श्रीगणेशाय नमः।

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 71–80

अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 71–80

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दिनचर्याध्यायः २ ] सूत्रस्थानम् ३५ याचकों की सम्मान -1 -विधि - अर्थियों ( याचकों ) को अपनी शक्ति के अनुसार कुछ देना चाहिए । उन्हें निराश नहीं लौटाना चाहिए, उनका अपमान न करे और न उन्हें झिड़कना ही चाहिए ॥२४ ॥

उपकारप्रधानः स्यादपकारपरेऽप्यरौ । उपकार का निर्देश — सदा सबका उपकार करना चाहिए, भले ही अपकार करने के लिए तैयार शत्रु ही सामने क्यों न हो, उसके प्रति भी उपकार करना चाहिए । वक्तव्य — सामान्य दृष्टिकोण है कि शत्रु के साथ अपकार ही करना चाहिए, किन्तु यहाँ तन्त्रकार का कथन उसके विपरीत है । उसका समर्थन इस प्रकार किया जा रहा है— जैसे वात आदि दोष रोगकारक होते हैं और जब वे सम अवस्था में होते हैं तो वे ' शरीरधारणात् धातवः ' कहे जाते हैं, अतएव वे दोष

भी हितकारक कहे जाते हैं ।

सम्पद्विपत्स्वेकमना, हेतावीर्येत्फले न तु ॥ २५ ॥

समभाव का निर्देश — सम्पत्ति ( सुख ) में तथा विपत्ति ( दुःख ) में समान भाव से रहे । किस कारण से सम्पत्ति मिली है और किस कारण से विपत्ति मिली है, इसका पता करे । जिस कारण से विपत्ति मिली है उस कारण से द्वेष करना चाहिए, न कि विपत्ति से द्वेष करे ॥ २५ ॥

वक्तव्य- - यह सम्पत्ति एवं विपत्ति अपने - पराये सब पर आती है । दूसरे की सम्पत्ति को देखकर जलना नहीं चाहिए और दूसरे की विपत्ति को देखकर प्रसन्न नहीं होना चाहिए; अपितु यदि आप सम्पन्न होना चाहते हैं, तो उस कारण का पता लगाइए और वैसा प्रयत्न कीजिए, जिससे आप भी सम्पन्न हो सकें, जलते रहने से कोई लाभ नहीं होता । काले हितं मितं ब्रूयादविसंवादि पेशलम् । मधुर भाषण - निर्देश – समय पर बोलें, हितकर बात कहें, थोड़ा ( युक्तियुक्त ) बोलें, ऐसी बात कहें जो अविसंवादि ( जिसका कोई विरोध न करे अर्थात् सत्य ) हो तथा पेशल ( मीठा वचन ) कहें । पूर्वाभिभाषी, सुमुखः सुशीलः करुणामृदुः ॥ २६ ॥

नैकः सुखी, न सर्वत्र विश्रब्धो, न च शङ्कितः । भाषण - विधि — पहले बोले ( यह प्रतीक्षा न करे कि जब वह बोलेगा तब मैं बोलूँगा ) अर्थात् मित्र के मिलते ही उसके बोलने से पहले मैं बोलूँगा, यह भाव मन में होना चाहिए और कुशल प्रश्न करने लगे । प्रसन्नचित्त, सभ्य व्यवहार करने वाला, दयालु, सरल स्वाभाव वाला, अकेला सुखी न रहे अर्थात् अपने बन्धु - बान्धव - इष्टमित्रों सहित सुखों का उपभोग करे । सबके साथ विश्वास न करे और सबके साथ अविश्वास भी न करे ॥ २६ ॥

न कञ्चिदात्मनः शत्रुं नात्मानं कस्यचिद्रिपुम् ॥ प्रकाशयेन्नापमानं न च निःस्नेहतां प्रभोः । विचारों को गुप्त रखें — न अपने को किसी का शत्रु और न दूसरे ने अपना अपमान किया हो, उसका तथा अपने स्वामी, राजा आदि की वर्णन किसी से न करे ॥ २७ ॥

जनस्याशयमालक्ष्य यो यथा परितुष्यति ॥

तं तथैवानुवर्तेत पराराधनपण्डितः ।

२७ ॥

को अपना शत्रु बतलाये । किसी अपने प्रति स्नेहहीनता का ही २८ ॥ घरच्छन्दानुवर्तन — दूसरे के मन का अभिप्राय समझकर जो व्यक्ति जिस प्रकार सन्तुष्ट होता हो, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए, उसे ' पराराधनपण्डित ' कहते हैं ॥ २८ ॥

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३६ अष्टाङ्गहृदये वक्तव्य- - पञ्चतन्त्र में इसी आशय का एक पद्य इस प्रकार आया है— ' लुब्धमर्थेन गृह्णीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा । मूर्खं छन्दानुरोधेन यथार्थत्वेन पण्डितः ॥ ' ( सूक्ति ) अर्थात् लोभी को पैसा देकर, क्रोधी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को जैसा वह कहता है वैसा ही मानकर और यथार्थ बात को कहकर पण्डित को

प्रसन्न करना चाहिए । यह लोकव्यवहार है ।

न पीडयेदिन्द्रियाणि न चैतान्यति लालयेत् ॥ २ ९ ॥

इन्द्रिय - व्यवहारविधि— आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों को रूप, शब्द आदि अपने - अपने विषयों का उपभोग करने से न रोके, परन्तु उन उन विषयों में उन्हें अत्यन्त लोलुप भी न होने दें॥२९ ॥

त्रिवर्गशून्यं नारम्भं भजेत्तं चाविरोधयन् । त्रिवर्ग - विरोध का निषेध - ऐसा कोई कार्य न करे जिससे त्रिवर्ग ( धर्म - अर्थ - काम ) की प्राप्ति

न हो अथवा त्रिवर्ग का विरोध होता हो ।

अनुयायात्प्रतिपदं सर्वधर्मेषु मध्यमाम् ॥ ३० ॥

सभी धर्मों का आचरण - सभी प्रकार के धर्मों में मध्यम मार्ग से चले, किसी धर्म का घोर समर्थक या घोर विरोधी न बने । यहाँ धर्म शब्द से आयुर्वेदोक्त सदाचार मार्ग में मध्यममार्ग पर चलें ॥ ३० ॥

नीचरोमनखश्मश्रुर्निर्मलाङ्घ्रिमलायनः । स्नानशीलः सुसुरभिः सुवेषोऽनुल्बणोज्ज्वलः ॥ ३१ ॥

शरीरशुद्धि के प्रकार — रोम ( लोम ), नख तथा श्मश्रु ( दाढ़ी - मोछ ) इन्हें अधिक न बढ़ायें, इन्हें काटते या कटवाते रहें । पैरों को स्वच्छ रखें, गुद आदि मलमार्गों को भी साफ रखना चाहिए । प्रतिदिन स्नान करें, सुगन्धित पदार्थों ( इत्र आदि ) का सेवन करें, सुन्दर वस्त्र धारण करें, उद्धत वेश न बनायें अर्थात् सभ्य पुरुषों के आचरणों का अनुकरण करें ॥ ३ ९ ॥ धारयेत्सततं रत्नसिद्धमन्त्रमहौषधीः । रत्न आदि का धारण- रत्न, सिद्ध मन्त्र तथा औषधद्रव्यों को धारण करना चाहिए । वक्तव्य- -रत्न – हीरा, माणिक्य, पुखराज, नीलम आदि । सिद्धमन्त्र – बला, अतिबला, अपराजिता आदि । महौषधि — सहदेवी आदि । इनको वैद्य तथा दैवज्ञ आदि के निर्देशानुसार बाँह तथा गला आदि में

धारण करना चाहिए ।

सातपत्रपदत्राणो विचरेद्युगमात्रदृक् ॥ ३२ ॥

छाता आदि धारण — छाता लगाकर चलें, जूता पहन कर चलें तथा चार हाथ आगे तक के मार्ग को देखते हुए चलें ॥ ३२ ॥

निशि चात्ययिके कार्ये दण्डी मौली सहायवान् । दण्ड आदि धारण— रात में यदि कोई आवश्यक कार्य आ जाय तो हाथ में लाठी लेकर चलें, सिर में पगड़ी बाँध लें या टोपी पहन लें और किसी को साथ में सहायता के लिए ले लें । वक्तव्य — ऐसे उपदेश या तो शास्त्र देते हैं अथवा माता - पिता, शुभचिन्तक । पञ्चतन्त्र में भी एक ऐसी कथा आयी है; यथा— - ' ' अपि का पुरुषो मार्गे द्वितीयः क्षेमकारकः ' । अर्थात् कैसा भी आदमी हो उसे

साथ ले लेना चाहिए, वह कल्याण करता ही है ।

चैत्यपूज्यध्वजाशस्तच्छायाभस्मतुषाशुचीन् ॥३३ ॥

नाक्रामेच्छर्करालोष्टबलिस्नानभुवो न च । गमन -1 -निर्देश - चैत्य ( देवता का स्थान, बौद्ध या जैन मन्दिर, समाधि ) पर न चढ़े, ध्वजा के डण्डा पर न चढ़े, निन्दित कर्म करने वाले पुरुष की छाया का स्पर्श भी न करे, भस्म ( राख ) तथा तुष ( भूसी ) के ढेर पर और अपवित्र स्थान पर न चढ़े और बालू एवं ढेलों के ढेर पर चढ़कर न चले ॥ ३३ ॥

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दिनचर्याध्यायः २ ] सूत्रस्थानम् ३७ नदीं तरेन्न बाहुभ्यां, नाग्निस्कन्धमभिव्रजेत् ॥ ३४ ॥

सन्दिग्धनावं वृक्षं च नारोहेद्दुष्टयानवत् । निषिद्ध कार्य — वेगवाली नदी या घहराती हुई नदी को बाँहों से तैरकर पार न करे । अग्निस्कन्ध ( आग के ढेर अथवा ज्वालामुखी ) के समीप न जाये । दूषित सवारी पर जैसे कोई नहीं चढ़ता उसी प्रकार सन्दिग्ध नौका ( जिसके डूब जाने का भय हो ) उसमें न चढ़े और जिस वृक्ष का टूट कर गिर जाने का सन्देह हो उस पर भी न चढ़े ॥ ३४ ॥

नासंवृतमुखः कुर्यात्क्षुतिहास्यविजृम्भणम् ॥ ३५ ॥

छींक आदि करने की विधि – मुख को ढके बिना न छींके, न हँसे और न जँभाई ले ( यह शिष्टाचार है ) ॥ ३५ ॥

नासिकां न विकुष्णीयान्नाकस्माद्विलिखेद्ध्रुवम् । नाङ्गैश्चेष्टेत विगुणं, नासीतोत्कटकश्चिरम् ॥ आंगिक चेष्टाओं का निषेध - अकारण नासिका के छिद्रों को अँगुली से न खोदे । अकारण भूमि को अँगुलियों से न खोदे ( यह लक्षण विषदाता का कहा गया है ) । टाँगों, बाँहों आदि से विकृत चेष्टाएँ न करें; जैसे — मुख बिचकाना, आँखें मटकाना आदि तथा उत्कट आसन से पाँवों के बल न बैठे ॥ ३६ ॥

वक्तव्य — सुश्रुत ने भी इस प्रकार के भावों का निषेध किया है । देखें – सु. चि. २४।९ ५ । देहवाक्चेतसां चेष्टाः प्राक् श्रमाद्विनिवर्तयेत् । नोर्ध्वजानुश्चिरं तिष्ठेत्— शारीरिक आदि चेष्टाओं की मात्रा —शरीर, मन तथा वाणी की चेष्टाओं ( इनके कार्यों ) को थकान होने से पहले ही रोक देना चाहिए ( इस विषय को वाग्भट ने सद्वृत्त में दिया है, चरक ने इसे व्यायाम के लक्षणों में कहा है ) और चिरकाल तक जाँघों को ऊपर की ओर उठाकर लेटा न रहे । — नक्तं सेवेत न द्रुमम् ॥ ३७ ॥

तथा चत्वरचैत्यान्तश्चतुष्पथसुरालयान् । सूनाटवीशून्यगृहश्मशानानि दिवाऽपि न ॥३८ ॥

अन्य सदाचार — रात्रि में वृक्ष के नीचे न रहे तथा चत्वर ( तिमुहानी ), चैत्य के समीप या भीतर, चतुष्पथ ( चौराहा या चौमुहानी ) पर, देवमन्दिर या मद्यशाला में, सूना ( कसाईघर अथवा फाँसी देने के ) स्थान पर, घोर वन में, सुनसान घर में तथा श्मशान में दिन में भी न रहे ॥ ३७-३८ ॥ वक्तव्य — ' रात में पेड़ के नीचे न रहे ' – इस वाक्य के समर्थन में श्री अरुणदत्त कहते हैं— ' उस वृक्ष के आश्रय में रहने वाले कीड़ों के मल - मूत्र गिरने से रक्षा होगी । आज का विज्ञान कहता है कि रात्रि वृक्ष ‘ कार्बन - डाई - आक्साइड ’ गैस को छोड़ते हैं, अतः उनसे दूर रहना चाहिए । क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है । उक्त ३८ वें श्लोक में ‘ चत्वर ' तथा ' चतुष्पथ ' दो एकार्थवाचक शब्दों का समावेश हुआ है, अतः इसकी संगति बैठाने के लिए विद्वान् टीकाकारों ने ' चत्वर ' का अर्थ ' तिमुहानी ' किया है । उसका आधार यह है — ‘ चत्वरं स्यात् पथां श्लेषे ' इति हैमः । अर्थात् मार्गों का संगम एकाधिक का हो ही सकता है । फिर भी हमारे विचार से यहाँ ' चत्वर ' का अर्थ — स्थण्डिल या आँगन तिमुहानी से अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है । इसी तथ्य को श्री अरुणदत्त ने भी स्वीकार करते हुए कहा है — ' अन्ये त्वाहु: - -यत्र प्रदेशे नगरनिवासिनो ग्राम्या वा समेत्य नानाविधाः कथाः कुर्वन्ति, स चत्वर उच्यते ' । सुरालयान्– ' सुर + आलयान् ’ = देवगृह या मन्दिर । ‘ सुरा + आलयान् ' = मद्यशाला या मधुशाला । ये दो अर्थ उक्त विग्रहों के आधार पर किये गये हैं । सर्वथेक्षेत नादित्यं, न भारं शिरसा वहेत् । नेक्षेत प्रततं सूक्ष्मं दीप्तामेध्याप्रियाणि च ॥ ३ ९ ॥

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३८ अष्टाङ्गहृदये अन्य सदाचार —सूर्य को एकटक होकर देखता न रहे, सिर पर बोझ रखकर न ले जाये; सूक्ष्म, चमकीले, अपवित्र तथा अप्रिय पदार्थों को लगातार देखना न रहे ॥ ३ ९ ॥ वक्तव्य — सूर्य को कब न देखे, इस सम्बन्ध में मनुस्मृति का वचन देखें— ' उदय तथा अस्त होते हुए, ग्रहणकाल में, जल में प्रतिबिम्बित, आकाश के मध्य में स्थित सूर्य को न देखें । ( मनु. ४ \ ३७ ) मद्यविक्रयसन्धानदानादानानि नाचरेत् । मद्य - विक्रय आदि का निषेध - मद्य का विक्रय न करे, मद्य का सन्धान ( निर्माण ) भी न करे और उसका लेन - देन ( व्यापार ) भी न करे तथा उसे पीना भी नहीं चाहिए; केवल ' औषधार्थे सुरां पिबेत् ' । पुरोवातातपरजस्तुषारपरुषानिलान् ॥ ४० ॥

अनृजुः क्षवथूद्गारकासस्वप्नान्नमैथुनम् । कूलच्छायां नृपद्विष्टं व्यालदंष्ट्रिविषाणिनः ॥ ४१ ॥

हीनानार्यातिनिपुणसेवां विग्रहमुत्तमैः । सन्ध्यास्वभ्यवहारस्त्रीस्वप्नाध्ययनचिन्तनम् ॥ ४२ ॥

शत्रुसत्रगणाकीर्णगणिकापणिकाशनम् । गात्रवक्त्रनखैर्वाद्यं हस्तकेशावधूननम् ॥ ४३ ॥

तोयाग्निपूज्यमध्येन यानं धूमं शवाश्रयम् । मद्यातिसक्तिं विश्रम्भस्वातन्त्र्ये स्त्रीषु च त्यजेत् ॥ अन्य निषिद्ध कर्म – पूर्व दिशा की ओर से बहने वाली वायु का, सामने से आने वाली वायु का, धूप का, धूलि का, तुषार ( ओस तथा बर्फ ) का तथा झोंके से चलने वाली वायु ( आँधी ) का सेवन न करे । जब शरीर की स्थिति सीधी न हो ऐसी अवस्था में न छींके, न डकार ले, न खाँसे, न सोये, न खाना खाये और न मैथुन करे । कूल ( नदी का किनारा ) की छाया में न बैठे, राजा के शत्रु का साथ न करे । सर्प से, दाँतों से काटने वाले कुत्ता आदि प्राणियों से दूर रहे । सींग से मारने वाले साँड़, भैंसा आदि प्राणियों से सदा दूर रहे । नीच, अनार्य ( अधम या कमीना ), अतिनिपुण ( दुष्ट, शैतान ) व्यक्तियों की सेवा ( नौकरी ) न करे । उत्तम ( अपने से बलवान् अथवा सदाचार युक्त ) पुरुषों से झगड़ा ( वैर ) न करे । सन्ध्याकाल में भोजन, स्त्रीसहवास, सोना, अध्ययन आदि किसी विषय का विचार न करे । यह समय भगवद्भजन करने का होता है । शत्रु का, यज्ञ का, गण ( समुदाय या समाज ) का, आकीर्ण ( इधर - उधर बिखरा हुआ ), गणिक ( वेश्याओं ) का तथा पणिक ( दुकान, होटल आदि ) का भोजन न करे । ( च.सू. ८ | २० के अनुसार आकीर्ण का अर्थ — बहुजनाकीर्ण है । ) गात्र ( काँख, ताली आदि ) से, मुख से तथा नाखूनों से बाजा बजाने की नकल न करें । हाथों को हिलाना एवं बालों का अवधूनन ( कम्पन ) न करे । ( प्रायः हाथों तथा केशों का कम्पन यह लक्षण उन्मादरोगियों में देखा जाता है । चेतन अवस्था में ये कृत्य शिष्टाचार के विरुद्ध हैं । ) जल, अग्नि तथा पूज्यर्जनों के बीच में से होकर इधर - उधर नहीं जाना चाहिए । ( इस विषय को चाणक्य ने इस प्रकार कहा है— ' विप्रयोर्विप्रवह्नयोश्च दम्पत्योः स्वामिभृत्ययोः । अन्तरेण न गन्तव्यं हलस्य वृषभस्य च ’ ॥— चाणक्यनीति ) श्मशान में चिता के धुँआ से दूर रहे, मद्य ( मादक पदार्थों के सेवन ) का अभ्यासी न बने । स्त्रियों का विश्वास न करे और इन्हें स्वतन्त्रता प्रदान न करे, क्योंकि ' प्रायः साहसिकाः स्त्रियः ' ॥ ४०-४४ । वक्तव्य — ऊपर कहा गया सद्वृत्त सत्पुरुषों तथा कुलांगनाओं के आचरण का लेखा - जोखा है । प्रतिदिन के आचरण में उक्त उपदेशों का समावेश अवश्य कर लेना चाहिए । सद्वृत्त में कहे गये विषयों के लिए च.सू. ५ तथा ८ को और सु. चि. २४ को देखें । यहाँ कहा गया सम्पूर्ण वृत्त सद्धर्म है । इनका व्यावहारिक प्रयोग मनुष्य को सदाचारी एवं सज्जन बनाता है, जिससे समाज उसका आदर करता है और परलोक में उसे शुभ गति प्राप्त होती है । आचार्यः सर्वचेष्टासु लोक एव हि धीमतः । अनुकुर्यात्तमेवातो लौकिकेऽर्थे परीक्षकः ॥ ४५ ॥

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दिनचर्याध्यायः २ ] सूत्रस्थानम् ३ ९ अन्य सदुपदेश — सभी प्रकार के सांसारिक व्यवहारों को सीखने के लिए बुद्धिमान् मानव का सम्पूर्ण संसार ही आचार्य ( गुरु ) है, फिर भी सांसारिक अर्थ ( स्वार्थ तथा परार्थ ) की परीक्षा ( क्या करने में हित है और क्या करने में अहित है, इस प्रकार का विचार ) करने वाला मनुष्य संसार का अनुकरण करे ॥ ४५ ॥

वक्तव्य — भगवान् पुनर्वसु ने उक्त विषय में अत्यन्त स्पष्ट निर्देश इस प्रकार दिया है— ' कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमताम् आचार्यः, शत्रुश्च अबुद्धिमताम् ' ( च.वि. ८ | १४ ) अर्थात् समझदार नर- र - नारियों के लिए सम्पूर्ण संसार आचार्य ( गुरु या उपदेशक ) है, क्योंकि वे उससे अच्छी बातें सीखते हैं और नासमझ लोग उससे बुरी बातें सीखते हैं, अतः संसार को उनका शत्रु कहा गया है । → SadvRatam आर्द्रसन्तानता त्यागः कायवाक्चेतसां दमः । स्वार्थबुद्धिः परार्थेषु पर्याप्तमिति सद्व्रतम् ॥ ४६ ॥

सदाचार - सूत्र — सभी प्राणियों पर दयालु होना, दान देना, शरीर, मन तथा वाणी पर नियन्त्रण रखना अर्थात् इन्हें स्वतन्त्र न छोड़ना तथा दूसरों के अर्थों में स्वार्थबुद्धि रखना ( उन्हें भी अपने ही जैसा समझना ) यह सूत्र रूप में पूर्ण सदाचार माना गया है ॥ ४६ ॥

नक्तंदिनानि मे यान्ति कथम्भूतस्य सम्प्रति । दुःखभाङ्न भवत्येवं नित्यं सन्निहितस्मृतिः ॥ ४७ ॥

विचार - पद्धति — आजकल मेरे रात - दिन कैसे बीत रहे हैं, मैं कैसा होता जा रहा हूँ? इस प्रकार का प्रतिदिन ध्यानपूर्वक विचार करने वाला पुरुष कभी दुःखी नहीं होता है ॥४७ ॥

वक्तव्य — महर्षि चाणक्य ने भी इसी प्रकार सोचने के लिए मनुष्य को बाध्य किया है— ' क: काल: कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ । कस्याऽहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ' ॥ ( चाणक्यनीति ) इस प्रकार विचार करने वाला पुरुष अज्ञानवश हुई अपनी भूलों को सुधार सकता है । इसका परिणाम यह होता है कि वह कभी दुःखी नहीं होता ।

इत्याचारः समासेन, यं प्राप्नोति समाचरन् ।

आयुरारोग्यमैश्वर्यं यशो लोकांश्च शाश्वतान् ॥ ४८ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने दिनचर्या नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

* सदवृत्त का उपसंहार — इस प्रकार संक्षेप से आचार ( सदाचार अथवा सद्वृत्त = सज्जनों का कर्तव्य ) कह दिया गया है । जिसका अपने जीवन में आचरण करता हुआ पुरुष ( नर - नारी ) दीर्घायु, आरोग्य ( उत्तम स्वास्थ्य ), ऐश्वर्य ( धन - सम्पत्ति ), सुयश तथा स्वर्ग आदि सनातन लोकों को प्राप्त करता है ॥ ४८ ॥

वक्तव्य- - इस अध्याय में मनुष्यों के हित के लिए सदाचार का संक्षेप से वर्णन किया गया है । यही मनुष्यों का प्रथम अथवा परम धर्म है । इसके सम्बन्ध में मनु ने कहा है । देखें - मनु. १।१०८ - ११०। इस सदाचार रूपी धर्म से धन - सम्पत्ति की प्राप्ति होती है, इससे सुख मिलता है और इसी से रोगों का नाश होता है । लोक में व्याप्त अन्य धर्मों से सदाचार नामक धर्म सर्वोत्तम हैं । इसका सेवन करने से मानव - जीवन सफल हो जाता है और इसका आचरण न करने से मनुष्य का विनाश हो जाता है । अतः सभी को सदाचार का सेवन करना चाहिए । इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय - सूत्रस्थान दिनचर्या नामक दूसरा अध्याय समाप्त ॥ २ ॥

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तृतीयोऽध्यायः अथात ऋतुचर्याध्यायं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः । अब यहाँ से हम ऋतुचर्या नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे, जैसा कि इसके सम्बन्ध में आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था । उपक्रम — चर्या शब्द का व्याख्यान हमने ' दिनचर्या ' प्रकरण में कर दिया था । अब यहाँ ' ऋतु ' = दो - दो मास के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष को छः भागों में जो बाँटा गया है उनमें किस प्रकार का आहार - विहार होना चाहिए, इस अध्याय में उस विषय का वर्णन किया जायेगा । संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेत — च.सू. ६; च.वि. ८; सु.सू. ६; सु.चि. २४ तथा सु.उ. ६४ एवं अ.सं. ४ में देखें । मासैर्द्विसङ्ख्यैर्माघाद्यैः क्रमात् षडृतवः स्मृताः । शिशिरोऽथ वसन्तश्च ग्रीष्मो वर्षाः शरद्धिमाः ॥ शिशिराद्यास्त्रिभिस्तैस्तु विद्यादयनमुत्तरम् । आदानं च, तदादत्ते नृणां प्रतिदिनं बलम् ॥२ ॥

छः ऋतुएँ — माघ आदि दो - दो महीनों से क्रमशः छः ऋतुएँ होती हैं । यथा - १. माघ - फाल्गुन: शिशिर ऋतु, २. चैत्र - वैशाख: वसन्त ऋतु, ३. ज्येष्ठ - आषाढ़: ग्रीष्म ऋतु, ४. श्रावण - भाद्रपद: वर्षा ऋतु, ५. आश्विन-कार्तिक: शरद् ऋतु और ६. मार्गशीर्ष पौष: हेमन्त ऋतु । उत्तरायण तथा आदानकाल — शिशिर, वसन्त तथा ग्रीष्म नामक तीन ऋतुओं में होने वाले छः मासों का नाम ‘ उत्तरायण ' है; इसी का दूसरा नाम है— ' आदानकाल ' । क्योंकि इन दिनों में यह काल अपनी प्रकृति से प्रतिदिन प्राणियों के बल को लेता रहता है अर्थात् उनके बल का अपहरण करता रहता है॥१-२ ॥ वक्तव्य — तन्त्रकारों की व्याख्यान - सरणियाँ भिन्न - भिन्न होती हैं, तथापि निष्कर्ष प्रायः समान होते हैं । यहाँ छः ऋतुओं तथा उत्तरायण की चर्चा की गयी है । यह भारत वर्ष भाग्यवान् देश है, यह ऋतु आदि की विविधता यहाँ के निवासियों का ही सौभाग्य है, अन्यत्र ऐसा नहीं है । इसके लिए आप विश्व के भूगोल का अध्ययन करें, अस्तु । सम्पूर्ण वर्ष में १२ मास, ६ ऋतुएँ और २ अयन होते हैं । यह कालविभाग सौरमासों के अनुसार कहा गया है । ज्यौतिष के अनुसार वर्षभर में चान्द्रमासों की भी सत्ता स्वीकार की गयी है । तदनुसार प्रति तीसरे वर्ष १ मास बढ़ जाता है, क्योंकि चान्द्रमास २७ या २८ दिन का होता है, किन्तु ऋतु- [ -विभाजन सौरमासों के अनुसार ही होता है । उक्त चान्द्रमास को समझने के लिए आप देखें — ‘ तैश्चतुर्भिरहोरात्रिश्च, पञ्चदशाहोरात्राः पक्षः । पक्षद्वयं मासः । स शुक्लान्तः ' । ( अ.सं.सू. ४१४ ) अर्थात् ४ पहर का दिन और ४ पहर की रात्रि होती है, जिसे मिलाकर १ दिन होता है । १५ दिनों का एक पक्ष होता है, यह कृष्ण तथा शुक्ल भेद से माना गया है । २ पक्षों का एक मास होता है, शुक्लपक्ष की ' पूर्णिमा ' के दिन इस मास की पूर्ति होती है । सूर्यसिद्धान्त के मध्याधिकार श्लोक १२-१३ के अनुसार मास ( महीना ) दो प्रकार का होता है— १. चान्द्र ( ऐन्दव ) मास — इसकी गणना प्रतिपदा से अमावास्या तक १५ दिन का कृष्णपक्ष और पुनः प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १५ दिन का शुक्लपक्ष, दोनों को मिलाकर एक मास । २. सौरमास — इसकी गणना मेष ( वैशाख ),

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ऋतुचर्याध्यायः ३ ] सूत्रस्थानम् वृष ( ज्येष्ठ ) आदि राशियों के अनुसार होती है । इस प्रकार भिन्न - भिन्न राशियों पर सूर्य के संक्रमण को मेषसंक्रान्ति आदि कहते हैं । सुश्रुत का दृष्टिकोण — ' इह तु ' ' ' ' प्रावृडिति ' । ( सु.सू. ६।१० ) अर्थात् यहाँ वर्षा, शरद्, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म, प्रावृट् ये छ: ऋतुएँ वात आदि दोषों के संचय, प्रकोप, प्रशमन में कारण हैं । उक्त छः ऋतुएँ भाद्रपद आदि दो - दो मासों को लेकर इस प्रकार मानी गयी है—- १. वर्षा — भाद्रपद - आश्विन, २. शरद्— कार्तिक - मार्गशीर्ष, ३. हेमन्त – पौष - माघ, ४. वसन्त – फाल्गुन - चैत्र, ५. ग्रीष्म —– वैशाख - ज्येष्ठ तथा ६. प्रावृट् — आषाढ - श्रावण | महर्षि सुश्रुत शल्यशास्त्र के आचार्य थे, अतएव उन्होंने वात, पित्त एवं कफ दोषों के संचय, प्रकोप, प्रशम को दृष्टि में रखकर इस प्रकार ऋतुक्रम को व्यवस्थित किया है । कायचिकित्सा - प्रधान चरकसंहिता में ‘ प्रावृट् ’ नामक ऋतु को स्वीकार न करके अपने क्रम से ' शिशिर ऋतु को माना है । देखें — च.सू. ६।४ । फिर भी चरक ने संशोधन - चिकित्सा को ध्यान में रखकर ' प्रावृट् ' ऋतु की सत्ता को स्वीकारा है । देखें — च. वि. ८।१२५ । मतभेद का समाधान - हमारे ये तन्त्रकार नीरजस्तम, आप्त, शिष्ट, विबुद्ध थे, अतएव इनके सिद्धान्त तीनों काल में मानने योग्य होते हैं, फिर भी जहाँ मतभेद होता है उसका कारण भी होता है । देखें - जिन देशों ( भूखण्डों ) में ठण्ड अधिक पड़ती है वहाँ हेमन्त तथा शिशिर हैं और जहाँ वर्षा अधिक होती है वहाँ प्रावृट् तथा वर्षा नाम की दो में हिमालय के कई भाग ऐसे भी हैं जहाँ वर्षभर सर्दी बनी रहती जहाँ वर्षा अधिक होती है तथा दक्षिण के कुछ देश ऐसे भी हैं जहाँ का अपना प्रभाव उन - उन स्थानों पर भी अवश्य पड़ता ही है । इसी सर्वेक्षण कर अधिकाधिक प्रभावकारी भूभागों को उक्त विभाजन की की दृष्टि से उपादेय है । नामक दो ऋतुएँ शीतकाल की होती ऋतुएँ मानी जाती हैं । हमारे भारतवर्ष है । आसाम आदि कुछ स्थान ऐसे हैं अधिक गर्मी पड़ती है; तथापि ऋतुओं दृष्टि से प्राचीन महर्षियों ने भौगोलिक सूक्ष्म दृष्टियों से देखा है, जो चिकित्सा सुश्रुत ने पहले ऋतुभेद से जिन वात आदि दोषों के चय, प्रकोप, प्रशम का वर्णन वर्षभर की अवधि में दिखलाया था, उसे दिन - रात के रूप में इस प्रकार कहा है— दिन के पूर्वार्ध में वसन्तऋतु ( कफप्रकोप ) के मध्याह्नकाल में, ग्रीष्मऋतु ( वातसंचय ) के अपराह्न में प्रावृट् ऋतु ( वातप्रकोप ) के प्रदोषकाल ( रात्रि के पूर्वभाग ) में वर्षाऋतु के ( पित्तसंचय ) के आधीरात में शरद् ऋतु ( पित्तप्रकोप ) के, रात्रि के अन्तिम भाग ( उषःकाल ) में हेमन्तऋतु ( कफसंचय ) के लक्षण होते हैं । इस प्रकार दिन - रात में भी दोषों क संचय, प्रकोप तथा प्रशम होता है । देखें — सु.सू. ६।१४ । तस्मिन् ह्यत्यर्थतीक्ष्णोष्णरूक्षा मार्गस्वभावतः । आदित्यपवनाः सौम्यान् क्षपयन्ति गुणान् भुवः । तिक्तः कषायः कटुको बलिनोऽत्र रसाः क्रमात् । तस्मादादानमाग्नेयम्— अग्निगुण - प्रधान आदानकाल — इस उत्तरायण काल में सूर्य के उत्तरमार्ग में चलने के कारण सूट की किरणें अत्यन्त तीक्ष्ण तथा उष्ण ( गरम ) हो जाती हैं । सूर्य की गरमी से तपी हुई हवाएँ भी उष्ण एवं रूक्ष हो जाती हैं अर्थात् लू चलने लगती है । अतएव ये दोनों ( सूर्य तथा हवा ) पृथ्वी के सौम्य ( शीतलत तथा गीलापन आदि ) गुणों को क्षीण ( नष्ट ) कर देते हैं । यही कारण है कि इन दिनों प्राणियों का भी शारीरिक बल क्षीण हो जाता है । इस उत्तरायण काल में क्रमशः शिशिर ऋतु में तिक्तरस, वसन्त ऋतु में कषाय रस और ग्रीष्म ऋतु में कटुरस बलवान् ( शक्तिशाली ) हो जाते हैं । यही कारण है कि यह आदानकाल आग्नेय ( अग्निगुण प्रधान ) कहा गया है ॥ ३ ॥

वक्तव्य — ‘ आदित्यपवनाः ' अर्थात् सूर्य की उष्णता से युक्त इधर - उधर बहती हुई हवाएँ इस काल में अपनी भयंकरता से युक्त रहती हैं । वास्तव में हवा का स्वभाव ही ऐसा होता है कि गर्मी में वही ' लू ' का रूप धारण कर लेती है और जाड़ों में सर्दी का । इस सम्बन्ध में चरक ने कहा है— ' वायु को

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४२ अष्टाङ्गहृदये योगवाही कहा गया है— जैसा उसे संयोग मिलता है, वैसा उसका स्वभाव हो जाता है ' । देखें — च.चि. ३।३८ । अग्निगुण - प्रधान आदानकाल का वर्णन चरक ने भी प्रायः इसी प्रकार किया है । देखें —च. सू. ६।६ । - ऋतवो दक्षिणायनम् ॥ ४ ॥

वर्षादयो विसर्गश्च-विसर्गकाल - दक्षिणायन — वर्षा, शरद् तथा हेमन्त नामक इन तीन ऋतुओं का नाम दक्षिणायन है, इसी का दूसरा नाम है ‘ विसर्ग काल ’ । क्योंकि ‘ विसृजति ददाति बलम् इति विसर्गः कालः’॥४ ॥

—यद्वलं विसृजत्ययम् । सौम्यत्वादत्र सोमो हि बलवान् हीयते रविः ॥ ५ ॥

मेघवृष्ट्यनिलैः शीतैः शान्ततापे महीतले । स्निग्धाश्चेहाम्ललवणमधुरा बलिनो रसाः ॥ ६ ॥

विसर्गकाल - परिचय —–— यह काल सौम्य होने के कारण प्राणिमात्र को बल देता है । इस काल में सौम्यगुणों वाला सोम ( चन्द्रमा ) बलवान् रहता है और सूर्य का बल क्षीण हो जाता है । इस काल में मेघों ( बादलों ) के छाये रहने के कारण, वर्षा के होते रहने से इन दोनों के कारण शीतल हवा के बहने से भूतल का सन्ताप शान्त हो जाता है । अतः वर्षा ऋतु में स्निग्ध गुण वाला अम्ल रस, शरद् ऋतु में लवण रस तथा हेमन्त ऋतु में मधुररस बलवान् हो जाते हैं । फलतः इस विसर्गकाल ( दक्षिणायन ) में प्राणियों के देह तथा उसका बल बढ़ जाता है, अतएव इसे ' विसर्गकाल ' कहते हैं॥५-६ ॥ वक्तव्य — ‘ वि + सृज् + घञ् = विसर्गः ' अर्थात् दान । यह काल प्राणियों को बल का विसर्जन करता है । चरक - सुश्रुत ने भी इस काल की प्रशंसा की है । शीतेऽग्रयं वृष्टिघर्मेऽल्पं बलं मध्यं तु शेषयोः । बल का चयापचय — शीत ऋतुओं ( हेमन्त तथा शिशिर ) में प्राणियों में बल की स्थिति उत्तम रहती है, शेष दो शरद् तथा वसन्त ऋतुओं में शारीरिक बल की स्थिति मध्यम कोटि की तथा वर्षा और ग्रीष्म ऋतुओं में बल की मात्रा अति अल्प हो जाती है । वक्तव्य — विसर्गकाल में क्रमशः बढ़ा हुआ शारीरिक बल आदानकाल में क्रमशः उस प्रकार घटता जाता है, जैसे शुक्लपक्ष में क्रमशः बढ़ा हुआ चन्द्रमा कृष्णपक्ष में क्रमशः घटता जाता है । अतएव शारीरिक बल के ह्रास - वृद्धि क्रम को हीन, मध्य, उत्तम भेद से तीन भागों में विभाजित किया गया है । बलिनः शीतसंरोधाद्धेमन्ते प्रबलोऽनलः ॥७ ॥

भवत्यल्पेन्धनो धातून् स पचेद्वायुनेरितः । अतो हिमेऽस्मिन्सेवेत स्वाद्वम्ललवणान्रसान् ॥ ८ ॥

हेमन्तऋतुचर्या – हेमन्त ऋतु में कालस्वभाव के कारण पुरुष अधिक बलवान् रहता है । क्योंकि शीत के कारण भीतर रुका होने के कारण ( अर्थात् रोमकूपों के शीत से अवरुद्ध होने के कारण ) जठराग्नि ( पाचकाग्नि ) अधिक बलवान् हो जाती है । यदि उसे आहार रूपी ईंधन ( जिसे वह जठराग्नि पका या जला सके । ) कम मिल पाता है, तो वह अग्नि वायु द्वारा प्रेरित होकर ( सुलगकर ) रस आदि शरीरस्थ धातुओं को पचाने लगती है । इसलिए हेमन्त ऋतु में वातनाशक मधुर, अम्ल तथा लवण रसयुक्त पदार्थों का पर्याप्त सेवन करना चाहिए ॥ ७-८ ॥ वक्तव्य- -यह हेमन्तऋतुचर्या है, कभी - कभी ऐसा भी देखा जाता है कि गर्मी में गर्मी नहीं पड़ती, वर्षा ऋतु में वर्षा नहीं होती और सर्दियों में जाड़ा नहीं पड़ता; इसे ऋतुविपर्यय कहते हैं । ये लक्षण शनि आदि ग्रहों के अतिचार से भी देखे जाते हैं । आजकल राकेट आदि अन्तरिक्ष में छोड़े जा रहे हैं, इनके प्रकोप से भी ये परिवर्तन दिखलायी दे रहे हैं । ऐसी स्थिति में कुशल चिकित्सक देश - काल की सामयिक स्थिति के अनुसार ऋतुचर्या का निर्देश करे ।

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ऋतुचर्याध्यायः ३ ] सूत्रस्थानम् ४३ सुश्रुत के अनुसार हेमन्तचर्या – ' हेमन्ते लवणक्षारतिक्ताम्लकटुकोत्कटम् । सर्पिस्तैलमहिममशनं हितमुच्यते ' ॥ ( सु.उ. ६४५२३ ) अर्थात् हेमन्त ऋतु में नमकीन, तिक्त, क्षार, अम्ल, कटु रसों का एवं पर्याप्त घी - तैल का तथा इनसे बने हुए भोज्य पदार्थों का सेवन हितकर होता है । इस काल में वातकारक पदार्थों का सेवन न करे । ऊपर कहे गये तिक्त, कटु आदि रस - प्रधान पदार्थ कफदोष के विनाशक होते हैं, क्योंकि इस काल में कफ की वृद्धि स्वभावतः होती है । दैर्घ्यान्निशानामेतर्हि प्रातरेव बुभुक्षितः । अवश्यकार्यं सम्भाव्य यथोक्तं शीलयेदनु ॥ ९ ॥

वातघ्नतैलैरभ्यङ्गं मूर्ध्नि तैलं विमर्दनम् । नियुद्धं कुशलैः सार्धं पादाघातं च युक्तितः ॥ १० ॥

प्रातःकाल के कर्तव्य— हेमन्त ऋतु में रातें लम्बी होने लगती हैं, अतः प्रातःकाल उठते ही भूख लग जाती है । इसलिए प्रातः काल समय पर उठकर मल - मूत्र करने के बाद शौच आदि क्रिया से निवृत्त होकर दतवन आदि करके उसके बाद यथोक्त ( आठवें पद्य में ऊपर जो कहा है— ' सेवेत स्वाद्वम्ललवणान् रसान् ' ) का सेवन करे अर्थात् मधुर, लवण तथा अम्ल रसयुक्त पदार्थों ( मिठाई, नमकीन आदि ) को खाये अथवा जलपान करे । इस ऋतु में प्रतिदिन वातनाशक तैलों का मालिश करे या कराये । मल्लविद्याकुशल पहलवानों के साथ कुश्ती करे, यदि सम्भव हो तो पादाघात ( लंगड़ी लगाना ) आदि को विधिपूर्वक सीखे, अन्यथा कुछ व्यायाम अवश्य करे ॥ ९ -१० ॥ वक्तव्य — ‘ अवश्यकार्य ' की व्याख्या हमने ऊपर कर दी है । ' बुभुक्षितः ' यद्यपि ऊपर कहा गया है कि भूख लगे हुए पुरुष को आवश्यक कार्य करने के बाद खाना चाहिए । इस प्रसंग में च.चि. १५।११७ से २२० तक पद्यों का अनुशीलन करें । इन सबका तात्पर्य यह है कि उसे तत्काल भोजन दें, अन्यथा उपेक्षा करने से उसकी मृत्यु भी हो सकती है । और भी देखें— ' आहारकाले सम्प्राप्ते यो न भुङ्क्ते बुभुक्षितः । तस्य सीदति कायाग्निर्निरिन्धन इवानलः ' । इन उद्धरणों से बुभुक्षित को भोजन करना ही चाहिए, ऐसा समझें । यहाँ व्यक्ति की स्वास्थ्य - सम्पत्ति का विचार करके चिकित्सक निर्देश दे कि तत्काल भोजन देना आवश्यक है या शौच आदि करने के बाद । कषायापहृतस्नेहस्ततः स्नातो यथाविधि । कुङ्कुमेन सदर्पेण प्रदिग्धोऽगुरुधूपितः ॥ ११ ॥

रसान् स्निग्धान् पलं पुष्टं गौडमच्छसुरां सुराम् । गोधूमपिष्टमाषेक्षुक्षीरोत्थविकृतीः शुभाः ॥ नवमन्नं वसां तैलं, शौचकार्ये सुखोदकम् । प्रावाराजिनकौशेयप्रवेणीकौचवास्तृतम् ॥ १३ ॥

उष्णस्वभावैर्लघुभिः प्रावृतः शयनं भजेत् । युक्त्याऽर्ककिरणान् स्वेदं पादत्राणं च सर्वदा ॥ १४ ॥

स्नान आदि विधि — उसके बाद आँवला आदि कसैले द्रव्यों के कल्क ( चटनी के समान पिसे हुए द्रव्यों ) से पहले किये गये अभ्यंग ( मालिश ) की चिकनाहट को दूर करे, फिर विधिपूर्वक स्नान करे । उसके बाद शरीर को मोटे तौलिया से पोंछकर कुंकुम, कस्तूरी आदि उष्णगुण- प्रधान द्रव्यों का लेप ( तिलक ) लगाये और अगुरु की धूप की सुवास का सेवन कर तदनन्तर भोजन करे । भोजन में घी - तेल में भुना गया मांसरस स्वस्थ प्राणियों के मांस का होना चाहिए । गुड़ से बने पदार्थ, स्वच्छ ( उत्तम ) मद्य या सामान्य मद्य, गेहूँ का आटा, उड़द की दाल, इक्षुरस, दूध द्वारा निर्मित पदार्थ ( दही, मठा, मलाई, रबड़ी, खुरचन आदि ), नये चावलों का भात, वसा, तैल का सेवन करे । हाथ धोने आदि के लिए गुनगुना गरम जल का प्रयोग करे । इन दिनों प्रावार ( ऊनी कम्बल आदि ), मृगचर्म, रेशमी बिछौना, टाट या कुथक ( रंग - बिरंगा कम्बल या गलीचा या गद्दा ) बिछाकर रखें । ऊनी हलके चादर को ओढ़कर सोयें । प्रातःकाल युक्तिपूर्वक सूर्य की किरणों का सेवन करे । स्वेदन कर्म करे तथा जूता - जुराब ( मोजे ) को सदैव धारण करे ॥ ११-१४ ॥ वक्तव्य — कोश - साहित्य में ' नियुद्ध ' शब्द का अर्थ है— बाहुयुद्ध । ' पादाघातं च युक्तितः ’ — यहाँ पादाघात रूपी व्यायाम को थकावट आने से पहले छोड़ दें, यही युक्ति है! ' कषायापहृतः स्नेहः ' – मालिश

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४४ अष्टाङ्गहृदये के समय जो शरीर पर तेल लगा है, उसे कषाय - द्रव्यों से दूर करें, न कि साबुन आदि क्षारयुक्त पदार्थों से । इनके प्रयोग से केशभूमि रूक्ष हो जाती है । स्नानविधि — इसके लिए शास्त्र में द्रोणी अवगाहन ( टब में लेटकर नहाने ) का विधान है । इसमें गरम पानी भर दिया जाता है, सिर को डुबाये बिना पूरे शरीर का इस प्रकार सुखद स्नान हो जाता है । केशर - कस्तूरी का लेप करने से शरीर सुवासित हो जाता है और शरीर में उष्णता का संचार भी होता है । भोजन — खाने वाले की रुचि के अनुसार इसका निर्माण किया तथा कराया जाता है । मांस - भोजन मांसभोजियों के लिए है । शाकाहार सबके लिए है । उड़द के बड़े तथा पकौड़े शाकाहारियों के मांस के प्रतिनिधिस्वरूप आहारद्रव्य हैं । वसा प्राणिज स्नेह है । गौड शब्द से गुड़ से बने भोज्य पदार्थ या मद्य का ग्रहण किया जाता है । प्रवेणी — रंगीन ऊनी वस्त्र । कौचव - कव वस्त्रभेद । पाठभेद के अनुसार कुथक-' कुथ ' का अर्थ अमरकोश में ' कुश ' दिया है । इसके कुशासन बनते हैं । ये बिछाये जाते हैं । धान के पुआल का गद्दा गरीबों का उत्तम बिस्तर है, किन्तु श्रीचक्रपाणि ने कुथक का अर्थ चित्रकम्बल किया है । इसी अर्थ में माघपण्डित ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है । देखें— ' कुथेन नागेन्द्रमिवेन्द्रवाहनम् ' ( शिशुपालवध १।८ ) इसके अतिरिक्त श्रीअत्रिदेव तथा श्रीछांगाणीजी ने इसका अर्थ रुई का गद्दा किया है । यह अर्थ प्रसंगोचित होने पर भी विचारणीय है । मूल में ' कौचव ' शब्द होने पर भी श्रीहेमाद्रि ' कुथक ' का पर्याय कम्बल दे रहे हैं । अस्तु । पीवरोरुस्तनश्रोण्यः समदाः प्रमदाः प्रियाः । हरन्ति शीतमुष्णाङ्गयो धूपकुङ्कुमयौवनैः ॥ १५ ॥

शीतनाशक उपाय — पीन ( स्थूल एवं पुष्ट ) ऊरु, स्तन तथा श्रोणिवाली यौवन तथा सुरा के मद से मदमाती हुई प्रिया, कुंकुम के लेप, अगुरु की धूप एवं यौवनमद के कारण उष्ण शरीर वाली नारियाँ ( भोग्या स्त्रियाँ ) शीत को हर लेती हैं ॥ १५ ॥

अङ्गारतापसन्तप्तगर्भभूवेश्मचारिणः । शीतपारुष्यजनितो न दोषो जातु जायते ॥१६ ॥

निवास - विधि— जलते हुए अंगारों से तपे हुए मकान के निचले तल में निर्मित कमरे में ( जहाँ बाहर बहने वाली शीतल हवा का प्रवेश न हो ) अथवा गर्भभूवेश्म ( घर के भीतर बनी हुई गुफा ) में निवास करने वाले नर - नारियों को शीत के कारण उत्पन्न होने वाली परुषता सम्बन्धी कोई विकार कभी नहीं होता । अतः इन दिनों उक्त प्रकार के घर में निवास करे ॥ १६ ॥

अयमेव विधिः कार्यः शिशिरेऽपि विशेषतः । तदा हि शीतमधिकं रौक्ष्यं चादानकालजम् ॥ १७ ॥

शिशिर ऋतुचर्या – हेमन्त ऋतु में कही गयी सभी विधियों का सेवन विशेष करके शिशिर ऋतु में भी करना चाहिए । विशेषता यह है कि इस ऋतु में हेमन्त ऋतु की अपेक्षा शीत अधिक पड़ने लगता है, क्योंकि इस ऋतु में आदानकाल का प्रारम्भ हो जाता है । अतः इसमें रूक्षता आने लगती है ॥ १७ ॥

वक्तव्य — इसमें आदानकाल के प्रारम्भ होने के कारण जो रूक्षता होने लग जाती है, उसकी शान्ति के लिए अभ्यंग का सेवन तथा स्निग्ध आहारों का सेवन करना चाहिए । संक्षेप में यही ‘ शिशिर ऋतुचर्या ’ है । तन्त्रकार का सूत्र रूप में सामान्य- विशेष विधि से वर्णन का प्रकार सर्वत्र दिखलाई देता है । कफश्चितो हि शिशिरे वसन्तेऽर्कांशुतापितः । हत्वाऽग्निं कुरुते रोगानतस्तं त्वरया जयेत् ॥ १८ ॥

तीक्ष्णैर्वमननस्याद्यैर्लघुरूक्षैश्च भोजनैः । व्यायामोद्वर्तनाघातैर्जित्वा श्लेष्माणमुल्बणम् ॥ १ ९ ॥ स्नातोऽनुलिप्तः कर्पूरचन्दनागुरुकुङ्कुमैः । पुराणयवगोधूमक्षौद्रजाङ्गलशूल्यभुक् ॥ २० ॥

सहकाररसोन्मिश्रानास्वाद्य प्रिययाऽर्पितान् । प्रियास्यसङ्गसुरभीन् प्रियानेत्रोत्पलाङ्कितान् ॥ सौमनस्यकृतो हृद्यान्वयस्यैः सहितः पिबेत् । निर्गदानासवारिष्टसीधुमार्द्वीकमाधवान् ॥ २२ ॥

शृङ्गबेराम्बु साराम्बु मध्वम्बु जलदाम्बु च ।