श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 661–670

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 661–670

पृष्ठ 661

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शतक्रतो! जो एक समय भोजन करके दूसरे समयके बचाये हुए भोजनसे गाय खरीदकर उसका दान करता है, वह उस गौके जितने रोएँ होते हैं, उतने गौओंके दानका अक्षय फल पाता है ॥ ३२ ॥

ब्राह्मणस्य फलं हीदं क्षत्रियस्य तु वै शृणु ॥ ३३ ॥

पञ्चवार्षिकमेवं तु क्षत्रियस्य फलं स्मृतम् ।

ततोऽर्धेन तु वैश्यस्य शूद्रो वैश्यार्धतः स्मृतः ॥ ३४ ॥

यह ब्राह्मणके लिये फल बताया गया । अब क्षत्रियको मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो । यदि क्षत्रिय इसी प्रकार पाँच वर्षोंतक गौकी आराधना करे तो उसे वही फल प्राप्त होता है । उससे आधे समयमें वैश्यको और उससे भी आधे समयमें शूद्रको उसी फलकी प्राप्ति बतायी गयी है ॥ ३३-३४ ॥

यश्चात्मविक्रयं कृत्वा गाः क्रीत्वा सम्प्रयच्छति ।

यावत् संदर्शयेद् गां वै स तावत् फलमश्नुते ॥ ३५ ॥

जो अपने आपको बेचकर भी गायको खरीदकर उसका दान करता है, वह ब्रह्माण्डमें जबतक गोजातिकी सत्ता देखता है, तबतक उस दानका अक्षय फल भोगता रहता ॥ ३५ ॥

रोम्णि रोम्णि महाभाग लोकाश्चास्याऽक्षयाःस्मृताः ।

संग्रामेष्वर्जयित्वा तु यो वै गाः सम्प्रयच्छति ।

आत्मविक्रयतुल्यास्ताः शाश्वता विद्धि कौशिक ॥ ३६ ॥

महाभाग इन्द्र! गौओंके रोम- रोममें अक्षय लोकोंकी स्थिति मानी गयी है । जो संग्राममें गौओंको जीतकर उनका दान कर देता है, उनके लिये वे गौएँ स्वयं अपनेको बेचकर लेकर दी हुई गौओंके समान अक्षय फल देनेवाली होती हैं - इस बातको तुम जान लो ॥ ३६ ॥

अभावे यो गवां दद्यात् तिलधेनुं यतव्रतः ।

दुर्गात् स तारितो धेन्वा क्षीरनद्यां प्रमोदते ॥ ३७ ॥

जो संयम और नियमका पालन करनेवाला पुरुष गौओंके अभावमें तिलधेनुका दान करता है, वह उस धेनुकी सहायता पाकर दुर्गम संकटसे पार हो जाता है तथा दूधकी धारा बहानेवाली नदीके तटपर रहकर आनन्द भोगता है ॥ ३७ ॥

न त्वेवासां दानमात्रं प्रशस्तं पात्र कालो गोविशेषो विधिश्च । कालज्ञानं विप्र गवान्तरं हि दुःखं ज्ञातुं पावकादित्यभूतम् ॥ ३८ ॥

केवल गौओंका दानमात्र कर देना प्रशंसाकी बात नहीं है; उसके लिये उत्तम पात्र, उत्तम समय, विशिष्ट गौ, विधि और कालका ज्ञान आवश्यक है । विप्रवर! गौओंमें जो

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परस्पर तारतम्य है, उसको तथा अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी पात्रको जानना बहुत ही कठिन है ॥ ३८ ॥

स्वाध्यायाढ्यं शुद्धयोनिं प्रशान्तं वैतानस्थं पापभीरुं बहुज्ञम् । गोषु क्षान्तं नातितीक्ष्णं शरण्यं वृत्तिग्लानं तादृशं पात्रमाहुः ॥ ३ ९ ॥ जो वेदोंके स्वाध्यायसे सम्पन्न, शुद्ध कुलमें उत्पन्न, शान्तस्वभाव, यज्ञपरायण, पापभीरु और बहुज्ञ है, जो गौओंके प्रति क्षमाभाव रखता है, जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा नहीं है, जो गौओंकी रक्षा करनेमें समर्थ और जीविकासे रहित है, ऐसे ब्राह्मणको गोदानका उत्तम पात्र बताया गया है ॥ ३ ९ ॥ वृत्तिग्लाने सीदति चातिमात्रं कृष्यर्थे वा होम्यहेतोः प्रसूतेः । गुर्वर्थं वा बालसंवृद्धये वा धेनुं दद्याद् देशकालेऽविशिष्टे ॥ ४० ॥

जिसकी जीविका क्षीण हो गयी हो तथा जो अत्यन्त कष्ट पा रहा हो, ऐसे ब्राह्मणको सामान्य देश- कालमें भी दूध देनेवाली गायका दान करना चाहिये । इसके सिवा खेतीके लिये, होम- सामग्रीके लिये, प्रसूता स्त्रीके पोषणके लिये, गुरुदक्षिणाके लिये अथवा शिशु-पालनके लिये सामान्य देश- कालमें भी दुधारू गायका दान करना उचित है ॥ ४० ॥

अन्तर्ज्ञाताः सक्रयज्ञानलब्धाः प्राणैः क्रीतास्तेजसा यौतकाश्च । कृच्छ्रोत्सृष्टाः पोषणाभ्यागताश्च द्वारैरेतैर्गोविशेषाः प्रशस्ताः ॥ ४१ ॥

गर्भिणी, खरीदकर लायी हुई, ज्ञान या विद्याके बलसे प्राप्त की हुई, दूसरे प्राणियोंके बदलेमें लायी हुई अथवा युद्धमें पराक्रम प्रकट करके प्राप्त की हुई, दहेजमें मिली हुई, पालनमें कष्ट समझकर स्वामीके द्वारा परित्यक्त हुई तथा पालन - पोषणके लिये अपने पास आयी हुई विशिष्ट गौएँ इन उपर्युक्त कारणोंसे ही दानके लिये प्रशंसनीय मानी गयी हैं ॥ ४१ ॥

बलान्विताः शीलवयोपपन्नाः सर्वाः प्रशंसन्ते सुगन्धवत्यः । यथा हि गंगा सरितां वरिष्ठा तथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा ॥ ४२ ॥

हृष्ट- पुष्ट, सीधी - सादी, जवान और उत्तम गन्धवाली सभी गौएँ प्रशंसनीय मानी गयी हैं । जैसे गंगा सब नदियोंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कपिला गौ सब गौओंमें उत्तम है ॥

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तिस्रो रात्रीस्त्वद्भिरुपोष्य भूमौ

तृप्ता गावस्तर्पितेभ्यः प्रदेयाः ।

वत्सैः पुष्टैः क्षीरपैः सुप्रचारा- स्त्र्यहं दत्त्वा गोरसैर्वर्तितव्यम् ॥ ४३ ॥

( गोदानकी विधि इस प्रकार है - ) दाता तीन राततक उपवास करके केवल पानीके आधारपर रहे, पृथ्वीपर शयन करे और गौओंको घास- भूसा खिलाकर पूर्ण तृप्त करे । तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे संतुष्ट करके उन्हें वे गौएँ दे । उन गौओंके साथ दूध पीनेवाले हृष्ट - पुष्ट बछड़े भी होने चाहिये तथा वैसी ही स्फूर्तियुक्त गौएँ भी हों । गोदान करनेके पश्चात् तीन दिनोंतक केवल गोरस पीकर रहना चाहिये ॥ ४३ ॥

दत्त्वा धेनुं सुव्रतां साधुदोहां कल्याणवत्सामपलायिनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावन्ति वर्षाणि भवन्त्यमुत्र ॥ ४४ ॥

सीधी - सूधी हो, सुगमतासे अच्छी तरह दूध दुहा लेती हो, जिसका बछड़ा भी सुन्दर हो तथा जो बन्धन तुड़ाकर भागनेवाली न हो, ऐसी गौका दान करनेसे उसके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक दाता परलोकमें सुख भोगता है ॥ ४४ ॥

तथानड्वाहं ब्राह्मणाय प्रदाय धुर्यं युवानं बलिनं विनीतम् । हलस्य वोढारमनन्तवीर्यं प्राप्नोति लोकान् दशधेनुदस्य ॥ ४५ ॥

जो मनुष्य ब्राह्मणको बोझ उठानेमें समर्थ, जवान, बलिष्ठ, विनीत - सीधा- सादा, हल खींचनेवाला और अधिक शक्तिशाली बैल दान करता है, वह दस धेनु दान करनेवालेके लोकोंमें जाता है ॥ ४५ ॥

कान्तारे ब्राह्मणान् गाश्च यः परित्राति कौशिक ।

क्षणेन विप्रमुच्येत तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ ४६ ॥

इन्द्र! जो दुर्गम वनमें फँसे हुए ब्राह्मण और गौओंका उद्धार करता है, वह एक ही क्षणमें समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा उसे जिस पुण्यफलकी प्राप्ति होती है, वह भी सुन लो ॥ ४६ ॥

अश्वमेधक्रतोस्तुल्यं फलं भवति शाश्वतम् ।

मृत्युकाले सहस्राक्ष यां वृत्तिमनुकाङ्क्षते ॥ ४७ ॥

सहस्राक्ष! उसे अश्वमेध यज्ञके समान अक्षय फल सुलभ होता है । वह मृत्युकालमें जिस स्थितिकी आकांक्षा करता है, उसे भी पा लेता है ॥ ४७ ॥

लोकान् बहुविधान् दिव्यान् यच्चास्य हृदि वर्तते ।

पृष्ठ 664

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तत् सर्वं समवाप्नोति कर्मणैतेन मानवः ॥ ४८ ॥

नाना प्रकारके दिव्य लोक तथा उसके हृदयमें जो - जो कामना होती है, वह सब कुछ मनुष्य उपर्युक्त सत्कर्मके प्रभावसे प्राप्त कर लेता है ॥ ४८ ॥

गोभिश्च समनुज्ञातः सर्वत्र च महीयते ।

यस्त्वेतेनैव कल्पेन गां वनेष्वनुगच्छति ॥ ४ ९ ॥

तृणगोमयपर्णाशी निःस्पृहो नियतः शुचिः ।

अकामं तेन वस्तव्यं मुदितेन शतक्रतो ॥ ५० ॥

मम लोके सुरैः सार्धं लोके यत्रापि चेच्छति ॥ ५१ ॥

इतना ही नहीं, वह गौओंसे अनुगृहीत होकर सर्वत्र पूजित होता है । शतक्रतो! जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे वनमें रहकर गौओंका अनुसरण करता है तथा निःस्पृह, संयमी और पवित्र होकर घास - पत्ते एवं गोबर खाता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह मनमें कोई कामना न होनेपर मेरे लोकमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता है । अथवा उसकी जहाँ इच्छा होती है, उन्हीं लोकोंमें चला जाता है ॥ ४ ९ –५१ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पितामहेन्द्रसंवादे त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्रह्माजी और इन्द्रका संवादविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥

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चतुःसप्ततितमोऽध्यायः दूसरोंकी गायको चुराकर देने या बेचनेसे दोष, गोहत्याके भयंकर परिणाम तथा गोदान एवं सुवर्ण - दक्षिणाका माहात्म्य इन्द्र उवाच

जानन् यो गामपहरेद् विक्रीयाच्चार्थकारणात् ।

एतद् विज्ञातुमिच्छामि क्व नु तस्य गतिर्भवेत् ॥ १ ॥

इन्द्रने पूछा — पितामह! यदि कोई जान- बूझकर दूसरेकी गौका अपहरण करे और धनके लोभसे उसे बेच डाले, उसकी परलोकमें क्या गति होती है? यह मैं जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥

पितामह उवाच

भक्षार्थं विक्रयार्थं वा येऽपहारं हि कुर्वते ।

दानार्थं ब्राह्मणार्थाय तत्रेदं श्रूयतां फलम् ॥ २ ॥

ब्रह्माजीने कहा — इन्द्र! जो खाने, बेचने या ब्राह्मणोंको दान करनेके लिये दूसरेकी गाय चुराते हैं, उन्हें क्या फल मिलता है, यह सुनो ॥ २ ॥

विक्रयार्थं हि यो हिंस्याद् भक्षयेद् वा निरंकुशः ।

घातयानं हि पुरुषं येऽनुमन्येयुरर्थिनः ॥ ३ ॥

जो उच्छृंखल मनुष्य मांस बेचनेके लिये गौकी हिंसा करता या गोमांस खाता है तथा जो स्वार्थवश घातक पुरुषको गाय मारनेकी सलाह देते हैं, वे सभी महान् पापके भागी होते हैं ॥ ३ ॥

घातकः खादको वापि तथा यश्चानुमन्यते ।

यावन्ति तस्या रोमाणि तावद् वर्षाणि मज्जति ॥ ४ ॥

गौकी हत्या करनेवाले, उसका मांस खानेवाले तथा गोहत्याका अनुमोदन करनेवाले लोग गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक नरकमें डूबे रहते हैं ॥ ४ ॥

ये दोषा यादृशाश्चैव द्विजयज्ञोपघातके ।

विक्रये चापहारे च ते दोषा वै स्मृताः प्रभो ॥ ५ ॥

प्रभो! ब्राह्मणके यज्ञका नाश करनेवाले पुरुषको जैसे और जितने पाप लगते हैं, दूसरोंकी गाय चुराने और बेचनेमें भी वे ही दोष बताये गये हैं ॥ ५ ॥

अपहृत्य तु यो गां वै ब्राह्मणाय प्रयच्छति ।

यावद् दानफलं तस्यास्तावन्निरयमृच्छति ॥ ६ ॥

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जो दूसरेकी गाय चुराकर ब्राह्मणको दान करता है, वह गोदानका पुण्य भोगनेके लिये जितना समय शास्त्रोंमें बताया गया है, उतने ही समयतक नरक भोगता है ॥ ६ ॥

सुवर्णं दक्षिणामाहुर्गोप्रदाने महाद्युते ।

सुवर्णं परमित्युक्तं दक्षिणार्थमसंशयम् ॥ ७ ॥

महातेजस्वी इन्द्र! गोदानमें कुछ सुवर्णकी दक्षिणा देनेका विधान है। दक्षिणाके लिये

सुवर्ण सबसे उत्तम बताया गया है । इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥

गोप्रदानात् तारयते सप्त पूर्वांस्तथा परान् ।

सुवर्णं दक्षिणां कृत्वा तावद्विगुणमुच्यते ॥ ८ ॥

मनुष्य गोदान करनेसे अपनी सात पीढ़ी पहलेके पितरोंका और सात पीढ़ी आगे आनेवाली संतानोंका उद्धार करता है; किंतु यदि उसके साथ सोनेकी दक्षिणा भी दी जाय तो उस दानका फल दूना बताया गया है ॥

सुवर्णं परमं दानं सुवर्णं दक्षिणा परा ।

सुवर्णं पावनं शक्र पावनानां परं स्मृतम् ॥९ ॥

तथा क्योंकि इन्द्र! सुवर्णका दान सबसे उत्तम दान है । सुवर्णकी दक्षिणा सबसे श्रेष्ठ है, पवित्र करनेवाली वस्तुओंमें सुवर्ण ही सबसे अधिक पावन माना गया है ॥ ९ ॥

कुलानां पावनं प्राहुर्जातरूपं शतक्रतो ।

एषा मे दक्षिणा प्रोक्ता समासेन महाद्युते ॥ १० ॥

महातेजस्वी शतक्रतो! सुवर्ण सम्पूर्ण कुलोंको पवित्र करनेवाला बताया गया है । इस प्रकार मैंने तुमसे संक्षेपमें यह दक्षिणाकी बात बतायी ॥ १० ॥

भीष्म उवाच

एतत् पितामहेनोक्तमिन्द्राय भरतर्षभ ।

इन्द्रो दशरथायाह रामायाह पिता तथा ॥ ११ ॥

भीष्मजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! यह उपर्युक्त उपदेश ब्रह्माजीने इन्द्रको दिया । इन्द्रने राजा दशरथको तथा पिता दशरथने अपने पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको दिया ॥ ११ ॥

राघवोऽपि प्रियभ्रात्रे लक्ष्मणाय यशस्विने ।

ऋषिभ्यो लक्ष्मणेनोक्तमरण्ये वसता प्रभो ॥ १२ ॥

प्रभो! श्रीरामचन्द्रजीने भी अपने प्रिय एवं यशस्वी भ्राता लक्ष्मणको इसका उपदेश दिया । फिर लक्ष्मणने भी वनवासके समय ऋषियोंको यह बात बतायी ॥

पारम्पर्यागतं चेदमृषयः संशितव्रताः ।

दुर्धरं धारयामासू राजानश्चैव धार्मिकाः ॥ १३ ॥

इस प्रकार परम्परासे प्राप्त हुए इस दुर्धर उपदेशको उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि और धर्मात्मा राजालोग धारण करते आ रहे हैं ॥ १३ ॥

पृष्ठ 667

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उपाध्यायेन गदितं मम चेदं युधिष्ठिर ।

य इदं ब्राह्मणो नित्यं वदेद् ब्राह्मणसंसदि ॥ १४ ॥

यज्ञेषु गोप्रदानेषु द्वयोरपि समागमे तस्य लोकाः किलाक्षय्या दैवतैः सह नित्यदा ॥ १५ ॥

(इति ब्रह्मा स भगवान् उवाच परमेश्वरः ) युधिष्ठिर! मुझसे मेरे उपाध्याय ( परशुरामजी ) ने इस विषयका वर्णन किया था । जो ब्राह्मण अपनी मण्डलीमें बैठकर प्रतिदिन इस उपदेशको दुहराता है और यज्ञमें, गोदानके समय तथा दो व्यक्तियोंके भी समागममें इसकी चर्चा करता है, उसको सदा देवताओंके साथ अक्षयलोक प्राप्त होते हैं । यह बात भी परमेश्वर भगवान् ब्रह्माने स्वयं ही इन्द्रको बतायी है ॥ १४-१५ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमेंचौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल १५३ श्लोक हैं ) 0

पृष्ठ 668

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पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः व्रत, नियम, दम, सत्य, ब्रह्मचर्य, माता - पिता, गुरु आदिकी सेवाकी महत्ता युधिष्ठिर उवाच

विस्रम्भितोऽहं भवता धर्मान् प्रवदता विभो ।

प्रवक्ष्यामि तु संदेहं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने कहा — प्रभो! आपने धर्मका उपदेश करके उसमें मेरा दृढ़ विश्वास उत्पन्न कर दिया है । पितामह! अब मैं आपसे एक और संदेह पूछ रहा हूँ, उसके विषयमें मुझे बताइये ॥ १ ॥

व्रतानां किं फलं प्रोक्तं कीदृशं वा महाद्युते ।

नियमानां फलं किं च स्वधीतस्य च किं फलम् ॥ २ ॥

महाद्युते! व्रतोंका क्या और कैसा फल बताया गया है? नियमोंके पालन और स्वाध्यायका भी क्या फल है? ॥ २ ॥

दत्तस्येह फलं किं च वेदानां धारणे च किम् ।

अध्यापने फलं किं च सर्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥

दान देने, वेदोंको धारण करने और उन्हें पढ़ानेका क्या फल होता है? यह सब मैं जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

अप्रतिग्राहके किं च फलं लोके पितामह ।

तस्य किं च फलं दृष्टं श्रुतं यस्तु प्रयच्छति ॥ ४ ॥

पितामह! संसारमें जो प्रतिग्रह नहीं लेता, उसे क्या फल मिलता है? तथा जो वेदोंका ज्ञान प्रदान करता है, उसके लिये कौन -सा फल देखा गया है ॥ ४ ॥

स्वकर्मनिरतानां च शूराणां चापि किं फलम् ।

शौचे च किं फलं प्रोक्तं ब्रह्मचर्ये च किं फलम् ॥ ५ ॥

अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहनेवाले शूरवीरोंको भी किस फलकी प्राप्ति होती है? शौचाचारका तथा ब्रह्मचर्यके पालनका क्या फल बताया गया है? ॥ ५ ॥

पितृशुश्रूषणे किं च मातृशुश्रूषणे तथा ।

आचार्यगुरुशुश्रूषास्वनुक्रोशानुकम्पने ॥ ६ ॥

पिता और माताकी सेवासे कौन-सा फल प्राप्त होता है? आचार्य एवं गुरुकी सेवासे तथा प्राणियोंपर अनुग्रह एवं दयाभाव बनाये रखनेसे किस फलकी प्राप्ति होती है? ॥ ६ ॥

एतत् सर्वमशेषेण पितामह यथातथम् ।

पृष्ठ 669

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वेत्तुमिच्छामि धर्मज्ञ परं कौतूहलं हि मे ॥ ७ ॥

धर्मज्ञ पितामह! यह सब मैं यथावत् रूपसे जानना चाहता हूँ । इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ भीष्म उवाच

यो व्रतं वै यथोद्दिष्टं तथा सम्प्रतिपद्यते ।

अखण्डं सम्यगारभ्य तस्य लोकाः सनातनाः ॥ ८ ॥

भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! जो मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे किसी व्रतको आरम्भ करके उसे अखण्डरूपसे निभा देते हैं, उन्हें सनातन लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥

नियमानां फलं राजन् प्रत्यक्षमिह दृश्यते ।

नियमानां क्रतूनां च त्वयावाप्तमिदं फलम् ॥ ९ ॥

राजन्! संसारमें नियमोंके पालनका फल तो प्रत्यक्ष देखा जाता है । तुमने भी यह नियमों और यज्ञोंका ही फल प्राप्त किया है ॥ ९ ॥

स्वधीतस्यापि च फलं दृश्यतेऽमुत्र चेह च ।

इहलोकेऽथवा नित्यं ब्रह्मलोके च मोदते ॥ १० ॥

वेदोंके स्वाध्यायका फल भी इहलोक और परलोकमें भी देखा जाता है । स्वाध्यायशील द्विज इहलोक और ब्रह्मलोकमें भी सदा आनन्द भोगता है ॥ १० ॥

दमस्य तु फलं राजन् शृणु त्वं विस्तरेण मे ।

दान्ताः सर्वत्र सुखिनो दान्ताः सर्वत्र निर्वृताः ॥ ११ ॥

राजन्! अब तुम मुझसे विस्तारपूर्वक दम ( इन्द्रियसंयम) के फलका वर्णन सुनो ।

जितेन्द्रिय पुरुष सर्वत्र सुखी और सर्वत्र संतुष्ट रहते हैं ॥ ११ ॥

यत्रेच्छागामिनो दान्ताः सर्वशत्रुनिषूदनाः ।

प्रार्थयन्ति च यद् दान्ता लभन्ते तन्न संशयः ॥ १२ ॥

वे जहाँ चाहते हैं वहीं चले जाते हैं और जिस वस्तुकी इच्छा करते हैं वही उन्हें प्राप्त हो

जाती है । वे सम्पूर्ण शत्रुओंका अन्त कर देते हैं । इसमें संशय नहीं है ॥ १२ ॥

युज्यन्ते सर्वकामैर्हि दान्ताः सर्वत्र पाण्डव ।

स्वर्गे यथा प्रमोदन्ते तपसा विक्रमेण च ॥ १३ ॥

दानैर्यज्ञैश्च विविधैस्तथा दान्ताः क्षमान्विताः । पाण्डुनन्दन! जितेन्द्रिय पुरुष सर्वत्र सम्पूर्ण मनचाही वस्तुएँ प्राप्त कर लेते हैं । वे अपनी तपस्या, पराक्रम, दान तथा नाना प्रकारके यज्ञोंसे स्वर्गलोकमें आनन्द भोगते हैं । इन्द्रियोंका दमन करनेवाले पुरुष क्षमाशील होते हैं ॥ १३३ ॥

दानाद् दमो विशिष्टो हि ददत्किंचित् द्विजातये ॥ १४ ॥

दाता कुप्यति नो दान्तस्तस्माद् दानात् परं दमः ।

पृष्ठ 670

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यस्तु दद्यादकुप्यन् हि तस्य लोकाः सनातनाः ॥ १५ ॥

दानसे दमका स्थान ऊँचा होता है । दानी पुरुष ब्राह्मणको कुछ दान करते समय कभी क्रोध भी कर सकता है; परंतु दमनशील या जितेन्द्रिय पुरुष कभी क्रोध नहीं करता; इसलिये दम ( इन्द्रिय - संयम) दानसे श्रेष्ठ है । जो दाता बिना क्रोध किये दान करता है उसे सनातन ( नित्य ) लोक प्राप्त होते हैं ॥ १४-१५ ॥

क्रोधो हन्ति हि यद् दानं तस्माद् दानात् परं दमः ।

अदृश्यानि महाराज स्थानान्ययुतशो दिवि ॥ १६ ॥

ऋषीणां सर्वलोकेषु यानि ते यान्ति देवताः ।

दमेन यानि नृपते गच्छन्ति परमर्षयः ॥ १७ ॥

कामयाना महत्स्थानं तस्माद् दानात् परं दमः । दान करते समय यदि क्रोध आ जाय तो वह दानके फलको नष्ट कर देता है; इसलिये उस क्रोधको दबानेवाला जो दमनामक गुण है, वह दानसे श्रेष्ठ माना गया है । महाराज! नरेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंमें निवास करनेवाले ऋषियोंके स्वर्गमें सहस्रों अदृश्य स्थान हैं, जिनमें दमके पालनद्वारा महान् लोककी इच्छा रखनेवाले महर्षि और देवता इस लोकसे जाते हैं; अतः ' दम' दानसे श्रेष्ठ है ॥ १६-१७३ ॥ अध्यापकः परिक्लेशादक्षयं फलमश्नुते ॥ १८ ॥

विधिवत् पावकं हुत्वा ब्रह्मलोके नराधिप । नरेन्द्र! शिष्योंको वेद पढ़ानेवाला अध्यापक क्लेश सहन करनेके कारण अक्षय फलका भागी होता है । अग्निमें विधिपूर्वक हवन करके ब्राह्मण ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १८ ॥ अधीत्यापि हि यो वेदान् न्यायविद्भ्यः प्रयच्छति ॥ १ ९ ॥ गुरुकर्मप्रशंसी तु सोऽपि स्वर्गे महीयते । जो वेदोंका अध्ययन करके न्यायपरायण शिष्योंको विद्यादान करता है तथा गुरुके कर्मोंकी प्रशंसा करनेवाला है, वह भी स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥

क्षत्रियोऽध्ययने युक्तो यजने दानकर्मणि ।

युद्धे यश्च परित्राता सोऽपि स्वर्गे महीयते ॥ २० ॥

वेदाध्ययन, यज्ञ और दानकर्ममें तत्पर रहनेवाला तथा युद्धमें दूसरोंकी रक्षा करनेवाला क्षत्रिय भी स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ २० ॥

वैश्यः स्वकर्मनिरतः प्रदानाल्लभते महत् ।

शूद्रः स्वकर्मनिरतः स्वर्गं शुश्रूषयार्च्छति ॥ २१ ॥

अपने कर्ममें लगा हुआ वैश्य दान देनेसे महत्- पदको प्राप्त होता है । अपने कर्ममें तत्पर रहनेवाला शूद्र सेवा करनेसे स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २१ ॥

शूरा बहुविधाः प्रोक्तास्तेषामर्थांस्तु मे शृणु ।