श्रीगणेशाय नमः।

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 81–90

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 81–90

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ऋतुचर्याध्यायः ३ ] सूत्रस्थानम् वसन्त ऋतुचर्या — शिशिर ऋतु में शीत की अधिकता के कारण स्वाभाविक रूप से कफदोष का संचय हो जाता है । वह कफदोष वसन्त ऋतु में सूर्य की किरणों से सन्तप्त होकर पिघलने लगता है, जिसके कारण पाचकानि मन्द पड़ कर अनेक प्रकार के ( प्रतिश्याय आदि ) रोगों को उत्पन्न कर देता है, अतः इस ऋतु में उस कफदोष को शीघ्र निकालने का प्रयत्न करे । ( वमन तथा रूक्ष नस्यों के प्रयोग से इसका निर्हरण करे । ) अन्यत्र कहा भी है— ' हेमन्ते चीयते श्लेष्मा वसन्ते च प्रकुप्यति ' । यहाँ हेमन्त शब्द के साहचर्य से शिशिर ऋतु का भी ग्रहण कर लेना चाहिए, क्योंकि दोनों की ऋतुचर्या प्रायः समान है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि हेमन्त शिशिर ऋतु में संचित कफदोष का प्रकोप वसन्त ऋतु में होता है । ) इसलिए कफदोष को निकालने के लिए तीक्ष्ण वमनकारक द्रव्यों द्वारा वमन करायें और तीक्ष्ण एवं रूक्ष औषधों का प्रतिदिन नस्य लें । लघु ( शीघ्र पचने वाले ) तथा रूक्ष ( स्नेहरहित ) भोजन करे । व्यायाम, उबटन, आघात ( दण्ड - बैठक ) का प्रयोग करें और कराये, जिससे बढ़ा हुआ कफदोष शान्त हो जाय ( अन्यत्र इस ऋतुचर्या में धूमपान, कवलग्रह का भी विधान है ) । उसके बाद स्नान करे; फिर कपूर, अगरु, चन्दन, कुंकुम का शरीर में अनुलेप लगाये ( तिलक करे ) । भोजन में पुराने जौ, गेहूँ की रोटी आदि बनाकर खाये, मधु का सेवन करे, जांगल देश के प्राणियों के मांस के बड़े बनवाकर खायें, जो लोहे की शलाका में पिरोकर पकाये जाते हैं, अतएव इन्हें ' शूल्य ' कहा जाता है । पान - विधि— पके हुए आम का रस निकाल कर, जिसे पहले प्रियतमा ने चखकर अपने प्रियतम को दिया हो, प्रिया के मुख की गन्ध से सुरभित, जिस पर प्रिया के नयनकमलों की छाया पड़ रही हो, जो मन को प्रिय लगने वाला हो, हृदय को शक्ति देने वाला हो; ऐसे आम के रस का मित्रमण्डली के साथ पान करे । ( ध्यान रहे, इन मित्रों के साथ - साथ पत्नी भी अवश्य रहे, नहीं तो ' प्रियानेत्रोत्पलाङ्कितान् ' यह विशेषेण व्यर्थ हो जायेगा ) । दोषरहित आसव, अरिष्ट, सीधु, मुनक्का द्वारा निर्मित सुरा तथा महुआ के आसव का सेवन भी मित्रों के साथ बैठकर उचित मात्रा में करे । अदरख का पानी, विजयसार तथा चन्दन का जल, मधुमिश्रित जल और नागरमोथा का क्वथित जल इनका भी सेवन करे ॥ १५-२२ ॥ वक्तव्य — ऊपर जो विस्तृत खान - पान व्यवस्था बतलायी है, इसका उद्देश्य यह है कि जिसे जो रुचिकर तथा प्रिय हो उसका वह सेवन करे । अदरख का पानी आदि सभी का क्वाथ कर लें, मध्वम्बु को केवल जल में घोलकर लें । यहाँ तक वसन्त ऋतु की प्रातः कालीन चर्या का वर्णन कर दिया गया है । दक्षिणानिलशीतेषु परितो जलवाहिषु ॥ २३ ॥

अदृष्टनष्टसूर्येषु मणिकुट्टिमकान्तिषु! परपुष्टविघुष्टेषु कामकर्मान्तभूमिषु ॥ २४ ॥

विचित्रपुष्पवृक्षेषु काननेषु सुगन्धिषु । गोष्ठीकथाभिश्चित्राभिर्मध्याह्नं गमयेत्सुखी ॥ २५ ॥

मध्याह्नचर्या – जो घने वन दक्षिण दिशा की वायु अर्थात् मलयज पवन से शीतल तथा सुगन्धित हों, जहाँ चारों ओर जलप्रवाह हो रहा हो, जहाँ सूर्य का प्रकाश थोड़ा पड़ रहा हो या वन के घने होने से न हो रहा हो, जहाँ हीरे - मरकत आदि के फर्श बने हों; इनकी कान्ति से युक्त वनों में, जहाँ कोयलें कूक रही हों, सहवास करने योग्य स्थानों में, जहाँ विविध प्रकार के सुगन्धित फूलों वाले वृक्ष हों, ऐसे वनों ( उद्यानों ) में सुख चाहने वाला पुरुष मित्रमण्डली की कथा - सुभाषित युक्त सभाओं द्वारा मध्याह्नकाल को बिताये ॥ २३-२५ ॥ गुरुशीतदिवास्वप्नस्निग्धाम्लमधुरांस्त्यजेत् वसन्त ऋतु में अपथ्य- - इस ऋतु में गुरु ( देर से पचने वाले भक्ष्य पदार्थ ), शीतल पदार्थ, दिन में सोना, स्निग्ध ( घी - तेल से बने हुए खाद्य ) पदार्थों, अम्ल तथा मधुर रस - प्रधान पदार्थों का सेवन न करें, क्योंकि ये सभी कफवर्धक होते हैं ।

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४६ अष्टाङ्गहृदये तीक्ष्णांशुरतितीक्ष्णांशुग्रष्मे सङ्क्षिपतीव यत् । २६ ॥ प्रत्यहं क्षीयते श्लेष्मा तेन वायुश्च वर्धते । अतोऽस्मिन्पटुकट्वम्लव्यायामार्ककरांस्त्यजेत् ॥ २७ ॥

ग्रीष्म ऋतुचर्या – ग्रीष्म ऋतु में तीक्ष्णांशु ( सूर्य ) अपनी तेज किरणों से संसार के जलीय तत्त्व को सुखा देता है । ( यहाँ एक दूसरा पाठभेद इस प्रकार मिलता है— ' स्नेहमर्कोऽतितीक्ष्णांशुः ' । यह पाठ अधिक स्पष्ट है, इससे भी चरकोक्त यह पाठ अधिक स्पष्ट है— ' मयूखैर्जगतः स्नेहं ग्रीष्मे पेपीयते रविः ' । ( च.सू. ६।२७ ) जिसके कारण शरीरस्थित जलीय अंश कफधातु का भी क्षय होने लगता है, फलतः वातदोष की वृद्धि होती जाती है । इसलिए इस ऋतु में लवण, कटु तथा अम्ल रस - प्रधान पदार्थों का, व्यायाम एवं धूप ( घाम ) का सेवन करना छोड़ दें ॥ २६-२७ ॥ भजेन्मधुरमेवान्नं लघु स्निग्धं हिमं द्रवम् । सेवनीय पदार्थ — इस ऋतु में अधिक मधुर आहारों का सेवन करे तथा लघु ( शीघ्र पच जाने वाले ), स्निग्ध ( घी - तेल से बने हुए ) पदार्थों, शीतल एवं पेयों का सेवन करे । वक्तव्य- - घी - तेल से बने पदार्थ गुरु होते हैं, अतः ' गुरूणामर्धसौहित्यम् ' अर्थात् गुरु पदार्थों को भरपेट न खाकर आधा ही खाना चाहिए, यह शास्त्र की आज्ञा है; नहीं तो पाठकों को सन्देह होगा कि ऊपर पहले लघु ( सुपच ) कहा है, फिर आगे स्निग्ध? सुशीततोयसिक्ताङ्गो लिह्यात्सक्तून् सर्शकरान् ॥ २८ ॥

सत्तू - सेवनविधि — अत्यन्त शीतल जल ( यह स्वभावशीतल जल पर्वतीय प्रदेशों में सुलभ होता है, कृत्रिम शीतल जल सर्वत्र मिल सकता है, किन्तु गुणवत्ता की दृष्टि से वह निकृष्ट होता है । देखें— ' हिमवत्प्रभवाः पथ्याः पुण्या देवर्षिसेविताः । च. सू. २७।२० ९ ) से स्नान करे, चीनी मिलाकर सत्तुओं को चाटे । ( चाटने योग्य बनाने के लिए उसमें शीतल जल मिला लें ॥। २८ ॥ मद्यं न पेयं, पेयं वा स्वल्पं, सुबहुवारि वा! मद्य सेवनविधि — इन दिनों मद्यपान न करे, यदि पीना ही हो तो थोड़ा पीयें अथवा उसमें बहुत - सा

जल मिलाकर पीयें । इतना भी वे पीयें जिन्हें यह अनुकूल पड़ता हो ।

अन्यथा शोषशैथिल्यदाहमोहान् करोति तत् ॥ २ ९ ॥

मद्यपान का निषेध — शास्त्रीय आज्ञा के विरुद्ध किया हुआ मद्यपान शोष ( क्षय ), पाठभेद के अनुसार शोफ = सूजन, शैथिल्य ( शिथिलता = अंगों में ढीलापन ), दाह ( जलन ), बेहोशी आदि विकारों को उत्पन्न कर देता है ॥ २ ९ ॥ कुन्देन्दुधवलं शालिमश्नीयाज्जाङ्गलैः पलैः । भोजन - विधान —कुन्द ( चमेली का एक भेद ' मोतिया ' ) के समान सफेद तथा इन्दु ( चन्द्रमा ) के समान शीतल ( शीतवीर्य ) शालिचावलों के भात को तीतर, बटेर आदि जांगलदेशीय प्राणियों के मांसरस

के साथ खाये ।

पिबेद्रसं नातिघनं रसालां रागखाण्डवौ ॥ ३० ॥

पानकं पञ्चसारं वा नवमृद्भाजने स्थितम् । मोचचोचदलैर्युक्तं साम्लं मृन्मयशुक्तिभिः ॥ ३१ ॥

पाटलावासितं चाम्भः सकर्पूरं सुशीतलम् । पेय - विधान — अधिक गाढ़े मांसरस का सेवन न करे । रसाला, राग ( रायता ), खाण्डव ( खट्टे, मधुर, नमकीन रसों के घोल ) का पान करे । पञ्चसार का सेवन करे, जो नये मिट्टी के पात्र में बनाया गया हो; इस पात्र की सोंधी गन्ध भी उसमें आ जाती है, उसे शीतल करने के लिए कुछ देर केले अथवा

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ऋतुचर्याध्यायः ३ ] सूत्रस्थानम् ४७ महुए के पत्तों से ढककर रखे हुए पन्ना या शर्बत को पीयें, जिसमें कुछ खटाई भी मिलायी गयी हो । इसे पीने के लिए मिट्टी का पुरवा या कुल्हड़ या कसोरा होना चाहिए । पीने से पहले इसे पाढ़ल के फूलों तथा कपूर से सुगन्धित कर लेना चाहिए ॥ ३०-३१ ॥ वक्तव्य- -इस प्रकरण में आये हुए भक्ष्य, भोज्य, पेय आदि पदार्थों का निर्माण - प्रकार भावप्रकाश के कृतान्नवर्ग में या पूर्ववर्ती संहिताग्रन्थों में देख लेना चाहिए । पञ्चसार- -इसका उल्लेख अ.हृ.चि. २।१३ में इस प्रकार दिया है — मधु, खजूर, मुनक्का, फालसा,

मिश्री तथा जल — इन पाँचों को मिलाकर बनाये गये मन्थ का दूसरा नाम ' पञ्चसार ' है ।

शशाङ्ककिरणान् भक्ष्यान् रजन्यां भक्षयन् पिबेत् ॥ ३२ ॥

ससितं माहिषं क्षीरं चन्द्रनक्षत्रशीतलम् । रात्रि में दुग्धपान - विधि — शशांककिरण नामक भोजनों का सेवन करते हुए चन्द्रमा तथा तारों द्वारा शीतल किया गया और मिश्री मिले हुए भैंस के दूध को पीये ॥ ३२ ॥

वक्तव्य — शशांककिरण नामक भोजन का परिचय — ' तालीसचूर्णबटकाः सकर्पूरसितोपलाः ।

शशाङ्ककिरणाख्याश्च भक्ष्या रुचिकराः परम् ' ( अ.हृ.चि. ५।४ ९ ) ।

अभ्रङ्कषमहाशालतालरुद्धोष्णरश्मिषु ॥ ३३ ॥

वनेषु माधवीश्लिष्टद्राक्षास्तबकशालिषु । मध्याह्नचर्या — दोपहर के समय धूप में पीड़ित मानव आकाश को छूने वाले अर्थात् बहुत ऊँचे बड़े - बडे शाल, ताल, तमाल वृक्षों से जहाँ सूर्य की किरणें छिप गयी हों तथा माधवीलताओं से परिवेष्टित, अंगूरों के गुच्छों से युक्त उपवनों में शयन या आराम करें ॥ ३३ ॥

वक्तव्य — यद्यपि इसी प्रकरण के ३६ वें पद्य में ' स्वप्यात् ' क्रिया का समावेश है, जिसका अध्याहार

यहाँ भी कर लिया गया है ।

सुगन्धिहिमपानीयसिच्यमानपटालिके ॥३४ ॥

कायमाने चिते चूतप्रवालफललुम्बिभिः । शयन - विधान — सुगन्धित एवं शीतल जल से बार - बार सींचे गये पटालिकाओं ( परदों ) वाले आमों के कोमल पत्तों एवं फलों की बन्दनवारों से सुसज्जित, कायमान ( जो ऊँचाई तथा चौड़ाई में निवास करने के इच्छुक नर - नारी के शरीर के नापवाले घर में तथा उसमें बिछे हुए विस्तर ) में सोयें ॥३४ ॥

वक्तव्य — ‘ कायमाने ' शब्द की यहाँ जो उपयोगिता है और जो उसका शाब्दिक अर्थ है, वह हमने ऊपर लिखा है । देखें — वी. एस. आप्टे कोश । श्री अरुणदत्त ने ' कायमाने ' शब्द का ‘ वेण्वादिनिष्पादिते गृहविशेषे ' यह जो अर्थ किया है, इस अर्थ को अभिव्यक्त करने की इसमें कितनी शक्ति है, इस पर विचार करना होगा । गर्मियों में बाँस के सहारे सरपत, घास- - फूँस के घर बनाये जाते हैं, पर उन्हें ' कायमान ' संज्ञा कब

किसने दी, यह विचारणीय है ।

कदलीदलकह्लारमृणालकमलोत्पलैः ॥ ३५ ॥

कोमलैः कल्पिते तल्पे हसत्कुसुमपल्लवे । मध्यन्दिनेऽर्कतापार्तः स्वप्याद्धारागृहेऽथवा ॥ ३६ ॥

पुस्तस्त्रीस्तनहस्तास्यप्रवृत्तोशीरवारिणि शयन - विधान — केले के पत्तों, सुगन्धित कहारों ( कमलभेदों ), मृणालों ( कमलकन्द = 1 बिसों ), कमलों, नीलकमलों से निर्मित तथा खिले हुए फूलों एवं मुलायम पत्तों से युक्त कोमल शयन = शय्या पर दोपहर की गर्मी से पीड़ित पुरुष सोए ( यही चर्या स्त्रियों के लिए भी है ) अथवा धारागृह के समीप शयन

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४८ अष्टाङ्गहृदये करे । जिस घर में शिल्पियों द्वारा स्त्री की आकृति की पुतलियाँ बनायी हों, उसके स्तनों, हाथों तथा मुख पर रखे गये खस से सुगन्धित जल बह रहा हो, तो ऐसे स्थान पर शयन करे ॥ ३५-३६ ॥ वक्तव्य — श्रीमानों के घरों की साज - सज्जा में ' पुरुष - स्त्री ' के जैसे अनेक प्रकार के चित्र किंवा मूर्तियाँ उनके शोभागृह में अथवा उद्यानों में देखी जाती हैं । यह भी विहार का एक प्राचीन प्रकार रहा

है । फूलों तथा किसलयों की शय्या रचाने का प्रकार भी प्राचीन ही है ।

निशाकरकराकीर्णे सौधपृष्ठे निशासु च ॥। ३७ ॥

आसना-रात्रिचर्या — रात के समय चूना पुते हुए महल ( सौंध ) की छत पर, जहाँ चन्द्रमा की चाँदनी छिटकी हो, वहाँ बैठना या लेटना चाहिए ॥ ३७ ॥

—स्वस्थचित्तस्य चन्दनार्द्रस्य मालिनः । निवृत्तकामतन्त्रस्य सुसूक्ष्मतनुवाससः ॥ ३८ ॥

जलार्द्रास्तालवृन्तानि विस्तृताः पद्मिनीपुटाः । उत्क्षेपाश्च मृदूत्क्षेपा जलवर्षिहिमानिलाः ॥

कर्पूरमल्लिकामाला हाराः सहरिचन्दनाः । मनोहरकलालापाः शिशवः सारिकाः शुकाः ॥

मृणालवलयाः कान्ताः प्रोत्फुल्लकमलोज्ज्वलाः । जङ्गमा इव पद्मिन्यो हरन्ति दयिताः क्लमम् ॥ मनोहर वातावरण- - इन दिनों चित्त को स्वस्थ बनाये रखें, चन्दन के लेप से शरीर को गीला करें, फूलों एवं रत्नों की माला को धारण करें, स्त्री - सहवास न करें, पतले एवं हलके वस्त्रों को धारण करें । पानी में भिगोये हुए ताड़ के पंखों की हवा का सेवन करें या कमल के पत्तों की हवा का सेवन करें या मोरपंखों की हवा ले, जो धीरे - धीरे हिलाये जा रहे हों; इन सभी प्रकार के पंखों से शीतल जल की बूँदें गिर रही हों तथा शीतल हवा आ रही हो, कपूर के घोल से सुवासित स्फटिक की मालाओं को धारण करे; इसी को मल्लिकामाला कहा गया है । हरिचन्दन से सुवासित मोतियों की मालाएँ धारण करें । चारों ओर तुतली वाणी बोलने वाले शिशु ( बालक - बालिकाएँ ) खेल रहे हों, सुग्गे ( तोते तथा मैनाएँ कलरव कर रही हों, कमलनाल के कंकण धारण की हुई तथा खिले हुए कमलों के समान उज्ज्वल मुखों वाली चलती - फिरती हुई कमलिनियों के सदृश नारियाँ ग्रीष्मकालजनित सुस्ती को दूर कर देती हैं ॥ ३८-४१ ॥ वक्तव्य — सम्पूर्ण ग्रीष्म ऋतु के वर्णन का सारांश यह है कि इन दिनों सभी प्रकार के आहार - विहार शीतल, सुगन्धित एवं मनोहर होने चाहिए । कालिदास ने इन दिनों को ' परिणामरमणीया दिवसाः ' कहा है अर्थात् सायंकाल का समय ही इन दिनों सुहावना लगता है । इस वर्णन को देखकर यह विश्वास होता है कि हमारे पूर्वज बहुत ही सम्पन्न एवं रसिक थे, अन्यथा इस प्रकार चित्रण करना और ऐसे साधन जुटा पाना वाणी से भी अगम ही होते हैं । आदानग्लानवपुषामग्निः सन्नोऽपि सीदति । वर्षासु दोषैर्दुष्यन्ति तेऽम्बुलम्बाम्बुदेऽम्बरे ॥ ४२ ॥

सतुषारेण मरुता सहसा शीतलेन च । भूबाष्पेणाम्लपाकेन मलिनेन च वारिणा ॥ ४३ ॥

वह्निनैव च मन्देन, तेष्वित्यन्योऽन्यदूषिषु । भजेत्साधारणं सर्वमूष्मणस्तेजनं च यत् ॥ ४४ ॥

वर्षाऋतुचर्या — आदानकाल ( शिशिर पहले से ही मन्द हुई अग्नि ( जठराग्नि ) इस ( मन्द पड़ जाती है, क्योंकि उक्त वे दोष जल पर तुषार युक्त अतएव शीतल वायु के स्पर्श के अम्लविपाक वाले होने से, इस काल में जाने से ( वे दोष ) कुपित होकर आपस में पर साधारण आहार - विहार, जो वात आदि उसका सेवन करे ॥ ४२-४४ ॥ , वसन्त, ग्रीष्म ) के प्रभाव से दुर्बल शरीर वाले प्राणियों की प्रावृट् एवं वर्षा ) ऋतु में वात आदि दोषों से और भी अधिक के भार से लटकते हुए बादलों द्वारा आकाश में छाये रहने से, पृथिवी में से निकलने वाली भाप के प्रभाव से, आहार होने वाले मैले जल के प्रयोग से तथा जठराग्नि के मन्द पड़ एक - दूसरे को दूषित करने लगते हैं । ऐसी स्थिति हो जाने दोषों का शमन करने वाला हो, साथ ही जठराग्निवर्धक हो,

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ऋतुचर्याध्यायः ३ ] सूत्रस्थानम् आस्थापनं शुद्धतनुर्जीर्णं धान्यं रसान् कृतान् । जाङ्गलं पिशितं यूषान् मध्वरिष्टं चिरन्तनम् ॥ मस्तु सौवर्चलाढ्यं वा पञ्चकोलावचूर्णितम् । दिव्यं कौपं शृतं चाम्भो भोजनं त्वतिदुर्दिने ॥ ४६ ॥

व्यक्ताम्ललवणस्नेहं संशुष्कं क्षौद्रवल्लघु ॥ शरीर शुद्धि — इस ऋतु के आरम्भ में वमन - विरेचन क्रियाओं द्वारा शरीरगत संचित दोषों का शोधन करके आस्थापन ( निरूहण ) बस्ति का सेवन करे । साधारण आहार — पहले खाये हुए भोजन के भलीभाँति पच जाने पर आगे निम्नोक्त पदार्थों का इन दिनों सेवन करें – पुराने जौ एवं गेहूँ आदि सुपच पदार्थों को खायें, अच्छी प्रकार पकाये गये तथा छौंके हुए मांसरस, हरिण आदि जांगलदेशीय प्राणियों का मांस, मूँग आदि दालों का जूस, पुराना मधु, पुराने आसव, अरिष्ट, मस्तु, सौवर्चल ( कालानमक ) युक्त अथवा पञ्चकोल ( पिप्पली, पीपलामूल, चव्य, चीता, नागरमोथा ) के चूर्ण को मिलाकर उक्त मांसों, मांसरसों, जूसों तथा आसवों का सेवन करें । जल— इन दिनों वर्षा का स्वच्छ जल ( जो आकाश से बरसते समय स्वच्छ पात्र में संग्रह किया हो ), कुआँ का जल अथवा पकाकर शीतल किये हुए जल का सेवन करें । दुर्दिन में जिस दिन आकाश में अत्यन्त बादल छायें हों, उस दिन पर्याप्त मात्रा में खट्टे रस वाले पदार्थों, नमकीन पदार्थों तथा स्निग्ध पदार्थों के साथ सूखा चबैना का सेवन करे । ये पदार्थ लघु होते हैं, अतः शीघ्र पच जाते हैं ॥ ४५-४६ ॥ अपादचारी सुरभिः सततं धूपिताम्बरः ॥ ४७ ॥

हर्म्यपृष्ठे वसेद्वाष्पशीतशीकरवर्जिते । सेवनीय विहार — इन दिनों नंगे पैरों से गीली भूमि में तथा कीचड़ में नहीं चलना चाहिए । इत्र आदि सुगन्धिन पदार्थों का प्रयोग करता रहे, वस्त्रों में अगुरु आदि की धूप देता रहे । छत के ऊपर चारों ओर से खुले कमरे में निवास करे, जहाँ पृथिवी से निकलने वाली भाप न हो, सर्दी न हो तथा वर्षा की बौछारें न पहुँचती हों ॥ ४७ ॥

वक्तव्य — ' हर्म्यपृष्ठे’– हर्म्य का अर्थ है राजाओं या श्रीमानों अथवा धनिकों का निवासगृह, उसका ‘ पृष्ठ ’ अर्थात् ऊपरी भाग, जिसे संस्कृत में ' अट्ट ' एवं हिन्दी में ' अट्टालिका ' कहते हैं । यह ' अट्ट ' या ' अट्टालिका '

हवादार कमरा होता है । श्रीवाग्भट ने इसी को ' हर्म्यपृष्ठे ' स्वीकारा है ।

नदीजलोदमन्थाहःस्वप्नायासातपांस्त्यजेत् ॥४८ ॥

त्याज्य विहार — इन दिनों नदी या नद के जलों तथा पतला मठा या छाँछ को न पीयें । सत्तू का सेवन न करें, दिन में न सोयें, अधिक परिश्रम न करें और धूप ( घाम ) का सेवन न करें ॥ ४८ ॥

वक्तव्य – वर्षा ऋतु में नदीजल का सामान्य रूप से निषेध किया गया है । इसकी विशेष जानकारी के लिए आप प्राचीन संहिताओं एवं परवर्ती निघण्टु - ग्रन्थों का अवलोकन कीजिये । भावप्रकाश निघण्टु वारिवर्ग ३२-३६ के अनन्तर भावमिश्र ने उसी प्रकरण में वृद्धसुश्रुत के वचनों को उद्धृत किया है उन्हें भी देखें — ६५-६७ । ‘ वर्षानादेयमुदकानाम् ' ( च.सू. २५।३ ९ ) । ' अनूपोऽहितदेशानाम् ' ( च.सू. २५/४० ) - चरक ने अहितकर देशों में अनूप देश की गणना की है । ध्यान रहे, वर्षा ऋतु में जाङ्गल देश तथा साधारण देश भी अनूपदेश का रूप धारण कर लेते हैं, अतः इन दिनों अत्यन्त सावधानी से रहकर अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखें । पहले तो कभी भी नंगे पैरों नहीं चलना चाहिए, फिर इन दिनों तो जूता पहनकर चले या सवारी से भ्रमण करें, अन्यथा ' अलस ' नामक पादरोग हो सकता है । देखें— सु. नि. १३।३२ । वर्षाशीतोचिताङ्गानां सहसैवार्करश्मिभिः । तप्तानां सञ्चितं वृष्टौ पित्तं शरदि कुप्यति ॥ ४ ९ ॥ तज्जयाय घृतं तिक्तं विरेको रक्तमोक्षणम् । X अ ० ह ०

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५० अष्टाङ्गहृदये शरद् ऋतुचर्या –वर्षा ऋतु में पानी से भीगे हुए अतएव शीततायुक्त प्राणियों के शरीरों में पित्त का संचय क्रमशः होता रहता है । उसके बाद शरद् ऋतु के आ जाने पर एकाएक सूर्य की तेज किरणों द्वारा तपे हुए प्राणियों के शरीरों में वर्षाकाल में संचित हुआ पित्त इस समय कुपित हो जाता है । उस पर विजय पाने के लिए अर्थात् वह किसी प्रकार के पित्तजनित विकारों को पैदा न कर दें, इसके लिए तिक्तघृत का सेवन, विरेचन तथा रक्तमोक्षण कराना चाहिए ॥ ४ ९ ॥ वक्तव्य — अ.हृ.चि. १ ९ में वर्णित तिक्तघृत अथवा महातिक्तघृत का सेवन करायें । चिकित्सक की

अनुमति से विरेचन तथा रक्तमोक्षण भी करायें ।

तिक्तं स्वादु कषायं च क्षुधितोऽन्नं भजेल्लघु ॥ ५० ॥

शालिमुद्गसिताधात्रीपटोलमधुजाङ्गलम् आहार - विधि— तिक्त, मधुर तथा कसैले रस - प्रधान पदार्थों को आहारकाल में भूख लगने पर थोड़ी मात्रा में खायें । शालि के चावल, मूँग, मिश्री या खाँड़, आँवला, परवल, मधु तथा जांगल प्राणियों के मांस या मांसरस का सेवन करें ॥ ५० ॥

तप्तं तप्तांशुकिरणैः शीतं शीतांशुरश्मिभिः ॥ ५१ ॥

समन्तादप्यहोरात्रमगस्त्योदयनिर्विषम् । शुचि हंसोदकं नाम निर्मलं मलजिज्जलम् ॥ ५२ ॥

नाभिष्यन्दि न वा रूक्षं पानादिष्वमृतोपमम् । हंसोदकसेवन - निर्देश – दिन में स्वाभाविक रूप से सूर्य की किरणों से तपा हुआ और रात्रि में चन्द्रमा की किरणों से शीतल अर्थात् सूर्य एवं चन्द्र की किरणों से सुसेवित तथा अगस्त्य तारा के उदय हो जाने से निर्विष ( दोषरहित ) अतएव पवित्र, निर्मल एवं दोषनाशक जल को ' हंसोदक ' कहते हैं । यह जल अभिष्यन्दकारक नहीं होता और न रूक्ष ही होता है । यह अमृत के समान गुणों वाला जल पीने योग्य होता है॥५१-५२ ॥ वक्तव्य - -'वर्षासु चीयते पित्तं शरत्काले प्रकुप्यति ' । ' हंसोदक ' को ही भावमिश्र ने ' अंशूदक ' कहा

है । इसका वर्णन भा.प्र. वारिवर्ग ६२-६३ में देखें ।

चन्दनोशीरकर्पूरमुक्तास्रग्वसनोज्ज्वलः ॥५३ ॥

सौधेषु सौधधवलां चन्द्रिकां रजनीमुखे । विहार - विधि—— रजनीमुख ( रात्रि होने के बाद एक - दो घण्टा तक आरम्भ ) में चन्दन, खस तथा कपूर का लेप लगाकर ( इन द्रव्यों का अलग - अलग या एक साथ भी लेप बनाया जा सकता है ), मोतियों की माला धारण कर, साफ - सुथरे वस्त्र पहन कर, चूना से पुते हुए भवन की ऊपरी छत पर बैठकर चूना के सदृश उज्ज्वल चाँदनी का सेवन करें ॥ ५३ ॥

वक्तव्य – सायंकाल छत में बैठकर चाँदनी का सेवन करें । यह कुछ ही रात्रियों में मिल सकता है, शेष दिनों सायंकालीन हवा का सेवन है कि रात होते ही एक - दो घण्टा तक छत पर बैठने का सुख लिया गिरने लगती है । यह हानिकारक होती है, इसका सेवन न करें । तुषारक्षारसौहित्यदधितैलवसातपान् तीक्ष्णमद्यदिवास्वप्नपुरोवातान् परित्यजेत् 1. अपथ्य - निषेध - इस ऋतु में निम्नलिखित दस वस्तुओं का सेवन न लाभ पूर्णिमा के आस - पास की करें । ' रजनीमुखे ' शब्द का तात्पर्य जा सकता है, उसके बाद ओस ॥५४ ॥

। करें, ये अपथ्य होते हैं —१. ओस, २. क्षार पदार्थ, ३. भरपेट भोजन करना, ४. दही, ५. तेल, ६. वसा ( प्राणिज स्नेह के द्वारा पकाये गये पदार्थ ), ७. तेजधूप ( घाम ), ८. तीक्ष्ण मद्य, ९. दिन में सोना तथा १०. पूरब की ओर से बहने वाली वायु ॥ ५४ ॥

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ऋतुचर्याध्यायः ३ ] सूत्रस्थानम् ५१ शीते वर्षासु चाद्यांस्त्रीन् वसन्तेऽन्त्यान् रसान्भजेत् ॥ ५५ ॥

स्वादुं निदाघे, शरदि स्वादुतिक्तकषायकान् । शरद्वसन्तयो रूक्षं शीतं घर्मघनान्तयोः ॥ ५६ ॥

अन्नपानं समासेन विपरीतमतोऽन्यदा । संक्षिप्त ऋतुचर्या – विस्तार से कही गई ऋतुचर्या का अब यहाँ संक्षेप से वर्णन किया जा रहा है । शीतकाल ( हेमन्त तथा शिशिर ऋतु ) में और वर्षा ऋतु में आरम्भ के तीन ( मधुर, अम्ल, लवण ) रसों का सेवन करे । वसन्त ऋतु में अन्तिम तीन ( तिक्त, कटु, कषाय ) रसों का सेवन करें । ग्रीष्म ऋतु में विशेष करके मधुररस का सेवन करे । शरद् ऋतु में मधुर, तिक्त, कषाय रसों का सेवन करें । शरद् तथा वसन्त ऋतुओं में रूक्ष अन्न ( आहार ) तथा पेय लें । ग्रीष्म एवं घनान्त ( शरद् ) ऋतुओं में शीतगुण - प्रधान अन्न - पान का सेवन करें और हेमन्त, शिशिर, वर्षा ऋतुओं में उक्त ( रूक्ष, शीत ) के विपरीत स्निग्ध एवं उष्ण अन्नपान का सेवन करना चाहिए ॥ ५५-५६ ॥ वक्तव्य — श्री अरुणदत्त अपनी व्याख्या में ' अन्यदा ' का अर्थ ' हेमन्तशिशिरवसन्तवर्षाख्ये काले ' करते हैं, श्रीहेमाद्रि यहाँ मौन है । अन्य टीकाकार ' अन्यदा ' शब्द से हेमन्त, शिशिर एवं वर्षा ऋतुओं का ग्रहण करते हैं । ध्यान दें —– वर्षाकाल में जब वर्षा होती है तो मौसम उतनी देर था उतने दिनों तक शीतल हो जाता है, तब शीतकाल के समान इसके विपरीत जब वर्षा न हो और गर्मी पड़ रही हो तब ग्रीष्म या शरद् ऋतु के समान अन्नों ( आहारों ) तथा रसों का सेवन करना चाहिए । ज्यौतिष सम्मत ऋतुक्रम क्रम. राशि १. मीन, मेष २. वृष, मिथुन ३. कर्क, सिंह ४. कन्या, तुला ५. II वृश्चिक, धनु ६. II मकर, कुम्भ मास ऋतु चैत्र, वैशाख वसन्त ज्येष्ठ, आषाढ़ ग्रीष्म श्रावण, भाद्रपद वर्षा आश्विन, कार्तिक शरत् मार्गशीर्ष, पौष हेमन्त माघ, फाल्गुन शिशिर संशोधनोपयोगी ऋतुक्रम क्रम. राशि १. III मेष, वृष २. मिथुन, कर्क ३. II सिंह, कन्या ४. तुला, वृश्चिक ५. II धनु, मकर ६. I कुम्भ, मीन मास ऋतु वैशाख, ज्येष्ठ ग्रीष्म आषाढ़, श्रावण प्रावृट् भाद्रपद, आश्विन वर्षा कार्तिक, मार्गशीर्ष शरत् पौष, माघ हेमन्त फाल्गुन, चैत्र वसन्त

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५२ अष्टाङ्गहृदये वातादि दोषों की चय- - प्रकोप - प्रशम तालिका दोष वात संचय ग्रीष्म ऋतु मेष, वृष वैशाख, ज्येष्ठ मध्याह्नकाल प्रकोप प्रावृट् ऋतु मिथुन, कर्क आषाढ़, श्रावण अपराह्णकाल प्रशम शरद् ऋतु तुला, वृश्चिक कार्तिक, मार्गशीर्ष 1 अर्धरात्रिकाल पित्त कफ वर्षा ऋतु हेमन्त ऋतु सिंह, कन्या धनु, मकर भाद्रपद, आश्विन पौष, माघ दिन का चौथा पहर उषः काल शरद् ऋतु वसन्त ऋतु तुला, वृश्चिक कुम्भ, मीन कार्तिक, मार्गशीर्ष फाल्गुन, चैत्र अर्धरात्रिकाल पूर्वाह्णकाल वसन्त ऋतु प्रावृट् ऋतु कुम्भ, मीन मिथुन, कर्क फाल्गुन, चैत्र आषाढ़, श्रावण पूर्वाह्णकाल अपराह्नकाल नित्यं सर्वरसाभ्यासः स्वस्वाधिक्यमृतावृतौ ॥ ५७ ॥

रससेवन - निर्देश — सभी ऋतुओं में प्रतिदिन सभी ( छहों ) रसों का सेवन करना चाहिए तथा जिस - जिस ऋतु में जिन - जिन रसों के सेवन का विशेष निर्देश दिया गया है, उस - उस ऋतु में उस - उस रस का अधिक सेवन करना चाहिए ॥ ५७ ॥

वक्तव्य — ऊपर जो वाग्भट ने ' नित्यं सर्वरसाभ्यासः ' कहा है, इसका समर्थन महर्षि चरक इस प्रकार कर रहे हैं — ‘ सर्वरसाभ्यासो बलकराणाम् ' तथा ' एकरसाभ्यासो दौर्बल्यकराणाम् ' । ( च.सू. २५/४० ) अर्थात् मधुर आदि छहों रसों का प्रतिदिन सेवन करने से देह तथा इन्द्रियों का बल बढ़ता है, इसके विपरीत आचरण करने से बलहानि होती है । आज की भाषा में ये सभी रस विटामिनों से भरपूर हैं और इनसे शरीर के उन आवश्यक तत्त्वों की पूर्ति होती है, जिनकी प्रतिदिन शरीर को आवश्यकता पड़ती रहती है । ऋत्वोरन्त्यादिसप्ताहावृतुसन्धिरिति स्मृतः । तत्र पूर्वो विधिस्त्याज्यः सेवनीयोऽपरः क्रमात् ॥ असात्म्यजा हि रोगाः स्युः सहसा त्यागशीलनात् । इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने ऋतुचर्या नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

ऋतुसन्धि में कर्तव्य — दो ऋतु के जोड़ को ऋतुसन्धि कहते हैं । प्रथम ऋतु का अन्तिम सप्ताह और आने वाली ऋतु का प्रथम सप्ताह अर्थात् यह पन्द्रह दिन का समय ऋतुसन्धि है । इसमें क्रमशः पहले ऋतु की चर्या को छोड़ते हुए अगले ऋतु की चर्या का अभ्यास करना प्रारम्भ कर देना चाहिए । यदि आप पहली ऋतुचर्या को सहसा छोडकर दूसरी ऋतुचर्या को सहसा प्रारम्भ कर देंगे तो इस व्यतिक्रम से असात्म्यजनित रोग हो सकते हैं । ५८ ॥

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ऋतुचर्याध्यायः ३ ] सूत्रस्थानम् वक्तव्य — शारीरिक सन्धियों की भाँति ऋतुसन्धियों का भी ध्यान रखना पड़ता है । महाकवि भारवि ने भी कहा है — ‘ सहसा विदधीत न क्रियाम् ' ( किरात ) आप नियमानुसार दो महीनों से जिस ऋतु के अनुसार जिन खान - पानों का सेवन करते आ रहे हैं, यदि एकाएक उसे छोड़कर आप दूसरे खान - पानों का सेवन कर देंगे तो वे खान - पान आपको सात्म्य ( अनुकूल ) नहीं होंगे । अतः प्रथम ऋतु के अन्तिम सप्ताह में पहले क्रम को छोड़ता हुआ आने वाली ऋतु के प्रथम सप्ताह तक अगली खान - पानविधि को व्यवस्थित कर लेना चाहिए । इसी प्रकार वस्त्रों के परिवर्तन पर भी ऋतुसन्धियों में ध्यान दें । सात्म्य – ' उपशय ' अथवा ' सात्म्य ' ये परस्पर पर्यायवाची शब्द हैं । जो आहार - विहार, वेश - भूषा, देश जिस पुरुष को अनुकूल हो, वह उसके लिए सात्म्य कहा जाता है । महर्षि चरक ने सात्म्य का परिचय इस प्रकार दिया है — ' सात्म्यं नाम ' ' ' ' सात्म्यम् ' । ( च.वि. १।२० ) अर्थात् सात्म्य वह है जो अपने सर्वथा अनुकूल हो, इसी को ‘ उपशय ' कहते हैं । वह प्रवर, अवर, मध्य भेद से तीन प्रकार का होता है । वह पुनः विधि - भेद से सात प्रकार का होता है । जैसे — मधुर आदि रसों के भेद से छः प्रकार का और सभी रसों के योग से एक प्रकार का । इनमें सब रसों का सेवन ' प्रवरसात्म्य ' है । केवल किसी एक रस का सेवन ' अवरसात्म्य ' है । प्रवर तथा अवर के बीच वाले रस को ' मध्यसात्म्य ' कहते हैं । इन अवर तथा मध्य सात्म्य को छोड़कर क्रमशः प्रवरसात्म्य का सेवन करे । अन्यत्र चरक ने ‘ सात्म्य ' की परिभाषा इस प्रकार दी है— ' सात्म्यं नाम भवन्ति ' । ( च.वि. ८।११८ ) अर्थात् ‘ सात्म्य ' वह तत्त्व है जिसका लगातार सेवन करने से लाभ प्राप्त होता है । उसमें जो घी, दूध, तैल, मांस तथा मांसरस का सेवन करते हैं और सभी रसों के सेवन करने का जिन्हें अभ्यास है वे बलवान्, कष्टों को सहन करने की शक्ति वाले तथा दीर्घायु होते हैं और जो किसी एक रस का सेवन करते हैं, वे प्रायः थोड़े बलवाले, कष्टों को न सहने वाले, अल्पायु एवं निर्धन होते हैं । चरक ने एक ‘ ओकसात्म्य ' की भी चर्चा की है । देखें —च. सू. ६।४५ में । यहाँ ' ओक ' शब्द का अर्थ ‘ गंगाधर ' के अनुसार औचित्य है, शेष इसका अर्थ ' घर रूपी शरीर ' करते हैं । ऊपर जो मास - ऋतु - अयन के रूप में कालविभाजन किया गया है, उस परिधि के अनुसार शीत, उष्ण तथा वर्षाकाल के स्वरूप में अन्तर आ सकता है । अतः चिकित्सा के क्षेत्र में यह अन्तर घातक हो सकता है । इसलिए जब शीत प्रारम्भ हो जाय तब हेमन्त शिशिर की चर्या करनी चाहिए । इसी प्रकार गर्मी - बरसात के मौसमों के सम्बन्ध में भी समझें । जब सौरमास के अनुसार किसी ऋतु के लक्षण सम्पूर्ण रूप से परिलक्षित नहीं होते अथवा कम - ज्यादा दिखलाई दें, तो ये अशुभ लक्षण कहे जाते हैं । इससे जल, देश एवं काल में विकृति उत्पन्न हो जाती है; जिससे कोई - न - कोई रोग फैलने लगता है, जिसे सुश्रुत के शब्दों में ‘ मरक ' कहते हैं । देखें— सु. सू. ६।१७ तथा च.वि. ३११ - २३ तक में जनपदोद्ध्वंस का वर्णन । इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय - सूत्रस्थान में ऋतुचर्या नामक तीसरा अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥

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चतुर्थोऽध्यायः अथातो रोगानुत्पादनीयाध्यायं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः । अब यहाँ से रोगानुत्पादनीय नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे । इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था । उपक्रम — जिस प्रकार का आचरण ( आहार - विहार आदि ) करने से रोगों की उत्पत्ति न हो अथवा जिस अध्याय में कहे जाने वाला विषय रोगों की उत्पत्ति को रोकने के लिए हितकारक हो, उसका नाम है — ‘ रोगानुत्पादनीय ' अध्याय । चरक में उक्त आशय से कहे गये अध्याय का नाम है— ' नवेगान्धारणीय ' । ( च.सू. ७ ) इस विषय को श्रीवाग्भट ने इस प्रकार कहा है — ' न वेगितोऽन्यकार्यः स्यान्नाजित्वा साध्यमामयम् ' । ( अ.हृ.सू. २।१ ९ ) अर्थात् मल - मूत्र आदि के वेग के उत्पन्न हो जाने पर दूसरा कोई कार्य न करे, सबसे पहले उस उत्पन्न वेग का परित्याग करे आदि । सुश्रुत ने अपानवायु, मल - मूत्र, जृम्भा, अश्रु, छींक, उद्गार ( डकार ), वमन, इन्द्रिय ( शुक्र ) के तथा भूख, प्यास, श्वास एवं निद्रा के वेगों को रोकने से उदावर्त ( गैस्ट्रिक / Gastric ) रोग हो जाता है, ऐसा कहा है । देखें – सु. उ. ५५ / ४-५ । संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेत — च.सू. ७; च.वि. २६; सु. उ. ५५ तथा अ.सं.सू. ५ में देखें । वेगान्न धारयेद्वातविण्मूत्रक्षवतृट्क्षुधाम् । निद्राकासश्रमश्वासजृम्भाश्रुच्छर्दिरेतसाम् ॥ १ ॥

वेगों को न रोकने का निर्देश – अपानवायु, मल - मूत्र, छींक, प्यास, भूख, निद्रा, कास, श्रमजनित श्वास, जृम्भा ( जँभाई ), आँसू, छर्दि ( वमन ) तथा शुक्र के वेगों को नहीं रोकना चाहिए ॥१ ॥

वक्तव्य — इसी विषय को सुश्रुत ने भी उत्तरतन्त्र ५५।४-५ में कहा है । वास्तव में तेजी से जिसका प्रवाह हो उसे वेग कहते हैं । जैसे नदी के वेग को रोकने पर पानी उछल कर ऊपर की ओर को जाने लगता है, ठीक उसी प्रकार इन वेगों की भी स्थिति होती है; फलतः ' उदावर्त ' रोग की उत्पत्ति हो जाती है । उदावर्त का अर्थ होता है — उलटा घुमाव । जो वेग जिधर से निकलना चाहता है अथवा जो वेग जिस मार्ग से निकलता है, उधर रुकावट कर देने से वह उसके विपरीत किसी अन्य मार्ग से निकल जाता ही है । यदि किसी कारण नहीं निकल सका तो उससे अनेक प्रकार की हानियाँ हो सकती हैं, अतएव कहा गया है— ' वेगान् न धारयेत् ' । अधोवातस्य रोधेन गुल्मोदावर्तरुक्क्लमाः । वातमूत्रशकृत्सङ्गदृष्ट्यग्निवधहृद्गदाः ॥ २ ॥

अपानवायु के रोकने से हानि - इसके वेग को रोकने से गुल्म, उदावर्ते, उदरशूल तथा क्लम ( सुस्ती ) – ये रोग हो सकते हैं । अपानवायु, मूत्र तथा पुरीष की प्रवृत्ति में रुकावट आ सकती है । नेत्ररोग, अग्निवध ( मन्दाग्नि ) एवं हृद्रोग ( हृदय का जकड़ जाना ) हो सकता है ॥ २ ॥

वक्तव्य — कुछ संस्करणों में उक्त श्लोक के बाद एक पद्य और इस प्रकार का देखा जाता है — ' स्नेहस्वेदविधिस्तत्र वर्तयो भोजनानि च । पानानि बस्तयश्चैव शस्तं वातानुलोमनम् ' ॥ अर्थ स्पष्ट है । यही चिकित्सा - विषय अगले पद्यों में भी प्राप्त है । अतएव ऐसा लगता है कि निर्णयसागरीय इस प्रति में उक्त श्लोक को स्थान नहीं दिया होगा । आगे देखें इसी प्रकरण के श्लोक ६-७ । शकृतः पिण्डिकोद्वेष्टप्रतिश्यायशिरोरुजः । ऊर्ध्ववायुः परीकर्तो हृदयस्योपरोधनम् ॥ ३ ॥

मुखेन विप्रवृत्तिश्च पूर्वोक्ताश्चामयाः स्मृताः ।