श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 651–660
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 651–660
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सास्यामुष्मिन् पुण्यतीर्था नदी वै ॥ ५३ ॥
' जो मनुष्य किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको सहस्र, शत, दस अथवा पाँच गौओंका उनके अच्छे बछड़ोंसहित दान करता है अथवा एक ही गाय देता है, उसके लिये वह गौ परलोकमें पवित्र तीर्थोंवाली नदी बन जाती है ॥ ५३ ॥
प्राप्त्या पुष्ट्या लोकसंरक्षणेन
गावस्तुल्याः सूर्यपादैः पृथिव्याम् ।
शब्दश्चैकः संततिश्चोपभोगा- स्तस्माद् गोदः सूर्य इवावभाति ॥ ५४ ॥
'प्राप्ति, पुष्टि तथा लोकरक्षा करनेके द्वारा गौएँ इस पृथ्वीपर सूर्यकी किरणोंके समान मानी गयी हैं । एक ही ‘ गो' शब्द धेनु और सूर्य किरणोंका बोधक है । गौओंसे ही संतति और उपभोग प्राप्त होते हैं; अतः गोदान करनेवाला मनुष्य किरणोंका दान करनेवाले सूर्यके ही समान माना जाता है ॥ ५४ ॥
गुरुं शिष्यो वरयेद् गोप्रदाने स वै गन्ता नियतं स्वर्गमेव । विधिज्ञानां सुमहान् धर्म एष विधिं ह्याद्यं विधयः संविशन्ति ॥ ५५ ॥
‘ शिष्य जब गोदान करने लगे, तब उसे ग्रहण करनेके लिये गुरुको चुने । यदि गुरुने वह गोदान स्वीकार कर लिया तो शिष्य निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है । विधिके जाननेवाले पुरुषोंके लिये यह गोदान महान् धर्म है। अन्य सब विधियाँ इस आदि विधिमें ही अन्तर्भूत हो जाती हैं ॥ ५५ ॥
इदं दानं न्यायलब्धं द्विजेभ्यः पात्रे दत्त्वा प्रापयेथाः परीक्ष्य । त्वय्याशंसन्त्यमरा मानवाश्च वयं चापि प्रसृते पुण्यशीले ॥ ५६ ॥
' तुम न्यायके अनुसार गोधन प्राप्त करके पात्रकी परीक्षा करनेके पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उनका दान कर देना और दी हुई वस्तुको ब्राह्मणके घर पहुँचा देना । तुम पुण्यात्मा और पुण्यकार्यमें प्रवृत्त रहनेवाले हो; अतः देवता, मनुष्य तथा हमलोग तुमसे धर्मकी ही आशा रखते हैं ' ॥ ५६ ॥
इत्युक्तोऽहं धर्मराजं द्विजर्षे धर्मात्मानं शिरसाभिप्रणम्य । अनुज्ञातस्तेन वैवस्वतेन प्रत्यागमं भगवत्पादमूलम् ॥ ५७ ॥
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ब्रह्मर्षे! धर्मराजके ऐसा कहनेपर मैंने उन धर्मात्मा देवताको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और फिर उनकी आज्ञा लेकर मैं आपके चरणोंके समीप लौट आया ॥ ५७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि यमवाक्यं नाम एकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें यमराजका वाक्य नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ७१ ॥
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द्विसप्ततितमोऽध्यायः गौओंके लोक और गोदानविषयक युधिष्ठिर और इन्द्रके प्रश्न युधिष्ठिर उवाच
उक्तं ते गोप्रदानं वै नाचिकेतमृषिं प्रति ।
माहात्म्यमपि चैवोक्तमुद्देशेन गवां प्रभो ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा – प्रभो! आपने नाचिकेत ऋषिके प्रति किये गये गोदानसम्बन्धी उपदेशकी चर्चा की और गौओंके माहात्म्यका भी संक्षेपसे वर्णन किया ॥ १ ॥
नृगेण च महद्दुःखमनुभूतं महात्मना ।
एकापराधादज्ञानात् पितामह महामते ॥ २ ॥
महामते पितामह! महात्मा राजा नृगने अनजानमें किये हुए एकमात्र अपराधके कारण महान् दुःख भोगा था ॥ २ ॥
द्वारवत्यां यथा चासौ निविशन्त्यां समुद्धृतः ।
मोक्षहेतुरभूत् कृष्णस्तदप्यवधृतं मया ॥ ३ ॥
जब द्वारकापुरी बसने लगी थी, उस समय उनका उद्धार हुआ और उनके उस उद्धारमें
हेतु हुए भगवान् श्रीकृष्ण । ये सारी बातें मैंने ध्यानसे सुनी और समझी हैं ॥ ३ ॥
किं त्वस्ति मम संदेहो गवां लोकं प्रति प्रभो ।
तत्त्वतः श्रोतुमिच्छामि गोदा यत्र वसन्त्युत ॥ ४ ॥
परन्तु प्रभो! मुझे गोलोकके सम्बन्धमें कुछ संदेह है; अतः गोदान करनेवाले मनुष्य जिस लोकमें निवास करते हैं, उसका मैं यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ ४ ॥
भीष्मउवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथापृच्छत् पद्मयोनिमेतदेव शतक्रतुः ॥ ५ ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! इस विषय में जानकार लोग एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं । जैसा कि इन्द्रने किसी समय ब्रह्माजीसे यही प्रश्न किया था ॥ ५ ॥
शक्र उवाच
स्वर्लोकवासिनां लक्ष्मीमभिभूय स्वयार्चिषा ।
गोलोकवासिनः पश्ये व्रजतः संशयोऽत्र मे ॥ ६ ॥
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इन्द्रने पूछा— भगवन्! मैं देखता हूँ कि गोलोक- निवासी पुरुष अपने तेजसे स्वर्गवासियोंकी कान्ति फीकी करते हुए उन्हें लाँघकर चले जाते हैं; अतः मेरे मनमें यहाँ यह संदेह होता है ॥ ६ ॥
इन्द्रका ब्रह्माजीके साथ गौओंके सम्बन्धमें प्रश्नोत्तर
कीदृशा भगवँल्लोका गवां तद् ब्रूहि मेऽनघ ।
यानावसन्ति दातार एतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ७ ॥
भगवन्! गौओंके लोक कैसे हैं? अनघ! यह मुझे बताइये । गोदान करनेवाले लोग जिन लोकोंमें निवास करते हैं, उनके विषयमें निम्नांकित बातें जानना चाहता हूँ ॥ ७ ॥
कीदृशाः किंफलाः किंस्वित् परमस्तत्र को गुणः ।
कथं च पुरुषास्तत्र गच्छन्ति विगतज्वराः ॥ ८ ॥
वे लोक कैसे हैं? वहाँ क्या फल मिलता है? वहाँका सबसे महान् गुण क्या है? गोदान करनेवाले मनुष्य सब चिन्ताओंसे मुक्त होकर वहाँ किस प्रकार पहुँचते हैं? ॥ ८ ॥
कियत्कालं प्रदानस्य दाता च फलमश्नुते ।
कथं बहुविधं दानं स्यादल्पमपि वा कथम् ॥ ९ ॥
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दाताको गोदानका फल वहाँ कितने समयतक भोगनेको मिलता है? अनेक प्रकारका दान कैसे किया जाता है? अथवा थोड़ा - सा भी दान किस प्रकार सम्भव होता है? ॥ ९ ॥
बह्वीनां कीदृशं दानमल्पानां वापि कीदृशम् ।
अदत्त्वा गोप्रदाः सन्ति केन वा तच्च शंस मे ॥ १० ॥
बहुत - सी गौओंका दान कैसा होता है? अथवा थोड़ी - सी गौओंका दान कैसा माना जाता है? गोदान न करके भी लोग किस उपायसे गोदान करनेवालोंके समान हो जाते हैं? यह मुझे बताइये ॥ १० ॥
कथं वा बहुदाता स्यादल्पदात्रा समः प्रभो ।
अल्पप्रदाता बहुदः कथं स्वित् स्यादिहेश्वर ॥ ११ ॥
प्रभो! बहुत दान करनेवाला पुरुष अल्प दान करनेवालेके समान कैसे हो जाता है? तथा सुरेश्वर! अल्प दान करनेवाला पुरुष बहुत दान करनेवालेके तुल्य किस प्रकार हो जाता है? ॥ ११ ॥
कीदृशी दक्षिणा चैव गोप्रदाने विशिष्यते ।
एतत् तथ्येन भगवन् मम शंसितुमर्हसि ॥ १२ ॥
भगवन्! गोदानमें कैसी दक्षिणा श्रेष्ठ मानी जाती है? यह सब यथार्थरूपसे मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानसम्बन्धी बहत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ७२ ॥
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त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गोदानकी महिमा बताना पितामह उवाच
योऽयं प्रश्नस्त्वया पृष्टो गोप्रदानादिकारितः ।
नास्ति प्रष्टास्ति लोकेऽस्मिंस्त्वत्तोऽन्यो हि शतक्रतो ॥ १ ॥
ब्रह्माजीने कहा – देवेन्द्र! गोदानके सम्बन्धमें तुमने जो यह प्रश्न उपस्थित किया है, तुम्हारे सिवा इस जगत्में दूसरा कोई ऐसा प्रश्न करनेवाला नहीं है ॥ १ ॥
सन्ति नानाविधा लोका यांस्त्वं शक्र न पश्यसि ।
पश्यामि यानहं लोकानेकपत्न्यश्च याः स्त्रियः ॥ २ ॥
शक्र! ऐसे अनेक प्रकारके लोक हैं, जिन्हें तुम नहीं देख पाते हो । मैं उन लोकोंको देखता हूँ और पतिव्रता स्त्रियाँ भी उन्हें देख सकती हैं ॥ २ ॥
कर्मभिश्चापि सुशुभैः सुव्रता ऋषयस्तथा ।
सशरीरा हि तान् यान्ति ब्राह्मणाः शुभबुद्धयः ॥ ३ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि तथा शुभ बुद्धिवाले ब्राह्मण अपने शुभकर्मोंके प्रभावसे वहाँ सशरीर चले जाते हैं ॥ ३ ॥
शरीरन्यासमोक्षेण मनसा निर्मलेन च ।
स्वप्नभूतांश्च ताँल्लोकान् पश्यन्तीहापि सुव्रताः ॥ ४ ॥
श्रेष्ठ व्रतके आचरणमें लगे हुए योगी पुरुष समाधि - अवस्थामें अथवा मृत्युके समय जब शरीरसे सम्बन्ध त्याग देते हैं, तब अपने शुद्ध चित्तके द्वारा स्वप्नकी भाँति दीखनेवाले उन लोकोंका यहाँसे भी दर्शन करते हैं ॥ ४ ॥
ते तु लोकाः सहस्राक्ष शृणु यादृग्गुणान्विताः ।
न तत्र क्रमते कालो न जरा न च पावकः ॥ ५ ॥
सहस्राक्ष! वे लोक जैसे गुणोंसे सम्पन्न हैं, उनका वर्णन सुनो । वहाँ काल और
बुढ़ापाका आक्रमण नहीं होता । अग्निका भी जोर नहीं चलता ॥ ५ ॥
तथा नास्त्यशुभं किंचिन्न व्याधिस्तत्र न क्लमः ।
यद् यच्च गावो मनसा तस्मिन् वाञ्छन्ति वासव ॥ ६ ॥
तत् सर्वं प्राप्नुवन्ति स्म मम प्रत्यक्षदर्शनात् ।
कामगाः कामचारिण्यः कामात् कामांश्च भुञ्जते ॥ ७ ॥
वहाँ किसीका किंचिन्मात्र भी अमंगल नहीं होता । उस लोकमें न रोग है न शोक । इन्द्र! वहाँकी गौएँ अपने मनमें जिस- जिस वस्तुकी इच्छा करती हैं, वे सब उन्हें प्राप्त हो जाती हैं,
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यह मेरी प्रत्यक्ष देखी हुई बात है । वे जहाँ जाना चाहती हैं जाती हैं; जैसे चलना चाहती हैं चलती हैं और संकल्पमात्रसे सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्तकर उनका उपभोग करती हैं ॥ ६-७ ॥
वाप्यः सरांसि सरितो विविधानि वनानि च ।
गृहाणि पर्वताश्चैव यावद्द्द्रव्यं च किंचन ॥ ८ ॥
बावड़ी, तालाब, नदियाँ, नाना प्रकारके वन, गृह और पर्वत आदि सभी वस्तुएँ वहाँ उपलब्ध हैं ॥ ८ ॥
मनोज्ञं सर्वभूतेभ्यः सर्वतन्त्रं प्रदृश्यत ।
ईदृशाद् विपुलाल्लोकान्नास्ति लोकस्तथाविधः ॥ ९ ॥
गोलोक समस्त प्राणियोंके लिये मनोहर है । वहाँकी प्रत्येक वस्तुपर सबका समान
अधिकार देखा जाता है । इतना विशाल दूसरा कोई लोक नहीं है ॥ ९ ॥
तत्र सर्वसहाः क्षान्ता वत्सला गुरुवर्तिनः ।
अहंकारैर्विरहिता यान्ति शक्र नरोत्तमाः ॥ १० ॥
इन्द्र! जो सब कुछ सहनेवाले, क्षमाशील, दयालु, गुरुजनोंकी आज्ञामें रहनेवाले और अहंकाररहित हैं, वे श्रेष्ठ मनुष्य ही उस लोकमें जाते हैं ॥ १० ॥
यः सर्वमांसानि न भक्षीत पुमान् सदा भावितो धर्मयुक्तः । मातापित्रोरर्चिता सत्ययुक्तः शुश्रूषिता ब्राह्मणानामनिन्द्यः ॥ ११ ॥
अक्रोधनो गोषु तथा द्विजेषु धर्मे रतो गुरुशुश्रूषकश्च । यावज्जीवं सत्यवृत्ते रतश्च दाने तो यः क्षमी चापराधे ॥ १२ ॥
मृदुर्दान्तो देवपरायणश्च सर्वातिथिश्चापि तथा दयावान् । ईदृग्गुणो मानवस्तं प्रयाति लोकं गवां शाश्वतं चाव्ययं च ॥ १३ ॥
जो सब प्रकारके मांसोंका भोजन त्याग देता है, सदा भगवच्चिन्तनमें लगा रहता है, धर्मपरायण होता है, माता- पिताकी पूजा करता, सत्य बोलता, ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहता, जिसकी कभी निन्दा नहीं होती, जो गौओं और ब्राह्मणोंपर कभी क्रोध नहीं करता, धर्ममें अनुरक्त रहकर गुरुजनोंकी सेवा करता है, जीवनभरके लिये सत्यका व्रत ले लेता है, दानमें प्रवृत्त रहकर किसीके अपराध करनेपर भी उसे क्षमा कर देता है, जिसका स्वभाव मृदुल है, जो जितेन्द्रिय, देवाराधक, सबका आतिथ्य सत्कार करनेवाला और दयालु है, ऐसे ही गुणोंवाला मनुष्य उस सनातन एवं अविनाशी गोलोकमें जाता है ॥ ११–१३ ॥
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न पारदारी पश्यति लोकमेतं न वै गुरुघ्नो न मृषा सम्प्रलापी । सदा प्रवादी ब्राह्मणेष्वात्तवैरो दोषैरेतैर्यश्च युक्तो दुरात्मा ॥ १४ ॥
न मित्रध्रुङ्नैकृतिकः कृतघ्नः शठोऽनृजुर्धर्मविद्वेषकश्च । न ब्रह्महा मनसापि प्रपश्येद् गवां लोकं पुण्यकृतां निवासम् ॥ १५ ॥
परस्त्रीगामी, गुरुहत्यारा, असत्यवादी, सदा बकवाद करनेवाला, ब्राह्मणोंसे वैर बाँध रखनेवाला, मित्रद्रोही, ठग, कृतघ्न, शठ, कुटिल, धर्मद्वेषी और ब्रह्महत्यारा –इन सब दोषोंसे युक्त दुरात्मा मनुष्य कभी मनसे भी गोलोकका दर्शन नहीं पा सकता; क्योंकि वहाँ पुण्यात्माओंका निवास है ॥ १४-१५ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं निपुणेन सुरेश्वर ।
गोप्रदानरतानां तु फलं शृणु शतक्रतो ॥ १६ ॥
सुरेश्वर! शतक्रतो! यह सब मैंने तुम्हें विशेषरूपसे गोलोकका माहात्म्य बताया है । अब गोदान करनेवालोंको जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो ॥ १६ ॥
दायाद्यलब्धैरर्थैर्यो गाः क्रीत्वा सम्प्रयच्छति ।
धर्मार्जितान् धनैः क्रीतान् स लोकानाप्नुतेऽक्षयान् ॥ १७ ॥
जो पुरुष अपनी पैतृक सम्पत्तिसे प्राप्त हुए धनके द्वारा गौएँ खरीदकर उनका दान करता है, वह उस धनसे धर्मपूर्वक उपार्जित हुए अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ॥ १७ ॥
यो वै द्यूते धनं जित्वा गाः क्रीत्वा सम्प्रयच्छति ।
स दिव्यमयुतं शक्र वर्षाणां फलमश्नुते ॥ १८ ॥
शक्र! जो जूएमें धन जीतकर उसके द्वारा गायोंको खरीदता है और उनका दान करता है, वह दस हजार दिव्य वर्षोंतक उसके पुण्यफलका उपभोग करता है ॥ १८ ॥
दायाद्याद् याः स्म वै गावो न्यायपूर्वैरुपार्जिताः ।
प्रदद्यात् ताः प्रदातॄणां सम्भवन्त्यपि च ध्रुवाः ॥ १ ९ ॥
जो पैतृक- सम्पत्तिसे न्यायपूर्वक प्राप्त की हुई गौओंका दान करता है, ऐसे दाताओंके लिये वे गौएँ अक्षय फल देनेवाली हो जाती हैं ॥ १ ९ ॥
प्रतिगृह्य तु यो दद्याद् गाः संशुद्धेन चेतसा ।
तस्यापीहाक्षयाल्लोँकान् ध्रुवान् विद्धि शचीपते ॥ २० ॥
शचीपते! जो पुरुष दानमें गौएँ लेकर फिर शुद्ध हृदयसे उनका दान कर देता है, उसे भी यहाँ अक्षय एवं अटल लोकोंकी प्राप्ति होती है — यह निश्चितरूपसे समझ लो ॥ २० ॥
जन्मप्रभृति सत्यं च यो ब्रूयान्नियतेन्द्रियः ।
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गुरुद्विजसहः क्षान्तस्तस्य गोभिः समा गतिः ॥ २१ ॥
जो जन्मसे ही सदा सत्य बोलता, इन्द्रियोंको काबूमें रखता, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंकी
कठोर बातोंको भी सह लेता और क्षमाशील होता है, उसकी गौओंके समान गति होती है ।
अर्थात् वह गोलोकमें जाता है ॥ २१ ॥
न जातु ब्राह्मणो वाच्यो यदवाच्यं शचीपते ।
मनसा गोषु न द्रुह्येद् गोवृत्तिर्गोऽनुकल्पकः ॥ २२ ॥
सत्ये धर्मे च निरतस्तस्य शक्र फलं शृणु ।
गोसहस्रेण समिता तस्य धेनुर्भवत्युत ॥ २३ ॥
शचीपते शक्र! ब्राह्मणके प्रति कभी कुवाच्य नहीं बोलना चाहिये और गौओंके प्रति कभी मनसे भी द्रोहका भाव नहीं रखना चाहिये । जो ब्राह्मण गौओंके समान वृत्तिसे रहता है और गौओंके लिये घास आदिकी व्यवस्था करता है, साथ ही सत्य और धर्ममें तत्पर रहता है, उसे प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन सुनो । वह यदि एक गौका भी दान करे तो उसे एक हजार गोदानके समान फल मिलता है ॥ २२-२३ ॥
क्षत्रियस्य गुणैरेतैरपि तुल्यफलं शृणु ।
तस्यापि द्विजतुल्या गौर्भवतीति विनिश्चयः ॥ २४ ॥
यदि क्षत्रिय भी इन गुणोंसे युक्त होता है तो उसे भी ब्राह्मणके समान ही (गोदानका ) फल मिलता है । इस बातको अच्छी तरह सुन लो । उसकी ( दान दी हुई ) गौ भी ब्राह्मणकी
गौके तुल्य ही फल देनेवाली होती है । यह धर्मात्माओंका निश्चय है ॥ २४ ॥
वैश्यस्यैते यदि गुणास्तस्य पञ्चशतं भवेत् ।
शूद्रस्यापि विनीतस्य चतुर्भागफलं स्मृतम् ॥ २५ ॥
यदि वैश्यमें भी उपर्युक्त गुण हों तो उसे भी एक गोदान करनेपर ब्राह्मणकी अपेक्षा ( आधे भाग ) पाँच सौ गौओंके दानका फल मिलता है और विनयशील शूद्रको ब्राह्मणके चौथाई भाग अर्थात् ढाई सौ गौओंके दानका फल प्राप्त होता है ॥ २५ ॥
एतच्चैनं योऽनुतिष्ठेत युक्तः सत्ये रतो गुरुशुश्रूषया च । दक्षः क्षान्तो देवतार्थी प्रशान्तः शुचिर्बुद्धो धर्मशीलोऽनहंवाक् ॥ २६ ॥
महत् फलं प्राप्यते स द्विजाय दत्त्वा दोग्ध्रीं विधिनानेन धेनुम् । जो पुरुष सदा सावधान रहकर इस उपर्युक्त धर्मका पालन करता तथा जो सत्यवादी, गुरुसेवापरायण, दक्ष, क्षमाशील, देवभक्त, शान्तचित्त, पवित्र, ज्ञानवान्, धर्मात्मा और अहंकारशून्य होता है, वह यदि पूर्वोक्त विधिसे ब्राह्मणको दूध देनेवाली गायका दान करे तो उसे महान् फलकी प्राप्ति होती है ॥ २६३ ॥
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नित्यं दद्यादेकभक्तः सदा च सत्ये स्थितो गुरुशुश्रूषिता च ॥ २७ ॥
वेदाध्यायी गोषु यो भक्तिमांश्च नित्यं दत्त्वा योऽभिनन्देत गाश्च । आजातितो यश्च गवां नमेत इदं फलं शक्र निबोध तस्य ॥ २८ ॥
इन्द्र! जो सदा एक समय भोजन करके नित्य गोदान करता है, सत्यमें स्थित होता है, गुरुकी सेवा और वेदोंका स्वाध्याय करता है, जिसके मनमें गौओंके प्रति भक्ति है, जो गौओंका दान देकर प्रसन्न होता है तथा जन्मसे ही गौओंको प्रणाम करता है, उसको मिलनेवाले इस फलका वर्णन सुनो ॥ २७-२८ ॥ यत् स्यादिष्ट्वा राजसूये फलं तु यत् स्यादिष्ट्वा बहुना काञ्चनेन । एतत् तुल्यं फलमप्याहुरग्रयं सर्वे सन्तस्त्वृषयो ये च सिद्धाः ॥ २ ९ ॥ राजसूय यज्ञका अनुष्ठान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है तथा बहुत- से सुवर्णकी दक्षिणा देकर यज्ञ करनेसे जो फल मिलता है, उपर्युक्त मनुष्य भी उसके समान ही उत्तम फलका भागी होता है । यह सभी सिद्ध - संत - महात्मा एवं ऋषियोंका कथन है ॥ २ ९ ॥ योऽग्रं भक्तं किंचिदप्राश्य दद्याद् गोभ्यो नित्यं गोव्रती सत्यवादी । शान्तोऽलुब्धो गोसहस्रस्य पुण्यं संवत्सरेणाप्नुयात् सत्यशीलः ॥ ३० ॥
जो गोसेवाका व्रत लेकर प्रतिदिन भोजनसे पहले गौओंको गोग्रास अर्पण करता है तथा शान्त एवं निर्लोभ होकर सदा सत्यका पालन करता रहता है, वह सत्य- शील पुरुष प्रतिवर्ष एक सहस्र गोदान करनेके पुण्यका भागी होता है ॥ ३० ॥
यदेकभक्तमश्नीयाद् दद्यादेकं गवां च यत् ।
दशवर्षाण्यनन्तानि गोव्रती गोऽनुकम्पकः ॥ ३१ ॥
जो गोसेवाका व्रत लेनेवाला पुरुष गौओंपर दया करता और प्रतिदिन एक समय भोजन करके एक समयका अपना भोजन गौओंको दे देता है, इस प्रकार दस वर्षोंतक गोसेवामें तत्पर रहनेवाले पुरुषको अनन्त सुख प्राप्त होते हैं ॥ ३१ ॥
एकेनैव च भक्तेन यः क्रीत्वा गां प्रयच्छति ।
यावन्ति तस्या रोमाणि सम्भवन्ति शतक्रतो ॥ ३२ ॥
तावत् प्रदानात् स गवां फलमाप्नोति शाश्वतम् ।