श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 2241–2250

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2241–2250

पृष्ठ 2241

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वैदूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम् ।

दधार तरसा भीमश्छत्रं तच्छार्ङ्गधन्वनः ॥

उसका डंडा वैदूर्यमणिका बना हुआ था तथा सोनेकी झालरें उसकी शोभा बढ़ा रही थीं । भीमसेनने शार्ङ्गधनुषधारी श्रीकृष्णके उस छत्रको शीघ्र ही धारण कर लिया ॥

उपारुह्य रथं शीघ्रं चामरव्यजने सिते ।

नकुलः सहदेवश्च धूयमानौ जनार्दनम् ॥

नकुल और सहदेव भी अपने हाथोंमें सफेद चँवर लिये शीघ्र रथपर सवार हो गये और भगवान् जनार्दनके ऊपर डुलाने लगे ॥

भीमसेनोऽर्जुनश्चैव यमावप्यरिसूदनौ ।

पृष्ठतोऽनुययुः कृष्णं मा शब्द इति हर्षिताः ॥

इस प्रकार युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवने हर्षपूर्वक श्रीकृष्णका अनुसरण किया और कहने लगे- ' आप मत जाइये ' ॥

त्रियोजने व्यतीते तु परिष्वज्य च पाण्डवान् ।

विसृज्य कृष्णस्तान् सर्वान् प्रणतान् द्वारकां ययौ ॥

तीन योजन ( चौबीस मील) तक चले आनेके बाद भगवान् श्रीकृष्णने अपने चरणोंमें पड़े हुए पाण्डवोंको गलेसे लगाकर विदा किया और स्वयं द्वारकाको चले गये ॥

पृष्ठ 2242

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तथा प्रणम्य गोविन्दं तदाप्रभृति पाण्डवाः ।

कपिलाद्यानि दानानि ददुर्धर्मपरायणाः ॥

इस प्रकार भगवान् गोविन्दको प्रणाम करके जब पाण्डव घर लौटे, उस दिनसे सदा धर्ममें तत्पर रहकर कपिला आदि गौओंका दान करने लगे ॥

मधुसूदनवाक्यानि स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः ।

मनसा पूजायामासुर्हृदयस्थानि पाण्डवाः ॥

वे सब पाण्डव भगवान् श्रीकृष्णके वचनोंको बारंबार याद करके और उनको हृदयमें धारण करके मन- ही - मन उनकी सराहना करते थे ॥

युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा हृदि कृत्वा जनार्दनम् ।

तद्भक्तस्तन्मना युक्तस्तद्याजी तत्परोऽभवत् ॥

धर्मात्मा युधिष्ठिर ध्यानद्वारा भगवान्‌को अपने हृदयमें विराजमान करके उन्हींके भजनमें लग गये, उन्हींका स्मरण करने लगे और योगयुक्त होकर भगवान्का यजन करते हुए उन्हींके परायण हो गये ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि नकुलोपाख्याने द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ २ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें नकुलोपाख्यानविषयक बानबेवाँअध्याय पूराहुआ ॥ ९२ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२२० श्लोक मिलाकर कुल १२७३ श्लोक हैं ) ॥ आश्वमेधिकपर्व सम्पूर्णम् ॥ अनुष्टुप् ( अन्य बड़े छन्दOFF ) FULL बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके कुल योग अनुष्टुप् मानकर गिननेपर उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये १६८ । २ ९ १५ ॥।* २७४७ ॥ ( १२२ ॥ ) दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये २८ ॥ १२ ९ ३ ॥।- ( ) १२६५ २१ आश्वमेधिकपर्वकी कुल श्लोकसंख्या- ४२० ९ ॥।- OF FUTE

पृष्ठ 2243

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ श्रीमहाभारतम् आश्रमवासिकपर्व आश्रमवासपर्व प्रथमोऽध्यायः भाइयोंसहित युधिष्ठर तथा कुन्ती आदि देवियोंके द्वार धृतराष्ट्र और गान्धारीकी सेवा

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥

अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, ( उनके नित्य सखा ) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली ) भगवती सरस्वती और (उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले ) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय ( महाभारत) का पाठ करना चाहिये ॥ जनमेजय उवाच

प्राप्य राज्यं महात्मानः पाण्डवा मे पितामहाः ।

कथमासन् महाराज्ञि धृतराष्ट्रे महात्मनि ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा —ब्रह्मन्! मेरे प्रपितामह महात्मा पाण्डव अपने राज्यपर अधिकार प्राप्त कर लेनेके बाद महाराज धृतराष्ट्रके प्रति कैसा बर्ताव करते थे? ॥ १ ॥

स तु राजा हतामात्यो हतपुत्रो निराश्रयः ।

कथमासीद्धतैश्वर्यो गान्धारी च यशस्विनी ॥ २ ॥

राजा धृतराष्ट्र अपने मन्त्री और पुत्रोंके मारे जानेसे निराश्रय हो गये थे । उनका ऐश्वर्य नष्ट हो गया था । ऐसी अवस्थामें वे और यशस्विनी गान्धारी देवी किस प्रकार जीवन व्यतीत करते थे ॥ २ ॥

कियन्तं चैव कालं ते मम पूर्वपितामहाः ।

पृष्ठ 2244

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स्थिता राज्ये महात्मानस्तन्ये व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥

मेरे पूर्वपितामह महात्मा पाण्डव कितने समयतक अपने राज्यपर प्रतिष्ठित रहे? ये सब बातें मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

प्राप्य राज्यं महात्मानः पाण्डवा हतशत्रवः ।

धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य पृथिवीं पर्यपालयन् ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! जिनके शत्रु मारे गये थे, वे महात्मा पाण्डव राज्य पानेके अनन्तर राजा धृतराष्ट्रको ही आगे रखकर पृथ्वीका पालन करने लगे ॥ ४ ॥

धृतराष्ट्रमुपातिष्ठद् विदुरः संजयस्तथा ।

वैश्यापुत्रश्च मेधावी युयुत्सुः कुरुसत्तम ॥ ५ ॥

कुरुश्रेष्ठ! विदुर, संजय तथा वैश्यापुत्र मेधावी युयुत्सु — ये लोग सदा धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित रहते थे ॥ ५ ॥

पाण्डवाः सर्वकार्याणि सम्पृच्छन्ति स्म तं नृपम् ।

चक्रुस्तेनाभ्यनुज्ञाता वर्षाणि दश पञ्च च ॥ ६ ॥

पाण्डवलोग सभी कार्योंमें राजा धृतराष्ट्रकी सलाह पूछा करते थे और उनकी आज्ञा लेकर प्रत्येक कार्य करते थे । इस तरह उन्होंने पंद्रह वर्षोंतक राज्यका शासन किया ॥ ६ ॥

सदा हि गत्वा ते वीराः पर्युपासन्त तं नृपम् ।

पादाभिवादनं कृत्वा धर्मराजमते स्थिताः ॥ ७ ॥

वीर पाण्डव प्रतिदिन राजा धृतराष्ट्रके पास जा उनके चरणोंमें प्रणाम करके कुछ कालतक उनकी सेवामें बैठे रहते थे और सदा धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञाके अधीन रहते थे ॥ ७ ॥

ते मूर्ध्नि समुपाघ्राताः सर्वकार्याणि चक्रिरे ।

कुन्तिभोजसुता चैव गान्धारीमन्ववर्तत ॥ ८ ॥

धृतराष्ट्र भी स्नेहवश पाण्डवोंका मस्तक सूँघकर जब उन्हें जानेकी आज्ञा देते, तब वे आकर सब कार्य किया करते थे । कुन्तीदेवी भी सदा गान्धारीकी सेवामें लगी रहती थीं ॥ ८ ॥

द्रौपदी च सुभद्रा च याश्चान्याः पाण्डवस्त्रियः ।

समां वृत्तिमवर्तन्त तयोः श्वश्र्वोर्यथाविधि ॥ ९ ॥

द्रौपदी, सुभद्रा तथा पाण्डवोंकी अन्य स्त्रियाँ भी कुन्ती और गान्धारी दोनों सासुओंकी समान भावसे विधिवत् सेवा किया करती थीं ॥ ९ ॥

शयनानि महार्हाणि वासांस्याभरणानि च ।

राजार्हाणि च सर्वाणि भक्ष्यभोज्यान्यनेकशः ॥ १० ॥

पृष्ठ 2245

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युधिष्ठिरो महाराज धृतराष्ट्रेऽभ्युपाहरत् ।

तथैव कुन्ती गान्धार्यां गुरुवृत्तिमवर्तत ॥ ११ ॥

महाराज! राजा युधिष्ठिर बहुमूल्य शय्या, वस्त्र, आभूषण तथा राजाके उपभोगमें आने योग्य सब प्रकारके उत्तम पदार्थ एवं अनेकानेक भक्ष्य, भोज्य पदार्थ धृतराष्ट्रको अर्पण किया करते थे । इसी प्रकार कुन्तीदेवी भी अपनी सासकी भाँति गान्धारीकी परिचर्या किया करती थीं ॥ १०-११ ॥

विदुरः संजयश्चैव युयुत्सुश्चैव कौरव ।

उपासते स्म तं वृद्धं हतपुत्रं जनाधिपम् ॥ १२ ॥

कुरुनन्दन! जिनकेपुत्र मारे गये थे, उन बूढ़े राजा धृतराष्ट्रकी विदुर, संजय और युयुत्सु -ये तीनों सदा सेवा करते रहते थे ॥ १२ ॥

श्यालो द्रोणस्य यश्चासीद् दयितो ब्राह्मणो महान् ।

स च तस्मिन् महेष्वासः कृपः समभवत् तदा ॥ १३ ॥

द्रोणाचार्यके प्रिय साले महान् ब्राह्मण महा- धनुर्धर कृपाचार्य तो उन दिनों सदा धृतराष्ट्रके ही पास रहते थे ॥ १३ ॥

व्यासश्च भगवान् नित्यमासांचक्रे नृपेण ह ।

कथाः कुर्वन् पुराणर्षिर्देवर्षिपितृरक्षसाम् ॥ १४ ॥

पुरातन ऋषि भगवान् व्यास भी प्रतिदिन उनके पास आकर बैठते और उन्हें देवर्षि, पितर तथा राक्षसोंकी कथाएँ सुनाया करते थे ॥ १४ ॥

धर्मयुक्तानि कार्याणि व्यवहारान्वितानि च ।

धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातो विदुरस्तान्यकारयत् ॥ १५ ॥

धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुरजी उनके समस्त धार्मिक और व्यावहारिक कार्य करते - कराते थे ॥ १५ ॥

सामन्तेभ्यः प्रियाण्यस्य कार्याणि सुबहून्यपि ।

प्राप्यन्तेऽर्थैः सुलघुभिः सुनयाद् विदुरस्य वै ॥ १६ ॥

विदुरजीकी अच्छी नीतिके कारण उनके बहुतेरे प्रिय कार्य थोड़े खर्चमें ही सामन्तों ( सीमावर्ती राजाओं ) -से सिद्ध हो जाया करते थे ॥ १६ ॥

अकरोद् बन्धमोक्षं च वध्यानां मोक्षणं तथा ।

न च धर्मसुतो राजा कदाचित् किंचिदब्रवीत् ॥ १७ ॥

वे कैदियोंको कैदसे छुटकारा दे देते और वधके योग्य मनुष्योंको भी प्राणदान देकर छोड़ देते थे; किंतु धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर इसके लिये उनसे कभी कुछ कहते नहीं थे ॥ १७ ॥

विहारयात्रासु पुनः कुरुराजो युधिष्ठिरः ।

सर्वान् कामान् महातेजाः प्रददावम्बिकासुते ॥ १८ ॥

पृष्ठ 2246

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महातेजस्वी कुरुराज युधिष्ठिर विहार और यात्राके अवसरोंपर राजा धृतराष्ट्रको समस्त मनोवाञ्छित वस्तुओंकी सुविधा देते थे ॥ १८ ॥

आरालिकाः सूपकारा रागखाण्डविकास्तथा ।

उपातिष्ठन्त राजानं धृतराष्ट्रं यथा पुरा ॥ १ ९ ॥

राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें पहलेकी ही भाँति उक्त अवसरोंपर भी रसोईके काममें निपुण आरालिक”, सूपकार और रागखाण्डविक मौजूद रहते थे ॥ १ ९ ॥

वासांसि च महार्हाणि माल्यानि विविधानि च ।

उपाजहुर्यथान्यायं धृतराष्ट्रस्य पाण्डवाः ॥ २० ॥

पाण्डवलोग धृतराष्ट्रको यथोचित रूपसे बहुमूल्य वस्त्र और नाना प्रकारकी मालाएँ भेंट करते थे ॥ २० ॥

मैरेयकाणि मांसानि पानकानि लघूनि च ।

चित्रान् भक्ष्यविकारांश्च चक्रुस्तस्य यथा पुरा ॥ २१ ॥

वे उनकी सेवामें पहलेकी ही भाँति सुखभोगप्रद फलके गूदे, हलके पानक ( मीठे शर्बत ) और अन्यान्य विचित्र प्रकारके भोजन प्रस्तुत करते थे ॥ २१ ॥

ये चापि पृथिवीपालाः समाजग्मुस्ततस्ततः ।

उपातिष्ठन्त ते सर्वे कौरवेन्द्रं यथा पुरा ॥ २२ ॥

भिन्न-भिन्न देशोंसे जो - जो भूपाल वहाँ पधारते थे, वे सब पहलेकी ही भाँति कौरवराज धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित होते थे ॥ २२ ॥

कुन्ती च द्रौपदी चैव सात्वती च यशस्विनी ।

उलूपी नागकन्या च देवी चित्राङ्गदा तथा ॥ २३ ॥

धृष्टकेतोश्च भगिनी जरासंधसुता तथा ।

एताश्चान्याश्च बह्वयो वै योषितः पुरुषर्षभ ॥ २४ ॥

किंकराः पर्युपातिष्ठन् सर्वाः सुबलजां तथा । पुरुषप्रवर! कुन्ती, द्रौपदी, यशस्विनी सुभद्रा, नागकन्या उलूपी, देवी चित्रांगदा, धृष्टकेतुकी बहिन तथा जरासंधकी पुत्री - ये तथा कुरुकुलकी दूसरी बहुत - सी स्त्रियाँ दासीकी भाँति सुबलपुत्री गान्धारीकी सेवामें लगी रहती थीं ॥ २३-२४ ॥ यथा पुत्रवियुक्तोऽयं न किंचिद् दुःखमाप्नुयात् ॥ २५ ॥

इति तानन्वशाद् भ्रातॄम् नित्यमेव युधिष्ठिरः । राजा युधिष्ठिर सदा भाइयोंको यह उपदेश देते थे कि ' बन्धुओ! तुम ऐसा बर्ताव करो, जिससे अपने पुत्रोंसे बिछुड़े हुए इन राजा धृतराष्ट्रको किंचिन्मात्र भी दुःख न प्राप्त हो ' ॥ २५३ ॥

एवं ते धर्मराजस्य श्रुत्वा वचनमर्थवत् ॥ २६ ॥

पृष्ठ 2247

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सविशेषमवर्तन्त भीममेकं तदा विना । धर्मराजका यह सार्थक वचन सुनकर भीमसेनको छोड़ अन्य सभी भाई धृतराष्ट्रका विशेष आदर -सत्कार करते थे ॥

न हि तत् तस्य वीरस्य हृदयादपसर्पति ।

धृतराष्ट्रस्य दुर्बुद्ध्य यद् वृत्तं द्यूतकारितम् ॥ २७ ॥

वीरवर भीमसेनके हृदयसे कभी भी यह बात दूर नहीं होती थी कि जूएके समय जो कुछ भी अनर्थ हुआ था, वह धृतराष्ट्रकी ही खोटी बुद्धिका परिणाम था ॥ इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

3. ‘ अरा' नामक शस्त्रसे काटकर बनाये जानेके कारण साग- भाजी आदिको ' अरालु' कहते हैं । उसको सुन्दर रीतिसे तैयार करनेवाले रसोइये ' आरालिक ' कहलाते हैं । २. दाल आदि बनानेवाले सामान्यतः सभी रसोइयोंको ' सूपकार' कहते हैं । ३. पीपल, सोंठ और चीनी मिलाकर मूँगका रसा तैयार करनेवाले रसोइये ' रागखाण्डविक ' कहलाते हैं ।

पृष्ठ 2248

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द्वितीयोऽध्यायः पाण्डवोंका धृतराष्ट्र और गान्धारीके अनुकूल बर्ताव वैशम्पायन उवाच

एवं सम्पूजितो राजा पाण्डवैरम्बिकासुतः ।

विजहार यथापूर्वमृषिभिः पर्युपासितः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार पाण्डवोंसे भलीभाँति सम्मानित हो अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र पूर्ववत् ऋषियोंके साथ गोष्ठी-- सुखका अनुभव करते हुए वहाँ सानन्द निवास करने लगे ॥ १ ॥

ब्रह्मदेयाग्रहारांश्च प्रददौ स कुरूद्वहः ।

तच्च कुन्तीसुतो राजा सर्वमेवान्वपद्यत ॥ २ ॥

कुरुकुलके स्वामी महाराज धृतराष्ट्र ब्राह्मणोंको देनेयोग्य अग्रहार ( माफी जमीन ) देते थे और कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर सभी कार्योंमें उन्हें सहयोग देते थे ॥ २ ॥

आनृशंस्यपरो राजा प्रीयमाणो युधिष्ठिरः ।

उवाच स तदा भ्रातॄनमात्यांश्च महीपतिः ॥ ३ ॥

मया चैव भवद्भिश्च मान्य एष नराधिपः ।

निदेशे धृतराष्ट्रस्य यस्तिष्ठति स मे सुहृत् ॥ ४ ॥

विपरीतश्च मे शत्रुर्नियम्यश्च भवेन्नरः । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे । वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि ‘ ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं । जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है । विपरीत आचरण करनेवाला मेरा शत्रु है । वह मेरे दण्डका भागी होगा ॥ ३-४ ॥ पितृवृत्तेषु चाहःसु पुत्राणां श्राद्धकर्मणि ॥ ५ ॥

सुहृदां चैव सर्वेषां यावदस्य चिकीर्षितम् । ‘पिता आदिकी क्षयाह तिथियोंपर तथा पुत्रों और समस्त सुहृदोंके श्राद्धकर्ममें राजा धृतराष्ट्र जितना धन खर्च करना चाहें, वह सब इन्हें मिलना चाहिये ' ॥ ५३ ॥

ततः स राजा कौरव्यो धृतराष्ट्रो महामनाः ॥ ६ ॥

ब्राह्मणेभ्यो यथार्हेभ्यो ददौ वित्तान्यनेकशः ।

धर्मराजश्च भीमश्च सव्यसाची यमावपि ॥ ७ ॥

तत् सर्वमन्ववर्तन्त तस्य प्रियचिकीर्षया । तदनन्तर महामना कुरुकुलनन्दन राजा धृतराष्ट्र उक्त अवसरोंपर सुयोग्य ब्राह्मणोंको बारम्बार प्रचुर धनका दान करते थे । धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, सव्यसाची अर्जुन और

पृष्ठ 2249

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नकुल- सहदेव भी उनका प्रिय करनेकी इच्छासे सब कार्योंमें उनका साथ देते थे ॥ कथं नु राजा वृद्धः स पुत्रपौत्रवधार्दितः ॥ ८ ॥

शोकमस्मस्कृतं प्राप्य न म्रियेतेति चिन्त्यते । उन्हें सदा इस बातकी चिन्ता बनी रहती थी कि पुत्र- पौत्रोंके वधसे पीड़ित हुए बूढ़े राजा धृतराष्ट्र हमारी ओरसे शोक पाकर कहीं अपने प्राण न त्याग दें ॥ ८३ ॥

यावद्धि कुरुवीरस्य जीवत्पुत्रस्य वै सुखम् ॥ ९ ॥

बभूव तदवाप्नोति भोगांश्चेति व्यवस्थिताः । अपने पुत्रोंकी जीवितावस्थामें कुरुवीर धृतराष्ट्रको जितने सुख और भोग प्राप्त थे, वे अब भी उन्हें मिलते रहें — इसके लिये पाण्डवोंने पूरी व्यवस्था की थी ॥ ९ ३ ॥ ततस्ते सहिताः पञ्च भ्रातरः पाण्डुनन्दनाः ॥ १० ॥

तथाशीलाः समातस्थुर्धृतराष्ट्रस्य शासने । इस प्रकारके शील और बर्तावसे युक्त होकर वे पाँचों भाई पाण्डव एक साथ धृतराष्ट्रकी आज्ञाके अधीन रहते थे ॥ १० ॥

धृतराष्ट्रश्च तान् सर्वान् विनीतान् नियमे स्थितान् ॥ ११ ॥

शिष्यवृत्तिं समापन्नान् गुरुवत् प्रत्यपद्यत । धृतराष्ट्र भी उन सबको परम विनीत, अपनी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले और शिष्य-भावसे सेवामें संलग्न जानकर पिताकी भाँति उनसे स्नेह रखते थे ॥ गान्धारी चैव पुत्राणां विविधैः श्राद्धकर्मभिः ॥ १२ ॥

आनृण्यमगमत् कामान् विप्रेभ्यः प्रतिपाद्य सा । गान्धारी देवीने भी अपने पुत्रोंके निमित्त नाना प्रकारके श्राद्धकर्मका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन दान किया और ऐसा करके वे पुत्रोंके ऋणसे मुक्त हो गयीं ॥ १२३ ॥

एवं धर्मभृतां श्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १३ ॥

भ्रातृभिः सहितो धीमान् पूजयामास तं नृपम् । इस प्रकार धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ रहकर सदा राजा धृतराष्ट्रका आदर-सत्कार करते रहते थे ॥ १३३ ॥

स राजा सुमहातेजा वृद्धः कुरुकुलोद्वहः ॥ १४ ॥

न ददर्श तदा किंचिदप्रियं पाण्डुनन्दने । कुरुकुलशिरोमणि महातेजस्वी बूढ़े राजा धृतराष्ट्रने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका कोई ऐसा बर्ताव नहीं देखा, जो उनके मनको अप्रिय लगनेवाला हो ॥ १४३ ॥

वर्तमानेषु सद्वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसु ॥ १५ ॥

प्रीतिमानभवद्राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।

पृष्ठ 2250

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2250 का मूल पृष्ठ
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महात्मा पाण्डव सदा अच्छा बर्ताव करते थे; इसलिये अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र उनके ऊपर बहुत प्रसन्न रहते थे ॥ १५३ ॥

सौबलेयी च गान्धारी पुत्रशोकमपास्य तम् ॥ १६ ॥

सदैव प्रीतिमत्यासीत् तनयेषु निजेष्विव । सुबलपुत्री गान्धारी भी अपने पुत्रोंका शोक छोड़कर पाण्डवोंपर सदा अपने सगे पुत्रोंके समान प्रेम करती थीं ॥ १६३ ॥

प्रियाण्येव तु कौरव्यो नाप्रियाणि कुरूद्वहः ॥ १७ ॥

वैचित्रवीर्ये नृपतौ समाचरत वीर्यवान् । पराक्रमी कुरुकुलतिलक राजा युधिष्ठिर महाराज धृतराष्ट्रका सदा प्रिय ही करते थे, अप्रिय नहीं करते थे ॥ १७३ ॥

यद् यद् ब्रूते च किंचित् स धृतराष्ट्रो जनाधिपः ॥ १८ ॥

गुरु वा लघु वा कार्यं गान्धारी च तपस्विनी ।

तं स राजा महाराज पाण्डवानां धुरंधरः ॥ १ ९ ॥

पूजयित्वा वचस्तत् तदकार्षीत् परवीरहा । महाराज! राजा धृतराष्ट्र और तपस्विनी गान्धारी देवी ये दोनों जो कोई भी छोटा या बड़ा कार्य करनेके लिये कहते, पाण्डवधुरन्धर शत्रुसूदन राजा युधिष्ठिर उनके उस आदेशको सादर शिरोधार्य करके वह सारा कार्य पूर्ण करते थे ॥ १८-१९ ३ ॥ तेन तस्याभवत् प्रीतो वृत्तेन स नराधिपः ॥ २० ॥

अन्वतप्यत संस्मृत्य पुत्रं तं मन्दचेतसम् । उनके उस बर्तावसे राजा धृतराष्ट्र सदा प्रसन्न रहते और अपने उस मन्दबुद्धि दुर्योधनको याद करके पछताया करते थे ॥ २०३ ॥

सदा च प्रातरुत्थाय कृतजप्यः शुचिर्नृपः ॥ २१ ॥

आशास्ते पाण्डुपुत्राणां समरेष्वपराजयम् । प्रतिदिन सबेरे उठकर स्नान- संध्या एवं गायत्रीजप कर लेनेके पश्चात् पवित्र हुए राजा धृतराष्ट्र सदा पाण्डवोंको समरविजयी होनेका आशीर्वाद देते थे ॥ ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्याथ हुत्वा चैव हुताशनम् ॥ २२ ॥

आयूंषि पाण्डुपुत्राणामाशंसत नराधिपः । ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर अग्निमें हवन करनेके पश्चात् राजा धृतराष्ट्र सदा यह शुभकामना करते थे कि पाण्डवोंकी आयु बढ़े ॥ २२ ॥

न तां प्रीतिं परामाप पुत्रेभ्यः स कुरूद्वहः ॥ २३ ॥

यां प्रीतिं पाण्डुपुत्रेभ्यः सदावाप नराधिपः ।