श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 421–430

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 421 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ब्रह्माजीके द्वारा ब्राह्मणोंकी महत्ताका वर्णन भीष्म उवाच

जन्मनैव महाभागो ब्राह्मणो नाम जायते ।

नमस्यः सर्वभूतानामतिथिः प्रसृताग्रभुक् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ब्राह्मण जन्मसे ही महान् भाग्यशाली, समस्त प्राणियोंका वन्दनीय, अतिथि और प्रथम भोजन पानेका अधिकारी है ॥ १ ॥

सर्वार्थाः सुहृदस्तात ब्राह्मणाः सुमनोमुखाः ।

गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिरनुध्यायन्ति पूजिताः ॥ २ ॥

तात! ब्राह्मण सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाले, सबके सुहृद् तथा देवताओंके मुख हैं । वे पूजित होनेपर अपनी मंगलयुक्त वाणीसे आशीर्वाद देकर मनुष्यके कल्याणका चिन्तन करते हैं ॥ २ ॥

सर्वान्नो द्विषतस्तात ब्राह्मणा जातमन्यवः ।

गीर्भिर्दारुणयुक्ताभिरभिहन्युरपूजिताः ॥ ३ ॥

तात! हमारे शत्रुओंके द्वारा पूजित न होनेपर उनके प्रति कुपित हुए ब्राह्मण उन सबको अभिशापयुक्त कठोर वाणीद्वारा नष्ट कर डालें ॥ ३ ॥

अत्र गाथाः पुरागीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।

सृष्ट्वा द्विजातीन् धाता हि यथापूर्वं समादधत् ॥ ४ ॥

न चान्यदिह कर्तव्यं किञ्चिदूर्ध्वं यथाविधि ।

गुप्त गोपायते ब्रह्मा श्रेयो वस्तेन शोभनम् ॥ ५ ॥

इस विषयमें पुराणवेत्ता पुरुष पहलेकी गायी हुई कुछ गाथाओंका वर्णन करते हैं— प्रजापतिने ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको पूर्ववत् उत्पन्न करके उनको समझाया, ' तुमलोगोंके लिये विधिपूर्वक स्वधर्मपालन और ब्राह्मणोंकी सेवाके सिवा और कोई कर्तव्य नहीं है । ब्राह्मणकी रक्षा की जाय तो वह स्वयं भी अपने रक्षककी रक्षा करता है; अतः ब्राह्मणकी सेवासे तुमलोगोंका परम कल्याण होगा ॥ ४-५ ॥

स्वमेव कुर्वतां कर्म श्रीर्वो ब्राह्मी भविष्यति ।

प्रमाणं सर्वभूतानां प्रग्रहाश्च भविष्यथ ॥ ६ ॥

‘ ब्राह्मणकी रक्षारूप अपने कर्तव्यका पालन करनेसे ही तुमलोगोंको ब्राह्मी लक्ष्मी प्राप्त होगी । तुम सम्पूर्ण भूतोंके लिये प्रमाणभूत तथा उनको वशमें करनेवाले बन जाओगे ॥ ६ ॥

न शौद्रं कर्म कर्तव्यं ब्राह्मणेन विपश्चिता ।

पृष्ठ 422

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 422 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शौद्रं हि कुर्वतः कर्म धर्मः समुपरुध्यते ॥ ७ ॥

‘ विद्वान् ब्राह्मणको शूद्रोचित कर्म नहीं करना चाहिये । शूद्रके कर्म करनेसे उसका धर्म नष्ट हो जाता है ॥ ७ ॥

श्रीश्च बुद्धिश्च तेजश्च विभूतिश्च प्रतापिनी ।

स्वाध्याये चैव माहात्म्यं विपुलं प्रतिपत्स्यते ॥ ८ ॥

‘ स्वधर्मका पालन करनेसे लक्ष्मी, बुद्धि, तेज और प्रतापयुक्त ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है, तथा स्वाध्यायका अत्यधिक माहात्म्य उपलब्ध होता है ॥ ८ ॥

हुत्वा चाहवनीयस्थं महाभाग्ये प्रतिष्ठिताः ।

अग्रभोज्याः प्रसूतीनां श्रिया ब्राह्मयानुकल्पिताः ॥ ९ ॥

‘ब्राह्मण आहवनीय अग्निमें स्थित देवतागणोंको हवनसे तृप्त करके महान् सौभाग्यपूर्ण पदपर प्रतिष्ठित होते हैं । वे ब्राह्मी विद्यासे उत्तम पात्र बनकर बालकोंसे भी पहले भोजन पानेके अधिकारी होते हैं ॥ ९ ॥

श्रद्धया परया युक्ता ह्यनभिद्रोहलब्धया ।

दमस्वाध्यायनिरताः सर्वान् कामानवाप्स्यथ ॥ १० ॥

‘ द्विजगण! यदि तुमलोग किसी भी प्राणीके साथ द्रोह न करनेके कारण प्राप्त हुई परम श्रद्धासे सम्पन्न हो इन्द्रियसंयम और स्वाध्यायमें लगे रहोगे तो सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लोगे ॥ १० ॥

यच्चैव मानुषे लोके यच्च देवेषु किञ्चन ।

सर्वं तु तपसा साध्यं ज्ञानेन नियमेन च ॥ ११ ॥

‘ मनुष्यलोकमें तथा देवलोकमें जो कुछ भी भोग्य वस्तुएँ हैं, वे सब ज्ञान, नियम और तपस्यासे प्राप्त होनेवाली हैं ॥ ११ ॥

( युष्मत्सम्माननात् प्रीतिं पावनाः क्षत्रियाः श्रियम् ।

अमुत्रेह समायान्ति वैश्यशूद्रादिकास्तथा ॥

अरक्षिताश्च युष्माभिर्विरुद्धा यान्ति विप्लवम् । युष्मत्तेजोधृता लोकास्तद् रक्षथ जगत्त्रयम् ॥ ) ‘ आपलोगोंके समादरसे पवित्र हुए क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र आदि प्राणी इहलोक और परलोकमें भी प्रीति एवं सम्पत्ति पाते हैं । जो आपके विरोधी हैं, वे आपसे अरक्षित होनेके कारण विनाशको प्राप्त होते हैं। आपके तेजसे ही ये सम्पूर्ण लोक टिके हुए हैं; अतः आप तीनों लोकोंकी रक्षा करें' ॥

इत्येवं ब्रह्मगीतास्ते समाख्याता मयानघ ।

विप्राणामनुकम्पार्थं तेन प्रोक्तं हि धीमता ॥ १२ ॥

निष्पाप युधिष्ठिर! इस प्रकार ब्रह्माजीकी गायी हुई गाथा मैंने तुम्हें बतायी है । उन परम बुद्धिमान् धाताने ब्राह्मणोंपर कृपा करनेके लिये ही ऐसा कहा है ॥ १२ ॥

पृष्ठ 423

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 423 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भूयस्तेषां बलं मन्ये यथा राज्ञस्तपस्विनः ।

दुरासदाश्च चण्डाश्च रभसाः क्षिप्रकारिणः ॥ १३ ॥

मैं ब्राह्मणोंका बल तपस्वी राजाके समान बहुत बड़ा मानता हूँ। वे दुर्जय, प्रचण्ड, वेगशाली और शीघ्रकारी होते हैं ॥ १३ ॥

सन्त्येषां सिंहसत्त्वाश्च व्याघ्रसत्त्वास्तथापरे ।

वराहमृगसत्त्वाश्च जलसत्त्वास्तथापरे ॥ १४ ॥

ब्राह्मणोंमें कुछ सिंहके समान शक्तिशाली होते हैं और कुछ व्याघ्रके समान । कितनोंकी

शक्ति वाराह और मृगके समान होती है । कितने ही जल-जन्तुओंके समान होते हैं ॥ १४ ॥

सर्पस्पर्शसमाः केचित् तथान्ये मकरस्पृशः ।

विभाष्यघातिनः केचित् तथा चक्षुर्हणोऽपरे ॥ १५ ॥

किन्हींका स्पर्श सर्पके समान होता है तो किन्हींका घड़ियालोंके समान । कोई शाप देकर मारते हैं तो कोई क्रोधभरी दृष्टिसे देखकर ही भस्म कर देते हैं ॥ १५ ॥

सन्ति चाशीविषसमाः सन्ति मन्दास्तथापरे ।

विविधानीह वृत्तानि ब्राह्मणानां युधिष्ठिर ॥ १६ ॥

कुछ ब्राह्मण विषधर सर्पके समान भयंकर होते हैं और कुछ मन्द स्वभावके भी होते हैं । युधिष्ठिर! इस जगत्में ब्राह्मणोंके स्वभाव और आचार- व्यवहार अनेक प्रकारके ॥ १६ ॥

मेकला द्राविडा लाटाः पौण्ड्राः कान्वशिरास्तथा ।

शौण्डिका दरदा दार्वाश्चौराः शबरबर्बराः ॥ १७ ॥

किराता यवनाश्चैव तास्ताः क्षत्रियजातयः ।

वृषलत्वमनुप्राप्ता ब्राह्मणानाममर्षणात् ॥ १८ ॥

मेकल, द्राविड़, लाट, पौण्ड्र, कान्वशिरा, शौण्डिक, दरद, दार्व, चौर, शबर, बर्बर, किरात और यवन — ये सब पहले क्षत्रिय थे; किंतु ब्राह्मणोंके साथ ईर्ष्या करनेसे नीच हो गये ॥ १७-१८ ॥

ब्राह्मणानां परिभवादसुराः सलिलेशयाः ।

ब्राह्मणानां प्रसादाच्च देवाः स्वर्गनिवासिनः ॥ १ ९ ॥

ब्राह्मणोंके तिरस्कारसे ही असुरोंको समुद्रमें रहना पड़ा और ब्राह्मणोंके कृपाप्रसादसे देवता स्वर्गलोकमें निवास करते हैं ॥ १ ९ ॥

अशक्यं स्प्रष्टुमाकाशमचाल्यो हिमवान् गिरिः ।

अधार्या सेतुना गङ्गा दुर्जया ब्राह्मणा भुवि ॥ २० ॥

जैसे आकाशको छूना, हिमालयको विचलित करना और बाँध बाँधकर गङ्गाके प्रवाहको रोक देना असम्भव है, उसी प्रकार इस भूतलपर ब्राह्मणोंको जीतना सर्वथा असम्भव है ॥ २० ॥

पृष्ठ 424

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 424 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

न ब्राह्मणविरोधेन शक्या शास्तुं वसुन्धरा ।

ब्राह्मणा हि महात्मानो देवानामपि देवताः ॥ २१ ॥

ब्राह्मणोंसे विरोध करके भूमण्डलका राज्य नहीं चलाया जा सकता; क्योंकि महात्मा ब्राह्मण देवताओंके भी देवता हैं ॥ २१ ॥

तान् पूजयस्व सततं दानेन परिचर्यया ।

यदीच्छसि महीं भोक्तुमिमां सागरमेखलाम् ॥ २२ ॥

युधिष्ठिर! यदि तुम इस समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राज्य भोगना चाहते हो तो दान और सेवाके द्वारा सदा ब्राह्मणोंकी पूजा करते रहो ॥ २२ ॥

प्रतिग्रहेण तेजो हि विप्राणां शाम्यतेऽनघ ।

प्रतिग्रहं ये नेच्छेयुस्तेभ्यो रक्ष्यं त्वया नृप ॥ २३ ॥

निष्पाप नरेश! दान लेनेसे ब्राह्मणोंका तेज शान्त हो जाता है; इसलिये जो दान नहीं लेना चाहते उन ब्राह्मणोंसे तुम्हें अपने कुलकी रक्षा करनी चाहिये ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्राह्मणप्रशंसायां पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमेंब्राह्मणकी प्रशंसाविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके दो श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं ) Face

पृष्ठ 425

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 425 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षट्त्रिंशोऽध्यायः ब्राह्मणकी प्रशंसाके विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरका संवाद भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

शक्रशम्बरसंवादं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, इसे सुनो ॥ १ ॥

शक्रो ह्यज्ञातरूपेण जटी भूत्वा रजोगुणः ।

विरूपं रथमास्थाय प्रश्नं पप्रच्छ शम्बरम् ॥ २ ॥

एक समयकी बात है, देवराज इन्द्र अज्ञातरूपसे रजोगुणसम्पन्न जटाधारी तपस्वी बनकर एक बेडौल रथपर सवार हो शम्बरासुरके पास गये । वहाँ पहुँचकर उन्होंने उससे पूछा ॥ २ ॥

शक्र उवाच

केन शम्बर वृत्तेन स्वजात्यानधितिष्ठसि ।

श्रेष्ठं त्वां केन मन्यन्ते तद् वै प्रब्रूहि तत्त्वतः ॥ ३ ॥

इन्द्र बोले— शम्बरासुर! किस बर्तावसे अपनी जातिवालोंपर शासन करते हो? वे किस कारण तुम्हें सर्वश्रेष्ठ मानते हैं? यह ठीक-ठीक बतलाओ ॥ ३ ॥

शम्बर उवाच

नासूयामि यदा विप्रान् ब्राह्ममेव च मे मतम् ।

शास्त्राणि वदतो विप्रान् सम्मन्यामि यथासुखम् ॥ ४ ॥

शम्बरासुरने कहा- मैं ब्राह्मणोंमें कभी दोष नहीं देखता । उनके मतको ही अपना मत समझता हूँ और शास्त्रोंकी बात बतानेवाले विप्रोंका सदा सम्मान करता हूँ— उन्हें यथासाध्य सुख देनेकी चेष्टा करता हूँ ॥ ४ ॥

श्रुत्वा च नावजानामि नापराध्यामि कर्हिचित् ।

अभ्यर्च्याभ्यनुपृच्छामि पादौ गृह्णामि धीमताम् ॥ ५ ॥

सुनकर उनके वचनोंकी अवहेलना नहीं करता । कभी उनका अपराध नहीं करता ।

उनकी पूजा करके कुशल पूछता हूँ और बुद्धिमान् ब्राह्मणोंके पाँव पकड़ता हूँ ॥ ५ ॥

ते विश्रब्धाः प्रभाषन्ते सम्पृच्छन्ते च मां सदा ।

प्रमत्तेष्वप्रमत्तोऽस्मि सदा सुप्तेषु जागृमि ॥ ६ ॥

पृष्ठ 426

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 426 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ब्राह्मण भी अत्यन्त विश्वस्त होकर मेरे साथ बातचीत करते और मेरी कुशल पूछते हैं। ब्राह्मणोंके असावधान रहनेपर भी मैं सदा सावधान रहता हूँ । उनके सोते रहनेपर भी मैं जागता रहता हूँ ॥ ६ ॥

ते मां शास्त्रपथे युक्तं ब्रह्मण्यमनसूयकम् ।

समासिञ्चन्ति शास्तारः क्षौद्रं मध्विव मक्षिकाः ॥ ७ ॥

मुझे शास्त्रीय मार्गपर चलनेवाला ब्राह्मणभक्त तथा अदोषदर्शी जानकर वे उपदेशक ब्राह्मण मुझे उसी प्रकार सदुपदेशके अमृतसे सींचते रहते हैं जैसे मधुमक्खियाँ मधुके छत्तेको ॥ ७ ॥

यच्च भाषन्ति संतुष्टास्तच्च गृह्णामि मेधया ।

समाधिमात्मनो नित्यमनुलोममचिन्तयम् ॥ ८ ॥

संतुष्ट होकर वे मुझसे जो कुछ कहते हैं उसे मैं अपनी बुद्धिके द्वारा ग्रहण करता हूँ । सदा ब्राह्मणोंमें अपनी निष्ठा बनाये रखता और नित्यप्रति उनके अनुकूल विचार रखता हूँ ॥ ८ ॥

सोऽहं वागग्रमृष्टानां रसानामवलेहकः ।

स्वजात्यानधितिष्ठामि नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ॥ ९ ॥

उनकी वाणीसे जो उपदेशका मधुर रस प्रवाहित होता है उसका मैं आस्वादन करता रहता हूँ । इसीलिये नक्षत्रोंपर चन्द्रमाकी भाँति मैं अपनी जातिवालोंपर शासन करता हूँ ॥ ९ ॥

एतत् पृथिव्याममृतमेतच्चक्षुरनुत्तमम् ।

यद् ब्राह्मणमुखात् शास्त्रमिह श्रुत्वा प्रवर्तते ॥ १० ॥

ब्राह्मणके मुखसे शास्त्रका उपदेश सुनकर इस जीवनमें उसके अनुसार बर्ताव करना ही पृथ्वीपर सर्वोत्तम अमृत और सर्वोत्तम दृष्टि है ॥ १० ॥

एतत् कारणमाज्ञाय दृष्ट्वा देवासुरं पुरा ।

युद्धं पिता मे हृष्टात्मा विस्मितः समपद्यत ॥ ११ ॥

इस कारणको जानकर अर्थात् ब्राह्मणके उपदेशके अनुसार चलना ही अमृत है — इस बातको भलीभाँति समझकर पूर्वकालमें देवासुरसंग्रामको उपस्थित हुआ देख मेरे पिता मन- ही- मन प्रसन्न और विस्मित हुए थे ॥

दृष्ट्वा च ब्राह्मणानां तु महिमानं महात्मनाम् ।

पर्यपृच्छत् कथममी सिद्धा इति निशाकरम् ॥ १२ ॥

महात्मा ब्राह्मणोंकी इस महिमाको देखकर उन्होंने चन्द्रमासे पूछा — ' निशाकर! इन ब्राह्मणोंको किस प्रकार सिद्धि प्राप्त हुई? ' ॥ १२ ॥

सोमउवाच

पृष्ठ 427

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 427 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ब्राह्मणास्तपसा सर्वे सिध्यन्ते वाग्बलाः सदा ।

भुजवीर्याश्च राजानो वागस्त्राश्च द्विजातयः ॥ १३ ॥

चन्द्रमाने कहा – दानवराज! सम्पूर्ण ब्राह्मण तपस्यासे ही सिद्ध हुए हैं । इनका बल सदा इनकी वाणीमें ही होता है । राजाओंका बल उनकी भुजाएँ हैं और ब्राह्मणोंका बल उनकी वाणी ॥ १३ ॥

प्रणवं चाप्यधीयीत ब्राह्मीर्दुर्वसतीर्वसन् ।

निर्मन्युरपि निर्वाणो यदि स्यात् समदर्शनः ॥ १४ ॥

पहले गुरुके घरमें ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए क्लेश सहनपूर्वक निवास करके प्रणवसहित वेदका अध्ययन करना चाहिये । फिर अन्तमें क्रोध त्यागकर शान्तभावसे

संन्यास ग्रहण करना चाहिये । यदि संन्यासी हो तो सर्वत्र समान दृष्टि रखे ॥ १४ ॥

अपि च ज्ञानसम्पन्नः सर्वान् वेदान् पितुर्गृहे ।

श्लाघमान इवाधीयाद् ग्राम्य इत्येव तं विदुः ॥ १५ ॥

जो सम्पूर्ण वेदोंको पिताके घरमें रहकर पढ़ता है वह ज्ञानसम्पन्न और प्रशंसनीय होनेपर भी विद्वानोंके द्वारा ग्रामीण ( गँवार) ही समझा जाता है । ( वास्तवमें गुरुके घरमें क्लेश- सहनपूर्वक रहकर वेद पढ़नेवाला ही श्रेष्ठ है ) ॥ १५ ॥

भूमिरेतौ निगिरति सर्पो बिलशयानिव ।

राजानं चाप्ययोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ १६ ॥

जैसे साँप बिलमें रहनेवाले छोटे जीवोंको निगल जाता है, उसी प्रकार युद्ध न करनेवाले क्षत्रिय और विद्याके लिये प्रवास न करनेवाले ब्राह्मणको यह पृथ्वी निगल जाती है ॥ १६ ॥

अभिमानः श्रियं हन्ति पुरुषस्याल्पमेधसः ।

गर्भेण दुष्यते कन्या गृहवासेन च द्विजः ॥ १७ ॥

मन्दबुद्धि पुरुषके भीतर जो अभिमान होता है वह उसकी लक्ष्मीका नाश करता है । गर्भ धारण करनेसे कन्या दूषित हो जाती है और सदा घरमें रहनेसे ब्राह्मण दूषित समझे जाते हैं ॥ १७ ॥

(विद्याविदो लोकविदः तपोबलसमन्विताः । नित्यपूज्याश्च वन्द्याश्च द्विजा लोकद्वयेच्छुभिः ॥ ) जो इहलोक और परलोक दोनोंको सुधारना चाहते हों, उन्हें विद्वान्, लौकिक बातोंके ज्ञाता, तपस्वी और शक्तिशाली ब्राह्मणोंकी सदा पूजा और वन्दना करनी चाहिये ॥

इत्येतन्मे पिता श्रुत्वा सोमादद्भुतदर्शनात् ।

ब्राह्मणान् पूजयामास तथैवाहं महाव्रतान् ॥ १८ ॥

अद्भुत दर्शनवाले चन्द्रमासे यह बात सुनकर मेरे पिताजीने महान् व्रतधारी ब्राह्मणोंका पूजन किया । वैसे ही मैं भी करता हूँ ॥ १८ ॥

पृष्ठ 428

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 428 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भीष्म उवाच

श्रुत्वैतद् वचनं शक्रो दानवेन्द्रमुखाच्च्युतम् ।

द्विजान् सम्पूजयामास महेन्द्रत्वमवाप च ॥ १ ९ ॥

भीष्मजी कहते हैं - भारत! दानवराज शम्बरके मुखसे यह वचन सुनकर इन्द्रने ब्राह्मणोंका पूजन किया, इससे उन्हें महेन्द्रपदकी प्राप्ति हुई ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्राह्मणप्रशंसायामिन्द्रशम्बरसंवादे षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमेंब्राह्मणकी प्रशंसाके प्रसंगमें इन्द्र और शम्बरासुरका संवादविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २० श्लोक हैं )

पृष्ठ 429

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 429 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तत्रिंशोऽध्यायः दानपात्रकी परीक्षा युधिष्ठिर उवाच

अपूर्वश्च भवेत् पात्रमथवापि चिरोषितः ।

दूरादभ्यागतं चापि किं पात्रं स्यात् पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! दानका पात्र कौन होता है? अपरिचित पुरुष या बहुत दिनोंतक अपने साथ रहा हुआ पुरुष । अथवा किसी दूर देशसे आया हुआ मनुष्य? इनमेंसे किसको दानका उत्तम पात्र समझना चाहिये? ॥ ॥ भीष्म उवाच

क्रिया भवति केषांचिदुपांशुव्रतमुत्तमम् ।

यो यो याचेत यत् किञ्चित् सर्वं दद्याम इत्यपि ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! कितने ही याचकोंका तो यज्ञ, गुरुदक्षिणा या कुटुम्बका भरण- पोषण आदि कार्य ही मनोरथ होता है और किन्हींका उत्तम मौनव्रतसे रहकर निर्वाह करना प्रयोजन होता है । इनमेंसे जो- जो याचक जिस किसी वस्तुकी याचना करे उन सबके लिये यही कहना चाहिये कि ' हम देंगे ' (किसीको निराश नहीं करना चाहिये ) ॥ २ ॥

अपीडयन् भूत्यवर्गमित्येवमनुशुश्रुम ।

पीडयन् भृत्यवर्गं हि आत्मानमपकर्षति ॥ ३ ॥

परंतु हमने सुना है कि 'जिनके भरण- पोषणका अपने ऊपर भार है उस समुदायको कष्ट दिये बिना ही दाताको दान करना चाहिये । जो पोष्यवर्गको कष्ट देकर या भूखे मारकर दान करता है वह अपने आपको नीचे गिराता है ' ॥ ३ ॥

अपूर्वं भावयेत् पात्रं यच्चापि स्याच्चिरोषितम् ।

दूरादभ्यागतं चापि तत्पात्रं च विदुर्बुधाः ॥ ४ ॥

इस दृष्टिसे विचार करनेपर जो पहलेसे परिचित नहीं है या जो चिरकालसे साथ रह चुका है, अथवा जो दूर देशसे आया हुआ है –इन तीनोंको ही विद्वान् पुरुष दान- पात्र समझते हैं ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अपीडया च भूतानां धर्मस्याहिंसया तथा ।

पात्रं विद्यात् तु तत्त्वेन यस्मै दत्तं न संतपेत् ॥ ५ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! किसी प्राणीको पीड़ा न दी जाय और धर्ममें भी बाधा न आने पाये, इस प्रकार दान देना उचित है; परंतु पात्रकी यथार्थ पहचान कैसे हो? जिससे

पृष्ठ 430

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 430 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दिया हुआ दान पीछे संतापका कारण न बने ॥ ५ ॥

भीष्म उवाच

ऋत्विक् पुरोहिताचार्याः शिष्यसम्बन्धिबान्धवाः ।

सर्वे पूज्याश्च मान्याश्च श्रुतवन्तोऽनसूयकाः ॥ ६ ॥

भीष्मजीने कहा- बेटा! ऋत्विक्, पुरोहित, आचार्य, शिष्य, सम्बन्धी, बान्धव, विद्वान् और दोष - दृष्टिसे रहित पुरुष- ये सभी पूजनीय और माननीय हैं ॥ ६ ॥

अतोऽन्यथा वर्तमानाः सर्वे नार्हन्ति सत्क्रियाम् ।

तस्मान्नित्यं परीक्षेत पुरुषान् प्रणिधाय वै ॥ ७ ॥

इनसे भिन्न प्रकारके तथा भिन्न बर्ताववाले जो लोग हैं, वे सब सत्कारके पात्र नहीं हैं; अतः एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन सुपात्र पुरुषोंकी परीक्षा करनी चाहिये ॥

अक्रोधः सत्यवचनमहिंसा दम आर्जवम् ।

अद्रोहोऽनभिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा दमः शमः ॥ ८ ॥

यस्मिन्नेतानि दृश्यन्ते न चाकार्याणि भारत ।

स्वभावतो निविष्टानि तत्पात्रं मानमर्हति ॥ ९ ॥

भारत! क्रोधका अभाव, सत्य भाषण, अहिंसा, इन्द्रियसंयम, सरलता, द्रोहहीनता, अभिमानशून्यता, लज्जा, सहनशीलता, दम और मनोनिग्रह– ये गुण जिनमें स्वभावतः दिखायी दें और धर्मविरुद्ध कार्य दृष्टिगोचर न हों, वे ही दानके उत्तम पात्र और सम्मानके अधिकारी हैं ॥ ८ - ९ ॥

तथा चिरोषितं चापि सम्प्रत्यागतमेव च ।

अपूर्वं चैव पूर्वं च तत्पात्रं मानमर्हति ॥ १० ॥

जो पुरुष बहुत दिनोंतक अपने साथ रहा हो, एवं जो कहींसे तत्काल आया हो, वह पहलेका परिचित हो या अपरिचित, वह दानका पात्र और सम्मानका अधिकारी है ॥ १० ॥

अप्रामाण्यं च वेदानां शास्त्राणां चाभिलङ्घनम् ।

अव्यवस्था च सर्वत्र एतान्नाशनमात्मनः ॥ ११ ॥

वेदोंको अप्रामाणिक मानना, शास्त्रकी आज्ञाका उल्लङ्घन करना तथा सर्वत्र अव्यवस्था फैलाना—ये सब अपना ही नाश करनेवाले हैं ॥ ११ ॥

भवेत् पण्डितमानी यो ब्राह्मणो वेदनिन्दकः ।

आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थिकाम् ॥ १२ ॥

हेतुवादान् ब्रुवन् सत्सु विजेताहेतुवादिकः ।

आक्रोष्टा चातिवक्ता च ब्राह्मणानां सदैव हि ॥ १३ ॥

सर्वाभिशङ्की मूढश्च बालः कटुकवागपि ।