श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 201–210
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 201–210
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दोषादिविज्ञानीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् १६५ वृद्धि एवं क्षय निर्देश – वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा पुरीष आदि मलों की वृद्धि एवं क्षय को चिकित्सक इस प्रकार जानें— दोष आदि के विपरीत गुणों एवं कर्मों के क्षय से उनकी वृद्धि समझें और उनके विपरीत गुणों को बढ़ता हुआ देखकर उनका क्षय समझें । मलों के संग ( भीतर रुक जाने ) से मलों की वृद्धि समझें और मलों के अधिक निकल जाने से उन ( मलों ) का क्षय समझें॥२४ । मलोचितत्वाद्देहस्य क्षयो वृद्धेस्तु पीडनः ॥ २५ ॥
पुरीषादि मलों का महत्त्व - पुरीष आदि मल शरीर के लिए उचित ( उपयोगी ) होते हैं । अतएव उन ( मलों ) के क्षय अथवा वृद्धि होने से अधिक कष्ट होता है ॥ २५ ॥
वक्तव्य — आप अतिसाररोग में देखें- इसमें मल का क्षय होना आरम्भ होते ही हट्टा - कट्टा पुरुष भी देखते - देखते धराशायी हो जाता है । अतएव सुश्रुत ने कहा है— ' दोषधातुमलमूलं हि शरीरम् ' । ( सु.सू. १५।३ ) इसका व्याख्यान वहीं देख लें । तत्रास्थनि स्थितो वायुः, पित्तं तु स्वेदरक्तयोः । श्लेष्मा शेषेषु, तेनैषामाश्रयाश्रयिणां मिथः ॥ यदेकस्य तदन्यस्य वर्धनक्षपणौषधम् । अस्थिमारुतयोर्नैवं, प्रायो वृद्धिर्हि तर्पणात् ॥ २७ ॥
श्लेष्मणाऽनुगता तस्मात् सङ्घयस्तद्विपर्ययात् । वायुनाऽनुगतोऽस्माच्च वृद्धिक्षयसमुद्भवान् ॥ विकारान् साधयेच्छीघ्रं क्रमाल्लङ्घनबृंहणैः । वात आदि के विशिष्ट स्थान — अस्थियों में वातदोष, स्वेद एवं रक्त में पित्तदोष और शेष रस तथा मांस आदि धातुओं में कफदोष रहता है । अतएव वात आदि दोषों तथा रस आदि धातुओं में आश्रय एवं आश्रयी सम्बन्ध है । यही कारण है कि आश्रय ( अस्थि आदि ) एवं आश्रयी ( वात आदि ) की आपस में जो औषधि एक ( आश्रय ) को बढाती है, वह दूसरे आश्रयी ( वातदोष ) को भी बढ़ाती है । इसी प्रकार जो औषधि या आहार - विहार एक को क्षीण करती है, वह दूसरे को भी क्षीण करती है । परन्तु अस्थि आश्रय और वायु आश्रयी में उक्त लक्षण चरितार्थ नहीं होता, क्योंकि वृद्धि में तर्पण ( तृप्ति ) क्रिया की प्रधानता रहती है, वह क्रिया कफदोष के अनुकूल होती है । इसलिए वृद्धि के कारण होने वाले रोगों में लंघन अर्थात् अपतर्पण से और क्षय से उत्पन्न होने वाले रोगों में रोगशान्ति के लिए बृंहणक्रिया करनी चाहिए, जिससे शीघ्र ही विकारों की शान्ति हो सके ॥ २६-२८ ॥ वायोरन्यत्र, तज्जांस्तु तैरेवोत्क्रमयोजितैः ॥ २ ९ ॥ वातजरोग - प्रतिकार — वायुजनित विकारों में उक्त परिभाषा अनुकूल नहीं होती है । वातज रोगों अर्थात् वातवृद्धि से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा लंघन ( अपतर्पण ) से करनी चाहिए ॥ २ ९ ॥ वक्तव्य ——— उक्त २६ से २८ तक के पद्यों का भाव स्पष्ट करने की दृष्टि से च.सू. २२ तथा २३ अध्यायों का अध्ययन करें । कहने का तात्पर्य यह है कि सन्तर्पणविधि से शरीर एवं रस आदि धातुओं की वृद्धि होती है । साथ ही वातदोष का क्षय होता है और अपतर्पण ( लंघन ) से सभी का क्षय होता है, किन्तु वातदोष की वृद्धि होती है । यही कारण है कि अस्थि आश्रय और वातदोष आश्रयी की चिकित्सा समान नहीं होती है । आगे चलकर श्रीवाग्भट ने अ.हृ.सू.१४ / ७ में इसी विषय की व्याख्या की है, उसे अवश्य देखें । विशेषाद्रक्तवृद्धयुत्थान् रक्तस्रुतिविरेचनैः । मांसवृद्धिभवान् रोगान् शस्त्रक्षाराग्निकर्मभिः ॥ ३० ॥
स्थौल्यकार्थ्योपचारेण मेदोजानस्थिसङ्क्षयात् । जातान्क्षीरघृतैस्तिक्तसंयुतैर्बस्तिभिस्तथा ॥ ३१ ॥
विड्वृद्धिजानतीसारक्रियया, विट्क्षयोद्भवान् । मेषाजमध्यकुल्माषयवमाषद्वयादिभिः ॥ ३२ ॥
मूत्रवृद्धिक्षयोत्यांश्च मेहकृच्छ्रचिकित्सया । व्यायामाभ्यञ्जनस्वेदमद्यैः स्वेदक्षयोद्भवान् ॥ ३३ वृद्धरक्तादि की चिकित्सा - विशेष कर के रक्तधातु की वृद्धि होने से उत्पन्न रोगों को रक्तस्रावण तथा विरेचन योगों से शान्त करें । मांसधातु की वृद्धि से होने वाले रोगों की चिकित्सा शस्त्रकर्म, क्षारकर्म तथा अग्निकर्म है । मेदोधातु की वृद्धि से उत्पन्न हुए रोगों की चिकित्सा कृशताकारक योगों से करनी चाहिए ।
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१६६ अष्टाङ्गहृदये ( देखें — अ.हृ.सू.१४ ) । अस्थिधातु के क्षय होने से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा दूध - घी के निरन्तर सेवन से तथा तिक्तरसयुक्त बस्तियों के प्रयोग से करनी चाहिए । मलों की वृद्धि एवं क्षय की चिकित्सा - पुरीष के बढने से पैदा हुए रोगों की चिकित्सा अतिसार की भाँति करें । पुरीषक्षय से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा भेड़ा तथा बकरा के मध्य काय के मांसभक्षण से अथवा कुल्माष ( अध उबले जौ आदि धान्य ) या माषद्वयों ( माष तथा राजमाष ) का अधिक सेवन करने से करे, क्योंकि ये सभी पुरीष को बढ़ाते हैं । मूत्रवृद्धि के कारण उत्पन्न हुए रोगों को प्रमेहचिकित्सा - विधि से ठीक करें और मूत्रक्षय से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा मूत्रकृच्छ्रचिकित्सा के अनुसार करें । स्वेदक्षय से पैदा हुए रोगों को व्यायाम, अभ्यंग, स्वेदन तथा मद्यपान आदि विधियों द्वारा ठीक करें । स्वेदवृद्धि के कारण उत्पन्न विकारों की चिकित्सा अ.हृ.अ. ३ ग्रीष्मऋतुचर्या में कहे गये शीतल उपचारों से ठीक करें ॥ ३०-३३ ॥ वक्तव्य- - ऊपर कहे गये पद्यों में प्रायः अनेक विषयों का समावेश कर दिया गया है, उनका विश्लेषण. हम यहाँ करेंगे । ऊपर श्लोक ३१ के आगे कुछ संस्करणों में एक श्लोक और मिलता है । जिसका संग्रह निर्णयसागरीय प्रति की टिप्पणी में इस प्रकार किया गया है— ' मज्जशुक्रोद्भवान् रोगान् भोजनैः स्वादुतिक्तकैः । वृद्धं शुक्रं व्यवायाद्यैर्यच्चान्यच्छुक्रशोषिकम् ' । यहाँ ' शुक्रशोषिकम् ' के स्थान पर ' शुक्रशोधनम् ' पाठ जो अन्यत्र मिलता है, अधिक रुचिकर है । अर्थात् मज्जा एवं शुक्र वृद्धि सम्बन्धी रोगों में मधुर तथा शीतल भोजन और वमन - -1 विरेचन रूपी शोधन दें । बढ़े हुए शुक्र को व्यायाम, मैथुन तथा शुक्रशोधक औषधोपचार से ठीक करें । इसी प्रकरण में किसी संस्करण में एक पंक्ति और इस प्रकार मिलती है— ' प्रत्यनीकौषधं मज्जाशुक्रवृद्धिक्षये हितम् ’ । अर्थात् मज्जा तथा शुक्र की विशेष वृद्धि हो जाने पर इनकी चिकित्सा के लिए इनके विपरीत आहारविहार तथा औषधद्रव्यों का प्रयोग करना चाहिए । पाठक ध्यान दें – इतना पाठ बढ़ा देने पर सम्पूर्ण वृद्धि तथा क्षयों का परिगणन हो गया है, ऐसा नहीं कहा जा सकता, अस्तु । इसका समाधान तो महर्षि वाग्भट द्वारा ३० वें पद्य के आरम्भ में प्रयुक्त ' विशेषात् ' पद से ही हो जाता है, क्योंकि ऊपर विशेष वृद्धियों की चिकित्सा का वर्णन कर दिया गया है, सामान्य वृद्धियों की चिकित्सा उसी विधि से की जा सकती है । सुश्रुत ने सूत्ररूप में धातुक्षयों की चिकित्सा का निर्देश इस प्रकार किया है — ‘ क्षय होने पर उस - उस धातु को बढ़ाने वाले द्रव्यों का उपयोग करे और धातुवृद्धि होने पर उनका यथोचित संशोधन करना चाहिए, जिससे उस धातु का अवश्य ही ह्रास हो सके । विशेष देखें — च.सू. २८।२४ से ३० तक तथा च.शा. ६।९ से ११ तक । स्वस्थानस्थस्य कायाग्नेरंशा धातुषु संश्रिताः । तेषां सादातिदीप्तिभ्यां धातुवृद्धिक्षयोद्भवः ॥ ३४ ॥
पूर्वी धातुः परं कुर्याद्वृद्धः क्षीणश्च तद्विधम् । धातुओं की वृद्धि - क्षय — अपने स्थान में स्थित रहने पर भी पाचकाग्निं के वे अंश, जो धातुओं में रहते हैं, उनके मन्द रहने से धातुओं की वृद्धि हो जाती है तथा उनके प्रदीप्त ( प्रखर ) रहने से धातुओं का क्षय हो जाता है । वृद्धि - क्षय का कारण – इनमें पहला धातु अपनी सीमा से बढ़कर वह परधातु ( अपने से बाद वाली धातु ) को भी बढ़ा देता है और यदि वह ( पूर्वधातु ) क्षीण हो जाता है तो परधातु को भी क्षीण कर देता है || ३४ || वक्तव्य – रस आदि धातुओं में स्थित अग्नितत्त्व जब मन्द हो जाता है तो उस धातु का समुचित पाक नहीं हो पाता, इस कारण से वह धातु बढ़ जाता है । जब धातुगत अग्नितत्त्व तेज हो जाता है तो उस धातु का अधिक पाक हो जाता है, अतः वह धातु घट जाता है । यह भी धातुओं की वृद्धि - क्षय का एक प्रमुख कारण होता है ।
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दोषादिविज्ञानीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् १६७ वृद्धि - क्षय का दूसरा स्वरूप- -बढ़ा हुआ रसधातु रक्तधातु को बढ़ा सकता है या बढ़ा देता है, इसी प्रकार अन्य धातुओं को भी समझें । ऐसे ही क्षीण रसधातु रक्त को भी क्षीण कर सकता है या कर देता है । इसी क्रम से अन्य धातुओं को भी समझें । इन सभी धातुओं को तृप्त करने वाला ' अन्नपानरस ' होता है । अतएव आगे कहा गया है— ' तेषां क्षयवृद्धी शोणितनिमित्ते ' । ( सु.सू. - १४।२१ ) अर्थात् रक्त
से लेकर शुक्र तक के धातुओं की क्षय - वृद्धि का निमित्त कारण रक्त है ।
दोषा दुष्टा रसैर्धातून् दूषयन्त्युभये मलान् ॥ ३५ ॥
अधो द्वे, सप्त शिरसि, खानि स्वेदवहानि च । मला मलायनानि स्युर्यथास्वं तेष्वतो गदाः ॥ ३६ ॥
दोष, धातु, मल एवं स्रोतों की दुष्टि - वात आदि दोष मधुर आदि छ: रसों द्वारा दुष्ट होकर रस आदि सात धातुओं को दूषित कर देते हैं और वे दोनों ( दोष एवं धातु ) पुरीष आदि मलों को दूषित कर देते हैं । वे मल अपने - अपने मलमार्गों को दूषित कर देते हैं, जिनके फलस्वरूप उन स्थानों में विविध प्रकार के रोग हो जाते हैं । मलायनों का परिचय — नीचे के भाग में दो ( १. मल एवं २. मूत्रमार्ग ), शिरःप्रदेश में सात ( कानों 1 के स्रोत २, नासारन्ध्र २, नेत्र २ तथा मुख १ ) तथा स्वेदवाही असंख्य रोमकूप ॥ ३५-३६ ॥ वक्तव्य — ‘ यथास्वं ’ अर्थात् जो जिसका स्थान है, उस - उस में उससे सम्बन्धित रोग होते हैं । वातज रोग वायु के, पित्तज रोग पित्त के तथा कफज रोग कफ के स्थानों ( आशयों ) में । रस आदि धातुओं के रोग उन - उन धातुओं में होते हैं । मलों के रोग अपने मलायनों में होते हैं । ओजस्तु तेजो धातूनां शुक्रान्तानां परं स्मृतम् । हृदयस्थमपि व्यापि देहस्थितिनिबन्धनम् ॥ ३७ ॥
स्निग्धं सोमात्मकं शुद्धमीषल्लोहितपीतकम् । यन्नाशे नियतं नाशो यस्मिंस्तिष्ठति तिष्ठति ॥ निष्पद्यन्ते यतो भावा विविधा देहसंश्रयाः । ओजस् का वर्णन — रस से शुक्र - पर्यन्त समस्त धातुओं का सर्वश्रेष्ठ तेजस् ‘ ओजस् ' है । वह हृदय में स्थित रहने पर भी सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है । वह शरीर स्थिति का आधार है । वह स्निग्ध, सोमगुणयुक्त, शुद्ध तथा लाल - पीला वर्ण वाला है । जिसका नाश होने पर मनुष्य की मृत्यु हो जाती है और जिसके रहने पर मनुष्य जीवित रहता है । जिसके रहने के कारण विविध प्रकार के कान्ति, पराक्रम आदि भाव मनुष्य में देखे जाते हैं ॥ ३७-३८ ॥ ओजः क्षीयेत कोपक्षुद्ध्यानशोकश्रमादिभिः ॥ ३ ९ ॥ बिभेति दुर्बलोऽभीक्ष्णं ध्यायति व्यथितेन्द्रियः । दुःच्छायो दुर्मना रूक्षो भवेत्क्षामश्च तत्क्षये ॥ जीवनीयौषधक्षीररसाद्यास्तत्र भेषजम् । ओजःक्षय के कारण — क्रोध, भूख, चिन्ता, शोक तथा परिश्रम आदि कष्टों से ओजस् का क्षय हो जाता है । ओजःक्षय के लक्षण — इसके क्षीण होने पर मनुष्य दूसरों से डरता है, दुर्बल हो जाता है, बार - बार अधिक चिन्ता करने लगता है, उसकी इन्द्रियाँ दुःखित हो जाती हैं, वह कान्ति रहित हो जाता है, उसका मन दुःखी हो जाता है, शरीर रूक्ष हो जाता है और वह कृश ( दुबला ) हो जाता है । ओजःक्षय की चिकित्सा — इसमें जीवनीय गण में परिगणित द्रव्यों का सेवन, दूध का सेवन, मांसरस आदि बलवर्धक द्रव्यों का निरन्तर सेवन करते रहना चाहिए; यही इसकी उत्तम चिकित्सा है ॥ ३ ९ -४० ॥ वक्तव्य — सुश्रुत ने इसका वर्णन विस्तार से किया है । देखें— सु.सू.१५।१ ९ से ३१ तक तथा च. सू. १७।७३-७७ । आगे चलकर सुश्रुत ने ओजस् को ' बल ' संज्ञा दी है । देखें— ' त्रयो दोषा बलस्योक्ताः ' । ( सु.सू. १५।२५ ) इसके पहले २० वें गद्य में भी इसे ' बल ' कहा गया है ।
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१६८ अष्टाङ्गहृदये ' यन्नाशे नियतं नाशो ' - जिस ओजस् के नाश से निश्चित रूप से मृत्यु हो जाती है । ' ओजस् ' तत्त्व के न रहने पर जीवित पुरुष को ' जीवन्मृत ' कहा जा सकता है, क्योंकि ओजस् के बिना उसमें पुरुषत्व का अभाव हो जाता है । यदि मर गया तो फिर कहना ही क्या है! आज का जिज्ञासु छात्र शवच्छेद के समय उस मृत देह में यदि ओजोधातु को खोजता है तो उसकी भूल है, क्योंकि वह केवल ओजस्वी पुरुष में ही रहता है, दूसरों में नहीं । ओजस् के गुणों का वर्णन सुश्रुत - सू. १५।२१ में देखें । ओजोवृद्धौ हि देहस्य तुष्टिपुष्टिबलोदयः ॥ ४१ ॥
ओजोवृद्धि के लक्षण – जीवनीय द्रव्य आदि के सेवन करने से ओजस् की वृद्धि होने पर देह स्थित मन या देही प्रसन्न ( सन्तुष्ट ) रहता है, शरीर पुष्ट होकर बल ( ओजस् ) का उदय होता है ॥ ४१ ॥
वक्तव्य — आचार्य शार्ङ्गधर ने ओजस् को शुक्र का उपधातु स्वीकार किया है । यही कारण है कि ऊपर ४१ वें श्लोक में ओजःक्षय - चिकित्सा में जिन द्रव्यों के सेवन करने का महर्षि वाग्भट ने निर्देश दिया है, उनसे पहले शुक्रधातु की पुष्टि होती है, उसके साथ - ही - साथ ओजस् की भी पुष्टि होती है । यदन्नं द्वेष्टि यदपि प्रार्थयेताविरोधि तु । तत्तत्त्यजन् समश्नंश्च तौ तौ वृद्धिक्षयौ जयेत् ॥ ४२ ॥
वृद्धि - क्षय का चिकित्सासूत्र - जिस विरोधी अन्न ( आहार ) से मनुष्य द्वेष करता है अर्थात् जिस आहार का वह सेवन करना नहीं चाहता है, उसको छोड़ता हुआ उस - उस दोष, धातु एवं मल की वृद्धि को जीत लेता है अर्थात् उसे बढ़ने नहीं देता । जिस अविरोधी आहार का वह सेवन करना चाहता है और उसका सेवन करता हुआ मनुष्य उस - उस दोष, धातु, मल के क्षय पर वह विजय प्राप्त कर लेता है ॥४२ ॥
कुर्वते हि रुचिं दोषा विपरीतसमानयोः । वृद्धाः क्षीणाश्च भूयिष्ठं लक्षयन्त्यबुधास्तु न ॥ ४३ ॥
द्वेष एवं प्रार्थना का कारण — बढ़े हुए दोष प्रायः अपने से विपरीत गुणवाले आहारों के सेवन की इच्छा को प्रकट करते हैं और क्षीणता को प्राप्त हुए दोष प्रायः समान गुण वाले आहारों का सेवन करने की इच्छा रखते हैं । इस वास्तविकता को शास्त्र को न जानने वाले पुरुष नहीं समझ पाते, बुद्धिमान् इसे समझ जाते हैं ॥ ४३ ॥।
वक्तव्य- –उक्त परिभाषा के अन्तर्गत न केवल दोषों का ही समावेश होता है अपितु रस आदि धातुओं तथा पुरीष आदि मलों का भी समावेश कर लेना चाहिए । इस प्रसंग में च.शा. ६।९ गद्य को देखें । अर्थात् शरीरस्थ धातुएँ समान गुण अथवा समान गुणबहुल आहार - विहार के निरन्तर सेवन करने से बढ़ती हैं और इसके विपरीत अथवा विपरीत गुणबहुल आहार - विहार से क्षीण होती हैं । दूसरा कारण यह भी है— ' सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् । ह्रासहेतुर्विशेषश्च प्रवृत्तिरुभयस्य च ' । ( च.सू. ११४४ ) अर्थ स्पष्ट है । आप उक्त ४३ वें पद्य का भाव इस प्रकार समझें- जब मानव भरपेट भोजन किया रहता है तब वह भोजन से द्वेष करता है और जब भोजन का क्षय हो जाता है, तब वह भोजन करने की इच्छा प्रकट करता है इत्यादि । यथाबलं यथास्वं च दोषा वृद्धा वितन्वते । रूपाणि, जहति क्षीणाः, समाः स्वं कर्म कुर्वते ॥ ४४ ॥
अवस्थानुसार दोषों के कर्म — बढ़े हुए दोष अपनी शक्ति के अनुसार अपने रूपों ( लक्षणों ) का विस्तार करते हैं । घटे हुए अर्थात् क्षीण दोष अपने लक्षणों ( गुण - कर्मों ) का त्याग करते हैं और सम दोष ( इसी अध्याय के ४ थे श्लोक के अनुसार ) अपना - अपना कर्म करते रहते हैं ॥ ४४ ॥
य एव देहस्य समा विवृद्ध्यै त एव दोषा विषमा वधाय ।
यस्मादतस्ते हितचर्ययैव क्षयाद्विवृद्धेरिव रक्षणीयाः ॥ ४५ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने दोषादिविज्ञानीयो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
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दोषादिविज्ञानीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् १६ ९ दोषों को सम रखना - जो वात आदि दोष सम स्थिति पर रहने से शरीर की वृद्धि का कारण होते हैं, वे ही दोष विषम होने पर शरीर के विनाश के कारण होते हैं । अतएव हितकर आहार - विहार द्वारा दोषों की वृद्धि के समान ही दोषों के क्षय से भी रक्षा करनी चाहिए ॥ ४५ ॥
वक्तव्य — समदोष की स्थिति ही उत्तम स्वास्थ्य के लिए हितकर होती है । अतः उत्तम स्वास्थ्य की इच्छा करने वाले पुरुष को ऐसा आहार - विहार करना चाहिए जिससे वात आदि दोष, रस आदि धातु तथा पुरीष आदि मल न बढ़ें और न घटें । इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा रचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय - सूत्रस्थान में दोषादिविज्ञानीय नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ॥ ११ ॥
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द्वादशोऽध्यायः
अथातो दोषभेदीयाध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥
अब हम यहाँ से दोषभेदीय नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे । जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था । उपक्रम —दोषविज्ञानीय अध्याय के बाद अब यहाँ दोषभेदीय अध्याय का आरम्भ किया जा रहा है । क्योंकि वात आदि दोषों के भेदों का वर्णन किये बिना दोषों के सम्बन्ध में उनकी विशेष चर्चा नहीं की जा सकती । ग्यारहवें अध्याय में दोषों के बारे में अनेक विषयों की चर्चा करनी थी, अतः वहाँ हमने दोषभेदों का वर्णन नहीं किया । अन्य संहिताओं में इस विषय का वर्णन कहाँ - कहाँ है, देखें । संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेत — च. सू. ११, १७, १ ९, २०, २८; च.शा. १ तथा च.चि. २८; सु.सू. २१, २४; सु.नि. १, ३; सु.उ. ६६ एवं अ.सं.सू. २०, २२ में देखें । पक्वाशयकटीसक्थिश्रोत्रास्थिस्पर्शनेन्द्रियम् । स्थानं वातस्य, तत्रापि पक्वाधानं विशेषतः ॥ १ ॥
बात के प्रमुख स्थान — पक्वाशय ( मलाशय ), कमर, दोनों टाँगें, दोनों कान, अस्थियाँ तथा त्वचा ये वात के स्थान कहे गये हैं । इन सबमें पक्वाधान अर्थात् जठराग्नि द्वारा पुनः पके हुए आहार का स्थान मलाशय इसका प्रमुख स्थान है ॥ १ ॥
वक्तव्य — यद्यपि शरीरस्थ वातदोष सम्पूर्ण शरीर में भ्रमण करता है, फिर भी सामान्य - विशेष की दृष्टि से ऊपर वात के स्थानों का परिचय दिया गया है । अन्यत्र यह भी वर्णन मिलता है— ' हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिमण्डले । उदानः कण्ठदेशे स्याद् व्यानः सर्वशरीरगः ' ॥ ये सब भेद प्राचीन आचार्यों के विचार - भेद हैं और सभी तथ्यपूर्ण हैं । उक्त स्थानों पर वातदोष की विकृति का प्रभाव विशेषरूप से देखा जाता है । नाभिरामाशयः स्वेदो लसीका रुधिरं रसः । दृक् स्पर्शनं च पित्तस्य, नाभिरत्र विशेषतः ॥ २ ॥
पित्त के प्रमुख स्थान – नाभि, आमाशय, स्वेद ( पसीना ), लसीका, रुधिर, रस, दृष्टि तथा त्वचा सामान्य रूप से ये पित्त के स्थान हैं । इन सबमें पित्त का प्रमुख स्थान नाभि है ॥२ ॥
वक्तव्य — यहाँ ‘ नाभि ’ शब्द से ढोंढ़ी या धुन्नी का ग्रहण नहीं किया गया है, जो उदर के बाहर देखी जाती है । सुश्रुत में नाभि का परिचय इस प्रकार है— ' पक्वामाशययोर्मध्ये सिराप्रभवा नाभिः ’ । ( सु.शा. ६।२५ ) अर्थात् पक्वाशय एवं आमाशय के बीच में सिराओं का उत्पत्तिस्थान नाभि नामक मर्म है । इसी को ‘ क्षुद्रान्त्र ' भी कहते हैं । लसीका — ' यत्तु त्वगन्तरे व्रणगतं लसीकाशब्दं लभते ' । ( च.शा. ७।१५ ) अर्थात् लसीका की स्थिति त्वचा के भीतर मानी है । यही कारण है कि त्वचा के रगड़ जाने से उससे जो लसीला द्रव पदार्थ निकलता है, उसे लसीका कहते हैं । स्पर्शनम् — यहाँ त्वचा को केवल पित्त का स्थान कहा गया है । आप ध्यान दें - सुश्रुत ने ' सप्त त्वचो भवन्ति ' ( सु.शा. ४।४ ) अर्थात् सात त्वचाएँ होती हैं कहा है और चरक ने ' शरीरे षट् त्वचः ’ ( च.शा. ७।४ ) अर्थात् छः त्वचाएँ होती हैं, स्वीकार किया है । इन दोनों आचार्यों के मतभेद की चर्चा हम शारीरस्थान में करेंगे । सुश्रुत ने पहली त्वचा का नाम अवभासिनी रखा है, इसमें भ्राजक नामक पित्त
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दोषभेदीयाध्यायः १२ ] सूत्रस्थानम् १७१ रहता है और पाँचवीं त्वचा का नाम ' वेदनी ' है, इसी को स्पर्शनेन्द्रिय भी कहते हैं । वास्तव में वात का स्थान यही है, इसी से शीत - उष्ण स्पर्श का ज्ञान होता है । उरःकण्ठशिरःक्लोमपर्वाण्यामाशयो रसः । मेदो घ्राणं च जिह्वा च कफस्य, सुतरामुरः ॥ ३ । कफ के प्रमुख स्थान — उरस् ( छाती ), कण्ठ, सिर, क्लोम, पर्व ( सन्धियाँ ), आमाशय, रसधातु, मेदोधातु, घ्राण ( नासिका ) तथा जीभ ये सब कफ के स्थान हैं । प्रमुख रूप से कफ का स्थान उरस् है ॥। ३ ॥ वक्तव्य — सुश्रुत ने शरीरसंख्याव्याकरण नामक ५ वें अध्याय के ५ वें गद्य में जो त्वचा से स्रोतों तक के अवयवों की गणना की है, उसमें हृदय तथा फुप्फुस आदि का समावेश किया गया है । अष्टाङ्गहृदय में इसका वर्णन शारीरस्थान अध्याय ३ में देखें । ये सब कफ के स्थान हैं । प्राणदिभेदात्पञ्चात्मा वायुः-वात के पाँच भेद - प्राण, उदान, व्यान, समान तथा अपान भेद से यह वात पाँच प्रकार का होता है । —प्राणोऽत्र मूर्धगः । उरः कण्ठचरो बुद्धिहृदयेन्द्रियचित्तधृक् ॥ ४ ॥
ष्ठीवनक्षवथूद्गारनिःश्वासान्नप्रवेशकृत् । पाँच वातों का वर्णन —उक्त पाँच वातों में प्राण नामक वायु शिरः प्रदेश में गतिशील रहता है । कण्ठ तथा उरःप्रदेश में उदानवायु विचरण करता हुआ बुद्धि, हृदय, सभी इन्द्रियों एवं मन को धारण करता है । यह ष्ठीवन ( थूकना तथा लालाम्राव ), छींक, उद्गार, निःश्वास तथा अन्नप्रवेश ( मुख से अन्न को भीतर ) की ओर ढकेलना कर्मों को करता है ॥४ ॥
वक्तव्य — चरक ने ‘ उत्तमाङ्ग ' शिरःप्रदेश का वर्णन इस प्रकार किया है —–— प्राणाः प्राणभृतां यत्र श्रिताः सर्वेन्द्रियाणि च । यदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते ' । ( च.सू. १७।१२ ) अर्थात् जहाँ प्राणियों के प्राण तथा सभी इन्द्रियाँ आश्रित रहती हैं और जो सभी अंगों में उत्तम अंग है, उसे सिर कहते हैं । सुश्रुत ने जत्रु के ऊपरी भाग में स्थित गरदन सहित अंगों को सिर कहा है और यह ३७ मर्मों का अधिष्ठान है । देखें— ' जत्रुण... अधिपतिरिति । ( सु.शा. ६।६ ) उरःस्थानमुदानस्य नासानाभिगलांश्चरेत् ॥ ५ ॥
वाक्प्रवृत्तिप्रयत्नोर्जाबलवर्णस्मृतिक्रियः उदानवायु का वर्णन — उदानवायु का प्रमुख स्थान उरस् ( छाती ) है । वह वायु नासिका ( नाक ), नाभि ( इसका परिचय श्लोक २ के वक्तव्य में ऊपर दिया गया है ) तथा गल ( कण्ठ ) प्रदेश में विचरण करता रहता है । वाक्प्रवृत्ति ( वाणी का निकलना ), प्रयत्न ( कर्म करने के प्रति उत्साह ), ऊर्जा ( शक्ति ), बल. वर्ण और स्मृति ये सब क्रियाएँ उसी वायु के अधीन हैं ॥५ ॥
व्यानो हृदि स्थितः कृत्स्नदेहचारी महाजवः ॥ ६ ॥
गत्यपक्षेपणोत्क्षेपनिमेषोन्मेषणादिकाः । प्रायः सर्वाः क्रियास्तस्मिन् प्रतिबद्धाः शरीरिणाम् ॥ व्यानवायु का वर्णन – व्यानवायु का प्रमुख स्थान हृदय है । यह वायु सम्पूर्ण शरीर में विचरण करता रहता है, क्योंकि यह अत्यन्त वेगवान् होता है । गति ( घूमते रहना ), अपक्षेपण ( अंगों को नीचे की ओर ले जाना ), उत्क्षेपण ( ऊपर की ओर ले जाना ), निमेष ( आँख बन्द करना ), उन्मेष ( आँख खोलना ), आदि शब्द से जँभाई आदि का ग्रहण - ये सभी क्रियाएँ व्यानवायु के अधीन होती हैं ॥ ६-७ ॥ वक्तव्य — व्यानवायु के जिन कर्मों की यहाँ चर्चा की गयी है, उनसे भी महत्त्वपूर्ण वर्णन शारीरस्थान ३।६८ में इनका किया है, उसका अवलोकन अवश्य कर लें । समानोऽग्निसमीपस्थः कोष्ठे चरति सर्वतः । अन्नं गृह्णाति पचति विवेचयति मुञ्चति ॥८ ॥
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१७२ अष्टाङ्गहृदये समानवायु का वर्णन - समानवायु पाचकाग्नि के समीप रहता है । यह कोष्ठप्रदेश में चारों ओर घूमता रहता है । यह आमाशय से अन्न को लेता है, फिर उसे पचाता है, उसकी विवेचना करता है और उस पके हुए आहार में से रस, मल तथा मूत्र को अलग - अलग करके उन्हें यथास्थान छोड़ देता है ॥८ ॥
अपानोऽपानगः श्रोणिबस्तिमेढोरुगोचरः । शुक्रार्तवशकृन्मूत्रगर्भनिष्क्रमणक्रियः ॥ ९ ॥
अपानवायु का वर्णन – अपानवायु प्रधानरूप से अपान ( गुद ) प्रदेश में रहता है । सामान्य रूप से कमर, बस्ति ( मूत्राशय एवं मूत्रवाही स्रोतों ), मेहन ( मूत्रमार्ग ) तथा ऊरुओं में पाया जाता है और यही शुक्र, आर्तव, मल, मूत्र, गर्भाशय से गर्भ को समय पर बाहर निकालना भी इसी का कार्य है ॥ ९ ॥
पित्तं पञ्चात्मकं-पित्त के पाँच भेद - पित्त के पाँच भेद इस प्रकार हैं —१. पाचक, २. रंजक, ३. साधक, ४. आलोचक
तथा ५. भ्राजक ।
-तत्र पक्वामाशयमध्यगम् । पञ्चभूतात्मकत्वेऽपि यत्तैजसगुणोदयात् ॥ १० ॥
त्यक्तद्रवत्वं पाकादिकर्मणाऽनलशब्दितम् । पचत्यन्नं विभजते सारकिट्टौ पृथक् तथा ॥ ११ ॥
तत्रस्थमेव पित्तानां शेषाणामप्यनुग्रहम् । करोति बलदानेन पाचकं नाम तत्स्मृतम् ॥ १२ ॥
पाचक पित्त का वर्णन — उक्त पाँच पित्तों में जो पित्त पक्वाशय तथा आमाशय के मध्यभाग ( क्षुद्रान्त्र ) में गतिशील होता है और जो पञ्चमहाभूतात्मक होने पर भी तैजस् ( आग्नेय ) गुण की प्रधानता के कारण जिसने अपना द्रव स्वरूप छोड़ कर कठिन ( अग्नि ) रूप धारण कर लिया है और पाचन आदि कर्मों को करने के कारण जो अग्नि संज्ञा को धारण कर लिया है । जो खाये हुए आहार को पचाता है तथा सार ( रस ) एवं किट्ट ( मल - मूत्र ) को विभाजित करता है । वहाँ रहकर रञ्जक आदि पित्तों को जो शक्ति प्रदान करके उनके ऊपर कृपा करता है, उसे ' पाचक पित्त ' कहते हैं ॥ १०-१२ ॥ आमाशयाश्रयं पित्तं रञ्जकं रसरञ्जनात् । रञ्जक पित्त का वर्णन — जो पित्त आमाशय में रहता है, वह रस को रंग देने के कारण रञ्जक पित्त कहा जाता है । वक्तव्य — सुश्रुत के अनुसार — ' स खलु आप्यो रसो यकृत्प्लीहानौ प्राप्य रागमुपैति ' । ( सु.सू. १४।४ ) अर्थात् शरीर का पोषक रसधातु ही यकृत् - प्लीहा में पहुँचकर लालिमा को प्राप्त हो जाता है । और भी देखें — ‘ यत्तु यकृत्प्लीह्नोः पित्तं तस्मिन् रञ्जकोऽग्निरिति संज्ञा ' । ( सु.सू. २१।१० ) अर्थात् जो पित्त यकृत् - प्लीहा में रहता है, उसका नाम ' रञ्जक पित्त ' है । इस दृष्टि से महर्षि वाग्भट का यह पाठ ' आमाशयाश्रयं पित्तं रञ्जकं ' समुचित प्रतीत नहीं होता । यहाँ वाग्भट का उक्त कथन आधुनिक विचारों से प्रभावित है, ऐसा लगता है । देखें — यह आमाशयाश्रय पित्त ' हाइड्रोक्लोरिक अम्ल ' नामक वह आमाशयिक रस है जो पित्त की भाँति खाये हुए आहार को पचाने में सहायक होता है और उसके मिश्रण से यकृत् - प्लीहा में पहुँचने पर वही रस राग को पाकर रक्त का रूप धारण कर लेता है । यही चरितार्थता है वाग्भट के उक्त
वचनों की ।
बुद्धिमेधाभिमानाद्यैरभिप्रेतार्थसाधनात् ॥१३ ॥
साधकं हृद्गतं पित्तं— साधक पित्त का वर्णन — जो पित्त हृदय में रहता है, उसे ' साधक पित्त ' कहते हैं । यह पित्त बुद्धि, मेधा, अभिमान ( अहंकार ) आदि द्वारा इच्छित पदार्थों की सिद्धि करता है ॥ १३ ॥
-रूपालोचनतः स्मृतम् । दृक्स्थमालोचकं—
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दोषभेदीयाध्यायः १२ ] सूत्रस्थानम् १७३ आलोचक पित्त का वर्णन – जो पित्त दृष्टिमण्डल में रहता है, उसे आलोचक पित्त कहते हैं । यह
पित्त रूप ( स्वरूप, आकार या वर्ण ) को देखने में उपयोगी ( सहायक ) होता है ।
- त्वक्स्थं भ्राजकं भ्राजनात्त्वचः ॥ १४ ॥
भ्राजक पित्त का वर्णन — जो पित्त सबसे बाहरी अतएव प्रथम ( अवभासिनी ) त्वचा में रहता है वह त्वचा को कान्तियुक्त करता है, इसीलिए इसे ' भ्राजक पित्त ' कहते हैं ॥ १४ ॥
वक्तव्य —— त्वचागत द्रव में जो पीलापन दिखलायी देता है, यही भ्राजक पित्त है । इसी से त्वचा में चमकीलापन दिखलायी देता है । श्लेष्मा तु पञ्चधा— कफ का वर्णन — शरीर में कफ भी पाँच प्रकार का होता है —१. अवलम्बक, २. क्लेदक, ३. बोधक,
४. तर्पक तथा ५. श्लेषक – ये उसके नाम हैं ।
—उरस्थः स त्रिकस्य स्ववीर्यतः । हृदयस्यान्नवीर्याच्च तत्स्थ एवाम्बुकर्मणा ॥ १५ ॥
कफधाम्नां च शेषाणां यत्करोत्यवलम्बनम् । अतोऽबलम्बकः श्लेष्मा— अवलम्बक कफ का वर्णन — जो कफ उर: प्रदेश में रहता है वह अपनी शक्ति से त्रिकास्थि का तथा आहार से हृदय का अवलम्बन ( सहारा ) करता है और वहीं ( हृदय में ) रहकर जलकर्म द्वारा आमाशय आदि दूसरे कफस्थानों की भी सहायता ( अवलम्बन ) करता है, अतएव इसे ' अवलम्बक ' कहा जाता है ॥ १५ ॥
वक्तव्य — ‘ पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुषः ' । ( सु.सू. ११२२ ) के अनुसार शरीर में स्थित जल तत्त्व ' कफ ' की संज्ञा है । इसी को श्लेष्मा भी कहते हैं । देखें — सु. सू. २१।१४ । इस प्रकार ये वात - पित्त - कफ क्रमशः यहाँ वायु, अग्नि एवं जल तत्त्वों के प्रतिनिधि हैं; इन्हीं से शरीर की उत्पत्ति होती है । देखें — ' वातपित्तश्लेष्माण एव देहसम्भव हेतवः ' । ( सु.सू. २१।३ ) ध्यान रहे, जलतत्त्व में कुछ अंश पृथिवी तत्त्व का भी होता है,
अतएव इसमें स्थिरता तथा गुरुता बनी रहती है ।
-यस्त्वामाशयसंस्थितः ॥ १६ ॥
क्लेदकः सोऽन्नसङ्घातक्लेदनात्-क्लेदक कफ का वर्णन — जो कफ आमाशय में रहकर अपना कार्य करता है वह अन्न ( आहार - समूह ) को गीला करता है, अतः इसे ' क्लेदक ' कहते हैं ॥ १६ ॥
—रसबोधनात् । बोधको रसनास्थायी— बोधक कफ का वर्णन — जो कफ रसना ( जीभ ) में रहता है वह वहाँ रहकर मधुर आदि रसों
का बोध कराता है, अतएव उसे ' बोधक ' कहते हैं ।
- शिरः संस्थोऽक्षतर्पणात् ॥ १७ ॥
तर्पक: -तर्पक कफ का वर्णन — जो कफ सिर ( मस्तिष्क ) में रहता है वह सभी ज्ञानेन्द्रियों का तर्पण, करता है अर्थात् इन्द्रियों को अपने सहयोग से तृप्त करता है, अतएव इसे ' तर्पक ' कहते हैं ॥१७ ॥
—सन्धिसंश्लेषाच्छ्लेषकः सन्धिषु स्थितः । श्लेषक कफ का वर्णन — जो कफ शरीर के सन्धिस्थलों में रहता है वह सन्धियों को सटाता है, अतः उसे ' श्लेषक ' कहते हैं । वक्तव्य — यहाँ एक - एक वात, पित्त, कफ के पाँच - पाँच नाम रखकर जो उनका परिचय दिया गया है, वह उनके कार्यक्षेत्रों के नाम हैं । जैसे एक ही व्यक्ति सम्बन्ध - विशेष से पिता, चाचा, मामा, भाई
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१७४ अष्टाङ्गहृदये आदि कहा जाता है; ऐसे ही कार्यभेद से उसके भिन्न - भिन्न नाम हो जाते हैं, वैसी ही उक्त संज्ञाएँ वात
आदि दोषों की भी निर्धारित की गयी हैं ।
इति प्रायेण दोषाणां स्थानान्यविकृतात्मनाम् ॥ १८ ॥
व्यापिनामपि जानीयात्कर्माणि च पृथक्पृथक् । उपसंहार — यहाँ तक अविकृत अर्थात् प्रकृतिस्थ वात, पित्त तथा कफ नामक दोषों और उनके पाँच-पाँच भेदों के प्रमुख स्थानों एवं उनके कार्यों का वर्णन कर दिया गया है । यद्यपि उक्त वात आदि दोष सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होते हैं, फिर भी उनके उक्त कर्मों के कारण उनके मानवशरीर में भिन्न - भिन्न स्थानों को समझ लेना चाहिए ॥१८ ॥
उष्णेन युक्ता रूक्षाद्या वायोः कुर्वन्ति सञ्चयम् ॥ १ ९ ॥ शीतेन कोपमुष्णेन शमं स्निग्धादयो गुणाः । वात के चय, कोप, शम का वर्णन – उष्णवीर्य से युक्त रूक्ष आदि गुण वातदोष का संचय करते हैं, शीतवीर्य से युक्त रूक्ष आदि गुण वातदोष को प्रकुपित करते हैं और उष्णवीर्य से युक्त स्निग्ध आदि गुण वातदोष का शमन करते हैं ॥१ ९ ॥ वक्तव्य- - रूक्ष आदि गुण – रूक्ष, शीत, खर, सूक्ष्म, चल तथा विशद इन गुणों वाले पदार्थों का सेवन करने से वातदोष की वृद्धि होती है, क्योंकि ' वृद्धिः समानैः सर्वेषाम् ' अथवा ' सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् ' आदि अनेक प्रमाण हैं । यह वृद्धि संचय तथा प्रकोप रूप से दो प्रकार की होती है । ध्यान दें — यदि रूक्ष आदि ( उपर्युक्त ) गुणों वाले द्रव्यों का सेवन उष्णवीर्य वाले द्रव्यों के साथ किया
जायेगा तो उसका संचय तो होगा किन्तु प्रकोप नहीं होगा, इसका ध्यान सर्वत्र रखें ।
शीतेन युक्तास्तीक्ष्णाद्याश्चयं पित्तस्य कुर्वते ॥ २० ॥
उष्णेन कोपं, मन्दाद्याः शमं शीतोपसंहिताः । पित्त के चय, कोप, प्रशम का वर्णन — शीतवीर्य से युक्त तीक्ष्ण आदि गुण वाले पदार्थ पित्तदोष का संचय करते हैं, उष्णवीर्य से युक्त तीक्ष्ण आदि गुण वाले पदार्थ पित्तदोष को प्रकुपित करते हैं और शीतवीर्य से युक्त मन्द आदि गुण वाले पदार्थ पित्तदोष का शमन करते हैं ॥ २० ॥
वक्तव्य —— तीक्ष्ण आदि गुण —– तीक्ष्ण, स्निग्ध, उष्ण, लघु, विम्र, सर तथा द्रव गुण वाले- अम्ल, लवण तथा कटु रस वाले । उक्त गुणों वाले पदार्थों का सेवन यदि शीतवीर्य पदार्थों के साथ किया जाता है, तो पित्त का संचय होता है, किन्तु शीतवीर्य पदार्थों के कारण पित्त का प्रकोप नहीं होने पाता । शीतेन युक्ताः स्निग्धाद्याः कुर्वते श्लेष्मणश्चयम् ॥ २१ ॥
उष्णेन कोपं, तेनैव गुणा रूक्षादयः शमम् । कफ के चय, कोप, प्रशम का वर्णन - शीतवीर्य से युक्त स्निग्ध आदि गुणवाले पदार्थ कफदोष का संचय करते हैं । उष्णवीर्य से युक्त स्निग्ध आदि गुण वाले पदार्थ कफदोष का प्रकोप करते हैं और उष्णवीर्य से युक्त रूक्ष आदि गुण वाले पदार्थ कफदोष का शमन करते हैं ॥ २१ ॥
वक्तव्य — स्निग्ध आदि गुण — स्निग्ध, शीत, गुरु, मन्द, श्लक्ष्ण, मृत्स्न, स्थिर, मृदु, मधुर तथा पिच्छिल गुण वाले पदार्थों का सेवन करने से कफदोष का संचय तो होता है, किन्तु उसका प्रकोप नहीं होता, क्योंकि शीतवीर्य द्रव्यों के प्रभाव से कफदोष जमा रहता है और इसके विपरीत उष्णवीर्य वाले पदार्थों
का सेवन करने से कफदोष पिघल कर कुपित हो जाता है ।
चयो वृद्धिः स्वधाम्न्येव प्रद्वेषो वृद्धिहेतुषु ॥ २२ ॥