श्रीगणेशाय नमः।

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 101–110

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 101–110

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द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् ६५ गङ्गा ' । अतएव वेगवती नदियों का जल शुद्ध होता है । देखें— ' नदी वेगेन शुध्यति ' । ( चा.नी. ६।३ ) अतः जल की परीक्षा करके उसका संग्रह तथा प्रयोग करें । कभी आश्विन में भी सामुद्र जल बरस सकता है । यद्यपि शरद् ऋतु का जल वर्षा ऋतु के जल से अवश्य स्वच्छ होता है, तथापि परीक्षा कर लेनी चाहिए । निष्कर्ष —— गंगा का जल पीने योग्य ( हितकर ) होता है और समुद्र का जल पीने योग्य नहीं होता, भले ही वह नमकीन न हो । अतः आश्विन मास से ज्येष्ठ मास तक जो वर्षा का जल होता है, वह पानीय ( पीने योग्य ) होता है, शेष महीनों में बरसने वाला जल सामान्यतः अपेय होता है । ऐन्द्रमम्बु सुपात्रस्थमविपन्नं सदा पिबेत् ॥ ४ ॥

तदभावे च भूमिष्ठमान्तरिक्षानुकारि यत् । शुचिपृथ्वसितश्वेते देशेऽर्कपवनाहतम् ॥ ५ ॥

पानीय जल — ऐन्द्रम् अम्बु ( बादलों से बरसा हुआ जल ) जो साफ - सुथरे पात्र में रखा हो और जो किसी प्रकार से विकार युक्त न हुआ हो, उसे सदा पीना चाहिए । इसके अभाव में उस प्रकार के जल को पीना चाहिए, जो आकाश से बरसे हुए जल की भाँति स्वच्छ हो तथा पृथिवी के स्वच्छ, पवित्र तथा काले अथवा सफेद स्थान ( पात्र ) में रखा गया हो, जिसमें सूर्य की किरणों एवं शुद्ध हवा का स्पर्श होता हो; इस दृष्टि से तालाब तथा झील के जल पीने के योग्य होते हैं॥४-५ ॥ न पिबेत्पङ्कशैवालतृणपर्णाविलास्तृतम् ॥ सूर्येन्दुपवनादृष्टमभिवृष्टं घनं गुरु ॥६ ॥

फेनिलं जन्तुमत्तप्तं दन्तग्राह्यतिशैत्यतः । अनार्तवं च यद्दिव्यमार्तवं प्रथमं च यत् ॥७ ॥

लूतादितन्तुविण्मूत्रविषसंश्लेषदूषितम् न पीने योग्य जल — कीचड़, सिवार, तिनके तथा पत्तों के फैल जाने के कारण जो जल मलिन हो गया हो, उसे नहीं पीना चाहिए । जिस जल पर सूर्य - चन्द्रमा की किरणों का तथा शुद्ध वायु का स्पर्श न होता हो, जो अभी - अभी बरसा हो अर्थात् जो पहली वर्षा का जल हो, जो जल घन ( गदला ) होने के कारण गुरु ( पचने में भारी ) हो, जिसके ऊपर झाग उठी हो, जो क्रिमियुक्त हो, स्पर्श में उष्ण हो तथा जो अत्यन्त शीतल होने के कारण दाँतों में लगकर पीड़ा उत्पन्न करता हो, उस जल को नहीं पीना चाहिए । वर्षाऋतु के जल को आर्तवजल कहते हैं । इस काल के अतिरिक्त जब भी तत्काल जल बरसे, उसे ' अनार्तव ' जल कहते हैं और जो वर्षाकाल में भी आकाश से पहली बार बरसा हुआ जल है, उसे भी न पीयें । लूता आदि प्राणियों की जो लार से, मल - मूत्र तथा विष के सम्पर्क से दूषित जल हो, उसे भी नहीं पीना चाहिए ॥ ६-७ ॥ वक्तव्य- - इस सम्बन्ध में सुश्रुत के विचार द्रष्टव्य हैं— ' तत्र सर्वं चेति ' । ( सु.सू. ४५।८ ) इसका आशय है — वर्षा ऋतु में आन्तरिक्ष ( आकाश से प्राप्त ), औद्भिद ( स्रोत से निकलने वाले ) जल को पीना चाहिए । भाद्रपद में जल को गरम करके ठण्डा कर लें, तब पीयें । क्योंकि ये दोनों प्रकार के जल महागुण वाले होते हैं । शरद् ऋतु में सभी प्रकार के जलों का सेवन किया जा सकता है, क्योंकि इन दिनों अगस्त्य का उदय हो जाता है । ( ज्ञानमण्डल से प्रकाशित ' बृहत् हिन्दी कोश ' में लिखा है — अगस्त्योदय भाद्र - शुक्लपक्ष में होता है । इसे एक नक्षत्र कहते हैं, किन्तु इसकी गणना २७ नक्षत्रों में नहीं है । अगस्त्य नाम एक ऋषि का है, इन्होंने विन्ध्याचल को बढ़ने से रोक दिया था । इनका दूसरा नाम ' कुम्भज ' है । ) अतः इनके उदय हो जाने पर सभी प्रकार के जल स्वच्छ हो जाते हैं । हेमन्त ऋतु में सरोवर तथा तालाबों का जल पीने योग्य हो जाता है । वसन्त तथा ग्रीष्म ऋतु में कुआँ तथा झरने का जल पीना चाहिए । प्रावृट् ऋतु में सरोवर, तालाब एवं कुआँ का जल नहीं पीना चाहिए । शेष जल पेय होते हैं, निषेध केवल ' अभिवृष्ट ' जल का है । ऐसे जल में स्नान भी नहीं करना चाहिए । महर्षि कश्यप ने कहा है — ' बलाहकाद्याः समदाः कीटा लूताश्च खेचराः । तद्विषोत्सर्गसंसर्गादग्राह्यं तत् तदा जलम् ’ ॥ अर्थात् अन्तरिक्ष में भ्रमण करने वाले अनेक प्रकार की लूताएँ तथा कीड़े आदि ऐसे होते ५ अ ० हृ ०

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६६ अष्टाङ्गहृदये हैं, जो वर्षा के साथ भूमि पर गिरते हैं । यह सत्य है । आप देखें, बरसात के आरम्भ में वर्षा के जल से स्नान करने के कारण खुजली आदि चर्मरोग और उसे पीने से कास, प्रतिश्याय आदि रोग हो जाते हैं । आठ प्रकार के जल — १. कौप ( कुएँ का जल ), २. सारस ( सरोवर या झील का जल ), ३. ताडाग ( तालाब का जल ), ४. चौण्ड्य ( इसे चौञ्ज, चौण्ट्य तथा चौण्ड्य भी कहते हैं । इसके लक्षण इस प्रकार हैं— ' शिलाकीर्णं स्वयं श्वभ्रं नीलाञ्जनसमोदकम् । लतावितानसम्पन्नं चौञ्जमित्यभिधीयते ॥ - भा. प्र. जलवर्ग ), ५. प्राम्रवण ( झरना का जल ), ६. औद्भिद ( चश्मा या स्रोत का जल ), ७. वाप्य ( बावड़ी का जल )

तथा ८. नदी का जल । देखें —— अ.सं. सू. ६।१२- १५ ।

पश्चिमोदधिगाः शीघ्रवहा याश्चामलोदकाः ॥ ८ ॥

पथ्याः समासात्ता नद्यो विपरीतास्त्वतोऽन्यथा । ( १ ) नदीजल का वर्णन - पश्चिमी समुद्र की ओर बहने वाली, वेग से बहने वाली तथा निर्मल जल वाली जो नदियाँ हैं, वे सभी संक्षेप से हितकारक जल वाली होती हैं । इन गुणों के विपरीत जो नदियाँ हैं, उनका जल अहितकारक होता है ॥८ ॥

उपलास्फालनाक्षेपविच्छेदैः खेदितोदकाः ॥९ ॥

हिमवन्मलयोद्भूताः पथ्यास्ता एव च स्थिराः । कृमिश्लीपदहृत्कण्ठशिरोरोगान् प्रकुर्वते ॥ १० ॥

( २ ) नदीजल का वर्णन — हिमालय तथा मलय पर्वत से निकल कर बहने वाली वे नदियाँ जिनका जल पत्थरों तथा चट्टानों से टकराकर गिरने से छिन्न - भिन्न होने के कारण खिन्न ( दुःखी, आलोड़ित ) हो जाता है, उनका जल पथ्य ( हितकर ) होता है । जब उक्त नदियों का जल जिस प्रदेश में आकर स्थिर हो जाता है अर्थात् वेग से बहता हुआ नहीं दिखलायी देता, उन - उन स्थानों में उन उन नदियों का जल क्रिमिरोग, श्लीपद ( फीलपाँव ), हृदयरोग, कण्ठरोग ( गलगण्ड ) तथा शिरोरोग कारक हो जाता है ॥ ९ -१० ॥ प्राच्यावन्त्यपरान्तोत्था दुर्नामानि, महेन्द्रजाः । उदर श्लीपदातङ्कान्, सह्यविन्ध्योद्भवाः पुनः ॥ कुष्ठपाण्डुशिरोरोगान्, दोषघ्न्यः पारियात्रजाः । बलपौरुषकारिण्यः, सागराम्भस्त्रिदोषकृत् ॥ ( ३ ) नदीजल का वर्णन - प्राच्यदेश ( आसाम तथा बंगाल ) की, आवन्त्य देश ( मालव ) की तथा अपरान्त ( सह्याद्रि का पश्चिमी प्रदेश – कोंकण ) प्रदेश की नदियाँ अर्श ( बवासीर ), उदररोग तथा श्लीपद ( फीलपाँव ) रोगों को पैदा कर देती हैं । सह्याचल तथा विन्ध्याचल की नदियाँ कुष्ठरोग, पाण्डुरोग एवं शिरोरोगों को उत्पन्न कर देती हैं । पारियात्र ( सात कुलपर्वतों में से एक ) पर्वत से उत्पन्न नदियों का जल दोषनाशक होता है । इसका सेवन करने से बल एवं पौरुष ( उत्साहशक्ति ) की वृद्धि होती है तथा समुद्र का जल तीनों दोषों को उभाड़ने वाला होता है ॥ ११-१२ ॥ वक्तव्य — ऊपर विभिन्न प्रकार की नदियों के जलों के गुण - धर्मों का विवेचन किया गया है, इसी विषय को संक्षेप में सुश्रुत ने इस प्रकार कहा है — ' तत्र नद्यः पश्चिमाभिमुखाः पथ्याः लघूदकत्वात्; पूर्वाभिमुखास्तु न प्रशस्यन्ते, गुरूदकत्वात्; दक्षिणाभिमुखा नातिदोषलाः, साधारणत्वात् ' । ( सु.सू. ४५।२१ ) अर्थात् पश्चिम समुद्र की ओर बहने वाली नदियों का जल हितकर होता है, क्योंकि उनका जल हलका होता है । पूर्वी समुद्र की ओर बहने वाली नदियों का जल हितकर नहीं होता, क्योंकि इनका जल भारी होता है । दक्षिण समुद्र की ओर बहने वाली नदियों का जल अधिक दोषकारक नहीं होता, क्योंकि यह जल साधारण होता है । वास्तव में उक्त तीन प्रकार की नदियाँ क्रमशः जांगल प्रदेश, आनूप प्रदेश तथा साधारण देश से सम्बन्धित हैं, अतएव उनके गुण - धर्मों में इस प्रकार का अन्तर है । स्पष्टीकरण— १. पश्चिमाभिमुखी नदियाँ – शतद्रु ( सतलज ) तथा विपाशा ( व्यास ) आदि । २. पूर्वाभिमुखी नदियाँ –— गंगा ( समतल भाग में बहने वाली ), यमुना, सरयू आदि । ३. दक्षिणाभिमुखी

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द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् नदियाँ — नर्मदा, ताप्ती, पयोष्णी, गोदावरी, कावेरी आदि । जिन नदियों का जल उत्तम कहा गया है, उनकी उत्तमता का मापदण्ड है— उनकी प्रवाहशीलता; अन्यथा प्रवाह के शिथिल होने पर उत्तमता में भी शिथिलता आ जाती है, फलतः वे भी अपथ्यकारक हो जाती हैं । विद्यात्कूपतडागादीन् जाङ्गलानूपशैलतः । कूप आदि का जल — कुआँ, तालाब, झील आदि के जलों के गुण - दोष का निर्णय जांगल देश, अनूपदेश तथा पर्वतीय देश के अनुसार होता है । वक्तव्य — जांगल देश के कुएँ, तालाब आदि का जल स्वास्थ्य - वृद्धि के लिए उत्तम होता है, अनूपदेश में स्थित इनका जल हानिकारक तथा पर्वतीय प्रदेश का जल ऊपरी भागों में हितकर एवं पर्वत के निचले भाग का जल प्रायः अहितकर होता है । सुश्रुत के अनुसार अशुद्ध जल को शुद्ध करने की विधि – ' तत्र ' ' ' ' ' मणिश्चेति ' । ( सु.सू. ४५/१७ ) अर्थात् मलिन जल को शुद्ध करने वाले सात पदार्थ हैं—– १. कतक ( निर्मली ), २. गोमेदक, ३. विसग्रन्थि ( कमल की जड़ ), ४. शैवाल ( काई ) की जड़, ५. वस्त्र, ६. मोती, ७. मणि ( फिटकिरी ) आदि । ‘ पञ्च ' ' ' ' चेति ’ । ( सु.सू. ४५।१८ ) अर्थात् पाँच वस्तुएँ ऐसी होती हैं, जिनके ऊपर पानी के पात्र को रख देने से भूमि का प्रभाव जल पर नहीं पड़ता - १. फलक ( सेमल आदि लकड़ी का तख्ता ), २. त्र्यष्टक ( तिकंटि या तिपायी ), ३. मुञ्जवलय ( मूँज आदि का बना गोल आकार का असन ), ४. उदकमञ्चिका • जिस पर जमीन से ऊँचे जलपात्र रखा जाय ) तथा ५. शिक्य ( छींका ) । ‘ सप्त ’ ं ं'चेति ’ । ( सु.सू. ४५।१ ९ ) अर्थात् पानी को शीतल करने के सात उपाय हैं— १. हवा में ( खुले स्थान में ) पानी को रखना, २. पानी से भरे पात्र को बाहर से गीले वस्त्र से लपेट कर उसे तर रखना, ३. यन्त्र, लकड़ी आदि को घुमाते रहना, ४. पंखा चलाना, ५. वस्त्र द्वारा छानना, ६. पानी भरे

पात्र को बालू के आसन पर रखना तथा ७. जलपात्र को छींके पर लटकाना ।

नाम्बु पेयमशक्त्या वा स्वल्पमल्पाग्निगुल्मिभिः ॥ १३ ॥

पाण्डूदरातिसारार्शोग्रहणीशोषशोथिभिः । ऋते शरन्निदाघाभ्यां पिबेत्स्वस्थोऽपि चाल्पशः ॥ जलपान - -1 विधि - शक्ति से अधिक जल किसी को नहीं पीना चाहिए । मन्दाग्नि, गुल्म, पाण्डुरोग, उदररोग, अतिसार, अर्शोरोग, ग्रहणीरोग, शोष ( राजयक्ष्मा ) तथा शोथरोग से युक्त पुरुषों को थोड़ा जल

पीना चाहिए । १३-१४ ॥

समस्थूलकृशा भुक्तमध्यान्तप्रथमाम्बुपाः । जलपान का प्रभाव — भोजन करते समय बीच - बीच में पानी पीने वालों का शरीर ' सम ' रहता है, भोजन के अन्त में जल पीने वालों का शरीर स्थूल ( मोटा ) होता है और भोजन के आरम्भ में जल पीने वालों का शरीर कृश ( दुर्बल ) हो जाता है । वक्तव्य — बेचारे वे जब पहले पानी से ही पेट भर लेंगे, तो भोजन कहाँ कर पायेंगे? वे कृश नहीं होंगे तो और क्या होंगे? शीतं मदात्ययग्लानिमूर्च्छाच्छर्दिश्रमभ्रमान् ॥ १५ ॥

तृष्णोष्णदाहपित्तास्रविषाण्यम्बु नियच्छति । शीतल जलपान के लाभ - शीतल जल का सेवन करने से मदात्ययरोग, ग्लानि ( हर्षक्षय ), मूर्च्छा ( बेहोशी ), छर्दि ( वमन ), श्रम ( थकावट ), भ्रम, तृष्णा, उष्ण या ऊष्म ( गर्मी या पसीने की अधिकता ), वह ( जलन ), पित्तविकार, रक्तविकार तथा विषविकार नष्ट हो जाते हैं ॥ १५ ।

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अष्टाङ्गहृदये दीपनं पाचनं कण्ठ्यं लघूष्णं बस्तिशोधनम् ॥ १६ ॥

हिध्माध्मानानिलश्लेष्मसद्यः शुद्धिनवज्वरे । कासामपीनसश्वासपार्श्वरुक्षु च शस्यते ॥१७ ॥

उष्ण जलसेवन के लाभ – यह जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, आमरस को पचाता है, कण्ठ के लिए हितकर है, लघु ( शीघ्र पचता ) है, बस्ति का शोधक है; हिक्का, अफरा, वातविकार, कफविकार, तत्काल किये गये वमन, विरेचन, नवज्वर, कास, आमाजीर्ण, पीनस, श्वास तथा पार्श्वशूल रोगों में इसका प्रयोग प्रशंसित है ॥ १६-१७ ॥ वक्तव्य — उष्ण जल के प्रयोग सम्बन्धी अनेक स्वरूप देखने को मिलते हैं । यथा — १. अष्टमांश शेष, २. चतुर्थांश शेष, ३. अर्धांश शेष तथा ४. उबाल कर रखा गया । ये जल उत्तरोत्तर सामान्य होते हैं । अष्टमांश शेष जल का प्रयोग प्रायः उच्च तापमान वाले ज्वर में गुनगुना करके दिया जाता है । यह स्वयं भी एक उत्तम औषध का काम करता है, व्यवहार करके देखें । जल को उबाल कर छान लें, उसे ठण्डा करने के लिए रख दें । यह निर्दोष जल सभी के पीने योग्य होता है । उष्णजल की उत्तमता १२ या २४ घण्टों तक ही रहती है, शेष आगे देखें । अनभिष्यन्दि लघु च तोयं क्वथितशीतलम् । पित्तयुक्ते हितं दोषे, व्युषितं तत्त्रिदोषकृत् ॥ १८ ॥

शृतशीत एवं बासी जल — उक्त विधियों से पकाकर शीतल किया हुआ जल अभिष्यन्दी नहीं होता अपितु वह लघु होता है । यह जल वातपित्त, कफपित्त तथा सन्निपात में भी यदि पित्त की अधिकता हो तो हितकर होता है और यही जल जब बासी हो जाता है, तो त्रिदोषकारक होता है ॥ १८ ॥

वक्तव्य- - इस विषय में सुश्रुत की स्पष्टोक्ति देखें— ' यत् क्वाथ्यमानं निर्वेगं निष्फेनं निर्मलं लघु । चतुर्भागावशेषस्तु तत्तोयं गुणवत् स्मृतम् ' ॥ ( सु.सू. ४५।४० ) अर्थात् जो पानी पकाने पर वेगरहित, झागरहित तथा निर्मल हो जाय और चतुर्थांश शेष रह गया हो, वह लघु एवं गुणकारी होता है । नारिकेलोदकं स्निग्धं स्वादु वृष्यं हिमं लघु । तृष्णापित्तानिलहरं दीपनं बस्तिशोधनम् ॥ १ ९ ॥ नारियल का जल – नारियल के कच्चे फल के भीतर दूध की आकृति का जो पानी होता है, वह स्निग्ध, स्वादु, वृष्य ( वीर्यवर्धक ), शीतल तथा लघु होता है । यह प्यास, पित्तविकार, वातविकार को नष्ट करता है, अग्नि को प्रदीप्त करता है तथा बस्ति को शुद्ध करता है ॥ १ ९ ॥ वक्तव्य — कवि कहता है कि ईश्वर की लीला विचित्र है । देखें उदाहरण — ' समायाति यदा लक्ष्मीर्नारि-केलफलाम्बुवत् । विनिर्याति यदा लक्ष्मीर्गजभुक्तकपित्थवत् ' ॥ अर्थात् जब लक्ष्मी आती है तो नारियल के फल के भीतर पानी की भाँति और जब वह जाने लगती है तो हाथी द्वारा खाये ( निगले ) गये कैथ के गूदा की भाँति । हाथी कैथ के फल को गूदा सहित निगल जाता है और जब उसके मल में वह कैथ का फल पाया जाता है तो बिना गूदा का । आश्चर्य है, बिना फल के फूटे वह वर्षासु दिव्यनादेये परं तोये वरावरे । इति तोयवर्गः । उत्तम एवं अधम जल ——– वर्षा ऋतु में दिव्य ( वर्षा का ) जल उत्तम योग्य नहीं होता है । अथ क्षीरवर्गः स्वादुपाकरसं स्निग्धमोजस्यं धातुवर्धनम् ॥ वातपित्तहरं वृष्यं श्लेष्मलं गुरु शीतलम् । प्रायः पयः-सामान्य दूध के गुण — प्रायः दूध रस एवं पाक में मधुर, स्निग्ध को बढ़ाने वाला, वात - -1 पित्तशामक, वीर्यवर्धक, कफकारक, गुरु तथा शीतल गूदा कहाँ गया? होता है और नदी का जल पीने २० ॥ , ओजस् एवं रस आदि धातुओं होता है ॥ २० ॥

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द्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् ६ ९ - अत्र गव्यं तु जीवनीयं रसायनम् ॥ २१ ॥

क्षतक्षीणहितं मेध्यं बल्यं स्तन्यकरं सरम् । श्रमभ्रममदालक्ष्मीश्वासकासातितृट्क्षुधः ॥ २२ ॥

जीर्णज्वरं मूत्रकृच्छ्रं रक्तपित्तं च नाशयेत् । गाय के दूध के गुण - यह विशेष करके जीवनीय शक्ति को देने वाला तथा रसायन के गुण - धर्मो से युक्त होता है । उरःक्षत एवं क्षयरोगियों के लिए हितकर होता है । यह मेधा ( धारणाशक्ति ) दायक, बलकारक, दुग्धवर्धक तथा सर है । यह श्रम, भ्रम, मद, अलक्ष्मी ( कान्तिहीनता ), श्वास, कास, प्यास का अधिक गना, अधिक भूख का लगना, जीर्ण ( पुराना ) ज्वर, मूत्रकृच्छ्र तथा रक्तपित्त रोग का विनाशक है ॥ २१-२२ ॥ हितमत्यग्न्यनिद्रेभ्यो गरीयो माहिषं हिमम् ॥ २३ ॥

भैंस के दूध का गुण — जिनकी जठराग्नि तीक्ष्ण हो गयी हों, जिन्हें नींद न आती हों उनके लिए हितकर होता है । यह गाय के दूध से अधिक गुरु तथा शीतल होता है ॥ २३ ॥

वक्तव्य- -चरक तथा सुश्रुत में वर्णित भैंस के दूध के गुणों में परस्पर विरोध प्रतीत होता है— ' महिषीणां गुरुतरं गव्याच्छीततरं पयः । स्नेहान्यूनमनिद्राय हितमत्यग्नये च तत् ' । ( च.सू. २७।२१ ९ ) और — ' महाभिष्यन्दि मधुरं माहिषं वह्निनाशनम् । निद्राकरं शीतकरं गव्यात् स्निग्धतरं गुरु ' ॥ ( सु.सू. ४५/५५ ) समन्वय -यहाँ चरक द्वारा कहा गया — गाय के दूध से भैंस के दूध में जो स्नेह की कभी कही गयी है, वह हृदय के लिए कम हितकर है, इस दृष्टि से कहा गया है । भैंस के दूध से निकलने वाला जो स्नेह ( घी ) है, उसकी अपेक्षा गाय के दूध से उत्पन्न स्नेह ( घी ) हृदय के लिए अधिक हितकर होता है, यही अभिप्राय है । इसीलिए ‘ खारणादि ' ने भी ' उत्तम ' शब्द का प्रयोग किया है— ' गव्यं स्नेहोत्तमं क्षीरं गव्याच्च पयसः पयः । यथोत्तरं स्नेहहीनमौरभ्रच्छागमाहिषम् ' । अल्पाम्बुपानव्यायामकटुतिक्ताशनैर्लघु । आजं शोषज्वरश्वासरक्तपित्तातिसारजित् ॥ २४ ॥

बकरी के दूध के गुण - बकरी जल थोड़ा पीती है, कूदना - फाँदना, दौड़ना आदि अनेक प्रकार का व्यायाम अधिक करती है; कटु - तिक्त रस युक्त पत्तों को प्रायः खाती रहती है, अतः उसका दूध हलका ( सुपच ) होता है । यह शोष ( राजयक्ष्मा ), ज्वर, श्वास, रक्तपित्त तथा अतिसार रोगों को नष्ट करता है ॥२४ ॥

वक्तव्य — बकरी स्वयं में राजयक्ष्मा - चिकित्सा की एक प्रयोगशाला है । चरक - टीकाकार चक्रपाणि ने स्वरचित ' चक्रदत्त ' में एक प्रयोग इस प्रकार दिया है—

' छागं मांसं पयश्छागं छागं सर्पिः सशर्करम् ।

छागोपसेवा शयनं छागमध्ये तु यक्ष्मनुत् ’ ॥

अर्थात् बकरी का मांस, चीनी मिला हुआ बकरी का दूध, बकरी का घी, बकरियों के बीच में रहना, इन्हीं के बीच में सोना और इनकी मैं - मैं सुनना यक्ष्मरोगनाशक होता है । बकरी के दूध - घी आदि के अलग - अलग प्रयोग प्राचीन संहिताओं में भी मिलते हैं । इस प्रकार बकरी का सर्वांग उपयोग आचार्य चक्रपाणि का बुद्धिकौशल है । काशी - निवासी स्वतन्त्रतासेनानी, वयोवृद्ध पण्डित शिवविनायक मिश्र वैद्य अपने जीवन के अन्तिम दिनों में क्षयरोग से पीड़ित हो गये थे । उन्होंने चक्रदत्त के उक्त श्लोक के अनुसार अपनी जीवनचर्या बना ली थी, जिससे वे रोगमुक्त हो गये थे; तब से समीपस्थ जनता उन्हें ' बकरिया वैद्य ' कहा करती थी । उनका स्वर्गवास उसके बहुत दिनों के बाद १ ९ ७६ में हुआ । ये स्वतन्त्रता - संग्राम के बाद आयुर्वेद के जीवन्त

सेनानी एवं प्रहरी थे । ये बकरी का मांस नहीं खाते थे ।

ईषद्र्क्षोष्णलवणमौष्ट्रकं दीपनं लघु । शस्तं वातकफानाहकृमिशोफोदरार्शसाम् ॥ २५ ॥

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७० अष्टाङ्गहृदये ऊँटनी के दूध के गुण – ऊँटनी का दूध थोड़ा रूक्षता युक्त, उष्ण तथा लवण रसयुक्त, अग्निदीपक, लघु ( हलका ) होता है । यह वातविकार, कफविकार, आनाह ( अफरा ), कृमिरोग, शोथरोग, उदररोग तथा अर्शोरोग में हितकर होता है ॥ २५ ॥

मानुषं वातपित्तासृगभिघाताक्षिरोगजित् । तर्पणाश्चोतनैर्नस्यैः- --मानुषी दूध के गुण - नारी का दूध वात, पित्त, रक्त तथा अभिघात ( चोट आदि लगने ) के कारण उत्पन्न नेत्र सम्बन्धी रोगों में तर्पण, आश्च्योतन एवं नस्य के रूप में प्रयोग करने से हितकर होता है । वक्तव्य — तर्पण - विधि — रोगी को चित्त लेटाकर दो - चार बूँदें उसकी आँखों में डालकर कुछ देर दूध से आँखों को तृप्त होने दें । आश्च्योतन - विधि— आँखों या आँख में नारी के दूध की दो - चार बूँदें टपकाना, यह विधि अनेक बार की जाती है । वे दूध की बूँदें बहकर नीचे आ जाती हैं । नस्य - विधि — इसमें नारी के दूध को नथुनों में डालकर ऊपर की ओर को खींचा जाता है । इस नस्य से शिरोरोगों में शान्ति

मिलती है ।

—अहृद्यं तूष्णमाविकम् ॥ २६ ॥

वातव्याधिहरं हिध्माश्वासपित्तकफप्रदम् । भेड़ी के दूध का गुण - हृदय को अप्रिय या अहितकर, उष्ण, वातव्याधिनाशक, हिचकी, श्वास, पित्त एवं कफ को उभाड़ता है ॥ २६ ॥

वक्तव्य —— वातव्याधि में इसकी मालिश करने तथा इसे पीने से लाभ होता है । हस्तिन्याः स्थैर्यकृत्— हथिनी के दूध का गुण —यह शरीर की स्थिरता को पर्याप्त मात्रा में बढ़ाता है । वास्तव में इसका

यह गुण ' कारणानुरूपं कार्यम् ' को चरितार्थ करता है ।

—बाढमुष्णं त्वैकशफं लघु ॥ २७ ।

शाखावातहरं साम्ललवणं जडताकरम् । एकशफ दूध के गुण —– एक खुर वाले प्राणियों ( घोड़ी, गधी आदि ) का लघु ( हलका ) होता है । शाखाओं ( टाँगों, बाँहों, रक्त आदि धातुओं एवं त्वचा ) है । यह कुछ खट्टा एवं लवणरस युक्त होता है और जड़ता ( आलस्य एवं बुद्धिहीनता ) वक्तव्य — ऊपर २७ वें पद्य में श्रीहेमाद्रि ने ' बाढम् ' इस पद को हथिनी के है और दूसरे विद्वानों ने इसे एकशफ दुग्ध का विशेषण स्वीकार किया है । ' एकशफ ' दूध उष्ण ( गरम ) एवं के वातदोष का नाशक कारक होता है ॥ २७ ॥

दूध का विशेषण माना शब्द ' जातौ एकवचनम् ’ के अनुसार एक मान लेने पर यहाँ तक आठ प्राणियों के दूधों का वर्णन कर दिया है । एक शफ ( खुर )

वाले प्राणी अन्य अनेक होते हैं ।

पयोऽभिष्यन्दि गुर्वामं, युक्त्या शृतमतोऽन्यथा ॥ २८ ॥

आमशृत दुग्ध - गुण— कच्चा ( बिना गरम किया ) दूध अभिष्यन्दी एवं गुरु, पाक में भारी होता है । विधिवत् पकाया गया दूध इस ( कच्चे ) के विपरीत गुण वाला होता है ॥२८ ॥

भवेद्गरीयोऽतिभृतं, धारोष्णममृतोपमम् । धारोष्ण दूध के गुण- — अत्यन्त पकाया गया दूध अधिक गुरु हो जाता है और धारोष्ण दूध अमृत के समान गुणकारक होता है ।

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द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् ७१ वक्तव्य — मनुष्यों की सन्तानें गाय, भैंस आदि के बच्चे जो माता का स्तनपान करते हैं, उन्हें धारोष्ण दूध सुलभ होता है । नवजात किंवा क्षीराद शिशुओं के भाग्य में अब धारोष्ण दूध पीना नहीं लिखा है,

यह आज के युग की देन है ।

अम्लपाकरसं ग्राहि गुरूष्णं दधि वातजित् ॥ २ ९ ॥

मेदःशुक्रबलश्लेष्मपित्तरक्ताग्निशोफकृत् । रोचिष्णु शस्तमरुचौ शीतके विषमज्वरे ॥ ३० ॥

पीनसे मूत्रकृच्छ्रे च, रूक्षं तु ग्रहणीगदे । नैवाद्यान्निशि नैवोष्णं वसन्तोष्णशरत्सु न ॥३१ ॥

नामुद्गसूपं नाक्षौद्रं तन्नाघृतसितोपलम् । न चानामलकं नापि नित्यं नो मन्दमन्यथा ॥ ३२ ॥

ज्वरासृक्पित्तवीसर्पकुष्ठपाण्डुभ्रमप्रदम् दधिगुण - वर्णन — दही पाक एवं रस में अम्ल होता है । ग्राही ( मल को बाँधने वाला ), गुरु ( पचने में देर लगाने वाला ), उष्ण तथा वातनाशक होता है । मेदोधातु, शुक्र, कफ, पित्त, रक्त, अग्निवर्धक एवं शोथकारक होता है । भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाता है । इसका प्रयोग अरुचि में किया जाता है । जाड़ा लगकर आने वाले विषमज्वर में, पीनसरोग में एवं मूत्रकृच्छ्ररोग में इसका प्रयोग हितकर होता है । ग्रहणीरोग में रूक्ष ( मक्खन निकाला हुआ ) दही हितकर होता है । रात में दही का सेवन नहीं करना चाहिए, उष्ण ( आग में तपाया हुआ ) दही न खाये, वसन्त, ग्रीष्म तथा शरद् ऋतु में दही न खाये, मूँग की दाल तथा उसके बड़े के बिना दही न खाये, मधु, घी, मिश्री से रहित दही न खाये, आँवलों से रहित दही न खाये, प्रतिदिन दही न खाये और मन्दक ( जो भलीभाँति जमा न हो ) ऐसा दही भी नहीं खाना चाहिए । यदि इस प्रकार के निषिद्ध दही का सेवन किया गया तो ज्वर, रक्तपित्त, विसर्प, कुष्ठरोग, पाण्डुरोग, भ्रम ( चक्कर आना ) – ये विकार उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २ ९ -३२ ॥ वक्तव्य — आजकल मक्खन रहित दूध तथा दही भी मिलता है । पुराने क्रम से घी निकालने में देर लगती है । आज भी पञ्जाब प्रदेश में उत्तम दूध, दही, घी सुलभ हैं । यद्यपि दही को बहुत से लोग सदा खाते हैं, फिर भी इसके निषिद्ध विधि से निषिद्ध कालों में सेवन करने से ऊपर कहे गये ज्वर आदि रोगों

के होने की सम्भावना बनी रहती है ।

तक्रं लघु कषायाम्लं दीपनं कफवातजित् ॥ ३३ ॥

शोफोदरार्शोग्रहणीदोषमूत्रग्रहारुचीः । प्लीहगुल्मघृतव्यापद्गरपाण्ड्वामयान् जयेत् ॥ ३४ ॥

तक्र ( मट्ठा या छाछ ) – यह लघु, कषाय, अम्ल, जठराग्निदीपक तथा कफ- वातनाशक होता है । यह शोथरोग, उदररोग, अर्शोरोग, ग्रहणीरोग, मूत्राघात, अरुचि, प्लीहाविकार, गुल्म, घृत ( स्नेह ) - व्यापत्, गरविष तथा पाण्डुरोग को जीत लेता है ॥ ३३-३४ ॥ वक्तव्य — ' तक्र के भेदों के सम्बन्ध में सुश्रुत के विचार — ' तक्र'- - ' जिस दही में आधा जल मिलाकर मथने से स्नेह ( मक्खन ) अलग कर लिया जाता है, फिर जो पतला दही का भाग शेष रहता है, उसे ' तक्र ' कहते हैं । यह न तो अधिक गाढ़ा और न अधिक पतला होता है । यह तक्र मधुरविपाकी, रस में अम्ल एवं कषाय होता है ' । घोल — बिना पानी मिलाये जो दही मथा जाता है और जिसमें से स्नेह भाग भी अलग नहीं किया जाता, उसे घोल कहते हैं । तक्रकूर्चिका — यह संग्राही, वातकारक तथा रूक्ष होती है एवं कठिनायी से पचती है । ( दही के साथ दूध को पकाने से ' दधिकूर्चिका ' और तक्र के साथ दूध को पकाने से ' तक्रकूर्चिका ’ बनती है । तक्र तथा दही के गाढ़े भाग को भी ' कूर्चिका ' या ' पनीर ' कहते हैं । दूध के गाढ़े भाग

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७२ अष्टाङ्गहृदये को भी ' कूर्चिका ' कहते हैं, लोकव्यवहार में जिसे ' खोया ' या ' मावा ' कहते हैं । दूध को फाड़कर जो घन भाग बच जाता है, उसे ' किलाट ' या ' छेना ' कहते हैं । ) मण्ड — यह तक्र से भी पाचन में लघु होता है, इसे ' मस्तु ' भी कहते हैं । छाछ का पानी भी कहते हैं । तक्रप्रयोग - निषेध-- घाव लग जाने पर, उष्णकाल भ्रम, दाह तथा रक्तपित्त रोग में तक्र का प्रयोग न करें । तक्रप्रयोग काल— शीतकाल में, अग्निमान्द्यरोग में, पर तथा वात के दूषित होने पर तक्र का सेवन करना उत्तम तक्र के गुण - मधुर रस वाला तक्र कफप्रकोपक तक्र वातनाशक तथा पित्तकारक होता है । ( ग्रीष्म तथा शरद् ऋतु ) कफजनित विकारों में, होता है । तथा पित्तशामक होता इसे दही का पानी या में, दुर्बलता में, मूर्च्छा, स्रोतों में रुकावट आने है और अम्लरस - प्रधान तक्रप्रयोग - विधि — वातदोष में अम्ल तक्र में नमक मिलाकर, पित्तदोष में मधुर तक्र में चीनी मिलाकर तथा कफदोष में तक्र में सोंठ, मरिच, पीपल के साथ कोई एक क्षार मिलाकर पीना चाहिए । इन प्रसंगों को देखें — सु.सू. ४५ के. तक्रवर्ग में । तक्र की प्रशंसा – संस्कृत के सुभाषित - साहित्य में विद्वानों ने तक्र की भूरि - भूरि प्रशंसा की है । यथा — ' तक्रं शक्रस्य दुर्लभम् । कविराज लोलिम्बराज ने इसका वर्णन आलंकारिक भाषा में किया है । देखें — वैद्यावतंस, निघण्टु । तक्र के वास्तविक गुणों का परिचायक एक पद्य इस प्रकार है— ' न तक्रसेवी व्यथते कदाचित् न तक्रदग्धाः प्रभवन्ति रोगाः । यथा सुराणाममृतं सुखाय तथा नराणां भुवि तक्रमस्ति ' । तद्वन्मस्तु सरं स्रोतः शोधि विष्टम्भजिल्लघु । मस्तु का वर्णन —मस्तु ( दही का पानी ) भी तक्र के समान गुण वाला होता है । विशेषकर यह सर, स्रोतों का शोधक, विष्टम्भ ( कब्जियत ) को दूर करता है तथा पाचन में लघु होता है । वक्तव्य- - जब तक्र का गाढ़ा भाग नीचे बैठ जाता है और उसके ऊपर जो जलीय भाग तैरता

है, वह ' तक्रमस्तु ' है ।

नवनीतं नवं वृष्यं शीतं वर्णबलाग्निकृत् ॥ ३५ ॥

सङ्ग्राहि वातपित्तासृक्क्षयार्शोर्दितकासजित् । नवनीत - वर्णन – नवनीत ( ताजा निकाला गया ) मक्खन वृष्य ( वीर्यवर्धक ), शीतल, कान्तिकारक, बलवर्धक, अग्नि को तीव्र करने वाला और संग्राही ( मल को बाँधने वाला ) होता है । वातविकार, पित्तविकार, रक्तविकार, क्षयरोग, अर्शोरोग ( रक्तार्श ), अर्दित ( मुखप्रदेश का लकवा ) तथा कासरोग का विनाश करता है ॥ ३५ ॥

क्षीरोद्भवं तु सङ्ग्राहि रक्तपित्ताक्षिरोगजित् ॥ ३६ ॥

दूध का नवनीत — दूध से निकाला गया नवनीत विशेषकर संग्राही होता है । यह रक्तरोग, पित्तरोग तथा नेत्ररोगों का विनाश करता है ॥ ३६ ॥

वक्तव्य — दूध को मथकर जो स्नेहद्रव्य प्राप्त किया जाता है, उसे ' नवनीत ' कहा जाता है । आज के दूध को गरम करके दही जमाकर, कल को उसे मथकर जो स्नेहद्रव्य प्राप्त किया जाता है, उसे ' हैयंगवीन ' कहते हैं । यह भी ' नवनीत ' का ही एक प्रकार - भेद है । दोनों में ही दूध या दही का कुछ भाग लगा रहता है । पकाने पर घी का भाग ऊपर आ जाता है और दूध या दही का भाग नीचे रहकर जल जाता है ।

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द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् ७३ शस्तं धीस्मृतिमेधाग्निबलायुः शुक्रचक्षुषाम् । बालवृद्धप्रजाकान्तिसौकुमार्यस्वरार्थिनाम् ॥ ३७ । क्षतक्षीणपरीसर्पशस्त्राग्निग्लपितात्मनाम् । वातपित्तविषोन्मादशोषालक्ष्मीज्वरापहम् ॥ ३८ ॥

स्नेहानामुत्तमं शीतं वयसः स्थापनं परम् । सहस्रवीर्यं विधिभिर्धृतं कर्मसहस्रकृत् ॥ ३ ९ ॥ घृत के गुण – बुद्धि, स्मृति ( स्मरणशक्ति ), मेधा ( धारणाशक्ति वाली बुद्धि ), जठराग्नि, शारीरिक बल, दीर्घायु ( आयुर्वै घृतम् ), शुक्र तथा दृष्टि के लिए उत्तम है; बालकों तथा वृद्धों के लिए श्रेष्ठ है । प्रजा ( सन्तान ), कान्ति, सुकुमारता तथा सुरीला या तेज स्वर चाहने वालों के लिए उत्तम है । क्षत, क्षीण ( क्षयपीड़ित ), विसर्परोगी, शस्त्रहत, अग्निदाह से पीड़ित रोगियों के लिए हितकर है । वातविकार, पित्तविकार, विषविकार, उन्माद, शोष ( राजयक्ष्मा ), अलक्ष्मी ( निर्धनता या कुरूपता ) तथा ज्वर का नाश करता है । यह समस्त स्नेहद्रव्यों में श्रेष्ठ है, शीतवीर्य है, यौवन को स्थिर रखने वाले द्रव्यों में भी सर्वश्रेष्ठ है । शास्त्रोक्त विधियों से पकाकर रखा गया घी हजारों शक्तियों से पूर्ण होता है, अतएव युक्तियुक्त इसका प्रयोग करने पर यह हजारों चिकित्सोपयोगी कर्मों को करता है ॥ ३७-३९ ॥ मदापस्मारमूर्च्छायशिरःकर्णाक्षियोनिजान् । पुराणं जयति व्याधीन् व्रणशोधनरोपणम् ॥ ४० ॥

पुराने घी के प्रयोग — मदपानजनित मदात्यय आदि विकारों में, अपस्मार, मूर्च्छा, सिर, कान तथा योनि ( गर्भाशय, भग ) के रोगों का विनाश करता है । यह व्रणों का शोधन एवं रोपण करता है ॥ ४० ॥

वक्तव्य — पुराने घी का व्यावहारिक परिचय सु.सू. ४५।१०७-१०९ से प्राप्त होगा । शास्त्रकारों ने काल की अवधि के अनुसार इसके नामभेद किये हैं । यथा — १. पुराणघृत, २. कुम्भसर्पि तथा ३. महाघृत । इनका प्रयोग उक्त सुश्रुत - सन्दर्भ के अनुसार करें । इसके भी कुछ अवान्तर भेद किये गये हैं । यथा— १ वर्ष पुराना, १० वर्ष पुराना, १५ वर्ष से अधिक पुराना अथवा १०० वर्ष या १११ वर्ष पुराना घृत ' पुराणघृत ' या ‘ कुम्भसर्पि ' कहा जाता है । इससे भी अधिक पुराने घी को ' महाघृत ' कहा जाता है । यह घी केवल औषधोपयोगी रह जाता है । घी जितना पुराना होगा उसका वर्ण मोमियाँ हो जाता है । तब इसमें विशेष प्रकार की गन्ध आने लगती है । इस घी का प्रयोग — सन्निपातज्वर में सिर के ऊपर ब्रह्मरन्ध्र के स्थान पर रखते हैं । श्वासरोग में इसे छाती, पसलियों तथा गले में लगाते ( मलते ) हैं । इसका संग्रह पहले श्रीमानों के घरों में, प्राचीन परम्परा के वैद्यों तथा हकीमों के चिकित्सालयों में होता था । यह चिकित्सा के क्षेत्र

में महत्त्वपूर्ण माना जाता था ।

बल्याः किलाटपीयूषकूर्चिकामोरणादयः । शुक्रनिद्राकफकरा विष्टम्भिगुरुदोषलाः ॥ ४१ ॥

किलाट आदि का वर्णन - दूध से बनाये गये किलाट, पीयूष, कूर्चिका, मोरण या मोरट आदि शब्द से क्षीरशाक एवं तक्रपिण्ड का ग्रहण किया जाता है । ये सब बल, शुक्र, निद्रा तथा कफदोष को बढ़ाते हैं । ये विष्टम्भी, गुरु तथा दोषकारक होते हैं ॥ ४१ ॥

वक्तव्य — किलाट आदि का परिचय – इनके सम्बन्ध में हम इसी अध्याय में ३३ - ३४ श्लोकों के नीचे कह चुके हैं । मोरण या मोरट — पकते हुए दूध को नीबू के रस या फिटकिरी डालकर फाड़ लिया जाता है । जलीय भाग को मोरण या मोरट जेज्जट ने सुश्रुत के ४५ वें अध्याय में यथास्थान कहा है । उसके सारभाग को छेना कहते हैं । पीयूष — अन्यत्र इसका अर्थ ' अमृत ' है । नवप्रसूता गाय या भैंस के एक सप्ताह तक के दूध को पकाया जाता है, पकाते ही वह फटकर गाढ़ा हो जाता है, इसे पीयूष कहा जाता है । यह अत्यन्त गरिष्ठ होता है । ५-७ दिन के बाद यह दूध शुद्ध हो जाता है । गव्ये क्षीरघृते श्रेष्ठे निन्दिते चाविसम्भवे । इति क्षीरवर्गः । उत्तम - अधम विचार — इस प्रकरण में कहे गये दूध तथा घी में गाय का दूध और गाय का ही बी उत्तम होता है और भेड़ का दूध एवं घी निन्दित होता है ।

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७४ अष्टाङ्गहृदये वक्तव्य — ‘ नानौषधिभूतं जगति किञ्चिद् विद्यते ' । चरक के इस वचन के अनुसार सभी पदार्थ चिकित्सोपयोगी हैं, अतएव उन सबका अपने - अपने स्थान पर महत्त्व होता ही है । यहाँ तो गाय और भेड़ के दूध, दही, घी की परस्पर तुलना की चर्चा मात्र है । अथेक्षुवर्गः इक्षो रसो गुरुः स्निग्धो बृंहणः कफमूत्रकृत् ॥ ४२ ॥

वृष्यः शीतोऽस्रपित्तघ्नः: स्वादुपाकरसः सरः । ईख के रस का वर्णन — ईख का रस सामान्य रूप से गुरु, स्निग्ध, बृंहण ( पुष्टिकारक ), कफ तथा मूत्र को बढ़ाने वाला होता है । यह वृष्य ( वीर्यवर्धक ), शीतल, रक्तपित्तनाशक, रस एवं पाक में मधुर तथा सर ( मलभेदक ) होता है ॥ ४२ ॥

वक्तव्य — शास्त्रान्तरों में ईख के भेद – आज चल रही विकास की आँधी में इनकी कुछ ही जातियों के नाम सुनायी देते हैं, हो सकता है कि आगे ये बचे - खुचे नाम भी उड़ जायेंगे; तथापि इनका उल्लेख यहाँ कर दिया जा रहा है: १. पौंड्रक ( पौंडा ), २. भीरुक, ३. वंशक, ४. शतपोरक ( सौ गाँठों वाला ), ५. कान्तार, ६. तापसेक्षु ( जंगलों में होने वाली ईख ), ७. काण्डेक्षु, ८. सूचिपत्रक ( जिसके पत्ते सुई की भाँति चुभते हों या नाम - विशेष ), ९. नैपाल ( नेपाल देश में होने वाला ), १०. दीर्घपत्र ( नाम - विशेष, वैसे तो सभी ईखों के पत्ते लम्बे होते हैं ), ११. नीलपोर ( जिसकी गाँठों में नीली आभा हो ), १२. कोशकृत् तथा १३. मनोगुप्ता — ये तेरह जातियाँ ईख की कही गयी हैं, इसी को ' ऊख ' भी कहा जाता है । अंग्रेजी में इसे ' सुगर केन ' कहते हैं । संस्कृत में इसका एक नाम ' गुडमूल ' है अर्थात् ईख सभी प्रकार की मिठाइयों की जड़ है । आगे चलकर बाल, तरुण, वृद्ध भेद से भी इसके गुणों का वर्णन किया गया है । ईख के रस से निर्मित पदार्थ - १. फाणित ( राब ), २. मत्स्यण्डी ( मछली के अण्डों के सदृश ) या खण्डराब, ३. गुड़, ४. खण्ड ( खाँड ), ५. शर्करा ( चीनी ), ६. पुष्पसिता या सितोपला ( फूलमिश्री ) ।

इनके गुण चरक, सुश्रुत आदि में देखें ।

सोऽग्रे सलवणो, दन्तपीडितः शर्करासमः ॥ ४३ ॥

अगले भाग का रस — ईख के प्रारम्भिक एक - दो पोरों का रस कुछ नमकीन जैसा होता है । मध्य भाग का दाँतों से चूसा हुआ रस चीनी के समान मधुर एवं गुणकारक होता है ॥ ४३ ॥

मूलाग्रजन्तुजग्धादिपीडनान्मलसङ्करात् । किञ्चित्कालं विधृत्या च विकृतिं याति यान्त्रिकः ॥ विदाही गुरुविष्टम्भी तेनासौ— यान्त्रिक रस के भेद – यन्त्र - विशेष में दबाकर निकाला हुआ ईख का रस— -जड़ का भाग, अगला भाग तथा कीड़े आदि द्वारा खाया गया भाग सब एक साथ निचोड़ा जाता है । उसमें मैल का भी मिश्रण हो जाता है और वह कुछ समय तक उसी प्रकार पड़ा रह जाता है, तो वह रस विकृत ( विकारयुक्त ) हो जाता है । अतः वह विदाहक, गुरुपाकी तथा विष्टम्भी हो जाता है ॥४४ ॥

—तत्र पौण्ड्रकः । शैत्यप्रसादमाधुर्यैर्वरस्तमनु वांशिकः ॥ ४५ ॥

ईख के भेद तथा गुण — ईख की अनेक जातियाँ होती हैं, उनमें पौण्ड्रक नामक ईख जो देखने में मोटी, चबाने में कोमल होती है, उसका रस शीतल, स्वच्छ एवं मधुर होने के कारण सबमें श्रेष्ठ होता है । इससे गुणों में कुछ कम ' वाशिक ' नामक ईख होती है ॥४५ ॥

वक्तव्य- -श्रीहेमाद्रि ने ' वांशिक ' नामक ईख का पर्याय ' नीलेक्षु ' दिया है । यह पौण्ड्रक जैसी मोटी तो होती है, किन्तु उससे कठोर होती है । शतपर्वककान्तारनैपालाद्यास्ततः क्रमात् । सक्षाराः सकषायाश्च सोष्णाः किञ्चिद्विदाहिनः ॥