श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 1–10
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 1–10
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अष्टाङ्गहृदयम् डॉ ॰ ब्रह्मानन्द त्रिपाठी
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॥ श्रीः ॥ व्रजजीवन आयुर्विज्ञान ग्रन्थमाला 27 अष्टाङ्गहृदयम् ‘ निर्मला ’ - हिन्दीव्याख्यया विशेषवक्तव्यादिभिश्च विभूषितम् ( सूत्रस्थान ) व्याख्याकार डॉ. ब्रह्मानन्द त्रिपाठी साहित्य - आयुर्वेद - ज्यौतिष - आचार्य एम.ए., पी - एच.डी., डी.एस - सी.ए. खाने सर्व प्रतिष्ठितम् चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान दिल्ली
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अष्टाङ्गहृदयम् प्रकाशक चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान 38 यू. ए. जवाहर नगर, बंगलो रोड़ पो. बा. नं. 2113 face - 110007 दूरभाष: 23856391; 41530902 सर्वाधिकार सुरक्षित पुनर्मुद्रित संस्करण 2014 पेज: 36 + 336 + 14 मूल्य: I 200.00 अन्य प्राप्तिस्थान चौखम्बा विद्याभवन चौक ( बैंक ऑफ बड़ौदा भवन के पीछे ) पो. बा. नं. 1069 वाराणसी - 221001 चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन के. 37/117 गोपाल मन्दिर लेन पो. बा. नं. 1129 वाराणसी - 221001 चौखम्बा पब्लिशिंग हाउस 4697/2, भू - तल ( ग्राउण्ड फ्लोर ) गली नं. 21 - ए, अंसारी रोड़ दरियागंज, नई दिल्ली- 110002 ISBN: 978-81-7084-559-0 मुद्रक: ए. के. लिथोग्राफर्स, दिल्ली
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THE VRAJAJIVAN AYURVIJNANA GRANTHAMALA 27 ASTANGA HRDAYAM OF SRIMADVAGBHATA Edited with ' Nirmala ' Hindi Commentary Alongwith Special Deliberation etc. By Dr. Brahmanand Tripathi Sahitya - Ayurveda - Jyotish - Acharya M.A., Ph.D., D.Sc. A. ज्ञाने सर्व प्रतिष्ठितम् ) CHAUKHAMBA SANSKRIT PRATISHTHAN DELHI
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AITANGA HIDAYAM STH ADIATZA Publishers: CHAUKHAMBA SANSKRIT PRATISHTHAN ( Oriental Publishers & Distributors ) 38 U. A., Bungalow Road, Jawahar Nagar Post Box No. 2113 Delhi 110007 Phone: ( 011 ) 23856391, 41530902 E - mail: cspdel.sales@gmail.com All Rights Reserved Reprinted: 2014 Pages: 36 + 336 + 14 Price: 200.00 Also can be had from: CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN Chowk ( Behind The Bank of Baroda Building ) Post Box No. 1069 Varanasi 221001 CHAUKHAMBA SURBHARATI PRAKASHAN K. 37/117 Gopal Mandir Lane Post Box No. 1129 Varanasi 221001 CHAUKHAMBA PUBLISHING HOUSE 4697/2, Ground Floor, Street No. 21 - A Ansari Road, Darya Ganj New Delhi 110002 ISBN: 978-81-7084-559-0 AHMADIJAHO Printed by: A. K. Lithographers, Delhi
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समर्पण पद्य श्रीलालचन्द्र! ' गुरुवर्य '! विदां वरिष्ठ! पीयूषपाणिरितिविश्रुत! कीर्तिसिन्धो! वाराणसेयजनतानुतपादपद्म, भक्त्याऽर्पयामि भवते स्वकृतिं नवीनाम् ॥ १ ॥
अष्टाङ्गहृदये शास्त्रकाव्ये वाग्भटनिर्मिते ।
व्याख्यैषा निर्मला भायाद् ब्रह्मानन्दकृता नवा ॥ २ ॥
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पुरोवचन आयुर्वेदीय वाङ्मय का इतिहास ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवों से सम्बन्धित होने के कारण अत्यन्त प्राचीन, गौरवास्पद एवं विस्तृत है । भगवान् धन्वन्तरि ने इस आयुर्वेद को ' तदिदं शाश्वतं पुण्यं स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं वृत्तिकरं चेति ' ( सु.सू. १।१ ९ ) कहा है । लोकोपकार की दृष्टि से इस विस्तृत आयुर्वेद को बाद में आठ अंगों में विभक्त कर दिया गया । तब से इसे ' अष्टांग आयुर्वेद ' कहा जाता है । इन अंगों का विभाजन उस समय के आयुर्वेदज्ञ महर्षियों ने किया । कालान्तर में कालचक्र के अव्याहत आघात से तथा अन्य अनेक कारणों से ये अंग खण्डित होने के साथ प्रायः लुप्त भी हो गये । शताब्दियों के पश्चात् ऋषिकल्प आयुर्वेदविद् विद्वानों ने आयुर्वेद के उन खण्डित अंगों की पुनः रचना की । खण्डित अंशों की पूर्ति युक्त उन संहिता ग्रन्थों को प्रतिसंस्कृत कहा जाने लगा, जैसे कि आचार्य दृढ़बल द्वारा प्रतिसंस्कृत चरकसंहिता । इसके अतिरिक्त प्राचीन खण्डित संहिताओं में भेड ( ल ) संहिता तथा काश्यपसंहिता के नाम भी उल्लेखनीय हैं । तदनन्तर संग्रह की प्रवृत्ति से रचित संहिताओं में अष्टांगसंग्रह तथा अष्टांगहृदय संहिताएँ प्रमुख एवं सुप्रसिद्ध हैं । परवर्ती विद्वानों ने वर्गीकरण की दृष्टि से आयुर्वेदीय संहिताओं का विभाजन बृहत्त्रयी तथा लघुत्रयी के रूप में किया । बृहत्त्रयी में - चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता तथा अष्टांगहृदय का समावेश किया गया है, क्योंकि ' गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति ' । यह भी तथ्य है कि वाग्भट की कृतियों में जितना प्रचार - प्रसार ' अष्टांगहृदय ' का है, उतना ‘ अष्टांगसंग्रह ' का नहीं है । इसी को आधार मानकर बृहत्त्रयी रत्नमाला में ' हृदय ' रूप रत्न को लेकर पारखियों ने गूँथा हो? चरक - सुश्रुत संहिताओं की मान्यता अपने - अपने स्थान पर प्राचीनकाल से अद्यावधि अक्षुण्ण चली आ रही है । अतएव इनका पठन - पाठन तथा कर्माभ्यास भी होता आ रहा है । यह भी सत्य है कि पुनर्वसु आत्रेय तथा भगवान् धन्वन्तरि के उपदेशों के संग्रहरूप उक्त संहिताओं में जो लिखा है, वह अपने - अपने क्षेत्र के भीतर आप्त तथा आर्ष वचनों की चहारदिवारी तक सीमित होकर रह गया है तथा उक्त महर्षियों ने पराधिकार में हस्तक्षेप न करने की प्रतिज्ञा कर रखी थी । यह उक्त संहिताकारों का अपना - अपना उज्ज्वल चरित्र था । महर्षि अग्निवेश प्रणीत कायचिकित्सा का नाम चरकसंहिता और भगवान् धन्वन्तरि द्वारा उपदिष्ट शल्यतन्त्र का नाम सुश्रुतसंहिता है । ये दोनों ही आयुर्वेदशास्त्र की धरोहर एवं अक्षयनिधि हैं । उन - उन आचार्यों द्वारा इनमें समाविष्ट विषय विशेष आयुर्वेदशास्त्र के जीवातु हैं, अतएव ये संहिताएँ समाज की परम उपकारक हैं । चरकसंहिता में स्वास्थ्यरक्षा के सिद्धान्तों, रोगमुक्ति के उपायों तथा आयुर्वेदीय सद्वृत्त आदि विषयों का जो विशद विवेचन उपलब्ध होता है, वह सभी दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है । अधिक क्या कहा जाय चरकोक्त सभी सिद्धान्त त्रिकालाबाधित हैं । इस प्रकार के विषयों की पुष्कल सामग्री से प्रभावित होकर आचार्य दृढबल ने ‘ यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ' ( च.सि. १२।५४ ) यह जो डिण्डिमघोष किया है, वह चिकित्सा - सिद्धान्तों पर पूर्णतया सही उतरता है । सुश्रुतसंहिता में आयुर्वेद के आठों अंगों का विभाजन शल्यकर्म को प्रधान मानकर किया गया है; फिर भी आधुनिक शल्य - शालाक्य चिकित्सा की दृष्टि से इन प्राचीन सिद्धान्तों में पग - पग पर प्रतिसंस्कारों की अपेक्षा प्रतीत होती है । सिंहगुप्त के पुत्र वाग्भट ने इसी प्रतिसंस्कार की उत्कट भावना से प्रेरित होकर पहले अष्टांगसंग्रह की रचना की, जिसे उन्होंने ' युगानुरूपसन्दर्भ ' संज्ञा दी ( अ.सं. सू. १।१८ ) । फिर उसी अष्टांगसंग्रह में से ‘ हृदय ' के समान सारभाग का स्वतन्त्र रूप से पृथक् संग्रह करके ' अष्टांगहृदय ' की रचना कर डाली
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( ८ ) और उसका विश्व में सादर प्रचार - प्रसार हुआ । वाग्भट ने न केवल आत्रेय आदि महर्षियों के वचनों का अनुकरण मात्र किया है, अपितु प्रसंगोचित अभिनव विषयों का भी इसमें स्थान - स्थान पर समावेश किया है, जो चिकित्सा की दृष्टि से उपादेय हैं । इन्होंने उत्तरस्थान में उन रोगों के निदान तथा चिकित्सा का वर्णन किया है, जिनका वर्णन आरम्भ के निदान तथा चिकित्सास्थानों में नहीं हो पाया था, अतएव आयुर्वेद की बृहतत्रयी में परवर्ती विद्वानों ने ' अष्टांगसंग्रह ' को छोड़कर ' अष्टांगहृदय ' का समावेश कर डाला, जो कि इस ग्रन्थ की सर्वांगीण गुणवत्ता का ज्वलन्त प्रमाण है । वास्तव में कालिदास के अनुसार - ' पुराणमित्येव न साधु सर्वं, नवीनमित्येव न चाप्यवद्यम् । सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ' ॥ ( मालवि ० ११२ ) इसका आशय यह है कि पुरानी अथवा नयी सभी वस्तुएँ अपनी गुणवत्ता के कारण ही ग्राह्य एवं तद्विपरीत होने से त्याज्य होती हैं । ऐसा कोई मापदण्ड नहीं है कि पुरानी सभी वस्तुएँ अच्छी हों और नयी सभी वस्तुएँ अनुपादेय हों । तात्पर्य यह है कि अच्छी वस्तु अपने गुणों के प्रभाव से सबका मन आकर्षित कर ही लेती हैं । नारायणभट्ट ने अपने ' प्रक्रिया सर्वस्व ' ग्रन्थ में इस बात की प्रामाणिक चर्चा की है कि जिस विषय को पाणिनि ने कहा है, उसकी कमी को उसके परवर्ती वार्तिककार ने पूरा किया; उसमें जो कमी रह गयी थी उसे भाष्यकार पतञ्जलि ने तथा उसमें भी जो त्रुटि रह गयी थी उसे भोज आदि विद्वानों ने सुधारा - सँवारा । अतएव व्याकरण सम्प्रदाय में यह सिद्धान्त सुप्रसिद्ध है— ' यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम् ' । आयुर्वेद के क्षेत्र में इसी प्रकार का प्रामाण्य महर्षि वाग्भट की रचना का भी है । भारतीय वाङ्मय में ‘ वाग्भट ' का उल्लेख बहुत मिलता है । यथा – वृद्ध, मध्य, लघु तथा रसवाग्भट नामों से प्रायः चार वाग्भट प्रसिद्ध हैं । इनके अतिरिक्त भी अन्य साहित्यिक क्षेत्र में अनेक वाग्भट कृतिकार के रूप में पाये जाते हैं । हारीतसंहिता में आयुर्वेद के ये आचार्य बहुचर्चित हैं— ' चरकः सुश्रुतश्चैव वाग्भटश्च तथा परः । मुख्याश्च संहिता वाच्यास्तिस्र एव युगे युगे ॥ अत्रिः कृतयुगे वैद्यो द्वापरे सुश्रुतो मतः । कलौ वाग्भटनामा च गरिमात्र प्रदृश्यते ' ॥ महर्षि वाग्भट के वचनों का उल्लेख निश्चलकर ने चक्रदत्त ग्रन्थ की रत्नप्रभा व्याख्या में किया है । १३ वीं शती के रसरत्नसमुच्चय के रचयिता वाग्भट को ही यहाँ ' रसवाग्भट ' के नाम से स्मरण किया गया है, क्योंकि इनके पित्ता का नाम भी सिंहगुप्त था । पिता - पुत्र के नाम की समानता को आधार मानकर कुछ ऐतिहासिक विद्वान् अष्टांगहृदय तथा रसरत्नसमुच्चय के रचयिताओं को एक ही मानने का आग्रह करते हैं । इतना सब होने पर भी समय का अन्तराल दोनों को एक स्वीकार करने में बाधक सिद्ध होता है । वृद्ध या प्रथम वाग्भट - - ऐतिहासिकों की मान्यता के अनुसार इन्होंने पूर्ववर्ती आर्षसंहिताओं को अपने ग्रन्थ की आधारशिला बनाकर ' अष्टांगसंग्रह संहिता ' की रचना की । उसके उत्तरस्थान अध्याय ५०।१३२-३३ में अपना संक्षिप्त परिचय भी दिया है । हमारे विचार से ये अपने जीवन के आरम्भ में वैदिक धर्मानुयायी थे और ‘ अवलोकित ' नामक बौद्ध गुरु से दीक्षा लेने के बाद इनके विचारों में परिवर्तन आया, जिसका पूर्ण प्रभाव इनकी उक्त रचना में परिलक्षित होता है । जहाँ बौद्धधर्म के अतिरिक्त वचनों का समावेश हुआ है, उसे आत्रेय आदि महर्षियों के वचनों का तथा इनके पूर्वाश्रम का प्रभाव समझ लेना चाहिए । चिकित्सा क्षेत्र का विषय ' बहुजनहिताय बहुजनसुखाय ' होता है । इसमें धार्मिक प्रभाव बाधक नहीं होता । प्रस्तुत वाग्भट ने वैदिकधर्म के साथ बौद्धधर्म का समुचित समन्वय अपनी कृतियों में स्थापित किया है । ऐसा अन्यत्र भी देखा जाता है । अवलोकितेश्वर की मूर्तियाँ गुप्तकाल में अधिकाधिक मात्रा में मिली हैं । कालक्रम में अवलोकितेश्वर की मूर्ति की भुजाओं की संख्या में वृद्धि होती गयी । देखें— कलकत्ता संस्कृत सिरीज XII - 8.37-38. इसी के अनुसार वाग्भट ने अवलोकितेश्वर की १२ भुजाओं का उल्लेख किया है । वाग्भट के इस संग्रह तथा हृदय में मन्त्रयान का रूप तो दृष्टिगोचर होता है किन्तु वज्रयान का नहीं । बौद्ध ग्रन्थों में आठ प्रकार की सिद्धियों का जो वर्णन मिलता है, उनका उल्लेख वाग्भट ने रसायन प्रकरण
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( ९ ) में अञ्जन, पादलेप, रस, रसायन के रूप में किया है । कोषकार अमरसिंह बौद्ध थे । उन्होंने अपने कोष में पहले सांकेतिक रूप से बुद्ध को प्रणाम कर शास्त्रीय मर्यादा का पालन मंगलाचरण के रूप में किया है । तदनन्तर स्वर्ग, गणदेवता, देवयोनि तथा दैत्यों के नामों का उल्लेख कर बाद में बुद्ध के नामों का परिगणन करते हुए इन्हीं में जिनका भी समावेश किया है, वे अब भिन्न रूप में देखे जाते हैं । चीनी यात्री इत्सिंग ( ६७१-६९ ५ ई ० ) ने समस्त भारत में प्रसिद्ध ' अष्टांगहृदय ' के प्रचार का उल्लेख किया है । इत्सिंग से पूर्ववर्ती वराहमिहिर ( ५०५ - ५८७ ई ० ) के ज्यौतिष सम्बन्धी सिद्धान्तों से हृदयकार प्रभावित थे । जैसा कि इन्होंने आत्रेय आदि को अपनी संहिता का जीवातु माना है, परन्तु इन्होंने दृढबल का उल्लेख कहीं भी नहीं किया, इससे लगता है कि इनके सामने चरकसंहिता का आदिम स्वरूप ही सुलभ था, न कि दृढबल द्वारा प्रतिसंस्कृत स्वरूप । इससे प्रतीत होता है कि दृढबल तथा प्रथम वाग्भट प्रायः समकालीन ही रहे होंगे अथवा दृढबल कुछ पूर्व रहे हों । बाह्य एवं आभ्यन्तर साक्ष्यों की समानता होने पर भी ' हृदय ' से ' संग्रह ' का कलेवर विशाल है । अतः परिनिरीक्षण करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वाग्भट प्रथम का काल ५५० ई ० मान लेना चाहिए । जैसा कि इतिहासकारों ने स्वीकार किया है, तदनुसार यहाँ तक प्रथम अथवा वृद्धवाग्भट की चर्चा की गयी है । अब इसके आगे ‘ अष्टांगहृदय ’ के रचयिता वाग्भट की चर्चा प्रस्तुत है । साम्प्रदायिक स्वरूप- शास्त्र - रचना अथवा शास्त्र - चिन्तन के क्षेत्र में सभी वर्गों के विद्वानों के विचार साम्प्रदायिक भावों को छोड़कर तत्त्वचिन्तन की ओर अग्रसर देखे जाते हैं । कतिपय उदाहरण— नामलिंगानुशासन के रचयिता अमरसिंह की भाँति वाग्भट भी अपने क्षेत्र में सर्वमान्य एवं सुप्रसिद्ध हुए । बौद्ध जिनेन्द्रबुद्धि ने अष्टाध्यायी की काशिकावृत्ति पर ' काशिकाविवरण पञ्जिकान्यास ' नामक व्याख्या लिखी है । व्याकरणशास्त्र के क्षेत्र में इसका पर्याप्त सम्मान है । वैसे भी लोक में इन्हें बुद्ध के समान सम्मान प्राप्त है । बौद्ध पुरुषोत्तमदेव कृत त्रिकाण्डशेष, भाषावृत्ति ( अष्टाध्यायी व्याख्या ) ग्रन्थों का सर्वत्र समभाव से आदर है । इन शास्त्रकारों का कहीं भी धर्म की ओर दुराग्रह परिलक्षित नहीं होता । क्योंकि शास्त्रचिन्तन में परम्परा कहीं भी बाधक नहीं होती । देखें— हर्षवर्धन शैव थे और राज्यवर्धन सौगत थे, जबकि ये दोनों सहोदर भाई थे । वास्तुपाल जैन थे । इन्होंने सोमनाथ की यात्रा की तथा अनेक शिव मन्दिरों की स्थापना की— ऐसा वर्णन अरिसिंह कृत ' सुकृतसंकीर्तनकाव्य ' में मिलता है । श्रीकृष्णभक्त जयदेव ने गीतगोविन्द में ‘ केशवधृतबुद्धशरीर ’ कहकर उनकी स्तुति की है । रत्नावली में श्रीहर्ष ने ' शिव - पार्वती ' की और नागानन्द नाटक में ' बुद्धो जिनः पातु वः ' कहकर बुद्ध की वन्दना की है । इन सभी उद्धरणों को देखकर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उस काल में आज का जैसा कलह तथा मनोमालिन्यपूर्ण दुराग्रह नहीं था । यही कारण था कि वाग्भट ने आयुर्वेद के निर्वचन में मध्यममार्ग का अनुसरण किया जिससे वाग्भट तथा उनकी कृति का विश्व में सर्वत्र समादर है । अष्टांगहृदयकर्ता वाग्भट — - संग्रह तथा हृदय के कर्ता वाग्भट ' इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ' इस अंश में दोनों समान हैं । मंगलाचरण के पद्य का आरम्भ ' रागादिरोग ' पद से भी दोनों समान हैं और उपर्युक्त उद्धरण के अनुसार दोनों द्वारा ग्रथित ग्रन्थों में चरक- - सुश्रुतानुयायित्व भी समान है । अधिक क्या कहें ' संग्रह ' के अनेक अविकल पद्य ' हृदय ' में सुलभ हैं । इन दृष्टियों से संग्रह एवं हृदय के रचयिताओं को एक मान लेना चाहिए । इसके समर्थन में हम नागपुर निवासी वैद्य श्रीगोवर्धनशर्मा छांगाणी द्वारा लिखित अष्टांगसंग्रह सूत्रस्थान की भूमिका से कुछ अंश साभार उद्धृत कर रहे हैं— ‘ स्वर्गीय ज्योतिषचन्द्र सरस्वती ने भी अष्टांगहृदय उत्तरस्थान ( शिवदास सेन टीका ) के सम्पादकीय उपोद्घात में अष्टाङ्गसंग्रह और हृदय के कर्ता भिन्न - भिन्न माने हैं । इसमें आधार केवल संग्रह से हृदय कुछ स्थानों में मत भिन्नता बतायी है । इस भिन्नता में संग्रह का मत तो दे ही दिया है परन्तु उसमें थोड़ा - सा
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( १० ) सुश्रुतादि के अनुसार आगे और कुछ जोड़ा है जो कि संग्रह के रचनाकाल में छूट गया था । केवल इसी कारण को लेकर अष्टाङ्गसंग्रह और अष्टाङ्गहृदय के कर्ता भिन्न नहीं हो सकते । अष्टाङ्गसंग्रह की रचना पहले की है । उसके अनन्तर लिखे गये अष्टाङ्गहृदय में वही ग्रन्थकार छूटे हुए विषय को ले सकता है । ' महामहोपाध्याय स्वर्गीय गणनाथसेन सरस्वती एवं श्रद्धेय यादवजी आचार्य ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रस्तुत ग्रन्थ - द्वय के सर्वत्र भाषा - सादृश्य तथा पिता - पितामह का एक नाम आदि होने से संग्रह एवं हृदय के भिन्न - भिन्न कर्ता मानना यह बड़ी भूल की बात है । सारांश यह है कि अष्टांगसंग्रह और अष्टाङ्गहृदय काकर्ता वास्तव में एक ही वाग्भट है । इन्हीं तथ्यों से आश्वस्त अष्टांगसंग्रह के व्याख्याकार तथा वाग्भट के शिष्य श्री इन्दु ने अपने द्वारा किये गये मङ्गलाचरण ‘ दुर्व्यारव्याविषसुप्तस्य वाग्भटस्यास्मदुक्तयः ' में तथा व्याख्या ' सोऽयं वाग्भटनामा शास्त्रकारः ' में कहीं भी वृद्ध, प्रथम, मध्य अथवा लघु विशेषणों का प्रयोग इनके नाम के पूर्व नहीं किया है । इन्होंने केवल सिंहगुप्तसूनु वाग्भट कहा है । इनकी दृष्टि से भी दोनों ( संग्रह तथा हृदय ) के कर्ता वाग्भट एक ही थे । उक्त मत के समर्थन में अष्टांगहृदय के रचयिता की निम्न सूक्तियों का अवलोकन तथा मनन करें और इनकी व्याख्या यथास्थान देखें— तेभ्योऽति विप्रकीर्णेभ्यः प्रायः सारतरोच्चयः । क्रियतेऽष्टाङ्गहृदयं नातिसङ्क्षेपविस्तरम् ॥ ( अ.हृ.सू. १।४ ) अष्टाङ्गवैद्यकमहोदधिमन्थनेन योऽष्टाङ्गसङ्ग्रहमहामृतराशिराप्तः । तस्मादनल्पफलमल्पसमुद्यमानां प्रीत्यर्थमेतदुदितं पृथगेव तन्त्रम् ॥ ( अ.हृ.उ. ४०।८० ) ग्रन्थकारों की व्यास एवं समास पद्धति – प्राचीनकाल में ऐसे अनेक उदाहरण पाये जाते हैं, जहाँ एक ही ग्रन्थकार ने एक ही विषय की व्यास एवं समास पद्धति से रचनाएँ की हैं; यथा— —भट्टोजिदीक्षित के पौत्र तथा नागेशभट्ट के विद्यागुरु श्री हरिदीक्षित ने बृहच्छब्दरत्न तथा लघुशब्दरत्न की रचना की थी । इसी का प्रभाव था कि उनके शिष्य आचार्य नागेशभट्ट ने व्याकरण विषय के अनेक ग्रन्थ लिखे; यथा— बृहच्छन्देन्दुशेखर तथा लघुशब्देन्दुशेखर, मञ्जूषा, लघुमञ्जूषा, परमलघुमञ्जूषा । जयपुर के राजा सवाई जयसिंह ( १६८८-१७२८ ई ० ) का काल तथा श्रीनागेशभट्ट का काल समान ही था । नामनिर्धारण परम्परा — प्रायः प्राचीनकाल में पितामह का ही नाम पौत्र का भी रखा जाता था । देखें — नीलकण्ठ दीक्षित विरचित ' गंगावतरणम् ' की भूमिका, काव्यमाला गुच्छक ७६ पृष्ठ १२, निर्णय-सागर प्रेस से १ ९ १६ में प्रकाशित – ' विदितमेव हि सर्वेषामस्माकमस्मद्देशीयाः प्रायशो बिभ्रति पितामहानां नाम; यथा — आचार्य दीक्षितः, आचार्य दीक्षित पौत्रः ' । इस प्रकार की यह नाम निर्धारण परम्परा कहाँ - कहाँ थी और कब से चली आयी है, यह भी एक गवेषणीय विषय है, जिसका प्रभाव ' वाग्भट ' नाम पर भी परिलक्षित होता है । देखें— ' भिषग्वरो वाग्भट इत्यभून्मे पितामहः ' । ( अ.सं.उ. ५०।२०३ ) अष्टाङ्गहृदय का कलेवर — ' कायबालग्रहोर्ध्वाङ्गशल्यदंष्ट्राजरावृषान् । अष्टावङ्गानि ' । ( अ.हृ.सू. १।५ ) के अनुसार आयुर्वेद के आठ अंग ये हैं— १. कायचिकित्सातन्त्र, २. बाल ( कौमारभृत्य ) तन्त्र, ३. ग्रहचिकित्सा ( भूतविद्या ) तन्त्र, ४. ऊर्ध्वागचिकित्सा ( शालाक्य ) तन्त्र, ५. शल्यचिकित्सा ( शल्यतन्त्र ), ६. दंष्ट्रा विषचिकित्सा ( अगदतन्त्र ), ७. जराचिकित्सा ( रसायनतन्त्र ) तथा ८. वृषचिकित्सा ( वाजीकरणतन्त्र ) । यद्यपि उक्त सभी अंगों में कायचिकित्सा एक ऐसा अंग है, जो सम्पूर्ण काय से सम्बन्ध रखता है, अतएव इससे सभी अंग प्रभावित हो जाते हैं, फिर भी अन्य अंगों की सत्ता अपने - अपने स्थान पर विशेष महत्त्व रखती ही है, तथापि कायचिकित्सा अंग को सबमें प्रधान माना जाता है । इन्होंने भी सुश्रुत की भाँति अपने ग्रन्थ ( अष्टाङ्गहृदय ) को ६ स्थानों में विभाजित किया है ।