श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 951–960
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 951–960
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हंससारसयुक्तं च विमानं लभते नरः ।
इन्द्रलोके च वसते वरस्त्रीभिः समावृतः ॥ १५ ॥
वह मानव हंस और सारसोंसे जुते हुए विमानको पाता है और इन्द्रलोकमें सुन्दरी स्त्रियोंसे घिरा हुआ निवास करता है ॥ १५ ॥
तृतीये दिवसे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ।
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ॥ १६ ॥
अग्निकार्यपरो नित्यं नित्यं कल्यप्रबोधनः ।
अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ १७ ॥
जो बारह महीनोंतक प्रति तीसरे दिन एक समय भोजन करता, नित्य सबेरे उठता और अग्निकी परिचर्यामें तत्पर हो नित्य अग्निमें आहुति देता है, वह अतिरात्र यागका परम उत्तम फल पाता है ॥ १६-१७ ॥
मयूरहंसयुक्तं च विमानं लभते नरः ।
सप्तर्षीणां सदा लोके सोऽप्सरोभिर्वसेत् सह ॥ १८ ॥
निवर्तनं च तत्रास्य त्रीणि पद्मानि चैव ह । उसे मोरोंसे जुता हुआ विमान प्राप्त होता है और वह सदा सप्तर्षियोंके लोकमें
अप्सराओंके साथ निवास करता है । वहाँ तीन पद्म वर्षोंतक वह निवास करता है ॥ १८३
|| दिवसे यश्चतुर्थे तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ १ ९ ॥
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् ।
वाजपेयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ २० ॥
जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बारह महीनोंतक प्रति चौथे दिन एक बार भोजन करता है, वह वाजपेय यज्ञका परम उत्तम फल पाता है ॥ १ ९ -२० ॥
इन्द्रकन्याभिरूढं च विमानं लभते नरः ।
सागरस्य च पर्यन्ते वासवं लोकमावसेत् ॥ २१ ॥
देवराजस्य च क्रीडां नित्यकालमवेक्षते । उस मनुष्यको देवकन्याओंसे आरूढ़ विमान उपलब्ध होता है और वह पूर्वसागरके तटपर इन्द्रलोकमें निवास करता है तथा वहाँ रहकर वह प्रतिदिन देवराजकी क्रीडाओंको देखा करता है ॥ २१३ ॥
दिवसे पञ्चमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ २२ ॥
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ।
अलुब्धः सत्यवादी च ब्रह्मण्यश्चाविहिंसकः ॥ २३ ॥
अनसूयुरपापस्थो द्वादशाहफलं लभेत् ।
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जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर पाँचवें दिन एक समय भोजन करता है और लोभहीन, सत्यवादी, ब्राह्मणभक्त, अहिंसक और अदोषदर्शी होकर सदा पापकर्मोंसे दूर रहता है, उसे द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ २२-२३३ ॥ जाम्बूनदमयं दिव्यं विमानं हंसलक्षणम् ॥ २४ ॥
सूर्यमालासमाभासमारोहेत् पाण्डुरं गृहम् ।
आवर्तनानि चत्वारि तथा पद्मानि द्वादश ॥ २५ ॥
शराग्निपरिमाणं च तत्रासौ वसते सुखम् । वह सूर्यकी किरणमालाओंके समान प्रकाशमान तथा जाम्बूनद नामक सुवर्णके बने हुए श्वेतकान्तिवाले हंसलक्षित दिव्य विमानकर आरूढ़ होता तथा चार, बारह एवं पैंतीस ( कुल मिलाकर इक्यावन) पद्म वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है ॥ २४-२५ ३ ॥ दिवसे यस्तु षष्ठे वै मुनिः प्राशेत भोजनम् ॥ २६ ॥
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् ।
सदा त्रिषवणस्नायी ब्रह्मचार्यनसूयकः ॥ २७ ॥
गवां मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् । जो बारह महीनेतक सदा अग्निहोत्र करता, तीनों संध्याओंके समय स्नान करता, ब्रह्मचर्यका पालन करता, दूसरोंके दोष नहीं देखता तथा मुनिवृत्तिसे रहकर प्रति छठे दिन एक बार भोजन करता है, वह गोमेध यज्ञका सर्वोत्तम फल पाता है ॥ २६-२७ ॥ अग्निज्वालासमाभासं हंसबर्हिणसेवितम् ॥ २८ ॥
शातकुम्भसमायुक्तं साधयेद् यानमुत्तमम् ।
तथैवाप्सरसामङ्के प्रतिसुप्तः प्रबोध्यते ॥ २९ ॥
नूपुराणां निनादेन मेखलानां च निःस्वनैः । उसे अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान, हंस और मयूरोंसे सेवित, सुवर्णजटित उत्तम विमान प्राप्त होता है और वह अप्सराओंके अंकमें सोकर उन्हींके कांचीकलाप तथा नूपुरोंकी मधुर ध्वनिसे जगाया जाता है ॥ कोटीसहस्रं वर्षाणां त्रीणि कोटिशतानि च ॥ ३० ॥
पद्मान्यष्टादश तथा पताके द्वे तथैव च ।
अयुतानि च पञ्चाशदृक्षचर्मशतस्य च ॥ ३१ ॥
लोम्नां प्रमाणेन समं ब्रह्मलोके महीयते । वह मनुष्य दो पताका ( महापद्म ), अठारह पद्म, एक हजार तीन सौ करोड़ और पचास अयुत वर्षोंतक तथा सौ रीछोंके चमड़ोंमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक ब्रह्मलोकमें सम्मानित होता है ॥ ३०-३११ ॥ दिवसे सप्तमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ ३२ ॥
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सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् ।
सरस्वतीं गोपयानो ब्रह्मचर्यं समाचरन् ॥ ३३ ॥
सुमनोवर्णकं चैव मधुमांसं च वर्जयन् ।
पुरुषो मरुतां लोकमिन्द्रलोकं च गच्छति ॥ ३४ ॥
जो बारह महीनोंतक प्रति सातवें दिन एक समय भोजन करता, प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता, वाणीको संयममें रखता और ब्रह्मचर्यका पालन करता एवं फूलोंकी माला, चन्दन, मधु और मांसका सदाके लिये त्याग कर देता है, वह पुरुष मरुद्गणों तथा इन्द्रके लोकमें जाता है ॥ ३२–३४ ॥
तत्र तत्र हि सिद्धार्थो देवकन्याभिरर्च्यते ।
फलं बहुसुवर्णस्य यज्ञस्य लभते नरः ॥ ३५ ॥
संख्यामतिगुणां चापि तेषु लोकेषु मोदते । उन सभी स्थानोंमें सफलमनोरथ होकर वह देवकन्याओंद्वारा पूजित होता है तथा जिस यज्ञमें बहुत - से सुवर्णकी दक्षिणा दी जाती है, उसके फलको वह प्राप्त कर लेता है और असंख्य वर्षोंतक वह उन लोकोंमें आनन्द भोगता है ॥ ३५३ ॥
यस्तु संवत्सरं क्षान्तो भुङ्क्तेऽहन्यष्टमे नरः ॥ ३६ ॥
देवकार्यपरो निन्यं जुह्वानो जातवेदसम् ।
पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ३७ ॥
जो एक वर्षतक प्रति आठवें दिन एक बार भोजन करता, सबके प्रति क्षमाभाव रखता, देवताओंके कार्यमें तत्पर रहता और नित्यप्रति अग्निहोत्र करता है, उसे पौण्डरीक यागका सर्वश्रेष्ठ फल मिलता है ॥ ३६-३७ ॥
पद्मवर्णनिभं चैव विमानमधिरोहति ।
कृष्णाः कनकगौर्यश्च नार्यः श्यामास्तथापराः ॥ ३८ ॥
वयोरूपविलासिन्यो लभते नात्र संशयः । वह कमलके समान वर्णवाले विमानपर चढ़ता है और वहाँ उसे श्यामवर्णा, सुवर्णसदृश गौर वर्णवाली, सोलह वर्षकी- सी अवस्थावाली और नूतन यौवन तथा मनोहर रूप-विलाससे सुशोभित देवांगनाएँ प्राप्त होती हैं । इसमें संशय नहीं है ॥ ३८३ ॥
यस्तु संवत्सरं भुङ्क्ते नवमे नवमेऽहनि ॥ ३ ९ ॥
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् ।
अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ४० ॥
जो एक वर्षतक नौ - नौ दिनपर एक समय भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञका परम उत्तम फल प्राप्त होता है ॥ ३ ९-४० ॥ पुण्डरीकप्रकाशं च विमानं लभते नरः ।
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दीप्तसूर्याग्नितेजोभिर्दिव्यमालाभिरेव च । ४१ ॥
नीयते रुद्रकन्याभिः सोऽन्तरिक्षं सनातनम् ।
अष्टादश सहस्राणि वर्षाणां कल्पमेव च ॥ ४२ ॥
कोटीशतसहस्रं च तेषु लोकेषु मोदते । तथा वह पुण्डरीकके समान श्वेत वर्णोंका विमान पाता है । दीप्तिमान् सूर्य और अग्निके समान तेजस्विनी और दिव्यमालाधारिणी रुद्रकन्याएँ उसे सनातन अन्तरिक्ष - लोकमें ले जाती हैं और वहाँ वह एक कल्प लाख करोड़ एवं अठारह हजार वर्षोंतक सुख भोगता है ॥ यस्तु संवत्सरं भुङ्क्ते दशाहे वै गते गते ॥ ४३ ॥
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् ।
ब्रह्मकन्यानिवासे च सर्वभूतमनोहरे ॥ ४४ ॥
अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ।
रूपवत्यश्च तं कन्या रमयन्ति सनातनम् ॥ ४५ ॥
जो एक वर्षतक दस - दस दिन बीतनेपर एक बार भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह सम्पूर्ण भूतोंके लिये मनोहर ब्रह्मकन्याओंके निवास-स्थानमें जाकर एक हजार अश्वमेध यज्ञोंका परम उत्तम फल पाता है और उस सनातन पुरुषका वहाँकी रूपवती कन्याएँ मनोरंजन करती हैं ॥
नीलोत्पलनिभैर्वर्णै रक्तोत्पलनिभैस्तथा ।
विमानं मण्डलावर्तमावर्तगहनाकुलम् ॥ ४६ ॥
सागरोर्मिप्रतीकाशं लभेद् यानमनुत्तमम् ।
विचित्रमणिमालाभिर्नादितं शंखनिःस्वनैः ॥ ४७ ॥
वह नीले और लाल कमलके समान अनेक रंगोंसे सुशोभित, मण्डलाकार घूमनेवाला, भँवरके समान गहन चक्कर लगानेवाला, सागरकी लहरोंके समान ऊपर- नीचे होनेवाला, विचित्र मणिमालाओंसे अलंकृत और शंखध्वनिसे परिपूर्ण सर्वोत्तम विमान प्राप्त करता है ॥
स्फाटिकैर्वज्रसारैश्च स्तम्भैः सुकृतवेदिकम् ।
आरोहति महद् यानं हंससारसनादितम् ॥ ४८ ॥
उसमें स्फटिक और वज्रसारमणिके खम्भे लगे होते हैं । उसपर सुन्दर ढंगसे बनी हुई वेदी शोभा पाती है तथा वहाँ हंस और सारस पक्षी कलरव करते रहते हैं । ऐसे विशाल विमानपर चढ़ता और स्वच्छन्द घूमता है ॥
एकादशे तु दिवसे यः प्राप्ते प्राशते हविः ।
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ॥ ४ ९ ॥
परस्त्रियं नाभिलषेद् वाचाथ मनसापि वा ।
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अनृतं च न भाषेत मातापित्रोः कृतेपि वा ॥ ५० ॥
अभिगच्छेन्महादेवं विमानस्थं महाबलम् ।
अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ५१ ॥
जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ प्रति ग्यारहवें दिन एक बार हविष्यान्न ग्रहण करता है, मन- वाणीसे भी कभी परस्त्रीकी अभिलाषा नहीं करता है और माता-- पिताके लिये भी कभी झूठ नहीं बोलता है, वह विमानमें विराजमान परम शक्तिमान् महादेवजीके समीप जाता और हजार अश्वमेध यज्ञोंका सर्वोत्तम फल पाता है ॥ ४ ९– ५१ ॥
स्वायम्भुवं च पश्येत विमानं समुपस्थितम् ।
कुमार्यः काञ्चनाभासा रूपवत्यो नयन्ति तम् ॥ ५२ ॥
रुद्राणां तमधीवासं दिवि दिव्यं मनोहरम् । वह अपने पास ब्रह्माजीका भेजा हुआ विमान स्वतः उपस्थित देखता है । सुवर्णके समान रंगवाली रूपवती कुमारियाँ उसे उस विमानद्वारा द्युलोकमें दिव्य मनोहर रुद्रलोकमें ले जाती हैं ॥ ५२ ॥
वर्षाण्यपरिमेयानि युगान्ताग्निसमप्रभः ॥ ५३ ॥
कोटीशतसहस्रं च दशकोटिशतानि च ।
रुद्रं नित्यं प्रणमते देवदानवसम्मतम् ॥ ५४ ॥
स तस्मै दर्शनं प्राप्तो दिवसे दिवसे भवेत् । वहाँ वह प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी शरीर धारण करके असंख्य वर्षोंतक एक लाख एक हजार करोड़ वर्षोंतक निवास करता हुआ प्रतिदिन देवदानव-सम्मानित भगवान् रुद्रको प्रणाम करता है । वे भगवान् उसे नित्य - प्रति दर्शन देते रहते हैं ॥ दिवसे द्वादशे यस्तु प्राप्ते वै प्राशते हविः ॥ ५५ ॥
सदा द्वादशमासान् वै सर्वमेधफलं लभेत् । जो बारह महीनोंतक प्रति बारहवें दिन केवल हविष्यान्न ग्रहण करता है, उसे सर्वमेध यज्ञका फल मिलता है ॥ ५५३ ॥
आदित्यद्वादशं तस्य विमानं संविधीयते ॥ ५६ ॥
मणिमुक्ताप्रवालैश्च महार्हैरुपशोभितम् ।
हंसमालापरिक्षिप्तं नागवीथीसमाकुलम् ॥ ५७ ॥
मयूरैश्चक्रवाकैश्च कूजद्भिरुपशोभितम् ।
अट्टैर्महद्भिः संयुक्तं ब्रह्मलोके प्रतिष्ठितम् ॥ ५८ ॥
नित्यमावसथं राजन् नरनारीसमावृतम् ।
ऋषिरेवं महाभागस्त्वङ्गिरा प्राह धर्मवित् ॥ ५ ९ ॥
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उसके लिये बारह सूर्योंके समान तेजस्वी विमान प्रस्तुत किया जाता है । बहुमूल्यमणि, मुक्ता और मूँगे उस विमानकी शोभा बढ़ाते हैं। हंसश्रेणीसे परिवेष्टित और नागवीथीसे परिव्याप्त वह विमान कलरव करते हुए मोरों और चक्रवाकोंसे सुशोभित तथा ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित है । उसके भीतर बड़ी- बड़ी अट्टालिकाएँ बनी हुई हैं । राजन्! वह नित्य-निवासस्थान अनेक नर-नारियोंसे भरा हुआ होता है। यह बात महाभाग धर्मज्ञ ऋषि अंगिराने कही थी ॥ ५६–५९ ॥
त्रयोदशे तु दिवसे प्राप्ते यः प्राशते हविः ।
सदा द्वादशमासान् वै देवसत्रफलं लभेत् ॥ ६० ॥
जो बारह महीनोंतक सदा तेरहवें दिन हविष्यान्न भोजन करता है, उसे देवसत्रका फल प्राप्त होता है ॥
रक्तपद्मोदयं नाम विमानं साधयेन्नरः ।
जातरूपप्रयुक्तं च रत्नसंचयभूषितम् ॥ ६१ ॥
देवकन्याभिराकीर्णं दिव्याभरणभूषितम् ।
पुण्यगन्धोदयं दिव्यं वायव्यैरुपशोभितम् ॥ ६२ ॥
उस मनुष्यको रक्तपद्मोदय नामक विमान उपलब्ध होता है, जो सुवर्णसे जटित तथा रत्नसमूहसे विभूषित है । उसमें देवकन्याएँ भरी रहती हैं, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित उस विमानकी बड़ी शोभा होती है । उससे पवित्र सुगन्ध प्रकट होती रहती है तथा वह दिव्य विमान वायव्यास्त्रसे शोभायमान होता है ॥ ६१-६२ ॥
तत्र शंखपताके द्वे युगान्तं कल्पमेव च ।
अयुतायुतं तथा पद्मं समुद्रं च तथा वसेत् ॥ ६३ ॥
वह व्रतधारी पुरुष दो शंख, दो पताका ( महापद्म), एक कल्प एवं एक चतुर्युग तथा दस करोड़ एवं चार पद्म वर्षोंतक ब्रह्मलोकमें निवास करता है ॥ ६३ ॥
गीतगन्धर्वघोषैश्च भेरीपणवनिःस्वनैः ।
सदा प्रह्लादितस्ताभिर्देवकन्याभिरिज्यते ॥ ६४ ॥
वहाँ देवकन्याएँ गीत और वाद्योंके घोष तथा भेरी और पणवकी मधुर ध्वनिसे उस पुरुषको आनन्द प्रदान करती हुई सदा उसका पूजन करती हैं ॥ ६४ ॥
चतुर्दशे तु दिवसे यः पूर्णे प्राशते हविः ।
सदा द्वादशमासांस्तु महामेधफलं लभेत् ॥ ६५ ॥
जो बारह महीनेतक प्रति चौदहवें दिन हविष्यान्न भोजन करता है, वह महामेध यज्ञका फल पाता है ॥
अनिर्देश्यवयोरूपा देवकन्याः स्वलंकृताः ।
मृष्टतप्तांगदधरा विमानैरुपयान्ति तम् ॥ ६६ ॥
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जिनके यौवन तथा रूपका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी देवकन्याएँ तपाये हुए शुद्ध स्वर्णके अंगद ( बाजूबन्द ) और अन्यान्य अलंकार धारण करके विमानोंद्वारा उस पुरुषकी सेवामें उपस्थित होती हैं ॥ ६६ ॥
कलहंसविनिर्घोषैर्नूपुराणां च निःस्वनैः ।
काञ्चीनां च समुत्कर्षैस्तत्र तत्र निबोध्यते ॥ ६७ ॥
वह सो जानेपर कलहंसोंके कलरवों, नूपुरोंकी मधुर झनकारों तथा काञ्चीकी मनोहर ध्वनियोंद्वारा जगाया जाता है ॥ ६७ ॥
देवकन्यानिवासे च तस्मिन् वसति मानवः ।
जाह्नवीवालुकाकीर्णं पूर्णं संवत्सरं नरः ॥ ६८ ॥
वह मानव देवकन्याओंके उस निवासस्थानमें उतने वर्षोंतक निवास करता है, जितने कि गंगाजीमें बालूके कण हैं ॥ ६८ ॥
यत्तु पक्षे गते भुङ्क्ते एकभक्तं जितेन्द्रियः ।
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ॥ ६९ ॥
राजसूयसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ।
यानमारोहते दिव्यं हंसबर्हिणसेवितम् ॥ ७० ॥
जो जितेन्द्रिय पुरुष बारह महीनोंतक प्रति पंद्रहवें दिन एक बार खाता और प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वह एक हजार राजसूय यज्ञका सर्वोत्तम फल पाता है और हंस तथा मोरोंसे सेवित दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है ॥ ६ ९ -७० ॥
मणिमण्डलकैश्चित्रं जातरूपसमावृतम् ।
दिव्याभरणशोभाभिर्वरस्त्रीभिरलंकृतम् ॥ ७१ ॥
वह विमान सुवर्णपत्रसे जटित तथा मणिमय मण्डलाकार चिह्नोंसे विचित्र शोभासम्पन्न है । दिव्य वस्त्राभूषणोंसे शोभायमान सुन्दरी रमणियाँ उसे सुशोभित किये रहती है ॥ ७१ ॥
एकस्तम्भं चतुर्द्वारं सप्तभौमं सुमंगलम् ।
वैजयन्तीसहस्रैश्च शोभितं गीतनिःस्वनैः ॥ ७२ ॥
उस विमानमें एक ही खम्भा होता है, चार दरवाजे लगे होते हैं । वह सात तल्लोंसे युक्त एवं परममंगलमय विमान सहस्रों वैजयन्ती पताकाओंसे सुशोभित तथा गीतोंकी मधुर-ध्वनिसे व्याप्त होता है ॥
दिव्यं दिव्यगुणोपेतं विमानमधिरोहति ।
मणिमुक्ताप्रवालैश्च भूषितं वैद्युतप्रभम् ॥ ७३ ॥
वसेद् युगसहस्रं च खड्गकुञ्जरवाहनः ।
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मणि, मोती और मूँगोंसे विभूषित वह दिव्य विमान विद्युत्की - सी प्रभासे प्रकाशित तथा दिव्य गुणोंसे सम्पन्न होता है । वह व्रतधारी पुरुष उसी विमानपर आरूढ़ होता है । उसमें गेंडे और हाथी जुते होते हैं तथा वहाँ एक सहस्र युगोंतक वह निवास करता है ॥ ७३ ३ ॥ षोडशे दिवसे प्राप्ते यः कुर्यादेकभोजनम् ॥ ७४ ॥
सदा द्वादशमासान् वै सोमयज्ञफलं लभेत् । जो बारह महीनोंतक प्रति सोलहवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे सोमयागका फल मिलता है ॥ सोमकन्यानिवासेषु सोऽध्यावसति नित्यशः ॥ ७५ ॥
सौम्यगन्धानुलिप्तश्च कामकारगतिर्भवेत् । वह सोम- कन्याओंके महलोंमें नित्य निवास करता है, उसके अंगोंमें सौम्य गन्धयुक्त अनुलेप लगाया जाता है । वह अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ चाहता है, घूमता है ॥ सुदर्शनाभिर्नारीभिर्मधुराभिस्तथैव च ॥ ७६ ॥
अर्च्यते वै विमानस्थः कामभोगैश्च सेव्यते । वह विमानपर विराजमान होता है और देखनेमें परम सुन्दरी तथा मधुरभाषिणी दिव्य नारियाँ उसकी पूजा करती तथा उसे काम - भोगका सेवन कराती हैं ॥ फलं पद्मशतप्रख्यं महाकल्पं दशाधिकम् ॥ ७७ ॥
आवर्तनानि चत्वारि साधयेच्चाप्यसौ नरः । वह पुरुष सौ पद्म वर्षोंके समान दस महाकल्प तथा चार चतुर्युगीतक अपने पुण्यका फल भोगता है ॥ ७७ ॥
दिवसे सप्तदशमे यः प्राप्ते प्राशते हविः ॥ ७८ ॥
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् ।
स्थानं वारुणमैन्द्रं च रौद्रं वाप्यधिगच्छति ॥ ७९ ॥
मारुतौशनसे चैव ब्रह्मलोकं स गच्छति ।
तत्र दैवतकन्याभिरासनेनोपचर्यते ॥ ८० ॥
जो मनुष्य बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ सोलह दिन उपवास करके सत्रहवें दिन केवल हविष्यान्न भोजन करता है, वह वरुण, इन्द्र, रुद्र, मरुत, शुक्राचार्यजी तथा ब्रह्माजीके लोकमें जाता है और उन लोकोंमें देवताओंकी कन्याएँ आसन देकर उसका पूजन करती हैं ॥ ७८–८० ॥
भूर्भुवं चापि देवर्षिं विश्वरूपमवेक्षते ।
तत्र देवाधिदेवस्य कुमार्यो रमयन्ति तम् ॥ ८१ ॥
द्वात्रिंशद् रूपधारिण्यो मधुराः समलंकृताः ।
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वह पुरुष भूर्लोक, भुवर्लोक तथा विश्वरूपधारी देवर्षिका वहाँ दर्शन करता है और देवाधिदेवकी कुमारियाँ उसका मनोरंजन करती हैं । उनकी संख्या बत्तीस है । वे मनोहर रूपधारिणी, मधुरभाषिणी तथा दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत होती हैं ॥ ८१३ ॥
चन्द्रादित्यावुभौ यावद् गगने चरतः प्रभो ॥ ८२ ॥
तावच्चरत्यसौ धीरः सुधामृतरसाशनः । प्रभो! जबतक आकाशमें चन्द्रमा और सूर्य विचरते हैं, तबतक वह धीर पुरुष सुधा एवं अमृतरसका भोजन करता हुआ ब्रह्मलोकमें विहार करता है ॥ ८२३ ॥
अष्टादशे यो दिवसे प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ ८३ ॥
सदा द्वादशमासान् वै सप्तलोकान् स पश्यति । जो लगातार बारह महीनोंतक प्रति अठारहवें दिन एक बार भोजन करता है, वह भू आदि सातों लोकोंका दर्शन करता है ॥ ८३ ॥
रथैः सनन्दिघोषैश्च पृष्ठतः सोऽनुगम्यते ॥ ८४ ॥
देवकन्याधिरूढैस्तु भ्राजमानैः स्वलंकृतैः । उसके पीछे आनन्दपूर्वक जयघोष करते हुए बहुत -से तेजस्वी एवं सजे - सजाये रथ चलते हैं । उन रथोंपर देवकन्याएँ बैठी होती हैं ॥ ८४३ ॥
व्याघ्रसिंहप्रयुक्तं च मेघस्वननिनादितम् ॥ ८५ ॥
विमानमुत्तमं दिव्यं सुसुखी ह्यधिरोहति । उसके सामने व्याघ्र और सिंहोंसे जुता हुआ तथा मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाला दिव्य एवं उत्तम विमान प्रस्तुत होता है, जिसपर वह अत्यन्त सुखपूर्वक आरोहण करता है ॥ ८५३ ॥
तत्र कल्पसहस्रं स कन्याभिः सह मोदते ॥ ८६ ॥
सुधारयं च भुञ्जीत अमृतोपममुत्तमम् । उस दिव्य लोकमें वह एक हजार कल्पोंतक देवकन्याओंके साथ आनन्द भोगता और अमृतके समान उत्तम सुधारसका पान करता है ॥ ८६ ॥
एकोनविंशतिदिने यो भुङ्क्ते एकभोजनम् ॥ ८७ ॥
सदा द्वादशमासान् वै सप्तलोकान् स पश्यति । जो लगातार बारह महीनोंतक उन्नीसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह भी भू आदि सातों लोकोंका दर्शन करता है ॥ ८७३ ॥
उत्तमं लभते स्थानमप्सरोगणसेवितम् ॥ ८८ ॥
गन्धर्वैरुपगीतं च विमानं सूर्यवर्चसम् । उसे अप्सराओंद्वारा सेवित उत्तम स्थान- गन्धर्वोंके गीतोंसे गूँजता हुआ सूर्यके समान तेजस्वी विमान प्राप्त होता है ॥ ८८३ ॥
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तत्रामरवरस्त्रीभिर्मोदते विगतज्वरः ॥ ८९ ॥
दिव्याम्बरधरः श्रीमानयुतानां शतं शतम् । उस विमानमें वह सुन्दरी देवांगनाओंके साथ आनन्द भोगता है । उसे कोई चिन्ता तथा रोग नहीं सताते । दिव्यवस्त्रधारी और श्रीसम्पन्न रूप धारण करके वह दस करोड़ वर्षोंतक वहाँ निवास करता है ॥ ८९ ३ ॥ पूर्णेऽथ विंशे दिवसे यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् ॥ ९ ० ॥
सदा द्वादशमासांस्तु सत्यवादी धृतव्रतः ।
अमांसाशी ब्रह्मचारी सर्वभूतहिते रतः ॥ ९ १ ॥
स लोकान् विपुलान् रम्यानादित्यानामुपाश्नुते । जो लगातार बारह महीनेतक पूरे बीस दिनपर एक बार भोजन करता, सत्य बोलता, व्रतका पालन करता, मांस नहीं खाता, ब्रह्मचर्यका पालन करता तथा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहता है, वह सूर्यदेवके विशाल एवं रमणीय लोकोंमें जाता है ॥ ९० -९ १३ ॥ गन्धर्वैरप्सरोभिश्च दिव्यमाल्यानुलेपनैः ॥ ९ २ ॥ विमानैः काञ्चनैर्हयैः पृष्ठतश्चानुगम्यते । उसके पीछे - पीछे दिव्यमाला और अनुलेपन धारण करनेवाले गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे सेवित सोनेके मनोरम विमान चलते हैं ॥ ९ २३ ॥ एकविंशे तु दिवसे यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् ॥ ९ ३ ॥
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् ।
लोकमौशनसं दिव्यं शक्रलोकं च गच्छति ॥ ९ ४ ॥
अश्विनोर्मरुतां चैव सुखेष्वभिरतः सदा ।
अनभिज्ञश्च दुःखानां विमानवरमास्थितः ॥ ९ ५ ॥
सेव्यमानो वरस्त्रीभिः क्रीडत्यमरवत् प्रभुः । जो लगातार बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ इक्कीसवें दिनपर एक बार भोजन करता है, वह शुक्राचार्य तथा इन्द्रके दिव्यलोकमें जाता है । इतना ही नहीं, उसे अश्विनीकुमारों और मरुद्गणोंके लोकोंकी भी प्राप्ति होती है । उन लोकोंमें वह सदा सुख भोगनेमें ही तत्पर रहता है । दुःखोंका तो वह नाम भी नहीं जानता है और श्रेष्ठ विमानपर विराजमान हो सुन्दरी स्त्रियोंसे सेवित होता हुआ शक्तिशाली देवताके समान क्रीड़ा करता है ॥ ९ ३ – ९ ५३ ॥ द्वाविंशे दिवसे प्राप्ते यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् ॥ ९ ६ ॥
सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् ।
अहिंसानिरतो धीमान् सत्यवागनसूयकः ॥ ९ ७ ॥
लोकान् वसूनामाप्नोति दिवाकरसमप्रभः ।
कामचारी सुधाहारो विमानवरमास्थितः ॥ ९ ८ ॥