श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 151–160
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 151–160
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अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् ११५ भिलावा का वर्णन — भिलावा का छिलका तथा गूदा बृंहण ( शरीर को स्थूल करने वाला ), रस में मधुर तथा शीतवीर्य होता है । भिलावा की गुठली अग्नि के समान तीक्ष्ण ( दाहक ), बुद्धिवर्धक एवं अत्यन्त कफ एवं वातनाशक होती है ॥ १३४ ॥
वक्तव्य — भिलावा के फल हृदयाकृति होने पर भी ये दो भागों में मूलतः विभक्त होते हैं । जब इसका ऊपरी भाग दाहक होता है और नीचे का भाग पकी नारंगी के सदृश हो जाता है, तब उसे खाया जाता है । इसी का वर्णन ऊपर प्रथम पंक्ति द्वारा किया गया है । स्वाद्वम्लं शीतमुष्णं च द्विधा पालेवतं गुरु । रुच्यमत्यग्निशमनं— पारेवत का वर्णन — पारेवत मधुर तथा अम्ल भेद से दो प्रकार का होता है । मीठा पारेवत शीतवीर्य होता है तथा अम्लपारेवत उष्णवीर्य होता है । ये दोनों पारेवत पाचन में गुरु, रुचिकारक तथा अत्यग्नि ( भस्मक रोग ) का शमन करते हैं । वक्तव्य —— उक्त गुण - धर्मों से युक्त द्रव्य को चरक ने ' पारावत ' कहा है । देखें — च.सू. २७।१३४ । यह फल कामरूप ( आसाम ) आदि देशों में पाया जाता है ( चक्रपाणि ) — रुच्यं मधुरमारुकम् ॥ १३५ ॥
पक्वमाशु जरां याति नात्युष्णगुरुदोषलम् । आरुक- फल का वर्णन – आडूफल रुचिकारक तथा रस में मधुर होता है । यह पका हुआ शीघ्र पच जाता है । यह अधिक गरम नहीं होता किन्तु गुरु तथा दोषकारक होता है ॥ १३५ ॥
वक्तव्य — यह पर्वतीय क्षेत्रों का फल है । इसके अनेक भेद - उपभेद होते हैं । तदनुसार ये वैशाख से पकने प्रारम्भ होते हैं और जातिभेद से आश्विन तक पकते रहते हैं । अब इसकी कुछ जातियाँ मैदानी भागों में भी पायी जाने लगी है, फिर भी पर्वतीय जल - वायु का स्वाद कुछ और ही द्राक्षापरूषकं चार्द्रमम्लं पित्तकफप्रदम् ॥ १३६ ॥
गुरूष्णवीर्यं वातघ्नं सरं सकरमर्दकम् । कच्चे दाख आदि का फल- - द्राक्षा ( मुनक्का ) एवं परूषक ( फालसा ) खट्टे होते हैं । ये पित्त तथा कफ वर्धक होते हैं । करमर्द ( करौंदा ) के कच्चे फल —यह पाचन में गुरु, उष्णवीर्य, वातनाशक तथाऽम्लं कोलकर्कन्धुलकुचाम्रातकारुकम् ॥ १३७ ॥
होता है । के कच्चे फल स्वाद में तथा सर होते हैं ॥ १३६ ॥
ऐरावतं दन्तशठं सतूदं मृगलिण्डिकम् । नातिपित्तकरं पक्वं शुष्कं च करमर्दकम् ॥ १३८ ॥
कोल - कर्कन्धु - वर्णन — कोल ( बड़ा बेर ) तथा कर्कन्धु ( छोटे बेर ), लकुच ( बड़हल ), आम्रातक ( आमड़ा ), ऐरावत ( नारंगी – वै ० नि ० ), दन्तशठ ( जम्बीरीनीबू ), तूद ( शहतूत ), मृगलिण्डिक ( बड़े शहतूत ) —ये सभी फल कच्ची दाख के समान गुण - धर्म वाले होते हैं । इनमें सूखा तथा पका हुआ करौंदा अधिक पित्तकारक नहीं होता है ॥ १३७-१३८ ॥
दीपनं भेदनं शुष्कमम्लीकाकोलयोः फलम् । तृष्णाश्रमक्लमच्छेदि लघ्विष्टं कफवातयोः ॥
इमली तथा बेर के सूखे फल – ये अग्नि को प्रदीप्त करने वाले तथा मलभेदक ( दस्तावर ) होते हैं । ये दोनों प्यास, शारीरिक एवं मानसिक थकावट को दूर करते हैं, कफ तथा वातविकार में लाभदायक होते हैं एवं पाचन में लघु होते हैं ॥ १३ ९ ॥ फलानामवरं तत्र लकुचं सर्वदोषकृत् । बड़हर के फल — फलों में बड़हर का फल अधम गुणों वाला होता है तथा यह वात आदि सभी दोषों को उभाड़ने वाला होता है ।
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११६ अष्टाङ्गहृदये हिमानलोष्णदुर्वातव्याललालादिदूषितम् ॥ १४० ॥
जन्तुजुष्टं जले मग्नमभूमिजमनार्तवम् । अन्यधान्ययुतं हीनवीर्यं जीर्णतयाऽति च ॥ १४१ धान्यं त्यजेत्तथा शाकं रूक्षसिद्धमकोमलम् । असञ्जातरसं तद्वच्छ्रुष्कं चान्यत्र मूलकात् ॥ १४२ ॥
प्रायेण फलमप्येवं तथाऽऽमं बिल्ववर्जितम् । इति फलवर्गः । त्याज्य धान्य, शाक एवं फल — हिम ( बरफ ) गिरने से, ओले पड़ने से, कड़ी धूप लगने से या आग से झुलस जाने से, दूषित वायु के स्पर्श से, साँप या अन्य जहरीले प्राणियों की लार के लग जाने से, कीड़े पड़ जाने से, जल में डूब जाने से, विपरीत. ( अपने प्रतिकूल ) गुणों वाली भूमि में उत्पन्न होने से, विपरीत ऋतु में उत्पन्न होने से, विपरीत गुणवाले धान्य ( अनाज ) के साथ मिला देने से, शक्तिहीन हो जाने से अथवा अधिक पुराने हो जाने से धान्य अपने गुणों से रहित हो जाते हैं । ऐसे धान्यों का सेवन न करें । इसी प्रकार के शाक भी त्याज्य होते हैं तथा जो शाक घी - तेल स्नेहों से बिना छोंके ही बनाये गये हों और जो कोमल न हों वे भी अखाद्य होते हैं । जिन शाकों में स्वाभाविक रस, गुण आदि की उत्पत्ति न हुई हो अथवा जो शाक सूख गये हों वे भी खाने योग्य नहीं होते । सुखाये गये कन्दशाक ( मूली आदि ) खाये जा सकते हैं । जैसा कि इसी अध्याय के १०५ वें प के पूर्वार्ध में कहा गया है । इसी प्रकार के फल भी खाने योग्य नहीं होते, किन्तु सुखाया गया कच्चा बेल का फल खाया जा सकता है, अन्य कच्चे फलों को नहीं खाना चाहिए ॥ १४०-१४२ ॥ अथौषधवर्गः विष्यन्दि लवणं सर्वं सूक्ष्मं सृष्टमलं मृदु ॥ १४३ ॥
वातघ्नं पाकि तीक्ष्णोष्णं रोचनं कफपित्तकृत् । फलों का वर्णन करने के बाद अब यहाँ से विविध प्रकार के लवणों का वर्णन प्रारम्भ होता है । लवण - सामान्य के गुण — ये विष्यन्दनकारक अर्थात् अभिष्यन्दी, सूक्ष्म, मल को सरकाने वाले, मृदु, वातविकारनाशक, भोजन को पचाने वाले, तीक्ष्ण, उष्ण, रुचि को बढ़ाने वाले और कफ तथा पित्तकारक होते हैं ॥ १४३ ॥
वक्तव्य — सूक्ष्म लवण ( नमक ) छोटे से भी छोटे स्रोतों में प्रवेश कर जाते हैं, यही कारण है कि नाड़ीव्रणविनाशक मलहमों में घृत, मधु तथा लवण आदि द्रव्यों का प्रमुख रूप से प्रयोग होता है । पाकि — बनते हुए भोजन ( दाल आदि ) को शीघ्र गला देता है, पकने के बाद आहार को पचाता है और व्रणशोथ ( फोड़े )
को भी पका देता है ।
सैन्धवं तत्र सस्वादु वृष्यं हृद्यं त्रिदोषनुत् ॥ १४४ ॥
लघ्वनुष्णं दृशः पथ्यमविदाह्यग्निदीपनम् । सेंधानमक के गुण – सभी नमकों में सेंधानमक तीक्ष्णता की कमी के कारण कुछ मधुर, वीर्यवर्धक, हृदय के लिए हितकर, त्रिदोषशामक, लघु, कुछ उष्णवीर्य वाला, नेत्रों के लिए हितकारी, अविदाही ( यह विदाहकारक नहीं होता ) होने पर भी जठराग्नि को प्रदीप्त करता है ॥ १४४ ॥
लघु सौवर्चलं हृद्यं सुगन्ध्युद्गारशोधनम् ॥ १४५ ॥
कटुपाकं विबन्धघ्नं दीपनीयं रुचिप्रदम् । सौवर्चलनमक के गुण— इसी को ' सज्जीखार ' कहते हैं । यह लघु, हृदय के लिए हितकर, सुगन्धित, उद्गार ( डकार ) को शुद्ध करने वाला, विपाक में कटु, मल - मूत्र की रुकावट को हटाने वाला, जठरात्रि को प्रदीप्त करने वाला तथा रुचिकारक होता है ॥ १४५ ॥
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अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ] सूत्रस्थानम् ११७ ऊर्ध्वाधः कफवातानुलोमनं दीपनं विडम् ॥। १४६ ॥ विबन्धानाहविष्टम्भशूलगौरवनाशनम् विड ( विरिया ) नमक के गुण – इसका सेवन करने से कफ ऊपर की ओर से निकलने लगता है और अपानवायु नीचे की ओर से निकलता है अर्थात् यह कफ एवं वायु की गति का अनुलोमन करता है, अग्नि को प्रदीप्त करता है, मल - मूत्र की रुकावट, आनाह, विष्टम्भ ( आँतों की गति की रुकावट को ), शूल तथा भारीपन का नाश करता है ॥ १४६ ॥
वक्तव्य — सुश्रुत ने इसे कफ का अनुलोमक नहीं कहा है, केवल वातानुलोमक ही कहा है । देखें — सु.सू. ४६।३१६ । आचार्य डल्हण कहते हैं —–— यह नमक स्रोतों की शुद्धि करता है, अतएव रुका हुआ वातदोष अनुलोम हो जाता है । कुछ टीकाकारों ने सौवर्चल लवण को कालानमक स्वीकार किया है । जो विडलवण को ' कालानमक ' कहते हैं, यह कृत्रिम नमक है । कालानमक - निर्माणविधि – ४०, सेर सेंधानमक, हरड़ के छिलके, आँवला का सूखा गूदा और सज्जीखार — ये द्रव्य प्रत्येक आधा - आधा सेर लेकर किसी लोहे या मिट्टी के पात्र में मिलाकर पकाते हैं । जब हरड़ तथा आँवला गलकर मिल जाता है, तो शीतल होने पर नमक निकाल लिया जाता है । इसी को मराठी में ' पादेलोण ' कालानमक कहते हैं । सौवर्चल लवण – कुछ विद्वानों ने इसे ' कालालवण ' माना है । फारसी में सोंचरनमक को ही ' नमकस्याह ' कहते हैं । कुछ लोगों का मत है कि जो सौवर्चलनमक गन्धरहित होता है । वह ' कालालवण ' है । डॉ ० देसाई कहते हैं कि रसग्रन्थों में सौवर्चल ' शोरे ' को कहते हैं । श्री द. अ. कुलकर्णी जी कहते हैं— जिस मिट्टी से शोरा प्राप्त होता है, उसे लुनिया मिट्टी कहते हैं, इसमें कुछ मात्रा नमक की भी रहती है । शोरा
के साथ प्राप्त होने के कारण इसे सोंचर या सौवर्चल कहते हैं । अस्तु ।
विपाके स्वादु सामुद्रं गुरु श्लेष्मविवर्धनम् ॥ १४७ ॥
सामुद्र लवण के गुण – समुद्रलवण ( समुद्र के जल को सुखाकर बनाया गया नमक ) रस में नमकीन किन्तु विपाक में मधुर, गुरु तथा कफदोष को बढ़ाता है ॥ १४७ ॥
सतिक्तकटुकक्षारं तीक्ष्णमुत्क्लेदि चौद्धिदम् । औद्भिदलवण के गुण - औद्भिदलवण ( रेह या ऊषर नमक ) कुछ तिक्त एवं कटु रस वाला, क्षार गुण युक्त, तीक्ष्ण तथा क्लेदकारक होता है । वक्तव्य — रेह मिट्टी को जल में घोलकर उस पानी को सुखाकर जो नमक तैयार किया जाता है, उसे औद्भिद लवण कृष्णलवण नहीं होती है ॥ १४८ रोमकलवण गुरु होता है । कहते हैं । जिससे धोबी कपड़े धोते हैं, वही रेह मिट्टी कृष्णे सौवर्चलगुणा लवणे गन्धवर्जिताः के गुण — इसमें सौंचर नमक के समान गुण होते ॥ रोमकं लघु, पांसूत्थं सक्षारं श्लेष्मलं गुरु के गुण – इसकी उत्पत्ति धूलि से होती है । यह वक्तव्य — इसी वर्ग में सज्जीखार तथा सोराखार भी आते हैं । ( कलमीसोरा ) भी कहते हैं । लवणानां प्रयोगे तु सैन्धवादि प्रयोजयेत्
है ।
॥ १४८ ॥
हैं, किन्तु उसकी जैसी गन्ध इसमें । लघु, कुछ खारा, कफकारक तथा इसी को संस्कृत में सुवर्चिकाक्षार ॥ १४ ९ ॥
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११८ अष्टाङ्गहृदये सामान्य निर्देश—— जहाँ केवल इस प्रकार का शास्त्रनिर्देश हो कि इस योग में लवण का प्रयोग करे, वहाँ निश्चिन्त होकर सैन्धवलवण का प्रयोग करना चाहिए ॥ १४ ९ ॥ वक्तव्य —– जहाँ एक लवण का प्रयोग करना हो वहाँ सैन्धवलवण का, जहाँ दो नमकों का प्रयोग करना हो; जैसे — हिंग्वष्टकचूर्ण में ' द्विपटु ', यहाँ १. सैन्धव तथा २. सौवर्चल का, जहाँ तीन लवणों का प्रयोग करना हो वहाँ— १. सैन्धव, २. सौर्वल, ३. विड का प्रयोग करना चाहिए । इसी प्रकार चतुर्लवण तथा पञ्चलवण का भी प्रयोग करना चाहिए । चरक ने ' सैन्धवं लवणानां हिततमम् ' । ( च.सू. २५।३८ ) तथा ' ऊषरं लवणानामहिततमम् । ( च.सू. २५ / ३ ९ ) अर्थात् सभी नमकों में सेंधानमक उत्तम होता है और ऊषर नमक अहित होता है । गुल्महृद्ग्रहणीपाण्डुप्लीहानाहग़लामयान् । श्वासार्शः कफकासांश्च शमयेद्यवशूकजः ॥ १५० ॥
यवक्षार के गुण — यवक्षार ( जौखार ) गुल्मरोग, हृदयरोग, ग्रहणीरोग, पाण्डुरोग, प्लीहारोग, आनाह ( अफरा रोग ), स्वरयन्त्र के रोग, श्वासरोग, अर्शोरोग, कफरोग तथा कासरोग को नष्ट करता है ॥ १५० ॥
क्षारः सर्वश्च परमं तीक्ष्णोष्णः कृमिजिल्लघुः । पित्तासृग्दूषणः पाकी छेद्यहृद्यो विदारणः अपथ्यः कटुलावण्याच्छुक्रौजः केशचक्षुषाम् । सभी प्रकार के क्षार — सभी क्षार अत्यन्त तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, कृमिनाशक तथा लघु होते हैं । पित्त तथा रक्त को दूषित करते हैं; आहार तथा व्रणशोथ ( फोड़ा ) को पका देते हैं । छेदक ( अर्श के मस्सों एवं बालों की जड़ों को काट देते ) हैं, हृदय के लिए अहितकर हैं, पके हुए व्रणशोथ को फाड़ देते हैं, कटु तथा लवण रस - प्रधान होने के कारण ये शुक्र, ओजस्, केंश तथा नेत्रों के लिए अहितकर होते हैं ॥ १५१ ॥
वक्तव्य — पलाश ( ढाक ) अथवा अर्क ( मदार ) की सूखी लकड़ियों को आग से जला दें । उस भस्म को लेकर चौगुना जल डालकर मिट्टी के पात्र में रातभर रहने दें । इस प्रकार राख नीचे जम जायेगी और क्षारयुक्त जल ऊपर रहेगा, इसे सावधानी के साथ दूसरे पात्र में ले लें । इस जल को अग्नि पर रखकर सुखायें । सूखने पर सफेद रंग का क्षार मिलेगा, उसे खुरच कर रख लें । क्षार तैयार है । यह दो प्रकार का होता है —१. प्रतिसारणीय क्षार चूर्णरूप में और २. पानीय क्षार क्वाथ के रूप में । विशेष देखें— सु.सू. ११ सम्पूर्ण । क्षारों का अधिक उपयोग नहीं करना चाहिए । देखें —च. वि. १।१५ । और भी देखें— ' क्षारः पुंस्त्वोपघातिनां श्रेष्ठः ' । ( च.सू. २५।४० ) इनका अधिक सेवन करने से पुरुष नपुंसक हो जाता है । हिङ्गु वातकफानाहशूलघ्नं पित्तकोपनम् ॥ १५२ ॥
कटुपाकरसं रुच्यं दीपनं पाचनं लघु । हींग का वर्णन —वातज रोगों, कफज रोगों, आनाह ( अफरा ) तथा शूलरोगों को यह नष्ट करती है, पित्त को प्रकुपित करती है तथा विपाक एवं रस में कटु होती है । हींग रुचिकारक, अग्निप्रदीपक, पाचक तथा लघु है ॥ १५२ ॥
वक्तव्य — हींग अनेक प्रकार की पायी जाती है, उन सबमें १. हीरा हींग और २. तलाव हींग अच्छी होती है । आजकल नकली हींग की प्राप्ति अच्छी हींग की तुलना में अधिक है । हींग के वृक्ष काबुल, फारस, अफगानिस्तान आदि प्रदेशों में अधिक पाये जाते हैं । इन वृक्षों की गोंद को ही हींग कहते हैं । देशी हींग की तुलना में काबुली हींग उत्तम होती है । अच्छी हींग को पानी में घिसने से दुधिया घोल
बनता है, दूसरों का नहीं, यही इसकी पहचान है ।
कषाया मधुरा पाके रूक्षा विलवणा लघुः ॥ १५३ ॥
दीपनी पाचनी मेध्या वयसः स्थापनी परम् । उष्णवीर्या सराऽऽयुष्या बुद्धीन्द्रियबलप्रदा ||| कुष्ठवैवर्ण्यवैस्वर्ण्यपुराणविषमज्वरान् । शिरोऽक्षिपाण्डुहृद्रोगकामलाग्रहणीगदान् ॥ १५५ ॥
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अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् ११ ९
सशोषशोफातीसारमेदमोहवमिक्रिमीन् । श्वासकासप्रसेकार्शःप्लीहानाहगरोदरम् ॥ १५६ ॥
विबन्धस्रोतसां गुल्ममूरुस्तम्भमरोचकम् । हरीतकी जयेद्वयाधींस्तांस्तांश्च कफवातजान् ॥१५७ ॥
हरीतकी का वर्णन —यह रस में कसैली, विपाक में मधुर, गुण में रूक्ष, केवल लवण रस से रहित अर्थात् लवण के अतिरिक्त इसमें शेष सभी रस रहते हैं । यह लघु, अग्नि को दीप्त करती है, भोजन को पचाती है, बुद्धिवर्धक है, दीर्घायु प्रदान करने वाले द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ है, उष्णवीर्य है, सर ( रेचक ), आयु के लिए हितकर, बुद्धि तथा ज्ञानेन्द्रियों को बल देने वाली है । यह कुष्ठरोग, विवर्णता, स्वरभेद, जीर्णज्वर, विषमज्वर, शिरोरोग, नेत्ररोग, पाण्डुरोग, हृदयरोग, कामलारोग, ग्रहणीरोग, शोष ( राजयक्ष्मा ), सूजन, अतिसार, मेदोरोग, मोह ( मूर्च्छा ), वमन, क्रिमिरोग, श्वास, कास, प्रसेक ( लालाम्राव तथा योनिस्राव ), अर्शोरोग, प्लीहारोग, आनाह ( अफरा ), गरविष, उदररोग, स्रोतों की रुकावट, गुल्मरोग, ऊरुस्तम्भ तथा अरोचक आदि कफज एवं वातज रोगों का विनाश करती है ॥ १५३-१५७ ॥ वक्तव्य — आयुर्वेदशास्त्र में हरीतकी ( हरड़ ), लहसुन तथा शिलाजीत इन तीन द्रव्यों का विशेष महत्त्व है । हरीतकी की तो यहाँ तक प्रशंसा की गयी है— ' कदाचित् कुप्यति माता नोदरस्था हरीतकी ' । अर्थात् माता तो अपने बालक पर कभी रुष्ट हो भी सकती है, परन्तु पेट के भीतर गयी हुई हरीतकी कभी कुपित नहीं होती । सचमुच यह इसके गुणों की वास्तविकता है, न कि अतिशयोक्ति । तद्वदामलकं शीतमम्लं पित्तकफापहम् । आमलक का वर्णन — आँवला के गुण भी हरीतकी ( हरड़ ) के समान ही होते हैं, परन्तु आँवला शीतवीर्य होता है तथा रस में अम्ल ( खट्टा ) होता है । यह पित्त तथा कफ का विनाशक होता है । कटु पाके हिमं केश्यमक्षमीषच्च तद्गुणम् ॥ १५८ ॥
बिभीतक का वर्णन —यह भी हरीतकी के समान गुण - धर्मों वाला होता है, किन्तु यह विपाक में कटु, केशों के लिए हितकर होता है, फिर भी हरीतकी तथा आँवला से कुछ कम गुण वाला होता है ॥ १५८ ॥
वक्तव्य — हरड़, बहेड़ा, आँवला का सम्मिलित नाम त्रिफला है । तन्त्रान्तर में कहा है — ' अभयैका प्रदातव्या द्वावेव तु बिभीतकौ । धात्रीफलानि चत्वारि त्रिफलेयं प्रकीर्तिता ' ॥ अर्थात् एक हरीतकी, दो बहेड़ा
और तीन आँवला – इनको इस अनुपात में मिलाकर त्रिफला का निर्माण होता है ।
इयं रसायनवरा त्रिफलाऽक्ष्यामयापहा । रोपणी त्वग्गदक्लेदमेदोमेहकफास्रजित् ॥ १५ ९ ॥
त्रिफला का वर्णन — उक्त तीनों फलों के विधिवत् मिश्रण का नाम ' त्रिफला ' है । यह उत्तम कोटि का रसायन है । यह नेत्ररोगों का विनाश करती है, व्रणरोपण, त्वचा में होने वाली सड़न, मेदोदोष, प्रमेह, कफज़ रोग एवं रक्तज रोगों का विनाश करती है ॥ १५ ९ ॥ सकेसरं चतुर्जातं त्वक्पत्रैलं त्रिजातकम् । पित्तप्रकोप तीक्ष्णोष्णं रूक्षं रोचनदीपनम् ॥ १६० ॥
त्रिजात का वर्णन – दालचीनी, तेजपत्ता और बड़ी इलायची इन तीन द्रव्यों के संयोग का नाम ' त्रिजात ' या ' त्रिजातक ' है । ये दोनों शब्द शास्त्रीय प्रयोगों में पाये जाते हैं । चतुर्जात का वर्णन — उक्त त्रिजात में नागकेसर द्रव्य को मिला देने से इसे ' चतुर्जात ' या ' चतुर्जातक ' कहा जाता है । उक्त योगों के गुण - धर्म — ये पित्तवर्धक, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रूक्ष, अग्नि को प्रदीप्त कर भोजन के प्रति रुचि को बढ़ाते हैं ॥ १६० ॥
रसे पाके च कटुकं कफघ्नं मरिचं लघु ।
मरिच ( कालीमरिच ) के गुण – यह रस एवं विपाक में कटु, कफनाशक तथा लघु होती है ।
श्लेष्मला स्वादुशीताऽऽर्द्रा गुर्वी स्निग्धा च पिप्पली ॥ १६१ ॥
सा शुष्का विपरीताऽतः स्निग्धा वृष्या रसे कटुः । स्वादुपाकाऽनिलश्लेष्मश्वासकासापहा सरा ॥
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१२० अष्टाङ्गहृदये न तामत्युपयुञ्जीत रसायनविधिं विना । पिप्पली के गुण – हरी पिप्पली कफकारक, स्वाद में मधुर, शीतवीर्य, देर में पचने वाली तथा कुछ स्निग्ध होती है । वही पिप्पली जब सूख जाती है तो उक्त गुणों से विपरीत हो जाती है । तब यह स्निग्ध, वीर्यवर्धक, रस में कटु और विपाक में मधुर होती है । यह वातनाशक, कफनाशक, श्वास तथा कास नाशक एवं सर ( मलभेदक ) है । ' पिप्पलीरसायन ' विधि के अतिरिक्त पिप्पली का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए ॥ १६१-१६२ ॥
वक्तव्य- — चरक में भी इसके अधिक सेवन का निषेध किया है । देखें I च.वि. १।१५ ।
नागरं दीपनं वृष्यं ग्राहि हृद्यं विबन्धनुत् ॥
रुच्यं लघु स्वादुपाकं स्निग्धोष्णं कफवातजित् । नागर ( सोंठ ) के गुण — यह जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, वीर्यवर्धक हृदय के लिए हितकर है । स्रोतों को शुद्ध करता है, रुचिवर्धक, लघु, विपाक कफ तथा वात नाशक है ॥ १६३ ॥
तद्वदार्द्रकमेतच्च त्रयं त्रिकटुकं जयेत् ॥ १६४ ॥
स्थौल्याग्निसदनश्वासकासश्लीपदपीनसान् । आर्द्रक के गुण - सोंठ के समान ही इसके भी गुण होते हैं । ये तीनों मिलकर ‘ त्रिकटु ' कहे जाते हैं । इसी को ' कटुत्रय ' या ' त्र्यूषण ' भी कहते हैं । त्रिकटु के गुण — यह स्थूलता ( मोटापा ), मन्दाग्नि, श्वास, कास, श्लीपद रोगों का विनाश करता है ॥१६४ ॥
चविकापिप्पलीमूलं मरिचाल्पान्तरं गुणैः ॥ १६५ ॥
१६३ ॥ है, मल को बाँधता है, में मधुर, स्निग्ध, उष्ण, ( सोंठ, मरिच, पीपल ) ( फीलपाँव ) तथा पीनस चव्य तथा पीपलामूल के गुण - चव्य तथा पीपलामूल ये दोनों द्रव्य गुणों में मरिच के गुणों से कुछ ही कम हैं अर्थात् लगभग वैसे ही गुणों वाले होते हैं ॥ १६५ ॥
चित्रकोऽग्निसमः पाके शोफार्शः कृमिकुष्ठहा । चित्रक के गुण — चित्रक के जड़ की छाल पाक में अग्नि के समान है । यह शोफ ( सूजन ), अर्श
( बवासीर ), क्रिमिरोग तथा कुष्ठरोग का विनाश करती है ।
पञ्चकोलकमेतच्च मरिचेन विना स्मृतम् ॥। १६६ ॥
गुल्मलीहोदरानाहशूलघ्नं दीपनं परम् । पञ्चकोल के गुण — यह ' पञ्चकोल ' के संयोग के बिना ही माना गया है अर्थात् इस योग में — पीपल, सोंठ, चव्य, पीपलामूल और चीता की छाल ये ५ द्रव्य हैं । यह गुल्म, प्लीहारोग, उदररोग, आनाह ( अफरा ) तथा शूलरोगों का विनाशक है और उत्तम अग्निदीपक है ॥ १६६ ॥
वक्तव्य — श्लोक १६१ से १६६ तक में वर्णित द्रव्यों में से मरिच को छोड़कर शेष कहे गये द्रव्यों के योग का नाम ' पञ्चकोल ' है, क्योंकि इस योग में इन द्रव्यों की मात्रा १ -१ कोल ( आधा - आधा तोला ) होती है । इस ‘ पञ्चकोल ' में यदि मरिच का संयोग कर दिया जाता है, तो इसे ' षडूषण ' कहते हैं अर्थात्
छः उष्ण द्रव्यों का योग ।
बिल्वकाश्मर्यतर्कारीपाटलाटिण्टुकैर्महत् ॥ १६७ ॥
जयेत्कषायतिक्तोष्णं पञ्चमूलं कफानिलौ । बृहत्पञ्चमूल के योग — बेल की गिरी, गम्भार, अरणी, पाढल तथा सोनापाठा की छाल — इन पाँच द्रव्यों के योग का नाम ' बृहत्पञ्चमूल ' है । यह रस में कषाय, तिक्त तथा उष्णवीर्य होता है । यह कफ एवं वात विकारों का विनाशक होता है ॥ १६७ ॥
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अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् १२१ ह्रस्वं बृहत्यंशुमतीद्वयगोक्षुरकैः स्मृतम् ॥ १६८ ॥
स्वादुपाकरसं नातिशीतोष्णं सर्वदोषजित् । लघुपञ्चमूल के गुण — वनभण्टा, कण्टकारी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी एवं गोखरू — इस योग को लघुपंचमूल कहते हैं । यह विपाक एवं रस में मधुर, समशीतोष्ण तथा सभी दोषों का शामक है ॥ १६८ ॥
बलापुनर्नवैरण्डशूर्पपर्णीद्वयेन तु ॥१६९ ॥
मध्यमं कफवातघ्नं नातिपित्तकरं सरम् । मध्यमपञ्चमूल गुण — बला, पुनर्नवा, रेड़ की जड़, माषपर्णी और मुद्गपर्णी – इन पाँच द्रव्यों के योग का नाम ‘ मध्यमपञ्चमूल ' है । यह कफ तथा वात दोष का नाशक तथा सर होता है । यह अधिक पित्तकारक नहीं होता है ॥ १६ ९ ॥ अभीरुवीराजीवन्तीजीवकर्षभकैः स्मृतम् ॥ १७० ॥
जीवनाख्यं तु चक्षुष्यं वृष्यं पित्तानिलापहम् । जीवनपञ्चमूल के गुण – शतावरी, मेदा, जीवन्ती, जीवक और ऋषभक — इन पाँच द्रव्यों के योग का नाम ' जीवनपञ्चमूल ' है । यह आँखों के लिए हितकर, वीर्यवर्धक, पित्तदोष तथा वातदोष का शमन करता है ॥ १७० ॥
तृणाख्यं पित्तजिद्दर्भकासेक्षुशरशालिभिः ॥ १७१ ॥
इत्यौषधवर्गः । तृणपञ्चमूल के गुण - दर्भ ( डाभ या कुश ), कास ( काँस ), ईख की जड़, शर ( सरपत ) और शालिधानों की जड़ — इनके योग का नाम ' तृणपञ्चमूल ' है । यह पित्तशामक होता है ॥ १७१ ॥
वक्तव्य — अष्टांगसंग्रह में दो पञ्चमूलों का संग्रह और मिलता है । यथा— — वल्लीपञ्चमूल — मेढ़ासिंगी, हल्दी, विदारीकन्द, सारिवा तथा गिलोय । दूसरा है कण्टकपञ्चमूल – गोखरू, शतावरी, कटसरैया, अहींस
तथा करौंदा । देखें — अ.सं.सू. १२।६१-६२ ।
शूकशिम्बीजपक्वान्नमांसशाकफलौषधैः । वर्गितैरन्नलेशोऽयमुक्तो नित्योपयोगिकः ॥ १७२ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थानेऽन्नस्वरूपविज्ञानीयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
उपसंहार - १. शूकधान्यवर्ग, २. शिम्बीधान्यवर्ग, ३. पक्वान्नवर्ग, ४. मांसवर्ग, ५. शाकवर्ग, ६. फलवर्ग और ७. औषधवर्ग — इस प्रकार के वर्गीकरण द्वारा आहारद्रव्यों का लेशमात्र ( अत्यन्त उपयोगी द्रव्यों का ) वर्णन यहाँ कर दिया गया है ॥ १७२ ॥
वक्तव्य- उक्त वर्गों के बीच - बीच में कुछ अन्य वर्गों का भी वर्णन इस अध्याय में हुआ है । यथा— ‘ फलवर्ग ’ के अन्त में ‘ लवणवर्ग ', इसके बाद ही ' हिंगु ' का वर्णन संहिताकार ने किया है । प्राचीन निघण्टु-ग्रन्थों में द्रव्यों का वर्गीकरण स्वतन्त्र रूप से देखा जाता है । इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय - सूत्रस्थान में अन्नस्वरूपविज्ञानीय नामक छठा अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥
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सप्तमोऽध्यायः अथातोऽन्नरक्षाध्यायं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः । अब हम यहाँ से अन्नरक्षा नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे । जैसा कि इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था । निरुक्ति — इस प्रकरण में ' अन्न ' शब्द पकाकर तैयार किये गये तथा खाये जाने योग्य पदार्थों का वाचक है । यथा — ‘ अन्नं भक्ते च भुक्ते स्यात् ' । इति मेदिनी । अन्यत्र इसके और भी अर्थ होते हैं । इसी अन्न की किस प्रकार और किसलिए रक्षा करनी चाहिए, यही इस अध्याय का प्रधान विषय है । यद्यपि आगे कहा जा रहा है कि राजा या महाराजा अपने घर के पास चिकित्सक के रहने की व्यवस्था करे । संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेत — च. सू. ११, २१, २६, च.शा. ८; च.सि. १२; सु.सू. २०, ३४; सु.शा. ४; सु.चि. २४; सु.क. १ तथा अ.सं. सू. ८ - ९ में देखें । राजा राजगृहासन्ने प्राणाचार्यं निवेशयेत् । सर्वदा स भवत्येवं सर्वत्र प्रतिजागृविः ॥१ ॥
प्राणाचार्य की नियुक्ति — राजा का कर्तव्य है कि वह अपने राजभवन के समीप शास्त्रज्ञ कुशल चिकित्सक को सदा रखे, उसकी नियुक्ति करे अथवा उसके रहने की व्यवस्था करे । ऐसा करने पर वह चिकित्सक राजा के आहार - विहार आदि के प्रति सदैव जागरूक ( सचेष्ट ) रहेगा ॥ १ ॥
अन्नपानं विषाद्रक्षेद्विशेषेण महीपतेः । योगक्षेमौ तदायत्तौ धर्माद्या यन्निबन्धनाः ॥२ ॥
चिकित्सक का कर्तव्य - राजा या श्रीमान् पुरुष जिस अन्न - पान का सेवन करें, उसमें कहीं से किसी प्रकार विष का प्रयोग तो नहीं हुआ है, इसकी परीक्षा कर उनकी रक्षा चिकित्सक करता रहे । क्योंकि राजा की विधिपूर्वक रक्षा होने पर ही उससे योगक्षेम ( जीविका एवं कुशलता ) तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का लाभ प्राप्त हो सकता है ॥ २ ॥
वक्तव्य- - उक्त श्लोक में ' अन्नपान ' एक प्रधान विषय कह दिया है, इसके अतिरिक्त वस्त्र, माला, गुलदस्ता, रूमाल, प्रसाधन सामग्री आदि पर भी चिकित्सक को ध्यान रखना चाहिए । विषकन्याओं का प्रयोग होता था, आज भी उसके प्रकारान्तर हैं, इनसे सावधान रहें । वैसे शत्रुओं से सभी को सदा सावधान रहना चाहिए । महर्षि चाणक्य ने तो इससे भी एक कदम आगे बढ़कर कहा है — ' न विश्वसेत् कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत् । कदाचित् कुपितं मित्रं सर्वं गुह्यं प्रकाशयेत् ' ॥ ( चा.नी. २।६ ) ओदनो विषवान् सान्द्रो यात्यविस्राव्यतामिव । चिरेण पच्यते पक्वो भवेत्पर्युषितोपमः ॥ ३ ॥
मयूरकण्ठतुल्योष्मा मोहमूर्च्छाप्रसेककृत् । हीयते वर्णगन्धाद्यैः क्लिद्यते चन्द्रिकाचितः ॥ ४ ॥
विषैले भात के लक्षण - विष मिला हुआ भात कुछ गीला- सा रहता है, ऐसा लगता है, मानो उसमें से माँड़ न निकाला गया हो । यदि पकते समय ही विष डाल दिया गया हो तो चावल देर से पकते हैं । यदि पके हुए भात में विष मिला दिया हो तो वह बासी भात जैसा दिखलायी देता है, उसमें से जो भाप निकलती है वह मोर के कण्ठ के समान वर्ण वाली ( नीली ) होती है । उस भाप के लगने से अथवा उस भात को खोलने से मोह, मूर्च्छा होती है तथा मुख से लार निकलने लगती है । वह विषैला भात अपने स्वाभाविक रूप तथा गन्ध वाला नहीं रह जाता है, उसमें गलन या सड़न - सी पैदा हो जाती है और उसमें चन्द्रिकाएँ जैसी दिखलायी पड़ती हैं॥३-४ ॥
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अन्नरक्षाध्यायः ७ ] सूत्रस्थानम् १२३ व्यञ्जनान्याशु शुष्यन्ति ध्यामक्वाथानि तत्र च । हीनाऽतिरिक्ता विकृता छाया दृश्येत नैव वा ॥ फेनोर्ध्वराजीसीमन्ततन्तुबुद्बुदसम्भवः । विच्छिन्नविरसा रागाः खाण्डवाः शाकमामिषम् ॥ ६ ॥
विषैले व्यञ्जनों के लक्षण - विष युक्त व्यंजन ( शाक - तरकारी आदि ) जल्दी सूख जाते हैं और उनके रस मलिन पड़ जाते हैं । उन रसों में यदि छाया दिखलायी भी पड़ती है, तो वह हीन अंगों वाली या अतिरिक्त अंगों वाली अथवा विकृत छाया दिखती है अथवा छाया नहीं दिखायी देती । उन व्यंजनों में विष के कारण ऊपर की ओर को झाग उठने लगती है, रेखाएँ दिखलायी देती हैं, बीच में फटा हुआ - सा, तन्तु ( ताँत ) जैसा, बुलबुले जैसे उठना – ये लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं । राग ( रायते ), खाडव ( खट्टे रस वाली सब्जियाँ ), शाक तथा मांसरसों के आकार कटे - फटे से दिखलायी देते हैं और खाने पर उनका रस विकृत जान पड़ता है॥५-६ ॥ नीला राजी रसे, ताम्रा क्षीरे, दधनि दृश्यते । श्यावाऽऽपीतासिता तक्रे, घृते पानीयसन्निभा ॥ मस्तुनि स्यात्कपोताभा, राजी कृष्णा तुषोदके । काली मद्याम्भसोः, क्षौद्रे हरित्तैलेऽरुणोपमा ॥ पाकः फलानामामानां पक्वानां परिकोथनम् । द्रव्याणामार्द्रशुष्काणां स्यातां म्लानिविवर्णते ॥ मृदूनां कठिनानां च भवेत्स्पर्शविपर्ययः । माल्यस्य स्फुटिताग्रत्वं म्लानिर्गन्धान्तरोद्भवः ॥ १० ॥
ध्याममण्डलता वस्त्रे, शदनं तन्तुपक्ष्मणाम् । धातुमौक्तिककाष्ठाश्मरत्नादिषु मलाक्तता ॥ ११ ॥
स्नेहस्पर्शप्रभाहानिः, सप्रभत्वं तु मृण्मये । विषैली वस्तुओं के विशिष्ट लक्षण – विषैले मांसरस में नीली रेखाएँ, दूध में लाल, दही में काली, पीली या सफेद मठा में, घी में पानी की जैसी, मस्तु ( दही के पानी तुषोदक ( काँजी ) में काली रेखाएँ, मद्य में तथा जल में काली रेखाएँ अरुण वर्ण ( ईंट के रंग जैसी ) रेखाएँ दिखलायी देती हैं । विष के प्रभाव से कच्चे फल शीघ्र पक जाते हैं, पके हुए फलों अथवा सूखे पदार्थ विषप्रयोग से मलिन तथा विकृत वर्ण के हो जाते हैं । में अन्तर पड़ जाता है । अथवा इसे इस प्रकार समझें- विष प्रयोग से मृदु स्पर्श वाले हो जाते हैं । माला में फूलों के अगले हिस्से फूट जाते हैं, आदि ) में कबूतर के वर्ण जैसी, , मधु में हरे वर्ण वाली, तेल में से सड़न पैदा हो जाती है । गीले कोमल एवं कठोर द्रव्यों के स्पर्श मृदु द्रव्य कठोर और कठोर द्रव्य वे मलिन पड़ जाते हैं और उनकी गन्ध विकृत हो जाती है । वस्त्रों पर सूखापन, चकत्ते पड़ जाना, उनके धागे या रोएँ ढीले पड़ जाते हैं या टूटने लगते हैं । सोना आदि धातुओं के आभूषणों, मोती आदि में; लकड़ी से बने हुए कुर्सी, टेबुल, चौकी, छड़ी आदि में, पत्थर से गढ़े गये पात्रों पर, हीरे आदि उत्तम रत्नों में मैलापन आ जाता है । उनमें से चिकनापन, स्पर्शप्रियता, प्रभा की हानि हो जाती है और मिट्टी के पात्रों में चमकीलापन आ जाता है ॥ ७-११ ॥ विषदः श्यावशुष्कास्यो विलक्षो वीक्षते दिशः ॥ १२ ॥
स्वेदवेपथुमांस्त्रस्तो भीतः स्खलति जृम्भते । विषदाता के लक्षण — इसका मुख गोरा होने पर भी काली छाया युक्त, चेहरा सूखा हुआ - सा कान्तिहीन हो जाता है । वह लज्जित होकर इधर - उधर दूर तक दिशाओं की ओर देखता रहता है अर्थात् वह अपराधी होने के कारण किसी से नजर मिला नहीं पाता । उसके शरीर में पसीना तथा कम्पन होने लगता है, वह घबड़ा जाता है, डर जाता है, चलने में उसके पैर लड़खड़ाने लगते हैं और बार - बार जँभाइयाँ लेता रहता है ॥ १२ ॥
वक्तव्य — विषदाता के कुछ और भी लक्षण होते हैं उन्हें चरक, सुश्रुत आदि में देखें । कभी - कभी पुलिस की धर - पकड़ से निरपराधी भी फँस जाते हैं और वे भी वैसी चेष्टा करने लगते हैं । अतः सावधानी से निर्णय करना चाहिए ।
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१२४ अष्टाङ्गहृदये प्राप्यान्नं सविषं त्वग्निरेकावर्तः स्फुटत्यति ॥। १३ ॥ शिखिकण्ठाभधूमार्चिरनर्चिर्वोग्रगन्धवान् विषैले अन्न की अग्नि परीक्षा —- यदि विषैला अन्न आग में डाला जाता है, तो उसकी लौ किसी एक ओर ही होती है । वह अन्न अत्यन्त फूटने ( चट - चटाने ) लगता है, मोर के गले के सदृश नीली लौ तथा ऐसा ही धुआँ निकलता है अथवा आग की लौ नहीं भी उठती और उसमें से अत्यन्त तीव्र दुर्गन्ध आती है॥१३ ॥
वक्तव्य — हमारे प्राचीन धर्माचार्यों ने भोजन करने के पहले कुछ ग्रास गाय, कुत्ता, कौआ आदि को देने का और कुछ अंश अग्नि में डालने का जो निर्देश दिया था, उसमें धार्मिक दृष्टिकोण के साथ - ही - साथ
एक रहस्य यह भी अवश्य रहा होगा । इसी से सम्बन्धित वर्णन आगे भी है ।
म्रियन्ते मक्षिकाः प्राश्य काकः क्षामस्वरो भवेत् ॥ १४ ॥
उत्क्रोशन्ति च दृष्ट्वैतच्छुकदात्यूहसारिकाः । हंसः प्रस्खलति, ग्लानिर्जीवञ्जीवस्य जायते ॥ चकोरस्याऽक्षिवैराग्यं, क्रौञ्चस्य स्यान्मदोदयः । कपोतपरभृद्दक्षचक्रवाका जहत्यसून् ॥१६ ॥
उद्वेगं याति मार्जारः, शकृन्मुञ्चति वानरः । हृष्येन्मयूरस्तद्दृष्ट्या मन्दतेजो भवेद्विषम् ॥ १७ ॥
॥ इत्यन्नं विषवज्ज्ञात्वा त्यजेदेवं प्रयत्नतः । यथा तेन विपद्येरन्नपि न क्षुद्रजन्तवः ॥१८ ॥
विषैले अन्न का प्रभाव - विषैले अन्न ( आहार ) को खाकर मक्खियाँ मर जाती हैं, कौए का स्वर क्षीण हो जाता है और ऐसे अन्न को देखते ही सुग्गा, दात्यूह ( जलमुर्गा या कौआ या चातक पक्षी ) तथा मैना — ये पक्षी चिल्लाने लगते हैं । हंस लड़खड़ाने लगते हैं, जीवंजीव ( कोषकार कहते हैं कि इसे देखने मात्र से विष का नाश हो जाता है ) पक्षी विष को देखकर दुःखी हो जाता है, चकोर की आँखों का रंग बिगड़ जाता है, क्रौञ्च को नशा चढ़ जाता है; कबूतर, कोयल, मुर्गा, चकवा ये मर जाते हैं, बिलाव घबड़ा जाता है, बन्दर देखते ही मलत्याग कर देता है तथा मोर विष को देखकर प्रसन्न हो जाता है और इसके देखने मात्र से विष का प्रभाव कम हो जाता है ( अतएव यह जहरीले साँपों को भी खा जाता है ) । इन परीक्षाओं से उस अन्न को विष के समान समझ कर छोड़ दे और उस अन्न को ऐसे स्थान पर डाल दे, जिससे क्षुद्र प्राणी भी उसे खाकर न मरें ॥ १४-१८ ॥ वक्तव्य —— प्रमादो धीमतामपि ' अर्थात् सूझ - बूझसम्पन्न लोग भी जब भूल कर बैठते हैं तो श्रीमान् पुरुषों की तो बात ही क्या कहना है! यदि किसी प्रकार विष प्रयोग हो ही गया हो तो उसका निराकरण इस प्रकार करें । स्पृष्टे तु कण्डूदाहोषाज्वरार्तिस्फोटसुप्तयः । नखरोमच्युतिः शोफः, सेकाद्या विषनाशनाः ॥१ ९ ॥ शस्तास्तत्र प्रलेपाश्च सेव्यचन्दनपद्मकैः । ससोमवल्कतालीसपत्रकुष्ठामृतानतैः ॥ २० ॥
स्पर्शज विष - चिकित्सा - विषैले पदार्थों ( माला, वस्त्र आदि ) का स्पर्श हो जाने पर खुजली, जलन, ऊष्मा ( गरम - गरम भाप जैसी निकलना ), ज्वर हो जाना, पीड़ा, उस स्थान पर फफोलों का निकलना, सुन्न पड़ जाना, नख तथा रोमों का उखड़ जाना, सूजन हो जाना आदि लक्षण हो जाते हैं । इस स्थिति में शीघ्र ही विषनाशक स्नान, अभ्यंग, अवगाहन तथा लेपों - प्रलेपों की व्यवस्था करें । यथा — खस, सफेद चन्दन, पद्मकाष्ठ ( पद्माख ), कायफल का छिलका ( इसकी नस्य भी बनायी जाती है ), तालीसपत्र, कूठ ( यह सुगन्धित द्रव्य है ), गिलोय तथा तगर के कल्क का लेप करें और क्वाथ को पिलायें अथवा इनके क्वाथों का उन अवयवों में सेचन करें ॥ १ ९ -२० ॥ लाला जिह्वौष्ठयोर्जाड्यमूषा चिमिचिमायनम् । दन्तहर्षो रसाज्ञत्वं हनुस्तम्भश्च वक्त्रगे ॥ २१ ॥
सेव्याद्यैस्तत्र गण्डूषाः सर्वं च विषजिद्धितम् ।