श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 931–940

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 931–940

पृष्ठ 931

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 931 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

महाकुले निवेष्टव्यं सदृशे वा युधिष्ठिर ।

अवरा पतिता चैव न ग्राह्या भूतिमिच्छता ॥ १३५ ॥

युधिष्ठिर! अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अपनी अपेक्षा महान् या समान कुलमें विवाह करना चाहिये । नीच जातिवाली तथा पतिता कन्याका पाणिग्रहण कदापि नहीं करना चाहिये ॥ १३५ ॥

अग्नीनुत्पाद्य यत्नेन क्रियाः सुविहिताश्च याः ।

वेदे च ब्राह्मणैः प्रोक्तास्ताश्च सर्वाः समाचरेत् ॥ १३६ ॥

( अरणी- मन्थनद्वारा ) अग्निका उत्पादन एवं स्थापन करके ब्राह्मणोंद्वारा बतायी हुई सम्पूर्ण वेदविहित क्रियाओंका यत्नपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १३६ ॥

न चेर्ष्या स्त्रीषु कर्तव्या रक्ष्या दाराश्च सर्वशः ।

अनायुष्या भवेदीर्ष्या तस्मादीर्ष्या विवर्जयेत् ॥ १३७ ॥

सभी उपायोंसे अपनी स्त्रीकी रक्षा करनी चाहिये । स्त्रियोंसे ईर्ष्या रखना उचित नहीं है ।

ईर्ष्या करनेसे आयु क्षीण होती है । इसलिये उसे त्याग देना ही उचित है ॥ १३७ ॥

अनायुष्यं दिवा स्वप्नं तथाभ्युदितशायिता ।

प्रगे निशामाशु तथा नैवोच्छिष्टाः स्वपन्ति वै ॥ १३८ ॥

दिनमें एवं सूर्योदयके पश्चात् शयन आयुको क्षीण करनेवाला है । प्रातःकाल एवं रात्रिके

आरम्भमें नहीं सोना चाहिये । अच्छे लोग रातमें अपवित्र होकर नहीं सोते हैं ॥ १३८ ॥

पारदार्यमनायुष्यं नापितोच्छिष्टता तथा ।

यत्नतो वै न कर्तव्यमभ्यासश्चैव भारत ॥ १३ ९ ॥

परस्त्रीसे व्यभिचार करना और हजामत बनवाकर बिना नहाये रह जाना भी आयुका नाश करनेवाला है । भारत! अपवित्रावस्थामें वेदोंका अध्ययन यत्नपूर्वक त्याग देना चाहिये ॥ १३ ९ ॥

संध्यायां च न भुञ्जीत न स्नायेन्न तथा पठेत् ।

प्रयतश्च भवेत् तस्यां न च किंचित् समाचरेत् ॥ १४० ॥

संध्याकालमें स्नान, भोजन और स्वाध्याय कुछ भी न करे । उस बेलामें शुद्ध चित्त

होकर ध्यान एवं उपासना करनी चाहिये । दूसरा कोई कार्य नहीं करना चाहिये ॥ १४० ॥

ब्राह्मणान् पूजयेच्चापि तथा स्नात्वा नराधिप ।

देवांश्च प्रणमेत् स्नातो गुरूंश्चाप्यभिवादयेत् ॥ १४१ ॥

नरेश्वर! ब्राह्मणोंकी पूजा, देवताओंको नमस्कार और गुरुजनोंको प्रणाम स्नानके बाद ही करने चाहिये ॥

अनिमन्त्रितो न गच्छेत यज्ञं गच्छेत दर्शकः ।

अनर्चिते ह्यनायुष्यं गमनं तत्र भारत ॥ १४२ ॥

पृष्ठ 932

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 932 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

बिना बुलाये कहीं भी न जाय, परंतु यज्ञ देखनेके लिये मनुष्य बिना बुलाये भी जा सकता है । भारत! जहाँ अपना आदर न होता हो, वहाँ जानेसे आयुका नाश होता है ॥ १४२ ॥

न चैकेन परिव्रज्यं न गन्तव्यं तथा निशि ।

अनागतायां संध्यायां पश्चिमायां गृहे वसेत् ॥ १४३ ॥

अकेले परदेश जाना और रातमें यात्रा करना मना है । यदि किसी कामके लिये बाहर जाय तो संध्या होनेके पहले ही घर लौट आना चाहिये ॥ १४३ ॥

मातुः पितुर्गुरूणां च कार्यमेवानुशासनम् ।

हितं चाप्यहितं चापि न विचार्यं नरर्षभ ॥ १४४ ॥

नरश्रेष्ठ! माता- पिता और गुरुजनोंकी आज्ञाका अविलम्ब पालन करना चाहिये । इनकी आज्ञा हितकर है या अहितकर, इसका विचार नहीं करना चाहिये ॥

धनुर्वेदे च वेदे च यत्नः कार्यो नराधिप ।

हस्तिपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च रथचर्यासु चैव ह ॥ १४५ ॥

यत्नवान् भव राजेन्द्र यत्नवान् सुखमेधते ।

अप्रधृष्यश्च शत्रूणां भृत्यानां स्वजनस्य च ॥ १४६ ॥

नरेश्वर! क्षत्रियको धनुर्वेद और वेदाध्ययनके लिये यत्न करना चाहिये । राजेन्द्र! तुम हाथी - घोड़ेकी सवारी और रथ हाँकनेकी कलामें निपुणता प्राप्त करनेके लिये प्रयत्नशील बनो, क्योंकि यत्न करनेवाला पुरुष सुखपूर्वक उन्नतिशील होता है । वह शत्रुओं, स्वजनों और भृत्योंके लिये दुर्धर्ष हो जाता है ॥ १४५-१४६ ॥

प्रजापालनयुक्तश्च न क्षतिं लभते क्वचित् ।

युक्तिशास्त्रं च ते ज्ञेयं शब्दशास्त्रं च भारत ॥ १४७ ॥

जो राजा सदा प्रजाके पालनमें तत्पर रहता है, उसे कभी हानि नहीं उठानी पड़ती । भरतनन्दन! तुम्हें तर्कशास्त्र और शब्दशास्त्र दोनोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ १४७ ॥

गान्धर्वशास्त्रं च कलाः परिज्ञेया नराधिप ।

पुराणमितिहासाश्च तथाख्यानानि यानि च ॥ १४८ ॥

महात्मनां च चरितं श्रोतव्यं नित्यमेव ते । नरेश्वर! गान्धर्वशास्त्र ( संगीत ) और समस्त कलाओंका ज्ञान प्राप्त करना भी तुम्हारे लिये आवश्यक है । तुम्हें प्रतिदिन पुराण, इतिहास, उपाख्यान तथा महात्माओंके चरित्रका श्रवण करना चाहिये ॥ १४८३ ॥

( मान्यानां माननं कुर्यान्निन्द्यानां निन्दनं तथा । गोब्राह्मणार्थे युध्येत प्राणानपि परित्यजेत् ॥ ) राजा माननीय पुरुषोंका सम्मान और निन्दनीय मनुष्योंकी निन्दा करे। वह गौओं तथा ब्राह्मणोंके लिये युद्ध करे । उनकी रक्षाके लिये आवश्यकता हो तो प्राणोंको भी निछावर कर

पृष्ठ 933

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 933 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दे ॥ पत्नी रजस्वला या च नाभिगच्छेन्न चाह्वयेत् ॥ १४ ९ ॥

स्नातां चतुर्थे दिवसे रात्रौ गच्छेद् विचक्षणः ।

पञ्चमे दिवसे नारी षष्ठेऽहनि पुमान् भवेत् ॥ १५० ॥

अपनी पत्नी भी रजस्वला हो तो उसके पास न जाय और न उसे ही अपने पास बुलाये । जब चौथे दिन वह स्नान कर ले, तब रातमें बुद्धिमान् पुरुष उसके पास जाय । पाँचवें दिन गर्भाधान करनेसे कन्याकी उत्पत्ति होती है और छठे दिन पुत्रकी अर्थात् समरात्रिमें गर्भाधानसे पुत्रका और विषमरात्रिमें गर्भाधान होनेसे कन्याका जन्म होता है ॥ १४ ९ -१५० ॥

एतेन विधिना पत्नीमुपगच्छेत पण्डितः ।

ज्ञातिसम्बन्धिमित्राणि पूजनीयानि सर्वशः ॥ १५१ ॥

इसी विधिसे विद्वान् पुरुष पत्नीके साथ समागम करे | भाई- बन्धु, सम्बन्धी और मित्र -इन सबका सब प्रकारसे आदर करना चाहिये ॥ १५१ ॥

यष्टव्यं च यथाशक्ति यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ।

अत ऊर्ध्वमरण्यं च सेवितव्यं नराधिप ॥ १५२ ॥

अपनी शक्तिके अनुसार भाँति- भाँतिकी दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये । नरेश्वर! तदनन्तर गार्हस्थ्यकी अवधि समाप्त हो जानेपर वानप्रस्थके नियमोंका पालन करते हुए वनमें निवास करना चाहिये ॥ १५२ ॥

एष ते लक्षणोद्देश आयुष्याणां प्रकीर्तितः ।

शेषस्त्रैविद्यवृद्धेभ्यः प्रत्याहार्यो युधिष्ठिर ॥ १५३ ॥

युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने तुमसे आयुकी वृद्धि करनेवाले नियमोंका संक्षेपसे वर्णन किया है । जो नियम बाकी रह गये हैं, उन्हें तुम तीनों वेदोंके ज्ञानमें बढ़े -चढ़े ब्राह्मणोंसे पूछकर जान लेना ॥ १५३ ॥

आचारो भूतिजनन आचारः कीर्तिवर्धनः ।

आचाराद् वर्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १५४ ॥

सदाचार ही कल्याणका जनक और सदाचार ही कीर्तिको बढ़ानेवाला है । सदाचारसे आयुकी वृद्धि होती है और सदाचार ही बुरे लक्षणोंका नाश करता है ॥ १५४ ॥

आगमानां हि सर्वेषामाचारः श्रेष्ठ उच्यते ।

आचारप्रभवो धर्मो धर्मादायुर्विवर्धते ॥ १५५ ॥

सम्पूर्ण आगमोंमें सदाचार ही श्रेष्ठ बतलाया जाता है । सदाचारसे धर्मकी उत्पत्ति होती है और धर्मसे आयु बढ़ती है ॥ १५५ ॥

एतद् यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् ।

अनुकम्प्य सर्ववर्णान् ब्रह्मणा समुदाहृतम् ॥ १५६ ॥

पृष्ठ 934

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 934 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पूर्वकालमें सब वर्णोंके लोगोंपर दया करके ब्रह्माजीने यह सदाचार धर्मका उपदेश दिया था । यह यश, आयु और स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा कल्याणका परम आधार है ॥ १५६ ॥

( य इमं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् । स शुभान् प्राप्नुते लोकान् सदाचारव्रतान्नृप ॥ ) नरेश्वर! जो प्रतिदिन इस प्रसंगको सुनता और कहता है, वह सदाचार- व्रतके प्रभावसे शुभ लोकोंमें जाता है ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि आयुष्याख्याने चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें आयु बढ़ानेवाले साधनोंका वर्णनविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९ ३ श्लोक मिलाकर कुल १६५३ श्लोक हैं ) * अपने जन्मनक्षत्रसे वर्तमान नक्षत्रतक गिने, गिननेपर जितनी संख्या हो उसमें नौका भाग दे । यदि पाँच शेष रहे तो उस दिनके नक्षत्रको प्रत्यरि तारा समझे ।

पृष्ठ 935

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 935 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः बड़े और छोटे भाईके पारस्परिक बर्ताव तथा माता - पिता, आचार्य आदि गुरुजनोंके गौरवका वर्णन युधिष्ठिर उवाच

यथा ज्येष्ठः कनिष्ठेषु वर्तेत भरतर्षभ ।

कनिष्ठाश्च यथा ज्येष्ठे वर्तेरंस्तद् ब्रवीहि मे ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! बड़ा भाई अपने छोटे भाइयोंके साथ कैसा बर्ताव करे? और छोटे भाइयोंका बड़े भाईके साथ कैसा बर्ताव होना चाहिये? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

ज्येष्ठवत् तात वर्तस्व ज्येष्ठोऽसि सततं भवान् ।

गुरोर्गरीयसी वृत्तिर्या च शिष्यस्य भारत ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा - तात भरतनन्दन! तुम अपने भाइयोंमें सबसे बड़े हो; अतः सदा बड़ेके अनुरूप ही बर्ताव करो । गुरुको अपने शिष्यके प्रति जैसा गौरवयुक्त बर्ताव होता है, वैसा ही तुम्हें भी अपने भाइयोंके साथ करना चाहिये ॥ २ ॥

नवकृतप्रज्ञे शक्यं शिष्येण वर्तितुम् ।

गुरोर्हि दीर्घदर्शित्वं यत् तच्छिष्यस्य भारत ॥ ३ ॥

यदि गुरु अथवा बड़े भाईका विचार शुद्ध न हो तो शिष्य या छोटे भाई उसकी आज्ञाके अधीन नहीं रह सकते । भारत! बड़ेके दीर्घदर्शी होनेपर छोटे भाई भी दीर्घदर्शी होते हैं ॥ ३ ॥

अन्धः स्यादन्धवेलायां जडः स्यादपि वा बुधः ।

परिहारेण तद् ब्रूयाद् यस्तेषां स्याद् व्यतिक्रमः ॥ ४ ॥

बड़े भाईको चाहिये कि वह अवसरके अनुसार अन्ध, जड़ और विद्वान् बने अर्थात् यदि छोटे भाइयोंसे कोई अपराध हो जाय तो उसे देखते हुए भी न देखे । जानकर भी अनजान बना रहे और उनसे ऐसी बात करे, जिससे उनकी अपराध करनेकी प्रवृत्ति दूर हो जाय ॥ ४ ॥

प्रत्यक्षं भिन्नहृदया भेदयेयुः कृतं नराः ।

श्रियाभितप्ताः कौन्तेय भेदकामास्तथारयः ॥ ५ ॥

यदि बड़ा भाई प्रत्यक्षरूपसे अपराधका दण्ड देता है तो उसके छोटे भाइयोंका हृदय छिन्न - भिन्न हो जाता है और वे उस दुर्व्यवहारका लोगोंमें प्रचार कर देते हैं, तब उनके

पृष्ठ 936

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 936 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ऐश्वर्यको देखकर जलनेवाले कितने ही शत्रु उनमें मतभेद पैदा करनेकी इच्छा करने लगते हैं ॥ ५ ॥

ज्येष्ठः कुलं वर्धयति विनाशयति वा पुनः ।

हन्ति सर्वमपि ज्येष्ठः कुलं यत्रावजायते ॥ ६ ॥

जेठा भाई अपनी अच्छी नीतिसे कुलको उन्नतिशील बनाता है; किंतु यदि वह कुनीतिका आश्रय लेता है तो उसे विनाशके गर्तमें डाल देता है! जहाँ बड़े भाईका विचार खोटा हुआ, वहाँ वह जिसमें उत्पन्न हुआ है, अपने उस समस्त कुलको ही चौपट कर देता है ॥ ६ ॥

अथ यो विनिकुर्वीत ज्येष्ठो भ्राता यवीयसः ।

अज्येष्ठः स्यादभागश्च नियम्यो राजभिश्च सः ॥ ७ ॥

जो बड़ा भाई होकर छोटे भाइयोंके साथ कुटिलतापूर्ण बर्ताव करता है, वह न तो ज्येष्ठ कहलाने योग्य है और न ज्येष्ठांश पानेका ही अधिकारी है । उसे तो राजाओंके द्वारा दण्ड मिलना चाहिये ॥ ७ ॥

निकृती हि नरो लोकान् पापान् गच्छत्यसंशयम् ।

विदुलस्येव तत् पुष्पं मोघं जनयितुः स्मृतम् ॥ ८ ॥

कपट करनेवाला मनुष्य निःसंदेह पापमय लोकों ( नरक ) - में जाता है । उसका जन्म पिताके लिये बेतके फूलकी भाँति निरर्थक ही माना गया है ॥ ८ ॥

सर्वानर्थः कुले यत्र जायते पापपूरुषः ।

अकीर्तिं जनयत्येव कीर्तिमन्तर्दधाति च ॥ ९ ॥

जिस कुलमें पापी पुरुष जन्म लेता है, उसके लिये वह सम्पूर्ण अनर्थोंका कारण बन जाता है । पापात्मा मनुष्य कुलमें कलंक लगाता और उसके सुयशका नाश करता है ॥ ९ ॥

सर्वे चापि विकर्मस्था भागं नार्हन्ति सोदराः ।

नाप्रदाय कनिष्ठेभ्यो ज्येष्ठः कुर्वीत यौतकम् ॥ १० ॥

यदि छोटे भाई भी पापकर्ममें लगे रहते हों तो वे पैतृक धनका भाग पानेके अधिकारी नहीं हैं । छोटे भाइयोंको उनका उचित भाग दिये बिना बड़े भाईको पैतृक- सम्पत्तिका भाग ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥ १० ॥

अनुपघ्नन् पितुर्दायं जङ्घाश्रमफलोऽध्वगः ।

स्वयमीहितलब्धं तु नाकामो दातुमर्हति ॥ ११ ॥

यदि बड़ा भाई पैतृक धनको हानि पहुँचाये बिना ही केवल जाँघोंके परिश्रमसे परदेशमें जाकर धन पैदा करे तो वह उसके निजी परिश्रमकी कमाई है । अतः यदि उसकी इच्छा न हो तो वह उस धनमेंसे भाइयोंको नहीं दे सकता है ॥ ११ ॥

भ्रातॄणामविभक्तानामुत्थानमपि चेत् सह ।

पृष्ठ 937

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 937 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

न पुत्रभागं विषमं पिता दद्यात् कदाचन ॥ १२ ॥

यदि भाइयोंके हिस्सेका बटवारा न हुआ हो और सबने साथ - ही - साथ व्यापार आदिके द्वारा धनकी उन्नति की हो, उस अवस्थामें यदि पिताके जीते - जी सब अलग होना चाहें तो पिताको उचित है कि वह कभी किसीको कम और किसीको अधिक धन न दे अर्थात् वह सब पुत्रोंको बराबर- बराबर हिस्सा दे ॥ १२ ॥

न ज्येष्ठो वावमन्येत दुष्कृतः सुकृतोऽपि वा ।

यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेयश्चेत् तत् तदाचरेत् ॥ १३ ॥

धर्मं हि श्रेय इत्याहुरिति धर्मविदो जनाः । बड़ा भाई अच्छा काम करनेवाला हो या बुरा, छोटेको उसका अपमान नहीं करना चाहिये । इसी तरह यदि स्त्री अथवा छोटे भाई बुरे रास्तेपर चल रहे हों तो श्रेष्ठ पुरुषको जिस तरहसे भी उनकी भलाई हो, वही उपाय करना चाहिये । धर्मज्ञ पुरुषोंका कहना है कि धर्म ही कल्याणका सर्वश्रेष्ठ साधन है ॥ १३३ ॥

दशाचार्यानुपाध्याय उपाध्यायान् पिता दश ॥ १४ ॥

दश चैव पितॄन् माता सर्वां वा पृथिवीमपि ।

गौरवेणाभिभवति नास्ति मातृसमो गुरुः ॥ १५ ॥

गौरवमें दस आचार्योंसे बढ़कर उपाध्याय, दस उपाध्यायोंसे बढ़कर पिता और दस पिताओंसे बढ़कर माता है । माता अपने गौरवसे समूची पृथ्वीको भी तिरस्कृत कर देती है । अतः माताके समान दूसरा कोई गुरु नहीं है ॥ १४-१५ ॥

माता गरीयसी यच्च तेनैतां मन्यते जनः ।

ज्येष्ठो भ्राता पितृसमो मृते पितरि भारत ॥ १६ ॥

भरतनन्दन! माताका गौरव सबसे बढ़कर है, इसलिये लोग उसका विशेष आदर करते हैं । भारत! पिताकी मृत्यु हो जानेपर बड़े भाईको ही पिताके समान समझना चाहिये ॥ १६ ॥

स ह्येषां वृत्तिदाता स्यात् स चैतान् प्रतिपालयेत् ।

कनिष्ठास्तं नमस्येरन् सर्वे छन्दानुवर्तिनः ॥ १७ ॥

तमेव चोपजीवेरन् यथैव पितरं तथा । बड़े भाईको उचित है कि वह अपने छोटे भाइयोंको जीविका प्रदान करे तथा उनका पालन- पोषण करे । छोटे भाइयोंका भी कर्तव्य है कि वे सब- के - सब बड़े भाईके सामने नतमस्तक हों और उसकी इच्छाके अनुसार चलें । बड़े भाईको ही पिता मानकर उनके आश्रयमें जीवन व्यतीत करें ॥ १७ ॥

शरीरमेतौ सृजतः पिता माता च भारत ॥ १८ ॥

आचार्य शास्ता या जातिः सा सत्या साजरामरा ।

पृष्ठ 938

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 938 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भारत! पिता और माता केवल शरीरकी सृष्टि करते हैं, किंतु आचार्यके उपदेशसे जो ज्ञानरूप नवीन जीवन प्राप्त होता है, वह सत्य, अजर और अमर है ॥ ज्येष्ठा मातृसमा चापि भगिनी भरतर्षभ ॥ १ ९ ॥ भ्रातुर्भार्या च तद्वत् स्याद् यस्या बाल्ये स्तनं पिबेत् ॥ २० ॥

भरतश्रेष्ठ! बड़ी बहिन भी माताके समान है । इसी तरह बड़े भाईकी पत्नी तथा बचपनमें जिसका दूध पिया गया हो, वह धाय भी माताके समान है ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ज्येष्ठकनिष्ठवृत्तिर्नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बड़े और छोटे भाईका पारस्परिक बर्तावनामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥

पृष्ठ 939

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 939 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

षडधिकशततमोऽध्यायः मास, पक्ष एवं तिथिसम्बन्धी विभिन्न व्रतोपवासके फलका वर्णन युधिष्ठिर उवाच

सर्वेषामेव वर्णानां म्लेच्छानां च पितामह ।

उपवासे मतिरियं कारणं च न विद्महे ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! सभी वर्गों और म्लेच्छ जातिके लोग भी उपवासमें मन लगाते हैं, किंतु इसका क्या कारण है? यह समझमें नहीं आता ॥ १ ॥

ब्रह्मक्षत्रेण नियमाश्चर्तव्या इति नः श्रुतम् ।

उपवासे कथं तेषां कृत्यमस्ति पितामह ॥ २ ॥

पितामह! सुननेमें आया है कि ब्राह्मण और क्षत्रियोंको नियमोंका पालन करना चाहिये; परंतु उपवास करनेसे किस प्रकार उनके प्रयोजनकी सिद्धि होती है, यह नहीं जान पड़ता है ॥ २ ॥

नियमांश्चोपवासांश्च सर्वेषां ब्रूहि पार्थिव ।

आप्नोति कां गतिं तात उपवासपरायणः ॥ ३ ॥

पृथ्वीनाथ! आप कृपा करके हमें सम्पूर्ण नियमों और उपवासोंकी विधि बताइये । तात! उपवास करनेवाला मनुष्य किस गतिको प्राप्त होता है? ॥ ३ ॥

उपवासः परं पुण्यमुपवासः परायणम् ।

उपोष्येह नरश्रेष्ठ किं फलं प्रतिपद्यते ॥ ४ ॥

नरश्रेष्ठ! कहते हैं, उपवास बहुत बड़ा पुण्य है और उपवास सबसे बड़ा आश्रय है; परंतु उपवास करके यहाँ मनुष्य कौन- सा फल पाता है? ॥ ४ ॥

अधर्मान्मुच्यते केन धर्ममाप्नोति वा कथम् ।

स्वर्गं पुण्यं च लभते कथं भरतसत्तम ॥ ५ ॥

भरतश्रेष्ठ! मनुष्य किस कर्मके द्वारा पापसे छुटकारा पाता है और क्या करनेसे किस प्रकार उसे धर्मकी प्राप्ति होती है? वह पुण्य और स्वर्ग कैसे पाता है? ॥

उपोष्य चापि किं तेन प्रदेयं स्यान्नराधिप ।

धर्मेण च सुखानर्थाल्लँभेद् येन ब्रवीहि तम् ॥ ६ ॥

नरेश्वर! उपवास करके मनुष्यको किस वस्तुका दान करना चाहिये? जिस धर्मसे सुख और धनकी प्राप्ति हो सके, वही मुझे बताइये ॥ ६ ॥

वैशम्पायन उवाच

पृष्ठ 940

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 940 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एवं ब्रुवाणं कौन्तेयं धर्मज्ञं धर्मतत्त्ववित् ।

धर्मपुत्रमिदं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धर्मज्ञ धर्मपुत्र कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर धर्मके तत्त्वको जाननेवाले शान्तनुनन्दन भीष्मने उनसे इस प्रकार कहा ॥ ७ ॥

भीष्म उवाच

इदं खलु मया राजन् श्रुतमासीत् पुरातनम् ।

उपवासविधौ श्रेष्ठा गुणा ये भरतर्षभ ॥ ८ ॥

भीष्मजीने कहा — राजन्! भरतश्रेष्ठ! उपवास करनेमें जो श्रेष्ठ गुण हैं, उनके विषयमें मैंने प्राचीन कालमें इस तरह सुन रखा है ॥ ८ ॥

ऋषिमंगिरसं पूर्वं पृष्टवानस्मि भारत ।

यथा मां त्वं तथैवाहं पृष्टवांस्तं तपोधनम् ॥ ९ ॥

भारत! जिस तरह आज तुमने मुझसे प्रश्न किया है इसी प्रकार मैंने भी पूर्वकालमें तपोधन अंगिरा मुनिसे प्रश्न किया था ॥ ९ ॥

प्रश्नमेतं मया पृष्टो भगवानग्निसम्भवः ।

उपवासविधिं पुण्यमाचष्ट भरतर्षभ ॥ १० ॥

भरतभूषण! जब मैंने यह प्रश्न पूछा, तब अग्निनन्दन भगवान् अंगिराने मुझे उपवासकी पवित्र विधि इस प्रकार बतायी ॥ १० ॥

अंगिरा उवाच

ब्रह्मक्षत्रे त्रिरात्रं तु विहितं कुरुनन्दन ।

द्विस्त्रिरात्रमथैकाहं निर्दिष्टं पुरुषर्षभ ॥ ११ ॥

अंगिरा बोले — कुरुनन्दन! ब्राह्मण और क्षत्रियके लिये तीन रात उपवास करनेका विधान है । कहीं- कहीं दो त्रिरात्र और एक दिन अर्थात् कुल सात दिन उपवास करनेका संकेत मिलता है ॥ ११ ॥

वैश्याः शूद्राश्च यन्मोहादुपवासं प्रचक्रिरे ।

त्रिरात्रं वा द्विरात्रं वा तयोर्व्युष्टिर्न विद्यते ॥ १२ ॥

वैश्यों और शूद्रोंने जो मोहवश तीन रात अथवा दो रातका उपवास किया है, उसका उन्हें कोई फल नहीं मिला है ॥ १२ ॥

चतुर्थभक्तक्षपणं वैश्ये शूद्रे विधीयते ।

त्रिरात्रं न तु धर्मज्ञैर्विहितं धर्मदर्शिभिः ॥ १३ ॥

वैश्य और शूद्रके लिये चौथे समयतकके भोजनका त्याग करनेका विधान है अर्थात् उन्हें केवल दो दिन एवं दो रात्रितक उपवास करना चाहिये; क्योंकि धर्मशास्त्रके ज्ञाता एवं