श्रीगणेशाय नमः।

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 281–290

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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नस्यविधिरध्यायः २० ] में, कफज ग्रन्थिरोग में, है ॥२ ॥

बृंहण - - नस्य का में, वाणी की रुकावट करना चाहिए ॥३ ॥

सूत्रस्थानम् कुष्ठरोग, अपस्माररोग तथा पीनस ( प्रतिष्याय ) रोग में बृंहणं वातजे शूले सूर्यावर्ते स्वरक्षये ॥ ३ ॥

नासास्यशोषे वाक्सङ्गे कृच्छ्रबोधेऽवबाहुके । प्रयोग - वातजनित शूल में, सूर्यावर्तरोग में, स्वरक्षयरोग में, में, बड़े कष्ट से नींद के खुलने में तथा अवबाहुक नामक शमनं नीलिकाव्यङ्गकेशदोषाक्षिराजिषु ॥ ४ ॥

२४५ इसका प्रयोग किया जाता नासिकाशोथ में, मुखशोथ वातरोग में इसका प्रयोग शमन - नस्य का प्रयोग — नीलिका ( क्षुद्ररोग - विशेष ), व्यंग, बालों का अकाल में पकना या झड़ना तथा आँखों में रेखा के आकार की सिराओं का उभर आना आदि रोगों में करना चाहिए ॥४ ॥

यथास्वं यौगिकैः स्नेहैर्यथास्वं च प्रसाधितैः । कल्कक्वाथादिभिश्चाद्यं मधुपट्वासवैरपि ॥ ५ ॥

विरेचन - नस्य के द्रव्य — रोगों को ध्यान में रखकर सरसों आदि स्नेह ( तेल ) से सिद्ध किये गये स्नेहन - द्रव्यों द्वारा मधु, लवण तथा आसव आदि के संयोग से प्रथम विरेचन - नस्य का प्रयोग किया जाता है ॥५ ॥

बृंहणं धन्वमांसोत्थरसासृक्खपुरैरपि । शमनं योजयेत्पूर्वैः क्षीरेण सलिलेन वा ॥ ६ ॥

बृंहण - नस्य के द्रव्य — धन्व ( जांगल ) देशीय पशु - पक्षियों के मांसरस से या उनके रक्त से अथवा राल तथा गुग्गुलु आदि द्रव्यों के प्रयोग से बृंहण- - नस्य देनी चाहिए । शमन - नस्य के द्रव्य — घृत आदि मृदु स्नेहों से अथवा कोमल द्रव्यों के कल्क या क्वाथों से अथवा गाय या बकरी के दूध से अथवा जल से नस्य देनी चाहिए ॥६ ॥

वक्तव्य — जल द्वारा जो नस्य - प्रयोग किया जाता है, उसे नासिका छिद्र से हैं । योगशास्त्र में इसे ‘ नेतिक्रिया ' कहते हैं । इसके प्रयोग से ऊर्ध्वजत्रुगत रोग कभी योग्य गुरु की देख - रेख में करना चाहिए । मर्शश्च प्रतिमर्शश्च द्विधा स्नेहोऽत्र मात्रया । कल्काद्यैरवपीडस्तु स ध्मानं विरेचनश्चूर्णो— नस्य के भेद —स्नेहन ( बृंहण ) नस्य मात्राभेद से दो प्रकार का होता है— १. जलपान करना भी कहते नहीं होते । इसका अभ्यास तीक्ष्णैर्मूर्द्धरेचनः ॥७ ॥

मर्श नस्य तथा २. प्रतिमर्श नस्य । शिरोविरेचन - नस्य भी दो प्रकार का होता है— १. अवपीड या अवपीडन नस्य और २. ध्मान या प्रधमन नस्य । अवपीड़ - नस्य उसे कहते हैं जो कल्क को निचोड़ कर उससे निकले हुए रस से दिया जाता है अथवा क्वाथ आदि के रस से दिया जाता है । ध्मान - नस्य उसे कहते हैं जिसमें शिरोविरेचक चूर्णों को नासिका - छिद्र के भीतर फूँककर प्रवेश कराया जाता है ॥७ ॥

- युञ्ज्यात्तं मुखवायुना । षडङ्गुलद्विमुखया नाड्या भेषजगर्भया ॥ ८ ॥

स हि भूरितरं दोषं चूर्णत्वादपकर्षति । ध्मान ( प्रधमन ) नस्य की प्रयोग - विधि— कट्फल आदि के कपड़छन चूर्ण को ६ अंगुल लम्बी एक ऐसी नाली जिसके दोनों ओर छिद्र हों, उसमें मात्रानुसार औषधचूर्ण भरकर उस नाली को नासिकाछिद्र में डालकर दूसरी ओर से फूँककर भीतर प्रवेश करा दें । इस प्रकार वह चूर्ण नासिकाछिद्र के भीतर पहुँचकर सिर के अनेक वात - कफ आदि दोषों को बाहर की ओर निकाल देता है ॥ ८ ॥

वक्तव्य- - यह प्रधमन - नस्य की शास्त्रीय विधि है । इसी का एक भेद है— सुँघनी । इसका सामान्य प्रयोग इस प्रकार भी देखा जाता है— चुटकीभर चूर्ण को नाक के भीतर प्रवेश कराकर ऊपर की ओर को श्वास द्वारा खींच लिया जाता है । इससे कफ आदि विकार छींक के द्वारा बाहर निकल जाते हैं ।

पृष्ठ 282

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२४६ अष्टाङ्गहृदये प्रदेशिन्यङ्गुलीपर्वद्वयान्मग्नसमुद्धृतात् 11811 यावत्पतत्यसौ बिन्दुर्दशाष्टौ षट् क्रमेण ते । मर्शस्योत्कृष्टमध्योना मात्रास्ता एव च क्रमात् ॥ १० ॥

बिन्दुद्वयोनाः कल्कादेः— नस्य की मात्रा — नस्य के योग्य किसी द्रव में प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के दो पर्वों ( गाँठों ) को डुबाकर निकालने पर जो बूँदें गिरती हैं, उसे बिन्दु कहते हैं । उसके परिमाण से मर्श नामक नस्य की तीन मात्राएँ उत्तम, मध्यम, हीन भेद से इस प्रकार निर्धारित की गयी हैं— १. उत्तम मात्रा १० बूँदें अर्थात् दोनों नासिकाछिद्रों में ५-५ बूँदें, २. मध्यम मात्रा ८ बूँदें अर्थात् दोनों में ४-४ बूँदें और ३. हीन मात्रा ६ बूँदें अर्थात् दोनों में ३-३ बूँदें । ऊपर कहे गये विरेचन तथा शमन नामक नस्यों की मात्रा, जिनमें कल्क, क्वाथ, जल आदि द्रव द्रव्यों का प्रयोग निर्दिष्ट है, उनकी मात्रा उक्त मात्राक्रम में से प्रत्येक में दो संख्या कम कर देने से इस प्रकार हो जायेगी । यथा — ८ बूँदों की उत्तम मात्रा, ६ बूँदों की मध्यम मात्रा और ४ बूँदों की हीन मात्रा होती है ॥ ९ -१० ॥ वक्तव्य — प्रतिमर्शनस्य की मात्रा आदि का विस्तृत विवेचन सु. चि. ४० । ५२-५३ में तथा च. सि. ९।९ ३ में देखें । सामान्य रूप से प्रतिमर्श - नस्य की मात्रा एक - एक बूँद है । स्नान करने के पहले जो नासिकाछिद्र

में तेल डाला या सूँघा जाता है, यही उक्त नस्य का वास्तविक स्वरूप है ।

— योजयेन्न तु नावनम् । तोयमद्यगरस्नेहपीतानां पातुमिच्छताम् ॥ ११ ॥

भुक्तभक्तशिरःस्नातस्नातुकामस्रुतासृजाम् । नवपीनसवेगार्तसूतिकाश्वासकासिनाम् ॥ १२ ॥

शुद्धानां दत्तबस्तीनां तथाऽनार्तवदुर्दिने । अन्यत्रात्ययिकाद्व्याधेः— नस्य के अयोग्य व्यक्ति — इन्हें नस्यकर्म का प्रयोग न करायें- जिन्होंने तत्काल जलपान, मद्यपान तथा गर ( दूषीविष ) का पान किया हो अथवा जो इन्हें पीना चाहते हों, जिन्होंने भात आदि का भोजन किया हो, शिरःस्नान किया हो अथवा जो नहाने के लिए तैयार हों, जिन्होंने रक्तमोक्षण कराया हो, जिन्हें अभी - अभी प्रतिश्याय हुआ हो, जो मल - मूत्र के वेग से पीड़ित हों, जो सूतिका हो, श्वास तथा कास रोग से पीड़ित हों, जिन्हें वमन तथा विरेचन का प्रयोग कराकर शुद्ध किया गया हो, जिन्हें बस्तिप्रयोग कराया गया हो तथा वर्षा ऋतु के अतिरिक्त ऋतुओं में जब बादल छाये हों; इन स्थितियों में नस्य का प्रयोग न करायें । यदि आवश्यक हो तो नस्य - प्रयोग किया जा सकता है ॥ ११-१२ ॥ — अथ नस्यं प्रयोजयेत् ॥ १३ ॥

प्रातः श्लेष्मणि, मध्याह्ने पित्ते, सायंनिशोश्चले । स्वस्थवृत्ते तु पूर्वाह्णे शरत्कालवसन्तयोः ॥ १४ ॥

शीते मध्यन्दिने, ग्रीष्मे सायं वर्षासु सातपे । वाताभिभूते शिरसि हिध्मायामपतानके ॥ १५ ॥

मन्यास्तम्भे स्वरभ्रंशे सायंप्रातर्दिने दिने । एकाहान्तरमन्यत्र-नस्य के योग्य काल- - कफज रोगों में प्रातःकाल, पित्तज रोगों में दोपहर के समय तथा वातज रोगों में सायंकाल नस्य का सेवन कराना चाहिए । यदि स्वस्थ ( नीरोग ) पुरुष को नस्य - प्रयोग कराना हो तो शरद् तथा वसन्त ऋतुओं में प्रातःकाल, शीतकाल ( हेमन्त तथा शिशिर ऋतु ) में दोपहर के समय, ग्रीष्म ऋतु में सायंकाल और वर्षा ऋतु में जब या जिस दिन धूप निकली हुई हो नस्य - सेवन कराना चाहिए । रोगानुसार नस्य - प्रयोग — शिरः प्रदेश में वातदोष का प्रकोप होने पर, हिक्का ( हिचकी ) में, अपतानक ( देखें — माधवनिदान - वातव्याधि ), मन्यास्तम्भ एवं स्वरभ्रंश ( स्वरभेद ) आदि में प्रतिदिन प्रातः तथा सायं काल नस्य - प्रयोग कराना चाहिए । इनके अतिरिक्त दूसरे रोगों में एक दिन का अन्तर देकर नस्य दें ॥ १३-१५ ॥ —सप्ताहं च तदाचरेत् ॥ १६ ॥

नस्य - सेवन की सीमा — और उस ( नस्य ) का सेवन एक सप्ताह तक करना चाहिए ॥ १६ ॥

पृष्ठ 283

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नस्यविधिरध्यायः २० ] सूत्रस्थानम् २४७ वक्तव्य — वृद्धवाग्भट का कथन है कि तब तक नस्य का प्रयोग करता या कराता रहे, जब तक उसके सम्यग्योग के लक्षण दिखलायी न दें, उसमें भले ही ५, ७ अथवा ९ दिन क्यों न लग जायें । यह निर्देश तर्कसंगत तथा व्यवहारोचित है । देखें – अ. सं. सू. २ ९ ।१७ । इसी के आगे उसमें नस्य के सम्यग्योग आदि का भी वर्णन किया है । अष्टांगहृदय में उक्त विषय आगे श्लोक २४-२५ में दिया है । स्निग्धस्विन्नोत्तमाङ्गस्य प्राक्कृतावश्यकस्य च । निवातशयनस्थस्य जत्रूर्ध्वं स्वेदयेत् पुनः ॥ १७ ॥

अथोत्तानर्जुदेहस्य पाणिपादे प्रसारिते । किञ्चिदुन्नतपादस्य किञ्चिन्मूर्द्धनि नामिते ॥ १८ ॥

नासापुटं पिधायैकं पर्यायेण निषेचयेत् । उष्णाम्बुतप्तं भैषज्यं प्रणाड्या पिचुनाऽथवा ॥ १ ९ ॥ दत्ते पादतलस्कन्धहस्तकर्णादि मर्दयेत् । शनैरुच्छिद्य निष्ठीवेत्पार्श्वयोरुभयोस्ततः ॥ २० ॥

आभेषजक्षयादेवं द्विस्त्रिर्वा नस्यमाचरेत् । नस्य का पूर्वकर्म —नस्य का प्रयोग कराने के पहले शिरः प्रदेश का स्नेहन तथा स्वेदन कराना चाहिए, उसके बाद अन्य आवश्यक कार्य ( मल - मूत्र आदि का त्याग ) कर लेने चाहिए । फिर उस व्यक्ति को ऐसी शय्या पर लेटायें जहाँ सीधे हवा का प्रवेश न होता हो । जब वह भलीभाँति लेट जाय तो फिर उसके शिरः प्रदेश का स्वेदन कराकर उसे निम्नलिखित विधि से नस्य - प्रयोग कराना चाहिए । नस्य - प्रयोगविधि — नस्य देने के लिए उस व्यक्ति को चित ( सीधा ) लिटाकर उसके हाथ - पाँव फैला दें और कुछ पैरों को उठा दें तथा उसके सिर को झुका दें । पहले नासिका के एक छिद्र को ढककर दूसरे छिद्र में, फिर उस छिद्र को ढककर पहले वाले छिद्र में डालें । नासिका में डालने योग्य औषधद्रव को किसी पात्र में रखकर उसे गरम पानी वाले पात्र में रखकर गुनगुना कर लें, तदनन्तर नाली से या पिचु ( रुई के फाहा ) से नाक में डालें । औषधद्रव को डाल देने के बाद पाँव के तलुओं को, कन्धों को, हथेलियों तथा कर्णपालियों को मसलते रहें । इसी बीच वह व्यक्ति उस औषधद्रव को ऊपर की ओर खींचे और दोनों नासापुटों के मल को दोनों ओर तब तक निकाले जब तक पूरा औषधद्रव निकल न जाय । इसी विधि से दो या तीन बार उक्त औषधद्रव को नासापुटों में डालें । यह मर्शनस्य की प्रयोगविधि है ॥ १७-२० ॥ मूर्च्छायां शीततोयेन सिञ्चेत्परिहरन् शिरः ॥ २१ ॥

मूर्च्छा - शान्ति की विधि - नस्य का प्रयोग कराते समय उस व्यक्ति को मूर्च्छा ( बेहोशी ) आ जाय तो उसके सिर को बचाकर शेष अंगों में शीतल जल का छिड़काव कराना चाहिए । इस उपचार से वह होश में आ जाता है ॥ २१ ॥

स्नेहं विरेचनस्यान्ते दद्याद्दोषाद्यपेक्षया । स्नेहनस्य - प्रयोग — शिरोविरेचन - नस्यप्रयोग के अन्त में वात आदि दोष तथा देश एवं काल का विचार करके किसी स्नेह नस्य का प्रयोग कराना चाहिए ( दोष एवं देश - काल का विवेचन पीछे १३ से १५ पद्यों में देखें ) । नस्यान्ते वाक्शतं तिष्ठेदुत्तानः-नस्य- य - प्रयोग की प्रतीक्षा — नस्य का प्रयोग कर लेने के बाद वह व्यक्ति वाक्शतपरिमित ( ३-४

मिनट ) समय तक चित लेटकर उसकी प्रतीक्षा करे ।

—धारयेत्ततः ॥ २२ ॥

धूमं पीत्वा कवोष्णाम्बुकवलान् कण्ठशुद्धये । धूमपान - प्रयोग — उसके बाद विधिवत् धूमपान करके गला को शुद्ध करने के लिए गुनगुने जल से कुल्ला करें ॥ २२ ॥

पृष्ठ 284

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२४८ अष्टाङ्गहृदये वक्तव्य — भगवान् धन्वन्तरि ने विशेष करके नस्य शब्द का प्रयोग कहाँ किया है, इसके लिए देखें — सु. चि. ४०।२२ । वृद्धवाग्भट ने नस्य- प्रयोगकाल में क्रोध, हँसना, बोलना, शरीर के अवयवों को हिलाना आदि

न करे, ऐसा निर्देश दिया है । देखें - अ. सं. सू. २ ९ ।१६ ।

सम्यक्स्निग्धे सुखोच्छ्वासस्वप्नबोधाक्षपाटवम् ॥ २३ ॥

स्नेहन- नस्य का समयोग — स्नेहन- नस्य का सम्यग्योग होने पर ये लक्षण होते हैं— श्वास - प्रश्वास की गति का सुखपूर्वक होना, निद्रा का भलीभाँति आना, सुख से जागना और श्रोत्र आदि सभी ज्ञानेन्द्रियों में अपने - अपने विषयों को ग्रहण करने की शक्ति का होना ॥ २३ ॥

रूक्षेऽक्षिस्तब्धता शोषो नासास्ये मूर्द्धशून्यता । रूक्ष- नस्य का हीनयोग — रूक्ष- नस्य के हीनयोग होने पर ये लक्षण होते हैं— आँखों में जकड़न, नासिका के छिद्रों तथा मुखप्रदेश में सूखापन तथा शिरः प्रदेश में सूनेपन का अनुभव होना । स्निग्धेऽति कण्डूगुरुताप्रसेकारुचिपीनसाः ॥ २४ ॥

स्नेहन- नस्य का अतियोग — स्नेहन- नस्य के अतियोग होने पर ये लक्षण होते हैं— नासिका में खुजली का होना, भारीपन, नासिका से तथा नेत्रों से लगातार स्राव का निकलना, भोजन के प्रति अरुचि तथा पीनस ( प्रतिश्याय ) का होना ॥ २४ ॥

सुविरिक्तेऽक्षिलघुतावक्त्रस्वरविशुद्धयः विरेचन - नस्य का सम्यग्योग — विरेचन - नस्य के सम्यग्योग होने पर ये लक्षण होते हैं—— आँखों में

हलकापन, मुख की शुद्धि तथा स्वर में स्पष्टता की प्रतीति होना ।

दुर्विरिक्ते गदोद्रेकः, क्षामताऽतिविरेचिते ॥ २५ ॥

मिथ्यायोग, हीनयोग के लक्षण — विरेचन- - नस्य के मिथ्यायोग होने पर रोगों की वृद्धि तथा विरेचन के हीनयोग होने पर शरीर में कृशता तथा दुर्बलता ये लक्षण होते हैं.॥ २५ ॥

वक्तव्य — वृद्धवाग्भट ने कहा है कि स्नेहविधि का सभी कार्य पूरा हो जाने पर उस व्यक्ति को स्नेहोक्त आचार के पालन का आदेश दें । देखें —अ. सं. सू. २ ९ ।१७ । इसका विस्तार से वर्णन अ. सं. सू. २५।४१ से ४४ तक के श्लोकों में दिया गया है । प्रतिमर्शः क्षतक्षामबालवृद्धसुखात्मसु । प्रयोज्योऽकालवर्षेऽपि— प्रतिमर्शनस्य - प्रयोग — उरःक्षत, कृशता, बालक, वृद्ध तथा सुकुमार व्यक्तियों में अकाल में अर्थात्

निर्दिष्ट समय के आगे - पीछे भी और वर्षाकाल में भी कराया जा सकता है ।

- न त्विष्टो दुष्टपीनसे ॥ २६ ॥

मद्यपीतेऽबलश्रोत्रे कुमिषितमूर्द्धनि । उत्कृष्टोत्क्लिष्टदोषे च, हीनमात्रतया हि सः ॥ २७ ॥

प्रतिमर्श - नस्य का निषेध - दुष्ट पीनस ( प्रतिश्याय ) में, मद्यपान करने के बाद या मदात्ययरोग में, कर्णविकारों में, शिरः प्रदेश में क्रिमियों के उत्पन्न हो जाने पर, बढ़े हुए दोषों में तथा उभड़े हुए दोषों में इस प्रतिमर्श - नस्य का प्रयोग न करे । क्योंकि इसकी मात्रा कम होती है, अतः वह रोगों को दूर नहीं कर सकती ॥ २६-२७ ॥ निशाहर्भुक्तवान्ताहःस्वप्नाध्वश्रमरेतसाम् । शिरोऽभ्यञ्जनगण्डूषप्रम्रावाञ्जनवर्चसाम् ॥ २८ ॥

दन्तकाष्ठस्य हासस्य योज्योऽन्तेऽसौ द्विबिन्दुकः । प्रतिमर्श - नस्य के पन्द्रह काल - १. रात्रि के अन्त में ( प्रातः उठते ही ), २. दिन के अन्त में, ३. भोजन करने के अन्त में, ४, वमन करने के अन्त में, ५. दिन में सोकर उठने के बाद, ६. मार्ग चलने के अन्त में, ७. परिश्रम करने के अन्त में, ८. स्त्री- सहवास के अन्त में, ९. सिर में अभ्यंग कराने के अन्त

पृष्ठ 285

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नस्यविधिरध्यायः २० ] सूत्रस्थानम् २४ ९ में, १०. कवलधारण के अन्त में, ११. प्रस्राव ( पेशाब करने ) के अन्त में, १२. अंजन लगाने के बाद, १३. मलत्याग करने के बाद, १४. दातौन करने के बाद तथा १५. हँसी - मजाक करने के बाद २ बूँद की मात्रा में प्रतिमर्श की एक नस्य लें ॥ २८ ॥

पञ्चसु स्रोतसां शुद्धिः, क्लमनाशस्त्रिषु क्रमात् ॥। २ ९ ॥ दृग्बलं पञ्चसु, ततो दन्तदाढर्यं मरुच्छमः । प्रतिमर्श - - न नस्य के लाभ - ऊपर कहे गये प्रथम पाँच कालों में नस्य लेने से स्रोतों की शुद्धि होती है । क्रमशः अगले तीन कालों में नस्य का प्रयोग करने से क्लम ( थकावट ) का नाश, उसके आगे पुनः पाँच कालों में नस्य का सेवन करने से दृष्टि की शक्ति बढ़ती है, इसके आगे शेष दो ( १४ तथा १५ ) कालों में नस्य लेने से क्रमशः दाँतों में स्थिरता एवं वातदोष की शान्ति होती है । वृद्धवाग्भट ने इसकी मात्रा १ या २ बूँद स्वीकार की है ॥२ ९ ॥ न नस्यमूनसप्ताब्दे नातीताशीतिवत्सरे ॥ ३० ॥

न चोनाष्टादशे धूमः, कवलो नोनपञ्चमे । न शुद्धिरूनदशमे न चातिक्रान्तसप्ततौ ॥ ३१ ॥

अवस्था का विचार — प्रायः सात वर्ष की अवस्था के पहले तथा अस्सी वर्ष की अवस्था के बाद मर्श नस्य का प्रयोग नहीं करना चाहिए । १८ वर्ष की अवस्था के पहले धूमपान का प्रयोग, ५ वर्ष की अवस्था के पहले कवल का प्रयोग न करे । १० वर्ष की अवस्था के पहले तथा ७० वर्ष की अवस्था के बाद शोधन ( वमन, विरेचन तथा सिरावेध ) का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ ३०-३१ ॥ वक्तव्य — उक्त अवस्था की सीमा स्वस्थ पुरुष को चिर - स्वस्थ रखने के दृष्टिकोण से कही गयी है । रुग्णावस्था में इन नियमों का पालन हो पाना सम्भव नहीं होता, अपितु आवश्यकता पड़ने पर उक्त सभी कर्म करने ही पड़ते हैं । आजन्ममरणं शस्तः प्रतिमर्शस्तु बस्तिवत् । मर्शवच्च गुणान् कुर्यात्स हि नित्योपसेवनात् ॥ ३२ ॥

न चात्र यन्त्रणा नापि व्यापद्भयो मर्शवद्भयम् । प्रतिमर्श- - नस्य का प्रयोग जन्म से लेकर मरण के पूर्व तक किया जाना श्रेयस्कर होता है । इसी प्रकार मात्राबस्ति का प्रयोग भी जीवनभर किया जाता है । प्रतिमर्श - नस्य का यदि प्रतिदिन सेवन किया जाता है, तो वह मर्श नस्य के समान ही गुणदायक होती है । इसमें किसी प्रकार की यन्त्रणा ( आहार - विहार आदि का बन्धन ) नहीं है और इससे मर्श नस्य के समान रोगों की उत्पत्ति होने का भय भी नहीं है ॥ ३२ ॥

तैलमेव च नस्यार्थे नित्याभ्यासेन शस्यते ॥ ३३ ॥

शिरसः श्लेष्मधामत्वात्स्नेहाः स्वस्थस्य नेतरे । नस्य में तेल का प्रयोग — स्वस्थ पुरुष को प्रतिदिन नस्य ( प्रतिमर्श ) करने के लिए तेल ( सरसों का तेल ) की ही प्रशंसा की गयी है, क्योंकि सिर कफ का घर है । अतः दूसरे स्नेह कफकारक होते हैं, अतएव उनका प्रयोग उचित नहीं माना गया ॥ ३३ ॥

आशुकच्चिरकारित्वं गुणोत्कर्षापकृष्टता ॥ ३४ ॥

मर्शे च प्रतिमर्शे च विशेषो न भवेद्यदि । को मर्शं सपरीहारं सापदं च भजेत्ततः ॥ ३५ ॥

अच्छपानविचाराख्यौ कुटीवातातपस्थिती । अन्वासमात्राबस्ती च तद्वदेव विनिर्दिशेत् ॥ ३६ ॥

मर्श - प्रतिमर्श में फलभेद —मर्श नस्य शीघ्र अपना फल देती है, अधिक काल तक गुणकारक होती है और प्रतिमर्श नस्य विलम्ब से फल देती है तथा उससे कम गुणकारक होती है । यदि मर्श तथा प्रतिमर्श नस्य में इस प्रकार का परस्पर फलभेद न होता, तो कौन आहार - विहार के परिहार ( नियन्त्रण ) वाले मर्श नस्य का सेवन करता । क्योंकि मर्श नस्य के प्रयोग में हीनयोग तथा अतियोग होने का भय बना

पृष्ठ 286

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२५० रहता है । इसी प्रकार वातातपिक के प्रयोगों का कारण तथा उनके किया है वे सब सहेतुक अष्टाङ्गहृदये स्नेहपान के अच्छपान तथा विचारणा में, रसायन - विधान के कुटीप्रावेशिक तथा में और बस्ति - विधान के अनुवासनबस्ति एवं मात्राबस्ति के प्रयोगों में परस्पर भेद लाभों पर ध्यान देना चाहिए । शास्त्रकारों ने जो प्रत्येक विधि के भेदों का वर्णन हैं, लाभदायक हैं, भले ही उनमें पथ्य - परहेज अनिवार्य होता है ॥ ३४-३६ ॥ जीवन्तीजलदेवदारुजलदत्वक्सेव्यगोपीहिमं दार्वीत्वङ्मधुकप्लवागुरुवरीपुण्ड्राह्वबिल्वोत्पलम् धावन्यौ सुरभिं स्थिरे कृमिहरं पत्रं त्रुटिं रेणुकां किञ्जल्कं कमलाद्बलां शतगुणे दिव्येऽम्भसि क्वाथयेत् ॥ ३७ ॥

तैलाद्रसं दशगुणं परिशेष्य तेन तैलं पचेत सलिलेन दशैव वारान् ।

पाके क्षिपेच्च दशमे सममाजदुग्धं नस्यं महागुणमुशन्त्यणुतैलमेतत् ॥ ३८ ॥

अणुतैल- निर्माणविधि— जीवन्ती, नेत्रबाला, देवदारु, केवटीमोथा, दालचीनी, खस, सारिवा, चन्दन, दारुहल्दी, मुलेठी, नागरमोथा, अगरु, त्रिफला, पुण्डेरिया, बेलगिरी, कमल, कण्टकारी, वनभण्टा, रासना, शालपर्णी, पृष्ठपर्णी, वायविडंग, तेजपत्ता, छोटी इलायची, रेणुका, कमल का केसर तथा बला — उक्त सभी द्रव्यों को समान भाग लेकर जौकुट कर लें । द्रव्यों के परिमाण से सौ गुना वर्षा के जल में क्वाथ करें । जब पकते - पकते दसवाँ हिस्सा जल शेष रह जाय तो इसे छान लें । तदनन्तर क्वाथ से दशमांश तेल लें और बराबर का क्वाथजल उस तैल में डालकर पाक करें । इसी प्रकार और आठ बार समान भाग क्वाथ जल डाल - डालकर कुल मिलाकर नौ बार उस तैल का पाक करें । दसवीं बार पाक करते समय क्वाथ के साथ समान भाग बकरी का दूध भी उसमें डाल कर पाक करें । यह ' अणुतैल ' है । इसका नस्य अत्यन्त गुणकारी होता है ॥ ३७-३८ ॥ वक्तव्य — अष्टांगसंग्रह - सूत्रस्थान २ ९ / ९ तथा १० में दो अणुतैलों का वर्णन है । उक्त योग दूसरे योग से मिलता - जुलता है । यही पाठ चरक के अनुकूल भी है । देखें- च. सू. ५६३-७० । चरकोक्त योग तथा दोनों वाग्भटों के योग नस्य के प्रयोग में आते हैं । ऊपर दिये गये ' बला ' शब्द से ' बरियारा ' का ग्रहण करना चाहिए । घनोन्नतप्रसन्नत्वक्स्कन्धग्रीवास्यवक्षसः । दृढेन्द्रियास्तपलिता भवेयुर्नस्यशीलिनः ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने नस्यविधिर्नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥

स्नेहन - नस्य से लाभ – जो प्रतिदिन स्नेहन - नस्य का प्रयोग करते हैं, उनकी त्वचा, कन्धे, गरदन, मुखमण्डल तथा वक्षस् ( छाती ) घन ( ठोस ), उन्नत ( ऊँचे ), प्रसन्न ( प्रसादगुणयुक्त ) हो जाते हैं । इन्द्रियाँ अपने - अपने विषयों को ग्रहण करने में समर्थ हो जाती हैं और उनके बाल बाल समव समय स से पहल पहले सक सफेद नहीं होते हैं ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय - सूत्रस्थान में नस्यविधि नामक बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २० ॥

पृष्ठ 287

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एकविंशोऽध्यायः

अथातो धूमपानविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥

अब हम यहाँ से धूमपानविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे । जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था । उपक्रम — ऊर्ध्वजत्रुविकारों के प्रशमन ( चिकित्सा ) के लिए २० वें अध्याय में नस्य के भेद - उपभेदों का वर्णन, उनकी सेवन विधि तथा उससे होने वाले लाभ - हानियों का वर्णन किया गया है । उसके बाद वर्णन किया जाने वाला यह धूमपान भी उक्त विकारों में हितकर होता है, इसका वर्णन इस अध्याय में किया जायेगा । यह धूमपान बीड़ी, सिगरेट, सिगार तथा चरस आदि विकारकारक धूमपानों से सर्वथा भिन्न एवं उपयोगी है । इसके पर्याय हैं — धूम्र, धूमल । संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेत — च. सू. ५; सु.चि. ४० तथा अ.सं. सू. ३० । सभी संहिताकारों ने अपनी - अपनी संहिताओं में कुछ - कुछ विशेषताओं का वर्णन किया है, अतः उक्त स्थलों का आप अवश्य अवलोकन करें । जत्रूर्ध्वकफवातोत्थविकाराणामजन्मने । उच्छेदाय च जातानां पिबेद्धूमं सदाऽऽत्मवान् ॥ १ ॥

धूमपान - विधि का वर्णन — आत्मवान् ( मानसिक बल से परिपूर्ण ) मानव को जत्रुअस्थि के ऊपरी भाग में होने वाले कफज तथा वातज रोगों की उत्पत्ति ही न हो इसलिए और यदि उक्त प्रकार के रोग हो गये हों तो उन्हें उखाड़ कर फेंकने के लिए सदा धूमपान करना चाहिए ॥ १ ॥

वक्तव्य — महर्षि वाग्भट ने नस्य, गण्डूष के साथ - साथ धूमपान आदि का वर्णन अ. हृ. सू. २/६ में किया है, यहाँ उसी धूम का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत है । धूमपान स्वयं में एक दुर्व्यसन है, किन्तु दुर्व्यसनों का प्रभाव आत्मवान् पुरुषों पर नहीं पड़ता, अस्तु । अष्टांगसंग्रह सू. ३०।३ में इस बात का स्पष्ट निर्देश दिया है कि इसका सेवन कब, किन्हें करना चाहिए और कब, किन्हें नहीं करना चाहिए । स्निग्धो मध्यः स तीक्ष्णश्च, वाते वातकफे कफे । योज्यः- --धूम के भेद तथा प्रयोग— धूमपान विधिभेद से तीन प्रकार का होता है— १. स्निग्ध, २. मध्य तथा ३. तीक्ष्ण । दोषभेद से इनका प्रयोग — स्निग्ध धूम वातविकारों में, मध्य धूम वातकफज विकारों में तथा केवल कफज विकारों में तीक्ष्ण धूम का प्रयोग विहित है । वक्तव्य — वृद्धवाग्भट ने अ. सं. सू. ३०१४ में धूमभेदों का वर्णन इस प्रकार किया है —१. शमन, २. बृंहण, ३. शोधन । पुनः इनके पर्याय – १. शमन, प्रायोगिक, मध्यम । २. बृंहण, स्नेहन, मृदु । ३. शोधन, विरेचन, तीक्ष्ण । तीन अन्य भेदों की चर्चा - १. कासघ्न, २. वामक, ३. व्रणधूमन । इसी विषय को सुश्रुत ने चि. ४०।१४ में इस प्रकार कहा है— धूमपान पाँच प्रकार का होता है— १. प्रायोगिक, २. स्नैहिक,

३. वैरेचनिक, ४. कासघ्न तथा ५. वामनीय ।

—न रक्तपित्तार्तिविरिक्तोदरमेहिषु ॥ २ ॥

तिमिरोर्ध्वानिलाध्मानरोहिणीदत्तबस्तिषु 1 मत्स्यमद्यदधिक्षीरक्षौद्रस्नेहविषाशिषु ॥ ३ ॥

शिरस्यभिहते पाण्डुरोगे जागरिते निशि ।

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२५२ अष्टाङ्गहृदये धूमपान का निषेध — रक्तपित्तज रोगों में, विरेचन कराने के बाद होने वाले उदररोगों में, प्रमेहरोग में, तिमिर नामक नेत्ररोग में, ऊर्ध्वग वात ( उदावर्त ) में, आध्मान होने पर, रोहिणी नामक कण्ठरोग में, बस्ति - प्रयोग कराने पर, मछली खाने पर, दही, दूध, मधु तथा स्नेहपान करने पर, विष खाने या पीने पर, सिर पर चोट आ जाने पर, पाण्डुरोग में तथा रात्रि में जागने पर धूमपान का प्रयोग न करें । इन स्थितियों पर न केवल शास्त्रीय धूमपान का ही नहीं अपितु बीड़ी, तमाखू आदि का भी सेवन न करें॥२-३ ॥ रक्तपित्तान्ध्यबाधिर्यतृण्मूर्च्छामदमोहकृत् ॥४ ॥

धूमोऽकालेऽतिपीतो वा— धूमपान से हानि — अकाल ( असमय ) में अथवा अधिक धूमपान कर लेने पर रक्तपित्तजनित विकार, अन्धापन, बहरापन, बार - बार प्यास का लगना, मूर्च्छा, मद तथा मोह ( बेहोशी ) हैं ॥४ ॥

-तत्र शीतो विधिर्हितः । धूमपानजनित रोगों की चिकित्सा - इस प्रकार के विकारों की शान्ति के शीत चिकित्सा करनी चाहिए । वक्तव्य — महर्षि सुश्रुत ने इस प्रकार की धूमविकृतियों को धूमोपहत संज्ञा

१२।२ ९ -३७ । वृद्धवाग्भट का दृष्टिकोण इस सम्बन्ध में देखें — अ.सं.सू. ३०।७ ।

क्षुतजृम्भितविण्मूत्रस्त्रीसेवाशस्त्रकर्मणाम् ॥५ ॥

– ये विकार हो जाते लिए सभी प्रकार की दी है । देखें — सु.सू. हासस्य दन्तकाष्ठस्य धूममन्ते पिबेन्मृदुम् । कालेष्वेषु निशाहारनावनान्ते च मध्यमम् ॥ ६ ॥

निद्रानस्याञ्जनस्नानच्छर्दितान्ते विरेचनम् । त्रिविध धूम के सेवन का काल— १. छींक होने, जँभाई लेने, मल - मूत्र त्याग करने, स्त्रीसहवास, शस्त्रकर्म, हँसने तथा दातून करने के अन्त में मृदु धूमपान करे । २. उक्त समयों में, रात में भोजन करने के बाद तथा नस्य - प्रयोग करने के अन्त में मध्य धूमपान करे । ३. निद्रा, स्नेहन- नस्य, अञ्जन, स्नान तथा वमन करने के अन्त में विरेचक धूमपान करें । कारण यह है कि इन समयों में धूमपान करने से कफ अपने स्थान को छोड़ देता है, अतः उसका निर्हरण हो सकता है ॥ ५-६ ॥ बस्तिनेत्रसमद्रव्यं त्रिकोशं कारयेदृजु ॥७ ॥

मूलाग्रेऽङ्गुष्ठकोलास्थिप्रवेशं धूमनेत्रकम् । धूमनेत्रक — इसका निर्माण भी बस्तिनेत्र की भाँति स्वर्ण आदि धातुओं से कराना चाहिए । ( इसका वर्णन १ ९वें अध्याय श्लोक ९ में देखें । ) इस नेत्रक में तीन कोश ( मोड़ ) हों, यह नेत्र सीधा हो, इसके मूलभाग ( जहाँ धूमोपयोगी द्रव्य रखे जाते हैं ) में अँगूठा के बराबर छिद्र हो और जहाँ से धूमपान किया जाता है, वहाँ जंगली बेर की गुठली के प्रवेश योग्य छेद हो ॥७ ॥

तीक्ष्णस्नेहनमध्येषु त्रीणि चत्वारि पञ्च च ॥ ८ ॥

अङ्गुलानां क्रमात्पातुः प्रमाणेनाष्टकानि तत् । धूमनेत्र की लम्बाई — तीक्ष्ण धूमपान करने के लिए तीन अष्टक अर्थात् २४ अंगुल, स्नेह धूमपान करने के लिए चार अष्टक अर्थात् ३२ अंगुल और मध्यम धूमपान करने के लिए पाँच अष्टक अर्थात् ४० अंगुल लम्बाई धूमपान करने वाले व्यक्ति की अंगुलियों के प्रमाण से होनी चाहिए ॥८ ॥

वक्तव्य- -यह धूमनेत्रक हुक्का की नली का नाम है । राजा, रईस, साहूकारों के घरों में, बड़ी - बड़ी महफिलों में इसके दर्शन होते हैं । च.चि. १७७ ९ में इसे ' मल्लकसम्पुट ' और च. चि. १८६६ में ' शरावसम्पुट ' कहा गया है ।

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धूमपानविधिरध्यायः २१ ] सूत्रस्थानम् २५३ ऋजूपविष्टस्तच्चेता विवृतास्यस्त्रिपर्ययम् ॥ ९ ॥

पिधाय च्छिद्रमेकैकं धूमं नासिकया पिबेत् । नासिका से धूमपान की विधि - सीधा बैठकर धूमपान की ओर मन लगाकर नासिका के एक छिद्र को अंगुली से दबाकर दूसरे छिद्र पर नेत्र को लगाकर मुख खोलकर तीन बार नासिका द्वारा धूमपान करे अर्थात् उसी विधि से फिर दूसरे छिद्र द्वारा धूमपान करे, फिर पहले वाले छिद्र से । इस प्रकार त्रिपर्यय हो जाता है ॥ ९ ॥

वक्तव्य — उक्त श्लोक में दिया गया ' विवृतास्यः ' पाठ विचारणीय है । इसका अर्थ है— जिस पुरुष का मुख खुला हो । आप प्रयोग करके देखें —– मुख के खुले रहने पर नासिकाछिद्र से धूमपान नहीं हो पायेगा । अतः उक्त प्रयोग की चरितार्थता इस रूप में की जा सकती है कि नासिका से किये गये धूम को मुख से निकालें । देखें — श्रीअरुणदत्त तथा श्रीहेमाद्रि ने इस पर टीका ही नहीं लिखी । इस दृष्टि से अ.सं.सू. ३०।१२ का पाठ अधिक स्पष्ट है । पर्यय — धूमपान करना और धूम को निकालना एक पर्यय है, इसी को आगे चलकर आक्षेप तथा

मोक्ष की संज्ञा दी गयी है ।

प्राक् पिबेन्नासयोत्क्लिष्टे दोषे घ्राणशिरोगते ॥ १० ॥

उत्क्लेशनार्थं वक्त्रेण, विपरीतं तु कण्ठगे । नासा एवं मुख से धूमपान - नासिका तथा शिरः प्रदेश में दोषों के उभड़े नासिका के छिद्रों द्वारा धूमपान करना चाहिए और यदि दोष उभड़ा हुआ न हो पहले मुख द्वारा धूमपान करके फिर नासिका से धूमपान करे । यदि कण्ठप्रदेश में हो तो पहले नासिका से और फिर मुख से धूमपान करे ॥ १० ॥

मुखेनैवोद्वमेद्धुमं— धूम का निर्हरण - धूमपान नासिका के छिद्र से और मुख से करने का

है, किन्तु इन दोनों धूमों को मुख से ही निकालना चाहिए ।

- नासया दृग्विघातकृत् ॥ ११ ॥

हुए होने पर सबसे पहले तो उसे उभाड़ने के लिए स्थित दोष को उभाड़ना ऊपर विधान किया गया नासिका से धूम न निकालें — नासिका के छिद्रों से धूम निकालने से नेत्रों को हानि हो सकती है ॥ ११ ॥

वक्तव्य — भगवान् धन्वन्तरि के शब्दों में इसका वर्णन सु. चि. ४०।७-८ में देखें । आक्षेपमोक्षैः पातव्यो धूमस्तु त्रिस्त्रिभिस्त्रिभिः । तीन बार धूमपान करें — आक्षेप ( धूमपान करना ) और मोक्ष ( धुआँ को बाहर निकालना ) यह एक पर्यय है । इसी प्रकार दो बार और अर्थात् एक बार के धूमपान काल में कुल मिलाकर तीन बार

धूमपान करना चाहिए ।

अह्नः पिबेत्सकृत् स्निग्धं, द्विर्मध्यं, शोधनं परम् ॥। १२ ॥

त्रिश्चतुर्वा -धूमपान की संख्या — दिनभर में स्निग्ध धूमपान एक बार, मध्यम धूमपान दो बार तथा शोधन ( तीक्ष्ण ) धूमपान तीन अथवा चार बार करना चाहिए ॥ १२ ॥

— मृदौ तत्र द्रव्याण्यगुरुगुग्गुलु । मुस्तस्थौणेयशैलेयनलदोशीरवालकम् ॥ १३ ॥

वराङ्गकौन्तीमधुकबिल्वमज्जैलवालुकम् । श्रीवेष्टकं सर्जरसो ध्यामकं मदनं प्लवम् ॥१४ ॥

शल्लकी कुङ्कुमं माषा यवाः कुन्दुरुकस्तिलाः । स्नेहः फलानां साराणां मेदो मज्जा वसा घृतम् ॥

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२५४ अष्टाङ्गहृदये मृदु धूम के द्रव्य — अगुरु, गुग्गुलु, मोथा, थुनेर, शैलेय ( छरीला ), जटामांसी, खस, नेत्रबाला, दालचीनी, रेणुका, मुलेठी, बेल की गिरी, एलवालुक, श्रीवेष्टक ( चीड़ की गोंद = विरौजा या लीसा ), सर्जरस ( राल ), ध्यामक ( कत्तृण ), मदन ( मोम ), नागरमोथा, शल्लकी ( सलाई = चीड़ की लकड़ी ), कुंकुम, उड़द, जौ, कुन्दुरुक गोंद, तिल, बादाम आदि फलों के तेल, चन्दन आदि सार वाले काष्ठों के स्नेह ( तेल ), मेदस्, मज्जा, वसा और घृत इन द्रव्यों से मृदु धूम का निर्माण किया जाता है । १३-१५ ॥ शमने शल्लकी लाक्षा पृथ्वीका कमलोत्पलम् । न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षरोधत्वचः सिता ॥ १६ । यष्टीमधु सुवर्णत्वक् पद्मकं रक्तयष्टिका । गन्धाश्चाकुष्ठतगराः-मध्य धूम के द्रव्य — इसी को शमन धूम भी कहते हैं । शल्लकी ( सलाई ), लाख, पृथ्वीका, कमल, नीलकमल, बरगद, गूलर, पीपल, पाकर, लोध ( इन वृक्षों ) की छालें, मिश्री, मुलेठी तथा अमलतास की छाल, पद्मकाष्ठ, मजीठ, कूठ तथा तगर अथवा कूठ एवं तगर को छोड़कर एलादि गण में कहे गये सभी सुगन्धिद्रव्यों का ग्रहण किया जाता है ॥ १६ ॥

- तीक्ष्णे ज्योतिष्मती निशा ॥ १७ । दशमूलमनोह्वालं लाक्षा श्वेता फलत्रयम् । गन्धद्रव्याणि तीक्ष्णानि गणो मूर्द्धविरेचनः ॥ १८ ॥

तीक्ष्ण धूम के द्रव्य - -मालकाँगुनी, हल्दी, दशमूल, मैनसिल, हरिताल, लाख, अपामार्ग ( चिरचिटा ), त्रिफला, तीक्ष्ण गन्धद्रव्य तथा शिरोविरेचन गण के द्रव्यों का प्रयोग ( देखें -अ.हृ.सू. १५।४ ) इस योग में किया जाता है ॥ १७-१८ ॥ जले स्थितामहोरात्रमिषीकां द्वादशाङ्गुलाम् । पिष्टैर्धूमौषधैरेवं पञ्चकृत्वः प्रलेपयेत् ॥१ ९ ॥ वर्तिरङ्गुष्ठकस्थूला यवमध्या यथा भवेत् । छायाशुष्कां विगर्भां तां स्नेहाभ्यक्तां यथायथम् । धूमनेत्रार्पितां पातुमग्निप्लुष्टां प्रयोजयेत् । धूमवर्ति - निर्माणविधि— सरपत की १२ अंगुल लम्बी नली को १ दिन - रात पानी में डाल दें । जब वह भीगने से फूल जाय तब उसके ऊपर उक्त धूमद्रव्यों को पीसकर ५ बार लेप करें । प्रत्येक बार का लेप सूख जाने पर तब दूसरा लेप करें । जब यह लेप अँगूठाभर मोटा हो जाय और उसका आकार जौ के सदृश ( आगे - पीछे पतला बीच में मोटा ) हो तब इसे छाया में सुखा लें । जब वह भलीभाँति सूख जाय तो उसके बीच में से सरपत की नली निकाल लें । उस धूमवर्ति को घी आदि से चुपड़ कर धूमनेत्र में लगाकर बीड़ी - सिगरेट की भाँति उसे जलाकर धूमपान करे ॥ १ ९ -२० ॥ वक्तव्य — बीड़ी, सिगरेट, चुरुट, सिगार आदि इसी धूमवर्ति के अद्यतन प्रतिनिधि द्रव्य हैं । अन्तर इतना ही है कि इनमें मादक द्रव्य होते हैं और धूमवर्ति में रोगनाशक औषध - द्रव्य हैं । शरावसम्पुटच्छिद्रे नाडीं न्यस्य दशाङ्गुलाम् ॥ २१ ॥

अष्टाङ्गुलां वा वक्त्रेण कासवान् धूममापिबेत् । कासघ्न धूमपान - विधि — शरावसम्पुट के छिद्र में १० अँगुल अथवा ८ अँगुल लम्बी नली लगाकर कासरोगी धूमपान करे । इस यन्त्र से मृदु, मध्य तथा तीक्ष्ण सभी प्रकार का धूमपान किया जा सकता है । वक्तव्य — शरावसम्पुट का वर्णन अ.सं.सू. ३०।१४ में देखें ।

कासः श्वासः पीनसो विस्वरत्वं पूतिर्गन्धः पाण्डुता केशदोषः ।

कर्णास्याक्षिस्रावकण्ड्वर्तिजाड्यं तन्द्रा हिध्मा धूमपं न स्पृशन्ति ॥ २२ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने धूमपानविधिर्नामैकविंशतितमोऽध्यायः ॥ २१ ॥