श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 111–120
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 111–120
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द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्याय: ५ ] सूत्रस्थानम् ७५ शतपर्वक आदि ईखों के गुण — शतपर्वक ईख ( अनेक पोरों वाला ) कान्तार, नैपाल, आदि शब्द से दीर्घपत्र आदि भेदों को समझना चाहिए । उक्त ईखों के रस वांशिक नामक ईख के रस से उत्तरोत्तर हीन गुण वाले होते हैं । यथा— क्रमश: कुछ खारे, कुछ कसैले, कुछ उष्ण और कुछ विदाहकारक होते हैं ॥। ४६ ॥ वक्तव्य — आज जहाँ ईख की प्राचीन जातियों का ह्रास हो रहा है, वहीं कृषि सम्बन्धी वैज्ञानिक अनुसन्धानों द्वारा नयी - नयी ईख की जातियों का आविष्कार भी हो रहा है । आज के नये उर्वरकों द्वारा उनकी उपज में बढ़ोत्तरी देखी जाती है, किन्तु स्वाद- गुण में प्राचीन जातियों की तुलना में ये कहीं स्थिर नहीं हैं, ऐसा बुद्धिजीवियों का मानना है । ये सब युगानुरूप कार्य हैं । फाणितं गुर्वभिष्यन्दि चयकृन्मूत्रशोधनम् । फाणित के गुण – फाणित गुरु, अभिष्यन्दी, दोषों का संचय करने वाला
करने वाला होता है अर्थात् इसका सेवन करने से मूत्र खुलकर निकल आता है ।
नातिश्लेष्मकरो धौतः सृष्टमूत्रशकृद्गुडः ॥ ४७ ॥
प्रभूतकृमिमज्जासृङ्मेदोमांसकफोऽपरः I गुड़ के गुण – १. ईख के रस को स्वच्छ करके बनाया गया प्रथम श्रेणी का किन्तु मूत्र का शोधन गुड़ अधिक कफकारक नहीं होता तथा यह मूत्र एवं पुरीष का प्रवर्तक होता है । २. ईख के रस को पकाते समय उसकी मैल को निकाले बिना जो गुड़ बनाया जाता है, वह उक्त प्रथम गुड़ से दूसरी श्रेणी का होता है । उसके गुण — इसके सेवन से पेट में पर्याप्त क्रिमियों की उत्पत्ति होती है, यह मज्जा, मेदस्, मांस तथा कफदोष को बढ़ाता है ॥ ४७ ॥
हृद्यः पुराणः पथ्यश्च, नवः श्लेष्माग्निसादकृत् ॥ ४८ ॥
पुराने - नये गुड़ के गुण — पुराना गुड़ हृदय के लिए हितकारक तथा पथ्य होता है और नया गुड़ कफदोष को बढ़ाने वाला एवं जठराग्नि को मन्द कर देता है ॥ ४८ ॥
वृष्याः क्षीणक्षतहिता रक्तपित्तानिलापहाः । मत्स्यण्डिकाखण्डसिताः क्रमेण गुणवत्तमाः ॥ ४ ९ ॥ मत्स्यण्डिका आदि के गुण — मत्स्यण्डिका ( राब ), खण्ड ( खाँड़ ) तथा सिता या सितोपला ( मिश्री ) ये उत्तरोत्तर गुणवान् होते हैं अर्थात् मत्स्यण्डिका से खण्ड, इससे सिता अधिक गुणवाली होती है । इनके गुण – ये सभी वृष्य, क्षत ( उरःक्षत ) तथा क्षीण पुरुषों के लिए हितकर होते हैं और रक्तपित्त एवं वातदोष नाशक हैं ॥ ४ ९ ॥ वक्तव्य — ईख के रस को भलीभाँति पकाते - पकाते जब वह पत्थर की भाँति कड़ा हो जाता है, तो उसे ' गुड़ ' कहते हैं, किन्तु उसी गुड़ को गौड़ ( बंगाल का पुराना नाम ) देशवासी मत्स्यण्डी कहते हैं । यथा- ' - ' इक्षो रसो यः सम्पक्वो जायते लोष्ठवद् घनः । स गुडो, गौडदेशे तु मत्स्यण्ड्यैव गुडो मतः ' ॥ तद्गुणा तिक्तमधुरा कषाया यासशर्करा । यासशर्करा या यवासशर्करा — इसे ' जवासा ' की खाँड या चीनी कहते हैं ।
के समान गुणों वाली होती है । यह कुछ तिक्त, मधुर तथा कषाय रस वाली होती है ।
दाहतृट्छर्दिमूर्च्छासृपित्तघ्न्यः सर्वशर्कराः ॥ ५० ॥
सभी प्रकार की शर्कराओं के गुण — दाह ( जलन ), प्यास, वमन, मूर्च्छा ( का शमन करती हैं, अत: इन्हें उत्तम कहा गया है ॥ ५० ॥
वक्तव्य — ईख के अतिरिक्त अन्य पदार्थों से भी शर्करा का निर्माण किया यह भी ईख की चीनी बेहोशी ) तथा रक्तपित्त जाता है । जैसे—– ताड़ का गुड़, ताड़ की चीनी, खजूर की चीनी, दाख ( मुनक्का ) की चीनी तथा अन्य मधुर फलरसों से बनायी गयी चीनी, मधुर्शकरा आदि ।
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७६ अष्टाङ्गहृदये मधुशर्करा - जैसे राब में खाँड का अंश नीचे बैठ जाता है वैसे ही किसी - किसी मधु में मधुशर्करा का अंश नीचे इकट्ठा हो जाता है । उसमें चीनी के सदृश कण दिखलायी देते हैं । यह स्थिति मधु में दो या तीन मास के बाद देखी जाती है और मधु का तरल भाग ऊपर तैरता रहता है, यह भी शर्कराभेद ही है । यही कारण है कि प्राचीन संहिताकारों ने मधुशर्करा के गुण - धर्मों का वर्णन किया है । देखें— सु.सू. ४५।१६६ । कुछ पर्वतीय प्रदेशों में मधु को जमा देने के लिए शुद्ध घी का जामन डाल देते हैं । इससे मधु जम जाता है, उसे बर्फी की भाँति काटकर मेहमानों ( महामान्यों ) का स्वागत किया जाता है । शर्करेक्षुविकाराणां फाणितं च वरावरे । इतीक्षुवर्गः । शर्करा की उत्तमता — ईख के रस से बनने वाले सभी पदार्थों में शर्करा तथा मिश्री सर्वश्रेष्ठ होती है । फाणित ( राब ) अधम होती है । वक्तव्य - ' यासशर्करा ' — जवासा नामक पौधा से जो गोंद निकलती है, उसी को यासशर्करा अथवा यवासशर्करा कहते हैं । देखें — सु. सू. ४५।१६७ । यह औषध व्यवसाइयों की दूकान में माना या मना नाम से मिलती है । यह राजाओं एवं श्रीमानों के योग्य विरेचन है, यूनानी वैद्यक में प्रसिद्ध तुरञ्जवीन भी यही है । इसे चासनी बनाकर बर्फी की भाँति जमा लिया जाता है, एक टुकड़ा बर्फी पानी के साथ लें, मुँह भी मीठा और पेट भी साफ । अथ मधुवर्गः चक्षुष्यं छेदि तृट्श्लेष्मविषहिध्माम्रपित्तनुत् ॥ ५१ ॥
मेहकुष्ठकृमिच्छर्दिश्वासकासातिसारजित् । व्रणशोधनसन्धानरोपणं वातलं मधु ॥ ५२ ॥
रूक्षं कषायमधुरं, तत्तुल्या मधुशर्करा । मधु का वर्णन - मधु ( शहद ) नेत्रों के लिए हितकारक होता है, यह लेखन होने के कारण कफ को निकाल देता है; प्यास, कफदोष, विषविकार, हिक्का ( हिचकी ), रक्तपित्त, प्रमेह, कुष्ठ, क्रिमि, छर्दि, श्वास, कास तथा अतिसार रोग को नष्ट करता है । यह व्रणशोधक, व्रणसन्धान तथा व्रणरोपण करता है । यह वातदोषकारक है, रूक्ष, कषाय एवं मधुर गुणवाला है । इसी के समान गुणों वाली ' मधुशर्करा ' भी होती है ॥ ५१-५२ ॥ वक्तव्य — सुश्रुत के अनुसार मधु आठ प्रकार का होता है— १. पौत्तिक, २. भ्रामर, ३. क्षौद्र, ४. माक्षिक, ५. छात्र, ६. आर्घ्य, ७. औद्दालक तथा ८. दाल । हमने मधुशर्करा का वर्णन ऊपर श्लोक ५० के वक्तव्य
में कर दिया है, क्योंकि उक्त श्लोक का विषय था ' सर्वशर्करा ' वर्णन ।
उष्णमुष्णार्तमुष्णे च युक्तं चोष्णैर्निहन्ति तत् ॥५३ ॥
उष्णमधुसेवन का निषेध - उष्ण मधु का सेवन उष्ण ( धूप, घाम या अग्नि ) से सन्तप्त मानव को उष्णकाल ( गर्मी के दिनों ) में उष्ण जल आदि के साथ खाने - पीने या चाटने के लिए नहीं देना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से हानि होती है ॥ ५३ ॥
प्रच्छर्दने निरूहे च मधूष्णं न निवार्यते । अलब्धपाकमाश्वेव तयोर्यस्मान्निवर्तते ॥ ५४ ॥
इति मधुवर्गः । संशोधन में मधु - प्रयोग — वमन के लिए तथा निरूहणबस्ति में प्रयुक्त उष्ण मधु अथवा द्रव पदार्थ के साथ मिला हुआ मधु हानिकारक नहीं होता, क्योंकि वमन, निरूहण में प्रयुक्त उष्ण मधु शरीर में बिना पचे ही शीघ्र बाहर लौट ( निकल ) जाता है ॥ ५४ ॥
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द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् ७७ अथ तैलवर्गः तैलं स्वयोनिवत्तत्र मुख्यं तीक्ष्णं व्यवायि च । त्वग्दोषकृदचक्षुष्यं सूक्ष्मोष्णं कफकृन्न च ॥ ५५ ॥
कृशानां बृंहणायालं स्थूलानां कर्शनाय च । बद्धविट्कं कृमिघ्नं च संस्कारात्सर्वरोगजित् ॥ ५६ ॥
सामान्य तैल का वर्णन —— सभी तेल अपने - अपने उत्पत्तिकारणों के समान गुण - धर्म वाले होते हैं । सब तेलों में ‘ तिलतैल ' मुख्य होता है, क्योंकि तैल शब्द की निष्पत्ति ही तिल शब्द से होती है । यथा “ तिलोद्भवं तैलम् ’ । तिलतैल- - तीक्ष्ण ( मन्द से विपरीत ), व्यवायी ( शीघ्र फैलने वाला ), त्वग्दोषनाशक ( दोषं कृन्ततीति दोषकृत् ), नेत्रों के लिए हानिकारक, सूक्ष्म तथा उष्ण होता है । यह स्निग्ध होने पर भी कफकारक नहीं होता, कृश पुरुषों को पुष्ट करने में समर्थ है, अतएव वह बृंहण - कार्य भी करता है । स्थूलों को कृश करता है, पुरीष को बाँधता है, कृमिनाशक है और संस्कार करने से वात आदि दोषों को नष्ट करता है ॥ ५५-५६ ॥ वक्तव्य- - ' कृशानां बृंहणायाऽलम्'- -यह तिलतैल जो दुबले हैं, उन्हें पुष्ट करने में समर्थ है और ' स्थूलानां कर्शनाय च ’ — स्थूल पुरुषों को कृश भी करता है । ये गुण इसके परस्पर विरुद्ध हैं? इसका समाधान — यह तेल कृश पुरुष के संकुचित हुए स्रोतों में जाकर व्यवायि गुण के कारण उनमें प्रवेश कर उन स्रोतों को रस आदि धातुओं को वहन करने की शक्ति देकर उनका बृंहण करता है और यह वातदोष तथा कफदोष का क्षय करके स्थूल पुरुषों को कृश करता है । यथा — ' तैलं वातश्लेष्मप्रशमनानाम् ' । ( च.सू. २५।४० ) सतिक्तोषणमैरण्डं तैलं स्वादु सरं गुरु । वर्ष्मगुल्मानिलकफानुदरं विषमज्वरम् ॥ ५७ ॥
रुक्शोफौ च कटीगुह्यकोष्ठपृष्ठाश्रयौ जयेत् । तीक्ष्णोष्णं पिच्छिलं विम्र, रक्तैरण्डोद्भवं त्वति ॥ एरण्डतेल के गुण — यह कुछ तिक्त एवं कुछ कटु तथा मधुर रस वाला, विरेचक और पचने में भारी होता है । यह अण्डवृद्धि, गुल्मरोग, वातरोग, कफरोग, उदररोग एवं विषमज्वर का विनाश करता है । कमर, गुह्यप्रदेश, समस्त कोष्ठ के अवयवों, पीठ की पीड़ा तथा सूजन को जीत लेता है । लाल एरण्ड का तेल – यह तीक्ष्ण, उष्ण, पिच्छिल एवं अप्रिय गन्ध वाला होता है ॥ ५७-५८ ॥ वक्तव्य — कटिशूल में इसकी शीघ्र गुणकारिता को देखकर कहा गया है— ' आमवातगजेन्द्रस्य कटीविपिनचारिणः । एक एव निहन्ताऽसौ एरण्डस्तैलकेशरी ' ॥ अर्थात् आमवातरोग रूपी कमररूपी वन में घूमने वाले हाथी को मारने वाला यह एरण्डतेल रूपी सिंह अकेला काफी है और इसका प्रयोग विरेचन के लिए किया जाता है । इसका प्रयोग करने के लिए ऋतु एवं देश - काल का विचार कर लेना चाहिए । पूर्ण अवस्था वालों को २ या ४ तोले की मात्रा में इसे दूध में मिलाकर देना चाहिए । बच्चों की नाभि के चारों ओर इसे गुनगुना कर मालिश कर देने से भी वही लाभ होता है । कटूष्णं सार्षपं तीक्ष्णं कफशुक्रानिलापहम् । लघु पित्तास्रकृत् कोठकुष्ठार्शोव्रणजन्तुजित् ॥ ५ ९ ॥ सरसों का तेल — सरसों का तेल कटु, उष्ण, तीक्ष्ण होता है । यह कफ, शुक्र तथा वात दोषनाशक है, लघु है, पित्त एवं रक्तवर्धक है, कोठ ( जुलपित्ती या पित्त उभड़ना ), कुष्ठरोग, अर्शोरोग, व्रण तथा क्रिमियों को नष्ट करता है ॥५ ९ ॥ वक्तव्य — सरसों वर्ण से दो प्रकार की होती है— १. लाल तथा २. पीली । इनमें लाल सामान्य है । इसका तेल निकाला जाता है । पीली सरसों पूजा - पाठ आदि शुभकृत्यों में सर्वत्र प्रयोग में लायी जाती है । पीली सरसों का प्रयोग कृत्या ( मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन ) आदि में भी होता है । पुनः यह दो प्रकार की होती है— १. मीठी तथा २. कड़वी । मीठी सरसों का शाक पर्वतीय क्षेत्रों तथा पञ्जाब आदि में बड़े चाव से खाया जाता है । कड़वी सरसों को राई या लाई भी कहा जाता है । अलमोड़ा, नैनीताल आदि क्षेत्रों में इसे बादशाहलाई भी कहते हैं । इसके पत्ते दो- -चार इंच चौड़े होते हैं, इनका शाक भी अत्यन्त रुचिकर होता है । इसका तेल झालदार होता है, नासिका तथा त्वचा पर लगाने से चुनचुनाता है । साहित्य-दर्पणकार ने ‘ तरुणं सर्षपशाक ' को ग्रामीणों का भोजन कहा है । यह नागरिकों को मिलता भी कहाँ है?
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७८ अष्टाङ्गहृदये आक्षं स्वादु हिमं केश्यं गुरु पित्तानिलापहम् । बहेड़े की गिरी का तेल – बहेड़ा का तेल स्वादु ( मधुर ), शीतल, बालों के लिए हितकर, पचने
में भारी, पित्त तथा वात विकारों का शमन करता है ।
नात्युष्णं निम्बजं तिक्तं कृमिकुष्ठकफप्रणुत् ॥ ६० ॥
नीम की गिरी का तेल — निबौलियों से निकाला गया तेल अधिक उष्णवीर्य वाला नहीं होता, स्वाद में तिक्त होता है । यह क्रिमियों, कुष्ठरोगों तथा कफज रोगों का नाश करता है ॥ ६० ॥
उमाकुसुम्भजं चोष्णं त्वग्दोषकफपित्तकृत् । अतसी एवं कुसुम्भ तेल — अतसी ( अलसी या तीसी ) तथा कुसुम्भ ( बर्रे ) के तेल उष्णवीर्य होते हैं; त्वचा के विकारों, कफदोष तथा पित्तदोष को बढ़ाते हैं । वक्तव्य — स्थावर तेलों की संख्या अनन्त हो सकती है । फिर भी कुछ तैल ऐसे हैं जो मिलते हैं, जिनकी आवश्यकता पड़ती रहती है; उनका परिगणन मात्र हम यहाँ कर रहे हैं— १. मूलक ( मूली के बीजों का ) तेल, २. दन्ती ( जमालगोटा ) का तेल, ३. इंगुदी ( हिंगोट ) के बीजों का तेल, ४. सरसों का तेल, ५. राई का तेल, ६. करञ्ज ( डिठौरी ) का तेल, ७. नीम का तेल, ८. सहजन के बीजों का तेल, ९. सुवर्चला ( हुलहुल ) के बीजों का तेल, १०. पीलु के बीजों का तेल, ११. नीप ( कदम्ब ) के बीजों का तेल, १२. शंखिनी वृक्ष के बीजों का तेल ( च.क. ११1१० में देखें ), १३. तुवरक ( चालमोगरा ) का तेल ( देखें — सु. चि. १३/२० - २६ ), १४. आरुष्कर ( भिलावा ) का तेल, १५. बिभीतक ( बहेड़ा की गिरी ) का तेल, १६. अतिमुक्तक ( माधवीलता के बीजों ) का तेल, १७. अक्षोट ( अखरोट की गिरी ) का तेल, १८. नारिकेल की गिरी का तेल, १ ९. मधूकबीजों का तेल, २०. त्रपुष ( खीरा ) के बीजों का तेल, २१. कूष्माण्ड - बीजतेल, २२. श्लेष्मातक ( लिसोड़ा ) के बीजों का तेल, २३. राजादन ( चिरौंजी ) का तेल, २४. अगुरुसारतेल, २५. सरल ( चीड़ ) सार का तेल ( गन्धाविरोजा ), २६. देवदारुसार ( तारपीन ) का तेल, २७. शिंशिपा ( सार ) का तेल, २८. श्रीपर्णी ( गम्भारी ) के बीजों का तेल, २ ९. किंशुक ( पलाश ) के
बीजों का तेल, ३०. खर्जूजा के बीजों का तेल, ३१. बादाम का तेल तथा अन्य अनेक तेल ।
वसा मज्जा च वातघ्नौ बलपित्तकफप्रदौ ॥ ६१ ॥
मांसानुगस्वरूपौ च, विद्यान्मेदोऽपि ताविव । इति तैलवर्गः । प्राणिज स्नेह - स्थावर - स्नेहों का वर्णन करने के बाद अब यहाँ से जंगम - स्नेहों का वर्णन किया जा रहा है । वसा तथा मज्जा नामक स्नेहों की प्राप्ति प्राणियों से की जाती है । ये दोनों स्नेह वातनाशक, बल, पित्त, कफ को बढ़ाते हैं । ये मांस के समान गुण वाले हैं । मेदोधातु के गुण भी वसा- मज्जा के समान होते हैं ॥ ६१ ॥
वक्तव्य — दिनचर्या - प्रकरण में उद्वर्तन का महत्त्व निर्दिष्ट है, उसी से सम्बन्धित विषय यहाँ भी दिया गया है — ‘ तैलप्रयोगादजरा निर्विकारा जितश्रमाः । आसन्नतिबला युद्धे दैत्याधिपतयः पुरा ' ॥ ( अ.सं.सू. ६।१०१ ) स्थावर - जंगम स्नेहों के सम्बन्ध में विशेष देखें —च.सू. १३; सु.सू. ४५ तथा सु.चि. ३१ । अथ मद्यवर्गः दीपनं रोचनं मद्यं तीक्ष्णोष्णं तुष्टिपुष्टिदम् ॥ ६२ ॥
सस्वादुतिक्तकटुकमम्लपाकरसं सरम् । सकषायं स्वरारोग्यप्रतिभावर्णकृल्लघु ॥ ६३ ॥
नष्टनिद्राऽतिनिद्रेभ्यो हितं पित्ताम्रदूषणम् । कृशस्थूलहितं रूक्षं सूक्ष्मं स्रोतोविशोधनम् ॥ ६४ ॥
वातश्लेष्महरं युक्त्या पीतं विषवदन्यथा ।
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द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् ७ ९ मद्य का वर्णन — विधिपूर्वक सेवन करने पर प्रायः सभी प्रकार के मद्य जठराग्नि को प्रदीप्त करते ( बढ़ाते ) हैं, रोचन ( भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाने वाले ) हैं, ये तीक्ष्ण एवं उष्ण होते हैं । मात्रानुकूल सेवन करने से तुष्टि ( सन्तोष ) तथा शारीरिक पुष्टि को देते हैं । सामान्य मद्य कुछ मधुर, तिक्त, कटु रस वाला होता है । इसका अम्लपाक होता है, सर ( मल को निकालने वाला ) है, कुछ कषाय रसयुक्त भी होता है । यह स्वर, आरोग्य, प्रतिभा तथा मुखमण्डल की कान्ति को बढ़ाता है, लघु है । जिन्हें निद्रा न आती हो और जो अतिनिद्रा से पीड़ित हों उनके लिए हितकर होता है । यह पित्त तथा रक्त को दूषित कर देता है, कृश को पुष्ट करता है और स्थूल को कृश कर देता है, रूक्ष तथा सूक्ष्म है, स्रोतों को शुद्ध करता है, वातदोष एवं कफदोष को दूर करता है । विधि - विपरीत सेवन किया मद्य विष के समान हानिकारक होता है ॥ ६२-६४ ॥ संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेत — च. सू. २५ ४०; च.चि. २४; सु.सू. ४५; सु.उ. ४७ तथा अ.सं.सू. ६ मद्यवर्ग । वक्तव्य — ‘ मद्यं सौमनस्यजननानां, मद्याक्षेपो धीधृतिस्मृतिहराणाम् ' । ( च.सू. २५।४० ) मद्य में जो दस गुण होते हैं वे क्रमशः ओजस् को जो शुक्र का उपधातु है, उसका विनाश कर देते हैं; यदि मद्य का अविधि सेवन किया गया तो । देखें – च. चि. २४।२ ९ -३१ । तैलवर्ग के बाद यहाँ मद्यवर्ग का इसलिए वर्णन किया गया है कि यह भी द्रव द्रव्य है, दूसरा कारण यह भी है कि तेल और मद्य में ' कृश - स्थूल हित ' धर्म समान हैं । मद्य किस प्रकार कृश तथा स्थूल पुरुषों के लिए हितकारक होता है, उसका विवेचन यहाँ दिया जा रहा है — मद्य अपने तीक्ष्ण, सूक्ष्म आदि गुणों से तथा स्रोतों को शुद्ध करने आदि कर्मों के कारण ही कृशता अथवा स्थूलता को नष्ट करता है । कृशता - नाश — स्रोतों का भलीभाँति शोधन हो जाने से शरीर में रसधातु का संचार सुचारु रूप से होने लगता है, जिसके फलस्वरूप रस आदि सभी धातुएँ पुष्ट होने लग जाती हैं, जिससे मानव - शरीर पुष्ट हो जाता है । स्थूलहित – मद्य में रूक्ष, सर, तीक्ष्ण आदि कतिपय गुण ऐसे होते हैं, जिनके कारण तथा उक्त प्रकार से स्रोतों के संशोधन - कर्म से मेदोधातु का संचय होना भी रुक जाता है और पहले से संचित मेदोधातु इधर - उधर विलीन हो जाती है, मेदोवृद्धि ही तो स्थूलता में मूल कारण है । नष्टनिद्राऽतिनिद्रेभ्यो हितम् — मद्य में तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष आदि गुण होते हैं, इनके कारण अतिनिद्रा का नाश हो जाता है । मद्य में मादकता यह एक प्रधान गुण होता है, जिसके कारण जिन्हें निद्रा नहीं आती है उन्हें मद्यपान कराने से निद्रा आ जाती है । मद्य - परिचय – ‘ बुद्धिं लुम्पति यद्द्रव्यं मदकारि तदुव्यते । तमोगुणप्रधानं च यथा मद्यं सुरादिकम् ' ॥ ( शा.पू.खं. ४।२१ ) अर्थात् जो द्रव्य ( मद्य ) बुद्धि का विनाश कर देता है, उसे मदकारक कहते हैं, क्योंकि उसमें तमोगुण की प्रधानता रहती है । जैसे — मद्य, सुरा आदि । मद्य रसायन है— यद्यपि मद्य एवं विष समान गुण वाले कहे गये हैं, तथापि मद्य तथा अन्न को समान रूप से प्रतिदिन सेवनीय कहा गया है । जब मद्य का अनुचित प्रकार से प्रयोग किया जाता है, तब यह रोगोत्पादक होता है, विधिपूर्वक सेवन करने से इसमें अमृत के समान गुण हैं । देखें —च.चि. २४४५ ९ । विधिप्रयुक्त मद्य के गुण — विधिपूर्वक, मात्रानुसार तथा समय पर चिकने पदार्थों के साथ यथाशक्ति, प्रसन्नचित्त होकर जो मद्यपान करता है, उसके लिए वह अमृत के समान गुणकारी होता है । देखें- च.चि. २४१२७ । सुरा का ऐतिहासिक वर्णन - चरक - चिकित्सास्थान २४।३ में सुरा की प्रशंसा करते हुए कहा है कि इसकी ‘ सौत्रामणि ' नामक यज्ञ में आहुति भी दी जाती है । इस दृष्टि से यह सुरा यज्ञीय ( पवित्र )
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८० अष्टाङ्गहृदये द्रव्य है । उक्त यज्ञ का संक्षिप्त परिचय – सौत्रामणि यज्ञ का ऋषि प्रजापति, देवता सुरा तथा इसका छन्द अनुष्टुप् है । इस यज्ञ में जिस समय सुरा - सन्धान किया जाता है, उस समय इस मन्त्र का उच्चारण किया जाता है —— ॐ स्वाद्वीन्त्वा स्वादुना तीव्रा तीव्रणामृताममृतेन । मधुमतीं मधुमता सृजामि । स सोमेन सोमोऽस्यश्विभ्यां पच्यस्व सरस्वत्यै पच्यस्वेन्द्राय सुत्राम्णे पच्यस्य ' । इसका विस्तृत विवरण यजुर्वेद - काण्वशाखा
अध्याय २१-२३ में देखें ।
गुरु तद्दोषजननं नवं जीर्णमतोऽन्यथा ॥। ६५ ॥
नया तथा पुराना मद्य – नया मद्य गुरु ( देर में पचने वाला ) तथा त्रिदोषकारक होता है और इसके विपरीत पुराना मद्य लघु ( शीघ्र पचने वाला ) एवं त्रिदोषशामक होता है । ६५ ॥ वक्तव्य — तात्पर्य यह है कि नये मद्यों का सेवन नहीं करना चाहिए, केवल पुराने मद्य, आसव, अरिष्ट आदि का सेवन करना चाहिए । अतएव कहा गया है — ' पुराणाः स्युर्गुणैर्युक्ता आसवा धातवो रसाः ’ । अर्थ स्पष्ट है । पेयं नोष्णोपचारेण न विरिक्तक्षुधातुरैः । नात्यर्थतीक्ष्णमृद्वल्पसम्भारं कलुषं न च ॥ ६६ ॥
मद्य का निषेध – उष्ण गुणयुक्त आहार - विहार के साथ, विरेचन करने के बाद एवं भूखे पेट में मद्य का सेवन न करे । अत्यन्त तीक्ष्ण, अत्यन्त मृदु ( जिसमें मादकता बहुत कम हो ), जो समुचित सामग्री से न बनाया गया हो और जो मलिन अर्थात् स्वच्छ न किया गया हो, ऐसे मद्य को नहीं पीना चाहिए ॥ ६६ ॥
गुल्मोदरार्शोग्रहणीशोषहृत् स्नेहनी गुरुः । सुराऽनिलघ्नी मेदोऽसृक्स्तन्यमूत्रकफावहा ॥ ६७ ॥
विभिन्न सुराओं का वर्णन – ' सुरा ' – यह गुल्मरोग, उदररोग, अर्शोरोग, ग्रहणीरोग तथा शोष ( राजयक्ष्मा ) रोग का विनाश करती है । यह स्नेहनकारक, गुरु ( देर में पचने वाली ) तथा वातनाशक होती है । यह मेदोधातु, रक्तधातु, दूध, मूत्र एवं कफदोष को बढ़ाती है ॥ ६७ ॥
वक्तव्य- -सुरा - परिचय — ' शालिपिष्टकृतं मद्यं सुरा ' । ( श्रीहेमाद्रि ) मद्य के अनेक भेदों में सुरा का भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान है । सुरा निर्माण के लिए शास्त्रोचित सामग्री का सन्धान हो जाने पर जब यन्त्र द्वारा मद्य निकाला जाता है, तो उसमें से पहले जो अर्क निकलता है, वह बहुत साफ होता है, अतएव उसे ' प्रसन्ना ' कहते हैं । इसे पीते समय इसमें जल मिलाकर पिया जाता है, अतः इसे उत्तम श्रेणी की ' सुरा ' कहते हैं । इसके बाद कादम्बरी, जगल और मेदक क्रमशः निम्न स्तर की होती हैं । प्राचीन काल में सुर, असुर, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व एवं मनुष्य भले ही इस उपद्रवकारिणी सुरा का आदर के साथ सेवन करते रहे हों; जैसा वर्णन च.चि. २४ में मिलता है और आज भी मद्य पीने वालों की कमी नहीं है । सरकार को भी इससे पर्याप्त लाभ है, भले ही सरकार मद्यविक्रय के साथ मद्यपान - निषेध की भी घोषणा करती रहती है, अस्तु । महर्षि वाग्भट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है — ' मद्यविक्रयसन्धानदानादानानि नाचरेत् ' । ( अ.हृ.सू. २।४० ) अर्थात् मद्य का बनाना, बेचना, देना तथा लेना नहीं करना चाहिए । शास्त्र के इन उपदेशों को जब भले लोग नहीं सुनते हैं, तो भला ये शराबी कब सुनेंगे? और क्यों सुनेंगे? सभी प्रकार के मादक पेय पदार्थों का नाम ' मद्य ' है । प्राचीन उपलब्ध आयुर्वैदिक ग्रन्थों में ‘ अर्क ’ निकालने की विधि का उल्लेख नहीं मिलता । परवर्ती ' ' भैषज्यरत्नावली ' नामक संग्रह - ग्रन्थ में ' मृतसंजीवनी सुरा ' के निर्माण की विधि ' मृन्मये मोचिकायन्त्रे मयूराख्येऽपि यन्त्रके ' ( ज्वराधिकार - प्रकरण ) में अर्क निकालने का विधान किया गया है । अर्क जिनसे निकाला जाता है, उनके मोचिकायन्त्र तथा मयूरयन्त्र ये प्राचीन नाम हैं । मद्य के लिए सन्धान किये गये द्रव्यों का जो अर्क रूप द्रव होता है, उसी को मद्य ( शराब ) कहते हैं । सन्धानकाल की निश्चित अवधि नहीं है, फिर भी जिन द्रव्यों का सन्धान शीत - -प्रधान प्र स्थानों में एक मास में हो जाता है, वही कार्य उष्ण - प्रधान स्थानों में १५ दिनों में होते देखा जाता है ।
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द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्याय: ५ ] सूत्रस्थानम् ८१ एलोपैथी तथा होमियोपैथी पद्धति के अनुसार मद्यसार ( स्प्रिट ) में औषधियाँ डालकर कुछ समय तक उसी में पड़ी रहने पर उस उस औषध को टिंचर के रूप में तैयार कर लिया जाता है । आयुर्वेदीय पद्धति के अनुसार औषधि तथा द्रव के संयोग से सन्धान करके आसव, अरिष्ट आदि तैयार कर लिये जाते हैं । औषध - द्रव्यों के क्वाथ आदि से आसव - अरिष्ट अपना प्रभाव इसलिए शीघ्र दिखलाते हैं, क्योंकि मद्य का एक गुण ‘ आशुकारी ’ भी है । अतएव सुश्रुत ने कहा है — ‘ आशुत्वाच्चाशुकर्मकृत् ' । ( सु.उ. ४७।५ ) तद्गुणा वारुणी हृद्या लघुस्तीक्ष्णा निहन्ति च । शूलकासवमिश्वासविबन्धाध्मानपीनसान् ॥ ६८ ॥
वारुणी - परिचय — वारुणी नामक मद्य के गुण भी उक्त सुरा के समान होते हैं । शेष गुण इस प्रकार हैं — यह हृदय को बल देती हैं, लघु ( शीघ्र पचने वाली ) तथा तीक्ष्ण है । यह शूल, कास, वमन, श्वास, विबन्ध ( स्रोतों की रुकावट, मल - मूत्र की रुकावट ), अफरा तथा पीनस रोगों को नष्ट करती है ॥ ६८ ॥
वक्तव्य — वरुणदेव ( जल तथा पश्चिम दिशा के स्वामी ) को यह मद्य प्रिय थी, अतः इसे ' वारुणी ' कहते हैं । शार्ङ्गधराचार्य का कथन है कि इसका निर्माण ताल या ताड़ तथा खजूर के रस का सन्धान करके किया जाता है । वैसे भी ताड़ एवं खजूर की ताड़ी प्रसिद्ध है । यह सूर्योदय से पहले पीने पर मधुर स्वाद वाली होती है, सूर्य निकलने के बाद क्रमशः खट्टी होती जाती है । नातितीव्रमदा लघ्वी पथ्या बैभीतकी सुरा । व्रणे पाण्ड्वामये कुष्ठे न चात्यर्थं विरुध्यते ॥ ६ ९ ॥ विष्टम्भिनी यवसुरा गुर्वी रूक्षा त्रिदोषला । बहेड़ा की सुरा — बिभीतक ( बहेड़ा ) की सुरा अधिक नशीली नहीं होती, हलकी होती है, हितकर होती है । और सुराओं की भाँति यह व्रण, पाण्डुरोग तथा कुष्ठरोग में अधिक हानिकारक नहीं होती ॥ ६ ९ ॥ यव ( जौ से निर्मित ) सुरा —यह विष्टम्भकारक ( कब्जियत करने वाली ), गुरु, रूक्ष तथा त्रिदोषकारक होती है । कौहली सुरा — यह शरीर को स्थूल करने वाली तथा गुरु ( देर में पचने वाली ) होती है । मधूलक सुरा — यह कफकारक होती है । वक्तव्य- - वास्तव में ' विष्टम्भिनी मधूलकः ' ॥ यह पद्य अ.सं. सू. ६।१२४ क्रमसंख्या में सुलभ है । इसे कुछ विद्वान् यहाँ भी जोड़ना चाहते हैं और कुछ इसकी प्रथम पंक्ति को यहाँ उद्धृत करना चाहते हैं, किन्तु श्रीहेमाद्रि कोहली सुरा का वर्णन करने वाली पहली पंक्ति को भी ' हृदयकार ' की सम्पत्ति नहीं मानते, अस्तु । कोहली सुरा - प्रथम मत- - वैद्यकशब्दसिन्धु में इसे ' कूष्माण्डसुरा ' कहा है अर्थात् कूष्माण्ड = पेठा, जिसकी मिठाई ( कोहड़ापाक ) बनती है, उससे बनायी गयी सुरा । द्वितीय मत - -'कोहलो ' यवसक्तुकृत-मद्यविशेषः ' अर्थात् जौ के सत्तुओं के द्वारा बनायी गयी सुरा । तीसरा मत— -'कोहल ': शक्तुभिर्देशे बाह्लीके क्रियते यवैः ’ । ( वाचस्पतिः ) बाह्लीक ( बलख- अरब ) देश में जौ के सत्तुओं द्वारा निर्मित सुरा । इस प्रकार दूसरा - तीसरा मत प्रायः समान है, केवल तीसरे मत में देश - विशेष की चर्चा है । ' मधूलक ' का परिचय देते हुए श्रीइन्दु कहते हैं— ' सर्वं मद्यमसञ्जातं मधूलकमिति स्मृतम् ' । इति इन्दुः । उन सभी मद्यों को ' मधूलक ' कह सकते हैं, जिनका सन्धान भलीभाँति न किया गया हो । यथाद्रव्यगुणोऽरिष्टः सर्वमद्यगुणाधिकः ॥ ७० ॥
ग्रहणीपाण्डुकुष्ठार्शःशोफशोषोदरज्वरान् । हन्ति गुल्मकृमिप्लीह्नः कषायकटुवातलः ॥ ७१ ॥
अरिष्ट - परिचय - जिन द्रव्यों के संयोग द्वारा जिस अरिष्ट का निर्माण किया जाता है, वह अरिष्ट उन द्रव्यों के गुण - धर्म के समान होता है, किन्तु यह आसव सभी मद्यों से अधिक गुणवान् होता है । यह ग्रहणी, पाण्डु, कुष्ठ, अर्श, शोफ ( सूजन ), शोष ( क्षय ), उदररोग, ज्वर, गुल्म, क्रिमिरोग तथा प्लीहाविकारों को नष्ट करता है । यह स्वाद में कसैला तथा कटु होता है और वातवर्धक होता है ॥ ७०-७१ ॥ ६ अ ० हृ ०
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८२ अष्टाङ्गहृदये वक्तव्य — आचार्य शार्ङ्गधर ने आसव - अरिष्ट के विभेदक लक्षणों का वर्णन इस प्रकार किया है — ‘ यद-पक्वौषधाम्बुभ्यां सिद्धं मद्यं स आसवः । अरिष्टः क्वाथसाध्यः स्यात् तयोर्मानं पलोन्मितम् ' ॥ ( शा.सं.म. १०१२ ) अर्थात् कच्ची औषधियों तथा जल के योग से सन्धान द्वारा जो मद्य तैयार किया जाता है, उसे ' आसव ' कहते हैं । औषध - द्रव्यों को जल में डालकर क्वाथ करने के बाद जो मद्य तैयार किया जाता है, उसे ' अरिष्ट ' कहते हैं । इन दोनों की साधारण मात्रा १ पल ( ४ तोला ) है । आसव - अरिष्ट का यह विभेदक लक्षण प्राचीन संहिताओं में नहीं मिलता है । हाँ, सुश्रुत ने आसवों से अरिष्टों को अधिक गुणवाला स्वीकार किया है— ' अरिष्टो द्रव्यसंयोगसंस्कारादधिको गुणैः ' । ( सु.सू. ४५।१ ९ ४ ) अर्थात् अरिष्ट में आसव से अधिक औषधद्रव्यों का संयोग होने से तथा संस्कार- विशेष होने से यह ( अरिष्ट ) अधिक गुणवान् होता है । मार्द्वीकं लेखनं हृद्यं नात्युष्णं मधुरं सरम् । अल्पपित्तानिलं पाण्डुमेहार्शःकृमिनाशनम् ॥ ७२ ॥
मुनक्का का मद्य — मृद्वीका को हिन्दी में मुनक्का या दाख कहते हैं । इसके द्वारा बनाया हुआ मद्य लेखन होता है, हृदय के लिए हितकर होता है । यह अधिक उष्ण नहीं होता, स्वाद में मधुर एवं इसका गुण सर है । यह थोड़ा पित्तदोष तथा वातदोष को बढ़ाता है । पाण्डुरोग, प्रमेह, अर्श ( बवासीर ) तथा क्रिमिरोग नाशक होता है ॥ ७२ ॥
वक्तव्य- - ऊपर मुनक्का के मद्य ( द्राक्षासव ) को ' लेखन ' कहा गया है । यह आयुर्वेद में प्रयुक्त होने वाला एक पारिभाषिक शब्द है । लिखने की क्रिया को जो ' लेखन ' कहा जाता है, वह वास्तविक रूप में लेपन है, क्योंकि हम स्याही द्वारा लेपन कार्य करते हैं । हाँ, उत्कीर्ण - लेखन कार्य में इस शब्द का समुचित प्रयोग हुआ है, क्योंकि ' लिख ' धातु का अर्थ है — अक्षरविन्यास । इसी अर्थ में आयुर्वेद का लेखन शब्द भी है, जरा इसकी परिभाषा देखें— ' धातून् मलान् वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत् । लेखनं तद्यथा क्षौद्रं नीरमुष्णं वचा यवाः ॥ ( शा.पू. ४८१० ) अर्थात् जो द्रव्य सम्पूर्ण शरीर की धातुओं और मलों को सुखाकर तथा छीलकर निकाल देता है, वह ' लेखन ' कहा जाता है । यथा— शहद, गरम जल, बालवच तथा जौ । वास्तव में छेदन एवं लेखन दोनों द्रव्य भीतर के जमे हुए दोषों को निकाल कर बाहर कर देते हैं । अस्मादल्पान्तरगुणं खार्जूरं वातलं गुरु । शार्करः सुरभिः स्वादुहृद्यो नातिमदो लघुः ॥ ७३ ॥
खार्जूर - शार्कर आसव— खजूर का मद्य - ऊपर मुनक्का के मद्य के जो गुण कहे गये हैं, उनसे खजूर के मद्य में कुछ कम गुण होते हैं । यह वातकारक तथा गुरु ( देर में पचने वाला ) होता है । शार्कर ( चीनी से निर्मित ) मद्य – यह सुगन्धित, स्वाद में मधुर, हृदय के लिए हितकारक, अधिक नशा न करने लायक तथा लघु ( शीघ्र पचने वाला ) होता है ॥ ७३ ॥
सृष्टमूत्रशकृद्वातो गौडस्तर्पणदीपनः । गुड़ निर्मित आसव- -यह मल, मूत्र तथा अपानवायु को बाहर निकलने के यह मद्य तृप्तिकारक तथा अग्निदीपक होता है । वक्तव्य — मद्य, आसव, सुरा, शराब, दारू आदि जिस - जिस द्रव्य से बनाये से ये पुकारे जाते हैं । इस विषय में चरक ने कहा है — ' योनिसंस्कारनामाद्यैर्विशेषैर्बहुधा च सामान्यान्मदलक्षणात् ' ॥ ( च.चि. २४/६ ) अर्थात् जो योनि ( उत्पत्तिस्थान — धान्य, लिए प्रेरित करता है । जाते हैं, उस - उस नाम या । भूत्वा भवत्येकविधा फल, मूल, सार, पुष्प, काण्ड, पत्र, त्वचा, शर्करा ), संस्कार ( पिप्पली आदि द्रव्यों से ) तथा नाम आदि विशेषताओं से बहुत प्रकार की होती हुई भी मदलक्षण के सब में समान होने के कारण शराब एक ही प्रकार की होती है । देखें — च.सू. २४ | ४ ९ । चरक के उक्त सन्दर्भ में इसके यथासम्भव भेदों का वर्णन कर दिया गया है ।
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द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्याय: ५ ] सूत्रस्थानम् ८३ वातपित्तकरः सीधुः स्नेहश्लेष्मविकारहा ॥ ७४ ॥
मेदःशोफोदरार्शोघ्नस्तत्र पक्वरसो वरः । सीधु का वर्णन —यह वात - पित्तकारक होता है, स्नेह के कारण उत्पन्न हुए विकारों तथा कफ - विकारों को नष्ट करता है । यह मेदोरोग, व्रणशोथ, उदरविकार तथा अर्शोरोग को नष्ट करता है । दो प्रकार के सीधुओं में शीत रस की तुलना में पक्वरस से बना हुआ सीधु गुणों में उत्तम होता है ॥७४ ॥
वक्तव्य — सीधु दो प्रकार का होता है— १. शीतरस तथा २. पक्वरस । इसका निर्माण - प्रकार इस प्रकार है — ईख तथा अंगूर आदि के मधुर रस को पात्र में डालकर धूप में रख दें । इसे दो - तीन सप्ताह के बाद छानकर दूसरे पात्र में रख दिया जाता है । जब - जब इसमें जाला पड़े तब - तब इसे छानकर दूसरे पात्र में रख दें । जब जाला पड़ना बन्द हो जाय और वह रस अत्यन्त निर्मल हो जाय तो समझना चाहिए कि सीधु ( सिरका ) तैयार है । इसे बनाने के पारिवारिक अन्य अनेक प्रकार भी देखे जाते हैं । प्रायः इसके निर्माण में ४-५ मास का समय लग जाता है । इसका स्वाद अम्ल ( खट्टा ) होता है । यह पाचन होता
है । इसका प्रयोग चटनी आदि के लिए किया जाता है ।
छेदी मध्वासवस्तीक्ष्णो मेहपीनसकासजित् ॥ ७५ ॥
मध्वासव का वर्णन — मधु के संयोग से बनाये गये आसव को मध्वासव कहते हैं । यह मल आदि का छेदन करता है और गुणों में तीक्ष्ण होता है । प्रमेह, पीनस एवं कास रोग को नष्ट करता है ॥ ७५ ॥
रक्तपित्तकफोत्क्लेदि शुक्तं वातानुलोमनम् । भृशोष्णतीक्ष्णरूक्षाम्लं हृद्यं रुचिकरं सरम् ॥ ७६ ॥
दीपनं शिशिरस्पर्शं पाण्डुदृक्कृमिनाशनम् । शुक्त का वर्णन —यह रक्त, पित्त तथा कफ दोष को उभारता है, वातदोष का अनुलोमन करता है । यह गुण में अत्यन्त उष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष तथा अम्लरस - प्रधान होता है । हृदय के लिए हितकर, रुचिकर, सर ( मल को निकालने वाला ), अग्निदीपन तथा स्पर्श में शीतल होता है । यह पाण्डुरोग, नेत्ररोग तथा क्रिमिरोग का नाश करता है ॥ ७६ ॥
गुडेक्षुमद्यमार्दीक शुक्तं लघु यथोत्तरम् ॥ ७७ ॥
गुड़ आदि शुक्त — गुड़ का शुक्त, ईख का शुक्त, मद्यनिर्माण - विधि से बनाया गया शुक्त तथा मुनक्का से बनाया गया शुक्त उत्तरोत्तर गुणों में हलके होते हैं ॥ ७७ ॥
कन्दमूलफलाद्यं च तद्वद्विद्यात्तदासुतम् । कन्द आदि शुक्त — सूरण, जिमीकन्द आदि कन्दों, गाजर- -मूली आदि मूलों तथा लौकी, सेम, केवाँच आदि फलों से बनाया गया आसुत ( आसव की भाँति चुवाया गया ) द्रव भी उसी प्रकार लघु होता है । वक्तव्य- -यह शुक्त दो - तीन दिन में तैयार हो जाता है । मारवाड़, पंजाब आदि प्रदेशों में इसे ' काँजी ' कहते हैं । इसमें राई पीसकर डाली जाती है; हींग, जीरा, कालानमक, हल्दी, तेल में पकाये पकौड़े भी डाले जाते हैं । खट्टापन आते ही इसमें डाले गये पदार्थों के साथ वह पानी भी तथा भूख को बढ़ाता है । शुक्त- चुक्रनिर्माण - विधि - ' मृण्मयादिशुचौ भाण्डे सगुडं क्षौद्रकाञ्जिकम् । चुक्रं तदुच्यते ' ॥ अर्थात् मिट्टी आदि ( ताँबा - पीतल का नहीं ) के साफ पात्र में घोलकर डाल दें । इस पात्र को तीन दिन तक धान्यराशि में दबाकर रख
कहते हैं ।
शाण्डाकी चासुतं चान्यत् कालाम्लं रोचनं लघु ॥ ७८
पिया जाता है, जो पाचक धान्यराशौ त्रिरात्रिस्थं शुक्रं में गुड़ तथा शहद को जल दें । इसी को शुक्त या चुक्र ॥
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८४ अष्टाङ्गहृदये शाण्डाकी - वर्णन — शाण्डाकी, आसुत तथा दूसरे वे द्रव जो कुछ ( ३ या ४ ) दिन तक रख देने से खट्टे हो जाते हैं, वे रुचिकारक तथा लघु ( सुपाच्य ) होते हैं ॥ ७८ ॥
वक्तव्य — शण्डाकी, आसुत, सौवीर, तुषोदक आदि नाम अलग - अलग पदार्थों से बनायी गयी काँजियों के हैं । यह गर्मी के दिनों में २-३ दिनों में सेवन करने योग्य हो जाती है और शीतकाल में ५-६ दिनों में तैयार हो पाती है । फिर जितने दिन इसे रखेंगे खट्टी होती जाती है । यह खट्टी तथा मीठी भेद से दो प्रकार की होती है । खट्टी काँजी के घटक द्रव्य— - १. जल, २. नमक, ३. राई, ४. हल्दी तथा ५. कालीमिर्च । मीठी काँजी के घटक द्रव्य — ईख का रस आदि मीठे द्रव - द्रव्यों द्वारा जल के योग से बनाई जाती है । काँजी का एक नाम ' अवन्तीसोम ' भी है । वास्तव में यह मालव देश ( मारवाड़ ) या जांगल देश का अमृत है, वहाँ इसे विविध प्रकार से बनाया जाता है, अन्यत्र यह अच्छी बनती भी नहीं । धान्याम्लं भेदि तीक्ष्णोष्णं पित्तकृत्स्पर्शशीतलम् । श्रमक्लमहरं रुच्यं दीपनं बस्तिशूलनुत् ॥ ७ ९ ॥
शस्तमास्थापने हृद्यं लघु वातकफापहम् । एभिरेव गुणैर्युक्ते सौवीरकतुषोदके ॥ ८० ॥
कृमिहृद्रोगगुल्मार्शःपाण्डुरोगनिबर्हणे । ते क्रमाद्वितुषैर्विद्यात्सतुषैश्च यवैः कृते ॥ ८१ ॥
इति मद्यवर्गः । धान्याम्ल आदि का वर्णन — धान्याम्ल नामक काँजी मल ( पुरीष ) का भेदन कर उसे निकालती है । यह तीक्ष्ण, उष्ण, पित्तवर्धक तथा स्पर्श में शीतल होती है । यह श्रम ( शारीरिक थकावट ) एवं क्लम ( मानसिक थकावट ) को दूर करती है । रुचिवर्धक, दीपन ( जठराग्नि को बढ़ाने वाली ), बस्तिशूलनाशक, निरूहणबस्ति में उपयोगी, हृदय के लिए हितकर, पाचन में लघु और वात तथा कफ दोष को नष्ट करती है । सौवीरक तथा तुषोदक — उक्त धान्याम्ल के समान ही गुण इनके भी होते हैं । विशेष रूप से इनका प्रयोग इन रोगों के विनाश के लिए किया जाता है— क्रिमिरोग, हृदयरोग, गुल्मरोग, अर्शोरोग तथा पाण्डुरोग | दोनों में भेद — सौवीरक काँजी तुषरहित यवसमूह से बनायी जाती है और तुषोदक काँजी तुष सहित यवसमूह से बनायी जाती है ॥ ७ ९ -८१ ॥ वक्तव्य- -भात या भात के माँड़ से जो काँजी बनायी जाती है, उसे ' धान्याम्ल ' कहते हैं । ‘ सौवीरक ’ तथा ' तुषोदक ' के भेदक लक्षण ऊपर कह दिये गये हैं । ऊपर ‘ एभिरेव ’ से ‘ यवैः कृते ' तक के श्लोकों की तीन पंक्तियाँ श्री अरुणदत्तसम्मत होने से इस संस्करण में अधिक हैं । ये पंक्तियाँ अ.सं. सू. ६।१३ ९ - १४० से ली गयी हैं । काँजी का स्पर्श शीतल होता है, अतः दाहशान्ति तथा ज्वरशान्ति के लिए इसमें साफ वस्त्र या रुई के फाहा को भिगाकर दाहस्थान पर माथा या नाभि पर रखा जाता है । ध्यान रहे, इसकी बूँदें आँखों में न पड़ने पायें । अथ मूत्रवर्गः मूत्रं गोऽजाविमहिषीगजाश्वोष्ट्रखरोद्भवम् । पित्तलं रूक्षतीक्ष्णोष्णं लवणानुरसं कटु ॥ ८२ ॥
कृमिशोफोदरानाहशूलपाण्डुकफानिलान् । गुल्मारुचिविषश्वित्रकुष्ठाशा॑सि जयेल्लघु ॥ ८३ ॥
इति मूत्रवर्गः । आठ प्रकार के सूत्र - १. गाय, २. बकरी, ३. भेड़ी, ४. महिषी, ५. हाथी, ६. घोड़ा, ७. ऊँट तथा ८. गधा का मूत्र चिकित्सा में उपयोगी होता है । सामान्य दृष्टि से सभी मूत्र पित्तकारक, रूक्ष, तीक्ष्ण.