श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 251–260
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 251–260
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स्वेदविधिरध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् २१५ इसे घड़ा में या झंझर ( सुराही ) में या नाली ( पिचकारी ) आदि में भरकर रोगयुक्त अंग पर अभ्यंग करने के बाद कपड़े से उस अंग को ढककर गुन - गुने उस द्रव का सेचन करें ॥ ७-१० ॥ वक्तव्य — श्लोक २ से १४ तक उष्ण अर्थात् आग्नेय स्वेदों की चर्चा है, इसके विपरीत अनाग्नेय स्वेद भी होते हैं, उनका वर्णन आगे २८ वें श्लोक में किया जायेगा । द्रवस्वेदों में अवगाहन, सेचन, परिषेक आदि विधियाँ कही गयी हैं । गरम पानी से स्नान करना भी ' द्रवस्वेद ' ही है, किन्तु उष्ण जल से सिर को नहीं धोना चाहिए । तैरेव वा द्रवैः पूर्णं कुण्डं सर्वाङ्गगेऽनिले । अवगाह्यातुरस्तिष्ठेदर्शः कृच्छ्रादिरुक्षु च ॥ ११ ॥
निवातेऽन्तर्बहिः स्निग्धो जीर्णान्नः स्वेदमाचरेत् । अवगाहन - स्वेदविधि —–— उक्त द्रवस्वेद - विधि में वर्णित द्रव्यों के क्वाथजल को कुण्ड ( टब ) में भर दें । स्पर्श करने योग्य उस जल में रोगी को बैठायें या लेटा दें । यह सर्वाङ्गव्यापी स्वेदन है । इसका प्रयोग वातविकारों, अर्शरोग तथा मूत्रकृच्छ्र रोगों में कराना चाहिए ॥ ११ ॥
स्वेदन - विधि —— स्नेहपान - विधि द्वारा भीतर से स्नेहन किया हुआ और अभ्यंग आदि विधियों से बाहर से स्नेहन किया हुआ पुरुष भोजन के पच जाने पर वातरहित स्थान में अर्थात् जहाँ
न हो रहा हो ( ऐसे घर के भीतर ) स्वेदन करे ।
व्याधिव्याधितदेशर्तुवशान्मध्यवरावरम् ॥ १२ ॥
स्वेदन - विधिभेद — रोग, रोगी, देश और ऋतु ( काल ) इन सबका विचार मध्यम अथवा अवर ( अधम ) कोटि का यथायोग्य स्वेदन कराना चाहिए ॥१२ ॥
कफार्तो रूक्षणं रूक्षो, रूक्षः स्निग्धं कफानिले । दोषभेद से स्वेदन — अन्यत्र स्नेहन करने के बाद स्वेदन करने का निर्देश है हवा का सीधा प्रवेश कर तदनुसार उत्तम, , अतः कफज रोग से पीड़ित रोगी बिना स्नेहन किये अर्थात् रूखा रहकर रूक्षताकारक द्रव्यों से स्वेदन करे । इस रूक्षस्वेदन को ' तापस्वेद ' भी कहते हैं । रूक्षरोगी कफज तथा वातज रोगों में रूक्ष तथा स्निग्ध द्रव्यों द्वारा द्रवस्वेदन करे ।
पित्तज विकारों में स्वयं स्वेद होने से स्वेदन की आवश्यकता ही नहीं होती है ।
आमाशयगते वायौ कफे पक्वाशयाश्रिते ॥ १३ ॥
रूक्षपूर्वं तथा स्नेहपूर्वं स्थानानुरोधतः । स्थानभेद से स्वेदन — वातदोष जब आमाशय में पहुँचा हो और कफदोष पक्वाशय में स्थित हो तो उस समय सबसे पहले रूक्ष स्वेदन करें, फिर स्निग्ध स्वेदन करें और जब वातदोष मलाशय में स्थित हो तो पहले स्निग्ध स्वेदन, फिर रूक्ष स्वेदन करें । यह स्थान के विचार से निर्णय लिया गया है ॥ १३ ॥
अल्पं वङ्क्षणयोः, स्वल्पं दृङ्मुष्कहृदये न वा ॥ १४ ॥
अन्यत्र स्वेदन - निर्देश— दोनों वंक्षणों ( पेडू और जाँघ के बीच का भाग ) में अल्प ( अवर श्रेणी का ) स्वेदन करना चाहिए । दृष्टि ( नेत्रों ), अण्डकोषों तथा हृदयप्रदेश पर थोड़ा - सा स्वेदन करें अथवा न करें ॥ १४ ॥
शीतशूलक्षये स्विन्नो जातेऽङ्गानां च मार्दवे । स्याच्छनैर्मृदितः स्नातस्ततः स्नेहविधिं भजेत् ॥ स्वेदन का सम्यक् योग — जब सर्दी लगना रुक जाय तथा शूल की शान्ति हो जाय और जकड़े हुए अंग ( शरीर के अवयव ) सुकोमल हो जायें तब समझें कि भलीभाँति स्वेदन हो चुका है । इस क्रिया के पश्चात् धीरे - धीरे शरीर को मसलना चाहिए, फिर गुनगुने जल से स्नान करे, तदनन्तर स्नेहपान या स्नेहन - विधि करे ॥ १५ ॥
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२१६ अष्टाङ्गहृदये पित्तास्रकोपतृमूर्च्छास्वराङ्गसदनभ्रमाः । सन्धिपीडा ज्वरः श्यावरक्तमण्डलदर्शनम् ॥ १६ ॥
स्वेदातियोगाच्छर्दिश्च, तत्र स्तम्भनमौषधम् । विषक्षाराग्न्यतीसारच्छर्दिमोहातुरेषु च ॥ १७ ॥
स्वेदन का अतियोग — इससे पित्तविकार, रक्तविकार, प्यास का लगना, बेहोशी होना, स्वर तथा शरीर में ढीलापन, चक्करों का आना, जोड़ों में पीड़ा का होना, ज्वर, काले एवं लाल चकत्तों का दिखलायी पड़ना तथा छर्दि ( वमन ) का होना — ये लक्षण होते हैं । इस स्थिति में स्तम्भन - चिकित्सा करनी चाहिए । विषजनित विकारों, क्षारविकारों, अग्निविकारों में, अतिसार, वमन तथा मूर्च्छा रोगों में भी स्तम्भन - -1 चिकित्सा करनी चाहिए ॥ १६-१७ ॥ स्वेदनं गुरु तीक्ष्णोष्णं प्रायः, स्तम्भनमन्यथा । द्रवस्थिरसरस्निग्धरूक्षसूक्ष्मं च भेषजम् ॥ १८ ॥
स्वेदनं, स्तम्भनं श्लक्ष्णं रूक्षसूक्ष्मसरद्रवम् । प्रायस्तिक्तं कषायं च मधुरं च समासतः ॥ १ ९ ॥ स्वेदन द्रव्य - प्रायः गुरु, तीक्ष्ण एवं उष्णवीर्य वाले द्रव्य स्वेदनकारक होते हैं । इनके विपरीत गुण - धर्म वाले द्रव्य स्तम्भनकारक होते हैं; यथा— लघु, मृदु एवं शीतवीर्य वाले द्रव्य । द्रव, स्थिर, सर, स्निग्ध, रूक्ष तथा सूक्ष्म द्रव्य स्वेदनकारक होते हैं । स्तम्भन द्रव्य — श्लक्ष्ण, रूक्ष, सूक्ष्म, सर एवं द्रव द्रव्य प्रायः स्तम्भनकारक होते हैं । रसों के विचार से स्तम्भन द्रव्य — तिक्त, कषाय तथा मधुर रस वाले द्रव्य प्रायः स्तम्भन होते हैं । रसों के विचार से स्वेदन द्रव्य — उक्त रसों के विपरीत ( लवण, अम्ल तथा कटु ) रस वाले द्रव्य स्वेदन होते हैं ॥ १८-१९ ॥ वक्तव्य — वास्तव में जिन द्रव्यों के प्रयोग से शरीर से पसीना निकले वे स्वेदन हैं और जिनके प्रयोग से पसीना निकलना रुक जाय वे स्तम्भन हैं । जैसे — उष्ण जल में अवगाहन करना या उष्ण जल से स्नान करना स्वेदन हैं, इसके विपरीत शीतल जल से स्नान करना या शीतल हवा का सेवन करना आदि उपाय स्तम्भन हैं । स्तम्भितः स्याद्वले लब्धे यथोक्तामयसङ्घयात् । स्तम्भन के समुचित प्रयोग के लक्षण –बल की प्राप्ति होना तथा इसी अध्याय के १६ वें श्लोक में कहे गये पित्तज, रक्तज विकार आदि का क्षीण हो जाना —ये स्तम्भन के लक्षण होते हैं । स्तम्भत्वक्स्नायुसङ्कोचकम्पहृद्वाग्घनुग्रहैः ॥२० ॥
पादौष्ठत्वक्करैः श्यावैरतिस्तम्भितमादिशेत् । स्तम्भन के अतियोग के लक्षण - शरीर में अकड़न या जकड़न, त्वचा एवं स्नायुओं में संकोच, कम्पन, हृदय, वाणी तथा हनु की गति में रुकावट, पैरों, होठों, त्वचा, हाथों एवं नखों में नीलापन का दिखलायी देना ॥ २० ॥
वक्तव्य — इस स्थिति में पुनः देश - काल के अनुसार उष्णोपचार करने चाहिए ।
न स्वेदयेदतिस्थूलरूक्षदुर्बलमूर्च्छितान् ॥ २१ ॥
स्तम्भनीयक्षतक्षीणक्षाममद्यविकारिणः । तिमिरोदरवीसर्पकुष्ठशोषाढयरोगिणः ॥ २२ ॥
पीतदुग्धदधिस्नेहमधून् कृतविरेचनान् । भ्रष्टदग्धगुदग्लानिक्रोधशोकभयार्दितान् ॥ २३ ॥
क्षुत्तृष्णाकामलापाण्डुमेहिनः पित्तपीडितान् । गर्भिणीं पुष्पितां सूतां, मृदु चात्ययिके गदे ॥ २४ ॥
स्वेदन के अयोग्य रोगी एवं रोग — अत्यन्त मोटे, अत्यन्त रूक्ष शरीर वाले, अत्यन्त कमजोर, मूर्च्छारोग से पीड़ित, स्तम्भन के योग्य व्यक्ति की ( इनका वर्णन इसी अध्याय के श्लोक १५, १६ तथा १ ९ में आया है ), क्षत ( उरःक्षत अथवा घाव लगने से पीड़ित ), क्षीण ( धातुक्षय आदि से पीड़ित ), क्षाम ( कृश ), मद्यविकार वाले ( मदात्यय आदि मदजनित रोगों से पीड़ित ), तिमिररोगी, उदररोगी, विसर्परोगी, कुष्ठरोगी,
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स्वेदविधिरध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् २१७ शोष ( राजयक्ष्मा ), आढ्य ( वातरक्त ) रोगी, जिन्होंने दूध, दही, स्नेह तथा शहद को तत्काल पिया हो, जिन्हें अभी विरेचन कराया गया हो, भ्रष्टगुद ( जिसकी काँच निकल गयी हो ), दग्धगुद ( जिसका गुदप्रदेश क्षार या अग्नि से जल गया हो ), मानसिक क्लेश से युक्त तथा क्रोध, शोक, भय, भूख, प्यास से पीड़ित; कामलारोगी, पाण्डुरोगी, प्रमेहरोगी, पित्तज रोगों से पीड़ित, गर्भिणी, रजस्वला तथा प्रसूता ( जिसने हाल में ही शिशु को जन्म दिया हो ) – इनको स्वेदन का प्रयोग न करायें । आवश्यक होने पर रोग की स्थिति में मृदु स्वेदन कराया जा सकता है ॥ २१-२४ ॥ वक्तव्य — वाग्भट की प्रतिज्ञानुसार जब हम उनकी पूर्ववर्ती संहिताओं का अवलोकन करते हैं, तो हमें ' सूता ' या ' प्रसूता ' के लिए स्वेदन का निषेध चरक में नहीं मिलता । आप भी देखें- च. सू. १४१६ - १ ९ । इसके विपरीत ‘ सूतिकां’‘सूतिकायाः ' ॥ ( च.शा. ८।४८ ) में ' पिप्पल्यादि गण ' द्वारा पकायी गयी स्नेहयुक्त यवागू का सेवन तथा उसे उष्णोदक द्वारा स्नान कराना निर्दिष्ट है । ये दोनों ही विधियाँ स्वेदन ही हैं । अब आप सश्रुत के दृष्टिकोण को भी देखें । आपने जिन्हें अस्वेद्य कहा है, उनका परिगणन यहाँ किया जा रहा है— पाण्डुरोगी, प्रमेहरोगी, रक्तपित्तरोगी, क्षयरोगी, क्षाम ( कृश ), अजीर्णरोगी, उदररोगी, विष से पीड़ित, प्यासा, वमन से पीड़ित, गर्भिणी, मद्यपान किया हुआ तथा अतिसाररोगी— इन्हें स्वेदन नहीं देना चाहिए । देखें —–— सु.चि. ३२।२५ । इसमें ' सूता ' को स्वेदन के अयोग्य नहीं कहा है । इसी के पहले सुश्रुत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है— ' सम्यक् प्रजाता काले या पश्चात् स्वेद्या विजानता । ( सु. चि. ३२।१८ ) इसके पहले सुश्रुत ने सु.शा. १०।१६-१८ में प्रसूता की जो परिचर्या दी है, वह स्नेहन तथा स्वेदन के भावों को व्यक्त करती है । लोकाचार में भी सद्यः प्रसूता स्त्रियों को स्वेदन का प्रयोग कराया ही जाता है । निष्कर्ष — प्राचीन महर्षियों के वचन सारवान् होते हैं । उक्त समस्त ऊहापोह करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि स्वेदन के उन भावों का आचार्य ने यहाँ निषेध किया है, जिन्हें सुकोमलांगी प्रसूताओं को अवश्य त्याग देना चाहिए । वे भाव हैं — नियुद्ध ( बाहुयुद्ध या पैदल लड़ाई करना अर्थात् आयास-जनित समस्त कार्य ), भारवहन, मार्गचलन आदि उन कष्टसाध्य कार्यों को न करे, जिनसे पसीना होता हो । यही आशय वृद्धवाग्भट का भी प्रतीत होता है । श्वासकासप्रतिश्यायहिध्माध्मानविबन्धिषु । स्वरभेदानिलव्याधिश्लेष्मामस्तम्भगौरवे ॥ २५ ॥
अङ्गमर्दकटीपार्श्वपृष्ठकुक्षिहनुग्रहे । महत्त्वे मुष्कयोः खल्यामायामे वातकण्टके ॥ २६ ॥
मूत्रकृच्छ्रार्बुदग्रन्थिशुक्राघाताढ्यमारुते । स्वेदं यथायथं कुर्यात्तदौषधविभागतः ॥ २७ ॥
स्वेदन के योग्य — श्वास, कास, प्रतिश्याय ( जुकाम ), हिध्मा ( हिक्का या हिचकी ), अफरा, विबन्ध ( कब्जियत ), स्वरभेद ( गला बैठना ), वातज रोग, कफज रोग, आमरसजनित रोग, हनुस्तम्भ, भारीपन, अंगों में मसलने की - सी पीड़ा का होना, कटिग्रह, पार्श्वग्रह, पृष्ठग्रह, कुक्षिग्रह ( आँतों की गति में रुकावट ), हनुग्रह, अण्डवृद्धि, खल्ली, अन्तरायाम या बाह्यायाम, वातकण्टक, मूत्रकृच्छ्र, अर्बुदरोग, ग्रन्थिरोग, शुक्राघात तथा आढ्यवात ( ऊरुस्तम्भ ) -- इन रोगों में उस - उस रोग का नाश करने वाली औषधियों द्वारा तैयार किये गये द्रव्यों से स्वेदन कराना चाहिए ॥ २५-२७ ॥ स्वेदो हितस्त्वनाग्नेयो वाते मेदः कफावृते । अनाग्नेय स्वेद — प्रायः सभी स्वेदन अग्नि के संयोग से सम्पन्न कराये जाते हैं । कुछ स्वेदन ऐसे हैं, जिनमें अग्नि का प्रयोग नहीं होता । इस प्रकार के स्वेदों का प्रयोग मेदोधातु तथा कफदोष से आवृत ( घिरे
हुए ) वातदोष से होने वाले ( ऊरुस्तम्भ आदि ) रोगों में किया जाता है ।
निवातं गृहमायासो गुरुप्रावरणं भयम् ॥ २८ ॥
उपनाहाहवक्रोधा भूरिपानं क्षुधाऽऽतपः ।
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२१८ अष्टाङ्गहृदये दसविध अनाग्नेय स्वेद - १. निवात घर में रहना, २. आयास ( विविध प्रकार के परिश्रमसाध्य कार्यों को करते रहना ), ३. गुरुप्रावरण ( मोटे कम्बल अथवा रजाई आदि को ओढ़े रहना ), ४. भय ( यह भी पसीना लाने का एक उपाय है ), ५. उपनाह ( ऊन की पट्टी से या साधारण पट्टी से कसकर बाँधे रहना ), ६. आहव ( लड़ाई या कुश्ती करना ), ७. क्रोध करना, ८. अधिक मात्रा में मादक पदार्थों का सेवन करना, ९. भूखा रहना तथा १०. आतप ( धूप का सेकना ) ॥ २८ ॥
वक्तव्य — भगवान् पुनर्वसु ने भी दसविध अनग्निस्वेदन का वर्णन इस प्रकार किया है — ' व्यायाम उष्णसदनं गुरुप्रावरणं क्षुधा । बहुपानं भयक्रोधावुपनाहाहवातपाः ' । ( च.सू. १४/६४ ) इसका अर्थ भी वाग्भट के उक्त २८ वें श्लोक के समान है । ज्वर में भूखा रहना या लंघन करना इस विधि से कुछ दिन बाद स्रोतों के खुल जाने पर पसीना निकलने लगता है; यही क्षुधा द्वारा स्वेदन होने का प्रमाण है । स्वेदन के भलीभाँति हो जाने के बाद किस प्रकार का आहार - विहार करना चाहिए, इसके लिए देखें— अष्टांगसंग्रह - सू. २६।३६
स्नेहक्लिन्नाः कोष्ठगा धातुगा वा स्रोतोलीना ये च शाखास्थिसंस्थाः ।
दोषाः स्वेदैस्ते द्रवीकृत्य कोष्ठं नीताः सम्यक् शुद्धिभिर्निह्रियन्ते ॥ २ ९ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने स्वेदविधिर्नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
स्वेदन का फल — कोष्ठगत दोष, रस - रक्त आदि धातुओं में गये हुए या व्याप्त दोष, स्रोतों में विलीन ( सटे हुए ) दोष एवं शाखाओं ( त्वचा, बाहुओं, सक्थियों ) में तथा अस्थियों में स्थित दोष स्नेहन - विधि द्वारा चिकने किये गये तदनन्तर स्वेदन - विधि से पिघलाये जाने पर कोष्ठ में पहुँचा दिये जाते हैं । तदनन्तर वमन - विरेचन रूप संशोधन - विधियों से उन्हें सुखपूर्वक भलीभाँति बाहर निकाला जा सकता है ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय - सूत्रस्थान स्नेहविधि नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ॥ १७ ॥
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अष्टादशोऽध्यायः अथातो वमनविरेचनविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः । अब हम यहाँ से वमन विरेचनविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे । जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था । उपक्रम —— सत्रहवें अध्याय के अन्तिम पद्य में कहा है कि स्नेहन तथा स्वेदन विधियों द्वारा कोष्ठ में लाये गये या पहुँचाये गये दोषों को संशोधन - विधियों से बाहर किया जायेगा । अतः प्रस्तुत अध्याय में उन दोषों को निकालने के लिए वमन तथा विरेचन विधियों का विस्तार से वर्णन किया जा रहा है । भगवान् पुनर्वसु ने वमन - विरेचन की व्याख्या इस प्रकार की है — ' तत्र ' लभते ' ॥ ( च.क. १।४ ) अर्थात् मुखभाग से दोषों का जो निर्हरण किया जाता है, उसे वमन कहते हैं और निचले ( गुद ) भाग से जो दोषों का निर्हरण किया जाता है, उसे विरेचन कहते हैं अथवा शरीर के दोषों को निकालने के कारण दोनों ( वमन तथा विरेचन ) की विरेचन संज्ञा है । यही मत सुश्रुत का भी है । देखें — सु. चि. ३३।४ । संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेत — च. सू. १५ एवं १६, च.सि. १, २, ६; सु.चि. ३३, ३ ९; अ.सं.सू. २७ में देखें । कफे विदध्याद्वमनं संयोगे वा कफोल्बणे । तद्वद्विरेचनं पित्ते — वमन विरेचन व्यवस्था — कफदोष की वृद्धि होने पर तथा कफजनित रोगों में अथवा कफदोष की प्रधानता जिस दोष ( वात - पित्त ) के साथ हो, तो इन सभी में वमन कराना चाहिए । इसी प्रकार पित्तदोष की वृद्धि होने पर तथा पित्तजनित रोगों में अथवा पित्तदोष की प्रधानता जिस दोष के साथ हो, तो इन
सभी विकारों में विरेचन कराना चाहिए ।
- विशेषेण तु वामयेत् ॥ १ ॥
नवज्वरातिसाराधः पित्तासृग्राजयक्ष्मणः । कुष्ठमेहापचीग्रन्थिश्लीपदोन्मादकासिनः ॥ २ ॥
श्वासहुल्लासवीसर्पस्तन्यदोषोर्ध्वरोगिणः वमन - निर्देश – विशेष करके निम्नलिखित रोगों में वमन कराने का निर्देश दिया गया है— नवज्वर की मुक्ति हो जाने पर, अतिसार में, नीचे के मार्ग से होने वाले रक्तपित्तरोग में, राजयक्ष्मारोग में, कुष्ठरोग में, अपचीरोग में, ग्रन्थिरोग में, श्लीपदरोग में, उन्माद में, कास में, श्वास में, हृल्लास ( जी मिचलाना ) में, विसर्परोग में, दुग्धदोष में एवं ऊर्ध्वजत्रु में होने वाले रोगों में॥१-२ ॥ वक्तव्य — उक्त रोगों में वमन का विधान इसलिए किया गया है कि इनमें कफ की प्रधानता होती ही है, यदि कभी किसी रोग में ऐसा न देखा जाय तो वमन न करायें । वमन तथा विरेचन विधियों में पहले वमन कराने का निर्देश इसलिए दिया गया है कि वमन द्वारा कफ के निकल जाने पर विरेचन - विधि सरलता से की जा सकती है और यदि बिना वमन कराये गये विरेचन कराया जाता है, तो वह बढ़ा हुआ कफ विरेचन कराते समय ग्रहणी को ढक देता है, जिससे भलीभाँति विरेचन नहीं हो पाता है । अतः 1 '
विरेचन कराने के पहले वमन करा लेना चाहिए ।
अवाम्या गर्भिणी रूक्षः क्षुधितो नित्यदुःखितः ॥३ ॥
बालवृद्धकृशस्थूलहृद्रोगिक्षतदुर्बलाः प्रसक्तवमथुप्लीहतिमिरक्रिमिकोष्ठिनः ॥ ४ ॥
ऊर्ध्वप्रवृत्तवाय्वम्रदत्तबस्तिहतस्वराः । मूत्राघात्युदरी गुल्मी दुर्वमोऽत्यग्निरर्शसः ॥ ५ ॥
उदावर्तभ्रमाष्ठीलापार्श्वरुग्वातरोगिणः ऋते विषगराजीर्णविरुद्धाभ्यवहारतः ॥ ६ ॥
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२२० अष्टाङ्गहृदये वमन के अयोग्य व्यक्ति – गर्भवती, रुक्षकोष्ठ, भूखा, सदा दुःखी रहने वाला अर्थात् पुराना रोगी, बालक, वृद्ध, कृश, स्थूल ( मोटा ), हृदयरोगी, उरःक्षत का रोगी अथवा जिसे घाव लगा हो, दुर्बल, जिसे स्वयं उलटियाँ हो रही हों, प्लीहारोगी, तिमिररोगी, जिसके कोष्ठ ( मलाशय ) में क्रिमि हों, ऊर्ध्ववातरोग में, ऊपर की ओर प्रवृत्त रक्तपित्तरोग में, जिसे अभी बस्ति - प्रयोग कराया गया हो, स्वरभेदरोग में, मूत्राघात में, उदररोग में, गुल्मरोग में, दुर्बल रोगी में, तीक्ष्णाग्निरोगी में, अर्शरोगी में, उदावर्तरोगी में, भ्रमरोगी में, अष्ठीलारोगी में, पार्श्वशूल में तथा वातरोगी में वमन का प्रयोग नहीं कराना चाहिए । यदि उक्त रोगियों को विषविकार, गरविकार, अजीर्ण विकार अथवा विरुद्ध आहार सम्बन्धी कोई विकार हो तो इस स्थिति में इन्हें भी वमन कराना चाहिए । ३-६ ॥ वक्तव्य — ऊपर ‘ उदावर्त ' शब्द का प्रयोग हुआ है, इससे पुरीषोदावर्त, मूत्रोदावर्त तथा वातोदावर्त रोगों का ग्रहण भी कर लेना चाहिए । ' उत् = ऊर्ध्वम्, आवर्तः = उदावर्तः ’ । प्रसक्तवमथोः पूर्वे प्रायेणामज्वरोऽपि च । धूमान्तैः कर्मभिर्वर्ज्याः, सर्वैरेव त्वजीर्णिनः ॥ ७ ॥
वमन आदि कर्मों का निषेध - ऊपर कहे गये ' प्रसक्त वमथु ' से पहले गर्भिणी से लेकर दुर्बल पर्यन्त रोगियों को और प्रायः आमज्वर के रोगी को न केवल वमन कर्म का अपितु विरेचन से लेकर धूमपान पर्यन्त सभी कर्मों का निषेध किया गया है । इसके अतिरिक्त अजीर्णरोग से पीड़ित रोगियों के लिए तो वमन से लेकर गण्डूष तक के सभी कर्मों का निषेध किया गया है । आमाजीर्ण में केवल उपवास एवं पाचनकर्म ही प्रशस्त हैं ॥७ ॥
वक्तव्य — धूमान्त कर्म — वमन, विरेचन, निरूहण, अनुवासन, नस्य एवं धूमपान । सर्वैरेव — इसकी सीमा में ऊपर कहे गये कर्मों के अतिरिक्त गण्डूष तथा कवल का ग्रहण भी होता है । विरेकसाध्या गुल्मार्शोविस्फोटव्यङ्गकामलाः । जीर्णज्वरोदरगरच्छर्दिप्लीहहलीमकाः ॥ ८ ॥
विद्रधिस्तिमिरं काचः स्यन्दः पक्वाशयव्यथा । योनिशुक्राश्रया रोगाः कोष्ठगाः कृमयो व्रणाः ॥ वाताम्रमूर्ध्वगं रक्तं मूत्राघातः शकृद्ग्रहः । वाम्याश्च कुष्ठमेहाद्याः-विरेचन के योग्य रोग – गुल्म, अर्शोरोग, विस्फोट, व्यंग, कामला, जीर्णज्वर, उदररोग, गरविषविकार, वमन, प्लीहरोग, हलीमक, विद्रधि, तिमिर, काच, अभिष्यन्द, मलाशय सम्बन्धी रोग, योनिव्यापद्, शुक्रविकार, उदरगत क्रिमिरोग, व्रण, वातरक्त, ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त, मूत्राघात, शकृद्ग्रह ( मलावरोध ) तथा वमन कराने के योग्य रोगों में कुष्ठ एवं प्रमेह आदि रोग ॥ ८ - ९ ॥ - न तु रेच्यो नवज्वरी ॥ १० । अल्पाग्न्यधोगपित्तास्रक्षतपाय्वतिसारिणः । सशल्यास्थापितक्रूरकोष्ठातिस्निग्धशोषिणः ॥ विरेचन के अयोग्य रोग — नवज्वर, मन्दाग्नि, अधोगामी रक्तपित्त, गुदप्रदेश का क्षत, अतिसाररोग, जिसके शरीर में कहीं शल्य धँसा हो, जिसे निरूहणबस्ति दी गयी हो, क्रूर कोष्ठवाला, जिसे अत्यन्त स्नेहद्रव्यों का प्रयोग कराया गया हो तथा शोषरोग से पीड़ित इनको विरेचन नहीं कराना चाहिए ॥ १०-११ ॥ अथ साधारणे काले स्निग्धस्विन्नं यथाविधि । श्वोवम्यमुत्क्लिष्टकफं मत्स्यमाषतिलादिभिः ॥ निशां सुप्तं सुजीर्णान्नं पूर्वाह्णे कृतमङ्गलम् । निरन्नमीषत्स्निग्धं वा पेयया पीतसर्पिषम् ॥ १३ ॥
वृद्धबालाबलक्लीबभीरून् रोगानुरोधतः । आकण्ठं पायितान्मद्यं क्षीरमिक्षुरसं रसम् ॥१४ ॥
यथाविकारविहितां मधुसैन्धवसंयुताम् । कोष्ठं विभज्य भैषज्यमात्रां मन्त्राभिमन्त्रिताम् ॥ १५ ॥
“ ब्रह्मदक्षाश्विरुद्रेन्द्रभूचन्द्रार्कानिलानलाः । ऋषयः सौषधिग्रामा भूतसङ्घाश्च पान्तु वः ॥ १६ ॥
रसायनमिवर्षीणाममराणामिवामृतम् । सुधेवोत्तमनागानां भैषज्यमिदमस्तु ते ॥१७ ॥
ॐ नमो भगवते भैषज्यगुरवे वैडूर्यप्रभराजाय । तथागतायार्हते सम्यक्सम्बुद्धाय । तद्यथा— ॐ भैषज्ये भैषज्ये महाभैषज्ये समुद्गते स्वाहा ॥ " प्राङ्मुखं पाययेत्—
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वमनविरेचनविधिरध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् २२१ वमनकारक औषधद्रव्य एवं प्रयोगविधि — ऊपर कहे गये पद्यों द्वारा कौन वमन विरेचन के योग्य हैं और कौन अयोग्य हैं, इसका भलीभाँति निर्णय कर लेने के बाद साधारण ( समशीतोष्ण ) काल में विधिपूर्वक स्नेहन एवं स्वेदन कराकर अगले दिन जिसे वमन कराना हो, उसे एक दिन पहले मछली का मांस, उड़द तथा तिल के भक्ष्यों को खिलाकर उसके कफदोष को उभाड़ कर उसे रात्रि में सुला दें । प्रातः काल उसके -उठ जाने पर उसे देखें, रात्रि में खाया हुआ भोजन पच गया हो तो इष्टदेव का स्मरण एवं पूजन कर मंगलाचार करके उसे बिना कुछ अन्न खिलाये उसका स्नेहन करके पेया के साथ घी पिलायें । यदि वह व्यक्ति वृद्ध, बालक, दुर्बल, क्लीब है अथवा वमन के कष्ट से डरने वाला है तो उसे रोग के अनुसार मद्य ( शराब ), दूध, गन्ने का रस अथवा मांसरस भरपेट पिला दें । उसके बाद रोग के अनुसार उसका कोष्ठ मृदु है या क्रूर है, इसका विचार करके मधु तथा सेंधानमक मिलाकर किसी वमनकारक औषध को ‘ ब्रह्मदक्षाश्वि ं ……. ’ इत्यादि मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर रोगी का पूर्व की ओर मुख कराकर उसे औषध पिला दें ॥ १२-१७ ॥ मन्त्रार्थ — ‘ ब्रह्मा, दक्षप्रजापति, अश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र, भूमि, चन्द्र, सूर्य, वायु, अग्नि, औषधिसमूह सहित समस्त ऋषिगण, पंच महाभूत आप सब की रक्षा करें । जिस प्रकार महर्षि च्यवन आदि महर्षियों के लिए रसायन, देवताओं के लिए जैसे अमृत और जैसे उत्तम नागों के लिए सुधा ( विष ) हितकर होता है, उसी प्रकार यह औषध तुम्हारे लिए हितकर हो ' । वक्तव्य — ‘ ब्रह्मरुद्राश्वि ' ' ' ' ते ' । ( च.क. १।१४ ) ये दोनों श्लोक महर्षि वाग्भट ने अविकलरूप से चरक से लिये हैं । इनकी विस्तृत व्याख्या का अवलोकन ' चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी ' से प्रकाशित चन्द्रिका व्याख्यायुक्त चरकसंहिता - उत्तरार्ध में देखें । - पीतो मुहूर्तमनुपालयेत् । तन्मनाः— वमन की प्रतीक्षा — इस प्रकार वमनकारक औषध को पीकर उसी की ओर मन लगाकर कुछ
देर तक वमन होने की प्रतीक्षा करें ।
- जातहृल्लासप्रसेकश्च्छर्दयेत्ततः ॥ १८ ॥
अङ्गुलिभ्यामनायस्तो नालेन मृदुनाऽथवा । गलतात्वरुजन् वेगानप्रवृत्तान् प्रवर्तयन् ॥१ ९ ॥ प्रवर्तयन् प्रवृत्तांश्च जानुतुल्यासने स्थितः । उभे पार्श्वे ललाटं च वमतश्चास्य धारयेत् ॥ २० ॥
प्रपीडयेत्तथा नाभिं पृष्ठं च प्रतिलोमतः । वमनकारक यत्न- -जब जी मिचलाने लगे, मुख से लार गिरने लगे तब वमन करें । यदि वमन भलीभाँति न हो रहा हो तो बिना बल लगाये दो अँगुलियों को मुख में डालकर अथवा कोमल एरण्ड की पत्ती की नली को मुख में डालकर गला तथा तालु प्रदेश को बिना पीड़ित करते हुए जो वमन के वेग नहीं आ रहे हैं उन्हें प्रवृत्त करें और जो वेग प्रवृत्त हैं उन्हें भी अधिक प्रवृत्त करें, जिससे पूर्ण रूप से वमन हो जाय । ये सभी क्रिया - कलाप जानुभर ऊँचे आसन ( कुर्सी आदि ) पर बैठकर करने चाहिए । जब वमन के वेग आ रहे हों, उस समय उसका सहायक ( परिचारक ) उसकी दोनों पसलियों तथा सिर को दबाता रहे और वमन करने वाले की नाभि तथा पीठ को दबाता रहे ॥ १८-२० ॥ कफे तीक्ष्णोष्णकटुकैः पित्ते स्वादुहिमैरिति । २१ ॥ वमेत् स्निग्धाम्ललवणैः संसृष्टे मरुता कफे । वमन में औषध प्रयोग — कफजनित रोगों में तीक्ष्ण, उष्णवीर्य तथा कटुरस वाले औषधद्रव्यों से वमन कराना चाहिए, पित्तजनित रोगों में मधुर तथा शीतवीर्य द्रव्यों से और वातजनित रोगों में स्निग्ध, अम्ल एवं लवण रसयुक्त द्रव्यों से तैयार किये गये वामक द्रव्यों का प्रयोग करें ॥ २१ ॥
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२२२ अष्टाङ्गहृदये पित्तस्य दर्शनं यावच्छेदो वा श्लेष्मणो भवेत् ॥ वमन की अवधि – वमन के सम्यग् योग का लक्षण यह है कि न हो जायें । यह पित्त देखने में हरा या पीला दिखता है और स्वाद में कफ कट - कट कर या लच्छे के रूप मे दिखलायी पड़े, यही पित्तदोष तथा अवधि है । इन लक्षणों को देखकर वमन का सम्यक् योग समझ लेना चाहिए
हीनवेगः कणाधात्रीसिद्धार्थलवणोदकैः । वमेत्पुनः पुनः-२२ ॥
जब तक उसमें पित्त के दर्शन खट्टा या कडुआ होता है तथा कफदोष के निर्हरण की अन्तिम ॥ २२ ॥
हीनयोग में औषध प्रयोग – यदि वमन के वेग कम मात्रा में आ रहे हों तो पिप्पली, आँवला, पीली सरसों तथा नमक को पीसकर जल में मिलाकर या क्वाथ बनाकर पीयें । इसको पीकर बार - बार
तब तक वमन करे जब तक पित्तदोष अथवा कफदोष के दर्शन न हो जायें ।
— तत्र वेगानामप्रवर्तनम् ॥ २३ ॥
प्रवृत्तिः सविबन्धा वा केवलस्यौषधस्य वा । अयोगस्तेन निष्ठीवकण्डूकोठज्वरादयः ॥ २४ ॥
वमन का हीनयोग – वमनकारक औषध का पान करने पर भी वमन का न होना अथवा रुक - रुककर होना अथवा केवल पिलाये गये औषधद्रव्यों का ही निकल जाना —ये लक्षण वमन के अयोग में होते हैं । इसके कारण मुख से लार का चूना, शरीर में खुजली का होना, चकत्तों का निकलना तथा ज्वर आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २३-२४ ॥ निर्विबन्धं प्रवर्तन्ते कफपित्तानिलाः क्रमात् । ( मनःप्रसादः स्वास्थ्यं चावस्थानं च स्वयं भवेत् । वैपरीत्यमयोगानां न चातिमहती व्यथा ॥ ) सम्यग्योगे — वमन का सम्यक् योग — वमन का सम्यक् ( ठीक - ठीक ) योग ( प्रयोग ) हो जाने पर कफ, पित्त तथा वात दोषों की प्रवृत्ति स्वयं क्रम से होती है और मन का प्रसन्न होना, स्वस्थता, स्वयं स्थिरता का अनुभव होना, वमन के अयोगों में होने वाले लक्षणों से विपरीत लक्षणों की उत्पत्ति तथा विशेष कष्ट का न होना — ये लक्षण होते हैं । यहाँ दोषों का क्रम परिवर्तन दिख रहा है, उसका आधार वमन होने की अपनी प्रक्रिया है । — अतियोगे तु फेनचन्द्रकरक्तवत् ॥ २५ ॥
वमितं क्षामता दाहः कण्ठशोषस्तमो भ्रमः । घोरा वाय्वामया मृत्युर्जीवशोणितनिर्गमात् ॥ २६ ॥
वमन का अतियोग — वमन का अतियोग हो जाने पर वमन में झाग निकलने लगता है, उसमें कुछ चमक तथा रक्त के कण दिखलायी पड़ते हैं, वमनकर्ता को दुर्बलता, दाह, गला का सूखना, आँखों के सामने अँधेरा दिखलायी देना, चक्करों का आना, अत्यन्त कष्टदायक वातव्याधियाँ पैदा हो जाती हैं और वमन में जीवरक्त के निकलने के कारण रोगी की मृत्यु भी हो जाती है ॥ २५-२६ ॥ सम्यग्योगेन वमितं क्षणमाश्वास्य पाययेत् । धूमत्रयस्यान्यतमं स्नेहाचारमथादिशेत् ॥ २७ ॥
वमन के पश्चात् कर्म - समुचित विधि से जिसे भलीभाँति वमन हो गये हों, उसे कुछ समय तक आश्वस्त कराकर अथवा आराम करा कर तीन प्रकार के धूमपानों में से कोई एक धूमपान कराये ( इसके निर्णय का भार चिकित्सक पर होता है ) और इसके बाद उसे स्नेहपान कराना चाहिए अथवा उसे स्नेहपान करने का आदेश देना चाहिए ॥ २७ ॥
वक्तव्य- उक्त पद्य में आचार्य ने सूत्र रूप में धूमपान तथा स्नेहपान करने का संकेत किया है । इनका विवरण यहाँ दिया जा रहा है । धूमपान तीन प्रकार का होता है — १. स्नैहिक धूमपान, २. वैरेचनिक धूमपान तथा ३. उपशमनीय धूमपान । इनमें पहला धूमपान वातरोगों में हितकारक होता है, दूसरा वातकफज विकारों में और तीसरा केवल कफज विकारों को दूर करता है । इसका विवरण आगे २१ वें अध्याय में विस्तार से देखें । स्नेहाचार — इसका वर्णन पिछले १६ वें अध्याय में कर दिया गया है । आप देखें— श्लोक २६ से ३० तक ।
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वमनविरेचनविधिरध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् २२३ ततः सायं प्रभाते वा क्षुद्वान् स्नातः सुखाम्बुना । भुञ्जानो रक्तशाल्यन्नं भजेत्पेयादिकं क्रमम् ॥ स्नान एवं भोजनविधि - भलीभाँति वमन हो जाने के बाद उसी दिन सांयकाल अथवा दूसरे दिन प्रातः काल समुचित प्रकार से भूख लगने पर गुनगुने जल से स्नान करके पेया आदि के क्रम से लालशालि के चावलों द्वारा निर्मित भोजन करे ॥ २८ ॥
वक्तव्य- -इस विषय पर सुश्रुत का दृष्टिकोण – ' ततोऽपराह्ने भोजयेत्तम् ' । ( सु.चि. ३३।११ ) अर्थात् वमन अथवा विरेचन कराने से शरीर के शुद्ध हो जाने पर गरम जल से स्नान कराकर कुलथी, मूँग या अरहर की दाल के यूष ( जूस ) के साथ अथवा जांगल प्राणियों के मांसरस से तथा लाल शालि - चावलों के योग से बनायी गयी पेया, विलेपी आदि को खिलाये । यहाँ जो वाग्भट ने रक्तशालिधान्य का ग्रहण किया है, इस सम्बन्ध में भगवान् पुनर्वसु ने कहा है— ' लोहितशालयः शूकधान्यानां पथ्यतमत्वे श्रेष्ठतमाः ' । ( च.सू. २५।३८ ) अर्थात् लालशालि के चावल स्वस्थ तथा रोगी दोनों के लिए हितकर होते हैं ।
पेयां विलेपीमकृतं कृतं च यूषं रसं त्रीनुभयं तथैकम् ।
क्रमेण सेवेत नरोऽन्नकालान् प्रधानमध्यावरशुद्धिशुद्धः ॥ २ ९ ॥
पेया आदि क्रम -निर्देश - 1 – प्रधान, मध्य तथा अवर भेद से शरीर शुद्धि तीन प्रकार की होती है । सामान्य रूप से दो अन्नकाल ( भोजन के समय ) होते हैं— १. प्रातःकाल तथा २. सायंकाल । वमन - -1 विरेचन से शुद्ध किये गये पुरुष के आहार - भेद छः होते हैं— १. पेया, २. विलेपी, ३. अकृतयूष, ४. कृतयूष, ५. अकृत - मांसरस तथा ६. कृतमांसरस । प्रधानशुद्धि - विधि से शुद्ध पुरुष ३-३ अन्नकालों में ऊपर कही गयी पेया, विलेपी आदि का सेवन करता हुआ इस कल्प के पूरा होने पर अर्थात् १८ वें दिन के बाद स्वाभाविक रूप से भोजन करे । मध्यशुद्धि - विधि से शुद्ध पुरुष २-२ अन्नकालों में उक्त पेया आदि का सेवन कर लेने पर १२ वें दिन के बाद स्वाभाविक भोजन करे और अवरशुद्धि - विधि से शुद्ध पुरुष १-१ अन्नकाल में पेया आदि का छः दिनों तक सेवन करने के बाद स्वाभाविक भोजन करे ॥ २ ९ ॥ वक्तव्य — आचार्य वाग्भट ने उक्त श्लोक को चरकसंहिता - सिद्धिस्थान १।११ से लिया है । पेया, विलेपी, यवागू, यूष आदि का वर्णन शार्ङ्गधरसंहिता म. खं. २।१६४ - १७४ में भी देखें । ' अकृत ' उन्हें कहा जाता है, जिन्हें न छोंका जाता है और न जिनमें सोंठ, नमक आदि मसाले डाले जाते । इसके विपरीत गुणों वाले भोजन को ‘ कृत ' कहते हैं ।
यथाऽणुरग्निस्तृणगोमयाद्यैः सन्धुक्ष्यमाणो भवति क्रमेण ।
महान् स्थिरः सर्वपचस्तथैव शुद्धस्य पेयादिभिरन्तराग्निः ॥ ३० ॥
पेया आदि से लाभ — जैसे अग्निकण को तृण ( घास - फूस ) तथा गोमय ( गोहरी, कण्डा, वनोपल ) आदि के संयोग से सुलगाने ( प्रज्वलित करने ) से वह अग्नि महान् ( पहले की तुलना में बड़ा ), स्थिर तथा सब पदार्थों को पकाने या पचाने वाला होता है; ठीक वैसे ही पेया, विलेपी आदि सुपचभक्ष्यों के सेवन करने से जठराग्नि भी सशक्त ( खाये हुए भोजन को पचाने में समर्थ ) हो जाता है ॥३० ॥
जघन्यमध्यप्रवरे तु वेगाश्चत्वार इष्टा वमने षडष्टौ ।
दशैव ते द्वित्रिगुणाविरेके प्रस्थस्तथा स्याद्विचतुर्गणश्च ॥ ३१ ॥
वमन - विरेचन के वेग एवं परिमाण —– जघन्य ( हीन ), मध्यम तथा प्रवर ( प्रधान ) भेद से क्रमशः ४, ६ एवं ८ वेग वमनों में होते हैं तथा विरेचनों में वे वेग क्रमशः १०, २० तथा ३० होते हैं । इन विरेचनों में निकलने वाले मल का क्रमशः भार जघन्य विरेचन में १ प्रस्थ, मध्यम विरेचन में २ प्रस्थ तथा प्रवर विरेचन में ४ प्रस्थ बतलाया गया है ॥ ३१ ॥
पित्तावसानं वमनं विरेकादर्द्ध, कफान्तं च विरेकमाहुः ।
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२२४ अष्टाङ्गहृदये वमन विरेचन की अवधि एवं मान - पित्त के निकलने तक वमन कराना चाहिए । इस वमन द्रव का मान विरेचनों में निकले मल के भार से आधा होना चाहिए । इसमें भी जघन्य, मध्य, प्रवर भेद से भार का निर्धारण कर लेना चाहिए और विरेचन को तब पूर्ण समझें जब उसके अन्त में कफ निकल जाय । द्वित्रान् सविट्कानपनीय वेगान् मेयं विरेके, वमने तु पीतम् ॥ ३२ ॥
भारमापन - -1 विधि - यह भार तौलने की प्रक्रिया मल के दो अथवा तीन वेगों के निकल जाने के बाद में करनी चाहिए । वमन में पहले पिलाये या पीये गये मद्य आदि द्रव पदार्थों अथवा वमनकारक क्वाथ की मात्रा को छोड़ कर ही तौलना चाहिए ॥ ३२ ॥
वक्तव्य — श्रीवाग्भट ने च.सि. १।१४ से उक्त श्लोक को अविकल उद्धृत किया है । चरक में भलीभाँति कराये गये विरेचन के ये लक्षण दिये हैं— ' स्रोतों की शुद्धि, इन्द्रियों की निर्मलता, शरीर में हलकापन, उत्साहशक्ति की प्राप्ति, अग्नि का प्रदीप्त होना, नीरोगता, क्रमशः मल, पित्त, कफ तथा अपानवायु का निकलना ' ॥ देखें — च. सि. १११७ । ध्यान दें — कभी - कभी पित्तान्त एवं कफान्त में भले ही भ्रम हो जाय परन्तु सम्यक् वान्त तथा सम्यक् विरिक्त के जो लक्षण कहे गये हैं, उनके दर्शन होने पर वमन - विरेचन का सम्यक् योग हो गया है, ऐसा समझें । अथैनं वामितं भूयः स्नेहस्वेदोपपादितम् । श्लेष्मकाले गते ज्ञात्वा कोष्ठं सम्यग्विरेचयेत् ॥ ३३ ॥
वमन के बाद विरेचन - वमन कराने के बाद पुनः विधिपूर्वक स्नेहन - स्वेदन कराकर श्लेष्मकाल ( प्रात: काल ) के बीत जाने पर रोगी अथवा स्वस्थ पुरुष के कोष्ठ ( मृदु, मध्य, क्रूर भेद से ) का विचार करके विरेचनोपयोगी औषधि का प्रयोग करा कर उसे विरेचन कराये ॥ ३३ ॥
वक्तव्य — भगवान् पुनर्वसु ने वमन के बाद विरेचन कराने की विधि का समुचित वर्णन च.सू. १५।१७ में किया है, प्रसंगवश इसका अवलोकन कर लें । बहुपित्तो मृदुः कोष्ठः क्षीरेणापि विरिच्यते । मृदुकोष्ठ का वर्णन – जिस पुरुष के शरीर में पित्तदोष की प्रधानता होती है, उसे ' मृदुकोष्ठ '
वाला कहते हैं । ऐसे पुरुषों को गरमा - गरम दूध पीने मात्र से विरेचन हो जाता है ।
प्रभूतमारुतः क्रूरः कृच्छ्राच्छ्यामादिकैरपि ॥ ३४ ॥
क्रूरकोष्ठ का वर्णन — जिस पुरुष के शरीर में वातदोष की प्रधानता होती है, उसे ' क्रूरकोष्ठ ' वाला कहते हैं । ऐसे पुरुषों को काली निशोथ, जो तीक्ष्ण विरेचक होती है, के प्रयोग से भी बड़े कष्ट के साथ विरेचन हो पाता है ॥ ३४ ॥
कषायमधुरैः पित्ते विरेकः, कटुकैः कफे । स्निग्धोष्णलवणैर्वायौ— दोषानुसार विरेचन – पित्तज विकारों में कषाय तथा मधुर रस- प्रधान द्रव्यों द्वारा विरेचन देना चाहिए । कफज विकारों में कटुरस - प्रधान द्रव्यों से विरेचन दें और वातज विकारों में स्निग्ध तथा उष्णवीर्य
द्रव्यों में लवण मिलाकर विरेचन देना चाहिए ।
— अप्रवृत्तौ तु पाययेत् ॥ ३५ ॥
उष्णाम्बु, स्वेदयेदस्य पाणितापेन चोदरम् । विरेचक 5- ज उपाय — यदि उक्त औषध - प्रयोग करने पर भी विरेचन न हो रहा हो तो उसे गुनगुना जल पिलाना चाहिए और हाथों को सेंक कर उसके पेट को सेकें । इन उपायों से विरेचन हो जाता है ॥ ३५ ॥
उत्थानेऽल्पे दिने तस्मिन्भुक्त्वाऽन्येद्युः पुनः पिबेत् ॥ ३६ ॥
अदृढस्नेहकोष्ठस्तु पिबेदूर्ध्वं दशाहतः । भूयोऽप्युपस्कृततनुः स्नेहस्वेदैर्विरेचनम् ॥ ३७ ॥
यौगिकं सम्यगालोच्य स्मरन्पूर्वमतिक्रमम् ।