श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 591–600
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 591–600
पृष्ठ 591
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सर्वकामदुघां धेनुं सर्वकामगुणान्विताम् ।
ददाति यः सहस्राक्ष स्वर्गं याति स मानवः ॥ ६३ ॥
सहस्राक्ष! जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली और समस्त मनोवांछित गुणोंसे सम्पन्न कामधेनु - स्वरूपा पृथ्वीका दान करता है, वह मानव स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ६३ ॥
मधुसर्पिःप्रवाहिण्यः पयोदधिवहास्तथा ।
सरितस्तर्पयन्तीह सुरेन्द्र वसुधाप्रदम् ॥ ६४ ॥
देवेन्द्र! यहाँ पृथ्वीदान करनेवाले पुरुषको परलोकमें मधु, घी, दूध और दहीकी धारा बहानेवाली नदियाँ तृप्त करती हैं ॥ ६४ ॥
भूमिप्रदानान्नृपतिर्मुच्यते सर्वकिल्बिषात् ।
न हि भूमिप्रदानेन दानमन्यद् विशिष्यते ॥ ६५ ॥
राजा भूमिदान करनेसे समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है । भूमिदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है ॥ ६५ ॥
ददाति यः समुद्रान्तां पृथिवीं शस्त्रनिर्जिताम् ।
तं जनाः कथयन्तीह यावद् भवति गौरियम् ॥ ६६ ॥
जो समुद्रपर्यना पृथ्वीको शस्त्रोंसे जीतकर दान देता है, उसकी कीर्ति संसारके लोग तबतक गाया करते हैं, जबतक यह पृथ्वी कायम रहती है ॥ ६६ ॥
पुण्यामृद्धिरसां भूमिं यो ददाति पुरंदर ।
न तस्य लोकाः क्षीयन्ते भूमिदानगुणान्विताः ॥ ६७ ॥
पुरंदर! जो परम पवित्र और समृद्धिरूपी रससे भरी हुई पृथ्वीका दान करता है, उसे उस भूदानसम्बन्धी गुणोंसे युक्त अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ॥ ६७ ॥
सर्वदा पार्थिवेनेह सततं भूतिमिच्छता ।
भूर्देया विधिवच्छक्र पाये सुखमभीप्सुना ॥ ६८ ॥
इन्द्र! जो राजा सदा ऐश्वर्य चाहता हो और सुख पानेकी इच्छा रखता हो, वह विधिपूर्वक सुपात्रको भूमिदान दे ॥ ६८ ॥
अपि कृत्वा नरः पापं भूमिं दत्त्वा द्विजातये ।
समुत्सृजति तत् पापं जीर्णां त्वचमिवोरगः ॥ ६ ९ ॥
पाप करके भी यदि मनुष्य ब्राह्मणको भूमिदान कर देता है तो वह उस पापको उसी प्रकार त्याग देता है, जैसे सर्प पुरानी केंचुलको ॥ ६ ९ ॥
सागरान् सरितः शैलान् काननानि च सर्वशः ।
सर्वमेतन्नरः शक्र ददाति वसुधां ददत् ॥ ७० ॥
इन्द्र! मनुष्य पृथ्वीका दान करनेके साथ ही समुद्र, नदी, पर्वत और सम्पूर्ण वन–इन सबका दान कर देता है ( अर्थात् इन सबके दानका फल प्राप्त कर लेता है ) ॥ तडागान्युदपानानि स्रोतांसि च सरांसि च ।
पृष्ठ 592
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
स्नेहान् सर्वरसांश्चैव ददाति वसुधां ददत् ॥ ७१ ॥
इतना ही नहीं, पृथ्वीका दान करनेवाला पुरुष तालाब, कुआँ, झरना, सरोवर, स्नेह ( घृत आदि ) और सब प्रकारके रसोंके दानका भी फल प्राप्त कर लेता है ॥ ७१ ॥
ओषधीर्वीर्यसम्पन्ना नगान् पुष्पफलान्वितान् ।
काननोपलशैलांश्च ददाति वसुधां ददत् ॥ ७२ ॥
पृथ्वीका दान करते समय मनुष्य शक्तिशाली ओषधियों, फल और फूलोंसे भरे हुए वृक्षों, वन, प्रस्तर और पर्वतोंका भी दान कर देता है ॥ ७२ ॥
अग्निष्टोमप्रभृतिभिरिष्ट्वा च स्वाप्तदक्षिणैः ।
न तत्फलमवाप्नोति भूमिदानाद् यदश्नुते ॥ ७३ ॥
बहुत - सी दक्षिणाओंसे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञोंद्वारा यजन करके भी मनुष्य उस फलको नहीं पाता, जो उसे भूमिदानसे मिल जाता है ॥ ७३ ॥
दाता दशानुगृह्णाति दश हन्ति तथा क्षिपन् ।
पूर्वदत्तां हरन् भूमिं नरकायोपगच्छति ॥ ७४ ॥
न ददाति प्रतिश्रुत्य दत्त्वापि च हरेत् तु यः ।
स बद्धो वारुणौः पाशैस्तप्यते मृत्युशासनात् ॥ ७५ ॥
भूमिका दान करनेवाला मनुष्य अपनी दस पीढ़ियोंका उद्धार करता है तथा देकर छीन लेनेवाला अपनी दस पीढ़ियोंको नरकमें ढकेलता है । जो पहलेकी दी हुई भूमिका अपहरण करता है वह स्वयं भी नरकमें जाता है । जो देनेकी प्रतिज्ञा करके नहीं देता है तथा जो देकर भी फिर ले लेता है वह मृत्युकी आज्ञासे वरुणके पाशमें बँधकर तरह- तरहके कष्ट भोगता है ॥ ७४ ॥
आहिताग्निं सदायज्ञं कृशवृत्तिं प्रियातिथिम् ।
ये भजन्ति द्विजश्रेष्ठं नोपसर्पन्ति ते यमम् ॥ ७६ ॥
जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, सदा यज्ञके अनुष्ठानमें लगा रहता और अतिथियोंको प्रिय मानता है तथा जिसकी जीविका - वृत्ति नष्ट हो गयी है, ऐसे श्रेष्ठ द्विजकी जो सेवा करते हैं वे यमराजके पास नहीं जाते ॥ ७६ ॥
ब्राह्मणेष्वनृणीभूतः पार्थिवः स्यात् पुरंदर ।
इतरेषां तु वर्णानां तारयेत् कृशदुर्बलान् ॥ ७७ ॥
पुरंदर! राजाको चाहिये कि वह ब्राह्मणोंके प्रति उऋण रहे अर्थात् उनकी सेवा करके उन्हें संतुष्ट रखे तथा अन्य वर्णोंमें भी जो लोग दीन- दुर्बल हों; उनका संकटसे उद्धार करे ॥ ७७ ॥
नाच्छिन्द्यात् स्पर्शितां भूमिं परेण त्रिदशाधिप ।
ब्राह्मणस्य सुरश्रेष्ठ कृशवृत्तेः कदाचन ॥ ७८ ॥
पृष्ठ 593
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुरश्रेष्ठ! देवेश्वर! जिसकी जीविका- वृत्ति नष्ट हो गयी है, ऐसे ब्राह्मणको दूसरेके द्वारा दानमें मिली हुई जो भूमि है, उसको कभी नहीं छीनना चाहिये ॥ ७८ ॥
यथाश्रु पतितं तेषां दीनानामथ सीदताम् ।
ब्राह्मणानां हृते क्षेत्रे हन्यात् त्रिपुरुषं कुलम् ॥ ७९ ॥
अपना खेत छिन जानेसे दुःखी हुए दीन ब्राह्मण जो आँसू बहाते हैं, वह छीननेवालेकी तीन पीढ़ियोंका नाश कर देता है ॥ ७ ९ ॥
भूमिपालं च्युतं राष्ट्राद् यस्तु संस्थापयेन्नरः ।
तस्य वासः सहस्राक्ष नाकपृष्ठे महीयते ॥ ८० ॥
इन्द्र! जो मनुष्य राज्यसे भ्रष्ट हुए राजाको फिर राजसिंहासनपर बैठा देता है, उसका स्वर्गलोकमें निवास होता है तथा वह वहाँ बड़ा सम्मान पाता है ॥ ८० ॥
इक्षुभिः संततां भूमिं यवगोधूमशालिनीम् ।
गोऽश्ववाहनपूर्णां वा बाहुवीर्यादुपार्जिताम् ॥ ८१ ॥
निधिगर्भां ददद् भूमिं सर्वरत्नपरिच्छदाम् ।
अक्षयाँल्लभते लोकान् भूमिंसत्र हि तस्य तत् ॥ ८२ ॥
जो भूमि गन्नेके वृक्षोंसे आच्छादित हो, जिसपर जौ और गेहूँकी खेती लहलहा रही हो अथवा जहाँ बैल और घोड़े आदि वाहन भरे हों, जिसके नीचे खजाना गड़ा हो तथा जो सब प्रकारके रत्नमय उपकरणोंसे अलंकृत हो, ऐसी भूमिको अपने बाहुबलसे जीतकर जो राजा दान कर देता है, उसे अक्षय लोक प्राप्त होते हैं। उसका वह दान भूमियज्ञ कहलाता है ॥ ८१-८२ ॥
विधूय कलुषं सर्वं विरजाः सम्मतः सताम् ।
लोके महीयते सद्भिर्यो ददाति वसुन्धराम् ॥ ८३ ॥
जो वसुधाका दान करता है, वह अपने सब पापोंका नाश करके निर्मल एवं सत्पुरुषोंके आदरका पात्र हो जाता है तथा लोकमें सज्जन पुरुष सदा ही उसका सत्कार करते हैं ॥ ८३ ॥
यथाप्सु पतितः शक्र तैलबिन्दुर्विसर्पति ।
तथा भूमिकृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते ॥ ८४ ॥
इन्द्र! जैसे जलमें गिरी हुई तेलकी एक बूँद सब ओर फैल जाती है; उसी प्रकार दान की हुई भूमिमें जितना-जितना अन्न पैदा होता है, उतना ही उतना उसके दानका महत्त्व बढ़ता जाता है ॥ ८४ ॥
ये रणाग्रे महीपालाः शूराः समितिशोभनाः ।
वध्यन्तेऽभिमुखाः शक्र ब्रह्मलोकं व्रजन्ति ते ॥ ८५ ॥
देवराज! युद्धमें शोभा पानेवाले जो शूरवीर भूपाल युद्धके मुहानेपर शत्रुके सम्मुख लड़ते हुए मारे जाते हैं, वे ब्रह्मलोकमें जाते हैं ॥ ८५ ॥
पृष्ठ 594
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नृत्यगीतपरा नार्यो दिव्यमाल्यविभूषिताः ।
उपतिष्ठन्ति देवेन्द्र तथा भूमिप्रदं दिवि ॥ ८६ ॥
देवेन्द्र! दिव्य मालाओंसे विभूषित हो नाच और गानमें लगी हुई देवांगनाएँ स्वर्गमें भूमिदाताकी सेवामें उपस्थित होती हैं ॥ ८६ ॥
मोदते च सुखं स्वर्गे देवगन्धर्वपूजितः ।
यो ददाति महीं सम्यग् विधिनेह द्विजातये ॥ ८७ ॥
जो यहाँ उत्तम विधिसे ब्राह्मणको भूमिका दान करता है, वह स्वर्गमें देवताओं और गन्धर्वोंसे पूजित हो सुख और आनन्द भोगता है ॥ ८७ ॥
शतमप्सरसश्चैव दिव्यमाल्यविभूषिताः ।
उपतिष्ठन्ति देवेन्द्र ब्रह्मलोके धराप्रदम् ॥ ८८ ॥
देवराज! भूदान करनेवाले पुरुषकी सेवामें ब्रह्मलोकमें दिव्य मालाओंसे विभूषित सैकड़ों अप्सराएँ उपस्थित होती हैं ॥ ८८ ॥
उपतिष्ठन्ति पुण्यानि सदा भूमिप्रदं नरम् ।
शङ्खभद्रासनं छत्रं वराश्वा वरवाहनम् ॥ ८ ९ ॥
उत्तम भूमिदान करनेवाले मनुष्यके यहाँ सदा पुण्यके फलस्वरूप शंख, सिंहासन, छत्र, घोड़े और श्रेष्ठ वाहन उपस्थित होते हैं ॥ ८ ९ ॥
भूमिप्रदानात् पुष्पाणि हिरण्यनिचयास्तथा ।
आज्ञा सदाप्रतिहता जयशब्दा वसूनि च ॥ ९ ० ॥
भूमिदान करनेसे पुरुषको सुन्दर पुष्प, सोनेके भण्डार, कभी प्रतिहत न होनेवाली आज्ञा, जयसूचक शब्द तथा भाँति- भाँतिके धन - रत्न प्राप्त होते हैं ॥ ९० ॥
भूमिदानस्य पुण्यानि फलं स्वर्गः पुरंदर ।
हिरण्यपुष्पाश्चौषध्यः कुशकाञ्चनशाद्वलाः ॥ ९ १ ॥
पुरंदर! भूमिदानके जो पुण्य हैं, उनके फलरूपमें स्वर्ग, सुवर्णमय फूल देनेवाली ओषधियाँ तथा सुनहरे कुश और घाससे ढकी हुई भूमि प्राप्त होती हैं ॥ ९ १ ॥ अमृतप्रसवां भूमिं प्राप्नोति पुरुषो ददत् ।
नास्ति भूमिसमं दानं नास्ति मातृसमो गुरुः ।
नास्ति सत्यसमो धर्मो नास्ति दानसमो निधिः ॥ ९ २ ॥
भूमिदान करनेवाला पुरुष अमृत पैदा करनेवाली भूमि पाता है, भूमिके समान कोई दान नहीं है, माताके समान कोई गुरु नहीं है, सत्यके समान कोई धर्म नहीं है और दानके समान कोई निधि नहीं है ॥ ९ २ ॥ भीष्म उवाच एतदांगिरसाच्छ्रुत्वा वासवो वसुधामिमाम् ।
पृष्ठ 595
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वसुरत्नसमाकीर्णां ददावांगिरसे तदा ॥ ९ ३ ॥ भीष्मजी कहते हैं – राजन्! बृहस्पतिजीके मुँहसे भूमिदानका यह माहात्म्य सुनकर इन्द्रने धन और रत्नोंसे भरी हुई यह पृथ्वी उन्हें दान कर दी ॥ ९ ३ ॥
य इदं श्रावयेच्छ्राद्धे भूमिदानस्य सम्भवम् ।
न तस्य रक्षसां भागो नासुराणां भवत्युत ॥ ९ ४ ॥
जो पुरुष श्राद्धके समय पृथ्वीदानके इस माहात्म्यको सुनता है, उसके श्राद्धकर्ममें अर्पण किये हुए भाग राक्षस और असुर नहीं लेने पाते ॥ ९ ४ ॥
अक्षयं च भवेद् दत्तं पितृभ्यस्तन्न संशयः ।
तस्माच्छ्राद्धेष्विदं विद्वान् भुञ्जतः श्रावयेद् द्विजान् ॥ १५ ॥
पितरोंके निमित्त उसका दिया हुआ सारा दान अक्षय होता है, इसमें संशय नहीं है; इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह श्राद्धमें भोजन करते हुए ब्राह्मणोंको यह भूमिदानका माहात्म्य अवश्य सुनाये ॥ ९ ५ ॥
इत्येतत् सर्वदानानां श्रेष्ठमुक्तं तवानघ ।
मया भरतशार्दूल किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ९ ६ ॥
निष्पाप भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने सब दानोंमें श्रेष्ठ पृथ्वीदानका माहात्म्य तुम्हें बताया है, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ९ ६ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि इन्द्रबृहस्पतिसंवादे द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवादविषयक बासठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ९ ८३ श्लोक हैं )
पृष्ठ 596
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्रिषष्टितमोऽध्यायः अन्नदानका विशेष माहात्म्य युधिष्ठिर उवाच
कानि दानानि लोकेऽस्मिन् दातुकामो महीपतिः ।
गुणाधिकेभ्यो विप्रेभ्यो दद्यात् भरतसत्तम ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- भरतश्रेष्ठ! जिस राजाको दान करनेकी इच्छा हो, वह इस लोकमें गुणवान् ब्राह्मणोंको किन -किन वस्तुओंका दान करे? ॥ १ ॥
केन तुष्यन्ति ते सद्यः किं तुष्टाः प्रदिशन्ति च ।
शंस मे तन्महाबाहो फलं पुण्यकृतं महत् ॥ २ ॥
किस वस्तुके देनेसे ब्राह्मण तुरन्त प्रसन्न हो जाते हैं? और प्रसन्न होकर क्या देते हैं? महाबाहो! अब मुझे दानजनित महान् पुण्यका फल बताइये ॥ २ ॥
दत्तं किं फलवद् राजन्निह लोके परत्र च ।
भवतः श्रोतुमिच्छामि तन्मे विस्तरतो वद ॥ ३ ॥
राजन्! इहलोक और परलोकमें कौन-सा दान विशेष फल देनेवाला होता है? यह मैं
आपके मुँहसे सुनना चाहता हूँ । आप इस विषयका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
इममर्थं पुरा पृष्टो नारदो देवदर्शनः ।
यदुक्तवानसौ वाक्यं तन्मे निगदतः शृणु ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! यही बात मैंने पहले एक बार देवदर्शी नारदजीसे पूछी थी । उस समय उन्होंने मुझसे जो कुछ कहा था, वही तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ ४ ॥
नारद उवाच
अन्नमेव प्रशंसन्ति देवा ऋषिगणास्तथा ।
लोकतन्त्रं हि संज्ञाश्च सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ॥ ५ ॥
नारदजीने कहा –देवता और ऋषि अन्नकी ही प्रशंसा करते हैं, अन्नसे ही लोकयात्राका निर्वाह होता है । उसीसे बुद्धिको स्फूर्ति प्राप्त होती है तथा उस अन्नमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥ ५ ॥
अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति ।
तस्मादन्नं विशेषेण दातुमिच्छन्ति मानवाः ॥ ६ ॥
अन्नके समान न कोई दान था और न होगा । इसलिये मनुष्य अधिकतर अन्नका ही दान करना चाहते हैं ॥ ६ ॥
पृष्ठ 597
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अन्नमूर्जस्करं लोके प्राणाश्चान्ने प्रतिष्ठिताः ।
अन्नेन धार्यते सर्वं विश्वं जगदिदं प्रभो ॥ ७ ॥
प्रभो! संसारमें अन्न ही शरीरके बलको बढ़ानेवाला है । अन्नके ही आधारपर प्राण टिके हुए हैं और इस सम्पूर्ण जगत्को अन्नने ही धारण कर रखा है ॥ ७ ॥
अन्नाद् गृहस्था लोकेऽस्मिन् भिक्षवस्तापसास्तथा ।
अन्नाद् भवन्ति वै प्राणाः प्रत्यक्षं नात्र संशयः ॥ ८ ॥
इस जगत्में गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा भिक्षा माँगनेवाले भी अन्नसे ही जीते हैं । अन्नसे ही सबके प्राणोंकी रक्षा होती है । इस बातका सबको प्रत्यक्ष अनुभव है, इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥
कुटुम्बिने सीदते च ब्राह्मणाय महात्मने ।
दातव्यं भिक्षवे चान्नामात्मनो भूतिमिच्छता ॥ ९ ॥
अतः अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह अन्नके लिये दुखी, बाल- बच्चोंवाले, महामनस्वी ब्राह्मणको और भिक्षा माँगनेवालेको भी अन्नदान करे ॥ ९ ॥
ब्राह्मणायाभिरूपाय यो दद्यादन्नमर्थिने ।
विदधाति निधिं श्रेष्ठं पारलौकिकमात्मनः ॥ १० ॥
जो याचना करनेवाले सुपात्र ब्राह्मणको अन्नदान देता है, वह परलोकमें अपने लिये एक अच्छी निधि ( खजाना ) बना लेता है ॥ १० ॥
श्रान्तमध्वनि वर्तन्तं वृद्धमर्हमुपस्थितम् ।
अर्चयेद् भूतिमन्विच्छन् गृहस्थो गृहमागतम् ॥ ११ ॥
रास्तेका थका - माँदा बूढ़ा राहगीर यदि घरपर आ जाय तो अपना कल्याण चाहनेवाले गृहस्थको उस आदरणीय अतिथिका आदर करना चाहिये ॥ ११ ॥
क्रोधमुत्पतितं हित्वा सुशीलो वीतमत्सरः ।
अन्नदः प्राप्नुते राजन् दिवि चेह च यत्सुखम् ॥ १२ ॥
राजन्! जो पुरुष मनमें उठे हुए क्रोधको दबाकर और ईर्ष्याको त्यागकर अच्छे शील-स्वभावका परिचय देता हुआ अन्नदान करता है, वह इहलोक और परलोकमें भी सुख पाता है ॥ १२ ॥
नावमन्येदभिगतं न प्रणुद्यात् कदाचन ।
अपि श्वपाके शुनि वा न दानं विप्रणश्यति ॥ १३ ॥
अपने घरपर कोई भी आ जाय, उसका न तो कभी अपमान करना चाहिये और न उसे ताड़ना ही देनी चाहिये; क्योंकि चाण्डाल अथवा कुत्तेको भी दिया हुआ अन्नदान कभी नष्ट नहीं होता ( व्यर्थ नहीं जाता ) ॥ १३ ॥
यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते ।
आर्तायादृष्टपूर्वाय स महद्धर्ममाप्नुयात् ॥ १४ ॥
पृष्ठ 598
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जो मनुष्य कष्टमें पड़े हुए अपरिचित राहीको प्रसन्नतापूर्वक अन्न देता है, उसे महान् धर्मकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥
पितॄन् देवानृषीन् विप्रानतिथींश्च जनाधिप ।
यो नरः प्रीणयत्यन्नैस्तस्य पुण्यफलं महत् ॥ १५ ॥
नरेश्वर! जो देवताओं, पितरों, ऋषियों, ब्राह्मणों और अतिथियोंको अन्न देकर संतुष्ट करता है, उसके पुण्यका फल महान् है ॥ १५ ॥
कृत्वातिपातकं कर्म यो दद्यादन्नमर्थिने ।
ब्राह्मणाय विशेषेण न स पापेन मुह्यते ॥ १६ ॥
जो महान् पाप करके भी याचक मनुष्यको, उसमें भी विशेषतः ब्राह्मणको अन्न देता है, वह अपने पापके कारण मोहमें नहीं पड़ता है ॥ १६ ॥
ब्राह्मणेष्वक्षयं दानमन्नं शूद्रे महाफलम् ।
अन्नदानं हि शूद्रे च ब्राह्मणे च विशिष्यते ॥ १७ ॥
ब्राह्मणको अन्नका दान दिया जाय तो अक्षय फल प्राप्त होता है और शूद्रको भी देनेसे महान् फल होता है; क्योंकि अन्नका दान शूद्रको दिया जाय या ब्राह्मणको, उसका विशेष फल होता है ॥ १७ ॥
न पृच्छेद् गोत्रचरणं स्वाध्यायं देशमेव च ।
भिक्षितो ब्राह्मणेनेह दद्यादन्नं प्रयाचितः ॥ १८ ॥
यदि ब्राह्मण अन्नकी याचना करे तो उससे गोत्र, शाखा, वेदाध्ययन और निवासस्थान आदिका परिचय न पूछे; तुरंत ही उसकी सेवामें अन्न उपस्थित कर दे ॥ १८ ॥
अन्नदस्यान्नवृक्षाश्च सर्वकामफलप्रदाः ।
भवन्ति चेह चामुत्र नृपतेर्नात्र संशयः ॥ १ ९ ॥
जो राजा अन्नका दान करता है, उसके लिये अन्नके पौधे इहलोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण मनोवांछित फल देनेवाले होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ १ ९ ॥
आशंसन्ते हि पितरः सुवृष्टिमिव कर्षकाः ।
अस्माकमपि पुत्रो वा पौत्रो वान्नं प्रदास्यति ॥ २० ॥
जैसे किसान अच्छी वृष्टि मनाया करते हैं, उसी प्रकार पितर भी यह आशा लगाये रहते हैं कि कभी हमलोगोंका पुत्र या पौत्र भी हमारे लिये अन्न प्रदान करेगा ॥ २० ॥
ब्राह्मणो हि महद्भूतं स्वयं देहीति याचति ।
अकामो वा सकामो वा दत्त्वा पुण्यमवाप्नुयात् ॥ २१ ॥
ब्राह्मण एक महान् प्राणी है । यदि वह ' मुझे अन्न दो ' इस प्रकार स्वयं अन्नकी याचना करता है तो मनुष्यको चाहिये कि सकामभावसे या निष्कामभावसे उसे अन्नदान देकर पुण्य प्राप्त करे ॥ २१ ॥
ब्राह्मणः सर्वभूतानामतिथिः प्रसृताग्रभुक् ।
पृष्ठ 599
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विप्रा यदधिगच्छन्ति भिक्षमाणा गृहं सदा ॥ २२ ॥
सत्कृताश्च निवर्तन्ते तदतीव प्रवर्धते ।
महाभागे कुले प्रेत्य जन्म चाप्नोति भारत ॥ २३ ॥
भारत! ब्राह्मण सब मनुष्योंका अतिथि और सबसे पहले भोजन पानेका अधिकारी है । ब्राह्मण जिस घरपर सदा भिक्षा माँगनेके लिये जाते हैं और वहाँसे सत्कार पाकर लौटते हैं, उस घरकी सम्पत्ति अधिक बढ़ जाती है तथा उस घरका मालिक मरनेके बाद महान् सौभाग्यशाली कुलमें जन्म पाता है ॥
दत्त्वा त्वन्नं नरो लोके तथा स्थानमनुत्तमम् ।
नित्यं मिष्टान्नदायी तु स्वर्गे वसति सत्कृतः ॥ २४ ॥
जो मनुष्य इस लोकमें सदा अन्न, उत्तम स्थान और मिष्टान्नका दान करता है, वह देवताओंसे सम्मानित होकर स्वर्गलोकमें निवास करता है ॥ २४ ॥
अन्नं प्राणा नराणां हि सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ।
अन्नदः पशुमान् पुत्री धनवान् भोगवानपि ॥ २५ ॥
प्राणवांश्चापि भवति रूपवांश्च तथा नृप ।
अन्नदः प्राणदो लोके सर्वदः प्रोच्यते तु सः ॥ २६ ॥
नरेश्वर! अन्न ही मनुष्योंके प्राण हैं, अन्नमें ही सब प्रतिष्ठित है, अतः अन्न दान करनेवाला मनुष्य पशु, पुत्र, धन, भोग, बल और रूप भी प्राप्त कर लेता है । जगत्में अन्न दान करनेवाला पुरुष प्राणदाता और सर्वस्व देनेवाला कहलाता है ॥ २५-२६ ॥
अन्नं हि दत्त्वातिथये ब्राह्मणाय यथाविधि ।
प्रदाता सुखमाप्नोति दैवतैश्चापि पूज्यते ॥ २७ ॥
अतिथि ब्राह्मणको विधिपूर्वक अन्नदान करके दाता परलोकमें सुख पाता है और देवता भी उसका आदर करते हैं ॥ २७ ॥
ब्राह्मणो हि महद्भूतं क्षेत्रभूतं युधिष्ठिर ।
उप्यते तत्र यद् बीजं तद्धि पुण्यफलं महत् ॥ २८ ॥
युधिष्ठिर! ब्राह्मण महान् प्राणी एवं उत्तम क्षेत्र है । उसमें जो बीज बोया जाता है, वह महान् पुण्यफल देनेवाला होता है ॥ २८ ॥
प्रत्यक्षं प्रीतिजननं भोक्तुर्दातुर्भवत्युत ।
सर्वाण्यन्यानि दानानि परोक्षफलवन्त्युत ॥ २ ९ ॥
अन्नका दान ही एक ऐसा दान है, जो दाता और भोक्ता, दोनोंको प्रत्यक्षरूपसे संतुष्ट करनेवाला होता है । इसके सिवा अन्य जितने दान हैं, उन सबका फल परोक्ष है ॥ २ ९ ॥
अन्नाद्धि प्रसवं यान्ति रतिरन्नाद्धि भारत ।
धर्मार्थावन्नतो विद्धि रोगनाशं तथान्नतः ॥ ३० ॥
पृष्ठ 600
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भारत! अन्नसे ही संतानकी उत्पत्ति होती है । अन्नसे ही रतिकी सिद्धि होती है । अन्नसे
ही धर्म और अर्थकी सिद्धि समझो । अन्नसे ही रोगोंका नाश होता है ॥ ३० ॥
अन्नं ह्यमृतमित्याह पुराकल्पे प्रजापतिः ।
अन्नं भुवं दिवं खं च सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ॥ ३१ ॥
पूर्वकल्पमें प्रजापतिने अन्नको अमृत बतलाया है । भूलोक, स्वर्ग और आकाश अन्नरूप ही हैं; क्योंकि अन्न ही सबका आधार है ॥ ३१ ॥
अन्नप्रणाशे भिद्यन्ते शरीरे पञ्च धातवः ।
बलं बलवतोऽपीह प्रणश्यत्यन्नहानितः ॥ ३२ ॥
अन्नका आहार न मिलनेपर शरीरमें रहनेवाले पाँचों तत्त्व अलग- अलग हो जाते हैं ।
अन्नकी कमी हो जानेसे बड़े - बड़े बलवानोंका बल भी क्षीण हो जाता है ॥ ३२ ॥
आवाहाश्च विवाहाश्च यज्ञाश्चान्नमृते तथा ।
निवर्तन्ते नरश्रेष्ठ ब्रह्म चात्र प्रलीयते ॥ ३३ ॥
निमन्त्रण, विवाह और यज्ञ भी अन्नके बिना बंद हो जाते हैं । नरश्रेष्ठ! अन्न न हो तो वेदोंका ज्ञान भी भूल जाता है ॥ ३३ ॥
अन्नतः सर्वमेतद्धि यत् किंचित् स्थाणु जंगमम् ।
त्रिषु लोकेषु धर्मार्थमन्नं देयमतो बुधैः ॥ ३४ ॥
यह जो कुछ भी स्थावर- जंगमरूप जगत् है, सब का सब अन्नके ही आधारपर टिका हुआ है । अतः बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि तीनों लोकोंमें धर्मके लिये अन्नका दान अवश्य करें ॥ ३४ ॥
अन्नदस्य मनुष्यस्य बलमोजो यशांसि च ।
कीर्तिश्च वर्धते शश्वत् त्रिषु लोकेषु पार्थिव ॥ ३५ ॥
पृथ्वीनाथ! अन्नदान करनेवाले मनुष्यके बल, ओज, यश और कीर्तिका तीनों लोकोंमें सदा ही विस्तार होता रहता है ॥ ३५ । ।
मेघेषूर्ध्वं संनिधत्ते प्राणानां पवनः पतिः ।
तच्च मेघगतं वारि शक्रो वर्षति भारत ॥ ३६ ॥
भारत! प्राणोंका स्वामी पवन मेघोंके ऊपर स्थित होता है और मेघमें जो जल है, उसे इन्द्र धरतीपर बरसाते हैं ॥ ३६ ॥
आदत्ते च रसान् भौमानादित्यः स्वगभस्तिभिः ।
वायुरादित्यतस्तांश्च रसान् देवः प्रवर्षति ॥ ३७ ॥
सूर्य अपनी किरणोंसे पृथ्वीके रसोंको ग्रहण करते हैं । वायुदेव सूर्यसे उन रसोंको लेकर फिर भूमिपर बरसाते हैं ॥ ३७ ॥
तद् यदा मेघतो वारि पतितं भवति क्षितौ ।
तदा वसुमती देवी स्निग्धा भवति भारत ॥ ३८ ॥