श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 191–200
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 191–200
पृष्ठ 191
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
रसभेदीयाध्यायः १० ] सूत्रस्थानम् १५५ मल को बाँधता है । यह अत्यन्त रूक्ष होता है, त्वचा को स्वच्छ करता है । इसका अधिक सेवन करने से विष्टम्भ, आध्मान ( अफरा ), हृदय में पीड़ा, प्यास, कृशता, शुक्रधातु का नाश, स्रोतों में रुकावट तथा मल - मूत्र में रुकावट होती है । २०-२१ ॥ घृतहेमगुडाक्षोडमोचचोचपरूषकम् ॥२२ ॥
अभीरुवीरापनसराजादनबलात्रयम् । मेदे चतस्रः पर्णिन्यो जीवन्ती जीवकर्षभौ ॥ २३ ॥
मधूकं मधुकं बिम्बी विदारी श्रावणीयुगम् । क्षीरशुक्ला तुगाक्षीरी क्षीरिण्यौ काश्मरी सहे ॥ २४ ॥
क्षीरेक्षुगोक्षुरक्षौद्रद्राक्षादिर्मधुरो गणः । मधुरस्कन्ध के द्रव्य — घृत, सोना, गुड़, अखरोट, केला, चोच ( दालचीनी, नारियल, तालफल– वैद्यकशब्दसिन्धु ), परूषक ( फालसा ), अभीरु ( शतावरी ), काकोली, कटहल, चिरौंजी, बलात्रय ( बला, अतिबला, नागबला ), दो मेदा ( मेदा, महामेदा ), चारपर्णिनी ( शालपर्णी, पृष्ठपर्णी, माषपर्णी, मुद्गपर्णी ), जीवन्ती, जीवक, ऋषभक, महुआ, मुलेठी, बिम्बी ( कुन्दरू ), विदारीकन्द, श्रावणीयुगल ( मुण्डी, बड़ीमुण्डी ), क्षीरशुक्ला, वंशलोचन, दो क्षीरिणी ( छोटी दुद्धी, बड़ी दुद्धी ), गम्भार, दो सहा ( सहा, महासहा ), दूध, ईख, गोखरू, मधु, मुनक्का आदि – ये सब द्रव्य मधुरस्कन्ध के हैं ॥ २२-२४ ॥ अम्लो धात्रीफलाम्लीकामातुलुङ्गाम्लवेतसम् ॥ २५ ॥
दाडिमं रजतं तक्रं चुक्रं पालेवतं दधि । आम्रमाम्रातकं भव्यं कपित्थं करमर्दकम् ॥२६ ॥
अम्लस्कन्ध के द्रव्य — आँवला, इमली, मातुलिंग ( प्रायः सभी नीबू विशेषकर बिजौरानीबू ), अम्लवेत, दाड़िम, रजत ( चाँदी ), तक्र ( मठा ), चुक्र, पालेवत, दही, आम, आमड़ा, भव्य ( कमरख ), कैथ तथा करमर्दक ( करौंदा ) ॥ २५-२६ ॥ वरं सौवर्चलं कृष्णं बिडं सामुद्रमौद्भिदम् । रोमकं पांसुजं शीसं क्षारश्च लवणो गणः ॥ २७ ॥
लवणस्कन्ध के द्रव्य — सेंधानमक, सोंचरनमक, कालानमक, विडलवण ( नौसादर ), समुद्रीनमक, औद्भिद ( रेह ) नमक, रोमक ( साँभर ) नमक, पांशुज ( धूल या मिट्टी का ) नमक, सीसाधातु तथा सभी क्षार ॥ २७ ॥
तिक्तः पटोली त्रायन्ती बालकोशीरचन्दनम् । भूनिम्बनिम्बकटुकातगरागुरुवत्सकम् ॥ २८ ॥
नक्तमालद्विरजनीमुस्तमूर्वाटरूषकम् । पाठापामार्गकांस्यायोगुडूचीधन्वयासकम् ॥ २ ९ ॥
पञ्चमूलं महद्व्याघ्र्यौ विशालाऽतिविषा वचा । तिक्तस्कन्ध के द्रव्य — तीता परवल, त्रायमाणा, नेत्रबाला, खस, चन्दन, चिरायता, नीम, कुटकी, तगर, अगरु, कुटज, नक्तमाल ( करंज ), दो हल्दी ( दारूहल्दी, हल्दी ), नागरमोथा, मूर्वा, अडूसा, पाठा, अपामार्ग, कांस्यधातु, लोहधातु, गुरुच, धमासा, बृहत्पंचमूल ( बिल्व, सोनापाठा, गम्भारी, पाढ़ल, अरणी ), वनभण्टा, कण्टकारी, विशाला ( इन्द्रायण ), अतीस तथा बालवच ॥ २८-२९ ॥ कटुको हिङ्गुमरिचकृमिजित्पञ्चकोलकम् ॥ ३० ॥
कुठेराद्या हरितकाः पित्तं मूत्रमरुष्करम् । कटुस्कन्ध के द्रव्य — हींग, कालीमिर्च, वायविडंग, पञ्चकोल ( पिप्पली, पीपलामूल, चव्य, चित्रक, नागर = सोंठ ), कुठेरक आदि, हरितक ( देखें – अ.हृ.सू. ६।१०६ ), पित्त ( मांस खाने वालों का प्रिय पदार्थ, जो मृग, बकरा आदि में पाया जाता है, वह अवयव - विशेष ), गोमूत्र आदि सभी ग्राह्य मूत्र और अरुष्कर ( भिलावा ) ॥ ३० ॥
वर्गः कषायः पथ्याऽक्षं शिरीषः खदिरो मधु ॥ ३१ ॥
कदम्बोदुम्बरं मुक्ताप्रवालाञ्जनगैरिकम् । बालं कपित्थं खर्जूरं बिसपद्मोत्पलादि च ॥ ३२ ॥
पृष्ठ 192
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१५६ अष्टाङ्गहृदये कषायस्कन्ध के द्रव्य - हरड़, बहेड़ा, सिरीष, खदिर ( बबूल, कीकर आदि ), मधु, कदम्ब, गूलर, मोती, मूँगा, अंजन, गेरू, कच्चा कैथ, कच्चा खजूर, बिस ( कमलकन्द ), कमल तथा उत्पल ( कमलभेद ) आदि ॥ ३१-३२ ॥ मधुरं श्लेष्मलं प्रायो जीर्णाच्छालियवादृते । मुद्गाद्गोधूमतः क्षौद्रात्सिताया जाङ्गलामिषात् ॥ ३३ ॥
मधुररस का विशिष्ट वर्णन - प्रायः सभी मधुर रस वाले द्रव्य कफकारक होते हैं; केवल पुराने शालिधान्य, जौ, मूँग, गेहूँ, मधु, सफेद मिश्री तथा जांगल देश के प्राणियों के मांस को छोड़कर ॥ ३३ ॥
प्रायोऽम्लं पित्तजननं दाडिमामलकादृते । अम्लरस का विशिष्ट वर्णन – अनार ( यहाँ अनार शब्द से पहाड़ों में पाये जाने वाले खट्टे दाड़िमों की ओर वाग्भट का संकेत है ) एवं आँवला को छोड़कर प्रायः सभी अम्लद्रव्य पित्तकारक होते हैं । अपथ्यं लवणं प्रायश्चक्षुषोऽन्यत्र सैन्धवात् ॥ ३४ ॥
लवणरस का विशिष्ट वर्णन — सेंधानमक के अतिरिक्त सभी नमक नेत्रों के लिए अहितकर होते हैं॥३४ ॥
तिक्तं कटु च भूयिष्ठमवृष्यं वातकोपनम् । ऋतेऽमृतापटोलीभ्यां शुण्ठीकृष्णारसोनतः ॥ ३५ ॥
तिक्त - कटुरसों का विशिष्ट वर्णन — गुरुच तथा तिक्त परबल के बिना प्रायः सभी तिक्त द्रव्य अवृष्य ( वीर्यनाशक ) तथा वातकारक होते हैं । सोंठ, पीपल, लहसुन को छोड़कर प्रायः सभी कटु द्रव्य अवृष्य तथा वातकारक होते हैं ॥ ३५ ॥
कषायं प्रायशः शीतं स्तम्भनं चाभयां विना । कषायरस का विशिष्ट वर्णन — हरड़ को छोड़कर प्रायः सभी कषाय द्रव्य शीतवीर्य तथा स्तम्भन-कारक होते हैं । रसाः कट्वम्ललवणा वीर्येणोष्णा यथोत्तरम् ॥ ३६ ॥
तिक्तः कषायो मधुरस्तद्वदेव च शीतलाः । तिक्तः कटुः कषायश्च रूक्षा बद्धमलास्तथा ॥ ३७ ॥
पट्वम्लमधुराः स्निग्धाः सृष्टविण्मूत्रमारुताः । पटोः कषायस्तस्माच्च मधुरः परमं गुरुः ॥ ३८ ॥
लघुरम्लः कटुस्तस्मात् तस्मादपि च तिक्तकः । रसों के द्विविध वीर्य — कटु, अम्ल तथा लवण रस वीर्य की दृष्टि से उत्तरोत्तर अधिक उष्ण होते हैं और तिक्त, कषाय तथा मधुर रस वीर्य की दृष्टि से उत्तरोत्तर अधिक शीत होते हैं । रसों के रूक्ष एवं स्निग्ध गुण — तिक्त, कटु तथा कषाय रस वाले द्रव्य उत्तरोत्तर रूक्ष गुण वाले तथा मल को बाँधने वाले होते हैं । लवण, अम्ल एवं मधुर रस वाले द्रव्य उत्तरोत्तर स्निग्ध गुण वाले तथा मल, मूत्र एवं अपानवायु को निकालने वाले होते हैं । रसों के गुरु एवं लघु गुण – लवणरस से कषायरस एवं कषायरस से मधुररस गुण में अधिक गुरु होता है । अम्लरस लघु होता है, इससे अधिक लघु कटुरस होता है और इससे भी अधिक लघु होता है तिक्तरस ॥ ३६-३८ ॥ वक्तव्य — महर्षियों की विचारदृष्टि अत्यन्त सूक्ष्म तथा व्यापक होती थी, अतएव उन्हें विविधता कदम - कदम पर दिखलायी देती थी और अपवाद भी, अस्तु । यहाँ तक के विवेचन से हमने रसों के गुण, वीर्य, विपाक तथा प्रभाव को समझा किन्तु इनके विपरीत भी कई स्थल ऐसे मिलते है जो उक्त सिद्धान्तों के विपरीत देखे जाते हैं । जैसे ऊपर रस का विवेचन किया गया है, वैसा ही विस्तृत क्षेत्र विपाक का भी है । इन गुत्थियों को सुलझाने के लिए च.सू. २६ का अध्ययन एवं मनन करें ।
पृष्ठ 193
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
रसभेदीयाध्यायः १० ] सूत्रस्थानम् १५७ संयोगाः सप्तपञ्चाशत्कल्पना तु त्रिषष्टिधा ॥ ३ ९ ॥ रसानां यौगिकत्वेन यथास्थूलं विभज्यते । रसों के ६३ भेद – मधुर आदि छः रसों के परस्पर ( एक - दूसरे के साथ ) संयोग करने पर इनके स्थूल रूप से ५७ भेद होते हैं । पुनः इनमें छः रसों को जोड़ देने पर इनकी कल्पना दोषों को आधार मानकर करने से ६३ प्रकार की हो जाती है । इसे शास्त्रकार स्थूल गणना मानते हैं ॥ ३ ९ ॥ वक्तव्य — अ.हृ.सू. १२ में देखें, वहाँ ६२ प्रकार के दोषभेदों का वर्णन किया गया है । एकैकहीनास्तान् पञ्चदश यान्ति रसा द्विके ॥ ४० ॥
त्रिके स्वादुर्दशाम्लः षट् त्रीन् पटुस्तिक्त एककम् । चतुष्केषु दश स्वादुश्चतुरोऽम्लः पटुः सकृत् ॥ पञ्चकेष्वेकमेवाम्लो मधुरः पञ्च सेवते । द्रव्यमेकं षडास्वादमसंयुक्ताश्च षड्रसाः ॥ ४२ ॥
दो - दो रसों के १५ योग — एक - एक रस को कम करते हुए पाँच भागों में दो - दो रसों के संयोग से इस प्रकार इनके १५ भेद होते हैं —– मधुररस के साथ अम्ल आदि ५ रसों के संयोग से ५, अम्लरस के साथ लवण आदि ४ रसों के संयोग से ४, लवणरस के साथ तिक्त आदि ३ रसों के संयोग से ३, तिक्तरस के साथ कटु आदि २ रसों के संयोग से २ तथा कटुरस के साथ कषाय १ रस के संयोग से १ ( योग १५ ); त्रिक ( तीन - तीन ) रसों के संयोग से इनके २० भेद इस प्रकार होते हैं— मधुररस के साथ अन्य दो रसों के संयोग से १०, अम्लरस के साथ अन्य दो रसों के संयोग से ६, लवणरस के साथ अन्य दो रसों के संयोग से ३ और तिक्तरस के साथ अन्य दो रसों के संयोग से १ ( योग २० ); चतुष्क ( चार - चार ) रसों के संयोग से इनके १५ भेद इस प्रकार होते हैं— मधुररस के साथ अन्य तीन रसों के संयोग से १०, अम्लरस के साथ अन्य तीन रसों के संयोग से ४ और लवणरस के साथ अन्य तीन रसों के संयोग से १ ( योग १५ ); पञ्चक ( पाँच - पाँच ) रसों के संयोग से इनके छः भेद इस प्रकार होते हैं — मधुररस के साथ अन्य चार रसों के संयोग से ५ और अम्लरस के साथ अन्य चार रसों के संयोग से १ ( योग ६ ); षट्क ( छः ) रसों के संयोग से केवल एक भेद इस प्रकार होता है— मधुररस के साथ अन्य पाँच रसों के संयोग से १ और असंयुक्त अर्थात् अलग - अलग मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु एवं कषाय नामक रस ६; इस प्रकार इनका कुल ६३ योग होता है ॥ ४०-४२ ॥
षट् पञ्चकाः, षट् च पृथग्रसाः स्युश्चतुर्द्विकौ पञ्चदशप्रकारौ ।
भेदास्त्रिका विंशतिरेकमेव द्रव्यं षडास्वादमिति त्रिषष्टिः ॥ ४३ ॥
विषयोपसंहार — पाँच - पाँच रसों के योग ६, अलग - अलग रस ६, चतुष्क रसयोग १५, द्विक रस योग १५, त्रिक रसयोग २० तथा षट्क रसयोग १ - इस प्रकार कुल ६३ प्रकार के भेद होते हैं ॥ ४३ ॥
वक्तव्य — उक्त ६३ प्रकार के रससंयोगों का यहाँ स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया जा रहा है— पंचक रससंयोग के ६ भेद – १. अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कषाय रसों का संयोग ( मधुररसहीन ), २. मधुर, लवण, तिक्त, कटु, कषाय रसों का संयोग ( अम्लरसहीन ), ३. मधुर, अम्ल, तिक्त, कटु, कषाय रसों का संयोग ( लवणरसहीन ), ४. मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय रसों का संयोग ( तिक्तरसहीन ), ५. मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कषाय रसों का संयोग ( कटुरसहीन ), ६. मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु रसों का संयोग ( कषाय रसहीन ); पृथक् रसों की गणना ६–१. मधुर, २. अम्ल, ३. लवण, ४. तिक्त, ५. कटु तथा ६. कषाय; चतुष्क रससंयोग के १५ भेद -- १. मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त रसों का संयोग ( कटुकषायरसहीन ); २. मधुर, अम्ल, लवण, कटु रसों का संयोग ( तिक्त - कषायरसहीन ); ३. मधुर, अम्ल, लवण, कषाय रसों का संयोग ( तिक्त - कटुरसहीन ); ४. मधुर, अम्ल, तिक्त, कटु रसों का संयोग ( लवण - कषायरसहीन );
पृष्ठ 194
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१५८ अष्टाङ्गहृदये ५. मधुर, अम्ल, तिक्त, कषाय रसों का संयोग ( लवण - कटुरसहीन ); ६. मधुर, अम्ल, कटु, कषाय रसों का संयोग ( लवण - तिक्तरसहीन ); ७. मधुर, लवण, तिक्त, कटु रसों का संयोग ( अम्ल - कषायरसहीन ); ८. मधुर, लवण, तिक्त, कषाय रसों का संयोग ( अम्ल- रु - कटुरसहीन ); ९. मधुर, लवण, कटु, कषाय रसों का संयोग ( अम्ल- - तिक्तरसहीन ); १०. मधुर, तिक्त, कटु, कषाय रसों का संयोग ( अम्ल - लवणरसहीन ); ११. अम्ल, लवण, तिक्त, कटु रसों का संयोग ( मधुर - कषायरसहीन ); १२. अम्ल, लवण, तिक्त, कषाय रसों का संयोग ( मधुर - कटुरसहीन ); १३. अम्ल, लवण, कटु, कषाय रसों का संयोग ( मधुर तिक्तरसहीन ); १४. अम्ल, तिक्त, कटु, कषाय रसों का संयोग ( मधुर - लवणरसहीन ) और १५. लवण, तिक्त, कटु, कषाय रसों का संयोग ( मधुर - अम्लरसहीन ) । द्विक रससंयोग के १५ भेद – १. मधुर तथा अम्ल रस का संयोग, २. मधुर तथा लवण रस का संयोग, ३. मधुर तथा तिक्त रस का संयोग, ४. मधुर तथा कटु रस का संयोग, ५. मधुर तथा कषाय रस का संयोग, ६. अम्ल तथा लवण रस का संयोग, ७. अम्ल तथा तिक्त रस का संयोग, ८. अम्ल तथा कटु रस का संयोग, ९. अम्ल तथा कषाय रस का संयोग, १०. लवण तथा तिक्त रस का संयोग, ११. लवण तथा कटु रस का संयोग, १२. लवण तथा कषाय रस का संयोग, १३. तिक्त तथा कटु रस का संयोग, १४. तिक्त तथा कषाय रस का संयोग और १५. कटु तथा कषाय रस का संयोग । त्रिक रससंयोग के २० भेद – १. मधुर, अम्ल, लवण रसों का संयोग; २. मधुर, अम्ल, तिक्त रसों का संयोग; ३. मधुर, अम्ल, कटु रसों का संयोग; ४. मधुर, अम्ल, कषाय रसों का संयोग, ५. मधुर, लवण, तिक्त रसों का संयोग; ६. मधुर, लवण, कटु रसों का संयोग; ७. मधुर, लवण, कषाय रसों का संयोग; ८. मधुर, तिक्त, कटु रसों का संयोग; ९. मधुर, तिक्त, कषाय रसों का संयोग; १०. मधुर, कंटु, कषाय रसों का संयोग; ११. अम्ल, लवण, तिक्त रसों का संयोग; १२. अम्ल, लवण, कटु रसों का संयोग; १३. अम्ल, लवण, कषाय रसों का संयोग; १४. अम्ल, तिक्त, कटु रसों का संयोग; १५. अम्ल, तिक्त, कषाय रसों का संयोग; १६. अम्ल, कटु, कषाय रसों का संयोग; १७. लवण, तिक्त, कटु रसों का संयोग; १८. लवण, तिक्त, कषाय रसों का संयोग; १ ९. लवण, कटु, कषाय रसों का संयोग और २०. तिक्त, कटु, कषाय रसों का संयोग । षडास्वाद रससंयोग का १ भेद – १. मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कषाय रसों का संयोग । इस प्रकार ६ + ६ + १५ + १५ + २० + १ = रसकल्पना के ६३ भेद किये गये हैं । इनका उपयोग चिकित्सा काल में किया जाता है ।
ते रसानुरसतो रसभेदास्तारतम्यपरिकल्पनया च ।
सम्भवन्ति गणनां समतीता दोषभेषजवशादुपयोज्याः ॥ ४४ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने रसभेदीयो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
रससंयोगों के असंख्य भेद – वे ( उपर्युक्त ) रसभेद रस तथा अनुरस के भेद से एवं तर - तम भाव की परिकल्पना से असंख्य हो जाते हैं । तथापि उन रससंयोग - भेदों का प्रयोग वात आदि दोषों का तथा हरीतकी आदि औषध - द्रव्यों के रस - अनुरस आदि का विचार करके यथोचित प्रकार से उपयोग करना चाहिए ॥४४ ॥
वक्तव्य — रसानुरस — प्रत्येक द्रव्य में एक प्रधान रस तथा एकाधिक अनुरस रहते ही हैं । जैसे — हरीतकी का प्रधान रस कषाय है, शेष लवण रहित चार रस उसके अनुरस हैं । यथा— - ' ' हरीतकी पञ्चरसाऽलवणा तुवरा परम् ' । और भी कहा गया है— ' द्रव्यमेकरसं नास्ति, न रोगोऽप्येकदोषजः ' । अस्तु ।
पृष्ठ 195
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
रसभेदीयाध्यायः १० ] सूत्रस्थानम् १५ ९ तारतम्य- -तर - तम के भाव को ' तारतम्य ' कहते हैं । दो द्रव्यों में एक को उत्तम या अधम बतलाने के लिए ' तर ' का प्रयोग होता है और वही अनेक में एक को बतलाने के लिए ' तम ' का प्रयोग होता है । दूसरा प्रयोग इस प्रकार है — यह द्रव्य उससे गुरुतर है अथवा यह द्रव्य उन सबमें गुरुतम है । इसी प्रकार लघुतर, लघुतम प्रयोग भी होते हैं, तीसरा प्रयोग है— मधुर, मधुरतर, मधुरतम आदि । इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय - सूत्रस्थान में रसभेदीय नामक दसवाँ अध्याय समाप्त ॥ १० ॥
पृष्ठ 196
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकादशोऽध्यायः
अथातो दोषादिविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥
अब हम यहाँ से दोषों, धातुओं तथा मलों के विशेष ज्ञान को देने वाले अध्याय की व्याख्या करेंगे । ऐसा आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था । उपक्रम – रसभेदीय नामक अध्याय के समाप्त होने के बाद अब यहाँ दोषादिविज्ञानीय नामक अध्याय का आरम्भ किया जा रहा है । दोषादि शब्द में ' आदि ' पद से धातु तथा मल का संग्रह किया गया है, क्योंकि धातु एवं मलों के दोष आधारस्वरूप होते हैं । संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेत — च. सू. १२, १७-१८, २८; सु.सू. १५ एवं अ.सं.सू. १ ९ में देखें । दोषधातुमला मूलं सदा देहस्य— शरीर के आधार — वात आदि ( पित्त - कफ ) तीन दोष, रस से लेकर शुक्रपर्यन्त सात धातु तथा स्वेद ( पसीना ) आदि मल ये सब देह ( शरीर ) के सदा ( जीवनभर ) मूल ( आधार ) कहे जाते हैं । —तं चलः । उत्साहोवासनिश्वासचेष्टावेगप्रवर्तनैः ॥ १ ॥
सम्यग्गत्या च धातूनामक्षाणां पाटवेन च । अनुगृह्णात्यविकृतः, पित्तं पक्त्यूष्मदर्शनैः ॥ २ ॥
क्षुत्तृचिप्रभामेधाधीशौर्यतनुमार्दवैः । श्लेष्मा स्थिरत्वस्निग्धत्वसन्धिबन्धक्षमादिभिः ॥ ३ ॥
प्रकृतिस्थ दोषों के कर्म — उस देह को प्रकृतिस्थ वायु सदा उत्साहशक्ति, श्वास, प्रश्वास, चेष्टा ( शरीर सम्बन्धी व्यवहार —उठना, बैठना, चलना, फिरना आदि ), मल - मूत्र आदि वेगों की प्रवृत्ति, रस आदि धातुओं की उचित गति, श्रोत्र आदि इन्द्रियों की अपने - अपने विषयग्रहण की कुशलता से कृपा करता रहता है । इसी प्रकार प्रकृतिस्थ पित्त इस देह के उपर सदा पाचन, उष्णता, दर्शन ( देखना ). भूख, प्यास, भोजन के प्रति रुचि, प्रभा ( कान्ति ), मेधा ( धारण करने की क्षमता वाली बुद्धि ), बुद्धि, शूरता, शरीर सम्बन्धी मृदुता द्वारा अनुग्रह करता है । प्रकतिस्थ कफ देह को सदा स्थिरता, स्निग्धता, दृढ़ सन्धिबन्धन तथा क्षमा, आदि द्वारा अनुगृहीत करता है ॥ १-३ ॥ वक्तव्य- -यह देह पञ्चमहाभूतों ( पृथिवी, जल, तेज, वायु तथा आकाश ) से निर्मित है । इनमें पृथिवी तत्त्व इस शरीर का आधार ही है और आकाश तत्त्व शरीर के रिक्त स्थानों का स्वरूप है । जैसे — कानों के तथा नाक के छिद्र एवं मुख - गुहा आदि आकाश तत्त्व के आशय हैं, इस दृष्टि से उक्त दोनों तत्त्व शरीर में प्रायः निष्क्रिय हैं । शेष तीन तत्त्व वायु, तेजस् तथा जल ये क्रमशः वात, पित्त, कफ धातुओं का कर्म करते हुए जीवनभर शरीर को धारण किये रहते हैं । प्रीणनं जीवनं लेपः स्नेहो धारणपूरणे । गर्भोत्पादश्च धातूनां श्रेष्ठं कर्म क्रमात्स्मृतम् ॥४ ॥
रस आदि धातुओं के कर्म - रस आदि सात धातुओं के क्रमशः ये प्रमुख कर्म हैं —१. रस का प्रीणन, २. रक्त का जीवन, ३. मांस का लेपन अर्थात् अस्थिसमूह का लेपन कर उसे स्थिर बनाये रखना, ४. मेदस् का स्नेहन ( सम्पूर्ण शरीर को स्निग्ध बनाये रखना ), ५. अस्थि का धारण करना, ६. मज्जा का अस्थियों की पूर्ति करना ( हड्डियों के भीतर जो स्निग्ध पदार्थ पाया जाता है वही मज्जा है, उसके अभाव में अस्थियों तथा अस्थिसन्धियों में पीड़ा का अनुभव होने लगता है ) तथा ७. शुक्र का गर्भोत्पादन कर्म होता है ॥४ ॥
पृष्ठ 197
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दोषादिविज्ञानीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् १६१ वक्तव्य — सुश्रुत के अनुसार — १. रस — शरीर का प्रीणन तथा रक्त का पोषण करता है । २. रक्त-वर्ण की निर्मलता, मांस का पोषण तथा जीवन प्रदान करता है । ३. मांस - शरीर एवं मेदस् का पोषण करता है । ४. मेदस् — स्नेह - स्वेद उत्पन्न करता है, शरीर में दृढ़ता उत्पन्न कर अस्थियों का पोषण करता है । ५. अस्थियाँ — शरीर को धारण करती हैं । ६. मज्जा — प्रीति, स्नेह, बल, शुक्र का पोषण कर अस्थियों का भी पोषण करती है । ७. शुक्र — धैर्य, च्युति, प्रीति, देहबल, हर्षबीज ( स्त्रियों में ) तथा गर्भधारण कार्य में उपयोगी होता है । देखें —सु.सू. १५।४ । अवष्टम्भः पुरीषस्य मूत्रस्य क्लेदवाहनम् । स्वेदस्य क्लेदविधृतिः-मलों के प्रमुख कर्म – पुरीष का कर्म – अवष्टभ ( बल की रक्षा करना, मलाशय को स्वस्थ रखना, वायु तथा अग्नि का धारण करना ) । मूत्र का कर्म - क्लेद को बहा देना । स्वेद का कर्म — शरीर में गीलापन बनाये रखना । इसी के कारण त्वचा का स्पर्श सुकोमल होता है । वक्तव्य — इनका शरीर में रहना और यथासमय मात्रानुसार निकलना शरीर के लिए उपकारक होता है । कहा भी है — ‘ मलायत्तं बलं पुंसां शुक्रायत्तं तु जीवितम् ' । सुश्रुत ने कहा है— ' दोषधातुमलमूलं हि शरीरम् ' । ( सु.सू. १५।३ ) अर्थात् प्रकृतिस्थ वात आदि दोषों का, रस आदि धातुजों का तथा पुरीष आदि मलों का शरीर में रहना ही शरीर का मूल ( आधार ) है । इसका सांगोपांग व्याख्यान सुश्रुत में यथास्थान देखें । संयोगवश गुण भी दोष हो जाते हैं और दोष भी गुण हो जाते हैं । शास्त्र एवं लोक का परिशीलन करें । एक सुभाषित-— ' तात वाग्भट! किं ब्रूयां विचित्रा कर्मणो गतिः । दुषधातुरिवात्यर्थं गुणो दोषाय कल्पते ' ॥ - वृद्धस्तु कुरुतेऽनिलः ॥५ ॥
कार्श्यकार्ण्योष्णकामत्वकम्पानाहशकृद्ग्रहान् । बलनिद्रेन्द्रियभ्रंशप्रलापभ्रमदीनताः ॥ ६ ॥
वातवृद्धि के लक्षण — विविध कारणों से बढ़ा हुआ वातदोष कृशता, नख - नेत्र आदि में कालापन, उष्ण आहार - विहार की इच्छा का होना, कँपकँपी का होना, आनाह, पुरीष की स्वाभाविक गति में रुकावट, बलनाश, निद्रानाश, इन्द्रियों की शक्ति का क्षय या ह्रास, प्रलाप ( अंट - संट बकना ), चक्करों का आना तथा दीनता — इन लक्षणों को उत्पन्न करता है ॥५-६ ॥ पीतविण्मूत्रनेत्रत्वक्क्षुत्तृड्दाहाल्पनिद्रताः । पित्तं— पित्तवृद्धि के लक्षण –अनेक कारणों से बढ़ा हुआ पित्तदोष मल, मूत्र, नेत्र तथा त्वचा में पीलापन, भूख - प्यास की अधिकता, जलन का होना, नींद का कम आना — इन लक्षणों को पैदा कर देता है । —श्लेष्माऽग्निसदनप्रसेकालस्यगौरवम् ॥ ७ ॥
श्वैत्यशैत्यश्लथाङ्गत्वं श्वासकासातिन्द्रिताः । कफवृद्धि के लक्षण — अनेक कारणों से बढ़ा हुआ कफदोष मन्दाग्नि, लालाम्राव, आलस्य, गुरुता, पुरीष आदि में सफेदी, शीतता ( जाड़ा लगना या शीतस्पर्श का अनुभव होना ), अंगों में शिथिलता ( ढीलापन ), श्वास, कास तथा निद्रा की अधिकता होना — इन लक्षणों को उत्पन्न कर देता है ॥७ ॥
वक्तव्य — यहाँ तक वात - पित्त - कफ के जिन लक्षणों का ऊपर वर्णन किया गया है, वे वात आदि दोषों के वृद्धि या प्रकोप के लक्षण हैं । इन्हें आप अ.हृ.नि. १।१४ से २२ तक देखें । रसोऽपि श्लेष्मवत् — रसवृद्धि के लक्षण —अनेक कारणों से बढ़ा हुआ रसधातु ऊपर कहे गये कफदोष की भाँति विकारों
को उत्पन्न करता है ।
— रक्तं विसर्पप्लीहविद्रधीन् ॥ ८ ॥
कुष्ठवाताम्रपित्तास्रगुल्मोपकुशकामलाः । व्यङ्गाग्निनाशसम्मोहरक्तत्वङ्नेत्रमूत्रताः ॥ ९ ॥
११ अ ० हृ ०
पृष्ठ 198
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६२ अष्टाङ्गहृदये रक्तवृद्धि के लक्षण — विविध कारणों से बढ़ा हुआ रक्तधातु विसर्परोग, प्लीहारोग, विद्रधिरोग, कुष्ठ, वातरक्त, पित्तजरोग, रक्तपित्तरोग, गुल्मरोग, उपकुश ( दन्तवेष्टगत ) रोग, कामलारोग, व्यङ्ग ( क्षुद्ररोग ), अग्निनाश ( मन्दाग्नि ), मूर्च्छा, त्वचा, नेत्र एवं मूत्र में लालिमा का होना – इन लक्षणों को उत्पन्न कर देता है ॥८ - ९ ॥ मांसं गण्डार्बुदग्रन्थिगण्डोरुदरवृद्धिताः । कण्ठादिष्वधिमांसं च-मांसवृद्धि के लक्षण: -1 - विविध कारणों से बढ़ा हुआ मांसधातु गण्डमाला या गलगण्ड, अर्बुद तथा ग्रन्थिशोथ को उत्पन्न करता है; गण्डों ( गालों ), ऊरुओं तथा उदरप्रदेश में वृद्धि कर देता है; इसके अतिरिक्त
गले एवं गुद में अधिमासों को उत्पन्न कर देता है ।
—तद्वन्मेदस्तथा श्रमम् ॥ १० ॥
अल्पेऽपि चेष्टिते श्वासं स्फिक्स्तनोदरलम्बनम् । मेदोवृद्धि के लक्षण — विविध कारणों से बढ़ा हुआ मेदोधातु मांसवृद्धि के समान विकारों को उत्पन्न करता है । थोड़ा - सा भी परिश्रम करने पर श्वास ( साँस ) फूलने लगता है । स्फिक् ( चूतड़ ), स्तन तथा उदर इन अवयवों को लटका देता है ॥ १० ॥
अस्थ्यध्यस्थ्यधिदन्तांश्च— अस्थिवृद्धि के लक्षण — विविध कारणों से बढ़ा हुआ अस्थिधातु अस्थि की वृद्धि करता है और संख्या
से अधिक दाँतों को उत्पन्न कर देता है ।
— मज्जा नेत्राङ्गगौरवम् ॥ ११ ॥
पर्वसु स्थूलमूलानि कुर्यात्कृच्छ्राण्यरूंषि च । मज्जावृद्धि के लक्षण — विविध कारणों से बढ़ा हुआ मज्जाधातु नेत्रों तथा शरीर में भारीपन पैदा कर देता है । शरीरसन्धियों ( जोड़ों ) में स्थूल मूल वाली तथा कष्टसाध्य फुन्सियों को पैदा कर देता है ॥ ११ ॥
अतिस्त्रीकामतां वृद्धं शुक्रं शुक्राश्मरीमपि ॥। १२ ॥ शुक्रवृद्धि के लक्षण – विविध कारणों से बढ़ा हुआ शुक्रधातु इस स्थिति में पुरुष स्त्री- - सहवास की अत्यन्त इच्छा करता है और इससे शुक्राश्मरी की भी उत्पत्ति हो जाती है । १२ ॥ वक्तव्य — सुश्रुत के अनुसार रस आदि धातुओं की वृद्धि होने पर निम्न लक्षण होते हैं — रसधातु के अधिक बढ़ने पर मिचली, लालाम्राव होता है । रक्तधातु के अधिक बढ़ने पर अंगों तथा आँखों में लालिमा का आना एवं सिराओं का रक्त से भर जाना होता है । मांस के अधिक बढ़ने पर नितम्बों, गण्डस्थलों, ओष्ठों, जाँघों, बाहुओं, ऊरुओं तथा योनि में वृद्धि, शरीर में भारीपन आ जाता है । मेदोधातु के बढ़ने पर अंगों में चिकनापन, पेट तथा पसलियों में वृद्धि, कास, श्वास, हिचकी आदि रोगों का होना तथा शरीर से दुर्गन्ध का आना —ये लक्षण होते हैं । अस्थिधातु के बढ़ने पर चणकास्थियों तथा अधिदन्तों में वृद्धि हो जाती है । मज्जाधातु के बढ़ने पर सभी अंगों में विशेषकर आँखों में भारीपन आ जाता है । शुक्रधातु के बढ़ने पर शुक्राश्मरी हो जाती है तथा शुक्र की अतिप्रवृत्ति होती है । देखें— सु. सू. १५/१४ । सुश्रुत के इस वर्णन को देखकर ऐसा लग रहा है कि महर्षि वाग्भट ने रक्तवृद्धि का वर्णन करने के प्रवाह में आकर रक्तदुष्टि का भी वर्णन कर डाला है । देखें — विसर्प, कुष्ठ, व्यंग आदि रोग के दूषित होने पर ये लक्षण देखे जाते हैं, न कि रक्तवृद्धि होने पर । कुक्षावाध्मानमाटोपं गौरवं वेदनां शकृत् । पुरीषवृद्धि के लक्षण — — विविध कारणों से बढ़ा हुआ पुरीष ( मल ) कुक्षि ( मलाशय ) में आध्मान ( अफरा ), आटोप ( गुड़गुड़ाहट ), शरीर में भारीपन तथा वेदना को उत्पन्न करता है ।
पृष्ठ 199
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दोषादिविज्ञानीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् मूत्रं तु बस्तिनिस्तोदं कृतेऽप्यकृतसंज्ञताम् ॥ मूत्रवृद्धि के लक्षण — विविध कारणों से बढ़ा हुआ मूत्र बस्तिप्रदेश वृक्कों ) में निस्तोद ( चुभने की - सी पीड़ा ) करता है । पेशाब ( मूत्रत्याग ) है, मानो पेशाब नहीं किया हो ॥ १३ ॥
स्वेदोऽतिस्वेददौर्गन्ध्यकण्डूः-स्वेदवृद्धि के लक्षण — विविध कारणों से बढ़ा हुआ स्वेद ( पसीना ) ( खुजली ) पैदा कर देता है । — एवं च लक्षयेत् । दूषिकादीनपि मलान् अन्य मलवृद्धि के लक्षण- इसी प्रकार अन्य शारीरिक मलों की वृद्धि १६३ १३ ॥ ( मूत्राशय, मूत्रवहस्रोतस् तथा कर लेने पर भी ऐसा लगता शरीरभर में दुर्गन्ध तथा कण्डू बाहुल्यगुरुतादिभिः ॥ १४ ॥
के लक्षण भी होते हैं — दूषिका ( नेत्रमल ), आदि शब्द से नासिकामल, कर्णमल का ग्रहण भी कर लेना चाहिए । इन मलों के बढ़ जाने से उन - उन मलमार्गों में भारीपन प्रतीत होता है । इस लक्षण को देखकर उनकी वृद्धि समझनी चाहिए ॥ १४ । वक्तव्य — सुश्रुत ने ऊपर कहे गये मलों के अतिरिक्त आर्तव ( मासिकधर्म ), गर्भ तथा स्तन्य ( स्तनों में होने वाले दूध ) की भी गणना की है । देखें—- सु. सू. १५।५ । इनकी वृद्धि होने पर जो लक्षण होते हैं, उन्हें देखें — सु.सू. १५।१६ । इसी के आगे इन बढ़े हुए दोष, धातु तथा मलों को प्रकृतिस्थ करने के लिए संशोधन, संशमन आदि चिकित्साविधियों का निर्देश किया है । उक्त दोष, धातु एवं मलों की वृद्धि किस प्रकार होती है, इसका उत्तर देते हुए सुश्रुत कहते हैं— ' अपने कारणों को बढ़ाने वाले द्रव्यों का निरन्तर अधिक उपयोग करते रहने से ' और इन बढ़े हुए दोष, धातु एवं मलों को प्रकृतिस्थ करने के लिए इनके प्रतिकूल द्रव्यों का क्रमशः सेवन करना चाहिए, क्योंकि ' सामान्यतः क्रियायोगो निदानपरिवर्जनम् ' । यह सूत्र रूप में इनकी चिकित्सा का वर्णन है । लिङ्गं क्षीणेऽनिलेऽङ्गस्य सादोऽल्पं भाषितेहितम् । संज्ञामोहस्तथा श्लेष्मवृद्धयुक्तामयसम्भवः ॥ वातदोष के क्षय- लक्षण - वातदोष के क्षीण होने पर अर्थात् उसके सम अवस्था से क्षीण होने पर शरीरावयवों में थोड़ी शिथिलता, बोलने तथा शारीरिक चेष्टाओं में कमी, संज्ञामोह ( ठीक न समझ पाना ) तथा कफदोष के बढ़ने से होने वाले रोगों की उत्पत्ति का होना — ये लक्षण होते हैं ॥ १५ ॥
पित्ते मन्दोऽनलः शीतं प्रभाहानिः- -पित्तदोष के क्षय - लक्षण — पित्तदोष के क्षीण होने पर जठराग्नि की मन्दता, शीतता का अनुभव होना अथवा शरीर का शीतस्पर्श युक्त हो जाना तथा प्रभा ( कान्ति ) की कमी का होना — ये लक्षण होते हैं । –कफे भ्रमः । श्लेष्माशयानां शून्यत्वं हृद्रवः श्लथसन्धिता ॥ १६ ॥
कफदोष के क्षय - लक्षण — कफदोष के क्षीण होने पर भ्रम ( चक्करों का आना ), श्लेष्माशयों ( सिर तथा उरस् आदि ) में खालीपन का अनुभव होना, हृदय में कँपकँपी; पाठभेद — ' हृद्गदः ' के अनुसार हृदय सम्बन्धी रोग तथा सन्धियों में ढीलापन – ये लक्षण होते हैं ॥ १६ ॥
रसे रौक्ष्यं श्रमः शोषो ग्लानिः शब्दासहिष्णुता । रसधातु के क्षय - लक्षण— रसधातु के क्षीण होने पर शरीर में रूखापन, थकावट, शोष ( सूखना ), ग्लानि ( हर्षक्षय ) तथा शब्द के प्रति असहनशीलता ( किसी की बात - चीत सुनने तथा सहने की इच्छा का न होना ) – ये लक्षण होते हैं ।॥ १६ ॥
रक्तेऽम्लशिशिरप्रीतिशिराशैथिल्यरूक्षताः ॥१७ ॥
पृष्ठ 200
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६४ अष्टाङ्गहृदये रक्तधातु के क्षय- लक्षण - रक्तधातु के क्षीण होने पर खट्टे पदार्थों तथा शीतल पदार्थों के सेवन करने की इच्छा, सिराओं में शिथिलता का हो जाना तथा शरीर में रूक्षता की प्रतीति होना — ये लक्षण होते हैं ॥ १७ ॥
मांसेऽक्षग्लानिगण्डस्फिक्शुष्कतासन्धिवेदनाः मांसधातु के क्षय- लक्षण - मांसधातु के क्षीण होने पर इन्द्रियों में दुर्बलता तथा चूतड़ों का पिचक या सूख जाना और सन्धियों में पीड़ा का होना — ये लक्षण होते मेदसि स्वपनं कट्याः प्लीह्नो वृद्धिः कृशाङ्गता ॥ १८ ॥
मेदोधातु के क्षय - लक्षण — मेदोधातु के क्षीण होने पर कमर में संज्ञाशून्यता तथा शरीर का दुबला हो जाना — ये लक्षण होते हैं ॥ १८ ॥
अस्थ्न्यस्थितोदः शदनं दन्तकेशनखादिषु । अस्थिधातु के क्षय - लक्षण — अस्थिधातु के क्षीण होने पर हड्डियों में पीड़ा,
का गिरना तथा टूटना —ये लक्षण होते हैं ।
अस्थ्नां मज्जनि सौषिर्यं भ्रमस्तिमिरदर्शनम् ॥ १ ९ ॥
मज्जाधातु के क्षय - लक्षण — मज्जाधातु के क्षीण होने पर हड्डियों में सुषिरता ( का आना, आँखों के सामने अँधेरा छा जाना —ये लक्षण होते हैं ॥ १ ९ ॥। ( निरुत्साहता ), गालों हैं । , प्लीहा का बढ़ जाना दाँत, बाल एवं नखों खोखलापन ), चक्करों शुक्रे चिरात् प्रसिच्येत शुक्रं शोणितमेव वा । तोदोऽत्यर्थं वृषणयोर्मेढूं धूमायतीव च ॥ २० ॥
शुक्रधातु के क्षय - लक्षण- शुक्रधातु के क्षीण होने पर स्त्री- सहवास काल में देर से शुक्र का निकल पाना अथवा शुक्र के स्थान में रक्तधातु का निकलना, वृषणों ( अण्डकोषों ) में अत्यन्त पीड़ा का होना, लिंग में से धुआँ - सा निकलना — ये लक्षण होते हैं ॥२० ॥
पुरीषे वायुरन्त्राणि सशब्दो वेष्टयन्निव । कुक्षौ भ्रमति यात्यूर्ध्वं हृत्पार्श्वे पीडयन् भृशम् ॥ २१ ॥
पुरीषक्षय के लक्षण – पुरीष के क्षीण होने पर वातदोष गुड़गुड़ाहट शब्द करता हुआ मानो अंतड़ियों को लपेटता हुआ पेट भर में घूमता है, हृदय एवं पसलियों में अत्यन्त पीड़ा करता हुआ ऊपर की ओर जाता है॥२१ ॥
मूत्रेऽल्पं मूत्रयेत्कृच्छ्राद्विवर्णं साम्रमेव वा । मूत्रक्षय के लक्षण – मूत्र के क्षीण होने पर मूत्र बहुत कम मात्रा में कष्ट
उसका वर्ण, विकारयुक्त होता है अथवा उसमें रक्त मिला होता है ।
स्वेदे रोमच्युतिः स्तब्धरोमता स्फुटनं त्वचः ॥ २२ ॥
स्वेदक्षय के लक्षण –स्वेद के क्षीण होने पर रोम ( रोंये ) झड़ने लगते हैं कड़े हो जाते हैं, त्वचा फटने लग जाती है ॥ २२ ॥
के साथ निकलता है । अथवा सूअर के बालों मलानामतिसूक्ष्माणां दुर्लक्ष्यं लक्षयेत् क्षयम् । स्वमलायनसंशोषतोदशून्यत्वलाघवैः ॥ २३ ॥
अन्य मलों के क्षय- लक्षण - कान आदि के मलों के क्षीण होने पर ये कान आदि के मल अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं, अतः इनका क्षय सरलता से मालूम नहीं किया जा सकता । फिर भी उनके क्षयों को कान, आँख आदि, जिनसे वे निकला करते हैं, के सूख जाने से तथा उनमें होने वाले तोद ( चुभन ) से, शून्यता से तथा लाघव ( हलकापन की प्रतीति ) से जान लेना चाहिए ॥ २३ ॥
दोषादीनां यथास्वं च विद्यादृद्धिक्षयौ भिषक् । क्षयेण विपरीतानां गुणानां वर्धनेन च ॥ २४ ॥
वृद्धिं मलानां सङ्गाच्च क्षयं चाति विसर्गतः ।