श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 11–20
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 11–20
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( ११ ) वाग्भट की प्रतिज्ञा — वैयाकरण सम्प्रदाय में यह प्रतिज्ञा प्रसिद्ध है कि ' एकमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः ’ । ऐसा लगता है कि अपने ग्रन्थ रचनाकाल में वाग्भट उक्त सूक्ति से प्रभावित थे । अतएव उन्होंने भी ‘ न मात्रामात्रमप्यत्र किञ्चिदागमवर्जितम् ' ( अ.सं. सू. १।२० ) एक ऐसी प्रतिज्ञा की, जिससे ग्रन्थ की प्रामाणिकता सिद्ध होती है । उक्त सूक्ति का आशय इस प्रकार है — इस सम्पूर्ण ग्रन्थ में शब्द अथवा वाक्य की बात तो कौन कहे, एक मात्रा भी शास्त्रों के विपरीत नहीं है । इसके अतिरिक्त भी इन्होंने अपने ग्रन्थ की प्रामाणिकता को सिद्ध करने के उद्देश्य से प्रत्येक अध्याय के आरम्भ में लिखा है— ' इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ' । आयुर्वेद के प्रति दृढ़ निष्ठा – वाग्भट कुलक्रमागत अधीतविद्य वैद्य एवं अनेक विषयों के उद्भट विद्वान् थे, अतएव वे आयुर्वेद के प्रति स्वयं भी अत्यन्त निष्ठावान् थे । यही कारण था कि उन्होंने सम्पूर्ण समाज को यह सन्देश दिया है — ' आयुर्वेदोपदेशेषु विधेयः परमादरः ' ( अ.सं.सू. १।३ तथा अ.हृ.सू. ११२ ) अर्थात् धर्म, अर्थ, सुख ( काम ) नामक तीन पुरुषार्थों की प्राप्ति सुखायु से होती है । अत: इनकी इच्छा रखने वाले पुरुषों को आयुर्वेद के विश्वजनीन उपदेशों का पालन अत्यन्त आदर के साथ सदैव करते रहना चाहिए । धन्वन्तरि अवतार की कल्पना- - ' रसरत्नसमुच्चय ' ग्रन्थ की भूमिका में श्रीकृष्णराव शर्मा लिखते हैं — शल्यचिकित्सा के आदिदेव भगवान् धन्वन्तरि का ' वाग्भट ' नाम से पुनः कलियुग में अवतार हुआ, इस बात को सिद्ध करने के लिए और उनकी पीयूषपाणित्व शक्ति को दिखाने के लिए ही अष्टाङ्गसंग्रहकर्ता वृद्धवाग्भट ने अपने प्राणहरण के बिना हृदय ( अष्टांगहृदय ) को सजीव अलग कर दिया, अर्थात् उन्होंने अपने इस उक्तिवैचित्र्य से ' वाग्भट ' शल्यचिकित्सा विशेषज्ञ थे, यह विद्वानों को दिखलाया । उक्त विषय को इस प्रकार समझें — ‘ अष्टांगसंग्रह ' सर्वावयव पूर्ण आयुर्वेद का शरीरस्वरूप है और ' अष्टांगहृदय ' उसके महत्त्वपूर्ण विषयों का सारभूत ' हृदय ' है । शल्यकर्म विशेषज्ञ वाग्भट ने ' शरीर ' तथा ' हृदय ' दोनों को अलग • करके भी दोनों को जीवित रखा है, यह इनका वैशिष्ट्य है । वास्तव में यह वाग्भट का आलंकारिक परिचय है । ग्रन्थरचना - कौशल — सरस्वती के वरदपुत्र वाग्भट द्वारा विरचित ' अष्टांगहृदय ' की समृद्ध काव्य-सम्पदा से यह सुविदित है कि ये आयुर्वेदीय समस्त अंगों के ज्ञाता होने के साथ - ही - साथ सुकवि भी थे तथा साहित्यशास्त्र पारावारपारीण भी थे । जो इनके छन्द, रस, गुण, अलंकार आदि से परिपूर्ण प्रस्तुत काव्य - सम्पत्ति से प्रमाणित होता है । एतदर्थ आचार्य दण्डी कृत महाकाव्य - लक्षण का अवलोकन करें-' सर्वत्र भिन्नवृत्तान्तैरुपेतं लोकरञ्जकम् । काव्यं कल्पान्तरस्थायि जायते सदलङ्कृति ' ॥ ( काव्यादर्श १।१ ९ ) छन्दःसन्दोह प्रयोग कौशल – आचार्य क्षेमेन्द्र ने अपने ' सुवृत्ततिलक ' में उन कवियों को दरिद्र कहा है, जिन्होंने अपने काव्य की रचना एक ही छन्द द्वारा पूर्ण की है, क्योंकि छन्दः प्रयोग में स्वच्छन्द कवि समवृत्त, अर्धसमवृत्त तथा मात्रावृत्त के प्रयोगों में पूर्ण स्वतन्त्र होते हैं । इसी प्रकार के कवियों में वाग्भट भी अन्यतम हैं । इन्होंने पाठकों के मनोविनोद के लिए श्रुतिमधुर विभिन्न छन्दों का स्थान - स्थान में प्रयोग किया है । कहीं - कहीं तो श्लेष अलंकार का सहारा लेकर स्वागता, पुष्पिताग्रा, पृथ्वी, शार्दूलविक्रीडित, द्रुतविलम्बित आदि छन्दों को मुद्रालंकार से अलंकृत किया है । यह कवि एवं कविराज वाग्भट का शास्त्र एवं काव्य- कौशल है । मुद्रालंकार परिचय — ' सूच्यार्थसूचनं मुद्रा प्रकृतार्थपरैः पदैः । नितम्बगुर्वी तरुणी दृग्युग्मविपुला च सा ' ॥ ( कुवलयानन्द ) अर्थात् जिस छन्द में उस छन्द का नाम सार्थक रूप से श्लेषप्रतिभा द्वारा प्रयुक्त किया गया हो, उसे ‘ मुद्रा ’ अलंकार कहते हैं । यहाँ अनुष्टुप् छन्द के भेदों में परिगणित ' युग्मविपुला ' छन्द का द्वयर्थक
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( १२ ) प्रयोग किया गया है । इस प्रकार के काव्यकौशल का प्रयोग वाग्भट ने अनेक स्थानों पर किया है । कतिपय अन्य उदाहरण भी देखें— १. हिङ्कङ्ग्राविडशुण्ठ्यजाजिविजयावाट्याभिधानामयै-वर्णः कुम्भनिकुम्भमूलसहितैर्भागोत्तरं वर्धितैः । पीतः कोष्णजलेन कोष्ठजरुजो गुल्मोदरादीनयं शार्दूलः प्रसभं प्रमथ्य हरति व्याधीन् मृगौघानिव ’ ॥ ( अ.हृ.चि. १४।३६ ) उक्त ‘ शार्दूलविक्रीडित ’ छन्द के चतुर्थ चरण में द्वयर्थक ' शार्दूल ' शब्द का प्रयोग अपने विविध अर्थों को प्रकट कर रहा है । २. ‘ सहचरं सुरदारु सनागरं क्वथितमम्भसि तैलविमिश्रितम् । पवनपीडितदेहगतिः पिबेत् द्रुतबिलम्बितगो भवतीच्छया ' ॥ ( वही, २१।५५ ) इस पद्य में आया हुआ ‘ द्रुतबिलम्बित ' पद छन्द तथा अपने प्रसंगोचित महत्त्वपूर्ण अर्थ का भी बोध करा रहा है । ३. ' बीजकस्य रसमङ्गुलिहार्यं शर्करां मधु घृतं त्रिफलां च । शीलयत्सु पुरुषेषु जरत्ता स्वागताऽपि विनिवर्तत एव ' ॥ ( अ.हृ.उ. ३ ९ ।१५३ ) इस पद्य में प्रयुक्त ‘ स्वागता ' पद छन्द एवं अपने अर्थ का विशिष्ट सूचक भी है । ४. ' मधु मुखमिव सोत्पलं प्रियायाः कलरणना परिवादिनी प्रियेव । कुसुमचयमनोरमा च शय्या किसलयिनी लतिकेव पुष्पिताग्रा ' ॥ ( वही, ४०।४६ ) यहाँ श्लेषप्रतिभोत्थापित पुष्पिताग्रा का एक प्राकरणिक अर्थ है और दूसरा है छन्द नाम । यह अर्धसमवृत्त का उदाहरण है । आचार्य वाग्भट की यही प्रवृत्ति अष्टांगसंग्रह के रचना काल में भी रही है । देखिये — पृथ्वीवृत्त का उदाहरण अ.सं.उ. ४ ९ ।३७ ९ - ३८० में । प्रायः वृत्तरत्नाकर, छन्दोमञ्जरी, सुवृत्ततिलक आदि के सभी छन्दों के उदाहरण वाग्भट की रचनाओं में सुलभ हैं । अतः कतिपय विशिष्ट छन्दः प्रयोगों को ऊपर दे दिया गया है । वाग्भट द्वारा प्रयुक्त छन्द – यहाँ हम अकारादि क्रम से छन्दों के नामों का उल्लेख कर रहे हैं । यदि आप इनको देखना चाहें तो सम्पूर्ण अष्टाङ्गहृदय पर लिखी गयी अरुणदत्त की टीका का अवलोकन करें । छन्द नाम— १. अनुष्टुप् २. आर्या, ३. आर्यागीति, ४. आर्याजघनचपला, ५. आर्याविपुला, ६. इन्द्रवज्रा, ७. उद्गीतिरार्या, ८. उपचित्रा, ९. उपजाति, १०. उपेन्द्रवज्रा, ११. औपच्छन्दसिक, १२. कुसुमितलता, १३. गीति, १४. गीतिसमुखचपला, १५. तोटक, १६. दण्डकोऽर्णाख्य; १७. दण्डको व्यालाख्यः, १८. दोधक, १ ९. द्रुतविलम्बित, २०. धीरललिता, २१. नर्कुटक, २२. पुष्पिताग्रा, २३. पृथ्वी, २४. प्रहर्षिणी, २५. भद्रा, २६. मत्तमयूर, २७. मन्दाक्रान्ता, २८. मात्रासमक, २ ९. मालिनी, ३०. मुखचपला, ३१. रथोद्धता, ३२. वसन्त-तिलका, ३३. वंशस्थ, ३४. विपुला, ३५. वैतालीय, ३६. वैश्वदेवी, ३७. शार्दूलविक्रीडित, ३८. शालिनी, ३ ९. शुद्धविराट्, ४०. म्रग्धरा, ४१. स्वागता, ४२. हरिणी । इनमें १६ वें तथा १७ वें दो गद्य छन्द हैं । अलंकार परिचय — वाग्भट की प्रस्तुत रचना में वृत्यनुप्रास, छेकानुप्रास, यमक आदि शब्दालंकारों के अनेक उदाहरण अनायास उपलब्ध होते हैं । उन्हें आप निम्न सन्दर्भ संकेतों के अनुसार स्वयं देखने का प्रयत्न करें — हृ.सू. ३।३५; ३।५१; १४३५; २७।१ । हृ.नि. ७।२५; १०।१३ । हृ.चि. १८३२; १ ९ ।७; १ ९ ।१७; १ ९ ।३२ । हृ.उ. २।३६; ७।२३; २१।३६; ३ ९ ।८०; ३ ९ ।१२७ आदि ।
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( १३ ) रचना - वैशिष्ट्य— वाग्भट की रचना में स्थल - विशेष पर उनके काव्यगत प्रसाद, सुकुमार, मांधुर्य आदि जो विशिष्ट गुण देखे गये हैं, उनमें से कतिपय स्थलों के संक्षिप्त संकेत सूत्र यहाँ दिये जा रहे हैं, तदनुसार आप साहित्यसुधा का रसास्वादन करें । मद्यपान विधि का वर्णन देखें— अ.हृ.चि. ७/७५ से ९ ० तक तथा अ.हृ.उ. ४०।४२-४७ । पुत्रसुख का माहात्म्य – वाग्भट ने आलंकारिक शब्दशय्या द्वारा पुत्र का वर्णन इस प्रकार किया है—
‘ स्खलद् गमनमव्यक्तवचनं धूलिधूसरम् । अपि लालाविलमुखं हृदयाह्लादकारकम् ।
अपत्यं तुल्यतां केन दर्शनस्पर्शनादिषु । किं पुनर्यद् यशोधर्ममानश्रीकुलवर्धनम् ॥
( अ.हृ. उ. ४०।१०-११ ) ऐसा लगता है कि पुत्र का वर्णन करते समय वाग्भट कालिदासीय निम्न पद्य से प्रभावित थे— ‘ आलक्ष्य दन्तमुकुलाननिमित्तहासै-रव्यक्तवर्णरमणीयवचःप्रवृत्तीन् अङ्काश्रयप्रणयिनस्तनयान् वहन्तो धन्यास्तदङ्गरजसा मलिनीभवन्ति ' ॥ ( अ.शा. ७।१७ ) वाग्भट की विशेषता — इन्होंने ' इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ' इस प्रतिज्ञा का परिपालन करते हुए आत्रेय आदि के विचारों, सिद्धान्तों, चिकित्साविधियों तथा अपने सभी पूर्ववती आचार्यों ( ब्रह्मा, अश्विनीकुमार, वसिष्ठ, भार्गव, अगस्त्य, भेड ( ल ), हारीत, वृद्धकाश्यप, काश्यप, अग्निवेश, आत्रेय पुनर्वसु, धन्वन्तरि, शौनक, निमि, विदेहाधिपति, जिन, माणिभद्र आदि ) द्वारा कहे गये औषध योगों का अपने तन्त्र में संग्रह किया है । इनके इस रचनाकौशल को देखकर यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि ऐसी विषय - सम्पदा इसके पूर्ववर्ती किसी दूसरे ग्रन्थ में दुर्लभ है । अतएव सूक्तिकारों ने ' सूत्रस्थाने तु वाग्भटः ' कहकर इसकी प्रशंसा की है । दूसरे आचार्यों ने ' कलौ वाग्भटनामा च ' कहकर आयुर्वेद जगत् में इसी का एकमात्र साम्राज्य स्वीकार किया है । सुना जाता है कि इसके अतिरिक्त इन्होंने ' अष्टाङ्गनिघण्टु ' तथा ‘ अष्टाङ्गावतार ' नामक दो अन्य ग्रन्थों की भी रचना की थी । इस विषय में अन्य विद्वान् सहमत नहीं हैं । ‘ अष्टांगनिघण्टु ' की हस्तलिखित पाण्डुलिपियाँ ओरियण्टल लायब्रेरी मद्रास में तथा तऔर ग्रन्थ संग्रहालय में हैं जो आज तक प्रकाशित नहीं हो सकी । वाग्भट सम्बन्धी किंवदन्ती — प्राचीनकाल से प्रचलित किंवदन्तियों का ऐतिहासिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है । तदनुसार मनुष्य किस प्रकार नीरोग में सुप्रसिद्ध वैद्यों के प्रत्येक थे । उत्तर न मिलने पर वे वैद्यराज वाग्भट के आँगन प्रश्न पूछे । उस समय श्री पक्षी की स्पष्ट, श्रुतिमधुर सुना जाता है कि एक बार भगवान् धन्वन्तरि ' कलियुग के कुप्रभाव से पीड़ित हों ' - इस शुभकामना से वे अत्यन्त मनोहर पक्षी का रूप धारण कर उस समय घर के पास जाकर ' कोऽरुक्, कोऽरुक्, कोऽरुक् ' इन तीन प्रश्नों को पूछते एक घर से दूसरे घर में चले जाते थे । इस प्रकार एक दिन सिन्धुप्रदेश में स्थित के समीप स्थित खिले हुए वृक्ष की शाखा पर बैठकर फिर इन्होंने वे ही तीन वाग्भट रोगियों की चिकित्सा करने में व्यस्त थे, फिर भी उनका ध्यान उस तथा परोपकार प्रेरित गम्भीर अर्थ वाली वाणी को सुनकर और उस पक्षी के अत्यन्त सुन्दर रूप से प्रभावित होकर साथ ही उसे अलौकिक पक्षी समझकर इन्होंने सादर पके हुए फल एवं जल उसे समर्पित किये, किन्तु ग्रहण किये बिना उस पक्षी ने पुनः उन्हीं प्रश्नों को दुहराया । तब वाग्भट ने सोचा — यह पक्षी जब तक अपने प्रश्नों का उत्तर नहीं पायेगा, तब तक यह खायेगा - पीयेगा नहीं । यह निश्चय करके वाग्भट ने उसके उन प्रश्नों का उसी शैली में शास्त्रसम्मत उत्तर इस प्रकार दिया— ' हितभुक् मितभुक् अशाकभुक् ' । वाग्भट के इन उत्तरों को सुनकर इनके द्वारा समर्पित फल - जल का सेवनकर प्रसन्न होकर उस पक्षी ने कहा – मैं सुयोग्य वैद्य की परीक्षा के लिए पक्षी का रूप धारण कर
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( १४ ) . भारतवर्ष में घूमता हुआ यहाँ आया हूँ । मैं तुम्हारे इस आयुर्वेदीय ज्ञान से अत्यन्त प्रसन्न हूँ । तुम अष्टांग आयुर्वेद की रचना करो । ऐसा कहकर वह पक्षी अन्तर्धान हो गया । उसके पश्चात् ही इन्होंने अपने इन ग्रन्थरत्नों की रचना की । यह किंवदन्ती चिरकाल से ' वाग्भट ' के साथ अनुस्यूत है । परवर्ती कतिपय ग्रन्थकार एवं ग्रन्थ- ' कल्याणकारक ' — इसकी रचना आचार्य उग्रादित्य ने की । ये जैन धर्मानुयायी थे, अतएव इन्होंने अपनी धर्मपरम्परा के अनुरूप चरकोक्त ' माधुतैलिकबस्ति ' के स्थान पर ‘ गौडतैलिकबस्ति ' का विधान किया, क्योंकि जैन सम्प्रदाय के आचार्य प्राणिज द्रव्य ( मधु ) का प्रयोग नहीं करते । योगशतक — इस ग्रन्थ के रचयिता श्री नागार्जुन हैं । अलबरूनी ने अपनी यात्रा के प्रसंग में जिस नागार्जुन का उल्लेख किया है, वे ८ वीं अथवा ९वीं शती के आचार्य थे, न कि ये सुश्रुतसंहिता के प्रतिसंस्कर्ता थे । इन्होंने अपने ग्रन्थ में अनेक पद्य ' अष्टांगहृदय ' से लिये हैं । अतः निश्चित रूप से यह वाग्भट से परवर्ती रचना है । इसमें आयुर्वेद के ८ अंगों के विवरण के अतिरिक्त उत्तरतंत्र भी दिया है । वररुचि द्वारा लिखित ' योगशतक ' इससे भिन्न है । सिद्धसारसंहिता — इसके कृतिकार दुर्गगुप्तात्मज ' रविगुप्त ' हैं । ये बौद्धधर्मावलम्बी थे । १० वीं शती में वर्तमान चन्द्रट ने अपनी रचनाओं में ' सिद्धसारसंहिता ' के अनेक स्थलों को उद्धृत किया है । उक्त संहिता के रचयिता ९वीं शती में विद्यमान थे । यह ग्रन्थ अद्यावधि अप्रकाशित है । इसकी तीन पाण्डुलिपियाँ नेपाल सरकार के पुस्तकागार काठमाण्डू में सुरक्षित हैं । हृदय के टीकाकार — अकोला निवासी हरिशास्त्री पराडकर वैद्य ने अष्टांगहृदय के ' वाग्भटविमर्श ' में ३४ व्याख्याओं तथा २३ व्याख्याकारों के नाम दिये हैं । जिनमें श्री अरुणदत्त द्वारा रचित सर्वांगसुन्दरा व्याख्या सम्पूर्ण तथा श्री हेमाद्रि द्वारा रचित आयुर्वेदरसायना व्याख्या अपूर्ण है, जिसके शेष अंश अद्यावधि प्राप्त नहीं हुए हैं । वाग्भट संहिता अपने गुणों से सर्वत्र सम्मानित है, अतएव प्रायः सभी भाषाओं में इसके अनुवाद सुलभ हैं । वाग्भट के व्याख्याकार अरुणदत्त – श्रीमृगांकदत्त पुत्र के श्री अरुणदत्त ने अष्टांगहृदय की ‘ सर्वांगसुन्दरा ' नामक व्याख्या लिखी है । अन्य टीकाओं की तुलना में यह महत्त्वपूर्ण है । इन्होंने इसमें यथासम्भव पदों के अर्थ दिये हैं । शंकायुक्त स्थलों का समाधान किया है । प्रायः छन्दों के नाम - निर्देशं तथा उनके लक्षण दिये हैं । विषय का समर्थन करने के लिए प्राचीन आयुर्वेदीय शास्त्रों के उद्धरण उद्धृत किये हैं, साथ में उनके ठीक - ठीक सन्दर्भ - संकेत भी दिये हैं । आवश्यकतानुसार यत्र - तत्र छन्द, व्याकरण आदि का परिचय भी दिया है । यद्यपि अरुणदत्त नामक अनेक विद्वान् हुए हैं तथापि अष्टांगहृदय के व्याख्याकार मृगांकदत्त के पुत्र अरुणदत्त ही हैं, जैसा कि इन्होंने ग्रन्थारम्भ की व्याख्या के तृतीय पद्य में कहा है— श्रीमन्मृगाङ्कतनयष्टीकामष्टाङ्गहृदयस्य श्रीमानरुणः कुरुते सम्यग्द्रष्टुः पदार्थबोधाय ॥ ३ ॥
वाग्भट के व्याख्याकार हेमाद्रि – देवगिरि निवासी महाराजाधिराज महादेव के पुत्र श्रीरामदेव के शासन काल में हेमाद्रि ने ‘ चतुर्वर्गचिन्तामणि ' नामक ग्रन्थ की रचना की । इन्होंने ही इसके बाद ' अष्टांगहृदय ' पर टीका की । प्राचीनकाल में पण्डितों की प्रतिभा बहुमुखी देखी जाती थी । आज ‘ हृदय ' में जो इनकी टीका देखी जाती है, वह केवल अष्टांगहृदय के सूत्रस्थान तथा कल्पसिद्धि स्थानों पर ही है, अन्यत्र नहीं । इनकी टीका का नाम ' आयुर्वेदरसायना ' है । विशेष — हेमाद्रि ने अपनी व्याख्या द्वारा अष्टांगहृदय में निर्दिष्ट विषयों का अपनी योग्यतानुसार अत्यन्त सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत किया है । अनेक स्थानों पर इन्होंने अरुणदत्त की व्याख्या का खण्डन करके अपने मत की बुद्धिपूर्वक स्थापना की है और कहीं - कहीं तो इन्होंने अरुणदत्त की व्याख्या से भी विस्तृत
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( १५ ) विवरण उपस्थापित किया है । ऐसे अवसरों को चरक ने ' बुद्धेर्विशेषस्तत्रासीत् ' कहा है । सच तो यह है— ‘ विद्या गुरूणां गुरुः ’ । पाठभेद तथा प्रक्षिप्त पद्य - वैदिक वाङ्मय को छोड़कर परवर्ती सभी प्रकार के साहित्य में पाठभेदों तथा प्रक्षिप्त गद्यों तथा पद्यों की भरमार देखी जाती है । तद्विद्य विद्वान् भी प्रसंगोचित पाठभेद को देखकर उसके समर्थक हो जाते हैं । ' इदम् इत्थम् ' ( यह ऐसा ही है ) की कोई कसौटी उनके पास भी नहीं होती । प्रस्तुत ' हृदय ' की व्याख्या करते समय मैंने निर्णयसागरीय प्रति को अपने ग्रन्थ का मूल आधार माना है । उसमें भी जहाँ - जहाँ स्खलन थे, उनको ' यथाबुद्धिबलोदय ' ठीक करने का प्रयास किया है । फिर भी अनेक स्थानों पर ऐसा अनुभव हुआ है कि जो पाठ मूल में ( ऊपर ) होना चाहिए था वह पाठ नीचे टिप्पणी में दिया गया है । ऐसे पाठनिर्णायकों को मेघदूत के व्याख्याकार पूर्णसरस्वती ने इस प्रकार आड़े हाथों लिया है । देखें— ‘ सुकविवचसि पाठानन्यथाकृत्य मोहाद् रसगतिमवधूय प्रौढमर्थं विहाय । विबुधवरसमाजे व्याक्रियाकामुकानां गुरुकुलविमुखानां धृष्टतायै नमोऽस्तु ' । टीकाकारों की आलोचना – धारानगरी के सुप्रसिद्ध भोजराज ऐसे अधिकांश टीकाकारों की आलोचना करते हुए कहते हैं — जो पाठ उनकी समझ में नहीं आता, उसे ' इति स्पष्टम् ' लिखकर छोड़ देते हैं और जो पाठ स्वयं स्पष्ट है, उसकी निरर्थक समास, विग्रह आदि द्वारा विस्तार से व्याख्या कर दिया करते हैं । इनके अतिरिक्त जहाँ आवश्यकता नहीं है, वहाँ अनुपयोगी विषयों को डालकर पढ़ने तथा सुनने वालों के मन में प्रायः सभी टीकाकार भ्रम उत्पन्न कर देते हैं । यथा— ‘ दुर्बोधं यदतीव तद्विजहति स्पष्टार्थमित्युक्तिभिः स्पष्टार्थेष्वतिविस्तृतिं विदधति व्यर्थैः समासादिभिः । अस्थानेऽनुपयोगिभिश्च बहुभिर्जल्पैर्भ्रमं तन्वते श्रोतॄणामितिवाक्यविप्लवकृतः सर्वेऽपि टीकाकृतः ॥ ( भोजराजकृत राजमार्तण्ड ) यद्यपि प्रस्तुत ग्रन्थ के श्रीअरुणदत्त एवं श्रीहेमाद्रि आयुर्वेद जगत् में स्वनाम धन्य प्राचीन व्याख्याकार हैं, तथापि ' दुर्बोधं यदतीव तद्विजहति ' के अनेक उदाहरण इनकी टीकाओं में देखने को मिलते हैं, फिर भी उनकी योग्यता के सामने हम नतमस्तक हैं । अष्टांगहृदय का कलेवर — निर्णयसागरीय अरुणदत्त तथा हेमाद्रि व्याख्या समुल्लसित अष्टांगहृदय की भूमिका की नवीं सूची में इसका उल्लेख विस्तार के साथ किया गया है । तदनुसार इसकी कुल स्थान संख्या ६, अध्याय संख्या १२० तथा श्लोक संख्या प्रायः ७४७१ है । ‘ कीर्तिरक्षरसम्बद्धा स्थिरा भवति भूतले ' इस सूक्ति के अनुसार विद्वान् लेखकों की कृतियाँ ही उन्हें सुदीर्घ काल तक जीवित रखने तथा यशस्वी बनाने में सहायक होती हैं । अतएव विद्वज्जन इस कार्य की ओर प्रवृत्त होते हैं । इसमें भी प्रकाशकों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है । वे न केवल ग्रन्थ के प्रकाशक होते हैं, अपितु ग्रन्थकार के भी प्रकाशक होते हैं । अन्यथा इनके अभाव में उत्तमोत्तम ग्रन्थों को दीमक चाट जाती है अथवा उन्हें प्राचीन ग्रन्थागारों की कारावास में शरण लेनी पड़ती है । प्रस्तुत व्याख्या की विशेषता - अष्टांगसंग्रह की विस्तार से रचना करने के बाद जब वाग्भट ने साररूप ' हृदय ' की रचना की तो विषयों को संक्षेप में उपस्थित करना आवश्यक हो गया था । व्यास - संक्षेप रचनाचतुर वाग्भट ने इस ग्रन्थ से सम्बन्धित विषयों की पूर्ति कैसे और कहाँ से की होगी, इसका ध्यान रखते हुए सम्पूर्ण ग्रन्थ में जहाँ - जहाँ जो संकेत दिये हैं, उन्हें व्याख्याकाल में सन्दर्भ - संकेत देकर अधिक स्पष्ट कर दिया गया है । इनकी सहायता से विज्ञ पाठक उन विषयों को यथास्थान सरलता से ढूँढ़ लेगा । साथ ही स्थान - स्थान पर ' अष्टांगहृदय ' के दुरूह विषयों को स्पष्ट करने की दृष्टि से जिन - जिन विषयों को ग्रन्थान्तरों से लिया गया है, उनके भी सन्दर्भ - संकेत यथास्थान दे दिये हैं । मूल ग्रन्थ की टीका के
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( १६ ) अन्त में वक्तव्य तथा विशेष वचन दिये गये हैं, जो ग्रन्थ के आशय को स्पष्ट करने में सहायक होंगे । यद्यपि ‘ अष्टांगहृदय ' में ग्रन्थकार ने तन्त्रयुक्तियों का उल्लेख नहीं किया है जिसका अष्टांगसंग्रह में उल्लेख हुआ है । अतः उनका परिगणन मात्र हमने यथास्थान अपने वक्तव्य में कर दिया है । औषधनिर्माण प्रसंग में जहाँ - जहाँ आवश्यक समझा गया वहाँ वहाँ औषध द्रव्य परिमाण तथा उसके निर्माण - विधि का भी उल्लेख कर दिया गया है । प्रस्तुत ' निर्मला ' व्याख्या की ये विशेषताएँ हैं । अष्टांगहृदय एक संग्रह - ग्रन्थ है । इसमें चरक, सुश्रुत, अष्टांगसंग्रह के तथा अन्य अनेक प्राचीन आयुर्वेदीय ग्रन्थों से उद्धरण लिये गये हैं । वाग्भट ने अपने विवेक से अनेक प्रसंगोचित विषयों का प्रस्तुत ग्रन्थ में समावेश किया है, यही कारण है कि इस ग्रन्थ का रूप अद्यतन बन पड़ा है । चरक आदि प्राचीन तन्त्रकारों ने जिन विषयों का सामान्य रूप से वर्णन किया था, उन्हें वाग्भट ने प्रमुख रूप देकर पाठकों का इस ओर विशेष ध्यानाकर्षण किया है; जैसे— रक्तविकारों में रक्तनिर्हरण ( सिरावेध, फस्द खोलना ) एक महत्त्वपूर्ण चिकित्सा है । वातविकारों में आयुर्वेदीय विधि से बस्ति - प्रयोग करना अपने में एक दायित्वपूर्ण चिकित्सा है । जिसकी आज का चिकित्सक समाज प्रायः उपेक्षा कर बैठा है । शिलाजतु प्रयोग — शास्त्रीय विधि से इसका दीर्घकाल तक सेवन करना तथा कराना चाहिए । पथ्य - अपथ्य का विचार करके किया गया इसका प्रयोग रोग को नष्ट करके दीर्घायु प्रदान करता है । अग्र्यद्रव्यसंग्रह — यह ( अ.हृ. उ. ४० / ४८-५८ ) प्रमुख रोगों में हितकर है । भूल किसी से भी हो सकती है, क्योंकि कहा गया है— ' प्रमादो धीमतामपि ' । अतः प्रामादिक अंशों को छोड़कर महत्त्वपूर्ण विषयों का ग्रहण करना विद्वानों का कर्तव्य है । आभार — प्रस्तुत व्याख्या लिखते समय मेरे सामने श्रीअरुणदत्त, श्रीहेमाद्रि कृत व्याख्याएँ तथा श्रीहरि शास्त्री द्वारा संगृहीत पाठभेद एवं टिप्पणियों से युक्त निर्णयसागरीय अष्टांगहृदय तथा पूज्य गुरुवर्य स्व ० लालचन्द्रजी वैद्य की व्याख्यायुक्त अष्टांगहृदय था । इन सबसे मुझे प्रेरणा मिली, तदर्थ उन सबके प्रति मैं नतमस्तक हूँ । आत्रेयकल्प सम्प्रति दिवंगत पीयूषपाणि गुरुवर्य पण्डितप्रवर लालचन्द्रजी वैद्य, प्रधानाचार्य श्रीअर्जुन आयुर्वेद महाविद्यालय, वाराणसी का आभार मैं किन शब्दों द्वारा प्रकट करूँ, जिनकी स्नेह - सुधा से छात्रावस्था में सिंचित मेरा शरीर, ज्ञानामृत से आप्लावित मेरा उत्तमांग तथा अमोघ आशीर्वादों से मेरा भूत, वर्तमान एवं भविष्यत् संवर्धित एवं परिरक्षित है, उनके प्रति सदैव नतमस्तक रहना ही मेरी शोभा है । व्याकरण में पतञ्जलि, न्याय में गौतम, वैशेषिकदर्शन में कणाद, सांख्य में कपिल, मीमांसा में जैमिनि, छन्दःशास्त्र में पिंगलमुनि, साहित्य में भास एवं कालिदास के प्रतिस्पर्धी, पाश्चात्य साहित्य के विशेषज्ञ महाकवि पण्डितप्रवर वसन्त त्र्यम्बक शेवडे का भी मैं अधमर्ण हूँ । जिन्होंने विविध शास्त्रों के उद्भट विद्वान् वाग्भट की प्रस्तुत कृति में स्थान - स्थान पर आये हुए व्याकरण सम्बन्धी पदों को स्पष्ट कर मेरा पथ प्रशस्त किया । इस अवसर पर कृशकाय किन्तु अदम्य उत्साह - सम्पन्न अपनी सहधर्मिणी के स्वास्थ्य सम्पन्न दीर्घायुष्य की कामना करता हूँ । जिनके सहयोग से मैं आज तक का साहित्य सृजन कर सका और भविष्य में भी कुछ कर सकूँ, यही साम्बसदाशिव से मेरी करबद्ध प्रार्थना है । अन्त में प्रस्तुत अष्टांगहृदय के साज - सज्जा पूर्ण प्रकाशन में होने वाले व्ययभार आदि की चिन्ता न करके इसे यथासम्भव शुद्ध छापने में दत्तावधान चौखम्बा सुरभारती परिवार, वाराणसी ने जो तत्परता दिखलायी है, तदर्थ उन्हें अनेकानेक साधुवाद देते हुए उनकी श्रीवृद्धि एवं यशोवृद्धि की कामना करता हूँ । इस ग्रन्थ के प्रूफ - संशोधन में श्री योगेशकुमार पण्ड्या ने मनोयोगपूर्वक कार्य किया है, एतदर्थ वे धन्यवादार्ह हैं । विदुषां विधेयः डॉ ॰ ब्रह्मानन्द त्रिपाठी
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विषयानुक्रमणिका सूत्रस्थानम् विषय ( १ ) आयुष्कामीयाध्यायः मंगलाचरण आयुर्वेद का प्रयोजन आयुर्वेदावतरण अष्टांगहृदय का स्वरूप आयुर्वेद के आठ अंग दोषों का वर्णन विकृत - अविकृत दोष दोषों के स्थान एवं प्रकोपकाल वय आदि के अनुसार काल दोषों का अग्नि पर प्रभाव दोषों का कोष्ठ पर प्रभाव दोषों से गर्भप्रकृति का वर्णन वातदोष के गुण पित्तदोष के गुण कफदोष के गुण संसर्ग - सन्निपात परिभाषा धातुओं का वर्णन मलों का वर्णन दोष, धातु, मलों की वृद्धि एवं क्षय रसों का वर्णन रसों का वात आदि पर प्रभाव द्रव्य का वर्णन वीर्य का वर्णन विपाक का वर्णन द्रव्य के गुणों का वर्णन रोग एवं आरोग्य के कारण रोग - आरोग्य में भेद रोगों के दो भेद दो प्रकार के रोगाधिष्ठान मानसिक दोषों का परिचय रोगी की परीक्षा पृष्ठांक | १ ३ | ५ ८ ८ ९ ९ ९ ९ १० १० १० ११ ११ ११ ११ १२ १२ १३ १३ १४ १४ १५ १५ १६ १६ १७ १७ १७ विषय रोग की परीक्षा देश - भेदों का वर्णन भूमिदेश का वर्णन काल के भेद औषध के भेद शारीरिक दोषों की चिकित्सा मानसिक दोषों की चिकित्सा चिकित्सा के चार पाद वैद्य के चार लक्षण औषध - द्रव्य के चार लक्षण परिचारक ( उपस्थाता ) के चार लक्षण रोगी के चार लक्षण साध्य - असाध्य के अनुसार व्याधि के भेद सुखसाध्य रोग के लक्षण कष्टसाध्य रोग के लक्षण याप्य रोग के लक्षण प्रत्याख्येय रोग के लक्षण त्याज्य रोगी अध्याय - संग्रह वर्णन | सूत्रस्थान के अध्याय शारीरस्थान के अध्याय निदानस्थान के अध्याय | चिकित्सास्थान के अध्याय कल्प- सिद्धिस्थान के अध्याय उत्तरस्थान के अध्याय अष्टांगहृदय के छः स्थान ( २ ) दिनचर्याध्यायः ब्राह्ममुहूर्त में जागना दतवन का विधान दतवन करने की विधि दतवन का निषेध अञ्जन- प्रयोग २ अ ० भू ०
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( १८ ) विषय रसाञ्जन - प्रयोगविधि नस्य आदि सेवन - निर्देश ताम्बूलसेवन - विधि ताम्बूलसेवन - निषेध अभ्यंगसेवन - विधान अभ्यंग के प्रमुख स्थान अभ्यंग का निषेध व्यायाम का विधान व्यायाम का निषेध अर्धशक्ति एवं काल - निर्देश शरीरमर्दन - निर्देश अतिव्यायाम से हानि व्यायाम आदि का निषेध उबटन के गुण स्नान के गुण उष्ण - शीत जलप्रयोग स्नान का निषेध भोजन आदि कर्तव्य सुख का साधन धर्म मित्र- अमित्र सेवन - विचार पापकर्मों का त्याग अनुकूल व्यवहार - निर्देश समदृष्टिता का निर्देश सम्मान करने का निर्देश याचकों की सम्मान - विधि उपकार का निर्देश समभाव का निर्देश मधुरभाषण- -निर्देश भाषण - विधि विचारों को गुप्त रखें परच्छन्दानुवर्तन इन्द्रियव्यवहार - विधि त्रिवर्ग - विरोध का निषेध सभी धर्मों का आचरण शरीरशुद्धि के प्रकार रत्न आदि का धारण छाता आदि धारण दण्ड आदि धारण गमन- -निर्देश पृष्ठांक २८ २८ २८ २ ९ २ ९ ३० ३० ३० ३१ ३१ ३१ ३१ ३२ ३२ ३२ ३२ ३३ ३३ ३३ ३४ ३४ ३४ ३४ ३४ ३५ ३५ | ३५ ३५ | ३५ ३५ ३५ ३६ ३६ ३६ ३६ ३६ | ३६ | ३६ ३६ | विषय निषिद्ध कार्य छींक आदि करने की विधि आंगिक चेष्टाओं का निषेध शारीरिक आदि चेष्टाओं की मात्रा १. अन्य सदाचार २. अन्य सदाचार मद्यविक्रय आदि का निषेध अन्य निषिद्ध कर्म अन्य सदुपदेश | सदाचारसूत्र विचार पद्धति सद्वृत्त का उपसंहार ( ३ ) ऋतुचर्याध्यायः छः ऋतुएँ उत्तरायण तथा आदानकाल अग्निगुण - प्रधान आदानकाल विसर्गकाल - दक्षिणायन विसर्गकाल - परिचय बल का चयापचय | हेमन्त ऋतुचर्या प्रातः काल के कर्तव्य स्नान आदि की विधि शीतनाशक उपाय निवास- विधि शिशिर ऋतुचर्या वसन्त ऋतुचर्या मध्याह्नचर्या वसन्त ऋतु में अपथ्य ग्रीष्म ऋतुचर्या सेवनीय पदार्थ सत्तूसेवन - विधि मद्यसेवन - विधि मद्यपान का निषेध भोजन - विधान पेय - विधान रात्रि में दुग्धपान - विधि मध्याह्नचर्या १. शयन - विधान २. शयन -विधान -1
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( १ ९ ) विषय रात्रिचर्या मनोहर वातावरण वर्षा ऋतुचर्या शरीर - शुद्धि सेवनीय विहार त्याज्य विहार शरद् ऋतुचर्या आहार - विधि हंसोदकसेवन - निर्देश विहार - विधि अपथ्य - निषेध संक्षिप्त ऋतुचर्या रससेवन - निर्देश ऋतुसन्धि में कर्तव्य ( ४ ) रोगानुत्पादनीयाध्यायः वेगों को न रोकने का निर्देश अपानवायु को रोकने से हानि मलवेगरोधज रोग मूत्रवेगरोधज रोग उक्त रोगों की चिकित्सा मूत्रवेगरोधज रोग - चिकित्सा उद्गारवेगरोधज रोग - चिकित्सा छींक के वेग को रोकने से हानि छिक्कावेगनिरोधज रोग - चिकित्सा तृषावेगनिरोधज रोग - चिकित्सा क्षुधावेगनिरोधज रोग - चिकित्सा निद्रावेगनिरोधज रोग - चिकित्सा कासवेगनिरोधज रोग - चिकित्सा श्रमश्वासवेगनिरोधज रोग - चिकित्सा जृम्भावेगनिरोधज रोग - चिकित्सा अश्रुवेगनिरोधज रोग - चिकित्सा छर्दिवेगनिरोधज रोग छर्दिवेगनिरोधज रोग - चिकित्सा शुक्र के वेग को रोकने के कारण उत्पन्न रोग शुक्र के वेग को रोकने के कारण उत्पन्न रोगों की चिकित्सा वेगरोधी के असाध्य लक्षण सामान्य चिकित्सा धारणीय वेग पृष्ठांक | विषय ४८ शोधन की आवश्यकता ४८ संशोधन कर्म की प्रशंसा ४८ रसायन, वाजीकरण योगों का ४८ शोधनोत्तर चिकित्सा ४ ९ चिकित्सा का फल ४ ९ आगन्तुज रोग प्रयोग ४ ९ निजागन्तुज रोगों का निरोध एवं शमन ५० शोधन योग्य ऋतुएँ -५० स्वस्थ रहने के उपाय ५० ( ५ ) द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५० अथ तोयवर्गः ५० गंगा का जल ५२ गंगाजल का परिचय ५२ सामुद्र जल पानीय जल ५४ न पीने योग्य जल ५४ १. नदीजल का वर्णन ५५ २. नदीजल का वर्णन ५५ ३. नदीजल का वर्णन ५५ कूप आदि का जल ५५ जलपान - विधि ५५ जलपान का प्रभाव ५६ शीतल जलपान के लाभ ५६ उष्ण जलसेवन के लाभ ५६ श्रुतशीत एवं बासी जल ५६ नारियल का जल ५६ | उत्तम एवं अधम जल ५७ अथ क्षीरवर्गः ५७ सामान्य दूध के गुण ५७ | गाय के दूध के गुण ५७ भैंस के दूध के गुण ५८ | बकरी के दूध के गुण ५८ | ऊँटनी के दूध के गुण ५८ मानुषी दूध के गुण भेड़ दूध के गुण ५८ हथिनी के दूध के गुण ५८ एकशफ दूध के गुण ५ ९ आम - शृत दुग्ध - गुण ५ ९ | धारोष्ण दूध
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( २० ) विषय दधिगुण - वर्णन तक्र का वर्णन मस्तु का वर्णन नवनीत - वर्णन दूध का नवनीत घृत के गुण पुराने घृत के प्रयोग किलाट आदि का वर्णन उत्तम - अधम विचार अथ इक्षुवर्गः ईख के रस का वर्णन अगले भाग का रस यान्त्रिक रस के भेद ईख के भेद एवं गुण शतपर्वक आदि ईखों के गुण फाणित के गुण गुड़ के गुण पुराने - नये गुड़ के गुण मत्स्यण्डिका आदि के गुण यासशर्करा के गुण सभी शर्कराओं के गुण शर्करा की उत्तमता अथ मधुवर्गः मधु का वर्णन उष्ण मधुसेवन का निषेध संशोधन में मधु - प्रयोग अथ तैलवर्गः सामान्य तैल का वर्णन एरण्डतेल के गुण सरसों का तेल बहेड़े की गिरी का तेल नीम की गिरी का तेल अतसी - कुसुम्भ तेल प्राणिज स्नेह अथ मद्यवर्गः मद्य का वर्णन नया एवं पुराना मद्य मद्य का निषेध विभिन्न सुराओं का वर्णन पृष्ठांक | विषय ७१ वारुणी - परिचय ७१ यव ( जौ से निर्मित ) सुरा ७२ | बहेड़ा की सुरा ७२ | कौहली सुरा ७२ मधूलक सुरा ७३ अरिष्ट - परिचय ७३ मुनक्का ( मार्दीक ) आसव ७३ | खार्जूर, शार्कर आसव ७३ गुड़ - निर्मित आसव सीधु का वर्णन ७४ मध्वासव का वर्णन ७४ शुक्त का वर्णन ७४ | गुड़ आदि शुक्त ७४ कन्द आदि शुक्त ७५ शाण्डाकी - वर्णन ७५ धान्याम्ल आदि का वर्णन ७५ | सौवीरक तथा तुषोदक ७५ अथ मूत्रवर्गः ७५ मूत्रों का वर्णन ७५ ( ६ ) अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ७५ अथ शूकधान्यवर्गः ७६ | शूकधान्यों का वर्णन रक्तशालि का वर्णन ७६ | क्रमशः गुणहीनता ७६ | यवक आदि शालिधान्य ७६ व्रीहिधान्य का वर्णन सामान्य गुण वाले षष्टिक ७७ अन्य व्रीहिधान्य - वर्णन ७७ तृणधान्यों का वर्णन ७७ प्रियंगुधान्य का वर्णन ७८ कोदों धान्य का वर्णन ७८ जौ का वर्णन ७८ अनुयव का वर्णन ७८ वंशज जौ का वर्णन गोधूम का वर्णन ७ ९ नन्दीमुखी का वर्णन ८० अथ शिम्बीधान्यवर्गः ८० शिम्बीधान्य - परिचय ८० । मूँग, मटर, राजमाष