये । वह छत्र सौ कमानियोंसे युक्त तथा दिव्य मालाओंसे सुशोभित था ॥