श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 411–420
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 411–420
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तेष्वेव यात्रा लोकानां भूतानामिव वासवे ॥ ७ ॥
राजाके लिये ब्राह्मण ही पिताकी भाँति पूजनीय, वन्दनीय और माननीय है । जैसे प्राणियोंका जीवन वर्षा करनेवाले इन्द्रपर निर्भर है उसी प्रकार जगत्की जीवन- यात्रा ब्राह्मणोंपर ही अवलम्बित है ॥ ७ ॥
अभिचारैरुपायैश्च दहेयुरपि चेतसा ।
निःशेषं कुपिताः कुर्युरुग्राः सत्यपराक्रमाः ॥ ८ ॥
ये सत्य- पराक्रमी ब्राह्मण जब कुपित होकर उग्ररूप धारण कर लेते हैं उस समय अभिचार या अन्य उपायोंद्वारा संकल्पमात्रसे अपने विरोधियोंको भस्म कर सकते हैं और उनका सर्वनाश कर डालते हैं ॥ ८ ॥
नान्तमेषां प्रपश्यामि न दिशश्चाप्यपावृताः ।
कुपिताः समुदीक्षन्ते दावेष्वग्निशिखा इव ॥ ९ ॥
मुझे इनका अन्त दिखायी नहीं देता । इनके लिये किसी भी दिशाका द्वार बंद नहीं है । ये जिस समय क्रोधमें भर जाते हैं उस समय दावानलकी लपटोंके समान हो जाते हैं और वैसी ही दाहक दृष्टिसे देखने लगते हैं ॥
बिभ्यत्येषां साहसिका गुणास्तेषामतीव हि ।
कूपा इव तृणच्छन्ना विशुद्धा द्यौरिवापरे ॥ १० ॥
बड़े - बड़े साहसी भी इनसे भय मानते हैं; क्योंकि इनके भीतर गुण ही अधिक होते हैं । इन ब्राह्मणोंमेंसे कुछ तो घास- फूससे ढके हुए कूपकी तरह अपने तेजको छिपाए रखते हैं और कुछ निर्मल आकाशकी भाँति प्रकाशित होते रहते हैं ॥ १० ॥
प्रसह्यकारिणः केचित् कार्पासमृदवो परे । ( मान्यास्तेषां साधवो ये न निन्द्याश्चाप्यसाधवः । ) सन्ति चैषामतिशठास्तथैवान्ये तपस्विनः ॥ ११ ॥
कुछ हठी होते हैं और कुछ रूईकी तरह कोमल । इनमें जो श्रेष्ठ पुरुष हों, उनका सम्मान करना चाहिये; परंतु जो श्रेष्ठ न हों, उनकी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये । इन ब्राह्मणोंमें कुछ तो अत्यन्त शठ होते हैं और दूसरे महान् तपस्वी ॥ ११ ॥
कृषिगोरक्ष्यमप्येके भैक्ष्यमन्येऽप्यनुष्ठिताः ।
चौराश्चान्येऽनृताश्चान्ये तथान्ये नटनर्तकाः ॥ १२ ॥
कोई- कोई ब्राह्मण खेती और गोरक्षासे जीवन चलाते हैं, कोई भिक्षापर जीवन- निर्वाह करते हैं, कितने ही चोरी करते हैं, कोई झूठ बोलते हैं और दूसरे कितने ही नटोंका तथा नाचनेका कार्य करते हैं ॥ १२ ॥
सर्वकर्मसहाश्चान्ये पार्थिवेष्वितरेषु च ।
विविधाकारयुक्ताश्च ब्राह्मणा भरतर्षभ ॥ १३ ॥
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भरतश्रेष्ठ! कितने ही ब्राह्मण राजाओं तथा अन्य लोगोंके यहाँ सब प्रकारके कार्य करनेमें समर्थ होते हैं और अनेक ब्राह्मण नाना प्रकारके आकार धारण करते हैं ॥ १३ ॥
नानाकर्मसु रक्तानां बहुकर्मोपजीविनाम् ।
धर्मज्ञानां सतां तेषां नित्यमेवानुकीर्तयेत् ॥ १४ ॥
नाना प्रकारके कर्मोंमें संलग्न तथा अनेक कर्मोंसे जीविका चलानेवाले उन धर्मज्ञ एवं सत्पुरुष ब्राह्मणोंका सदा ही गुण गाना चाहिये ॥ १४ ॥
पितॄणां देवतानां च मनुष्योरगरक्षसाम् ।
पुराप्येते महाभागा ब्राह्मणा वै जनाधिप ॥ १५ ॥
नरेश्वर! प्राचीनकालसे ही ये महाभाग ब्राह्मण-लोग देवता, पितर, मनुष्य, नाग और राक्षसोंके पूजनीय हैं ॥ १५ ॥
नैते देवैर्न पितृभिर्न गन्धर्वैर्न राक्षसैः ।
नासुरैर्न पिशाचैश्च शक्या जेतुं द्विजातयः ॥ १६ ॥
ये द्विज न तो देवताओं, न पितरों, न गन्धर्वों, न राक्षसों, न असुरों और न पिशाचोंद्वारा ही जीते जा सकते हैं ॥ १६ ॥
अदैवं दैवतं कुर्युर्दैवतं चाप्यदैवतम् ।
यमिच्छेयुः स राजा स्याद् ये नेष्टः स पराभवेत् ॥ १७ ॥
ये चाहें तो जो देवता नहीं है उसे देवता बना दें और जो देवता हैं उन्हें भी देवत्वसे गिरा दें । ये जिसे राजा बनाना चाहें वही राजा रह सकता है । जिसे राजाके रूपमें ये न देखना चाहें उसका पराभव हो जाता है ॥ १७ ॥
परिवादं च ये कुर्युर्ब्राह्मणानामचेतसः ।
सत्यं ब्रवीमि ते राजन् विनश्येयुर्न संशयः ॥ १८ ॥
राजन्! मैं तुमसे यह सच्ची बात बता रहा हूँ कि जो मूढ़ मानव ब्राह्मणोंकी निन्दा करते हैं वे नष्ट हो जाते हैं— इसमें संशय नहीं है ॥ १८ ॥
निन्दाप्रशंसाकुशलाः कीर्त्यकीर्तिपरायणाः ।
परिकुप्यन्ति ते राजन् सततं द्विषतां द्विजाः ॥ १ ९ ॥
निन्दा और प्रशंसामें निपुण तथा लोगोंके यश और अपयशको बढ़ानेमें तत्पर रहनेवाले द्विज अपने प्रति सदा द्वेष रखनेवालोंपर कुपित हो उठते हैं ॥ १ ९ ॥
ब्राह्मणा यं प्रशंसन्ति पुरुषः स प्रवर्धते ।
ब्राह्मणैर्यः पराकृष्टः पराभूयात् क्षणाद्धि सः ॥ २० ॥
ब्राह्मण जिसकी प्रशंसा करते हैं; उस पुरुषका अभ्युदय होता है और जिसको वे शाप देते हैं; उसका एक क्षणमें पराभव हो जाता है ॥ २० ॥
शका यवनकाम्बोजास्तास्ताः क्षत्रियजातयः ।
वृषलत्वं परिगता ब्राह्मणानामदर्शनात् ॥ २१ ॥
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शक, यवन और काम्बोज आदि जातियाँ पहले क्षत्रिय ही थीं; किंतु ब्राह्मणोंकी कृपादृष्टिसे वञ्चित होनेके कारण उन्हें वृषल ( शूद्र एवं म्लेच्छ) होना पड़ा ॥ २१ ॥
द्राविडाश्च कलिङ्गाश्च पुलिन्दाश्चाप्युशीनराः ।
कोलिसर्पा माहिषकास्तास्ताः क्षत्रियजातयः ॥ २२ ॥
वृषलत्वं परिगता ब्राह्मणानामदर्शनात् ।
श्रेयान् पराजयस्तेभ्यो न जयो जयतां वर ॥ २३ ॥
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ नरेश! द्राविड़, कलिंग, पुलिन्द, उशीनर, कोलिसर्प और माहिषक आदि क्षत्रिय जातियाँ भी ब्राह्मणोंकी कृपादृष्टि न मिलनेसे ही शूद्र हो गयीं । ब्राह्मणोंसे हार मान लेनेमें ही कल्याण है, उन्हें हराना अच्छा नहीं है ॥ २२-२३ ॥
यस्तु सर्वमिदं हन्याद् ब्राह्मणं च न तत्समम् ।
ब्रह्मवध्या महान् दोष इत्याहुः परमर्षयः ॥ २४ ॥
जो इस सम्पूर्ण जगत्को मार डाले तथा जो ब्राह्मणका वध करे, उन दोनोंका पाप समान नहीं है । महर्षियोंका कहना है कि ब्रह्महत्या महान् दोष है ॥ २४ ॥
परिवादो द्विजातीनां न श्रोतव्यः कथंचन ।
आसीताधोमुखस्तूष्णीं समुत्थाय व्रजेच्च वा ॥ २५ ॥
ब्राह्मणोंकी निन्दा किसी तरह नहीं सुननी चाहिये । जहाँ उनकी निन्दा होती हो, वहाँ नीचे मुँह करके चुपचाप बैठे रहना या वहाँसे उठकर चल देना चाहिये ॥ २५ ॥
न स जातोऽजनिष्यद् वा पृथिव्यामिह कश्चन ।
यो ब्राह्मणविरोधेन सुखं जीवितुमुत्सहेत् ॥ २६ ॥
इस पृथ्वीपर ऐसा कोई मनुष्य न तो पैदा हुआ है और न आगे पैदा होगा ही जो ब्राह्मणके साथ विरोध करके सुखपूर्वक जीवित रहनेका साहस करे ॥ २६ ॥
दुर्ग्राह्यो मुष्टिना वायुर्दुःस्पर्शः पाणिना शशी ।
दुर्धरा पृथिवी राजन् दुर्जया ब्राह्मणा भुवि ॥ २७ ॥
राजन्! हवाको मुट्ठीमें पकड़ना, चन्द्रमाको हाथसे छूना और पृथ्वीको उठा लेना जैसे अत्यन्त कठिन काम है, उसी तरह इस पृथ्वीपर ब्राह्मणोंको जीतना दुष्कर है ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्राह्मणप्रशंसा नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्राह्मणकी प्रशंसा नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठक श्लोक मिलाकर २७३ श्लोक हैं )
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चतुस्त्रिंशोऽध्यायः श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी प्रशंसा भीष्म उवाच
ब्राह्मणानेव सततं भृशं सम्परिपूजयेत् ।
एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखयोः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ब्राह्मणोंका सदा ही भलीभाँति पूजन करना चाहिये ।
चन्द्रमा इनके राजा हैं । ये मनुष्यको सुख और दुःख देनेमें समर्थ हैं ॥ १ ॥
एते भोगैरलङ्कारैरन्यैश्चैव किमिच्छकैः ।
सदा पूज्या नमस्कारै रक्ष्याश्च पितृवन्नृपैः ॥ २ ॥
ततो राष्ट्रस्य शान्तिर्हि भूतानामिव वासवात् । राजाओंको चाहिये कि वे उत्तम भोग, आभूषण तथा पूछकर प्रस्तुत किये गये दूसरे मनोवांछित पदार्थ देकर नमस्कार आदिके द्वारा सदा ब्राह्मणोंकी पूजा करें और पिताके समान उनके पालन - पोषणका ध्यान रखें । तभी इन ब्राह्मणोंसे राष्ट्रमें शान्ति रह सकती है । ठीक उसी तरह, जैसे इन्द्रसे वृष्टि प्राप्त होनेपर समस्त प्राणियोंको सुख- शान्ति मिलती है ॥ २३ ॥
जायतां ब्रह्मवर्चस्वी राष्ट्रे वै ब्राह्मणः शुचिः ॥ ३ ॥
महारथश्च राजन्य एष्टव्यः शत्रुतापनः । सबको यह इच्छा करनी चाहिये कि राष्ट्रमें ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पवित्र ब्राह्मण उत्पन्न हो और शत्रुओंको संताप देनेवाले महारथी क्षत्रियकी उत्पत्ति हो ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणं जातिसम्पन्नं धर्मज्ञं संशितव्रतम् ॥ ४ ॥
वासयेत गृहे राजन् न तस्मात् परमस्ति वै । राजन्! विशुद्ध जातिसे युक्त तथा तीक्ष्ण व्रतका पालन करनेवाले धर्मज्ञ ब्राह्मणको
अपने घरमें ठहराना चाहिये । इससे बढ़कर दूसरा कोई पुण्यकर्म नहीं है ॥ ४३ ॥
ब्राह्मणेभ्यो हविर्दत्तं प्रतिगृह्णन्ति देवताः ॥ ५ ॥
पितरः सर्वभूतानां नैतेभ्यो विद्यते परम् । ब्राह्मणोंको जो हविष्य अर्पित किया जाता है उसे देवता ग्रहण करते हैं; क्योंकि
ब्राह्मण समस्त प्राणियोंके पिता हैं । इनसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है ॥ ५३ ॥
आदित्यश्चन्द्रमा वायुरापो भूरम्बरं दिशः ॥ ६ ॥
सर्वे ब्राह्मणमाविश्य सदान्नमुपभुञ्जते ।
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सूर्य, चन्द्रमा, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश और दिशा- इन सबके अधिष्ठाता देवता सदा ब्राह्मणके शरीरमें प्रवेश करके अन्न भोजन करते हैं ॥ ६३ ॥
न तस्याश्नन्ति पितरो यस्य विप्रा न भुञ्जते ॥ ७ ॥
देवाश्चाप्यस्य नाश्नन्ति पापस्य ब्राह्मणद्विषः । ब्राह्मण जिसका अन्न नहीं खाते उसके अन्नको पितर भी नहीं स्वीकार करते । उस ब्राह्मणद्रोही पापात्माका अन्न देवता भी नहीं ग्रहण करते हैं ॥ ७३ ॥
ब्राह्मणेषु तु तुष्टेषु प्रीयन्ते पितरः सदा ॥ ८ ॥
तथैव देवता राजन् नात्र कार्या विचारणा । राजन्! यदि ब्राह्मण संतुष्ट हो जायँ तो पितर तथा देवता भी सदा प्रसन्न रहते हैं । इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ८३ ॥
तथैव तेऽपि प्रीयन्ते येषां भवति तद्धविः ॥ ९ ॥
न च प्रेत्य विनश्यन्ति गच्छन्ति च परां गतिम् । इसी प्रकार वे यजमान भी प्रसन्न होते हैं जिनकी दी हुई हवि ब्राह्मणोंके उपयोगमें आती है । वे मरनेके बाद नष्ट नहीं होते हैं, उत्तम गतिको प्राप्त हो जाते हैं ॥ ९ ३ ॥ येन येनैव हविषा ब्राह्मणांस्तर्पयेन्नरः ॥ १० ॥
तेन तेनैव प्रीयन्ते पितरो देवतास्तथा । मनुष्य जिस -जिस हविष्यसे ब्राह्मणोंको तृप्त करता है, उसी उसीसे देवता और पितर भी तृप्त होते हैं ॥ १०३ ॥
ब्राह्मणादेव तद् भूतं प्रभवन्ति यतः प्रजाः ॥ ११ ॥
यतश्चायं प्रभवति प्रेत्य यत्र च गच्छति ।
वेदैष मार्गं स्वर्गस्य तथैव नरकस्य च ॥ १२ ॥
आगतानागते चोभे ब्राह्मणो द्विपदं वरः ।
ब्राह्मणो भरतश्रेष्ठ स्वधर्मं चैव वेद यः ॥ १३ ॥
जिससे समस्त प्रजा उत्पन्न होती है, वह यज्ञ आदि कर्म ब्राह्मणोंसे ही सम्पन्न होता है । जीव जहाँसे उत्पन्न होता है और मृत्युके पश्चात् जहाँ जाता है, उस तत्त्वको, स्वर्ग और नरकके मार्गको तथा भूत, वर्तमान और भविष्यको ब्राह्मण ही जानता है । ब्राह्मण मनुष्योंमें सबसे श्रेष्ठ है । भरतश्रेष्ठ! जो अपने धर्मको जानता है और उसका पालन करता है, वही सच्चा ब्राह्मण है ॥ ११–१३ ॥
ये चैनमनुवर्तन्ते ते न यान्ति पराभवम् ।
न ते प्रेत्य विनश्यन्ति गच्छन्ति न पराभवम् ॥ १४ ॥
जो लोग ब्राह्मणोंका अनुसरण करते हैं उनकी कभी पराजय नहीं होती तथा मृत्युके
पश्चात् उनका पतन नहीं होता । वे अपमानको भी नहीं प्राप्त होते हैं ॥ १४ ॥
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यद् ब्राह्मणमुखात् प्राप्तं प्रतिगृह्णन्ति वै वचः ।
भूतात्मानो महात्मानस्ते न यान्ति पराभवम् ॥ १५ ॥
ब्राह्मणके मुखसे जो वाणी निकलती है, उसे जो शिरोधार्य करते हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंको आत्मभावसे देखनेवाले महात्मा कभी पराभवको नहीं प्राप्त होते हैं ॥
क्षत्रियाणां प्रतपतां तेजसा च बलेन च ।
ब्राह्मणेष्वेव शाम्यन्ति तेजांसि च बलानि च ॥ १६ ॥
अपने तेज और बलसे तपते हुए क्षत्रियोंके तेज और बल ब्राह्मणोंके सामने आनेपर ही शान्त होते हैं ॥
भृगवस्तालजंघांश्च नीपानाङ्गिरसोऽजयन् ।
भरद्वाजो वैहतव्यानैलांश्च भरतर्षभ ॥ १७ ॥
भरतश्रेष्ठ! भृगुवंशी ब्राह्मणोंने तालजंघोंको, अंगिराकी संतानोंने नीपवंशी राजाओंको तथा भरद्वाजने हैहयोंको और इलाके पुत्रोंको पराजित किया था ॥ १७ ॥
चित्रायुधांश्चाप्यजयन्नेते कृष्णाजिनध्वजाः ।
प्रक्षिप्याथ च कुम्भान् वै पारगामिनमारभेत् ॥ १८ ॥
क्षत्रियोंके पास अनेक प्रकारके विचित्र आयुध थे तो भी कृष्णमृगचर्म धारण करनेवाले इन ब्राह्मणोंने उन्हें हरा दिया । क्षत्रियको चाहिये कि ब्राह्मणोंको जलपूर्ण कलश दान करके पारलौकिक कार्य आरम्भ करे ॥ १८ ॥
यत् किंचित् कथ्यते लोके श्रूयते पठ्यतेऽपि वा ।
सर्वं तद् ब्राह्मणेष्वेव गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥ १९ ॥
संसारमें जो कुछ कहा - सुना या पढ़ा जाता है वह सब काठमें छिपी हुई आगकी तरह ब्राह्मणोंमें ही स्थित है ॥ १ ९ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
संवादं वासुदेवस्य पृथ्व्याश्च भरतर्षभ ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! इस विषयमें जानकार लोग भगवान् श्रीकृष्ण और पृथ्वीके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २० ॥
वासुदेव उवाच
मातरं सर्वभूतानां पृच्छे त्वां संशयं शुभे ।
केनस्वित् कर्मणा पापं व्यपोहति नरो गृही ॥ २१ ॥
श्रीकृष्णने पूछा - शुभे! तुम सम्पूर्ण भूतोंकी माता हो, इसलिये मैं तुमसे एक संदेह पूछ रहा हूँ। गृहस्थ मनुष्य किस कर्मके अनुष्ठानसे अपने पापका नाश कर सकता है? ॥ २१ ॥
पृथिव्युवाच
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ब्राह्मणानेव सेवेत पवित्रं ह्येतदुत्तमम् ।
ब्राह्मणान् सेवमानस्य रजः सर्वं प्रणश्यति ।
अतो भूतिरतः कीर्तिरतो बुद्धिः प्रजायते ॥ २२ ॥
पृथ्वीने कहा- भगवन्! इसके लिये मनुष्यको ब्राह्मणोंकी ही सेवा करनी चाहिये । यही सबसे पवित्र और उत्तम कार्य है । ब्राह्मणोंकी सेवा करनेवाले पुरुषका समस्त रजोगुण नष्ट हो जाता है । इसीसे ऐश्वर्य, इसीसे कीर्ति और इसीसे उत्तम बुद्धि भी प्राप्त होती है ॥ २२ ॥
महारथश्च राजन्य एष्टव्यः शत्रुतापनः ।
इति मां नारदः प्राह सततं सर्वभूतये ॥ २३ ॥
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पृथ्वी और श्रीकृष्णका संवाद
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सदा सब प्रकारकी समृद्धिके लिये नारदजीने मुझसे कहा कि शत्रुओंको संताप देनेवाले महारथी क्षत्रियके उत्पन्न होनेकी कामना करनी चाहिये ॥ २३ ॥
ब्राह्मणं जातिसम्पन्नं धर्मज्ञं संशितं शुचिम् ।
अपरेषां परेषां च परेभ्यश्चैव येऽपरे ॥ २४ ॥
ब्राह्मणा यं प्रशंसन्ति स मनुष्यः प्रवर्धते ।
अथ यो ब्राह्मणान् क्रुष्टः पराभवति सोऽचिरात् ॥ २५ ॥
उत्तम जातिसे सम्पन्न, धर्मज्ञ, दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले तथा पवित्र ब्राह्मणके उत्पन्न होनेकी भी इच्छा रखनी चाहिये । छोटे - बड़े सब लोगोंसे जो बड़े हैं, उनसे भी ब्राह्मण बड़े माने गये हैं । ऐसे ब्राह्मण जिसकी प्रशंसा करते हैं उस मनुष्यकी वृद्धि होती है और जो ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है वह शीघ्र ही पराभवको प्राप्त होता है ॥ २४-२५ ॥
यथा महार्णवे क्षिप्त आमलोष्टो विनश्यति ।
तथा दुश्चरितं सर्वं पराभावाय कल्पते ॥ २६ ॥
जैसे महासागरमें फेंका हुआ कच्ची मिट्टीका ढेला तुरंत गल जाता है, उसी प्रकार ब्राह्मणोंका संग प्राप्त होते ही सारा दुष्कर्म नष्ट हो जाता है ॥ २६ ॥
पश्य चन्द्रे कृतं लक्ष्म समुद्रो लवणोदकः ।
तथा भगसहस्रेण महेन्द्रः परिचिह्नितः ॥ २७ ॥
तेषामेव प्रभावेण सहस्रनयनो ह्यसौ ।
शतक्रतुः समभवत् पश्य माधव यादृशम् ॥ २८ ॥
माधव! देखिये, ब्राह्मणोंका कैसा प्रभाव है, उन्होंने चन्द्रमामें कलंक लगा दिया, समुद्रका पानी खारा बना दिया तथा देवराज इन्द्रके शरीरमें एक हजार भगके चिह्न उत्पन्न कर दिये और फिर उन्हींके प्रभावसे वे भग नेत्रके रूपमें परिणत हो गये; जिनके कारण शतक्रतु इन्द्र ‘ सहस्राक्ष ' नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ २७-२८ ॥
इच्छन् कीर्तिं च भूतिं च लोकांश्च मधुसूदन ।
ब्राह्मणानुमते तिष्ठेत् पुरुषः शुचिरात्मवान् ॥ २ ९ ॥
मधुसूदन! जो कीर्ति, ऐश्वर्य और उत्तम लोकोंको प्राप्त करना चाहता हो, वह मनको वशमें रखनेवाला पवित्र पुरुष ब्राह्मणोंकी आज्ञाके अधीन रहे ॥ २ ९ ॥ भीष्म उवाच
इत्येतद् वचनं श्रुत्वा मेदिन्या मधुसूदनः ।
साधु साध्विति कौरव्य मेदिनीं प्रत्यपूजयत् ॥ ३० ॥
भीष्मजी कहते हैं – कुरुनन्दन! पृथ्वीके ये वचन सुनकर भगवान् मधुसूदनने कहा ——वाह- वाह, तुमने बहुत अच्छी बात बतायी । ' ऐसा कहकर उन्होंने भूदेवीकी भूरि- भूरि प्रशंसा की ॥ ३० ॥
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एतां श्रुत्वोपमां पार्थ प्रयतो ब्राह्मणर्षभान् ।
सततं पूजयेथास्त्वं ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे ॥ ३१ ॥
कुन्तीनन्दन! इस दृष्टान्त एवं ब्राह्मण- माहात्म्यको सुनकर तुम सदा पवित्रभावसे श्रेष्ठ
ब्राह्मणोंका पूजन करते रहो । इससे तुम कल्याणके भागी होओगे ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पृथ्वीवासुदेवसंवादे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पृथ्वी और वासुदेवका संवादविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ३४ ॥
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