श्रीगणेशाय नमः।

आयुष्याख्यान : मनुष्य की आयु और कीर्ति कैसे बढ़ती है?

सदाचार और दीर्घायु

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · पृष्ठ 911–934

3,610 शब्द · 19 मिनटका पाठ · 32 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

युधिष्ठिर द्वारा अल्पायु और दीर्घायु के कारणों पर जिज्ञासा पूछने पर

युधिष्ठिर ने पितामह की ओर देखते हुए अत्यन्त जिज्ञासा भरे स्वर में कहा— "पितामह! शास्त्रों में तो यह कहा गया है कि मनुष्य की आयु सौ वर्षों की होती है और वह सैकड़ों प्रकार की शक्ति लेकर जन्म धारण करता है। किन्तु मैं देखता हूँ कि कितने ही मनुष्य बचपन में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? मनुष्य किस उपाय से दीर्घायु होता है अथवा किस कारण से उसकी आयु कम हो जाती है? क्या करने से वह कीर्ति पाता है या क्या करने से उसे सम्पत्ति की प्राप्ति होती है? पितामह! मनुष्य मन, वाणी अथवा शरीर के द्वारा तप, ब्रह्मचर्य, जप, होम तथा औषध आदि में से किसका आश्रय ले, जिससे वह श्रेय का भागी बन सके— यह मुझे बताइये।"

युधिष्ठिर उवाच

शतायुरुक्तः पुरुषः शतवीर्यश्च जायते ।
कस्मान्म्रियन्ते पुरुषा बाला अपि पितामह ॥

युधिष्ठिरने कहा - पितामह! शास्त्रोंमें कहा गया है कि ' मनुष्यकी आयु सौ वर्षोंकी होती है । वह सैकड़ों प्रकारकी शक्ति लेकर जन्म धारण करता है । ' किंतु देखता हूँ कि कितने ही मनुष्य बचपनमें ही मर जाते हैं । ऐसा क्यों होता है?

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 1पृष्ठ 912

भीष्म ने युधिष्ठिर के प्रश्नों को सुना और शान्त भाव से कहा— "युधिष्ठिर! तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, मैं उसका उत्तर देता हूँ। मनुष्य जिस कारण से अल्पायु होता है, किस उपाय से दीर्घायु होता है, जिससे वह कीर्ति और सम्पत्ति का भागी होता है तथा जिस बर्ताव से पुरुष को श्रेय का संयोग प्राप्त होता है— वह सब मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो।"

युधिष्ठिर उवाच

आयुष्मान् केन भवति अल्पायुर्वापि मानवः ।
केन वा लभते कीर्तिं केन वा लभते श्रियम् ॥

मनुष्य किस उपायसे दीर्घायु होता है अथवा किस कारणसे उसकी आयु कम हो जाती है? क्या करनेसे वह कीर्ति पाता है या क्या करनेसे उसे सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है?

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 2पृष्ठ 912

भीष्म बोले— "सदाचार से ही मनुष्य को आयु की प्राप्ति होती है, सदाचार से ही वह सम्पत्ति पाता है तथा सदाचार से ही उसे इहलोक और परलोक में भी कीर्ति प्राप्त होती है। दुराचारी पुरुष, जिससे समस्त प्राणी डरते और तिरस्कृत करते हैं, वह इस संसार में बड़ी आयु नहीं पाता। अतः यदि मनुष्य अपना कल्याण करना चाहता हो, तो उसे इस जगत् में सदाचार का पालन करना चाहिए। जिसका सारा शरीर ही पापमय है, वह भी यदि सदाचार का पालन करे, तो वह उसके शरीर और मन के बुरे लक्षणों को दबा देता है। सदाचार ही धर्म का लक्षण है और सच्चरित्रता ही श्रेष्ठ पुरुषों की पहचान है।"

आचारलक्षणो धर्मः संतश्चारित्रलक्षणाः ।
साधूनां च यथावृत्तमेतदाचारलक्षणम् ॥

सदाचार ही धर्मका लक्षण है।| सच्चरित्रता ही श्रेष्ठ पुरुषोंकी पहचान है । श्रेष्ठ पुरुष जैसा बर्ताव करते हैं; वही सदाचारका स्वरूप अथवा लक्षण है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 9पृष्ठ 913

भीष्//म ने आगे विस्तार से समझाते हुए कहा— "जो मनुष्य धर्म का आचरण करता है और लोक-कल्याण के कार्यों में लगा रहता है, उसका दर्शन न हुआ हो तो भी लोग केवल उसका नाम सुनकर उससे प्रेम करने लगते हैं। किन्तु जो नास्तिक, क्रियाहीन, गुरु और शास्त्र की आज्ञा का उल्लङ्घन करने वाले, धर्म को न जानने वाले और दुराचारी हैं, उन मनुष्यों की आयु क्षीण हो जाती है। जो मनुष्य शीलहीन हैं, सदा धर्म की मर्यादा भङ्ग करते हैं तथा दूसरे वर्ण की स्त्रियों के साथ सम्पर्क रखते हैं, वे इस लोक में अल्पायु होते हैं और मरने के बाद नरक में पड़ते हैं।"

ये नास्तिका निष्क्रियाश्च गुरुशास्त्राभिलङ्घिनः ।
अधर्मज्ञा दुराचारास्ते भवन्ति गतायुषः ॥

जो नास्तिक, क्रियाहीन, गुरु और शास्त्रकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाले, धर्मको न जाननेवाले और दुराचारी हैं, उन मनुष्योंकी आयु क्षीण हो जाती है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 11पृष्ठ 913

भीष्म ने कहा— "सब प्रकार के शुभ लक्षणों से हीन होने पर भी, जो मनुष्य सदाचारी, श्रद्धालु और दोषदृष्टि से रहित होता है, वह सौ वर्षों तक जीवित रहता है। जो क्रोधहीन, सत्यवादी, किसी भी प्राणी की हिंसा न करने वाला, अदोषदर्शी और कपटशून्य है, वह भी सौ वर्षों तक जीवित रहता है। किन्तु जो मनुष्य ढेले फोड़ता है, तिनके तोड़ता है, नख चबाता है तथा सदा ही उच्छिष्ट और चञ्चल रहता है, ऐसे कुलक्षणयुक्त मनुष्य को दीर्घायु प्राप्त नहीं होती।"

सर्वलक्षणहीनोऽपि समुदाचारवान् नरः ।
श्रद्दधानोऽनसूयुश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥

सब प्रकारके शुभ लक्षणोंसे हीन होनेपर भी जो मनुष्य सदाचारी, श्रद्धालु और दोषदृष्टिसे रहित होता है, वह सौ वर्षोंतक जीवित रहता है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 13पृष्ठ 913

"दीर्घायु के लिए नियम सुनो— प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्त में जागना चाहिए, अर्थात सूर्योदय से दो घड़ी पहले। उस समय धर्म और अर्थ के विषय में विचार करना चाहिए। फिर शय्या से उठकर शौच और स्नान के पश्चात् आचमन करके, हाथ जोड़े हुए प्रातःकाल की सन्ध्या करनी चाहिए। इसी प्रकार सायङ्काल में भी मौह रहकर सन्ध्योपासना करनी चाहिए। उदय और अस्त के समय सूर्य की ओर कदापि नहीं देखना चाहिए। ग्रहण और मध्याह्न के समय भी सूर्य की ओर दृष्टिपात न करें और जल में स्थित सूर्य के प्रतिबिम्ब की ओर भी न देखें। ऋषियों ने प्रतिदिन सन्ध्योपासन करने से ही दीर्घ आयु प्राप्त की थी; इसलिए सदा मौन रहकर द्विजमात्र को प्रातःकाल और सायङ्काल की सन्ध्या अवश्य करनी चाहिए।"

ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चानुचिंतयेत् ।
उत्थायाचम्य तिष्ठेत पूर्वां संध्यां कृताञ्जलिः ॥

प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें ( अर्थात् सूर्योदयसे दो घड़ी पहले ) जागे तथा धर्म और अर्थके विषयमें विचार करे । फिर शय्यासे उठकर शौच-स्नानके पश्चात् आचमन करके हाथ जोड़े हुए प्रातःकालकी संध्या करे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 16पृष्ठ 914

भीष्म ने चेतावनी देते हुए कहा— "जो द्विज प्रातःकाल और सायङ्काल की सन्ध्या नहीं करते, उन्हें एक धार्मिक राजा द्वारा शूद्रोचित कर्म करने चाहिए। किसी भी वर्ण के पुरुष को कभी भी परायी स्त्रियों से संसर्ग नहीं करना चाहिए; क्योंकि परस्त्री-सेवन से मनुष्य की आयु जल्दी ही समाप्त हो जाती है। संसार में परस्त्री-समागम के समान पुरुष की आयु को नष्ट करने वाला दूसरा कोई कार्य नहीं है। व्यभिचारी पुरुषों को स्त्रियों के शरीर के जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही हजार वर्षों तक नरक में रहना पड़ता है।"

परदारा न गन्तव्या सर्ववर्णेषु कर्हिचित् ॥

नहीदृशमनायुष्यं लोके किंचन विद्यते ।
यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ॥

किसी भी वर्णके पुरुषको कभी भी परायी स्त्रियोंसे संसर्ग नहीं करना चाहिये । परस्त्री-सेवनसे मनुष्यकी आयु जल्दी ही समाप्त हो जाती है । संसारमें परस्त्री- समागमके समान पुरुषकी आयुको नष्ट करनेवाला दूसरा कोई कार्य नहीं है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 20-21पृष्ठ 914

"स्वयं के शुद्धि हेतु— केशों को संवारना, आँखों में अञ्जन लगाना, दाँत-मुँह धोना और देवताओं की पूजा करना, ये सब कार्य दिन के पहले प्रहर में ही करने चाहिए। अज्ञात लोगों के साथ न घूमें; न अपरिचित पुरुषों के साथ यात्रा करें, न शूद्रों के साथ और न अकेले ही। यदि ब्राह्मण, गाय, राजा, वृद्ध पुरुष, गर्भिणी स्त्री, दुर्बल और भारपीड़ित मनुष्य सामने से आते हों, तो स्वयं किनारे हटकर उन्हें मार्ग देना चाहिए। चौराहों पर कभी न रहें— विशेषतः दोपहर, रात, आधी रात और दोनों सन्ध्याओं के समय।"

प्रसाधनं च केशानामञ्जनं दन्तधावनम् ।
पूर्वाह्न एव कार्याणि देवतानां च पूजनम् ॥

केशोंको सँवारना, आँखोंमें अंजन लगाना, दाँत-मुँह धोना और देवताओंकी पूजा करना — ये सब कार्य दिनके पहले प्रहरमें ही करने चाहिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 23पृष्ठ 915

"दूसरों के पहने हुए वस्त्र और जूते न पहनें। सदा ब्रह्मचर्य का पालन करें और पैर से पैर को न दबाएँ। अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी और अष्टमी तिथियों को सदा ब्रह्मचारी रहें और स्त्री-समागम से बचें। किसी की निन्दा, बदनामी या चुगली न करें; दूसरों के मर्म पर आघात न करें और क्रूरतापूर्ण बात न बोलें। जो दूसरों को नीचा दिखाता है या उद्वेग पैदा करता है, उसके वचन पापियों के लोक में ले जाने वाले होते हैं। वचनरूपी बाण मुँह से निकलते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोक में पड़ा रहता है। यदि शरीर में कोई शस्त्र जैसे कर्ण या नाराच गड़ जाए, तो चिकित्सक उसे निकाल देते हैं, किन्तु दुर्वचनरूपी शस्त्र का घाव हृदय के भीतर चुभता है और वह कभी नहीं भरता।"

ब्रह्मचारी च नित्यं स्यात् पादं पादेन नाक्रमेत् ।
अमावास्यां पौर्णमास्यां चतुर्दश्यां च सर्वशः ॥

अष्टम्यां सर्वपक्षाणां ब्रह्मचारी सदा भवेत् ।
आक्रोशं परिवादं च पैशुन्यं च विवर्जयेत् ॥

दूसरोंके पहने हुए वस्त्र और जूते न पहने । सदा ब्रह्मचर्यका पालन करे । पैरसे पैरको न दबावे । सभी पक्षोंकी अमावास्या, पौर्णमासी, चतुर्दशी और अष्टमी तिथिको सदा ब्रह्मचारी रहे— स्त्री - समागम न करे । किसीकी निंदा, बदनामी और चुगली न करे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 28–30पृष्ठ 915

"अतः किसी भी हीनाङ्ग, विद्याहीन, निन्दित, कुरूप, निर्धन या निर्बल मनुष्यों पर आक्षेप न करें। क्रोध में आकर अपने पुत्र या शिष्य के सिवा दूसरे को न मारें; शिक्षा हेतु उन्हें ताड़ना देना उचित है। ब्राह्मणों की निन्दा न करें और घर-घर घूमकर नक्षत्र या तिथि न बताते रहें। भोजन से पूर्व और मार्ग चलने के बाद पैर धो लेने चाहिए। जिस वस्तु पर किसी की दूषित दृष्टि न पड़ी हो, जो जल से धोई गई हो और जिसकी ब्राह्मण प्रशंसा करते हों— वही पवित्र है। अपने लिए स्वयं भोजन बनाने के बजाय देवताओं के लिए अन्न तैयार करें। प्रतिदिन अग्नि की सेवा करें, भिक्षु को भिक्षा दें और मौन रहकर दन्तधावन करें।"

परस्य दण्डं नोद्यच्छेत् क्रुद्धो नैनं निपातयेत् ।
अन्यत्र पुत्राच्छिष्याच्च शिक्षार्थं ताडनं स्मृतम् ॥

क्रोधमें आकर पुत्र या शिष्यके सिवा दूसरे किसीको न तो डंडा मारे, न उसे पृथ्वीपर ही गिरावे । हाँ, शिक्षाके लिये पुत्र या शिष्यको ताड़ना देना उचित माना गया है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 37पृष्ठ 916

"सूर्योदय होने तक कभी न सोएँ; यदि ऐसा हो जाए तो प्रायश्चित करें। प्रातः उठकर सर्वप्रथम माता-पिता का अभिवादन करें, फिर आचार्य और गुरुजनों का। इससे दीर्घायु मिलती है। शास्त्रों में जिन काष्ठों का दाँतन निषिद्ध है, उन्हें त्याग दें। सदा एकाग्रचित्त होकर उत्तर की ओर मुँह करके ही मल-मूत्र का त्याग करें। बुद्धिमान पुरुषों को मलिन दर्पण में अपना मुख नहीं देखना चाहिए। विद्वान पुरुष विवाह से पूर्व मैथुन न करें, अन्यथा वे ब्रह्मचर्य व्रत के अपराधी माने जाते हैं; ऐसी दशा में उन्हें प्रायश्चित करना चाहिए। परायी स्त्री की ओर न देखें और न ही एकान्त में उसके साथ बैठें। अपनी इन्द्रियों को वश में रखें और स्वप्न में भी शुद्ध मन वाला बने रहें।"

न ब्राह्मणान् परिवदेन्नक्षत्राणि न निर्दिशेत् ।
तिथिं पक्षस्य न ब्रूयात् तथास्यायुर्न रिष्यते ॥

ब्राह्मणोंकी निंदा न करे, घर- घर घूम- घूमकर नक्षत्र और किसी पक्षकी तिथि न बताया करे । ऐसा करनेसे मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 38पृष्ठ 917

भीष्म बोले— "हे युधिष्ठिर! आयु को सुरक्षित रखने के लिए शयन, भोजन और शुद्धि के अत्यन्त सूक्ष्म नियमों का पालन करना आवश्यक है। शयन करते समय ध्यान रहे कि उत्तर अथवा पश्चिम की ओर सिर करके न सोये; विद्वान् पुरुष को सदा पूर्व अथवा दक्षिण दिशा की ओर सिर करके ही शय्या ग्रहण करनी चाहिए। कभी भी टूटी या ढीली खाट पर न सोये और अन्धेरे में पड़ी हुई शय्या पर बिना उजाला किए सहसा न लेटें। किसी दूसरे के साथ एक ही खाट पर सोने का दोष है। पलङ्ग पर कभी तिरछा होकर न लेटें, सदा सीधे ही शयन करें।"

न भग्ने नावशीर्णे च शयने प्रस्वपीत च ।
नान्तर्धाने न संयुक्ते न च तिर्यक् कदाचन ॥

टूटी और ढीली खाटपर नहीं सोना चाहिये । अँधेरेमें पड़ी हुई शय्यापर भी सहसा शयन करना उचित नहीं है ( उजाला करके उसे अच्छी तरह देख लेना चाहिये ) । किसी दूसरेके साथ एक खाटपर न सोये । इसी तरह पलंगपर कभी तिरछा होकर नहीं, सदा सीधे ही सोना चाहिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 49पृष्ठ 919

भीष्म ने आगे कहा— "नास्तिक पुरुषों के साथ, चाहे कोई काम ही क्यों न पड़े, संसर्ग न रखें; उनके शपथ खाने या प्रतिज्ञा करने पर भी उनके साथ यात्रा न करें। आसन को पैर से खींचकर कभी न बैठें। विद्वान् पुरुष को कभी नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिए और न ही रात में स्नान करना उचित है। स्नान के पश्चात अपने अङ्गों में तैल आदि की मालिश न करवाएँ। गले में पहनी हुई माला को कभी न खींचें और उसे कपड़े के ऊपर धारण न करें। रजस्वला स्त्री के साथ कभी बातचीत न करें। बोए हुए खेत में, गाँव के समीप या पानी में मल-मूत्र का त्याग कदापि न करें। देव-मन्दिरों, गौओं के समूह, देव-सम्बन्धी वृक्षों, विश्राम-स्थानों और बढ़ी हुई खेती के निकट भी मल-मूत्र त्यागना वर्जित है।"

नोत्सृजेत पुरीषं च क्षेत्रे ग्रामस्य चान्तिके ।
उभे मूत्रपुरीषे तु नाप्सु कुर्यात् कदाचन ॥

बोये हुए खेतमें, गाँवके आस-पास तथा पानीमें कभी मल-मूत्रका त्याग न करे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 54पृष्ठ 919

"हे कुन्तेय! भोजन करते समय शुद्धि का विशेष ध्यान रखें। यदि भोजन कर लिया हो, छींक आए या मार्ग में चलते हुए मल-मूत्र त्याग करना पड़े, तो यथोचित शुद्धि करके दो बार आचमन अवश्य करें। आचमन में इतना जल पिएँ कि वह हृदय तक पहुँच जाए। भोजन करने वाला पुरुष प्रतिदिन पूर्व दिशा की ओर मुँह करके मौन भाव से भोजन करे। भोजन करते समय परोसे हुए अन्न की निन्दा न करें और न ही थाली में कुछ भी छोड़ें; भोजन के पश्चात मन ही मन अग्नि का स्मरण करें। जो पूर्व की ओर मुख करके भोजन करता है उसे दीर्घायु मिलती है, दक्षिण की ओर मुख करने वाले को यश, पश्चिम की ओर मुख करने वाले को धन और उत्तराभिमुख होकर भोजन करने वाले को सत्य प्राप्त होता है।"

प्राङ्मुखो नित्यमश्नीयाद् वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन् ।
प्रस्कन्दयेच्च मनसा भुक्त्वा चाग्निमुपस्पृशेत् ॥

भोजन करनेवाला पुरुष प्रतिदिन पूर्वकी ओर मुँह करके मौन भावसे भोजन करे । भोजन करते समय परोसे हुए अन्नकी निन्दा न करे । किंचिन्मात्र अन्न थालीमें छोड़ दे और भोजन करके मन- ही- मन अग्निका स्मरण करे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 56पृष्ठ 920

"भोजन से पूर्व या पश्चात शुद्धि के लिए— अग्नि का मन से स्मरण कर जल से अपने सम्पूर्ण इन्द्रियों, अङ्गों, नाभि और दोनों हथेलियों को स्पर्श करें। भूसी, भस्म, बाल या मृतक की खोपड़ी पर कभी न बैठें। यदि कोई दूसरा नहा चुका हो, तो उसके नहाए हुए जल का दूर से ही त्याग कर दें। शान्ति-होम करें, सावित्री मन्त्रों का जप और स्वाध्याय करें। सदैव बैठकर ही भोजन करें; चलते-फिरते कदापि भोजन न करें। खड़ा होकर पेशाब करने का दोष है। राख में या गोशाला में मूत्र त्याग न करें। यदि पैर भीगे हों, तो भोजन अवश्य करें, परन्तु गीले पैरों से शयन न करें। भोजन के पश्चात हाथ-मुँह धोए बिना मनुष्य उच्छिष्ट यानी अपवित्र रहता है; ऐसी अवस्था में उसे अग्नि, गौ और ब्राह्मण— इन तीन तेजस्वियों का स्पर्श नहीं करना चाहिए। इस प्रकार आचरण करने से आयु का नाश नहीं होता।"

आर्द्रपादस्तु भुंजानो वर्षाणां जीवते शतम् ।
त्रीणि तेजांसि नोच्छिष्ट आलभेत कदाचन ॥

अग्निं गां ब्राह्मणं चैव तथा ह्यायुर्न रिष्यते । भीगे पैर भोजन करनेवाला मनुष्य सौ वर्षोंतक जीवन धारण करता है । भोजन करके हाथ -मुँह धोये बिना मनुष्य उच्छिष्ट ( अपवित्र) रहता है । ऐसी अवस्थामें उसे अग्नि, गौ तथा ब्राह्मण – इन तीन तेजस्वियोंका स्पर्श नहीं करना चाहिये । इस प्रकार आचरण करनेसे आयुका नाश नहीं होता ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 62पृष्ठ 921

भीष्म ने गम्भीर स्वर में कहा— "जो मनुष्य उच्छिष्ट अवस्था में हो, उसे सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्रों जैसे त्रिविध तेजों की ओर दृष्टि नहीं डालनी चाहिए। जब कोई वृद्ध पुरुष आए, तो तरुण पुरुष को खड़े होकर उसका स्वागत करना चाहिए और प्रणाम करना चाहिए; ऐसा करने से प्राण पुनः पूर्वावस्था में आ जाते हैं। यदि कोई वृद्ध आपके पास आए, तो उसे प्रणाम कर आसन दें और स्वयं हाथ जोड़कर उसकी सेवा में उपस्थित रहें; उसके जाने के बाद कुछ दूर तक उसके पीछे-पीछे जाएँ।"

ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति ॥

प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान् प्रतिपद्यते । वृद्ध पुरुषके आनेपर तरुण पुरुषके प्राण ऊपरकी ओर उठने लगते हैं । ऐसी दशामें जब वह खड़ा होकर वृद्ध पुरुषोंका स्वागत और उन्हें प्रणाम करता है, तब वे प्राण पुनः पूर्वावस्थामें आ जाते हैं ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 64पृष्ठ 921

"आसन फटे हुए न हों और काँस्य की थाली फूटी हुई न हो। भोजन करते समय केवल एक ही वस्त्र (धोती) पहनकर न बैठें, साथ में गमछा भी रखें। नग्न होकर स्नान न करें और न ही उच्छिष्ट अवस्था में सोएँ। जूठे हाथों से अपने मस्तक का स्पर्श कदापि न करें, क्योंकि समस्त प्राण मस्तक के ही आश्रित हैं। सिर के बाल खींचना या मस्तक पर प्रहार करना वर्जित है; दोनों हाथ सटाकर सिर न खुजलाएँ और बार-बार मस्तक पर पानी न डालें। यदि सिर पर तेल लगा लिया हो, तो उसी हाथ से दूसरे अङ्गों का स्पर्श न करें और तिल से बने पदार्थ न खाएँ।"

केशग्रहं प्रहारांश्च शिरस्येतान् विवर्जयेत् ॥

सिरके बाल पकड़कर खींचना और मस्तकपर प्रहार करना वर्जित है । दोनों हाथ सटाकर उनसे अपना सिर न खुजलावे । बारंबार मस्तकपर पानी न डाले । इन सब बातोंके पालनसे मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 68पृष्ठ 921

"भीष्म बोले— "यदि दुर्गन्धयुक्त वायु चले, तो उच्छिष्ट अवस्था में स्वाध्याय भी न करें। प्राचीन इतिहास के ज्ञाता बताते हैं कि यमराज स्वयं कहते हैं— 'जो मनुष्य जूठे मुँह उठकर दौड़ता है या स्वाध्याय करता है, मैं उसकी आयु नष्ट कर देता हूँ और उसकी सन्तानों को भी उससे छीन लेता हूँ।' जो द्विज मोहवश अनध्याय के समय अध्ययन करता है, उसके वैदिक ज्ञान और आयु का भी नाश हो जाता है। अतः सावधान पुरुष को निषिद्ध समय में वेदों का अध्ययन नहीं करना चाहिए।"

अत्र गाथा यमोद्गीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
आयुरस्य निकृन्तामि प्रजास्तस्याददे तथा ॥

उच्छिष्टो यः प्राद्रवति स्वाध्यायं चाधिगच्छति ।
यश्चानध्यायकालेऽपि मोहादभ्यस्यति द्विजः ॥

तस्य वेदः प्रणश्येत आयुश्च परिहीयते ।
तस्माद् युक्तो ह्यनध्याये नाधीयीत कदाचन ॥

प्राचीन इतिहासके जानकार लोग इस विषय में यमराजकी गायी हुई गाथा सुनाया करते हैं । ( यमराज कहते हैं— ) 'जो मनुष्य जूठे मुँह उठकर दौड़ता और स्वाध्याय करता है, मैं उसकी आयु नष्ट कर देता हूँ और उसकी संतानोंको भी उससे छीन लेता हूँ । जो द्विज मोहवश अनध्यायके समय भी अध्ययन करता है, उसके वैदिक ज्ञान और आयुका भी नाश हो जाता है । ' अतः सावधान पुरुषको निषिद्ध समयमें कभी वेदोंका अध्ययन नहीं करना चाहिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 72–74पृष्ठ 922

"जो मनुष्य सूर्य, अग्नि, गौ तथा ब्राह्मणों की ओर मुँह करके पेशाब करते हैं या बीच रास्ते में मूत्र त्याग करते हैं, वे गतायु यानी अल्पायु हो जाते हैं। मल और मूत्र का त्याग दिन में उत्तराभिमुख होकर और रात में दक्षिणाभिमुख होकर करना चाहिए; इससे आयु सुरक्षित रहती है। जिसे दीर्घ काल तक जीवित रहने की इच्छा हो, वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और सर्प— इन तीनों के दुर्बल होने पर भी इन्हें न छेड़े; क्योंकि ये अत्यन्त जहरीले होते हैं। क्रोध में भरा हुआ साँप जहाँ तक आँखों से देख पाता है, वहाँ तक धावा बोल देता है। क्षत्रिय भी कुपित होने पर शत्रु को भस्म करने की चेष्टा करता है, परन्तु ब्राह्मण जब कुपित होता है, तो वह अपने सङ्कल्प और दृष्टि मात्र से अपमान करने वाले के सम्पूर्ण कुल को दग्ध कर देता है। इसलिए समझदार मनुष्य को इन तीनों की सेवा यत्नपूर्वक करनी चाहिए।"

न चाभीक्ष्णं शिरः स्नायात् तथास्यायुर्न रिष्यते ॥

सिरके बाल पकड़कर खींचना और मस्तकपर प्रहार करना वर्जित है । दोनों हाथ सटाकर उनसे अपना सिर न खुजलावे । बारंबार मस्तकपर पानी न डाले । इन सब बातोंके पालनसे मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 69पृष्ठ 922

"हे युधिष्ठिर! गुरु के साथ कभी हठ न ठानें। यदि गुरु अप्रसन्न हों, तो उन्हें मान देकर प्रसन्न करने का प्रयास करें। गुरु प्रतिकूल व्यवहार भी करें, तब भी उनके प्रति अच्छा बर्ताव रखें; क्योंकि गुरु की निन्दा मनुष्य की आयु को दग्ध कर देती है। अपना हित चाहने वाले को चाहिए कि वह घर से दूर जाकर पेशाब करे और दूर रहकर ही पैर धोए। विद्वान् पुरुष को लाल फूलों की नहीं, बल्कि श्वेत पुष्पों की माला धारण करनी चाहिए (कमल और कुवलय को छोड़कर)। स्नान के पश्चात ललाट पर गीला चन्दन लगाना चाहिए। बुद्धिमान पुरुष को अपने कपड़ों में उलट-फेर नहीं करना चाहिए; उत्तरीय को अधोवस्त्र और अधोवस्त्र को उत्तरीय के स्थान पर न पहने।"

ब्राह्मणस्तु कुलं हन्याद् ध्यानेनावेक्षितेन च ।
तस्मादेतत् त्रयं यत्नादुपसेवेत पण्डितः ॥

क्रोधमें भरा हुआ साँप जहाँतक आँखोंसे देख पाता है, वहाँतक धावा करके काटता है । क्षत्रिय भी कुपित होनेपर अपनी शक्तिभर शत्रुको भस्म करनेकी चेष्टा करता है; परंतु ब्राह्मण जब कुपित होता है, तब वह अपनी दृष्टि और संकल्पसे अपमान करनेवाले पुरुषके सम्पूर्ण कुलको दग्ध कर डालता है; इसलिये समझदार मनुष्यको यत्नपूर्वक इन तीनोंकी सेवा करनी चाहिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 79पृष्ठ 923

"भ्रमण के लिए अलग वस्त्र, सोने के लिए अलग और देवताओं की पूजा के लिए अलग ही वस्त्र रखें। पर्वकाल में सदा ब्रह्मचारी बने रहें, स्नान करके पवित्र हों और उपवास करें। किसी दूसरे के पात्र में भोजन न करें। जिसे रजस्वला स्त्री ने स्पर्श किया हो, ऐसे अन्न का सेवन न करें। बुद्धिमान पुरुष को अपवित्र मनुष्यों या सत्पुरुषों के सामने बैठकर भोजन नहीं करना चाहिए। श्रेष्ठ पुरुष को पीपल, बड़, गूलर के फल और सन के साग का त्याग कर देना चाहिए। विद्वान् पुरुष हाथ में नमक लेकर न चाटे। रात में दही और सत्तू का सेवन वर्जित है। मांस का सर्वथा त्याग कर दें।"

स्नातस्य वर्णकं नित्यमार्द्रं दद्याद् विशाम्पते ।
विपर्ययं न कुर्वीत वाससो बुद्धिमान् नरः ॥

प्रजानाथ! स्नानके पश्चात् मनुष्यको अपने ललाटपर गीला चन्दन लगाना चाहिये । बुद्धिमान् पुरुषको कपड़ोंमें कभी उलट- फेर नहीं करना चाहिये अर्थात् उत्तरीय वस्त्रको अधोवस्त्रके स्थानमें और अधोवस्त्रको उत्तरीयके स्थानमें न पहने ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 85पृष्ठ 924

"भोजन सदैव एकाग्रचित्त होकर सुबह और शाम ही करें; बीच में कुछ न खाएँ। जिस भोजन में बाल पड़ गया हो, उसे न ग्रहण करें और शत्रु के श्राद्ध में अन्न न खाएँ। भोजन करते समय मौन रहें, खड़े होकर या बातचीत करते हुए कभी न खाएँ। भोजन की वस्तु को भूमि पर रखकर कदापि न खाएँ। यदि एक पङ्क्ति में बैठे हों, तो सबको समान भोजन दें; जो अपने मित्रों को न देकर अकेला भोजन करता है, वह हालाहल विष ही खाता है। पानी, खीर, सत्तू, दही और घी छोड़कर अन्य पदार्थों का बचा हुआ भाग दूसरे को न दें।"

नालीढया परिहतं भक्षयीत कदाचन ।
तथा नोद्धृतसाराणि प्रेक्ष्यते नाप्रदाय च ॥

जनेश्वर! किसीके साथ एक पात्रमें भोजन न करे । जिसे रजस्वला स्त्रीने अपने स्पर्शसे दूषित कर दिया हो, ऐसे अन्नका भोजन न करे एवं जिसमेंसे सार निकाल लिया गया हो ऐसे पदार्थको कदापि भक्षण न करे तथा जो तरसती हुई दृष्टिसे अन्नकी ओर देख रहा हो, उसे दिये बिना भोजन न करे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 90पृष्ठ 924

"भोजन के पश्चात कुल्ला कर मुँह धो लें और एक हाथ से दाहिने पैर के अँगूठे पर जल डालें। इसके पश्चात एकाग्रचित्त होकर हाथ सिर पर रखें और मन से अग्नि का स्पर्श करें; ऐसा करने वाला मनुष्य अपने कुटुम्ब में श्रेष्ठता प्राप्त करता है। फिर जल से आँख, नाक और नाभि को धोकर दोनों हथेलियों को धो लें, परन्तु गीले हाथ लेकर न बैठें, उन्हें कपड़ों से सुखा लें। अँगूठे का मध्य भाग 'ब्राह्मतीर्थ', कनिष्ठा की उँगलियों का अग्रभाग 'देवतीर्थ' और अङ्गूठे व तर्जनी के बीच का भाग 'पितृतीर्थ' कहलाता है; वहाँ से जल लेकर पितृकार्य करना चाहिए। अपने कल्याण चाहने वाले पुरुष को दूसरों की निन्दा या अप्रिय वचन नहीं कहने चाहिए और न ही किसी को क्रोध दिलाना चाहिए। पतित मनुष्यों के दर्शन और उनसे वार्तालाप का त्याग कर देना चाहिए; ऐसा करने से मनुष्य बड़ी आयु पाता है।"

परापवादं न ब्रूयान्नाप्रियं च कदाचन ।
न मन्युः कश्चिदुत्पाद्यः पुरुषेण भवार्थिना ॥

अपनी भलाई चाहनेवाले पुरुषको दूसरोंकी निन्दा तथा अप्रिय वचन मुँहसे नहीं निकालने चाहिये और किसीको क्रोध भी नहीं दिलाना चाहिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 105पृष्ठ 926

भीष्म बोले— "कुरुनन्दन! अब मैं तुम्हें ब्राह्मण के लिए भोजन के आदि और अन्त में किए जाने वाले पवित्र एवं हितकारक शुद्धिकरण के विधान बता रहा हूँ, इसे ध्यान से सुनो। जब भी कोई कार्य करने का सङ्कल्प हो, तो मनुष्य को अपने-अपने तीर्थ में जाकर आचमन करना चाहिए। तीन बार जल पीकर और दो बार अपने ओठों को पोंछकर ही शुद्ध होना चाहिए। ब्राह्मण के प्रत्येक शुद्धिकरण के कार्य में ब्राह्मतीर्थ से आचमन आवश्यक है; थूकने या छींकने के पश्चात झलका स्पर्श यानी आचमन करने से वह शुद्ध हो जाता है।"

ब्राह्मणार्थे च यच्छौचं तच्च मे शृणु कौरव ।
पवित्रं च हितं चैव भोजनाद्यन्तयोस्तथा ॥

कुरुनन्दन! अब ब्राह्मणके लिये भोजनके आदि और अन्तमें जो पवित्र एवं हितकारक शुद्धिका विधान है, उसे बता रहा हूँ, सुनो ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 110पृष्ठ 927

भीष्म ने युधिष्ठिर की ओर देखते हुए आगे कहा— "हे राजपत्नी! सुनो, यदि तुम्हारे पास वृद्ध कुटुम्बी, दरिद्र मित्र या कुलीन पण्डित हों और वे निर्धन अवस्था में हों, तो उनकी यथाशक्ति रक्षा करनी चाहिए और उन्हें अपने घर में ठहराना चाहिए। ऐसा करने से धन और आयु दोनों की वृद्धि होती है। घर के भीतर यदि तोता, मैना जैसे पक्षी निवास करें, तो वह अत्यन्त मङ्गलकारी होता है; वे तैलपायिक पक्षियों की भाँति अमङ्गल नहीं करते। इसके अतिरिक्त दर्पण, चन्दन, पुष्प-वल्लिका, शुद्ध जल, सोना और चाँदी का घर में होना भी सौभाग्य लाता है। किन्तु यदि घर में उद्दीपक, गीध, कपोत अथवा भ्रमर नामक पक्षी आ जाएँ, तो समझ लेना कि अमङ्गल है; ऐसे में उनकी शान्ति करानी चाहिए। याद रखना, महात्मा पुरुषों के गुप्त कर्मों को किसी पर प्रकट करना अधर्म है; उनकी निन्दा करने वाला मनुष्य अपना कल्याण नहीं कर पाता।"

गृहे पारावता धन्याः शुकाश्च सहसारिकाः ।
गृहेष्वेते न पापाय तथा वै तैलपायिकाः ॥

( देवता प्रतिमाऽऽदर्शाश्चन्दनाः पुष्पवल्लिकाः । शुद्धं जलं सुवर्णं च रजतं गृहमंगलम् ॥ ) परेवा, तोता और मैना आदि पक्षियोंका घरमें रहना अभ्युदयकारी एवं मंगलमय है । ये तैलपायिक पक्षियोंकी भाँति अमंगल करनेवाले नहीं होते । देवताकी प्रतिमा, दर्पण, चन्दन, फूलकी लता, शुद्ध जल, सोना और चाँदी - इन सब वस्तुओंका घरमें रहना मंगल - कारक है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 113पृष्ठ 927

"राजेंद्र! स्त्रियों के प्रति सावधानी बरतने का नियम अत्यन्त कठोर है। पराई स्त्रियाँ सदा अगम्य होती हैं, उनके साथ कभी समागम न करे। राजा की पत्नी और सखियों के पास भी कभी नहीं जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति सम्बन्धियों की स्त्रियों के पास जाता है, तो वह दीर्घायु प्राप्त नहीं कर पाता। बुद्धिमान पुरुष को अपने घर का निर्माण कराते समय ब्राह्मण द्वारा वास्तु-पूजन करवाना चाहिए और कुशल कारीगरों द्वारा बनाए गए घर में ही निवास करना चाहिए। जीवन में उन्नति चाहने वाले विद्वान को सन्ध्याकाल में न तो सोना चाहिए, न विद्या पढ़नी चाहिए और न ही भोजन करना चाहिए; ऐसा करने से आयु बढ़ती है। रात्रि के समय श्राद्धकर्म, केश-संस्कार या जल से स्नान करना उचित नहीं है। भरतनन्दन! रात में सत्तू का सेवन वर्जित है और भोजन के पश्चात बचा हुआ जल या अन्न त्याग देना चाहिए। जो मनुष्य स्वयं डटकर भोजन करता है या दूसरे को डटकर भोजन कराता है, उसे सावधान रहना चाहिए; और ब्राह्मण का वध तो कदापि न करे।"

महात्मनोऽतिगुह्यानि न वक्तव्यानि कर्हिचित् ।
अगम्याश्च न गच्छेत राज्ञः पत्नीं सखीस्तथा ॥

महात्मा पुरुषोंके गुप्त कर्म कहीं किसीपर प्रकट नहीं करने चाहिये । परायी स्त्रियाँ सदा अगम्य होती हैं, उनके साथ कभी समागम न करे । राजाकी पत्नी और सखियोंके पास भी कभी न जाय ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 115पृष्ठ 928

भीष्म का स्वर गम्भीर हुआ— "विवाह के विषय में भी नियम निश्चित हैं। एक श्रेष्ठ बुद्धिमान पुरुष को केवल उन्हीं सुलक्षणा कन्याओं से विवाह करना चाहिए जो श्रेष्ठ कुल में जन्मी हों, उत्तम लक्षणों से प्रशंसित हों और विवाह की योग्य अवस्था में हों। ऐसी कन्या के गर्भ से सन्तान उत्पन्न करके ही वह अपने वंश-परम्परा को प्रतिष्ठित करे। पुत्रों को ज्ञान और कुलधर्म की शिक्षा हेतु गुरु के आश्रम भेजना चाहिए। यदि कन्या हो, तो उसे बुद्धिमान और कुलीन वर के साथ ब्याह दे; और यदि पुत्र हो, तो उसका विवाह भी उत्तम कुल की कन्या से ही कराए। स्मरण रहे, श्राद्ध के लिए भी विशेष नक्षत्र होते हैं। जन्म नक्षत्र और भाद्रपद मास के पूर्वा तथा उत्तरा नक्षत्रों के अतिरिक्त, कृत्तिका नक्षत्र में भी श्राद्ध वर्जित है। आश्लेषा, आर्द्रा, ज्येष्ठा और मूल जैसे दारुण नक्षत्रों तथा प्रत्यरितारा का त्याग कर देना चाहिए; इन नक्षत्रों में देवकार्य और पितृकार्य नहीं करने चाहिए।"

महाकुले प्रसूतां च प्रशस्तां लक्षणैस्तथा ॥

वयःस्थां च महाप्राज्ञः कन्यामावोढुमर्हति । जो श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुई हो, उत्तम लक्षणोंसे प्रशंसित हो तथा विवाहके योग्य अवस्थाको प्राप्त हो गयी हो, ऐसी सुलक्षणा कन्याके साथ श्रेष्ठ बुद्धिमान् पुरुष विवाह करे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 122पृष्ठ 929

"हे भरतश्रेष्ठ! शुद्धिकरण के लिए मनुष्य को एकाग्रचित्त होकर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके हजामत (क्षौरकर्म) करवानी चाहिए, इससे आयु बढ़ती है। सत्पुरुषों, गुरुजनों, वृद्धों और विशेषकर कुलाङ्गनाओं की निन्दा करने से बचना चाहिए, क्योंकि निन्दा अधर्म का हेतु है। विवाह के समय भी सावधानी आवश्यक है; जो कन्या किसी अङ्ग से हीन हो, जिसके गोत्र अपने समान हों, जो माता के कुल में जन्मी हो, या जिसका शरीर पीला हो, जो कुष्ठ रोग या मृगीरोग से दूषित कुल की हो, उससे विवाह नहीं करना चाहिए। इसके विपरीत, जो स्त्री उत्तम लक्षणों से सम्पन्न, प्रशंसित और मनोहारिणी हो, केवल उसी के साथ गृहस्थ जीवन बसाना चाहिए। यज्ञ और देव-कार्य के लिए अग्नि उत्पन्न करके वेदों द्वारा बताई गई क्रियाओं का यत्नपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिए।"

( सतां गुरूणां वृद्धानां कुलस्त्रीणां विशेषतः ।
) परिवादं न च ब्रूयात् परेषामात्मनस्तथा ।
परिवादो ह्यधर्माय प्रोच्यते भरतर्षभ ॥

भरतश्रेष्ठ! सत्पुरुषों, गुरुजनों, वृद्धों और विशेषतः कुलांगनाओंकी, दूसरे लोगोंकी और अपनी भी निन्दा न करे; क्योंकि निन्दा करना अधर्मका हेतु बताया गया है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 129पृष्ठ 930

भीष्म ने आगे निर्देश दिया— "अपनी स्त्री की रक्षा हर उपाय से करनी चाहिए। स्त्रियों से ईर्ष्या रखना त्याग दो, क्योंकि इससे आयु क्षीण होती है। सूर्योदय के पश्चात् और दिन के समय शयन करना आयु घटाता है; प्रातःकाल और रात्रि के आरम्भ में नहीं सोना चाहिए। अपवित्र अवस्था में वेदों का अध्ययन न करें। सन्ध्याकाल में केवल शुद्ध चित्त होकर ध्यान और उपासना करनी चाहिए, वहाँ स्नान या भोजन वर्जित है। बिना बुलाए कहीं भी न जाएँ, केवल यज्ञ देखने जा सकते हैं; जहाँ आदर न हो, वहाँ जाने से आयु नष्ट होती है। अकेले परदेश जाना और रात्रि में यात्रा करना मना है; यदि बाहर जाना पड़े तो सन्ध्या से पूर्व लौट आना चाहिए। माता-पिता और गुरुजनों की आज्ञा का बिना किसी विचार के पालन करना ही कल्याणकारी है।"

प्राङ्मुखः श्मश्रुकर्माणि कारयेत् सुसमाहितः ।
उदङ्मुखो वा राजेन्द्र तथायुर्विन्दते महत् ॥

राजेन्द्र! मनुष्य एकाग्रचित्त होकर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके हजामत बनवाये, ऐसा करनेसे बड़ी आयु प्राप्त होती है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 128पृष्ठ 930

"राजेंद्र! एक क्षत्रिय को धनुर्वेद और वेदों के अध्ययन में यत्नशील रहना चाहिए। हाथी, घोड़े और रथ चलाने की कला में निपुणता प्राप्त करने का प्रयत्न करो; ऐसा करने वाला पुरुष शत्रुओं और स्वजनों के लिए दुर्धर्ष हो जाता है। जो राजा प्रजा के पालन में तत्पर रहता है, उसे कभी हानि नहीं होती। तुम्हें तर्कशास्त्र, शब्दशास्त्र और समस्त कलाओं के साथ-साथ पुराण, इतिहास और महात्माओं के चरित्र का श्रवण भी करना चाहिए। एक राजा को माननीय पुरुषों का सम्मान और निन्दनीय मनुष्यों की निन्दा करनी चाहिए; गौ और ब्राह्मणों के लिए तो प्राण भी त्याग देने चाहिए।"

प्रजापालनयुक्तश्च न क्षतिं लभते क्वचित् ।
युक्तिशास्त्रं च ते ज्ञेयं शब्दशास्त्रं च भारत ॥

जो राजा सदा प्रजाके पालनमें तत्पर रहता है, उसे कभी हानि नहीं उठानी पड़ती । भरतनन्दन! तुम्हें तर्कशास्त्र और शब्दशास्त्र दोनोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 147पृष्ठ 932

अन्त में भीष्म ने गृहस्थ जीवन के सूक्ष्म नियम बताए— "अपनी पत्नी के साथ समागम के नियमों का पालन करो। यदि वह रजस्वला हो, तो उसके पास न जाओ और न उसे बुलाओ; चौथे दिन स्नान के पश्चात ही उसके पास जाना उचित है। स्मरण रहे, पाञ्चवें दिन गर्भाधान से कन्या और समरात्रि में गर्भाधान से पुत्र की उत्पत्ति होती है, जबकि विषमरात्रि में गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है। अपने भाइयों, सम्बन्धियों और मित्रों का आदर करो। युधिष्ठिर! ये वे नियम हैं जो आयु बढ़ाते हैं; शेष नियमों को तुम बढ़े-चढ़े ब्राह्मणों से पूछकर जान लेना।"

एष ते लक्षणोद्देश आयुष्याणां प्रकीर्तितः ।
शेषस्त्रैविद्यवृद्धेभ्यः प्रत्याहार्यो युधिष्ठिर ॥

युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने तुमसे आयुकी वृद्धि करनेवाले नियमोंका संक्षेपसे वर्णन किया है । जो नियम बाकी रह गये हैं, उन्हें तुम तीनों वेदोंके ज्ञानमें बढ़े -चढ़े ब्राह्मणोंसे पूछकर जान लेना ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 153पृष्ठ 933

"हे कुन्तीपुत्र! सारांश यह है कि सदाचार ही कल्याण का जनक है। सदाचार से ही कीर्ति बढ़ती है और बुरे लक्षणों का नाश होता है। सम्पूर्ण आगमों में सदाचार को ही श्रेष्ठ माना गया है; इसी से धर्म की उत्पत्ति होती है और धर्म से आयु बढ़ती है। प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने स्वयं इन सदाचारों का उपदेश दिया था, जो यश, आयु और स्वर्ग प्राप्ति का परम आधार है।"

आचारो भूतिजनन आचारः कीर्तिवर्धनः ।
आचाराद् वर्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम् ॥

सदाचार ही कल्याणका जनक और सदाचार ही कीर्तिको बढ़ानेवाला है । सदाचारसे आयुकी वृद्धि होती है और सदाचार ही बुरे लक्षणोंका नाश करता है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 104 · श्लोक 154पृष्ठ 933

In English

Bhishma's teachings on longevity and conduct

Yudhisthira asks Bhishma why some people die young while others live long lives. Bhishma explains that following righteous conduct, daily rituals, and specific hygiene rules leads to a long life and prosperity.

This page answers

  • How to achieve longevity according to bhishma?
  • What are the rules for daily morning rituals?
  • Why does bad conduct shorten human life?
  • Rules for eating and sleeping for a long life?
  • How to show respect to elders according to dharma?

Also written: Ayushyakhyana, Ayushya, Yudhishthira, Bhishma, Brahma, आयुष्याख्यान