श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 141–150
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 141–150
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अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् १०५ वक्तव्य — करीर या करील को ' क्रकरीपत्र ' भी कहा गया है । यह अन्य वृक्षों की भाँति बहुत पत्तों वाला नहीं होता, तथापि इसकी नवीन शाखाओं में विरल पत्ते होते हैं । निघण्टुकारों ने इसे ' मरुभूरुह ’ कहा है । इसकी कली तथा फलों का अचार भी बनता है । औषधीय उपयोग में इसकी कली, फल एवं छाल लिये जाते हैं । मुञ्जातक — एक कन्द - विशेष का नाम है, इसके गुण राजनिघण्टु में देखें । इसके अभाव में तालमज्जा का प्रयोग किया जाता है । सु.सू. ३ ९ १ ९ में कफनाशक द्रव्यों में इसका भी परिगणन किया
गया है ।
विदारी वातपित्तघ्नी मूत्रला स्वादुशीतला ॥ ८५ ॥
जीवनी बृंहणी कण्ठ्या गुर्वी वृष्या रसायनम् । विदारी ( बिलाई ) कन्द— यह वात - पित्तनाशक, मल - मूत्र को निकालने वाला, स्वाद में मधुर, शीतवीर्य, जीवनीय शक्ति को देने वाला, स्वास्थ्यवर्धक, कण्ठ के लिए हितकर, पाचन में गुरु, वीर्यवर्धक तथा रसायन होता है ॥ ८५ ॥
वक्तव्य — इसकी सुदीर्घ लताएँ होती हैं, उनकी जड़ों में गाँठ के रूप में यह कन्द पाया जाता है । छिलका उतारने पर दूध जैसा सफेद द्रव इसमें से निकलता है । यह खाने में आरम्भ में अत्यन्त मधुर किन्तु अन्त में कुछ कसैलापन इसमें पाया जाता है । पहाड़ी क्षेत्रों में यह जाड़े का मेवा है । वर्षभर के बाद इनका
स्वाद वैसा नहीं रह जाता ।
चक्षुष्या सर्वदोषघ्नी जीवन्ती मधुरा हिमा ॥ ८६ ॥
जीवन्ती का शाक — यह दृष्टि के लिए हितकर, त्रिदोषनाशक, मधुर तथा शीतवीर्य है ॥ ८६ ॥
कूष्माण्डतुम्बकालिङ्गकर्कार्वेर्वारुतिण्डिशम् । तथा त्रपुसचीनाकचिर्भटं कफवातकृत् ॥ ८७ ॥
भेदि विष्टम्भ्यभिष्यन्दि स्वादुपाकरसं गुरु । कूष्माण्ड आदि का वर्णन कूष्माण्ड ( कोहड़ा, पेठा ), तुम्ब ( जिसकी साधु लोग तुम्बी या कमण्डलु बनाते हैं ), कालिंग ( तरबूज ), कर्कारु ( खरबूजा ), उर्वारु ( ककड़ी या खीरा ), ( बड़ा खीरा ), चीनाक ( चीना ककड़ी ) और चिर्भट ( फूट ) – ये सभी कफकारक विष्टम्भी, अभिष्यन्दी, विपाक तथा रस में मधुर एवं गुरु होते हैं ॥ ८७ ॥
वल्लीफलानां प्रवरं कूष्माण्डं वातपित्तजित् ॥ ८८ ॥
बस्तिशुद्धिकरं वृष्यम्-कूष्माण्ड ( कोहड़ा ) के गुण – लताओं में फलने वाले उक्त सभी फलों गया है । यह वात तथा पित्त विकार का शमन करता है, बस्ति ( मूत्राशय ) को को बढ़ाता है ॥८८ ॥।
—त्रपुसं त्वतिमूत्रलम् । त्रपुस का वर्णन — पुस ( बड़ा खीरा ) कूष्माण्ड आदि से अधिक मूत्रकारक तुम्बं रूक्षतरं ग्राहि कालिङ्गैर्वारुचिर्भटम् ॥ ८ ९ ॥ बालं पित्तहरं शीतं विद्यात्पक्वमतोऽन्यथा । तिण्डिश ( टिंडे ), त्रपुस , वातकारक, मलभेदक, में कूष्माण्ड उत्तम माना शुद्ध करता है और वीर्य होता है । तुम्ब या तुम्बा ( गोल लौआ या लौकी ) – तरबूज, ककड़ी, फूट ये सब अत्यन्त रूक्ष तथा मल को बाँधने वाले होते हैं । ऊपर कहे गये फल जब तक बाल ( मुलायम ) रहते हैं तब तक इनका गुण पित्तनाशक होता है और ये शीतवीर्य होते हैं । जब ये पक जाते हैं, तब पित्तकारक एवं उष्णवीर्य हो जाते हैं ॥ ८ ९ ॥
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१०६ अष्टाङ्गहृदये शीर्णवृन्तं तु सक्षारं पित्तलं कफवातजित् ॥ ९ ० ॥ रोचनं दीपनं हृद्यमष्ठीलाऽऽनाहनुल्लघु । शीर्णवृन्त - फलशाक — शीर्णवृन्त ( जो शाकफल अपने डण्ठल से अलग हो गया हो ) शाक कुछ खारापन, पित्तकारक, कफदोष तथा वातदोष का विनाशक, रुचिकारक, जठराग्निदीपक तथा हृदय के लिए हितकर होता है । यह वाताष्ठीला तथा आनाह ( अफरा ) रोगों का विनाशक एवं लघु होता है ॥ ९ ० ॥ वक्तव्य — यहाँ ‘ शीर्णवृन्त ' शब्द से भलीभाँति पके हुए फल का ग्रहण करना चाहिए । जैसा कि सुश्रुत ने कहा है — ‘ शुक्लं लघूष्णं सक्षारं दीपनं बस्तिशोधनम् ' ( सु.सू. ४६।२१३ ) श्री अरुणदत्त अपनी व्याख्या में कहते हैं — ‘ शीर्णवृन्तं ' = कर्पूरम् । शीर्णवृन्त — यहाँ इस नाम से एक शाक - विशेष का वर्णन किया गया है । ' वृन्त ' शब्द का प्रयोग — फल तथा वृक्ष या लता से जुटे हुए भाग को डण्ठी या डण्ठल कहते हैं । शीर्ण का अर्थ है — गला हुआ । प्रायः सब फलों के वृन्त पकने पर गल या झड़ जाते हैं, किन्तु लाल कुम्हड़ा या सीताफल या कद्दू नाम का एक लताफल ऐसा होता है, जिसका वृन्त पकने पर भी अलग नहीं होता । इसे अंग्रेजी में Red gourd कहते हैं, इसका अर्थ लाल कुम्हड़ा होता है । वाग्भट ने श्लोक ८८ में जिस कूष्माण्ड का वर्णन किया है,
वह ' पेठे की मिठाई ' वाला है ।
मृणालबिसशालूककुमुदोत्पलकन्दकम् ॥९ १ ॥
नन्दीमाषककेलूटशृङ्गाटककसेरुकम् । क्रौञ्चादनं कलोड्यं च रूक्षं ग्राहि हिमं गुरु ॥ ९ २ ॥ मृणाल आदि का वर्णन - मृणाल ( कमलनाल ), बिस ( कमल की जड़ = भसींडा ), शालूक ( कमलकन्द ), कुमुद ( कुई ) एवं उत्पल के कन्द, नन्दी ( तुण्डिकेरी ), माषक ( वास्तुल ), केलूट ( किस्मक नामक उदुम्बर भेद ), शृंगाटक ( सिंघाड़ा ), कसेरू, क्रौञ्चादन ( मृणाल, पिप्पली, धेञ्चुलक, चिञ्चोटक ) और कलोड्य ( पद्मबीज ) – ये सभी द्रव्य रूक्ष, ग्राही ( मल को बाँधने वाले ), शीतवीर्य एवं गुरु ( देर से पचने वाले ) होते हैं ॥ ९ १ - ९ २ ॥
कलम्बनालिकामार्षकुटिञ्जरकुतुम्बकम् । चिल्लीलट्वाकलोणीकाकुरूटकगवेधुकम् ॥ ९ ३ ॥
जीवन्तझुञ्झ्वेडगजयवशाकसुवर्चलाः । आलुकानि च सर्वाणि तथा सूप्यानि लक्ष्मणम् ॥ ९ ४ ॥ स्वादु रूक्षं सलवणं वातश्लेष्मकरं गुरु । शीतलं सृष्टविण्मूत्रं प्रायो विष्टभ्य जीर्यति ॥ ९ ५ ॥ स्विन्नं निष्पीडितरसं स्नेहाढ्यं नातिदोषलम् । कलम्ब आदि का वर्णन – कलम्ब ( कदम्ब या करेमू ), नालिका ( नालीशाक ), मार्ष ( मरसा ), कुटिञ्जर ( ताम्रमूलक या तन्दुलक ), कुतुम्बक ( द्रोणपुष्पी - गूमा ), चिल्ली ( क्षारपत्रक शाक, लाल बथुआ ), लट्वाक ( गुग्गुलशाक ), लोणीका ( लोणार, सलूनक, कुलफा ), कुरूटक ( स्थितिवारक, शितिवारी ), गवेधुक ( तृणधान्य ), जीवन्त ( जीवन्ती ), झुञ्झु ( चुच्चू ), ऐडगज ( चकवड़ ), यवशाक ( छोटे पत्तों वाली चिल्ली या जौ के कोमल पत्ते ), सुवर्चल ( हुलहुल ), सभी प्रकार के आलू, सभी प्रकार के वे अन्न जिनकी दालें बनायी जाती हैं ( जैसे — चना, अरहर, मूँग, उड़द, मसूर, कुलथी आदि ) और लक्ष्मण ( मुलेठी के पत्ते ) —उपर्युक्त सभी शाक स्वाद में मधुर, रूक्ष, लवणरस युक्त, वात तथा कफ कारक, देर में पचने वाले, शीतवीर्य, मल - मूत्र निकालने वाले और प्रायः ये देर से पचते हैं । यदि इन्हें उबाल कर इनका रस निचोड़ कर घी या तेल में भलीभाँति भूँज लिया जाता है, तो ये दोषकारक नहीं होते ॥ ९ ३ - ९ ५ ॥ लघुपत्रा तु या चिल्ली सा वास्तुकसमा मता ॥ ९ ६ ॥ चिल्लीशाक का वर्णन — चिल्ली नामक शाक दो प्रकार का होता है —१. बड़े पत्तों वाला तथा २. • छोटे पत्तों वाला । इनमें से दूसरे के गुण - धर्म बथुआ के समान होते हैं ॥ ९ ६ ॥
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अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् १०७ तर्कारीवरुणं स्वादु सतिक्तं कफवातजित् । तर्कारी आदि शाक का वर्णन - तर्कारी ( अरणी ) तथा वरणा के कोमल पत्तों एवं फलों का शाक स्वाद में मधुर, कुछ तीतापन युक्त होता है । ये दोनों कफदोष तथा वातदोष नाशक होते हैं । वर्षाभ्वौ कालशाकं च सक्षारं कटुतिक्तकम् ॥ ९ ७ ॥ दीपनं भेदनं हन्ति गरशोफकफानिलान् । पुनर्नवा एवं कालशाक — दोनों प्रकार की ( छोटी तथा बड़ी ) पुनर्नवाओं का तथा कालशाक ( काला मरसा का शाक ) कुछ खारा, स्वाद में कुछ कटु एवं कुछ तिक्त रस वाला होता है । ये दोनों शाक जठराग्नि को प्रदीप्त करते ( सुलगाते ) हैं, मल का भेद करके उसे निकालते हैं । दूषीविष, शोफ ( सूजन ), कफदोष तथा वातदोष का विनाश करते हैं ॥ ९ ७ ॥ दीपनाः कफवातघ्नाश्चिरिबिल्वाङ्कुराः सराः ॥ ९ ८ ॥ करञ्ज का शाक — करंज के कोमल पत्तों या अंकुरों का शाक जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला कफ एवं वात नाशक होता है और मल की रुकावट को दूर करता है॥९ ८ ॥ शतावर्यङ्कुरास्तिक्ता वृष्या दोषत्रयापहाः । शतावरी के अंकुरों का शाक — यह स्वाद में हलका तिक्तरस वाला, वीर्यवर्धक तथा तीनों दोषों का विनाशक होता है । वक्तव्य — शतावरी या शतावर वृष्य ( वीर्यवर्धक ) औषधों में उत्तम है । नैनीताल तथा अलमोड़ा आदि पर्वतीय क्षेत्रों में यह पर्याप्त रूप में पायी जाती है । इसके अंकुरों को पर्वतीय भाषा में ' कैंरुआ ' कहा जाता है । ये चैत्रमास के अन्तिम दिनों से आषाढ़ तक अधिक मात्रा में निकलते रहते हैं । आरम्भ में ये दो - चार दिनों तक सुकोमल होते हैं । इनका संग्रह कर छोटे - छोटे टुकड़े काटकर सब्जी बना ली जाती है । इसे रोटी के साथ खाया जाता है । यह पौष्टिक तथा रुचिवर्धक होती है । यह अंकुरशाक है । रूक्षो वंशकरीरस्तु विदाही वातपित्तलः ॥ ९९ ॥
वंशकरीर का शाक — बाँस के नये अंकुर का शाक - शतावरी के अंकुरों की भाँति बाँस के भी अंकुर निकलते हैं, इनका भी शाक, आचार तथा मुरब्बा बनाया जाता है । नेपाल में इसके आचार का अत्यन्त प्रचार है, वहाँ इसे ' तामा ' कहते हैं । इसके गुण – यह रूक्ष, विदाहकारक तथा वातपित्तकारक होता है॥९९ ॥
पत्त्रो दीपनस्तिक्तः प्लीहार्शःकफवातजित् । पत्तूर ( मछेछी ) का शाक — यह अग्निदीपक, स्वाद में तिक्त, कफ तथा वात दोष का नाशक
है । यह प्लीहाविकार तथा अर्शोरोग को शान्त करता है ।
कृमिकासकफोत्क्लेदान् कासमर्दो जयेत्सरः ॥ १०० ॥
कासमर्द ( कसौंदी ) का शाक — यह क्रिमिरोग, कासरोग, कफज विकार तथा उत्क्लेद ( शरीर
में उत्पन्न गीलेपन ) को जीत लेता है । यह मलभेदक है ॥ १०० ॥
रूक्षोष्णमम्लं कौसुम्भं गुरु पित्तकरं सरम् । कुसुम्भ का शाक — कुसुम्भ ( कुसुम ) के पत्तों का शाक रूक्ष, उष्णवीर्य, अम्ल, गुरु ( देर से पचने
वाला ), पित्तकारक तथा सर ( रेचक ) होता है ।
गुरूष्णं सार्षपं बद्धविण्मूत्रं सर्वदोषकृत् ॥ १०१ ॥
सरसों के पत्तों का शाक — यह पाचन में गुरु, उष्णवीर्य, स्वाद में कुछ अम्ल, पाचन में गुरु, मल - मूत्र की प्रवृत्ति में रुकावट डालने वाला तथा त्रिदोषकारक होता है ॥ १०१ ॥
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१०८ अष्टाङ्गहृदये वक्तव्य — साहित्यदर्पणकार श्रीविश्वनाथ ने भी सर्षपशाक की प्रशंसा की है, परन्तु यह भी कह दिया है कि इसे ग्राम्य लोग बड़े चाव से खाते हैं— ' तरुणं सर्षपशाकं ' इत्यादि । इसे पंजाब में बड़े आदर के साथ खाया जाता है, अन्यत्र भी लोग खाते ही हैं । यद्वालमव्यक्तरसं किञ्चित्क्षारं सतिक्तकम् । तन्मूलकं दोषहरं लघु सोष्णं नियच्छति ॥ १०२ ॥
गुल्मकासक्षयश्वासव्रणनेत्रगलामयान् । स्वराग्निसादोदावर्तपीनसांश्च — बालमूली का शाक — जो मूली कच्ची ( रूढ़ न हुई हो ) वह अव्यक्त रस वाली या कुछ खारापन तथा तीतापन लिये होती है । वह तीनों दोषों का नाश करती है, लघु तथा कुछ उष्णवीर्य वाली होती है । मूली गुल्म, कास, क्षय, श्वास, व्रण, नेत्रविकार, कण्ठविकार ( स्वरभेद आदि ), ज्वररोग, अग्निमान्द्य, उदावर्त तथा पीनस रोगों को नष्ट करती है ॥ १०२ ॥
- महत्पुनः ॥ १०३ ॥
रसे पाके च कटुकमुष्णवीर्यं त्रिदोषकृत् । गुर्वभिष्यन्दि च— वृद्धमूली का शाक — बड़ी मूली रस एवं विपाक में कटु, उष्णवीर्य, त्रिदोषकारक, देर में पचने वाली तथा अभिष्यन्दी होती है ॥ १०३ ॥
— स्निग्धसिद्धं तदपि वातजित् ॥ १०४ ॥
स्नेहसिद्ध मूली का शाक – यदि बड़ी मूली को घी में भलीभाँति पका लिया जाय तो यह वातनाशक होती है ॥ १०४ ॥
वक्तव्य — आकृतिभेद से मूली दो प्रकार की होती है— १. गोल तथा २. लम्बी । लम्बी मूली भी छोटी - बड़ी भेद से दो प्रकार की होती है – १. लघुमूलक और २. नेपालमूलक । ये भी नयी एवं पुरानी भेद से पुनः दो प्रकार की होती है । गर्मियों में मिलने वाली मूली स्वाद में कटु होती है, जाड़ों में होने वाली मूली मधुर होती है । इसे नमक - मिरच लगाकर खाया जाता है । कच्ची मूली का शाक भी बनाया जाता है और सलाद के रूप में कच्चा भी खाया जाता है । इसी के भेद हैं— गाजर, चुकन्दर, सलजम आदि । मौसम में मूली को काट कर सुखा लिया जाता है । बाद में पानी में भिगाकर इसका भी शाक के लिए प्रयोग होता है । यह सब वर्णन किसी भी जाति की बालमूली का है । जब यह रूढ़ हो जाती है, इसके भीतर जाली पड़ जाती है और बाहर का भाग कड़ा हो जाता है तब यह अग्राह्य हो जाती है । इसके विशेष गुण - धर्मों के लिए देखें— सु. सू. ४६।२४० - २४३ । सुखाये सभी शाक विष्टम्भी तथा वातकारक होते हैं, केवल सुखाए हुए मूली के शाक को छोड़कर । वातश्लेष्महरं शुष्कं सर्वम्— सूखी मूली का शाक- -सुखायी गयी सभी प्रकार की मूलियाँ वात एवं कफ नाशक होती हैं । - आमं तु दोषलम् ।
कच्ची मूली का शाक— सभी प्रकार की कच्ची मूलियाँ वात आदि दोषकारक होती हैं ।
कटूष्णो वातकफहा पिण्डालुः पित्तवर्धनः ॥ १०५ ॥
पिण्डालु नामक कन्द का शाक- -यह कुछ कटु, उष्णवीर्य तथा पित्त को बढ़ाने वाला है ॥ १०५ ॥
वक्तव्य — सुश्रुत ने पिण्डालु का जो वर्णन किया है, वह उक्त वाग्भटोक्त गुण - धर्मों के विपरीत है । देखें — ‘ पिण्डालुकं कफकरं गुरु वातप्रकोपणम् ' । ( सु.सू. ४६।३०४ )
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अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् १० ९ आयुर्वेद में ‘ आलुक ' नाम से अनेक कन्दों का ग्रहण होता है । जैसे —१. काष्ठालुक ( कठालू ) । २. शंखालुक — यह सफेदी लिये होता है, ऐसा लगता है कि बाजारों में बिकने वाला यही शंखालू ही आलू है । ३. हस्त्यालुक — बड़े - से - बड़े आकार का आलू, इसके दर्शन प्रदर्शनियों में किये जा सकते हैं । ४. पिण्डालुक — हमारी मान्यता के अनुसार यह वही है, जिसका विवेचन हमने इसी प्रकरण में आगे किया है । जो इसे ‘ सुथनी ' मानते हैं, उन्हें इसका समावेश ' मध्वालुक ' में अथवा ' रक्तालुक ' में करना चाहिए, क्योंकि यह लाल तथा सफेद भेद से दो प्रकार का पाया जाता है । ५. मध्वालुक — यह आकृति से दो प्रकार का होता है—– १. छोटा और २. बड़ा । इनमें छोटा छीलने पर भीतर से सफेद और बड़ा छीलने पर रक्ताभ होता है । हिन्दी में इन्हें छोटी सुथनी तथा बड़ी सुथनी कहते हैं । ६. रक्तालुक — यह भी वर्णभेद से दो प्रकार का होता है । १. जंगली सफेद और २. घर में लगाया हुआ लाल रंग का । जंगली अधिक - से - अधिक १ या २ इंच गोलाई में मोटा, घरेलू ५ या ६ इंच मोटा या इससे भी अधिक । इसे तरूड़ या रतालू भी कहते हैं । इन्हीं कन्दों में एक शकरकन्द भी है । यह शक्कर की भाँति खाने में मीठा होता है, अतएव इसे ‘ शकरकन्द ' कहते हैं । नैनीताल तथा अलमोड़ा आदि जिलों में ' पिण्डालु ' नाम से सुप्रसिद्ध एक कन्द मिलता है, जिसका शाक क्षेत्रीय लोगों को अतिप्रिय है । वहाँ इसकी खेती भी होती है । मैदानी स्थानों में इसे ' अरुई ' या ' घुइयाँ ’ कहते हैं । ये पिण्डालू या पिनालू के उपकन्द हैं । पिण्डालू के जिस मूल अवयव को यहाँ बण्डा कहा जाता है, उसे पर्वतीय क्षेत्रों में ' गडेरी ' कहते हैं । हमारे विचार से सुश्रुत ने जिस ' पिण्डालु ' के गुण - धर्मों का वर्णन किया है, वह यही ' पिण्डालु ' कन्द है । कुठेरशिग्रुसुरससुमुखासुरिभूस्तृणम् । फणिज्जार्जकजम्बीरप्रभृति ग्राहि शालनम् ॥१०६ ॥
विदाहि कटु रूक्षोष्णं हृद्यं दीपनरोचनम् । दृक्शुक्रकृमिहृत्तीक्ष्णं दोषोत्क्लेशकरं लघु ॥ १०७ ॥
कुठेरक आदि शाक — कुठेरक ( वनतुलसी – बवई ), शिग्रु ( सहजन की फली ), सुरस ( काली तुलसी ), सुमुखा ( तुलसीभेद ), आसुरि ( राई के पत्ते ), भूस्तृण, फणिज्झक, अर्जक, जम्बीर आदि के पत्तों के शाक ग्राही ( मल को बाँधने वाले ) तथा उत्तम होते हैं । यह विदाहकारी, स्वाद में कटु, रूक्ष, उष्णवीर्य, हृदय के लिए हितकारी, जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाले तथा रुचिकारक होते हैं । ये दृष्टिनाशक, शुक्र तथा क्रिमि नाशक होते हैं । ये गुणों में तीक्ष्ण, वात आदि दोषों को उभाड़ने वाले तथा पाचन में लघु होते हैं ॥ १०६-१०७ ॥ वक्तव्य — ‘ फणिज्जार्जकजम्बीरप्रभृति ' इस ' प्रभृति ' शब्द से अष्टांगसंग्रह अध्याय ७ में कहे गये — धान्य, तुम्बुरु, शैलेय, यवानी, शृंगवेर, पर्णाश, गुंजन, अजाजी, कण्डीर, जलपिप्पली, खराश्वा, कालमालिका, दीप्यक, क्षवकृत्, द्वीपि और वस्तगन्धा का ग्रहण कर लेना चाहिए । अष्टांगहृदय में उक्त द्रव्यों को ' हरितकवर्ग ' में गिना है । हिध्माकासविषश्वासपार्श्वरुक्पूतिगन्धहा । सुरसः— सुरसा का शाक — हिचकी, कास, विषविकार, श्वास, पार्श्वशूल ( पसलियों में पीड़ा का होना )
तथा मुख की दुर्गन्ध का विनाश करता है ।
—सुमुखो नातिविदाही गरशोफहा ॥ १०८ ॥
सुमुख नामक तुलसी का शाक- -यह अधिक विदाहकारक नहीं होता है । दूषीविष तथा शोथरोग का विनाश करता है ॥ १०८ ॥
आर्द्रिका तिक्तमधुरा मूत्रला न च पित्तकृत् । हरा धनिया का शाक — यह थोड़ा तीता तथा मधुर होता है । मूत्रल तथा पित्तकारक नहीं होता ।
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११० अष्टाङ्गहृदये लशुनो भृशतीक्ष्णोष्णः कटुपाकरसः सरः ॥ १० ९ ॥ हृद्यः केश्यो गुरुर्वृष्यः स्निग्धो रोचनदीपनः । भग्नसन्धानकृद्वल्यो रक्तपित्तप्रदूषणः ॥ ११० ॥
किलासकुष्ठगुल्मार्शोमेहक्रिमिकफानिलान् । स हिध्मापीनसश्वासकासान् हन्ति रसायनम् ॥
लशुनकन्द का शाक — इसका कन्द विशेष करके तीक्ष्ण एवं उष्णवीर्य होता है । इसका विपाक कटु होता है । यह सर है, हृदय के लिए तथा केशों के लिए हितकर है, पचने में गुरु, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, दीपन, पाचन, अस्थिभग्न को जोड़ने वाला, बलवर्धक, रक्त एवं पित्त को दूषित करने वाला है । यह किलास ( श्वित्र ), कुष्ठ, गुल्म, अर्श, प्रमेह, क्रिमिरोग, कफविकार, वातविकार, हिचकी, पीनस, श्वास और कास
रोग का विनाश करता है । यह रसायन है ॥ १० ९ -१११ ॥
वक्तव्य — यहाँ लहसुन के केवल कन्द के गुण दिये गये हैं । प्रसंगवश उसके अन्य अंगों का वर्णन भी प्रस्तुत है — इसके पत्र खारे तथा मधुर होते हैं और इसका मध्यभाग अधिक मधुर एवं पिच्छिल होता है । कभी - कभी इसके मध्यभाग में भी लशुनकन्द पाये जाते हैं, औषध में इनका भी महत्त्वपूर्ण स्थान है । अष्टांगहृदय - उत्तरस्थान ( ३ ९।१११-१२९ ) में इसकी विस्तृत रसायनविधि देखें । इसके अतिरिक्त ' काश्यपसंहिता ' में भी इसके विविध कल्पों का अवलोकन करें । पलाण्डुस्तद्गुणन्यूनः श्लेष्मलो नातिपित्तलः । पलाण्डु ( प्याज ) का शाक —— यह लहसुन से कुछ कम गुणों वाला होता है । यह कफकारक है
तथा पित्तकारक कम होता है ।
कफवातार्शसां पथ्यः स्वेदेऽभ्यवहृतौ तथा ॥ ११२ ॥
तीक्ष्णो गृञ्जनको ग्राही पित्तिनां हितकृन्न सः । गृञ्जनक का शाक — यह कफविकार, वातविकार तथा अर्शोरोग में हितकर होता है । व्रणशोथ आदि पर इसका लेप कर के स्वेदन किया जाता है एवं शाक बनाकर इसे खाया भी जाता है । गाजर का शाक तीक्ष्ण गुणवाला, मल को बाँधने वाला तथा यह पित्तविकार वालों के लिए हितकर नहीं है ॥ ११२ ॥
वक्तव्य — वास्तव में उक्त ११२ वें पद्य को ' पलाण्डु ' तथा ' । इस प्रकार दो पंक्तियों में पूरा होना चाहिए था । ऐसा मत श्री अरुणदत्त एवं श्रीचन्द्रनन्दन का था, किन्तु श्रीहेमाद्रि का कथन है कि ये गुण - -धर्म ध पलाण्डु के नहीं अपितु ' गृञ्जन ' के हैं । अतः उक्त दो पंक्तियों को यहाँ एक साथ रखा है । वास्तव में स्वेदन के लिए ' पलाण्डु ' तथा गृञ्जन दोनों का ही प्रयोग होता है । देखें — च.सू. २७।१७४ । दीपनः सूरणो रुच्यः कफघ्नो विशदो लघुः ॥ ११३ ॥
विशेषादर्शसां पथ्यः— सूरण का शाक- -यह अग्निदीपक, रुचिकारक, कफनाशक, विशद ( पिच्छिलतानाशक ), लघु ( शीघ्र पचने वाला ), विशेष करके यह अर्शरोगियों के लिए हितकर होता है ॥ ११३ ॥
वक्तव्य — अर्शोनाशक ‘ शूरणमोदक ' योग, देखें — भैषज्यरत्नावली - अर्शोरोगाधिकार में —१. स्वल्प-शूरणमोदक, २. बृंहत्शूरणमोदक तथा अन्य अनेक योग । सूरण- परिचय -यह दो प्रकार का होता है — एक वह जिसे खा लेने से मुख तथा गले में काँटे जैसे चुभते - से प्रतीत होते हैं, दूसरा वह जो पहले की तुलना में कम कष्टकारक होता है । पाककर्मकुशल व्यक्ति दोनों की सब्जी सूखी अथवा रसेदार बनाते हैं, बड़े शौक से खायी भी जाती है । वे इसके टुकड़ों को इमली ( किसी प्रकार के अम्ल में ), चूना या फिटकिरी आदि में डालकर उबाल कर घी में भलीभाँति तलकर इसका पाक किया करते हैं । कुछ टीकाकारों ने ' सूरण ' को ही भूकन्द माना है । ' कन्द ' शब्द की दृष्टि से उनका सोचना उचित ही है, किन्तु ' सूरण ' के उक्त गुणों के बाद उसे ' अतिदोषज ' कहना कहाँ तक युक्तिसंगत होगा?
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अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् १११ — भूकन्दस्त्वतिदोषलः । भूकन्द का शाक — यह अत्यन्त दोषकारक तथा दोषवर्धक होता है । वक्तव्य — भूकन्द के सम्बन्ध में विद्वानों के मतभेद — कोई इसे ‘ जिमीकन्द ’, दूसरे विद्वान् इसे ‘ भूस्फोटाऽऽख्यः प्रावृड् उद्भवः ' अर्थात् यह संस्वेद शाक है । हिन्दी में इसे – भुँईछत्ता, खुमी आदि कहते हैं । अंग्रेजी में ‘ Mushroom ' कहते हैं । यह वर्षाऋतु में जोरदार वर्षा होने पर सहसा पैदा हो जाता है । इसका आकार छाता का जैसा होता है, रंग सफेद या बादामी सफेद होता है । यह भक्ष्य ( खाने योग्य )
तथा अभक्ष्य ( जहरीला ) भेद से दो प्रकार का होता है ।
पत्रे पुष्पे फले नाले कन्दे च गुरुता क्रमात् ॥ ११४ ॥
शाकों में उत्तरोत्तर गुरुता — पत्रशाकों से पुष्पशाक गुरु, इनसे अधिक गुरु फलशाक, फलशाकों से भी अधिक गुरु नालशाक ( सरसों के नाल = गन्दल ), इनसे भी अधिक गुरु कन्दशाक होते हैं ॥ ११४ ॥
वक्तव्य — श्रीहेमाद्रि उक्त श्लोक का क्रम ' पुष्पे पत्रे ' इस प्रकार चाहते हैं, क्योंकि सुश्रुत ने एक तो ‘ नालशाक ’ का ग्रहण नहीं किया है और दूसरा जहाँ श्रीहेमाद्रि ' लघवः ' पाठ को उद्धृत करते हैं, वहाँ सुश्रुत ने ‘ गुरवः ’ पाठ दिया है, जो सर्वथा युक्तियुक्त है । देखें— सु.सू. ४६।२४३ । ' गुरवः ' के स्थान पर ' लघवः ' शब्द का छप जाना सम्पादकीय प्रमाद प्रतीत होता है । वरा शाकेषु जीवन्ती सार्षपं त्ववरं परम् । इति शाकवर्गः । उत्तम - अधम- निर्णय — शाकवर्ग में परिगणित शाकों में जीवन्ती ( डोड़ी ) शाक उत्तम तथा सरसों की पत्तियों एवं नाल का शाक अधम माना गया है । वक्तव्य — शाकवर्ग के आरम्भ में छः प्रकार के शाकों का परिगणन किया गया था । तदनुसार यहाँ कहा गया ‘ भूकन्द ' संस्वेदज शाकों में गिना जाता है । संक्षेप में शाक - परिचय – १. पत्रशाक — बथुआ, पोई, मरसा, चौलाई आदि । २. पुष्पशाक — गोभी, अगस्तिया के फूल, केले के फूल, सेमल के फूल आदि । ३. फलशाक — पेठा, लौकी, करेला, बैगन, परवल, टिण्डा आदि । ४. नालशाक — सरसों, राई आदि के नाल । ५. कन्दशाक — मूली, सूरण ( जिमीकन्द ), आलू, पिण्डालू, रक्तालू, वाराहीकन्द, गेठी, तरूड़ आदि । ६. संस्वेदज शाक— -छत्रक, खुंब आदि । आचार्य खरनाद ने कहा है कि भोजन कर लेने के बाद फलों का सेवन करना चाहिए, अतः अब इसके बाद यहाँ फलवर्ग का प्रस्ताव है । अथ फलवर्गः द्राक्षा फलोत्तमा वृष्या चक्षुष्या सृष्टमूत्रविट् ॥। ११५ ॥ स्वादुपाकरसा स्निग्धा सकषाया हिमा गुरुः । निहन्त्यनिलपित्ताम्रतिक्तास्यत्वमदात्ययान् ॥ तृष्णाकासश्रमश्वासस्वरभेदक्षतक्षयान् द्राक्षा - परिचय — द्राक्षा ( दाख या मुनक्का ) सब फलों में उत्तम है । यह वीर्यवर्धक, आँखों के लिए हितकर, मल - मूत्र को सुचारु रूप से निकालती है । विपाक तथा रस में मधुर, स्निग्ध, कुछ कषाय रसयुक्त, शीतवीर्य तथा देर में पचने वाली है । यह वात, पित्त तथा रक्त विकारों का विनाश करती है । मुख का तीतापन, मदात्ययरोग, तृष्णा ( प्यास का अधिक लगना ), कास, श्रम ( थकावट ), श्वास, स्वरभेद, क्षत ( उरःक्षत ) एवं क्षय इन रोगों का विनाश करती है ॥ ११५-११६ ॥ वक्तव्य — अंगूर आकार - भेद से दो प्रकार के होते हैं-- १. छोटे, जिनके किसमिस बनाये जाते है और २. बड़े, जो आकार में लम्बे होते हैं, इनके मुनक्के बनाये जाते हैं । फिर ये बीज वाले तथा बीज-
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११२ अष्टाङ्गहृदये रहित भेद से भी दो प्रकार के होते हैं । स्वाद - भेद से भी ये दो प्रकार के होते हैं —१. खट्टे और २. मीठे । वर्ण - भेद से भी ये दो प्रकार के होते हैं —१. काले तथा २. सफेद या हरिताभ सफेद । मुनक्का या किसमिस बनाने के लिए इन्हें थोड़ा पकाना पड़ता है, नहीं तो ये जल्दी सूखते नहीं अपितु सड़ जाते हैं । उद्रिक्तपित्ताञ्जयति त्रीन्दोषान्स्वादु दाडिमम् ॥ ११७ ॥
पित्ताविरोधि नात्युष्णमम्लं वातकफापहम्! सर्वं हृद्यं लघु स्निग्धं ग्राहि रोचनदीपनम् ॥ ११८ ॥
दाड़िम - फल का वर्णन —यह स्वादभेद से दो प्रकार का होता है —१. मधुर और २. अम्ल ( खट्टा ) । मधुर दाडिम के गुण – इसी को ' अनार ' कहते हैं । यह पित्त - प्रधान तीनों दोषों को शान्त करता है । खट्टा दाड़िम — यह खट्टा होने पर पित्तदोष को प्रकुपित नहीं करता । यह अधिक उष्ण भी नहीं होता है । यह वात तथा कफ दोष का विनाशक होता है । सभी प्रकार के दाड़िम हृदय के लिए हितकर, शीघ्र पचने वाले, स्निग्ध, ग्राही ( मल को बाँधने वाले ), रुचि तथा जठराग्नि को बढ़ाने वाले होते हैं ॥ ११७-११८ ॥ वक्तव्य — पर्वतीय क्षेत्रों में दाड़िम के वृक्ष पर्याप्त रूप में पाये जाते हैं । इसके वृक्ष चिरायु होते हैं । स्थानीय लोग खट्टे तथा मीठे दाड़िमों की चटनी बनाकर रख लेते हैं । इसे ' काली चटनी ' कहते हैं । यह लाल, सफेद वर्णभेद से दो प्रकार का होता है । इसके छिलकों को धूप में सुखाकर चूर्ण बनाकर रख लिया जाता है । यह चूर्ण पित्तातिसार, प्रवाहिका, कास, बालको के दाँत निकलने तथा टाउन्सिल में प्रयोग किया जाता है । यद्यपि सभी अम्ल पदार्थ पित्तवर्धक तथा उष्णवीर्य होते हैं, तथापि अनार एवं आँवला
फल इसके अपवाद हैं ।
मोचखर्जूरपनसनारिकेलपरूषकम् । आम्राततालकाश्मर्यराजादनमधूकजम् ॥ ११ ९ ॥
सौवीरबदराङ्कोल्लफल्गुश्लेष्मातकोद्भवम् । वातामाभिषुकाक्षोडमुकूलकनिकोचकम् ॥ १२० ॥
उरुमाणं प्रियालं च बृंहणं गुरु शीतलम् । दाहक्षतक्षयहरं रक्तपित्तप्रसादनम् ॥ १२१ ॥
स्वादुपाकरसं स्निग्धं विष्टम्भि कफशुक्रकृत् । केला आदि फलों का वर्णन — मोच ( केले का फल ), खर्जूर ( खजूर या छुहारा ), पनस ( कटहल ). नारियल, परूषक ( फालसा ), आम्रात ( आमड़ा ), तालफल, काश्मर्य ( गम्भारी का फल ), राजादन ( खिरनी ), महुआ का फल, सौवीर ( बड़ा बेर का फल ), बेर का फल, अंकोल, फल्गु ( गूलर ), श्लेष्मातक ( लिसोड़ा ), बादाम, अभिषुक ( पिस्ता ), अखरोट, मुकूलक ( यह भी पिस्ता की जाति है ), निकोचक ( चिलगोजा - चीड़ का बीज ), उरुमाण ( खुमानी या खुरमानी ) और प्रियाल ( चिरौंजी ) – ये सभी फल बृंहण ( शरीर को बढ़ाने वाले ), गुरु ( देर में पचने वाले ) तथा शीतवीर्य होते हैं । दाह, क्षत ( उरःक्षत ) तथा अन्य स्थानों में लगे घावों का शमन करते हैं । रक्त तथा पित्त को शुद्ध करते हैं । ये सभी विपाक में मधुर हैं, स्निग्ध, विष्टभकारक ( मलावरोधक ), कफ एवं शुक्रधातु को बढ़ाते हैं ॥ ११ ९ -१२१ ॥ फलं तु पित्तलं तालं सरं काश्मर्यजं हिमम् ॥ १२२ ॥
शकृन्मूत्रविबन्धघ्नं केश्यं मेध्यं रसायनम् । वातामाद्युष्णवीर्यं तु कफपित्तकरं सरम् ॥ १२३ ॥
परं वातहरं स्निग्धमनुष्णं तु प्रियालजम् । प्रियालमज्जा मधुरो वृष्यः पित्तानिलापहः ॥ १२४ ॥
कोलमज्जा गुणैस्तद्वत्तृट्छर्दिः कासजिच्च सः । ताल आदि फलों का वर्णन – ताल ( ताड़ ) का फल पित्तकारक तथा सर ( रेचक ) होता है । गम्भार का फल शीतवीर्य, मल तथा मूत्र की रुकावट को दूर करता है, बालों एवं मेधा ( धारणाशक्ति ) के लिए हितकर, रसायन गुणों से युक्त होता है । बादाम आदि फलों के गुण — ये उष्णवीर्य, कफकारक, पित्तकारक, सर, वातनाशक द्रव्यों में श्रेष्ठ तथा स्निग्ध होते हैं, किन्तु प्रियाल ( चिरौंजी ) उष्णवीर्य नहीं होता । प्रियालमज्जा के गुण- चिरौंजी की गिरी मधुर, वीर्यवर्धक, पित्त तथा वातविकार का नाश करती
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अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् ११३ है । बेर की मज्जा के गुण – इसके गुण भी प्रायः प्रियालमज्जा के समान होते हैं, किन्तु यह तृष्णा तथा
कास का विनाश करती है । १२२-१२४ ॥
वक्तव्य — ‘ वातामादि ’ —– यहाँ आदि शब्द से अभिषेक ( पिस्ता ), अखरोट, मकूलक, निकोचक ( चिलगोजा ) और उरुमाण ( खुमानी ) तक के द्रव्यों को लेना चाहिए । उरुमाण फल पर्वतीय प्रदेशों ( नैनीताल, अलमोड़ा, शिमला, मंसूरी, काश्मीर आदि ) में होता है । इसका बाहरी गूदा भी और भीतर की गिरी भी खायी जाती है, जो बादाम के आकार की तथा स्वाद में मधुर होती है । यह आकार - भेद से दो प्रकार की होती है — छोटी तथा बड़ी । बड़ी खुमानी के भीतर से निकलने वाली गिरी के ये गुण हैं । पक्वं सुदुर्जरं बिल्वं दोषलं पूतिमारुतम् ॥ १२५ ॥
दीपनं कफवातघ्नं बालं, ग्राह्युभयं च तत् । बिल्व का पका फल—– पका हुआ बेल का फल बड़ी कठिनता से पचता है, दोषकारक होता है तथा इसका सेवन करने से अपानवायु दुर्गन्धयुक्त निकलता है । कच्चा बेल का फल अग्नि प्रदीप्त करता है, कफ तथा वात दोष का नाश करता है । ये दोनों प्रकार के बेल ग्राही ( मल को बाँधने वाले ) होते हैं । कपित्थमामं कण्ठघ्नं दोषलं, दोषघाति तु ॥ १२६ ॥
पक्वं हिध्मावमथुजित्, सर्वं ग्राहि विषापहम् । कैथ का कच्चा फल –— यह कण्ठ (. स्वरयन्त्र ) को हानि पहुँचाता है, दोषकारक होता है । कैथ का पका फल दोषशामक, हिचकी तथा वमन का विनाश करता है । दोनों प्रकार के कैथ ग्राही होते हैं और विषविकार को नष्ट करते हैं ॥ १२६ ॥
जाम्बवं गुरु विष्टिम्भि शीतलं ' भृशवातलम् ॥ १२७ ॥
सङ्ग्राहि मूत्रशकृतोरकण्ठ्यं कफपित्तजित् । जामुन का फल – यह गुरु ( देर में पचने वाला ), विष्टम्भी, शीतवीर्य, बढ़ाने वाला, मल - मूत्र को रोकने वाला, स्वरयन्त्र के लिए अहितकर, कफ तथा वाला होता है ॥ १२७ ॥
वक्तव्य —राजजम्बू को संस्कृत में ' फलेन्द्रा ' तथा हिन्दी में ' फरेना ' कहते हैं वातविकार को अत्यन्त पित्त विकार को जीतने । इसके अतिरिक्त जामुन के ये भेद पाये जाते हैं — शुद्रजम्बू, काकजम्बू, भूमिजम्बू तथा जलजम्बू । ' राजजम्बू का ही वर्णन महाकवि कालिदास ने मेघदूत में इस प्रकार किया है— ' श्यामजम्बूवनान्ताः ' । ( पूर्वमेघ ) वातपित्तास्रकृद्वालं, बद्धास्थि कफपित्तकृत् ॥ १२८ ॥
गुर्वाम्रं वातजित्पक्वं स्वाद्वम्लं कफशुक्रकृत् । आम का वर्णन — जिसमें अभी गुठली नहीं पड़ी हो ऐसा बाल ( छोटा ) आम वातकारक, पित्तकारक तथा रक्तधातु को दूषित करता है । गुठली पड़ जाने पर अर्थात् कुछ बड़ा होने पर वह कफकारक तथा पित्तकारक होता है । पका हुआ आम पाक में गुरु, वातनाशक, स्वाद में मधुर होता है । पका हुआ खट्टा आम कफकारक तथा शुक्रवर्धक होता है ॥ १२८ ॥
वृक्षाम्लं ग्राहि रूक्षोष्णं वातश्लेष्महरं लघु ॥ १२ ९ ॥ वृक्षाम्ल का वर्णन – वृक्षाम्ल ( विषांविल, कोकम ) का फल ग्राही, रूक्ष, उष्णवीर्य, वात तथा कफदोष नाशक तथा पाचन में लघु होता है ॥ १२ ९ ॥ वक्तव्य — इसकी उत्पत्ति कोंकण, कनारा आदि दक्षिणी प्रान्तों में होती है । बीज निकाल कर सुखाये हुए फल को अमसूल या कोकम कहते हैं । इसके बीजों से तेल निकाला जाता है । इसे कोकम का घी या तेल कहते हैं । यह तेल स्तम्भन एवं व्रणरोपण होता है । इसके छिलकों की चटनी बनायी जाती है । ८ अ ० हृ ०
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११४ अष्टाङ्गहृदये अतिसार, रक्तातिसार आदि में इसका फाण्ट ( चाय ) बनाकर दिया जाता है तथा पित्तजनित विकारों में इसे घोलकर इसका शरबत बनाकर दिया जाता है । इससे लाभ भी होता है । शम्या गुरूष्णं केशघ्नं रूक्षम्— शमी का फल – -यह पाक में गुरु, उष्णवीर्य, केशनाशक तथा रूक्ष होता है । वक्तव्य - शमी को हिन्दी में ' छोंकर ' कहते हैं । इसका वर्णन ' भावप्रकाश ' तथा ' धन्वन्तरि ' निघण्टुओं में भी आया है । यह छोटी - बड़ी भेद से दो प्रकार की होती है । धार्मिक कार्यों में इसका बड़ा महत्त्व है । इसकी कच्ची फलियों का शाक बनाकर मारवाड़ तथा पंजाब में खाया जाता है, दशहरा के पुण्य पर्व पर इस वृक्ष की पूजा की जाती है । विशेष देखें —च. सू. २७ | १५ ९; सु.सू. ४६।१ ९ ३ । — पीलु तु पित्तलम् । कफवातहरं भेदि प्लीहार्शःकृमिगुल्मनुत् ॥ १३० ॥
सतिक्तं स्वादु यत्पीलु नात्युष्णं तत्त्रिदोषजित् । पीलु का फल –यह पित्तकारक, कफ तथा वात नाशक, मलभेदक ( दस्तावर ), प्लीहारोग, अर्शोरोग, क्रिमिरोग तथा गुल्मरोग नाशक होता है । जो पीलु कुछ तीता एवं मधुर होता है, वह अधिक उष्ण नहीं होता और वह त्रिदोषनाशक भी होता है ॥ १३० ॥
वक्तव्य — इसके वृक्ष राजस्थान, बिहार, कोंकण, दक्षिणप्रदेश, कर्नाटक, बलूचिस्तान आदि सूखे स्थानों
में पाये जाते हैं । यह पीलु छोटा - बड़ा भेद से दो प्रकार का होता है ।
त्वक्तिक्तकटुका स्निग्धा मातुलुङ्गस्य वातजित् ॥ १३१ ॥
बृंहणं मधुरं मांसं वातपित्तहरं गुरु । लघु तत्केसरं कासश्वासहिध्मामदात्ययान् ॥ १३२ ॥
आस्यशोषानिलश्लेष्मविबन्धच्छर्द्यरोचकान् । गुल्मोदरार्शःशूलानि मन्दाग्नित्वं च नाशयेत् ॥ मातुलुंग ( बिजौरा नीबू ) की त्वचा - यह तिक्त एवं कटु होती है और स्निग्ध तथा वातनाशक होती है । उसका मांस ( गूदा ) बृंहण, मधुर, वात तथा पित्त नाशक और गुरु होता है । बिजौरानीबू का केशर लघु, कास, श्वास, हिचकी, मदात्यय, मुखशोष, वातरोग, कफरोग, विबन्ध ( कब्जियत ), वमन, अरोचक, गुल्मरोग, उदररोग, अर्शोरोग, शूलरोग एवं मन्दाग्नि का विनाश करता है ॥ १३१-१३३ ॥ वक्तव्य — नैनीताल, अलमोड़ा आदि पर्वतीय स्थानों में ' बिजौरानीबू ' पर्याप्त रूप में पाया जाता है । इसका छिलका बाहरी और भीतरी भेद से दो प्रकार का कहा गया है । बाहरी छिलका को त्वक्, भीतरी छिलका को मांस और उसके भीतर मिलने वाले अम्ल पदार्थ को केसर कहा गया है । अब आप इसका अर्थ इस प्रकार लगायें — बाहरी छिलका को अत्यन्त पतला छीलकर फेंक दिया जाता है, उसके गुण हैं —— त्वक्तिक्ता —— ‘ “ वातजित् ' । इस बाहरी छिलका में तेल का अंश पाया जाता है, जो छीलने वाले के हाथ में लग जाता है । इसका वह भाग जिसे वाग्भट ने ' मांस ' कहा है, इसे मित्रमण्डली या परिजनों के साथ बैठकर खाया जाता है, जिसे ' सौगात ' = ' स्वागत ' माना जाता है । यह अत्यन्त कोमल तथा मधुर होता है । इसी का एक भेद ‘ मतकाकड़ी ' भी है, जिसे आयुर्वेद में ' मधुकर्कटी ' कहा है । इसके विपरीत जो निघण्टु - ग्रन्थों में इसे चकोतरा कहा है, यह भ्रम है । आप देखें— मधुकर्कटी और मतकाकड़ी शब्दों में कितना साम्य है? इसी प्रकार बिजौरानीबू और मतकाकड़ी में क्रमशः छोटे - बड़े मात्र का अन्तर है । इसी बहाने आप पर्वतीय यात्रा करें और देखें — इन दोनों फलों को । ' चकोतरा ' जिसे कहते हैं, उसका बाहर का छिलका फेंक दिया जाता है और भीतर का केशर मीठा होने के कारण खाया जाता है । उक्त बिजौरानीबू तथा मतकाकड़ी का केशर अत्यन्त खट्टा होता है । ये दोनों के परस्पर विभेदक लक्षण हैं । भल्लातकस्य त्वङ्मांसं बृंहणं स्वादु शीतलम् । तदस्थ्यग्निसमं मेध्यं कफवातहरं परम् ॥। १३४ ॥