श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 261–270
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 261–270
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वमनविरेचनविधिरध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् २२५ पुनः विरेचन - प्रयोग — इस विधि से यदि अल्पमात्रा में भी विरेचन हो तो उस रात्रि में उसे थोड़ा - सा हलका आहार ( दलिया, खिचड़ी आदि ) खिलाकर दूसरे दिन फिर उसे विरेचक औषधि पिलायी जाय । उदरप्रदेश का भलीभाँति स्नेहन न होने के कारण यदि विरेचन न हुआ हो तो उसे फिर दस दिन के बाद विरेचन कराने के लिए औषध सेवन करायें । इसके पूर्व स्नेहन - स्वेदन का प्रयोग भी अवश्य करें । इस बार भी औषधयोग का समुचित विधान तथा उसे अभिमन्त्रित कर तभी उसका सेवन करना चाहिए ॥ ३६-३७ ॥ हृत्कुक्ष्यशुद्धिररुचिरुत्क्लेशः श्लेष्मपित्तयोः ॥ ३८ ॥
कण्डूविदाहः पिटिकाः पीनसो वातविग्रहः । अयोगलक्षणम्— हीनयोग ( अयोग ) के लक्षण – हृदय एवं उदर की ठीक प्रकार से शुद्धि का न होना, अतएव भारीपन की प्रतीति, अरुचि, कफ तथा पित्त के उभड़ जाने से जी मिचलाने की जैसी प्रतीति का होना, खुजली, जलन, शरीर में पिड़काओं की उत्पत्ति, पीनस ( प्रतिश्याय ), अपानवायु, मूत्र एवं पुरीष की प्रवृत्ति में रुकावट का होना — ये लक्षण होते हैं ॥ ३८ ॥
— योगो वैपरीत्ये यथोदितात् ॥ ३ ९ ॥ समयोग के लक्षण — ऊपर कहे गये हीनयोग के लक्षणों से विपरीत लक्षणों का होना समयोग कहा जाता है । यह तन्त्रकार द्वारा सूत्ररूप में निर्देश है ॥ ३ ९ ॥ विट्पित्तकफवातेषु निःसृतेषु क्रमात्स्रवेत् । निःश्लेष्मपित्तमुदकं श्वेतं कृष्णं सलोहितम् ॥ ४० ॥
मांसधावनतुल्यं वा मेदःखण्डाभमेव वा । गुदनिःसरणं तृष्णा भ्रमो नेत्रप्रवेशनम् ॥ ४१ ॥
भवन्त्यतिविरिक्तस्य तथाऽतिवमनामयाः । अतियोग के लक्षण — इस प्रकार के विरेचन में पहले पुरीष ( मल ), फिर पित्त, कफ तथा अपान-वायु के निकल जाने पर भी कफ एवं पित्त रहित मलद्वार से सफेद, काला तथा लाल अथवा मांस को धोने से जैसा वर्ण जल का हो जाता है, वैसा जल निकलने लगता है अथवा मेदस् के टुकड़ों का स्राव होता है, गुदभ्रंश ( काँच का निकलना ), बार - बार प्यास का लगना, चक्करों का आना, आँखों का भीतर की ओर को धँस जाना तथा विरेचन के अतियोग होने पर वमन के अतियोग के लक्षण भी दिखलायी देने लगते हैं ॥ ४०-४१ ॥ वक्तव्य — वमन के अतियोग के लक्षण इसी अध्याय के २६ वें श्लोक में देखें । अध्याय ८ में आमविष के लक्षणों से वमन तथा विरेचन के अतियोग लक्षणों का मिलान
के कारण ही विसूचिका की उत्पत्ति होती है ।
सम्यग्विरिक्तमेनं च वमनोक्तेन योजयेत् ॥ ४२ ॥
धूमवर्ज्येन विधिना — समयोग में पश्चात्कर्म — विरेचन विधि का सम या सम्यक् योग हो जाने बिना वमनोत्तर विधि के उपचारों से इसे जोड़ें अर्थात् इसे स्नेहाचार करायें ॥ ४२ ॥
अष्टांगहृदय - सूत्रस्थान करें । इसी ' आमविष ' पर धूमपान - विधि के — ततो वमितवानिव । क्रमेणान्नानि भुञ्जानो भजेत्प्रकृतिभोजनम् ॥ ४३ ॥
समयोग में भोजन - विधि - स्नेहन कराने के बाद समुचित वमन कराये गये पुरुष के समान लाल शालिचावलों की पेया, विलेपी आदि का भोजनकाल में सेवन करता हुआ वह बाद में स्वाभाविक भोजन
का सेवन करें । ४३ ॥
मन्दवह्निमसंशुद्धमक्षामं दोषदुर्बलम् । अदृष्टजीर्णलिङ्गं च लङ्घयेत्पीतभेषजम् ॥ ४४ ॥
लंघन - निर्देश — विरेचन कराने के बाद यदि अग्नि मन्द पड़ गया हो, भलीभाँति संशोधन न हो सका हो, रोगी दुर्बल न हो, दोषों की वृद्धि से दुर्बलता आ गयी हो अथवा अपच के लक्षण दिखलायी दे रहे हों तो इन सभी स्थितियों में विरेचक औषध का पान किये हुए रोगी पुरुष को लंघन करायें ॥ ४४ ॥
स्नेहस्वेदौषधोत्क्लेशसङ्गेरिति न बाध्यते । १५ अ ० हु ०
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२२६ अष्टाङ्गहृदये लंघन का फल – लंघन या उपवास करने से स्नेहन तथा स्वेदन विधियों का सेवन करने के कारण जी मिचलाने से तथा मल - मूत्र आदि मलों की रुकावट से उत्पन्न होने वाली किसी प्रकार की बाधा से पीड़ित नहीं होता । पेया आदि की जठराग्नि मन्द पड़ जाती पेया सेवन का संशोधनास्रविस्रावस्नेहयोजनलङ्घनैः ॥४५ ॥
यात्यग्निर्मन्दतां तस्मात् क्रमं पेयादिमाचरेत् । आवश्यकता — वमन, विरेचन, रक्तस्रावण, स्नेहपान तथा है, अतः पेया आदि का आचरण ( सेवन ) करना चाहिए ॥ स्रुताल्पपित्तश्लेष्माणं मद्यपं वातपैत्तिकम् ॥ ४६ ॥
पेयां न पाययेत्तेषां तर्पणादिक्रमो हितः । निषेध - जिसका पित्त तथा कफ थोड़ा - सा निकला हो, लंघन करने के बाद प्रायः ४५ ॥ जो मद्यपान का अभ्यासी हो, जो वातपित्तज विकारों से पीड़ित हो — इन सभी को पेया का सेवन न करायें । इनके लिए तर्पण ( सन्तर्पण ) चिकित्सा लाभदायक होती है ॥ ४६ ॥
वक्तव्य —च.सू.अ. २३ सम्पूर्ण में तथा अष्टांगहृदय १४१८ - ९ में इस विषय को देखें ।
अपक्वं वमनं दोषान् पच्यमानं विरेचनम् ॥ ४७ ॥
निर्हरेद्वमनस्यातः पाकं न प्रतिपालयेत् । वमन विरेचन की प्रतीक्षा — वमनकारक औषधद्रव्य सेवन करने के पश्चात् बिना पचे ही दोषों को निकाल देते हैं और विरेचनकारक औषधद्रव्य पचते हुए अर्थात् कुछ देर से दोषों को निकालते हैं । अतएव वमनकारक औषधद्रव्य की देर तक प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए ॥ ४७ ॥
वक्तव्य — उक्त ४७ वाँ श्लोक श्रीवाग्भट ने च.क. १२।६२ से अविकल रूप में उद्धृत करने पर भी
' दोष ' के स्थान पर ‘ दोषान् ' पाठभेद किया है ।
दुर्बलो बहुदोषश्च दोषपाकेन यः स्वयम् ॥ ४८ ॥
विरिच्यते भेदनीयैर्भोज्यैस्तमुपपादयेत् । वमन विरेचन की चिकित्सा – यदि उदर सम्बन्धी दोष अधिक हों और रोगी दुर्बल हो, ऐसी स्थिति में दोषों का पाक हो जाने के कारण औषधद्रव्यों के प्रयोग किये बिना यदि स्वयमेव विरेचन हो रहे हों तो उसे मलभेदक आहारों का प्रयोग कराना चाहिए ॥ ४८ ॥
वक्तव्य — स्वयमेव होने वाले वमन या विरेचन को तत्काल रोकने का प्रयत्न कभी नहीं करना चाहिए, अपितु उनकी गतिविधि की प्रतीक्षा करनी चाहिए । यदि वे दोष निकल जाने पर स्वयं शान्त हो जाते हैं, तो इसे ईश्वर की कृपा समझें । यदि इनका क्रम चालू रह जाता है तो इनकी चिकित्सा करें । दुर्बलः शोधितः पूर्वमल्पदोषः कृशो नरः ॥ ४ ९ ॥ अपरिज्ञातकोष्ठश्च पिबेन्मृद्वल्पमौषधम् । मृदु विरेचन का निर्देश— जो सम्प्रति दुर्बल हो, जिसे पहले संशोधन कराया जा चुका हो, जिसके उदरप्रदेश में थोड़ा दोष शेष रह गया हो, जो मनुष्य कृश हो और जिसके कोष्ठ के सम्बन्ध में भलीभाँति जानकारी न हो कि यह व्यक्ति क्रूर कोष्ठ वाला है या मृदु कोष्ठ वाला है, उसे वमन या विरेचन कारक पहले मृदु औषध अल्प मात्रा में दें ॥ ४ ९ ॥ वरं तदसकृत्पीतमन्यथा संशयावहम् ॥५० ॥
हरेद्वहंश्चलान्दोषानल्पानल्पान् पुनः पुनः । औषध प्रयोग में सावधानी - वमन या विरेचनकारक औषधि को थोड़ा - थोड़ा बार - बार पीना अच्छा ( समझदारी ) है और एक साथ अधिक मात्रा में औषध का सेवन करना हानिकारक हो सकता
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वमनविरेचनविधिरध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् है । अतएव अधिक दोषों को अथवा स्वयं निकलने वाले दोषों को थोड़ा - थोड़ा चाहिए ॥ ५० ॥
दुर्बलस्य मृदुद्रव्यैरल्पान् संशमयेत्तु तान् ॥ ५१ दुर्बल के दोषों पर विचार — दुर्बल ( कमजोर ) पुरुष के थोड़े दोषों यथासम्भव शमन - चिकित्सा द्वारा शान्त करने का प्रयत्न करना चाहिए ॥ ५१ ॥
क्लेशयन्ति चिरं ते हि हन्युर्वैनमनिर्हृताः । २२७ बार - बार निकल जाने देना ॥ को मृदुविरेचक द्रव्यों द्वारा दोषनिर्हरण की आवश्यकता – यदि स्वल्पमात्रा में बचे हुए वे दोष शोधन - विधि से नहीं निकाले जाते तो वे उस पुरुष को चिरकाल तक कष्ट देते रहते हैं अथवा इसे मार डालते हैं । वक्तव्य — इसी विषय को दृष्टि में रखकर भगवान् पुनर्वसु ने भी कहा है— ' दुर्बलोऽपि महादोषो विरेच्यो बहुशोऽल्पशः । मृदुभिर्भेषजैर्दोषा हन्युर्ह्येनमनिर्हृताः ' ॥ ( च.क. १२ ६ ९ ) मन्दाग्निं क्रूरकोष्ठं च सक्षारलवणैर्धृतैः ॥ ५२ ॥
सन्धुक्षिताग्निं विजितकफवातं च शोधयेत् । पुनः शोधन - निर्देश—— मन्दाग्नि तथा क्रूरकोष्ठ वाले व्यक्तियों को जवाखार तथा लवण मिले हुए घी का सेवन कराकर उनकी जठराग्नि को प्रदीप्त करे और उसके कफ एवं वात दोष पर विजय प्राप्त करें, तदनन्तर उनका संशोधन करें ॥ ५२ ॥
रूक्षबह्वनिलक्रूरकोष्ठव्यायामशीलिनाम् ॥५३ ॥
दीप्ताग्नीनां च भैषज्यमविरेच्यैव जीर्यति । तेभ्यो बस्तिं पुरा दद्यात्ततः स्निग्धं विरेचनम् ॥ ५४ ॥
शकृन्निर्हृत्य वा किञ्चित्तीक्ष्णाभिः फलवर्तिभिः । प्रवृत्तं हि मलं स्निग्धो विरेको निर्हरेत्सुखम् ॥ विरेचन में विविध विचार — जिनका कोष्ठ रूक्ष ( रूखा ) है, वातदोष अवरुद्ध है, जिनका कोष्ठ क्रूर है, जो निरन्तर व्यायाम किया करते हैं तथा जिनकी जठराग्नि प्रदीप्त है; इस प्रकार के व्यक्तियों को दी गयी विरेचनकारक औषधि बिना अपना कार्य ( विरेचन ) किये ही पच जाती है । ऐसे पुरुषों को विरेचक औषध देने से पहले अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए अथवा तीक्ष्ण विरेचक द्रव्यों द्वारा बनायी गयी फलवर्ति का गुद में प्रवेश कराये । इससे जब थोड़ा मल निकल जाय तब स्निग्ध विरेचन देना चाहिए, इस विधि से मल सुखपूर्वक निकल आता है ॥ ५३-५५ ॥ विषाभिघातपिटिकाकुष्ठशोफविसर्पिणः । कामलापाण्डुमेहार्तान्नातिस्निग्धान् विशोधयेत् ॥ शोधन के अयोग्य रोगी — विषविकार, अभिघात, पिडका, कुष्ठ, शोथ, विसर्प, कामला, पाण्डुरोग तथा प्रमेहरोग से पीड़ित व्यक्तियों को थोड़ा - सा स्नेहन कराकर तभी विरेचन - औषधि का प्रयोग कराना चाहिए । विरेचन देने के पहले स्नेहन कराना आवश्यक है किन्तु जिन्हें स्नेहन - प्रयोग कराया गया है, उन्हें रूक्ष विरेचन देना हितकर होता है ॥ ५६ ॥
सर्वान् स्नेहविरेकैश्च, रूक्षैस्तु स्नेहभावितान् । शोधन के भेद - जिनका थोड़ा - सा स्नेहन किया गया है, विष सेवन से पीड़ित जो थोड़े रूक्ष हैं इनका स्नेहयुक्त विरेचक औषधों द्वारा शोधन करना चाहिए और जिनका भलीभाँति स्नेहन किया गया हो
उनका रूक्ष विरेचक पदार्थों द्वारा शोधन करना चाहिए ।
कर्मणां वमनादीनां पुनरप्यन्तरेऽन्तरे ॥ ५७ ॥
स्नेहस्वेदौ प्रयुञ्जीत, स्नेहमन्ते बलाय च । स्नेहन - स्वेदन प्रयोग — वमन तथा विरेचन जब कराये जा रहे हों उस काल में इनके बीच - बीच में बार - बार स्नेहन एवं स्वेदन प्रयोग कराते रहने चाहिए । ऐसा न सोच लें कि प्रारम्भ में तो स्नेहन - स्वेदन करा दिये थे, वे ही पर्याप्त हैं । प्रत्येक प्रकार की चिकित्सा - विधि के अन्त में रोगी का बल बढ़े, इस सदिच्छा से उसे स्नेहन कराना चाहिए ॥ ५७ ॥
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२२८ अष्टाङ्गहृदये वक्तव्य — भगवान् धन्वन्तरि ने स्नेह को जीवनोपयोगी बतलाते हुए इस प्रकार पुरुषः ‘ ' ‘ “ योज्यः ’ । ( सु.चि. ३१।३ ) अर्थात् यह पुरुष स्नेह के सहारे ही स्वस्थ का भी मुख्य आधार स्नेह ही है । प्रायः रोग भी स्नेहसाध्य होते हैं, अतः स्नेह का शिरोविरेचन, शिरोबस्ति, उत्तरबस्ति, नस्य, कर्णपूरण ( कान में डालने ), शरीर
भोजन के साथ किया जाता है ।
मलो हि देहादुत्क्लेश्य हियते वाससो यथा ॥ ५८ ॥
स्नेहस्वेदैस्तथोत्क्लिष्टः शोध्यते शोधनैर्मलः । मलों का उत्क्लेशन —- जिस प्रकार कपड़ा पर जमी हुई मैल को स्नेहन ( कहा है — ' स्नेहसारोऽयं रह पाता है और प्राणों प्रयोग पीने, अनुवासन, पर मालिश करने तथा स्नेह तथा क्षार प्रधान पदार्थ साबुन ) तथा स्वेदन ( गरम पानी ) द्वारा उभाड़ कर निकाला जाता है, उसी प्रकार शरीर स्थित मलों को स्नेहन एवं स्वेदन विधियों से उत्क्लेशन ( उभाड़ ) कर वमन एवं विरेचन निकाल दिया जाता है ॥ ५८ ॥
स्नेहस्वेदावनभ्यस्य कुर्यात्संशोधनं तु यः ॥ ५ ९ ॥ दारु शुष्कमिवानामे शरीरं तस्य दीर्यते । स्नेहन - स्वेदन के लाभ- -स्नेहन तथा स्वेदन का अभ्यास ( निरन्तर सेवन संशोधन का प्रयोग करता है, उसका शरीर उस प्रकार फट जाता है जैसे स्नेहन झुकाने का प्रयत्न करने पर सूखी लकड़ी टूट या फट जाती है ॥५ ९ ॥ नामक शोधनों से बाहर ) किये बिना जो रोगी तथा स्वेदन किये बिना वक्तव्य- - सामान्य रूप से स्नेहन - स्वेदन किये कराये बिना वमन तथा विरेचन होते भी हैं और कराये भी जाते हैं । यहाँ जो प्रमुख रूप से स्नेहन - स्वेदन की चर्चा है, वह पञ्चकर्म - विधि को ध्यान में रखकर ही की गयी है ।
बुद्धिप्रसादं बलमिन्द्रियाणां धातुस्थिरत्वं ज्वलनस्य दीप्तिम् ।
चिराच्च पाकं वयसः करोति संशोधनं सम्यगुपास्यमानम् ॥ ६० ॥।
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने वमनविरेचनविधिर्नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
संशोधन से लाभ — शास्त्रोक्त विधि द्वारा सेवन किया गया संशोधन ( वमन न - - 1 विरेचन ) बुद्धि को निर्मल, करता है, इन्द्रियों को बल प्रदान करता है, रस - रक्त आदि धातुओं में स्थिरता ला देता है, ज्वलन ( जठराग्नि ) को प्रदीप्त कर देता है और चिरकाल तक वृद्धावस्था को समीप नहीं आने देता । ये ही भाव जीवन में अपेक्षित होते हैं ॥ ६० ॥
वक्तव्य — भगवान् पुनर्वसु ने संशोधन - विधियों की प्रशंसा इस प्रकार की है— ' दोषाः कदाचित् कुप्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः । जिताः संशोधनैर्ये तु न तेषां पुनरुद्भवः ' ॥ ( च.सू. १६।२० ) अर्थात् लंघन एवं पाचन विधियों से शान्त किये वात आदि दोष कभी - कभी फिर भी कुपित हो जाते हैं, किन्तु संशोधन - विधि से जिनका निर्हरण कर दिया जाता है, उनकी पुनः उत्पत्ति नहीं होती । यही संशोधन - विधि की प्रमुखता है । इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय - सूत्रस्थान में वमन विरेचनविधि नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ॥ १८ ॥
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एकोनविंशोऽध्यायः अथातो बस्तिविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः । अब हम यहाँ से बस्तिविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे । ऐसा आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था । उपक्रम — इसके पहले १८ वें अध्याय में वमन विरेचन विधियों से मलों के निर्हरण - विधि का वर्णन किया गया था । बस्ति के प्रयोग से भी मल का निर्हरण किया जाता है, अतएव यहाँ वमन- - विरेचन के वर्णन करने के बाद तदनुरूप बस्तिविधि का उपदेश किया जा रहा है । वस्ति या बस्ति शब्द पर विचार — अमरकोश की रामाश्रमी टीका में ' वस्ति ' शब्द की निरुक्ति ——— वस निवासे ' तथा ‘ वस आच्छादने ' धातुओं से की गयी है । यहाँ वस धातु से ' वसेस्तिः ' ( उ. ४।१८० ) सूत्र के अनुसार ' ति ' प्रत्यय का योग होने से उक्त शब्द की निष्पत्ति हुई है । इसका अर्थ है — ' वसति मूत्रम् अत्र ', जो सर्वथा प्रसंगोचित अर्थ है । तदाकार इस यन्त्र के होने के कारण इसे भी ' वस्तियन्त्र ' कहा जाता है । बस्ति — वी. एस. आप्टे ने अपने कोश में ' बस्त + घञ् ' = बकरा, ऐसा विवरण दिया है । जहाँ बस्ति के लिए अनेक प्राणियों के चर्म आदि को लेने का विधान किया है, वहाँ अन्त में उल्लिखित ' बस्त ' का ग्रहण कर उसके नाम के अनुसार इसका नाम ' बस्ति ' स्वीकार कर लेना अधिक समीचीन प्रतीत नहीं होता । देखें बस्ति - निर्माण के लिए उपयोगी चर्म —- सु. चि. ३५।१३ तथा च. सि. ३।१० - ११ । इसके बाद भी चरक - सुश्रुत आदि संहिताओं में वस्ति शब्द में ' व ' के स्थान पर ' ब ' का ही प्रयोग अधिकांश देखा जाता है । आचार्य पुरुषोत्तमदेव ने स्वरचित ' वर्णदेशना ' नामक ग्रन्थ में ब, व, न, ण; य, ज; श, स आदि के औचित्य पर संक्षेप में विचार किया है, आप भी उसका अनुशीलन करें । संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेतच. सि. १, २, ३, सु. चि. ३५, ३७ तथा ३८; अ.सं.सू. २८ में देखें । वातोल्बणेषु दोषेषु वाते वा बस्तिरिष्यते । उपक्रमाणां सर्वेषां सोऽग्रणीस्त्रिविधस्तु सः ॥ १ ॥
निरूहोऽन्वासनं बस्तिरुत्तरः-बस्ति का प्रयोग — वात - प्रधान दोषों में अथवा केवल वातदोष में भी बस्ति का प्रयोग करना चाहिए । बस्ति को सभी उपक्रमों ( चिकित्साविधियों ) में अग्रगण्य ( प्रमुख ) माना जाता है । यह विधिभेद से तीन प्रकार की होती है— १. निरूह या निरूहण या आस्थापन, २. अन्वासन ( अनुवासन ) तथा ३. उत्तरबस्ति ॥ १ ॥
वक्तव्य- -भगवान् पुनर्वसु ने बस्ति - प्रयोग की उपयोगिता को देखकर अपना तथा दूसरों का मत इस प्रकार उपस्थापित किया है— ' तस्मात् चिकित्सार्धमिति ब्रुवन्ति सर्वां चिकित्सामपि बस्तिमेके ' ॥ ( च.सि.
१४० ) अर्थ स्पष्ट है ।
- तेन साधयेत् । गुल्मानाहखुडप्लीहशुद्धातीसारशूलिनः ॥ २ ॥
जीर्णज्वरप्रतिश्यायशुक्रानिलमलग्रहान् । वर्ध्याश्मरीरजोनाशान् दारुणांश्चानिलामयान् ॥ ३ ॥
बस्ति - प्रयोग से लाभ – निरूहणबस्ति के प्रयोग से गुल्म, आनाह, खुडरोग ( वातरक्तरोग – वै. निघण्टु ), प्लीहविकार, शुद्धातिसार ( आमदोषरहित अतिसार ), शूल, जीर्णज्वर, प्रतिश्याय, शुक्रग्रह ( शुक्र की रुकावट या शुक्रोदावर्त ), वातग्रह, मलग्रह, वृद्धिरोग, अश्मरी ( पथरी हो जाने पर कभी - कभी जो मूत्र में रुकावट आ जाती है ), रजोरोध तथा वातज भीषण रोग शान्त हो जाते हैं ॥ २-३ ॥
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२३० अष्टाङ्गहृदये वक्तव्य — भगवान् धन्वन्तरि ने बस्तियों को दो भागों में बाँटा है । यथा — १. निरूहण तथा २. स्नेहन । आस्थापन और निरूह ये नैरूहिक बस्ति के पर्यायवाची नाम हैं । इसी का भेद है— माधुतैलिकबस्ति और इसके पर्याय हैं — यापनाबस्ति, युक्तरथबस्ति एवं सिद्धबस्ति । शरीर से दोषों को निकालने अथवा शरीर का रोहण करने के कारण इसे निरूहणबस्ति कहते हैं । आयु ( यौवन ) को स्थिर रखने के कारण इसी को आस्थापनबस्ति कहते हैं । माधुतैलिकबस्ति का वर्णन आगे निरूहण - चिकित्सा प्रसंग में कहा जायेगा । यथाप्रमाण कही हुई बस्ति के परिमाण में सें चौथा भाग निकालने पर स्नेहबस्ति का ही भेद अनुवासनबस्ति नाम से कहा जाता है । शरीर के भीतर रह जाने पर भी जो दूषित नहीं होती अथवा जिसका प्रयोग प्रतिदिन किया जा सकता है, अतएव इसे ' अनुवासनबस्ति ' कहते हैं । इसी का एक भेद है— ' मात्राबस्ति ' । इसमें आधे से भी आधी मात्रा ली जाती है । इसमें किसी प्रकार के परिहार की आवश्यकता नहीं होती है । देखें — सु.चि. ३५।१८ । बस्ति - परिचय - अनुवासनबस्ति की परिभाषा तो ऊपर दी गयी है । यथा— ' -'अनुवसन् अपि न दुष्यति ' अथवा ' अनुदिवसं दीयते इति अनुवासनः ' । अर्थ ऊपर दिया है । यह अनुवासनबस्ति की उत्तम परिभाषा है । यापनाबस्ति — जिन बस्तियों के प्रयोग से मानव तथा स्त्री को दीर्घकाल तक युवा - युवती बनाये रखा जा सके, उन्हें ' यापनाबस्ति ' कहते हैं । युक्तरथबस्ति — आचार्य चक्रपाणि ने उक्त बस्ति का परिचय इस प्रकार दिया है — घोड़े जुते हुए रथ में बैठकर तत्काल जाने वाले व्यक्ति को भी किसी प्रकार की तैयारी किये बिना भी यह बस्ति दी जा सकती है और देने के बाद किसी प्रकार का परहेज भी इसमें नहीं करना पड़ता, यही उक्त नाम की सार्थकता है । मात्राबस्ति - ' षट्पली तु भवेच्छ्रेष्ठा मध्यमा त्रिपली भवेत् । कनीयस्यध्यर्धपला त्रिधा मात्राऽनुवासने ' ॥ अर्थात् चौबीस पल में से चतुर्थांश ( ६ पल ) स्नेह लेने से अनुवासनबस्ति की उत्तम मात्रा होती है । तीन पल की मध्यम मात्रा और डेढ़ पल की कनीयसी मात्रा होती है । भगवान् पुनर्वसु का कथन है- ' निरूहपादांशसमेन तैलम् ' अर्थात् चौबीस पल निरूहद्रव्य के होने पर छ: पल स्नेह की मात्रा चतुर्थांश होती है, यह उत्तम मात्रा है । इसी क्रम में मध्यम तथा कनीयसी मात्रा को भी समझें । आचार्य गयी के अनुसार — ६ पल स्नेहबस्ति में, ३ पल अनुवासनबस्ति में और १३ पल मात्राबस्ति में स्नेह की मात्रा होनी चाहिए । उत्तरबस्ति — जो बस्ति स्त्री अथवा पुरुष के मूत्रमार्ग में दी जाती है, उसे उत्तरबस्ति कहते हैं । इसके भी निरूहण तथा अनुवासन नाम से दो भेद होते हैं । अनास्थाप्यास्त्वतिस्निग्धः क्षतोरस्को भृशं कृशः । आमातिसारी वमिमान् संशुद्धो दत्तनावनः ॥ श्वासकासप्रसेकार्शोहिध्माध्मानाल्पवह्नयः । शूनपायुः कृताहारो बद्धच्छिद्रोदकोदरी ॥ ५ ॥
कुष्ठी च मधुमेही च मासान् सप्त च गर्भिणी । निरूहण के अयोग्य – जिसे अधिक स्नेहपान कराया गया हो, उरःक्षत का रोगी, अत्यन्त कृश ( दुर्बल ), आमज अतिसार का रोगी, छर्दि ( वमन ) का रोगी, वमन विरेचन कराने के तत्काल बाद, जिसे नस्य का प्रयोग कराया गया हो, श्वासरोगी, कासरोगी, प्रसेक ( कफदोष की वृद्धि के कारण जिसके मुख से लार निकल रही हो ) का रोगी, अर्शोरोगी, हिचकी का रोगी, आध्मान, मन्दाग्नि, जिसके गुदप्रदेश में सूजन हो, जिसने तत्काल भोजन किया हो, बद्धगुदोदर, छिद्रोदर तथा जलोदर का रोगी, कुष्ठरोगी, मधुमेह का रोगी और जिसके गर्भ को सात मास हो गये हों ऐसी स्त्री को भी आस्थापन ( निरूहण ) बस्ति का प्रयोग नहीं कराना चाहिए ॥ ४-५ ॥ वक्तव्य — भंगवान् पुनर्वसु ने च.सि. २११४ में जिन रोगियों को अनास्थाप्य कहा है, उनका परिगणन तो श्रीवाग्भट ने उक्त श्लोकों में प्रायः कर दिया है, किन्तु जिन्हें चरक ने सि. २।१४-१५वें गद्य द्वारा कहा है उनका उल्लेख नहीं किया । अस्तु, उन्हें आप चरक के उक्त सन्दर्भ में देख लें । जिसे श्रीवाग्भट ने ' मासान् सप्त च गर्भिणी ' कहा है, उसके स्थान पर चरक में ' आमप्रजाता ' पाठ है, आप ऐसी स्थिति में भी निरूहणबस्ति का प्रयोग न करें ।
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बस्तिविधिरध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् २३१ आस्थाप्या एव चान्वास्या विशेषादतिवह्नयः ॥ ६ ॥
रूक्षाः केवलवातार्ताः-निरूहण एवं अनुवासन के योग्य – जो व्यक्ति आस्थापन ( निरूहण ) बस्ति के योग्य होते हैं वे ही अनुवासनबस्ति के योग्य भी होते हैं । विशेष करके जिनकी जठराग्नि अत्यधिक तीव्र हो, जो रूक्षशरीर वाले हों और जो केवल वातदोष से पीड़ित हों उन्हें अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए ॥ ६ ॥
-नानुवास्यास्त एव च । येऽनास्थाप्यास्तथा पाण्डुकामलामेहपीनसाः ॥ ७ ॥
निरन्नप्लीहविड्भेदिगुरुकोष्ठकफोदराः । अभिष्यन्दिभृशस्थूलकृमिकोष्ठाढ्यमारुताः ॥ ८ ॥
पीते विषे गरेऽपच्यां श्लीपदी गलगण्डवान् । निरूहण एवं अनुवासन के अयोग्य – जो रोगी आस्थापन ( निरूहण ) बस्ति के अयोग्य होते हैं, वे अनुवासनबस्ति के भी अयोग्य होते हैं, क्योंकि दोनों बस्तियों का प्रयोग साथ - साथ किया जाता है । उनकी गणना पाण्डुरोगी, कामलारोगी, प्रमेह, पीनस, निरन्न ( जिसने लंघन किया हो या भूखा हो ), प्लीहा-रोगी, अतिसार, पेट का भारीपन, कफोदर, अभिष्यन्द, कृश, स्थूल, जिसके पेट में क्रिमि हों, ऊरुस्तम्भ, विषपान कर लेने पर, गर - विषयुक्त, अपची, श्लीपद ( फीलपाँव ) तथा गलगण्ड का रोगी – ये सभी अनुवासनबस्ति - प्रयोग के योग्य नहीं होते हैं ॥ ७-८ ॥ तयोस्तु नेत्रं हेमादिधातुदार्वस्थिवेणुजम् ॥ ९ ॥
गोपुच्छाकारमच्छिद्रं श्लक्ष्णर्जु गुलिकामुखम् । बस्तिनेत्र - परिचय — उन दोनों ( निरूहण एवं अनुवासन ) बस्तियों के नेत्रों को सोना आदि धातु का, लकड़ी का, हड्डी का अथवा बाँस का बनवाना चाहिए । इन नेत्रों का आकार गाय की पूँछ के सदृश ( नीचे की ओर को क्रमशः मोटा और आगे की ओर क्रमशः पतला ), पतले छेद से युक्त, चिकना, सीधा तथा उसका मुख ( अगला ) भाग गोलाकार होना चाहिए ॥ ९ ॥
वक्तव्य — बस्तिनेत्र ( नली ) को ' अच्छिद्र ' कहा गया है, किन्तु इस नली के अगले भाग में भीतर ही भीतर एक छिद्र होता है, जो बस्तिपुट से लेकर आगे तक होता है । इसी छिद्र से वह द्रव पदार्थ गुद आदि प्रदेशों में पहुँचाया जाता है । ऊपर जो अच्छिद्र कहा गया है उसका तात्पर्य है — उस नली के अगल - बगल छिद्र न हों । आज का अनीमा यन्त्र इसी का प्रतिनिधि है । इस ' अच्छिद्रं ' का अर्थ श्रीअरुणदत्त ‘ निर्विवरम् ’ कहते हैं और श्रीहेमाद्रि मौन हैं । जब कि बस्तिनेत्र में भीतर - ही - भीतर आदि से अन्त तक छिद्र होना परम आवश्यक है, अतः यहाँ ' अच्छिद्रं ' का अर्थ सूक्ष्मछिद्र युक्त कर लेना चाहिए; क्योंकि नञ्समस्त पद का अर्थ ' तदल्पता ' भी होता है । देखें— ' तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तदल्पता । अप्राशस्त्यं विरोधश्च नञर्थाः षट् प्रकीर्तिताः ' ॥ ( नञ्प्रकरण - मनोरमाटीका ) प्राचीन तन्त्रकारों के वचनों की संगति बैठाना ही व्याख्याकार की योग्यता है, अपनी अयोग्यता का भार तन्त्रकार पर डालना यह उसकी उच्छृंखलता है । नेत्र - निरुक्ति — ‘ णीञ् प्रापणे ' धातु से ' ष्ट्रन् ' प्रत्यय करके ' नेत्र ' शब्द की निष्पत्ति होती है । इसका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है — ‘ नयति, नीयते वा अनेन बस्तिकर्मोचितं द्रव्यम् ' । अर्थात् इस नेत्रयन्त्र के माध्यम से बस्ति में रखे हुए द्रव्य को गुद के मूत्रमार्ग से भीतर तक पहुँचाया जाता है, अतएव इसे नेत्र कहते हैं । ऊनेऽब्दे पञ्च, पूर्णेऽस्मिन्नासप्तभ्योऽङ्गुलानि षट् ॥ १० ॥
सप्तमे सप्त, तान्यष्टौ द्वादशे षोडशे नव । द्वादशैव परं विंशाद्वीक्ष्य वर्षान्तरेषु च ॥ ११ ॥
वयोबलशरीराणि प्रमाणमभिवर्द्धयेत् । नेत्र का आकार — नेत्र की लम्बाई किस अवस्था में कितनी होनी चाहिए, इसका विवरण दिया जा रहा है — एक वर्ष से कम अवस्था वालों में उनके अंगुलों के प्रमाण से ५ अंगुल, एक वर्ष से लेकर सात वर्ष के पहले तक की अवस्था वालों में ६ अंगुल, सातवें वर्ष में ७ अंगुल, बारहवें वर्ष में ८ अंगुल,
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२३२ अष्टाङ्गहृदये सोलहवें वर्ष में ९ अंगुल तथा बीस वर्ष पूरा होने से लेकर अगले वर्षों में भी नेत्र का प्रमाण १२ अंगुल होना चाहिए । इनके अतिरिक्त जिन वर्षों का उल्लेख ऊपर नहीं किया गया उन ( ९, १०, ११ आदि ) वर्षों में वयस् ( अवस्था ), शारीरिक बल तथा शरीर की स्थिति ( नाटा, लम्बा, दुबला, मोटा आदि ) का विचार कर उक्त नेत्र के परिमाण को बढ़ाया भी जा सकता है ॥ १०-११ ॥ वक्तव्य — श्रीवाग्भट ने ' वयोबलशरीराणि ' का जो निर्देश दिया है, वह चिकित्सक के लिए है, वह देखे कि जिसे बस्ति - प्रयोग कराना है उसकी अवस्था, बल तथा शारीरिक स्थिति कैसी है, तदनुसार नेत्र की लम्बाई का निर्धारण करे । ऊपर जो नेत्र की लम्बाई के प्रमाण दिये हैं, वे सामान्य हैं । ' आसप्तभ्यः ’ — यहाँ पर ‘ आङ् ' उपसर्ग का प्रयोग ' मर्यादा ' अर्थ में किया गया है, न कि ' अभिविधि ' अर्थ में । वयस्, बल और शरीर की अनुकूल स्थिति को देखकर नेत्र का प्रमाण बढ़ाया जा सकता है, तो विपरीत स्थिति में
वह घटाया भी जा सकता है ।
स्वाङ्गुष्ठेन समं मूले स्थौल्येनाग्रे कनिष्ठया ॥ १२ ॥
नेत्र की मोटाई — बस्तिनेत्र के मूल भाग की मोटाई जिसे बस्तिप्रयोग कराया जा रहा हो उसके अँगूठा के समान मोटी और उसके अगले भाग की मोटाई उसके कनिष्ठिका अंगुली के समान पतली होनी चाहिए ॥ १२ ॥
पूर्णेऽब्देऽङ्गुलमादाय तदर्द्धार्द्धप्रवर्द्धितम् । त्र्यङ्गुलं परमं छिद्रं मूलेऽग्रे वहते तु यत् ॥१३ ॥
मुद्रं माषं कलायं च क्लिन्नं कर्कन्धुकं क्रमात् । बस्तिनेत्र का छिद्र — बस्तिनेत्र का छेद ( जिससे बस्ति में रखा हुआ द्रव भीतर प्रवेश कराया जाता है ) एक वर्ष की अवस्था पूरी हो जाने पर १ अंगुल से लेकर उसके आधे के क्रम से क्रमशः अवस्थानुसार बढ़ाया गया परम ( बड़े से भी बड़ा ) तीन नेत्रछिद्र का यह परिमाण मूल भाग ( जो बस्ति के साथ जुटा रहता है, कहे गये विषय को इस प्रकार समझें – १ वर्ष से ६ वर्ष तक १ अंगुल ( सवा ) अंगुल, १२ से १५ वर्ष तक १३ ( डेढ़ ) अंगुल, १६ वर्ष में १ में २ अंगुल, १८ वर्ष में २ ( सवा दो ) अंगुल, १ ९ वर्ष में २३ ( अढ़ाई ) तीन ) अंगुल, तदनन्तर ३ अंगुल का छिद्र होना चाहिए । बस्तिनेत्र के अगले भाग का छिद्र क्रमशः मूँग के बराबर ( १ वर्ष का आधा अर्थात् चौथाई अंगुल अंगुल प्रमाण का होना चाहिए । उस ) में होना चाहिए । ऊपर छिद्र, ७ से ११ वर्ष तक ११ ( पौने दो ) अंगुल, १७ वर्ष अंगुल, २० वर्ष में २ ( पौने से ६ वर्ष तक के लिए ), उड़द के बराबर ( ७ वर्ष से ११ वर्ष तक के लिए ), कलाय ( मटर ) के बराबर ( १६ वर्ष से २० वर्ष तक के लिए ) और कर्कन्धु ( झड़बेर ) के बराबर ( २० वर्ष से अन्त तक के लिए ) होना चाहिए, जिससे गीले, कच्चे या हरे मूँग आदि आसानी से निकल सकें॥१३ ॥
वक्तव्य- -'स्वाङ्गुष्ठेन ' ' ' ' त्र्यङ्गुलं परमं छिद्रम् ' । उपर्युक्त पद्यभाग पर आप विचार करें, इसके लिए
सु.चि. ३५।७, ८, ९ उद्धरणों में जो कुछ कहा गया है उससे सहायता लें ।
मूलच्छिद्रप्रमाणेन प्रान्ते घटितकर्णिकम् ॥ १४ ॥
वर्त्याऽग्रे पिहितं, मूले यथास्वं द्व्यङ्गुलान्तरम् । कर्णिकाद्वितयं नेत्रे कुर्यात्— कर्णिका का वर्णन — बस्तिनेत्र के मूल छिद्र के प्रमाण से उसके प्रान्त ( अन्तिम ) भाग में कर्णिका ( कँगनी ) बनानी चाहिए । नेत्र के मूल में दो अंगुल की दूरी पर दो - दो कर्णिकाएँ बनायें । इस समय नेत्र के अगले छिद्र में वस्त्र या रुई की बत्ती डालकर उस छिद्र को बन्द कर लें ॥ १४ ॥
— तत्र च योजयेत् ॥। १५ ॥ अजाविमहिषादीनां बस्तिं सुमृदितं दृढम् । कषायरक्तं निश्छिद्रग्रन्थिगन्धशिरं तनुम् ॥ १६ ॥
ग्रथितं साधु सूत्रेण सुखसंस्थाप्यभेषजम् ।
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बस्तिविधिरध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् २३३ बस्तिपुट का वर्णन — नेत्र के अन्तिम भाग में जहाँ कर्णिका बनायी गयी थी, वहाँ बस्तिपुट को बाँधें । यह बस्तिपुट बकरा, भेड़ा, भैंसा आदि के मूत्राशय की जो बस्ति होती है उसे भलीभाँति मलकर बना लिया जाता है, यह मजबूत होती है । बबूल आदि कषायरस - प्रधान द्रव्यों के रस से रँगा गया हो, उसमें कोई छिद्र न हो, कोई गाँठ न हो, दुर्गन्ध न हो, सिराओं से रहित हो, वह चर्म पतला हो तथा वह इतना बड़ा हो जिसमें औषध द्रव भलीभाँति रखे जा सकें, तदनन्तर वह अच्छी तरह से मजबूत धागे से सिली गयी हो ॥ १५-१६ ॥ बस्त्यभावेऽङ्कपादं वा न्यसेद्वासोऽथवा घनम् ॥ १७ ॥
अन्य · बस्तिपुट - विधान —– यदि ऊपर कहे गये बकरा आदि के मूत्राशय उपलब्ध न हो सकें तो बकरे के ऊरुचर्म या पादचर्म या ऐसा वस्त्र जिसमें से पानी न चूता हो अथवा वस्त्र में मोम घिसकर उससे बस्तिपुट का निर्माण कर लें ॥ १७ ॥
निरूहमात्रा प्रथमे प्रकुञ्चो वत्सरे परम् । प्रकुञ्चवृद्धिः प्रत्यब्दं यावत्षट्प्रसृतास्ततः ॥ १८ ॥
प्रसृतं वर्द्धयेदूर्ध्वं द्वादशाष्टादशस्य तु । आसप्ततेरिदं मानं, दशैव प्रसृताः परम् ॥१ ९ ॥ निरूहणबस्ति की मात्रा — निरूहण ( आस्थापन ) बस्ति में दिये जाने वाले औषध द्रव की मात्रा प्रथम वर्ष में १ प्रकुंच ( १ पल = ४ कर्ष = ४ तोला ) होनी चाहिए । एक वर्ष के बाद प्रतिवर्ष १-१ प्रकुंच के अनुपात से मात्रा तब तक बढ़ानी चाहिए जब तक वह ६ प्रसृत ( १२ प्रकुंच = ४८ तोला ) न हो जाय । तदनन्तर १-१ प्रसृत के प्रमाण से मात्रा बढ़ानी चाहिए । इस प्रकार १८ वर्ष की अवस्था वाले पुरुष के लिए यह मात्रा १२ प्रसृत ( २४ प्रकुंच = ९ ६ तोला ) हो जाती है । इसके बाद ७० वर्ष की अवस्था तक यही मात्रा उचित होती है । उसके बाद १० प्रसृत ( २० प्रकुंच = २० पल = ८० तोला ) की मात्रा होनी चाहिए । १८ - १ ९ ॥ यथायथं निरूहस्य पादो मात्राऽनुवासने । अनुवासनबस्ति की मात्रा — उक्त निरूहणबस्ति के क्रम से बढ़ाते हुए अनुवासनबस्ति में दिये जाने वाले स्नेहन - द्रव्यों की मात्रा चौथाई भाग होनी चाहिए । अर्थात् निरूहणबस्ति में जहाँ द्रव मात्रा एक पल
कही गयी है, वहाँ उस अवस्था में अनुवासन द्रव की मात्रा १ कर्ष होनी चाहिए ।
आस्थाप्यं स्नेहितं स्विन्नं शुद्धं लब्धबलं पुनः ॥ २० ॥
अन्वासनार्हं विज्ञाय पूर्वमेवानुवासयेत् । शीते वसन्ते च दिवा रात्रौ केचित्ततोऽन्यदा ॥ २१ ॥
अभ्यक्तस्नातमुचितात्पादहीनं हितं लघु । अस्निग्धरूक्षमशितं सानुपानं द्रवादि च ॥२२ ॥
कृतचङ्क्रमणं मुक्तविण्मूत्रं शयने सुखे । नात्युच्छ्रिते न चोच्छीर्षे संविष्टं वामपार्श्वतः ॥ २३ ॥
सङ्कोच्य दक्षिणं सक्थि प्रसार्य च ततोऽपरम् । बस्ति देने की विधि— निरूहणबस्ति देने योग्य पुरुष को पञ्चकर्म विधि के अनुसार स्नेहन - स्वेदन कराने के बाद वमन तथा विरेचन कराकर उसे शुद्ध करे । जब वह भलीभाँति स्वाभाविक रूप से बलवान् हो जाय तब उसे देखे कि यह अनुवासनबस्ति देने योग्य है, तब उसे पहले अनुवासनबस्ति देनी चाहिए । कुछ आचार्यों का मत है कि यह अनुवासनबस्ति शीतकाल ( हेमन्त तथा शिशिर काल ) में एवं वसन्त ऋतु में दिन में देनी चाहिए । इनके अतिरिक्त कालों ( ग्रीष्म, प्रावृट्, शरद् ऋतुओं ) में रात्रि के समय बस्ति का प्रयोग कराना चाहिए । इस प्रकार काल तथा दिन - रात्रि का निर्णय कर लेने पर जिस दिन बस्ति प्रयोग कराना हो, उस दिन अभ्यंग कराकर उस व्यक्ति को स्नान कराये । आहारमात्रा से चतुर्थांश, हितकर, लघु ( सुपच ), न अतिस्निग्ध, न अतिरूक्ष तथा उचित अनुपान के साथ द्रव आदि दें । भोजन करने के बाद वह थोड़ा भ्रमण करे । मल - मूत्र का त्याग करके सुखद शय्या पर, जो न अधिक ऊँची हो और न उसमें अधिक ऊँचा सिरहाना ही हो, ऐसी शय्या पर उसे बायीं करवट लेटा दें । उसकी दाहिनी टाँग को मोड़कर तथा बायीं टाँग को
सीधी करा दें । २०-२३ ॥
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२३४ अष्टाङ्गहृदये अथास्य नेत्रं प्रणयेत्स्निग्धे स्निग्धमुखं गुदे ॥ २४ ॥
उच्छ्वास्य बस्तेर्वदने बद्धे हस्तमकम्पयन् । पृष्ठवंशं प्रति ततो नातिद्रुतविलम्बितम् ॥ २५ ॥
नातिवेगं न वा मन्दं सकृदेव प्रपीडयेत् । सावशेषं च कुर्वीत वायुः शेषे हि तिष्ठति ॥ २६ ॥
बस्तिनेत्र के प्रवेश की विधि - उसके बाद औषधद्रव से भरी हुई बस्ति के मुख को चिकना करके चिकना किये गये गुदद्वार में इसका प्रवेश कराना चाहिए । औषधद्रव भरने के पहले बस्तिपुट को दबाकर उसके भीतर जो हवा भरी हुई थी उसे निकाल कर तब उसमें औषधद्रव भरें । बस्तिनेत्र का प्रवेश पीठ की ओर न अधिक शीघ्रता से और न अधिक विलम्ब से करे और औषधद्रव को भीतर प्रवेश कराने की इच्छा से बस्तिपुट को न अधिक वेग से और न अधिक धीरे से दबायें अर्थात् उसे एक बार दबाकर औषधद्रव को भीतर प्रवेश करा दें । यदि कुछ औषधद्रव रह गया हो तो पुनः उसे भीतर प्रवेश न करायें, क्योंकि जो शेष बच जाता है उसमें वायु का प्रवेश हो जाता है । अतः उस बस्तिनेत्र को धीरे - धीरे गुद से बाहर निकाल लें ॥ २४-२६ ॥ दत्ते तूत्तानदेहस्य पाणिना ताडयेत्स्फिजौ । तत्पार्ष्णिभ्यां तथा शय्यां पादतश्च त्रिरुत्क्षिपेत् ॥ २७ ॥
ततः प्रसारिताङ्गस्य सोपधानस्य पार्ष्णिके । आहन्यान्मुष्टिनाऽङ्गं च स्नेहेनाभ्यज्य मर्दयेत् ॥ वेदनार्तमिति स्नेहो न हि शीघ्रं निवर्तते । योज्यः शीघ्रं निवृत्तेऽन्यः स्नेहोऽतिष्ठन्नकार्यकृत् ॥ बस्ति के पश्चात् कर्म — इस प्रकार बस्तिकर्म कर लेने के बाद उस व्यक्ति को पीठ के बल से चित लिटा दें । उसके बाद उसके स्फिचों ( चूतड़ों ) को थपथपाये अथवा उससे कहें कि वह अपनी एड़ियों से स्वयं चूतड़ों को थपथपाये तथा उसकी शय्या ( पलंग या चारपायी ) को धीरे - धीरे तीन बार ऊपर की ओर उठा - उठाकर पटके । तदनन्तर जब वह व्यक्ति तकिया लगाकर और हाथ - पैर फैलाकर लेटा हो तब उसकी एड़ियों को और पसलियों को मुट्ठी से थपथपाये, शरीर पर तेल लगाकर उसके वेदना वाले अंग को विशेष करके मले, ऐसा करने से बस्ति द्वारा दिया गया स्नेह जल्दी नहीं लौट आता । यदि स्नेह लौटकर बाहर निकल आया हो तो शीघ्र ही दूसरी स्नेहबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए । क्योंकि बस्ति द्वारा भीतर प्रवेश कराया गया स्नेह यदि कुछ समय तक मलाशय के भीतर नहीं रुकता तो वह अपना कार्य ( लाभ ) नहीं करता है॥२७-२९ ॥ दीप्ताग्निं त्वागतस्नेहं सायाह्ने भोजयेल्लघु । स्नेह के लौट आने पर आहार – स्नेहद्रव के लौट आने पर यदि उस व्यक्ति की जठराग्नि प्रदीप्त
हो तो उसे लघु ( सुपच ) आहार खाने के लिए देना चाहिए ।
निवृत्तिकालः परमस्त्रयो यामास्ततः परम् ॥। ३० ॥
अहोरात्रमुपेक्षेत, परतः फलवर्तिभिः । तीक्ष्णैर्वा बस्तिभिः कुर्याद्यलं स्नेहनिवृत्तये ॥ ३१ ॥
स्नेह के न लौटने पर चिकित्सा - स्नेह के स्वाभाविक रूप से लौट आने का समय तीन प्रहर ( ९ घण्टे ) होते हैं, किन्तु आप एक दिन एक रात अर्थात् ८ प्रहर ( २४ घण्टे ) प्रतीक्षा कर लें । इतने समय तक भी यदि वह स्नेह नहीं लौटता है, तब उसे फलवर्तियों के प्रयोग से अथवा तीक्ष्ण ( निरूहण ) बस्तियों द्वारा लौटाने का प्रयत्न करें ॥ ३०-३१ ॥ अतिरौक्ष्यादनागच्छन्न चेज्जाड्यादिदोषकृत् । उपेक्षेतैव हि ततोऽध्युषितश्च निशां पिबेत् ॥ प्रातर्नागरधान्याम्भः कोष्णं, केवलमेव वा । विशेष चिकित्सा – यदि मलाशय की अत्यन्त रूक्षता के कारण स्नेह लौटकर न आ रहा हो और उसके न आने से शरीर पर जड़ता आदि दोष भी नहीं दिखलायी दे रहे हों तो उसकी उपेक्षा करें अर्थात् उस स्नेह को लौटाने का प्रयत्न ही न करें । अपितु रात्रिभर विश्राम कर लेने के बाद प्रातः काल सोंठ तथा धनियाँ डालकर उबाला हुआ जल अथवा केवल गुनगुना जल वह पीये ॥ ३२ ॥