श्रीगणेशाय नमः।

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 271–280

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 271–280

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बस्तिविधिरध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् २३५ अन्वासयेत्तृतीयेऽह्नि पञ्चमे वा पुनश्च तम् ॥ ३३ ॥

यथा वा स्नेहपक्तिः स्यादतोऽत्युल्बणमारुतान् ।

व्यायामनित्यान् दीप्ताग्नीन् रूक्षांश्च प्रतिवासरम् ॥ ३४ ॥

पुनः अनुवासन - प्रयोग— तदनन्तर उस व्यक्ति को तीसरे अथवा पाँचवें दिन पुनः अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए । अथवा जैसे - जैसे स्नेह का पाचन होता जाय वैसे - वैसे अनुवासनबस्ति देते रहना चाहिए । यही कारण है कि जिनके शरीरों में वातदोष की अधिकता हो, जो प्रतिदिन व्यायाम करते हों, जिनकी जठराग्नि प्रदीप्त हों तथा जो रूक्ष हों, उन्हें प्रतिदिन अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराया जा सकता है ॥ ३३-३४ ॥ इति स्नेहैस्त्रिचतुरैः स्निग्धे स्रोतोविशुद्धये । निरूहं शोधनं युञ्ज्यादस्निग्धे स्नेहनं तनोः ॥ ३५ ॥

निरूहणबस्ति - प्रयोग — इस प्रकार तीन या चार बार दी गयी स्नेहबस्तियों द्वारा शरीर के स्निग्ध हो जाने पर स्रोतों को शुद्ध करने के लिए शोधनकारक निरूहणबस्ति का उपयोग करना चाहिए । यदि उतने पर भी शरीर का भलीभाँति स्नेहन न हो पाया हो तो स्नेहपान आदि विधियों से शरीर को स्निग्ध कर लेना चाहिए ॥ ३५ ॥

पञ्चमेऽथ तृतीये वा दिवसे साधके शुभे । मध्याह्ने किञ्चिदावृत्ते प्रयुक्ते बलिमङ्गले ॥ ३६ ॥

अभ्यक्तस्वेदितोत्सृष्टमलं नातिबुभुक्षितम् । अवेक्ष्य पुरुषं दोषभेषजादीनि चादरात् ॥ ३७ ॥

बस्तिं प्रकल्पयेद्वैद्यस्तद्विद्यैर्बहुभिः सह । निरूहण - प्रयोगविधि — अनुवासनबस्ति का प्रयोग कर लेने के बाद तीसरे या पाँचवें दिन अथवा जो कार्य में सफलता दिलाने वाला ( ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ) दिन हो, मध्याह्नकाल जब कुछ दिन ढल जाय बलिदान तथा मंगलकार्य करके, उस व्यक्ति को अभ्यंग तथा स्वेदन कराकर जिसने मल - मूत्र का त्याग कर लिया हो, जो अधिक भूखा न हो तथा वात आदि दोषों एवं औषध - द्रव्यों का भलीभाँति विचार करके, बस्तिकर्मकुशल अन्य अनेक चिकित्सकों के साथ विचार - विमर्श करके बस्ति में प्रयुज्यमान द्रव का निर्माण ( कल्पना ) करें ॥ ३६-३७ ॥ क्वाथयेद्विंशतिपलं द्रव्यस्याष्टौ फलानि च ॥३८ ॥

ततः क्वाथाच्चतुर्थांशं स्नेहं वाते प्रकल्पयेत् । पित्ते स्वस्थे च षष्ठांशमष्टमांशं कफेऽधिके ॥ ३ ९ ॥ सर्वत्र चाष्टमं भागं कल्काद्भवति वा यथा । नात्यच्छसान्द्रता बस्तेः पलमात्रं गुडस्य च ॥ ४० ॥

मधुपट्वादिशेषं च युक्त्या -बस्तिद्रव - निर्माणविधि— ( निरूहणोपयोगी द्रव्यों को आगे कल्पस्थान अध्याय ४ के प्रारम्भ में देखें, क्योंकि यहाँ द्रव्यों का उल्लेख श्रीवाग्भट ने नहीं किया है, केवल बस्तिद्रवकल्पनाविधि का निर्देश किया है । ) २०_पल = ८० तोला परिमाण में यथोचित द्रव्यों को लेकर और उसमें ८ मैनफलों का चूर्ण करके ८ गुना जल में पकाकर अष्टमांश जल शेष रहने पर उतार कर छान लें । यदि वातदोष की अधिकता हो तो क्वाथ से चतुर्थांश उसमें स्नेह ( एरण्ड आदि का समुचित तेल ) मिलायें, पित्त की अधिकता होने पर और वात आदि दोषों की समान स्थिति होने पर छठा भाग स्नेह मिलायें और यदि कफदोष की अधिकता हो तो आठवाँ भाग स्नेह मिलायें । इसके अतिरिक्त सभी स्थितियों में कल्क का आठवाँ भाग अथवा उतना कल्क ( चटनी की भाँति पिसा हुआ द्रव्य ) मिलायें, जिससे ऊपर कहा गया क्वाथ न अधिक पतला हो जाय और न अधिक गाढ़ा । उसमें गुड़ एक पल, मधु तथा लवण आदि शेष द्रव्यों का युक्तिपूर्वक मिश्रण करना चाहिए ॥ ३८-४० ॥ —सर्वं तदेकतः । उष्णाम्बुकुम्भीबाष्पेण तप्तं खजसमाहतम् ॥४१ ॥

प्रक्षिप्य बस्तौ प्रणयेत्पायौ नात्युष्णशीतलम् । नातिस्निग्धं न वा रूक्षं नातितीक्ष्णं न वा मृदु ॥ नात्यच्छसान्द्रं नोनातिमात्रं नापटु नाति च । लवणं तद्वदम्लं च—

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२३६ अष्टाङ्गहृदये उक्त सभी द्रव्यों को एक पात्र ( बर्तन ) में मिलाकर खौलते हुए जल में डालकर उसे भलीभाँति मथानी से मथें । तैयार हो जाने पर तथा गुनगुना होने पर इसे बस्तिपुट में भरें । भरने के पहले इस द्रव को देख लें — यह न अधिक स्निग्ध हो, न अधिक रूक्ष हो, न अधिक तीक्ष्ण हो, न अधिक मृदु हो, न अधिक अच्छ ( स्वच्छ द्रव के आकार का ) हो, न अधिक गाढ़ा हो, न मात्रा में कम हो, न अधिक हो, न अधिक लवण युक्त हो, न लवण से सर्वथा रहित हो, न अधिक अम्ल ( खट्टा ) हो और न अम्लरहित ही हो; ऐसे गुनगुने द्रव पदार्थ द्वारा बस्ति दें ॥ ४१-४२ ॥ — पठन्त्यन्ये तु तद्विदः ॥ ४३ ॥

मात्रां त्रिपलिकां कुर्यात्स्नेहमाक्षिकयोः पृथक् । कर्षार्द्ध माणिमन्थस्य स्वस्थे कल्कपलद्वयम् ॥ सर्वद्रवाणां शेषाणां पलानि दश कल्पयेत् । अन्य आचार्यों का मत — इस सम्बन्ध में बस्तिविशेषज्ञ दूसरे आचार्यों का मत इस प्रकार है — इसमें स्नेह तथा मधु की मात्रा ३-३ पल ( १२-१२ तोला ), माणिमन्थ ( सेंधानमक ) आधा कर्ष, कल्क २ पल ( ८ तोला ), इनके अतिरिक्त ऊपर जो - जो द्रव पदार्थ कहे गये हैं, उन्हें तथा क्वाथद्रव सहित १० पल ( ४० तोला ) लें । यह प्रमाण स्वस्थ ( पूर्ण ) पुरुष के लिए कहा गया है ॥ ४३-४४ ॥ माक्षिकं लवणं स्नेहं कल्कं क्वाथमिति क्रमात् ॥ ४५ ॥

आवपेत निरूहाणामेष संयोजने विधिः । बस्तिद्रव्य - मिश्रणविधि — बस्ति में प्रयोग किये जाने वाले द्रव्यों को मिलाने की विधि - पात्र - विशेष में सबसे पहले क्रमशः मधु, लवण ( नमक ), स्नेह, कल्क, क्वाथ किया हुआ द्रव आदि डालते जाय और मथानी से इन्हें मथता जाय । यह बस्ति में डालने से पहले द्रव्यों को मिलाने की विधि है ॥ ४५ । उत्तानो दत्तमात्रे तु निरूहे तन्मना भवेत् ॥। ४६ ॥ कृतोपधानः सञ्जातवेगश्चोत्कटकः सृजेत् । निरूहण का पश्चात् कर्म — जिसे निरूहणबस्ति दी गयी हो, वह बस्ति - प्रयोग के तत्काल बाद तकिया लगाकर कब निरूह द्रव्यों का वेग लौट आता है, इसका ध्यान रखता हुआ लेटा रहे और वेग की प्रतीति होते ही पाँवों के बल बैठकर ( इसी को उत्कट आसन = उकडूं बैठना कहते हैं ) मल का त्याग कर दें ॥ ४६ ॥

आगतौ परमः कालो मुहूर्तो मृत्यवे परम् ॥ ४७ ॥

तत्रानुलोमिकं स्नेहक्षारमूत्राम्लकल्पितम् । त्वरितं स्निग्धतीक्ष्णोष्णं बस्तिमन्यं प्रपीडयेत् ॥ ४८ ॥

विदद्यात्फलवर्तिं वा स्वेदनोत्त्रासनादि च । बस्ति के लौटने की अवधि — निरूहणबस्ति के लौट आने का अधिक - से - अधिक समय एक मुहूर्त ( २ घड़ी = ४८ मिनट ) है । इसके बाद भी यदि नहीं लौटता है तो इसके बाद मृत्यु हो सकती है । इस स्थिति में उन द्रव्यों का अनुलोमन ( विरेचन ) कराने वाली स्नेह, क्षार, गोमूत्र, अम्ल ( काँजी ) मिलाकर बनायी गयी स्निग्ध, तीक्ष्ण ( क्षार ) एवं गरमागरम दूसरी बस्ति का प्रयोग कर देना चाहिए अथवा मदनफलयुक्त फलवर्ति ( देखें — अ.हृ.चि. ८ १३७ ) का प्रयोग कराना चाहिए अथवा पेट के ऊपर स्वेदन करायें अथवा उसे डराने - धमकाने का प्रयत्न करे, इससे भी मल निकल आता है ॥ ४७-४८ ॥ स्वयमेव निवृत्ते तु द्वितीयो बस्तिरिष्यते ॥ ४ ९ ॥ तृतीयोऽपि चतुर्थोऽपि यावद्वा सुनिरूढता । अनेक बस्ति - प्रयोग — यदि स्वाभाविक रूप से समय के भीतर बस्तिद्रव लौटकर बाहर न आ जाय तब तक आवश्यकतानुसार दूसरी, तीसरी तथा चौथी बस्ति का प्रयोग करते रहना चाहिए, जब तक उसमें सम्यक् निरूहण के लक्षण न देख लिये जायें ॥ ४ ९ ॥

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बस्तिविधिरध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् २३७ विरिक्तवच्च योगादीन्विद्यात्— सम्यग्योग आदि का संकेत — निरूहणबस्ति के सम्यग्योग, हीनयोग, अतियोग के लक्षणों को विरेचन

के समान ही समझें । इनके लक्षण अ.हृ.सू. १८ ३८-४१ में कहे गये हैं ।

-योगे तु भोजयेत् ॥५० ॥

कोष्णेन वारिणा स्नातं तनुधन्वरसौदनम् । सम्यग्योग में पश्चात् कर्म – निरूहणबस्ति का सम्यग्योग हो जाने के बाद उस व्यक्ति को गुनगुने जल से स्नान कराकर धन्व ( जांगल ) देश में उत्पन्न पशु - पक्षियों के मांसरस के साथ भात खिलाना चाहिए ॥ ५० ॥

विकारा ये निरूढस्य भवन्ति प्रचलैर्मलैः ॥ ५१ ॥

ते सुखोष्णाम्बुसिक्तस्य यान्ति भुक्तवतः शमम् । विकारों का शमन — निरूहणबस्ति का प्रयोग कराने से मलों के अपने जाने के कारण जो तात्कालिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं, वे सब गुनगुने जल द्वारा के साथ भोजन कर लेने पर शान्त हो जाते हैं ॥ ५१ ॥

अथ वातार्दितं भूयः सद्य एवानुवासयेत् ॥ ५२ ॥

पुनः अनुवासन - प्रयोग — वातरोग से पीड़ित व्यक्ति को निरूहणबस्ति अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए ॥ ५२ ॥।

वक्तव्य —— सद्य एवानुवासयेत् ' – यहाँ ' सद्यः ' शब्द का अर्थ ' तत्क्षण = स्थान से इधर - उधर हो स्नान करने तथा मांसरस देने के बाद तत्काल ही तत्काल ' ही है, न कि ‘ सद्योमरणीयमिद्रिय ’ अध्याय में कहे गये ' सद्यः ' के समान समझें । वहाँ तो श्रीचक्रपाणि के अनुसार सात रात या तीन रात तक का समय स्वीकार किया गया है । देखें I च.इ. १०।१ २ । यहाँ भी सामान्य रूप से विरेचन के सात दिन बाद अनुवासनबस्ति देने की अनुमति चरक तथा सुश्रुत ने दी है । देखें —सु.चि. ३७।३ तथा च.सू. १५।१६ । आवश्यक विधियों में सामान्य वचनों का उपयोग कहीं भी नहीं होता है । सम्यग्धीनातियोगाश्च तस्य स्युः स्नेहपीतवत् । अनुवासन के विविध योग — अनुवासनबस्ति के सम्यग्योग, हीनयोग तथा अतियोग स्नेहपान के

सम्यग्योग, हीनयोग तथा अतियोग के समान होते हैं । देखें— अ.हृ.सू. १६।३०-३१ ।

किञ्चित्कालं स्थितो यश्च सपुरीषो निवर्तते ॥ ५३ ॥

सानुलोमानिलः स्नेहस्तत्सिद्धमनुवासनम् । सम्यग्योग का वर्णन — अनुवासनबस्ति द्वारा दिया गया जो स्नेह कुछ समय तक मलाशय में रुककर पुरीष ( मल ) के साथ लौट आता है और जो वायु का अनुलोमन कर देता है, उसे अनुवासनबस्ति का सम्यग्योग कहा जाता है ॥ ५३ ॥

एकं त्रीन् वा बलासे तु स्नेहबस्तीन् प्रकल्पयेत् ॥ ५४ ॥

पञ्च वा सप्त वा पित्ते, नवैकादश वाऽनिले । पुनस्ततोऽप्ययुग्मांस्तु पुनरास्थापनं ततः ॥ ५५ ॥

दोषानुसार बस्तिसंख्या – कफदोष में १ अथवा ३, पित्तदोष में ५ या ७ तथा वातदोष में ९ या ११ स्नेहबस्तियाँ देनी चाहिए । यदि आवश्यकता हो तो इसके आगे भी अयुग्म ( विषम ) संख्या में ( पहले कही हुई संख्याओं से बढ़ाकर बस्तियाँ देनी चाहिए । उसके बाद फिर आस्थापन ( निरूहण ) बस्तियों का प्रयोग कराना चाहिए । यह आस्थापनबस्ति स्नेहबस्तियों के साथ - साथ भी दी जाती है ॥ ५४-५५ ॥ कफपित्तानिलेष्वन्नं यूषक्षीररसैः क्रमात् ।

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२३८ अष्टाङ्गहृदये आहार - विधान — बस्ति - प्रयोग के दिनों में आहारविधि का शास्त्रीय निर्देश —— कफदोष में यूष ( जूस ) के साथ, पित्तदोष में दूध के साथ और वातदोष में मांसरस के साथ सुपाच्य भोजन देना चाहिए । वातघ्नौषधनिष्क्वाथत्रिवृतासैन्धवैर्युतः ॥५६ ॥

बस्तिरेकोऽनिले स्निग्धः स्वाद्वम्लोष्णो रसान्वितः । वातदोष में बस्ति - प्रयोग -- वातनाशक ( भद्रदारु अथवा दशमूल आदि ) द्रव्यों का क्वाथ बनाकर उसमें निशोथ, सेंधानमक, मधुर तथा अम्लरस एवं उष्णवीर्य पदार्थों को मिलाकर एक बस्ति देनी चाहिए ॥ ५६ ॥

न्यग्रोधादिगणक्वाथपद्मकादिसितायुतौ ॥५७ ॥

पित्ते स्वादुहिमी साज्यक्षीरेक्षुरसमाक्षिकौ । पित्तदोष में बस्ति - प्रयोग— न्यग्रोधादि गण के क्वाथ में पद्मकादि गणोक्त द्रव्यों का कल्क, मिश्री, घी, दूध, ईख का रस तथा मधु आदि मधुर एवं शीतल द्रव्यों को मिलाकर एक बस्ति देनी चाहिए ॥ ५७ ॥

आरग्वधादिनिष्क्वाथवत्सकादियुतास्त्रयः ॥ ५८ ॥

रूक्षाः सक्षौद्रगोमूत्रास्तीक्ष्णोष्णकटुकाः कफे । कफदोष में बस्ति - प्रयोग — आरग्वधादि गणोक्त द्रव्यों के क्वाथ में वत्सकादि गणोक्त द्रव्यों का कल्क, रूक्षताकारक मधु, गोमूत्र, तीक्ष्ण, उष्ण एवं कटु द्रव्यों को मिलाकर तीन बस्तियाँ देनी चाहिए ॥५८ ॥

वक्तव्य- - ऊपर कतिपय गणों के नाम आये हैं, उन्हें अ.हृ.सू. १५ में इस प्रकार देखें — वातनाशक गण श्लोक ५, न्यग्रोधादि गण श्लोक ४१-४२, पद्मकादि गण श्लोक १२, आरग्वधादि गण श्लोक ७ तथा

१७-१८ तथा वत्सकादि गण श्लोक ३३-३४ ।

त्रयस्ते सन्निपातेऽपि दोषान् घ्नन्ति यतः क्रमात् ॥५ ९ ॥

सन्निपात में बस्ति प्रयोग — सन्निपात में भी ऊपर कही गयी तीनों वात, पित्त तथा कफ नाशक बस्तियाँ क्रमानुसार दी जाती हैं । इस क्रम को कुशल चिकित्सक जानते हैं, अतएव ये तीनों दोषों का शोधन करती हैं ॥ ५ ९ ॥ त्रिभ्यः परं बस्तिमतो नेच्छन्त्यन्ये चिकित्सकाः । न हि दोषश्चतुर्थोऽस्ति पुनर्दीयेत यं प्रति ॥ ६० ॥

तीन ही बस्तियाँ — इस दृष्टिकोण से कुछ चिकित्सक केवन तीन ही बस्तियाँ होती हैं, ऐसा कहते हैं; क्योंकि दोष भी तीन ही होते हैं, चौथा दोष भी नहीं होता, जिसके लिए अन्य बस्ति की कल्पना की जाय ॥ ६० ॥

उत्क्लेशनं शुद्धिकरं दोषाणां शमनं क्रमात् । त्रिधैव कल्पयेद्वस्तिमित्यन्येऽपि प्रचक्षते ॥ ६१ ॥

बस्तिनाम - भेद —— दूसरे आचार्यों का कथन है कि विधिभेद से बस्तियाँ तीन प्रकार की होती हैं— १. उत्क्लेशन, जो भीतर जाकर जमे हुए दोषों को उभार देती है । २. शुद्धिकर, विरेचन द्वारा बाहर निकाल देने वाली तथा ३. शमन, उपस्थित दोषों का शमन करने वाली ॥ ६१ ॥

दोषौषधादिबलतः सर्वमेतत् प्रमाणयेत् । उक्त मतों की प्रामाणिकता — उक्त सभी मत प्रामाणिक हैं, ऐसा समझना चाहिए । क्योंकि वात आदि दोषों का, विविध गुणवाले औषध - द्रव्यों का तथा देश - काल आदि के बल का विचार करने से इनकी प्रामाणिकता स्वयं सिद्ध है । वास्तव में जो भेद दृष्टिगोचर होता है, वह केवल विधिभेद ही है । सम्य‌निरूढलिङ्गं तु नासम्भाव्य निवर्तयेत् ॥ ६२ ॥

बस्तिकर्म की अवधि — जब तक इसी अध्याय में कथित सम्यक् निरूहण के लक्षण दिखलायी न दें तब तक बस्तिकर्म के प्रयोगक्रम को रोकना नहीं चाहिए ॥ ६२ ॥

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बस्तिविधिरध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् २३ ९ वक्तव्य — निरूहणबस्ति के सम्यग्योग का वर्णन इसी अध्याय के ५० वें पद्य में सूत्ररूप से कहा गया है, अतः वमन एवं विरेचन के सम्यग्योग के समान इसके लक्षणों का भी विचार कर लेना चाहिए । प्राक्स्नेह एकः पञ्चान्ते द्वादशास्थापनानि च । सान्वासनानि कर्मैवं बस्तयस्त्रिंशदीरिताः ॥ ६३ ॥

बस्तिकर्म का वर्णन – प्रस्तुत बस्तिकर्म के आरम्भ में १ स्नेहबस्ति दी जाती है तथा अन्त में ५ स्नेहबस्तियाँ और बीच में १२ आस्थापन ( निरूहण ) बस्तियाँ तथा १२ अनुवासनबस्तियाँ दी जाती हैं । इस प्रकार इन बस्तियों की कुल संख्या ३० हो जाती है । इस क्रम से प्रयुक्त विधि को ' बस्तिकर्म ' कहते हैं ॥ ६३ ॥

कालः पञ्चदशैकोऽत्र प्राक् स्नेहोऽन्ते त्रयस्तथा । षट् पञ्चबस्त्यन्तरिताः- — बस्तिकाल का वर्णन — बस्तिकाल में सर्वप्रथम १ स्नेहबस्ति का प्रयोग किया जाता है और अन्त में ३ स्नेहबस्तियाँ दी जाती हैं, मध्य में ६ स्नेहबस्तियाँ तथा इनके बीच - बीच में ५ निरूहणबस्तियाँ दी जाती हैं । इस प्रकार इन कुल बस्तियों की संख्या १५ हो जाती है । इस क्रम से प्रयुक्त विधि को ‘ बस्तिकाल ’

कहते हैं ।

— योगोऽष्टौ बस्तयोऽत्र तु ॥ ६४ ॥

यो निरूहाः स्नेहाश्च स्नेहावाद्यन्तयोरुभौ । बस्तियोग का वर्णन — बस्तियोग में सर्वप्रथम १ स्नेहबस्ति और अन्त में १ स्नेहबस्ति दी जाती है । इन दोनों के बीच में ३ निरूहणबस्तियाँ एवं इन्हीं के बीच - बीच में ३ अनुवासनबस्तियाँ दी जाती हैं । इस प्रकार इन कुल बस्तियों की संख्या ८ हो जाती है । इस क्रम से प्रयुक्त विधि को ' बस्तियोग ' कहते हैं ॥ ६४ ॥

स्नेहबस्तिं निरूहं वा नैकमेवाति शीलयेत् ॥। ६५ ॥ उत्क्लेशाग्निवधौ स्नेहान्निरूहान्मरुतो भयम् । स्नेह एवं निरूहण प्रयोग — केवल स्नेहबस्तियों अथवा केवल निरूहणबस्तियों का निरन्तर सेवन कराना उचित नहीं है, क्योंकि केवल स्नेहबस्तियों का प्रयोग कराने से दोषों का उत्क्लेश ( पित्त एवं कफ दोषों की वृद्धि तथा मल का उभर आना ) हो जाता है और मन्दाग्नि हो का निरन्तर अधिक सेवन कराने से वातदोष की वृद्धि का भय हो सकता है तस्मान्निरूढः स्नेह्यः स्यान्निरूह्यश्चानुवासितः बस्तियों का प्रयोगक्रम — इसलिए निरूहणबस्ति - प्रयोग के बाद बाद निरूहणबस्ति का प्रयोग अवश्य करना चाहिए ॥ ६६ ॥

स्नेहशोधनयुक्त्यैवं बस्तिकर्म त्रिदोषजित् बस्ति की त्रिदोषनाशकता — उक्त विधि के अनुसार स्नेहबस्ति द्वारा शोधन कराने से यह बस्ति - प्रयोग त्रिदोषनाशक होता है । ह्रस्वया स्नेहपानस्य मात्रया योजितः समः मात्राबस्तिः स्मृतः स्नेहः-मात्राबस्ति का वर्णन — स्नेहपान की ह्रस्वमात्रा ( १ कर्ष = १ तोला द्वारा जो प्रयुक्त किया जाता है, उसका नाम ' मात्राबस्ति ' है ॥६७ ॥

जाती है । केवल निरूहणबस्तियों ॥ ६५ ॥

॥ ६६ ॥

स्नेहबस्ति का और स्नेहबस्ति के । द्वारा स्नेहन तथा निरूहण बस्ति ॥ ६७ ॥

) के बराबर स्नेह को अनुवासनबस्ति - शीलनीयः सदा च सः । बालवृद्धाध्वभारस्त्रीव्यायामासक्तचिन्तकैः ॥ ६८ ॥

वातभग्नाबलाल्पाग्निनृपेश्वरसुखात्मभिः । दोषघ्नो निष्परीहारो बल्यः सृष्टमलः सुखः ॥ ६ ९ ॥

पृष्ठ 276

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२४० अष्टाङ्गहृदये मात्राबस्ति सेवन — उक्त प्रकार की मात्राबस्ति का निम्नोक्त व्यक्तियों को सदा सेवन करने का निर्देश — बालक, वृद्ध, जो प्रतिदिन पैदल चलते हों, बोझा ढोते हों, स्त्री - सहवास करते हों, व्यायामशील व्यक्तियों को, विचारकों, वातरोगियों, अस्थिभंग से पीड़ितों, दुर्बलों, मन्दाग्निवालों, राजाओं, धनवानों तथा सुख से जीवन बिताने वालों को इसका प्रतिदिन सेवन करना चाहिए । यह मात्राबस्ति सभी दोषों को शान्त करती है, इसमें किसी प्रकार का परहेज ( पथ्य - अपथ्य का विचार ) नहीं है । यह बलवर्धक है तथा मल - मूत्र को सरलता से निकालने वाली एवं सुखदायक होती है ॥ ६८-६९ ॥ वक्तव्य- - उक्त विषय का समर्थन देखें – च. सि. १।२७ में है । मात्राभेद से स्नेहपान तीन प्रकार का होता है— १. उत्तम मात्रा – १ पल = ४ तोला, २. मध्यम मात्रा – ३ कर्ष = ३ तोला तथा ३. जघन्य मात्रा — आधा पल = २ तोला । मात्राबस्ति की विशेषता — जिस प्रकार प्रतिदिन के भोजन में घृत आदि स्नेहों का सेवन किया जाता है, इसके लिए किसी प्रकार का परहेज नहीं किया जाता है, उसी प्रकार इस मात्राबस्ति के सेवन में भी किसी प्रकार के परीहार ( परहेज ) की आवश्यकता नहीं होती है । स्नेहपान की ह्रस्वमात्रा वह होती है, जो प्रातःकाल सेवन करने के बाद दोपहर के भोजन करने तक पच जाय । इसमें भी समाग्नि, मन्दाग्नि, विषमाग्नि एवं तीक्ष्णाग्नि का विचार कर लेना चाहिए । ह्रस्वमात्रा में प्रयुक्त स्नेहपान से जो लाभ होते हैं वे समस्त मात्राबस्ति के सेवन से होते हैं । बस्तौ रोगेषु नारीणां योनिगर्भाशयेषु च । द्वित्रास्थापनशुद्धेभ्यो विदध्याद्वस्तिमुत्तरम् ॥ ७० ॥

उत्तरबस्ति का वर्णन — नर तथा नारियों के बस्तिगत रोगों में एवं विशेषकर नारियों के योनिगत तथा गर्भाशयगत रोगों में उत्तरबस्ति का प्रयोग तब करना चाहिए जब कि इसके पहले दो - तीन बार आस्थापन ( निरूहण ) बस्ति का प्रयोग कराकर मलाशय का भलीभाँति शोधन हो जाय ॥ ७० ॥

वक्तव्य — उत्तरबस्ति उसे कहते हैं जिसका प्रयोग नर एवं नारी के मूत्रमार्ग द्वारा किया जाता है । निरूहणबस्ति को शोधनबस्ति तथा अनुवासनबस्ति को स्नेहनबस्ति भी कहा जाता है । आतुराङ्गुलमानेन तन्नेत्रं द्वादशाङ्गुलम् । वृत्तं गोपुच्छवन्मूलमध्ययोः कृतकर्णिकम् ॥ ७१ ॥

सिद्धार्थकप्रवेशाग्रं श्लक्ष्णं हेमादिसम्भवम् । कुन्दाश्वमारसुमनःपुष्पवृन्तोपमं दृढम् ॥७२ ॥

उत्तरबस्ति में नेत्र का प्रमाण – मूत्रमार्ग में जो बस्ति दी जाती है, उसके नेत्र की लम्बाई रोगी की अँगुलियों से बारह अंगुल होनी चाहिए । इस नेत्र का अगला भाग गोलाकार तथा शेष भाग गाय की पूँछ की भाँति अर्थात् आगे की ओर पतला और मूल ( जड़ ) की ओर क्रमशः मोटा होना चाहिए । उस नेत्र ( नलिका ) के मूल भाग में बस्तिपुट को बाँधने के लिए दो कर्णिकाएँ बनी हों । एक मूल में और दूसरी मध्य भाग की ओर । उसके नेत्र के अगले भाग का छिद्र इतना बड़ा हो जिसमें सरलता से सरसों का दाना प्रवेश कर सके । नेत्रनलिका का बाहरी भाग चिकना हो तथा सोना, चाँदी, ताँबा आदि धातुओं से बना हो । इसका अगला भाग कुन्द, कनेर अथवा चमेली के फूल के वृन्त के आकार का हो तथा उसे दृढ़ होना चाहिए ॥ ७१-७२ ॥ तस्य बस्तिर्मृदुलघुर्मात्रा शुक्तिर्विकल्प्य वा । स्नेहमात्रा का प्रमाण — उस उत्तरबस्ति का बस्तिपुट गुद में दी जाने वाली बस्ति की तुलना में छोटा तथा कोमल होना चाहिए । इसमें स्नेह की मात्रा एक शुक्ति ( २ कर्ष = २ तोला ) अथवा जिसे उत्तरबस्ति दी जा रही है उसके बल, अवस्था आदि का विचार कर तदनुसार कुछ कम या ज्यादा की जा सकती है । वक्तव्य — स्त्री - पुरुष भेद से उत्तरबस्ति के विचारणीय विषयों के लिए आप देखें — सु.चि. ३७ श्लोक १०२ से १२१ तक; तभी इस प्रकरण में आवश्यक वय, मात्रा, काल आदि का स्पष्टीकरण हो सकता है, अतः आप उक्त सन्दर्भों का अवलोकन अवश्य कर लें ।

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बस्तिविधिरध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् २४१ अथ स्नाताशितस्यास्य स्नेहबस्तिविधानतः ॥ ७३ ॥

ऋजोः सुखोपविष्टस्य पीठे जानुसमे मृदौ । हृष्टे मेद्रे स्थिते चर्जी शनैः स्रोतोविशुद्धये ॥ ७४ ॥

सूक्ष्मां शलाकां प्रणयेत्तया शुद्धेऽनुसेवनि । आमेहनान्तं नेत्रं च निष्कम्पं गुदवत्ततः ॥ ७५ ॥

पीडितेऽन्तर्गते स्नेहे स्नेहवस्तिक्रमो हितः । उत्तरबस्ति - प्रयोगविधि — उत्तरबस्ति का प्रयोग करने के पहले स्नेहबस्ति की विधि से उस व्यक्ति को गुनगुने जल से स्नान कराकर पथ्य भोजन खिलाकर, जानु ( घुटने ) भर ऊँचे मुलायम पीठ ( आसन ) पर सीधा तथा आराम से बैठे हुए पुरुष के हृष्ट एवं सीधे लिंग के मूत्र निकलने वाले छिद्र में स्रोतस् को शुद्ध करने के लिए सूक्ष्म ( उस छिद्र में प्रवेश करने योग्य ) शलाका ( कैथीटर नामक आधुनिक यन्त्र ) का धीरे - धीरे प्रवेश कराये । उस उत्तरबस्ति के नेत्र द्वारा मार्ग शुद्ध हो गया है, ऐसा अनुमान हो जाने पर सेवनी की सीध में मूत्रमार्ग के अन्त तक नेत्र का प्रवेश करता जाय । इसमें भी गुदबस्ति की भाँति नेत्र प्रवेश कराते समय चिकित्सक का हाथ हिलना नहीं चाहिए । तदनन्तर बस्तिपुट को दबाना चाहिए । जब स्नेहबस्ति ( मूत्राशय ) में पहुँच जाय तब बस्तिनेत्र को धीरे - धीरे निकालें । इस प्रकार उत्तरबस्ति - विधि से दिया गया स्नेह हितकर होता है ॥ ७३-७५ ॥ वक्तव्य — इसके बाद जब वह स्नेह लौट आता है, तो उस व्यक्ति को भूख लगने पर इसी अध्याय में कहे गये श्लोक ३० की भाँति उचित भोजन करायें । शंका- ' हृष्टे मेद्रे ' ( अ.सं. सू. २८/६६ ); सुश्रुत में — ‘ ततः समं स्थापयित्वा नालमस्य प्रहर्षितम् ' । ( सु.चि. ३७।११० ) तथा चरक में— ' ऋजोः सुखोपविष्टस्य हृष्टे मेद्रे घृताक्तया । शलाकयाऽन्विष्य गतिं यद्यप्रतिहता व्रजेत् ' । ( च.सि. ९ / ५४ ) इस प्रकार सभी आचार्यों का पुरुष की मूत्रेन्द्रिय में उत्तरबस्ति देने का एक ही दृष्टिकोण है और होना भी चाहिए । किन्तु चरक को छोड़कर अन्य सभी के वचन इस दृष्टि से तब तक विवादास्पद कहे जा सकते हैं जब तक हम निम्न समाधान पक्ष को प्रस्तुत नहीं करते । क्योंकि हृष्टमेद्र ( स्त्री - सहवास के लिए उद्यत पुरुष की मूत्रेन्द्रिय अर्थात् लिंग ) इतना तन जाता है कि उसमें द्रवरूप मूत्र तो निकल ही नहीं पाता, भला उस स्थिति में उसके भीतर बस्तिनेत्र का प्रवेश बाधारहित कैसे किया या कराया जा सकता है? समाधान — प्राचीन आचार्य - परम्परा पर अपना अज्ञान नहीं लादना चाहिए, अतएव सुश्रुत ने कहा है— ' एक ही शास्त्र को पढ़ता हुआ व्यक्ति शास्त्र के रहस्य को नहीं जान सकता, इसलिए जिसने अनेक शास्त्रों का अध्ययन किया है वही शास्त्र के रहस्य को जान सकता है ' । देखें - सु. सू. ४७ । जब हम व्याकरण की दृष्टि से विचार करते हैं, तो उक्त स्थलों में कहीं भी शंका नहीं रह जाती । ' हृष तुष्टौ ' धातु से ' क्त ' प्रत्यय करने पर ' हृष्ट ' रूप बनता है । जिसका अर्थ होता है — तुष्टि, हर्ष, विस्मित तथा प्रतिघात या प्रतिहत; इसी को मनोहत भी कहते हैं । ‘ धातूनाम् अनेकार्थत्वात् ' उनके प्रसंगवश अनेक अर्थ कर लिए जाते हैं, किन्तु हम उक्त अर्थों को कोश एवं व्याकरण की सहायता से ले रहे हैं । देखें – पाणिनीय सूत्र ' हृषेर्लेमसु ' ( ७।२।२ ९ ) ' विस्मितः प्रतिघातयोश्च ' ( वार्तिक ) के तथा ' मनोहतः प्रतिहतः प्रतिबद्धो हतश्च सः ' । ( अमरकोश ) आप ध्यान दें - हृष धातु से हृष्ट एवं हृषित दो ही रूप निष्पन्न होते हैं, न कि हर्षित या प्रहर्षित, जिसका प्रयोग सुश्रुत ने किया है । किन्तु ' ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति ' के अनुसार जब हम ' हर्षित ' रूप को सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, तो हमें ' हर्षः सञ्जातः अस्य ' इस प्रकार विग्रह करके ‘ तदस्य सञ्जातं तारकादिभ्य इतच् ' । ( ५।२।३६ ) सूत्र से इतच् प्रत्यय करना होगा, क्योंकि ‘ तारकादिगण ' में हर्ष शब्द का पाठ है । इस दृष्टि से हर्ष शब्द का एक अर्थ प्रतिघात या प्रतिहत भी होता है, अतः लिंग की ' प्रतिहत ' स्थिति में नेत्रप्रणयन सरल, स्वाभाविक एवं शास्त्रसम्मत है ही । चरक ने पहले ही कहा है— शलाका का प्रवेश करके देखें कि उसकी गति में कहीं रुकावट तो नहीं आ रही है? यदि आ रही हो तो बस्तिनेत्र का प्रवेश न करायें । क्या सुबोध भाषा है आचार्य चरक की! इसी प्रसंग में आप आचार्य शार्ङ्गधर के विचारों को देखें— शा.उ.खं. ७।३-५ । इन्होंने पुरुषों की उत्तरबस्ति - प्रयोगविधि में इस प्रकार का उलझाने वाला पाठ नहीं दिया है । १६ अ ० हृ ०

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२४२ अष्टाङ्गहृदये बस्तीननेन विधिना दद्यात् त्रींश्चतुरोऽपि वा ॥ ७६ ॥

अनुवासनवच्छेषं सर्वमेवास्य चिन्तयेत् । उत्तरबस्ति की संख्या- ऊपर कही गयी विधि से तीन या चार बस्तियाँ में दें । शेष सभी विषयों ( सम्यग्योग, हीनयोग तथा अतियोग, आहार - विहार एवं विचार अनुवासनबस्ति की भाँति करें ॥ ७६ ॥

स्त्रीणामार्तवकाले तु योनिर्गृह्णात्यपावृतेः ॥ ७७ ॥

नर - नारी के मूत्रमार्ग चिकित्सा आदि ) का

विदधीत तदा तस्मादनृतावपि चात्यये । योनिविभ्रंशशूलेषु योनिव्यापद्यसृग्दरे ॥ ७८ ॥

स्त्रियों में उत्तरबस्ति— स्त्रियों की योनि का मुख आर्तवकाल ( मासिकधर्म के दिनों ) में खुला रहता है, अत: उस काल में उत्तरबस्ति का प्रयोग करना चाहिए; क्योंकि इन दिनों दी गयी बस्ति के स्नेह का वह ग्रहण कर लेती है । अत्यन्त आवश्यकता होने पर ऋतुकाल के बीत जाने पर भी उत्तरबस्ति का प्रयोग किया जा सकता है । जैसे — योनिभ्रंश ( काँच की भाँति योनि = गर्भाशय के बाहर निकल आने पर ), योनिशूल, योनिव्यापदों तथा रक्तप्रदररोग आदि रोगों के होने पर उत्तरबस्ति का प्रयोग करना चाहिए ॥ ७७-७८ ॥ नेत्रं दशाङ्गुलं मुद्गप्रवेशं चतुरङ्गुलम् । अपत्यमार्गे योज्यं स्याद् द्व्यङ्गुलं मूत्रवर्त्मनि ॥७९ ॥

मूत्रकृच्छ्रविकारेषु, बालानां त्वेकमङ्गुलम् । बस्तिनेत्र का परिमाण— उत्तरबस्ति का नेत्र १० अंगुल लम्बा होना चाहिए । इसके अगले भाग का छिद्र मूँग के दाने के सरलता से आने - जाने योग्य हो, उसका प्रवेश भगमार्ग में चार अंगुल मात्र कराना चाहिए । मूत्रकृच्छ्र आदि रोगों में जब इसे मूत्रमार्ग में प्रवेश कराना हो तो दो अंगुल मात्र प्रवेश करायें । कन्याओं को यदि मूत्रमार्ग में बस्ति देनी हो तो एक अंगुल मात्र प्रवेश करायें ॥ ७ ९ ॥ प्रकुञ्चो मध्यमा मात्रा, बालानां शुक्तिरेव तु ॥ ८० ॥

स्नेहमात्रा - निर्देश — स्त्रियों में उत्तरबस्ति - प्रयोग के लिए स्नेह की मध्यम मात्रा १ प्रकुंच = ४ तोला होती है और बालिकाओं के लिए मध्यम मात्रा १ शुक्ति = २ तोला होती है ॥ ८० ॥

उत्तानायाः शयानायाः सम्यक् सङ्कोच्य सक्थिनी । ऊर्ध्वजान्वास्त्रिचतुरानहोरात्रेण योजयेत् ॥ बस्तींस्त्रिरात्रमेवं च स्नेहमात्रां विवर्द्धयन् । त्र्यहमेव च विश्रम्य प्रणिदध्यात्पुनस्त्र्यहम् ॥ ८२ ॥

उत्तरबस्ति - प्रयोगविधि — स्त्री को चित लेटाकर उसकी जानुओं को भलीभाँति मोड़कर घुटनों को ऊपर की ओर उठाकर एक दिन - रात ( २४ घण्टे ) में तीन अथवा चार बार बस्ति का प्रयोग कराना चाहिए । इस प्रकार स्नेह की मात्रा को क्रमशः बढ़ाता हुआ तीन दिन तक बस्तियों का प्रयोग कराता रहे । तीन दिन रुककर पहले की भाँति फिर तीन दिन तक बस्ति - प्रयोग कराये ॥ ८१-८२ ॥ वक्तव्य — स्त्रियों को उत्तरबस्ति का प्रयोग कराना केवल स्त्री - चिकित्सक का ही अधिकार है । यही लोकाचार भी है और यही पक्ष न्यायसंहितासम्मत भी है । पुरुष - चिकित्सक इस कार्य को न करें । इस सम्बन्ध में सुश्रुत ने सु. चि. ३७।११४- ११५ में उत्तरबस्ति - प्रयोगकर्ता को ' विचक्षणः ' कहा है । यहाँ पर जो पाठभेद दिया है वह है ' समाहितः ', जिसकी व्याख्या करते हुए आचार्य डल्हण कहते हैं — ‘ कामसङ्कल्परहितेन अचलचित्तप्रकृतिना ' । अर्थ स्पष्ट है । सुश्रुत एवं चरक ने प्रसवकाल में नारियों का अधिकार बतलाया है, यह बस्तिकर्म भी प्रायः उसी प्रकार की स्थिति है । पक्षाद्विरेको वमिते ततः पक्षान्निरूहणम् । सद्यो निरूढश्चान्वास्यः सप्तरात्राद्विरेचितः ॥ ८३ ॥

वमन आदि में काल- 5 - निर्देश - वमन कराने के १५ दिन के बाद विरेचन करायें, तदनन्तर १५ दिन के बाद निरूहणबस्ति का प्रयोग करें और निरूहणबस्ति का प्रयोग करने के तत्काल बाद उसे अनुवासन-बस्ति दें और विरेचन कराने के एक सप्ताह बाद भी अनुवासनबस्ति का प्रयोग कराना चाहिए ॥ ८३ ॥

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बस्तिविधिरध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् २४३ यथा कुसुम्भादियुतात्तोयाद्रागं हरेत्पटः । तथा द्रवीकृताद्देहाद्वस्तिर्निर्हरते मलान् ॥८४ ॥

बस्ति द्वारा दोषनिर्हरण - जिस प्रकार जल में घुले हुए कुसुम्भी रंग को पट ( वस्त्र ) ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार शरीर में द्रवीभूत मलों को बस्तिप्रयोग शरीर से बाहर निकाल देता है ॥८४ ॥

शाखागताः कोष्ठगताश्च रोगा मर्मोर्ध्वसर्वावयवाङ्गजाश्च ।

ये सन्ति तेषां न तु कश्चिदन्यो वायोः परं जन्मनि हेतुरस्ति ॥ ८५ ॥

विट्श्लेष्मपित्तादिमलोच्चयानां विक्षेपसंहारकरः स यस्मात् ।

तस्यातिवृद्धस्य शमाय नान्यद् बस्तेर्विना भेषजमस्ति किञ्चित् ॥ ८६ ॥

तस्माच्चिकित्सार्द्ध इति प्रदिष्टः कृत्स्ना चिकित्साऽपि च बस्तिरेकैः । बस्ति - प्रयोग की प्रशंसा – जो रोग शाखागत ( त्वचा तथा रक्त आदि धातुओं ), कोष्ठगत तथा मर्मस्थानों की विकृति द्वारा शरीर के सभी सिर आदि अवयवों में व्याप्त हो जाते हैं अथवा अंग - विशेष में व्याप्त होते हैं, उन सबकी उत्पत्ति में वातदोष के अतिरिक्त कोई दूसरा कारण नहीं होता है । क्योंकि मल, मूत्र, कफ, पित्त आदि शरीर के अन्य मलों को इधर - उधर करना तथा संहार ( शमन ) करना —ये सब वातदोष के कार्य हैं । अतः बढ़े हुए अथवा विकारयुक्त वातदोष की शान्ति के लिए बस्तिप्रयोग के अतिरिक्त और कोई चिकित्सा नहीं है । इसलिए बस्तिचिकित्सा को आधी चिकित्सा माना जाता है, कुछ आचार्य इसे सम्पूर्ण चिकित्सा स्वीकार करते हैं ॥ ८५-८६ ॥ तथा निजागन्तुविकारकारिरक्तौषधत्वेन शिराव्यधोऽपि ॥ ८७ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने बस्तिविधिर्नामैकोनविंशतितमोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ सिरावेध का महत्त्व — इसी प्रकार शारीरिक तथा आगन्तुज रोगों का उत्पादक होने के कारण विकृत रक्तधातु की प्रधान चिकित्सा सिरावेध है । शल्यतन्त्र में सिरावेध को आधी चिकित्सा अथवा दूसरे विद्वानों के मत में इसे सम्पूर्ण चिकित्सा भी कहा गया है ॥८७ ॥

वक्तव्य — सुश्रुत के अनुसार शल्यतन्त्र में सिरावेध को जिस प्रकार आधी चिकित्सा कहा गया है, वैसा ही महत्त्व कायचिकित्सा में बस्तिचिकित्सा का है । देखें — सु.शा. ८।२३ और च.सि. १।४० । इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय - सूत्रस्थान में बस्तिविधि नामक उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ १ ९ ॥

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विंशोऽध्यायः

अथातो नस्यविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ।

इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ॥

अब हम यहाँ से नस्यविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे । जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था । उपक्रम – पञ्चकर्मों के वर्णन - प्रसंग में क्रमशः वमन, विरेचन, अनुवासनबस्ति तथा निरूहणबस्तियों का वर्णन करने के बाद अब यहाँ नस्यविधि का वर्णन किया जा रहा है । इन्हीं पाँच कर्मों को पंचकर्म कहा जाता है । वमन - विरेचन के पूर्व किये जाने वाले स्नेहन तथा स्वेदन कर्म इन्हीं के उपांग अथवा पृष्ठपोषक अंग हैं । यह पञ्चकर्म - विधान एक ऐसा उपक्रम है, इसकी जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम ही कही जायेगी । आज चिकित्सक इसे भूल चुके हैं अथवा चिकित्सकों ने इस विधि की प्रायः उपेक्षा कर दी है; अथवा ऐसा कहें — इस कल -युग में इसके प्रयोग का किसी के पास समय ही नहीं है । जब समाज नहीं चाहता तो चिकित्सकों ने भी इसे भुला - सा दिया है । नस्य – नासिका शब्द को ' नस् ' आदेश तथा यत् प्रत्यय करने से ' नस्य ' शब्द की निष्पत्ति होती है । उक्त ‘ यत् ’ प्रत्यय ‘ हित ' अर्थ में प्रयुक्त है । इसके पर्याय हैं — नावन तथा नस्त । नासा को सिर का दरवाजा कहा गया है; अतएव नासिकाछिद्र द्वारा भीतर प्रवेश करायी गयी औषधि श्रृंगाटक नामक मर्म में पहुँचकर और वहाँ अपना प्रभाव दिखाकर सिर, नेत्र, श्रोत्र, कण्ठ आदि की सिराओं से दोषों को शीघ्र निकालती है । देखें शृंगाटक मर्म – अ. हृ. शा. ४८३४ तथा सु. शा. ६ । ७ । यह शृंगाटक सिरामर्म है । यही कारण है कि नस्य के प्रयोग से नेत्र, कर्ण, नासा, मुख एवं शिरो रोगों में शीघ्र लाभ होता है । सुश्रुत के अनुसार — ‘ औषधमौषधसिद्धो वा स्नेहो नासिकाभ्यां दीयत इति नस्यम् ' । ( सु.चि. ४०।२१ ) संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेत –च. सि. १, २, ९, सु. चि. ४० तथा अ. सं. सू. २ ९ में देखें । ऊर्ध्वजत्रुविकारेषु विशेषान्नस्यमिष्यते । नासा हि शिरसो द्वारं तेन तद्वयाप्य हन्ति तान् ॥ १ ॥

नस्य का वर्णन – जत्रु अस्थि ( Collar bone ) के ऊपरी भाग अर्थात् गरदन से लेकर ऊपर सिर तक के रोगों में नस्यकर्म विशेषरूप से लाभदायक होता है, क्योंकि नासिका के छिद्रों को शिरःप्रदेश का द्वार ( दरवाजा ) कहते हैं । अतः उस द्वार से दी गयी नस्य भीतरी अवयवों में व्याप्त होकर उन - उन अवयवों में होने वाले रोगों का विनाश कर देती है ॥१ ॥

विरेचनं बृंहणं च शमनं च त्रिधाऽपि तत् । नस्यकर्म के भेद — उक्त नस्यकर्म विधिभेद से तीन प्रकार का होता है— १. विरेचन — जो सिर में स्थित कफ आदि दोषों को नासिका के छिद्रों से बाहर निकाल देता है, इसे आप वमन कहें अथवा विरेचन । २. बृंहण — जो शिरःप्रदेश में स्थित समस्त अवयवों को पुष्ट करता है । ३. शमन — जो वात

आदि दोषों का शमन ( शान्ति ) करता है ।

विरेचनं शिरःशूलजाड्यस्यन्दगलामये ॥ २ ॥

शोफगण्डकृमिग्रन्थिकुष्ठापस्मारपीनसे विरेचन - नस्य का प्रयोग — शिरःशूल, बुद्धि, मन तथा नासिका आदि की जड़ता ( अकर्मण्यता ) में, अभिष्यन्द नामक नेत्ररोग में, गलरोगों ( शोथ, स्वरभेद आदि ) में, सूजन में, गलगण्ड में, क्रिमिरोगों