श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 101–110
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 101–110
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अधि ० ४० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित 33 सच देहेन संहत एव । तेनैव कर्त्राऽहं प्रत्ययविषयेण प्रत्ययिना सर्वाः क्रिया निर्वर्त्यन्ते तत्फलं च स एवाश्नाति ' तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ' ( मुण्ड ० ३।१।१ ) इति मन्त्रवर्णात् । ' आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ' ( काठ ० १।३४ ) । इति च । * तथा च ' एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूता-धिवासः साक्षी चेता केवली निर्गुणश्च ' ( श्वेता ० ६ । ११ ) इति स पर्यगाच्छुक्रमकायमत्रणमस्नादिर; शुद्धमपापविद्धम् ' ( ईशा ० ८ ) इति चैतो मन्त्रावनाधेयातिशयतां नित्यशुद्धतां च ब्रह्मणो दर्शयतः ब्रह्मभावश्च मोक्षः । तस्मान्न संस्कार्योऽपि मोक्षः । अतोऽन्यन्मोक्षं प्रति क्रियानु-प्रवेशद्वारं न शक्यं केनचिद्दर्शयितुम् । तस्माज्ज्ञानमेकं मुक्त्वा क्रियाया गन्धमात्रस्या-प्यनुप्रवेश इह नोपपद्यते । ननु ज्ञानं नाम मानसी क्रिया । नः वैलक्षण्यात् । क्रिया हि नाम सा, यत्र वस्तुस्वरूपनिरपेक्षैव योद्यते, पुरुषचित्तव्यापाराधीना च । यथा- ' यस्यै देवतायै हविगृहीतं स्यात् तां मनसा ध्यायेद्वषट् करिष्यन् ' इति, ' संध्यां मनसा ध्यायेत् ' ( ऐ ० ब्रा ० इसीप्रकार ' एको देवः ' ( सब भूतोंमें एक, स्वप्रकाश, गूढ, सर्वव्यापक, सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा, कर्मोंका अधिष्ठाता, समस्त प्राणियोंमें बसा हुआ, सबका साक्षी, सबको चेतनता प्रदान करनेवाला निर्गुण और शुद्ध आत्मा है ) ‘ स पर्यंगात् ० ' ( वह आत्मा सर्वगत, शुद्ध, अशरीरी, अक्षत, स्नायु रहित - स्थूल शरीर रहित और अपापहत है ) ये दोनों मन्त्र ब्रह्म में अनाधेयातिशयता और नित्य-शुद्धता दिखलाते हैं । ब्रह्मभाव ही तो मोक्ष है । इसलिए मोक्ष संस्कार्य भी नहीं है । इस कारण • मोक्षके प्रति उत्पत्ति, विकृति, आप्ति और संस्कृतिसे भिन्न क्रिया सम्बन्धका द्वार कोई नहीं दिखा सकता । इसलिए मोक्षमें केवल ज्ञानके सिवा क्रियाके लेशमात्रका भी सम्बन्ध उपपन्न नहीं है । परन्तु ज्ञान तो मानसी क्रियाका नाम है? ऐसा नहीं, क्योंकि ज्ञान उससे विलक्षण है । वस्तु स्वरूपकी अपेक्षा के विना जहाँ जिसका विधान किया जाता है वह क्रिया है और वह पुरुष संकल्पके अधीन है, जैसे ' यस्यै देवतायै ० ' ( जिस देवताके लिए अध्वर्युने हविका ग्रहण किया हो उस समय होता ' वषट् ' शब्दका उच्चारण करता हुआ उसका मनसे ध्यान करे ) और ' सन्ध्यां ० ' ( सन्ध्याका सत्यानन्दी - दीपिका * ' एको देवः सर्वभूतेषु ' और ' स पर्यंगात् ' इन मन्त्रों में निर्गुणपदसे ब्रह्ममें गुणाधानरूप संस्कारका और शुद्ध पदसे दोषापनयनरूप संस्कारका निषेध किया गया है । इसलिए उत्पत्ति, विकृति, आप्ति और संस्कृति इन चारों क्रियाओंके क्रमशः उत्पाद्य विकार्य, आप्य और संस्कार्य ये चार फल हैं । इनसे भिन्न पाँचवां कोई क्रियाका फल नहीं है जो मोक्षको क्रिया साध्य सिद्ध करनेमें सहायक हो । अतः मोक्ष क्रियाका फल नहीं है । परन्तु मोक्ष असाध्य होनेसे शास्त्रका आरम्भ व्यर्थ हो जायगा? नहीं, क्योंकि शास्त्रका अवान्तर प्रयोजन तत्त्वज्ञान कराना है । वह अधिकारी पुरुषोंकी प्रवृत्ति साध्य है, अत: शास्त्रका बारम्भ व्यर्थ नहीं है । * शंका - जो यह कहा गया है कि मोक्ष में ज्ञानके विना अन्य क्रियाका सम्बन्ध नहीं है, यह कथन असंगत है अर्थात् व्याघात दोष ग्रस्त हैं, क्योंकि जब मोक्षमें ज्ञानका प्रवेश है तो ज्ञान मानसिक क्रिया होनेसे मोक्षमें उसका प्रवेश हो चुका । इसप्रकार जब मानसी क्रियारूप ज्ञानसे मोक्ष साध्य है तो क्रिया साध्य - उत्पाद्य आदि चार फलोंमें से किसी एकको मोक्ष फल मानना पड़ेगा? सिद्धान्ती इसका समाधान ' न ' आदि भाष्यसे करते हैं । ' स्वाहा देव हविर्दाने श्रौषट्, वौषट् वषट्, स्वधा ' देवताको आहुति देते समय ' स्वाहा, श्रौषट्, वौषट्, वषट्, स्वधा ' इनमें से किसी एक शब्दका मन्त्र के साथ प्रयोग किया जाता है ।
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ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पाद १ ( ३२८ | १ ) इति चैवमादिषु । ध्यानं चिन्तनं यद्यपि मानसम्, तथापि पुरुषेण कर्तुमकर्तुमन्यथा वा कर्तुं शक्यम्, पुरुषतन्त्रत्वात् । ज्ञानं तु प्रमाणजन्यम् । प्रमाणं च यथाभूतवस्तुविषयम्, अतो ज्ञानं कर्तुमकर्तुमन्यथा वा कर्तुमशक्यम्, केवलं वस्तुतन्त्रमेव तत् । न चोदना-तन्त्रम् । नापि पुरुषतन्त्रम् । तस्मान्मानसत्वेऽपि ज्ञानस्य महद्वैलक्षण्यम् । * यथा च ' पुरुषो वाव गौतमाग्निः ', ' योषा वाच गौतमाग्निः ' ( छान्दो ० ५/७ १,८1१ ) इत्यत्र योषित्पुरुष-योरग्निबुद्धिर्मानसी भवति । केवलचोदनाजन्यत्वात्क्रियैव सा पुरुषतन्त्रा च । या तु प्रसिद्धेऽग्नावग्निवुद्धिः, न सा चोदनातन्त्रा । नापि पुरुषतन्त्रा । किं तर्हि? प्रत्यक्षविषय-' वस्तुतन्त्रैवेति ज्ञानमेवैतन्न क्रिया । एवं सर्वप्रमाणविषयवस्तुषु वेदितव्यम् । तत्रैवं सति यथाभूतब्रह्मात्मविषयमपि ज्ञानं न चोदनातन्त्रम् । तद्विषये लिङादयः श्रूयमाणा अप्यनियोज्यविषयत्वात्कुण्ठीभवन्ति, उपलादिषु प्रयुक्तक्षुरतैक्ष्ण्यादिवत्; अहेयानुपादेय-वस्तुविषयत्वात् । किमर्थानि ताह ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः ' ( वृ ० २।४।५ ) इत्यादीनि मनसे ध्यान करे ) इत्यादि श्रुतिमें ध्यान चिन्तन यद्यपि मानसी क्रिया है, तो भी पुरुषके अधीन होनेके कारण वह पुरुष द्वारा करने न करने अथवा अन्य प्रकारसे करने के योग्य है । ज्ञान तो प्रमाण जन्य है और प्रभाण यथार्थ वस्तु विषयक होता है, इसलिए ज्ञान करने न करने अथवा अन्य प्रकारसे करनेके योग्य नहीं हो सकता, क्योंकि वह केवल वस्तुके ही अधीन है, विधिके अधीन नहीं है और पुरुषके अधीन भी नहीं है । अतः मानसिक होनेपर भी ज्ञानका ध्यानसे महान् अन्तर है । जैसे ' पुरुषो ० ' ( हे गौतम! पुरुष अग्नि है ) ' योषा ० ' ( हे गौतम! स्त्री अग्नि है ) यहां स्त्री और पुरुष में अग्नि बुद्धि मानसिक है और वह केवल विधि जन्य होनेके कारण क्रिया ही है और पुरुषके अधीन है । लोक प्रसिद्ध अग्नि में जो अग्नि बुद्धि है वह न. विधिके अधीन है और न पुरुषके ही अधीन, किन्तु प्रत्यक्ष विषय वस्तु ( अग्नि ) के अधीन है, अतः वह ज्ञान ही है क्रिया नहीं । इसीप्रकार समस्त प्रमाण विषयक वस्तुमें भी समझना चाहिए । लोकमें ज्ञानके अविधेय होनेपर ब्रह्मात्मविषयक ज्ञान भी विधिके अधीन नहीं है । यद्यपि ज्ञानके विषयमें लिङ्, लोट् आदि विधि प्रत्यय श्रूयमाण हैं, तो भी अनियोज्य विषयक होनेके कारण पत्थरादिमें प्रयुक्त उस्तरेको तीक्ष्णधारके समान कुण्ठित हो जाते हैं अर्थात् उक्त विधि प्रत्यय भी अनियोज्य विषयक होनेसे पुरुषको प्रवृत्त करनेमें समर्थं नहीं है, क्योंकि अहेयानुपादेय ( हेयोपादेय रहित ) वस्तु विषयक हैं । तब ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः सत्यानन्दी - दीपिका * अब भगवान् भाष्यकार ज्ञान और ध्यानके भेदको ' पुरुषो वाव गौतमाग्निः ' आदि उदाहरणोंसे स्पष्ट करते हैं । परन्तु ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' ' आत्मानं पश्येत् ' ( आत्माको देखे ) ' तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि ० ' ( उसीको तू ब्रह्म जान ) इत्यादि स्थलोंमें लिङ्, लोट्, तव्य आदि विधिप्रत्यय श्रूयमाण हैं, अतः ब्रह्मज्ञान विधेय प्रतीत होता है । जैसे ' यजेत ' इस विधिसे विधेय याग क्रियारूप है, वैसे ' द्रष्टव्यः ' पश्येत् ' इत्यादि विधियोंसे विधेय ब्रह्मज्ञान भी क्रियारूप है? * विधि हेय तथा उपादेय विषयक है । पुरुष जिसके करने आदिमें स्वतन्त्र है वह हेय तथा उपादेय है, वहींपर पुरुष नियोज्य होता है । किन्तु ब्रह्म तो अनियोज्य है । सुरापान हेय हैं और यांगदि उपादेय हैं । ब्रह्म तो अपना स्वरूप है और नित्य प्राप्त हैं, अतः वह हेयोपादेय भी नहीं है । कि ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि विधियाँ परम पुरुषार्थके साधन ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानकी प्रतिबन्धक जो स्वभावसे मनुष्योंकी सुखके लिए विषयोंकी ओर प्रवृत्ति है उस क्षणिक विषय सुखमें प्रवृत्त मनुष्य को आत्मज्ञानकी स्तुति श्रवण कराकर वहाँसे हटाती हुई प्रयोजनवाली होती हैं ।
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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६ ९ विधिच्छायानि वचनानि? स्वाभाविकप्रवृत्तिविषयविमुखीकरणार्थानीति ब्रूमः । यो हि बहिर्मुखः प्रवर्तते पुरुषः ' इष्टं मे भूयादनिष्टं मा भूत् ' इति, नच तत्रात्यन्तिकं पुरुषार्थ लभते, तमात्यन्तिकपुरुषार्थवाञ्छिनं स्वाभाविक कार्यकरण संघातप्रवृत्तिगोचराद्विमुखी-कृत्य प्रत्यगात्म स्रोतस्तया प्रवर्तयन्ति - ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादीनि । * तस्यात्मा-न्वेषणाय प्रवृत्तस्याहेयमनुपादेयं चात्मतत्त्वमुपदिश्यते । ' इदं सर्वं यदयमात्मा ' ( बृह ० २।४।६ ) ' यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं विजानीयात् ', ' विज्ञातारमरे केन विजानीयात् ' ( बृह ० ४।५।१५ ) ' अयमात्मा ब्रह्म ' ( बृह ० २ / ५ / १ ९ ) इत्यादिभिः । यदप्यकर्तव्यप्रधानमात्मज्ञानं हानायोपा-दानाय वा न भवतीति तत्तथैवेत्यभ्युपगम्यते । अलंकारो हायमस्माकं यद्ब्रह्मात्माव-गतौ सत्यां सर्वकर्तव्यताहानिः कृतकृत्यता चेति । तथा च श्रुतिः - ' आत्मानं चेद्विजानीयादय-मस्मीति पूरुषः । किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥ ' ( बृह ० ४ | ४ | १२ ) इति एतबुद्ध्वा श्रोतव्यः ' इत्यादि विधि तुल्य वाक्य किसलिए हैं अर्थात् इनका क्या प्रयोजन है? हम कहते हैं ि विषयमें पुरुषकी जो स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है इससे उसको वे पराङ्मुख करनेके लिए हैं । जो पुरुष बाह्य विषयोंमें ' इष्ट वस्तु मुझे प्राप्त हो अनिष्ट प्राप्त न हो ' इस प्रकार बहिर्मुख होकर प्रवृत्त होता है, वह उन विषयोंसे आत्यन्तिक पुरुषार्थं प्राप्त नहीं कर सकता । उस आत्यन्तिक पुरुषार्थके अभिलाषीको ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि वाक्य कार्य ( शरीर ) करण ( इन्द्रिय ) समुदायकी स्वाभाविक प्रवृत्तिके विषय शब्दादिसे हटाकर उसकी चित्तवृत्तिको अन्तरात्मा की ओर प्रवाहरूपसें प्रवृत्त करते हैं । आत्मस्वरूपकी खोज में प्रवृत्त हुए उस पुरुषको ' इदं सर्व ० ' ( यह जो कुछ भी है : सब आत्मा है ) ' यत्र त्वस्य ० ' ( किन्तु जिस तत्त्वज्ञानावस्था में इसके लिए सब आत्मा ही हो गया वहाँ किससे किसे देखे, किससे किसे जाने, अरे उस विज्ञाताको किससे जाने ) ' अयमात्मा ० ' ( यह आत्मा ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतियोंसे हेय तथा उपादेयसे रहित आत्मतत्त्व का उपदेश किया जाता है । यद्यपि अकर्तव्य प्रधान आत्मज्ञान किसीके त्याग अथवा ग्रहणके लिए नहीं होता, तथापि हम उसको उसी प्रकार स्वीकार करते हैं । हम वेदान्तियोंके लिए यह अलङ्कार है कि जो प्रत्यगभिन्न ब्रह्मका ऐक्यज्ञान होने पर सर्व कर्तव्यताकी हानि और कृतकृत्यता होती है । इस विषय में ' आत्मानं ० ' ( ( यदि पुरुष स्वयं प्रकाश आत्माको ' यह मैं हूँ ' इसप्रकार विशेषरूपसे जान जाय तो फिर किस फलकी इच्छा करता हुआ किस कामनासे शरीर के पीछे स्वयं संतप्त हो ) यह श्रुति और ' एतबुद्धवा ० ' ( हे अर्जुन! इस सत्यानन्दी - दीपिका * ‘ निरुपममनादितत्त्वं त्वमहमिदमद इति कल्पनादूरम् । नित्यानन्दैकरसं सत्यं ब्रह्माद्वितीय-मेवाहम् । ' ( ' वि ० चू ० ४१ ९ ४ ) ( जो उपमा रहित अनादितत्त्व ' तू, मैं, यह, वह आदि कल्पना से अत्यन्त दूर है, वह नित्यानन्दैकरस स्वरूप, सत्य और अद्वितीय ब्रह्म ही मैं हूँ ) इसप्रकार जीव ब्रह्मका ऐक्यज्ञान होनेपर आत्मवित् के लिए न कुछ हेय है और न कुछ उपादेय, न कुछ कर्तव्य है और न कुछ अकर्तव्य | जब वेदान्तशास्त्रद्वारा स्वतन्त्ररूपसे ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानसे अनर्थकी अत्यन्त निवृत्ति परमानन्दस्वरूप ब्रह्मका आविर्भावात्मक मोक्ष और कृतकृत्यता अनुभव सिद्ध है, तब क्रियारूप उपासना से अविद्याको निवृत्तिरूप संस्कार सहित प्रत्यगाभिन्नब्रह्मका आविर्भावात्मक मोक्ष होता है तथा ' उपासीत ' इस उपासनारूप क्रियाका अङ्ग होकर सम्पूर्ण वेदान्तवाक्य ब्रह्मका उपदेश करते हैं, इसप्रकार वृत्तिकारके मतका उपर्युक्त रीतिसे खण्डन समझना चाहिए | अब ' यदपि ' आदिसे प्रभाकरके मतका उल्लेख करते हैं ।
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७० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ' ( भ ० गी ० १५/२० ) इति स्मृतिः । तस्मान्न प्रतिपत्तिविधि-विषयतया ब्रह्मण: समर्पणम् । यदपि केचिदाहुः -- ' प्रवृत्तिनिवृत्तिविधितच्छेषव्यति-रेकेण केवलवस्तुवादी वेदभागो नास्ति ' इति, तन्न औपनिषदस्य पुरुषस्यानन्य शेषत्वात् । योऽसावुपनिषत्स्वेवाधिगतः पुरुषोऽसंसारी ब्रह्म, उत्पाद्यादिचतुर्विधद्रव्यविलक्षणः स्व-प्रकरणस्थोऽनन्यशेषः, नासौ नास्ति नाधिगम्यत इति वा शक्यं वदितुम्, ' स एष नेति नेत्यात्मा ' ( बृह ० ३।९ ।२६ ) इत्यात्मशब्दात् आत्मनश्च प्रत्याख्यातुमशक्यत्वात्, य एव निराकर्ता तस्यैवात्मत्वात् । * नन्वात्माऽहंप्रत्ययविषयत्वादुपनिषत्स्वेव विज्ञायत इत्यनुपन्नम् । न; तत्साक्षित्वेन प्रत्युक्तत्वात् । नाहंप्रत्ययविषयकर्तृव्यतिरेकेण तत्साक्षी सर्वभूतस्थः सम एकः कूटस्थनित्यः पुरुषो विधिकाण्डे तर्कसमये वा केनचिदधिगतः सर्वस्यात्मा, अतः स न केनचित्प्रत्याख्यातुं शक्यो विधिशेषत्वं वा नेतुम् । आत्मत्वा-देव च सर्वेषां न हेयो नाप्युपादेयः । सर्वे हि विनश्यद्विकारजातं पुरुषान्तं विनश्यति । गुह्यतम तत्त्वको जानकर पुरुष ज्ञानी और कृतकृत्य हो जाता है ) यह स्मृति है । इस कारण वेदान्तवाक्य उपासना विधिके विषयरूपसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं कराते । कोई कहते हैं कि प्रवृत्ति विधि, निवृत्ति विधि और उनके अङ्गोंसे भिन्न केवल सिद्ध वस्तुका प्रतिपादक वेद भाग नहीं है । यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि उपनिषद् प्रतिपाद्य पुरुष अन्यका शेष ( अङ्ग ) नहीं है । जो केवल उपनिषदोंसे ही अधिगत असंसारी पुरुष ब्रह्म है, वह तो उत्पाद्य आदि चार प्रकारकें द्रव्योंसे विलक्षण, स्वप्रकरण में स्थित, अनन्यशेष है, यह नहीं है अथवा नहीं जाना जाता ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ' स एष ० ( यह नहीं, यह नहीं, इसप्रकार जो आत्मा उपादिष्ट है वह यह है ) इस श्रुतिमें ' आत्मशब्द ' है, अतः आत्माका निषेध नहीं किया जा सकता, क्योंकि जो निषेध कर्ता है उसका वही तो आत्मा ( स्वरूप ) है । यदि कहो कि आत्मा ' मैं ' इस प्रसिद्ध लोक प्रतीतिका विषय होनेसे केवल उपनिषदोंसे ही जाना जाता है, यह कथन अयुक्त है, ऐसा नहीं, क्योंकि आत्मा तो ' मैं ' इस लोक विषय नहीं, ऐसा कहा जा चुका है । ' मैं ' इस लोक प्रतीतिका विषय उसका साक्षी, सब भूतोंमें स्थित, सम, एक कूटस्थ, नित्य सबका आत्मा अथवा तर्कशास्त्र में किसीसे भी अधिगत नहीं है । इसलिए उसका न और न कोई उसे किसी विधिके अङ्गरूपसे ग्रहणकर सकता है । इसलिए न हेय है और न उपादेय ही । नष्ट होता हुआ सब विकार सत्यानन्दी - दीपिका प्रसिद्ध प्रतीतिका साक्षी है लोक प्रसिद्ध कर्ता मिन्न पुरुष है । वह विधिकाण्ड कोई निषेध कर सकता है वह सबका आत्मा है, समुदाय पुरुष पर्यन्त नष्ट * प्रवृत्ति ( यागादि ), निवृत्ति ( सुरापानादिका निषेध ) रूप कार्य तथा उनके अङ्गों का ही वेद प्रतिपादन करता है । इससे भिन्न केवल सिद्ध वस्तु ( ब्रह्म ) का प्रतिपादन नहीं करता, अतः वेदान्तवाक्य मी क्रियाके अङ्ग होकर ही ब्रह्मका ज्ञान कराते हैं, क्योंकि ' आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम् ' ( वेद क्रियार्थक है, क्रिया से भिन्न अक्रियार्थक निष्फल है ) इसका समाधान ' तन्न ' आदिसे करते हैं । * ' मैं ' इस प्रतीतिका विषय लोक प्रसिद्ध कर्ता भोक्ता संसारी है । उसीको प्रायः सब लोग आत्मा मानते हैं । परन्तु आत्मा तो अहंकारादिका साक्षी मात्र है । स्वयं साक्षी आत्मा अहंकारादिका विषय भला कैसे हो सकता है? किश्व आत्मा भ्रमात्मक द्वैतका अधिष्ठान है उसका विषेध करनेपर जगत् में अस्ति, भाति, प्रियता कदापि सिद्ध नहीं होगी । इसलिए वेदान्तवेद्य आत्माका कोई निषेध नहीं कर सकता और न वह किसीका अङ्ग ही हो सकता है ।
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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७१ पुरुषो विनाशहेत्वभावादविनाशी, विक्रियाहेत्वभावाच्च कूटस्थनित्यः, अत एव नित्य-शुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः । तस्मात् ' पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्टा सा परा गतिः ' ( कठ ० १।३।११ ) ‘ तँ त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ' ( बृह ० ३ / ९ / २६ ) इति चौपनिषदत्वविशेषणं पुरुषस्योपनिषत्सु प्राधान्येन प्रकाश्यमानत्व उपपद्यते । अतो भूतवस्तुपरो वेदभागो नास्तीति वचनं साहसमात्रम् । * यदपि शास्त्रतात्पर्यविदामनुक्रमणम्- ' दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनम् ' इत्येवमादि, तद्धर्मजिज्ञासाविषयत्वाद्विधिप्रतिषेधशास्त्राभिप्रायं द्रष्टव्यम् । अपि च ' आफ्ना-यस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम् ' इत्येतदेकान्तेनाभ्युपगच्छतां भूतोपदेशानर्थक्य-प्रसङ्गः । प्रवृत्तिनिवृत्तिविधितच्च्छेषव्यतिरेकेण भूतं चेह स्तूपदिशति भव्यार्थत्वेन, कूटस्थ-नित्यं भूतं नोपदिशतीति को हेतुः? नहि भूतमुपदिश्यमानं क्रिया भवति । अक्रियात्वेऽपि होता है । ' विनाश हेतु अभावसे पुरुष अविनाशी है । विक्रिया हेतुके अमावसे कूटस्थनित्य है, अतएव नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव है । इस कारण ' पुरुषान्न ० ' ( पुरुषसे पर और कुछ नहीं है वह सूक्ष्मत्वकी पराकाष्ठा ( अवधि ) है और वही परा गति है ) ' तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ' इस श्रुतिमें पुरुषका ' औपनिषदं ' यह विशेषण उपनिषदोंमें मुख्यरूपसे ज्ञान गम्य होनेपर उपपन्न होता है । इसलिए सिद्ध वस्तु विषयक वेद भाग नहीं है यह वादीका कथन साहस मात्र है । यदपि शास्त्रका तात्पर्यं जाननेवालोंका ' दृष्टो हि ० ' ( कर्मका ज्ञान करना ही उनका दृष्ट ( प्रत्यक्ष ) प्रयोजन है ) इत्यादि कथन है । उन्हें धर्मं जिज्ञासाका विषय होनेसे विधि प्रतिषेध शास्त्र के प्रकरण में सिद्ध अर्थके प्रतिपादक वाक्योंके अभिप्रायके लिए समझना चाहिए । और ' आम्नायस्य ० ' ( वेद क्रियार्थक है, अक्रियार्थक वेद वाक्य निष्फल हैं ) इस अव्यभिचारी नियमको माननेवाले मीमांसकोंके मत में सिद्ध वस्तु प्रतिपादक वेद वाक्य भी निष्फल होंगे । यदि कहो कि शास्त्र प्रवृत्ति विधि, निवृत्ति विधि और उनके अङ्गोंसे अतिरिक्त सिद्ध वस्तुका उपदेश धर्मके लिए करता है, कुटस्थ नित्य सिद्ध वस्तुका उपदेश नहीं करता इसमें क्या कारण है? उपदिश्यमान सिद्ध वस्तु केवल उपदेशसे ही क्रिया नहीं हो जाती । यदि कहो कि सिद्ध वस्तु भले ही क्रिया न हो किन्तु क्रियाकी निष्पत्तिका साधन होनेके सत्यानन्दी - दीपिका! * यदि कहो कि आत्मा अनित्य होनेके कारण हेय है, तो इसका समाधान ' सर्वं हि ' आदिसे कहते हैं | आत्मा तो सब भूतों में पूर्ण होने से पुरुष कहा गया है । ' अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ' ( गी ० २।२० ) ( क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है । शरीरके नाश होनेपर भी इसका नाश नहीं होता ) यह स्मृति प्रमाण है । परन्तु आत्मा परिणामी होने से अनित्य होगा? यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि धर्म, लक्षण, अवस्था भेदसे परिणाम तीन प्रकारका होता है । उससे रहित होनेके कारण आत्मा कूटस्थ नित्य है । आत्मासे उत्कृष्ट वस्तु प्राप्य होने के कारण आत्मा य है? ऐसा भी नहीं, क्योंकि आत्मा ही सबकी पराकाष्ठा, परागति है । याज्ञवल्क्य - हे शाकल्य! ' तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि ' इत्यादि वेदान्त वाक्य अबाध्य, नित्य सिद्ध, अनन्यशेष ब्रह्मात्मतत्त्वका प्रतिपादन करते हैं । अतः वेद भाग सिद्ध वस्तु ब्रह्मका प्रतिपादन नहीं करता यह कथन केवल साहस मात्र है । ** यदि अक्रियार्थक वेद वाक्य निष्फल है तो मीमांसकके मतमें ' सोमेन यजेत ' ( सोम नामक याग करे ) ‘ दध्ना जुहोति ' ( दधिसे हवन करे ) इस प्रकार सोम, दधि आदि सिद्ध वस्तु प्रतिपादक वेद अनर्थक ही होगा । जो शब्द क्रियार्थक नहीं है उनकी अनर्थकता क्या है? क्या उनका कुछ
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७२ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ भूतस्य क्रियासाधनत्वात्क्रियार्थ एव भूतोपदेश इति चेत्, नेष दोषः, " क्रियार्थत्वेऽपि क्रियानिर्वर्तन शक्तिमह स्तूपदिष्टमेव । क्रियार्थत्वं तु प्रयोजनं तस्य । न चैतावता वस्त्वनु-पदिष्टं भवति । * यदि नामोपदिष्टं किं तव तेन स्यादिति । उच्यते, अनवगतात्मवस्तूप-देशश्च तथैव भवितुमर्हति । तदवगत्या मिथ्याज्ञानस्य संसारहेतोर्निवृत्तिः प्रयोजनं क्रियत इत्यविशिष्टमर्थवत्त्वं क्रियासाधनंवस्तूपदेशेन । * अपि च ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' इति चैव-माद्या निवृत्तिरूपदिश्यते । न च सा क्रिया । नापि क्रियासाधनम् । अक्रियार्यानामुप-देशोऽनर्थकश्चेत् ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' इत्यादिनिवृत्त्युपदेशानामानर्थवयं प्राप्तम् । तच्चा-कारण सिद्ध वस्तुका उपदेश क्रिया के लिए ही होता है, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि सिद्ध वस्तु क्रियाके लिए होनेपर भी क्रियोत्पादन शक्ति विशिष्ट वस्तु उपदिष्ट है, क्रियार्थत्व ही उसका प्रयोजन है अर्थात् क्रियाको निष्पन्न करना ही सिद्ध वस्तुका प्रयोजन है । क्रियार्थक होनेपर भी सिद्ध वस्तु अनुपदिष्ट नहीं होती । पूर्वपक्षी - यदि सिद्ध वस्तुका उपदेश होता भी तो उससे तुमको क्या लाभ होगा? सि०-कहते हैं - दधि आदि पदार्थोंके समान प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे अज्ञात ब्रह्मात्म वस्तुका भी शास्त्र से उपदेश होना ही युक्त है । उसके ज्ञानसे संसारके हेतु भूत मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति प्रयोजन होता है । इसकारण क्रियाके साधन भूत सिद्ध वस्तुके उपदेशके समान आत्माका उपदेश भी सार्थक है । और ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' ( ' ब्राह्मणकी हिंसा नहीं करनी चाहिए ) इत्यादि श्रुतियाँ निवृत्तिका उपदेश करती हैं । वह निवृत्ति न तो क्रिया है और न क्रियाका साधन ही । यदि क्रियाको न कहने वाले वाक्य अनर्थक हैं तो ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' इत्यादि निवृत्ति परक उपदेश व्यर्थ होंगे । परन्तु वह इष्ट नहीं है । सत्यानन्दी - दीपिका अर्थ नहीं है अथवा वे फल रहित हैं? ' आम्नायस्य ' इस नियमसे यदि अक्रियार्थक शब्द अनर्थक हैं तो सोम, दधि आदि अर्थं शून्य होंगे । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि उनका याग आदिकी सिद्धिके लिए वर्णन मिलता है । यदि कहो कि वे ' स्वर्गकामो यजेत ' ' सुरां न पिबेत् ' इस प्रकार प्रवृत्ति, निवृत्ति विधिसे भिन्न प्रतिपादित सोम दधि आदि सिद्ध पदार्थ धर्मके लिए कथित होनेके कारण सार्थक हैं, तो प्रश्न होता है कि ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि सिद्ध वस्तु प्रतिपादक वाक्य सार्थक क्यों नहीं हैं? इसमें यह कारण है कि सोम आदि क्रिया सम्बन्धी होनेसे कार्य हैं, अतः उनका उपदेश युक्त है, किन्तु सिद्ध ब्रह्म किसी क्रियाका सम्बन्धी न होनेसे कार्य नहीं है, इसलिए उसके प्रतिपादक वाक्य अनर्थक हैं । * यद्यपि ' सोमेन यजेत ' ' दध्ना जुहोति ' आदि उपदेशोंसे दधि, सोमादि यागादि क्रिया नहीं हो जाते, फिर भी सोमादि सिद्ध वस्तु यागादि क्रियाकी निष्पत्तिमें साधन हैं, अतः वे सार्थक हैं । सि ० - सिद्ध पदार्थ क्रियाके अङ्ग भले हों फिर भी यह नहीं हो सकता कि सोमादि पदार्थ नहीं रहते या उन पदोंका कुछ अर्थ नहीं है । * वादीका यह मत ठीक नहीं है कि सिद्ध वस्तुकी सफलता में क्रिया ही द्वार है, क्योंकि जैसे ' रज्जु ज्ञानसे सर्पादि भ्रान्ति और उससे उत्पन्न भयादिकी निवृत्ति होती है, उसी प्रकार आत्मसाक्षात्कारसे प्रपञ्चके कारणभूत मिथ्याज्ञान और उससे उत्पन्न प्रप में सत्यत्व बुद्धिकी निवृत्ति हो जाती है । दधि, सोमादि यागादि क्रिया द्वारा सफल होते हैं, किन्तु ब्रह्म तो स्वयं फलस्वरूप है । यद्यपि दोनोंमें इतना अन्तर है, तथापि दधि सोमादि शब्द जैसे सफल सिद्ध दधि आदि वस्तुका बोध कराते हैं, उसीप्रकार ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि वेदान्त वाक्य भी सफल सिद्ध वस्तु ब्रह्मका बोध कराते हैं । जैसे विधि वाक्य सिद्ध पदार्थ परक हैं, वैसे ही वेदान्त वाक्य मी सिद्ध वस्तु परक हैं ।
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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुषाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७३ निष्टम् । न च स्वभावप्राप्तहन्त्यर्थानुरागेण नञः शक्यमप्राप्तक्रियार्थत्वं कल्पयितुं हनन-क्रियानिवृत्त्योदासीन्यव्यतिरेकेण । नञश्चैष स्वभावो यत्स्वसंबन्धिनोऽभावं बोधयतीति । * अभावबुद्धिवोदासीन्यकारणम् । सा च दग्धेन्धनाग्निवत्स्वयमेवोपशाम्यति । तस्मा-त्यसक्तक्रियानिवृत्त्यौदासीन्यमेव ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' इत्यादिषु प्रतिषेधार्थं मन्यामहे, अन्यत्र प्रजापतिव्रतादिभ्यः । तस्मात्पुरुषार्थानुपयो ग्युपाख्यानादिभूतार्थवादविषयमानर्थ-नंंका रागतः प्राप्त हनन क्रियाके साथ सम्बन्ध होनेसे हनन क्रियासे निवृत्त होकर औदासीन्यके अतिरिक्त अप्राप्त क्रियाकी कल्पना नहीं की जा सकती । नञ्का यह स्वभाव है कि जो अपने सम्बन्धी पदार्थ के अभावका ज्ञान कराता है । अभावज्ञान उदासीनताका कारण है । वह दग्धेन्धन अग्नि समान स्वयं ही शान्त हो जाता है । इस कारण प्रजापति व्रतादिके अतिरिक्त ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' सत्यानन्दी - दीपिका * विधि वाक्यगत सिद्ध पदार्थोंका विचारकर अब निषिद्ध वाक्यगत सिद्ध पदार्थोंका विचार करते हैं — जैसे ' ब्राह्मणो न हन्तव्य: ' इस वाक्यके मध्य में जो ' न ' है, वह निवृत्तिका उपदेश करता है । निवृत्ति अभावरूप है, अतः वह न क्रिया है और न क्रियाका साधन हो, क्योंकि क्रिया और क्रियाके साधन भावरूप होते हैं । अक्रियार्थंक वेदवाक्य यदि अनर्थक हों तो ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' इत्यादि निवृत्ति परक वेद वाक्य व्यर्थ हो जाएँगे । और ' स्वाध्यायोऽध्येतव्य: ' इस स्वाध्याय विधि प्राप्त होनेके कारण उनमें व्यर्थत्वकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, इसलिए स्वाभाविक रागसे प्राप्त हनन क्रियासे ' नञ् ' हनन कर्ताको निवृत्तकर उदासीनभावमें लाता है । इस अर्थ से भिन्न लक्षणाद्वारा हनन विरोधी संकल्पादि क्रिया, ' अहननं कुर्यात् ' ( हनन न करे ) इस प्रकार ' नजा ' के अर्थकी कल्पना करना ठीक नहीं है । किन्तु अपने सम्बन्धी अभावका ज्ञान करना ही ' नञ् ' का स्वभाव है । “ तत्सादृश्यममावश्चतदन्यत्वं तदल्पता । अप्राशस्त्यं विरोधश्व नञर्थाः षट् प्रकीर्तिताः ॥ " “ नत्र के छः अर्थं कहे गये हैं - + तत्सादृश्य ( उसके समान ), अभाव, उससे भिन्न, उससे अल्प, अप्राशस्त्य ( अयोग्य ) तथा विरोध यदि विधिके समान निषेधका अर्थ भी कार्य किया गया तो फिर विधि और निषेध में अन्तर न रहेगा । + टि ० -- तत्सादृश्यम् - अनिक्षु अर्थात् ईखसे भिन्न ईखके सदृश शर, अभावः यथा नास्ति अर्थात् अस्तित्वका अभाव, तदन्यत्व - अब्राह्मण - ब्राह्मणसे भिन्न क्षत्रियादि, तदल्पता अनुदरा कन्या-कृशोदरी, अप्राशस्त्य - अपशवः - अन्ये गोऽश्वेभ्यः, अर्थात् गौ, अश्वसे भिन्न पशु हैं, विरोधः - अमित्रः, अविद्या आदि अर्थात् मित्रसे विरुद्ध शत्रु, विद्यासे भिन्न अविद्या आदि । ( क ) ' अप्राधान्यं विधेर्यत्र प्रतिषेधे प्रधानता । प्रसज्यप्रतिषेधोऽसौ क्रियया सह यत्र नञ् ॥ ' ( जिस वाक्य में विधि अप्रधान और प्रतिषेध प्रधान हो और जहाँ नञ्का क्रियाके साथ सम्बन्ध हो, वहाँ नज्का प्रसज्यप्रतिषेध अर्थ है ) यथा ' न कलअं मक्षयेत् ' ( कलञ्जका मक्षण न करे ) इसमें बलवत् अनिष्टके असाधनत्वसे विशिष्ट इष्ट साधनरूप विधि वाचक प्रत्यय के अर्थके अभावका मक्षणक्रियामें बोधन कराता है, इसलिए विधि अप्रधान है और नञ्का अर्थ अभाव प्रधान है, अतः क्रियापदके साथ जिसका अन्वय है, ऐसा नज् प्रसज्यप्रतिषेध कहलाता है, प्रसज्य - प्रसक्त, प्रतिषेध - निषेध अर्थात् प्रसक्का निषेध । ( ख ) ' प्राधान्यं हि विधेर्यत्र प्रतिषेधेऽप्रधानता । पर्युदासः स विज्ञेयो यत्रोत्तरपदेन नज् ॥ ' ' जिसमें विधि प्रधान और प्रतिषेध अप्रधान हो तथा जिसमें उत्तरपदके साथ नज्का अन्वय हो वहाँ नका पर्युदास अर्थ है । '
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७४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ क्याभिधानं द्रष्टव्यम् । * यदप्युक्तम्- कर्तव्यविध्यनुप्रवेशमन्तरेण वस्तुमात्रमुच्यमान-मनर्थकं स्यात्, ' सप्तद्वीपा वसुमती ' इत्यादिवदिति, तत्परिहृतम्; ' रज्जुरियं नायं सर्पः ' इति वस्तुमात्रकथनेऽपि प्रयोजनस्य दृष्टत्वात् । ननु श्रुतब्रह्मणोऽपि यथापूर्वं संसारित्व-दर्शनान्न रज्जुस्वरूपकथनवदर्थवत्त्वमित्युक्तम्; अत्रोच्यते, नावगतब्रह्मात्मभावस्य यथा-पूर्वं संसारित्वं शक्यं दर्शयितुं, वेदप्रमाणजनितब्रह्मात्मभावविरोधात् । नहि शरीराद्यात्मा-इत्यादि स्थलोंमें रागसे प्राप्त हनन क्रियासे निवृत्त होकर औदासीन्य ही ' नन् ' प्रतिषेधका अर्थं हम मानते हैं । इस कारण पुरुषार्थके अनुपयोगी उपाख्यानादि भूतार्थवाद विषयक आनर्थक्य अभिधान है, ऐसा समझना चाहिए । जो पहले कहा गया है कि कर्तव्य विधिके साथ सम्बन्धके विना कही हुई वस्तुमात्र ' सात द्वीप वाली पृथ्वी है ' इत्यादिके समान अनर्थक है । ' यह रज्जु है सर्प नहीं है ' इस प्रकार वस्तु मात्रके कथनसे भी भयादिकी निवृत्ति रूप प्रयोजन देखा गया है, इस तरहसे कहकर उसका परिहार किया गया है । परन्तु श्रुत ब्रह्म पुरुष में भी पूर्वके समान संसारित्व देखने में आता है, अतः रज्जुस्वरूप ( यह रज्जु है ) कथन के समान ब्रह्मस्वरूपको कथन सार्थक नहीं हो सकता, ऐसा पहले कहा गया है । सि ० - इसपर कहते हैं— ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार अवगत ब्रह्मात्म-भाववाले विद्वान्में पूर्वके समान संसारित्व नहीं दिखलाया जा सकता, क्योंकि वेद प्रमाणसे जनित सत्यानन्दी - दीपिका * ' नव् ' से प्राप्त जो निवृत्त्यात्मक अभाव ज्ञान है वह ब्राह्मण हिंसा के प्रवर्तक रागका नाश करता हुआ हनन कर्ताको हनन क्रियासे हटाकर उदासीन भावमें लाता हुआ स्वयं भी शान्त हो जाता है | ' तस्य बटोर्व्रतम् ' ( उस ब्रह्मचारीका यह व्रत है ) इस वाक्य में अनुष्ठेय क्रियाका वाचक व्रत शब्द है, उससे उपक्रमकर. ' नेक्षेतोद्यन्तमादीत्यम् ' ( उदय होते हुए सूर्यको ब्रह्मचारी न देखे अर्थात् दर्शन विरोधी संकल्परूप क्रिया करे ) यह उपसंहार वाक्य है । इससे ब्रह्मचारीके लिए प्रजापति व्रतका विधान किया गया है । जैसे यहाँ लक्षणासे प्रजापति व्रतमें सूर्यदर्शन विरोधी संकल्परूप क्रिया मानी गई है, वैसे ' ब्राह्मणो न हन्तव्यः ' में नहीं है । किन्तु यहाँ तो रागसे प्राप्त हनन क्रियाका अभाद ' नञ् ' पदका अर्थं है । हनन विरुद्ध संकल्परूप क्रिया नहीं । जैमिनि मुनिके ' आम्नायस्यं क्रियार्थत्वात् ' इस पूर्वपक्ष सूत्रसे क्रिया से भिन्न सिद्ध वस्तु प्रतिपादक वेदवाक्य अनर्थक कहे गये हैं उनका भी तात्पर्य यह है कि जिन वाक्योंका श्रवणादि करनेसे भी कुछ फल सिद्ध नहीं होता ऐसे पुरुषार्थंके अनुपयोगी उपाख्यान । यथा ' वज्रहस्तः पुरन्दरः ' इत्यादि † भूतार्थवाद ( कथामात्र ) व्यर्थं हैं । शेष वेदान्तवाक्य तो सफल होनेसे सर्वथा सार्थक हैं । * सि ० ०. – क्या केवल श्रुतब्रह्म तत्त्वज्ञानके अनन्तर श्रोतामें पूर्वकी भाँति संसारित्व है अथवा ब्रह्म साक्षात्कारके अनन्तर? प्रथमपक्ष तो हमें इष्ट ही है, क्योंकि केवल परोक्ष ज्ञानमात्रसे अपरोक्ष संसारित्व भ्रान्ति निवृत्त नहीं होती । द्वितीय पक्ष तो युक्त नहीं है, कारण कि मिथ्याज्ञानसे ही कर्तृत्व भोक्तृत्व संसारित्व अपनेमें माना हुआ है । वह ' स आत्मा तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्त वाक्योंके श्रवणसे उत्पन्न तत्त्वज्ञानद्वारा निवृत्त हो जाता है । ‡ टि ० -- ' विरोधे गुणवादः स्यादनुवादोऽवधारिते । भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवादास्त्रिधा मताः ' ( जहाँ प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरोध उपस्थित हो वहाँ गुणवाद, जहाँ वाक्यसे प्रतिपादित अर्थ प्रत्यक्षादिसे अवधारित हो वहाँ अनुवाद और जहाँ वाक्यसे प्रतिपादित अर्थका प्रमाणान्तरसे बाध न हो और अनुवाद मी न हो वह भूतार्थवाद कहा जाता है ) इसका विस्तृत वर्णन देवताधिकरण ( ब्र ० सू ० १।३।२६ ) में द्रष्टव्य है ।
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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ७५ मिमानिनो दुःखभयादिमत्त्वं दृष्टमिति तस्यैव वेदप्रमाणजनितब्रह्मात्मावगमे तदभिमान -निवृत्तौ तदेव मिथ्याज्ञाननिमित्तं दुःखभयादिमत्त्वं भवतीति शक्यं कल्पयितुम् । नहि धनिनो गृहस्थस्य धनाभिमानिनो धनापहारनिमित्तं दुःखं दृष्टमिति तस्यैव प्रव्रजितस्य धनाभिमान रहितस्य तदेव धनापहारनिमित्तं दुःखं भवति । नच कुण्डलिनः कुण्डलित्वा-भिमाननिमित्तं सुखं दृष्टमिति तस्यैव कुण्डलवियुक्तस्य कुण्डलित्वाभिमानरहितस्य तदेव कुण्डलित्वाभिमाननिमित्तं सुखं भवति । तदुक्तं श्रुत्या ' अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ' ( छान्दो ० ८।१२।१ ) इति । शरीरे पतितेऽशरीरत्वं स्यात्, न जीवति इति चेत्, - नः सशरीर-त्वस्य मिथ्याज्ञाननिमित्तत्वात् । न ह्यात्मनः शरीरात्माभिमानलक्ष्णं मिथ्याज्ञानं मुक्त्वा -न्यतः संशरीत्वं शक्यं कल्पयितुम् । नित्यमशरीरत्वमकर्मनिमित्तत्वादित्यवोचाम । तत्कृत-धर्माधर्मनिमित्तं सशरीरत्वमिति चेन्न, शरीरसम्बन्धस्यासिद्धत्वाद्धर्माधर्मयोरात्मकृतत्वा-सिद्धेः । शरीरसम्बन्धस्य धर्माधर्मयोस्तत्कृतत्वस्य चेतरेतराश्रयत्वप्रसङ्गादन्धपरम्परै-षाऽनादित्वकल्पना । * क्रियासमवायाभावाच्चात्मनः कर्तृत्वानुपपत्तेः । संनिधानमात्रेण राजप्रभृतीनां दृष्टं कर्तृत्वमिति चेन्न; धनदानाद्युपार्जितभृत्यसंबन्धित्वात्तेषां कर्तृत्वोपपत्तेः । नत्वात्मनो धनदानादिवच्छरीरादिभिः स्वस्वामिसंबन्धनिमित्तं किंचिच्छक्यं कल्पयितुम् । ब्रह्मात्मभावके साथ उसका विरोध है । [ इस अर्थको स्पष्ट करने के लिए भगवान् भाष्यकार तीन उदाहरण देते हैं, उनमें से प्रथम ] अनात्म शरीरादिमें आत्मबुद्धि रखनेवाले पुरुषमें दुःख भयादि देखे गये हैं, परन्तु वेदसे जनित ब्रह्मात्मभावावगम ( ज्ञान ) होनेपर देहात्मबुद्धिके निवृत्त हो जानेपर मिथ्याज्ञान निमित्त वही दुःख मयादि पहले के समान उस ( आत्मवित् ) में होते हैं, ऐसो कल्पना नहीं की जा सकती । [ द्वितीय उदाहरण ] धनाभिमानी धनी गृहस्थको धनापहारसे दुःख होता देखा गया है । संन्यास ग्रहण किए हुए धनाभिमान रहित उसी पुरुषको धनापहार निमित्तक वहीं दुःख नहीं होता । [ तृतीय उदा-हरण ] कुण्डल पहनने वालेको कुण्डलित्वाभिमान निमित्तक सुख होता देखा गया है, कुण्डलवियुक्त कुण्डलित्वाभिमान रहित उसी पुरुषको कुण्डलित्वाभिमान निमित्तक वही सुख नहीं होता । यही बात ' अशरीरं ० ' ( शरीर रहित हुए आत्माको सुख और दुःख स्पर्श नहीं करते ) इस श्रुति से भी कही गई है । यदि कहो कि शरीरपात होनेपर अशरीरत्व हो जायगा जीवित होनेपर नहीं? तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि सशरीरत्व मिथ्याज्ञान निमित्तक है । ' शरीर ही आत्मा है ' इस अभिमानरूप मिथ्याज्ञानको छोड़कर अन्य किसी कारण से आत्मामें सशरीरत्वकी कल्पना नहीं की जा सकती । कर्मसे उत्पन्न न होने के कारण अशरीरत्व नित्य है, ऐसा हम पहले कह चुके हैं । यदि कहो कि आत्मकृत धर्माधर्म निमित्तक उसमें सशरीरत्व है, तो ऐसा नहीं, क्योंकि आत्माका शरीरके साथ सम्बन्ध हो असिद्ध है, इससे धर्माधर्ममें आत्मकृतत्व भी असिद्ध है । आत्माका शरीर के साथ सम्बन्ध हो तो धर्माधर्मकी उत्पत्ति हो, आत्मकृत धर्माधर्म हों तो आत्माका शरीर के साथ सम्बन्ध हो, ऐसा अन्योन्याश्रय दोष प्रसक्त होगा । इन दोनोंका कार्यकारणभाव अनादि है, यह अनादित्व कल्पना भी अन्धपरम्परा है । क्रिया सम्बन्धके अभाव होनेसे आत्मा कर्ता भी नहीं हो सकता । यदि कहो कि सेवकोंके साथ सान्निध्यमात्रसे राजादिमें कर्तृत्व देखा गया है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि धन दानादि उपायोंसे सम्पादित सेवकोंके साथ सम्बन्ध होनेके कारण उनमें कर्तृत्वकी उपपत्ति होती है । परन्तु आत्मामें शरीरादिके साथ धनदानादिके समान स्वस्वामिभाव सम्बन्धके कारणकी किञ्चिदपि कल्पना नहीं की जा सकती । किन्तु मिथ्याभिमान तो सम्बन्धका हेतु प्रत्यक्ष है । इस कथन से आत्मामें यजमानत्वादिका प्रतिपादन हो गया अर्थात् जब तक
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७६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ मिथ्याभिमानस्तु प्रत्यक्षः सम्बन्धहेतुः । एतेन यजमानत्वमात्मनो व्याख्यातम् । अत्रा-हु: - देहादिव्यतिरिक्तस्यात्मन आत्मीये देहादावभिमानो गौणो न मिथ्येति चेन्न प्रसिद्धवस्तु-भेदस्य गौणत्वमुख्यत्वप्रसिद्धेः । यस्य हि प्रसिद्धो वस्तुभेदः, यथा केसरादिमानाकृति-विशेषोऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां सिंहशब्दप्रत्ययभाङमुख्योऽन्यः प्रसिद्धः, ततश्चान्यः पुरुषः प्रायिकः क्रौर्यशौर्यादिभिः सिंहगुणः संपन्नः प्रसिद्धः, तस्य पुरुषे सिंहशब्दप्रत्ययौ गौणौ भवतो नाप्रसिद्धवस्तुभेदस्य । तस्य त्वन्यत्रान्यशब्दप्रत्ययौ भ्रान्तिनिमित्तावेव भवतो गौणौ । यथा मन्दान्धकारे स्थाणुरयमित्यगृहमाणविशेषे पुरुषशब्दप्रत्ययौ स्थाणुविषयी, यथा वा शुक्तिकायामकस्माद्रजतमिति निश्चितौ शब्दप्रत्ययौ तद्वद्देहादिसंघातेऽहमिति निरुपचारेण शब्दप्रत्ययावात्मानात्माविवेके नोत्पद्यमानौ कथं गौणौ शक्यौ वदितुम्? आत्मानात्मविवेकिनामपि पण्डितानामजाविपालानामिवाविक्तौ शब्दप्रत्ययौ भवतः । तस्माद्देहादिव्यतिरिक्तात्मास्तित्ववादिनां देहादावहंप्रत्ययो मिथ्यैव, न गौणः । तस्मान्मि-थ्याप्रत्ययनिमित्तत्वात्सशरीरत्वस्य सिद्धं जीवतोऽपि विदुषोऽशरीरत्वम् । * तथा च ब्रह्म-विद्विषया श्रुतिः ' तद्यथाऽहिनिवयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेद शरीर शे । तेऽथायमशरीरोऽमृतः प्राणो ब्रह्मैव तेज एव ' ( बृह ० ४ । ४ । ७ ) इति । ' सचक्षुरचक्षुरिव सकर्णोऽकर्ण मिथ्याभिमान है तभी तक आत्मामें यजमानत्वादि भी हैं । इस विषय में प्रभाकर कहते हैं - देहादिसे मन आत्माका अपने देहादिमें ' मैं, मेरा ' अभिमान गौण है मिथ्या नहीं, यदि ऐसा कहो तो ठीक नहीं, क्योंकि जिसको वस्तुका भेद ज्ञात है उसीको गौण मुख्य ज्ञान होता है यह प्रसिद्ध है । जिसको दो वस्तुओंका भेव ज्ञात है, जैसे अन्वयव्यतिरेकसे सिंह शब्द सिंह ज्ञानका विषय केसर आदिसे युक्त, विशेष आकृति वाला, पुरुष से भिन्न सिंह प्रसिद्ध है और उससे भिन्न प्रायः क्रूरता एवं शूरता आदि सिंहके गुणोंसे सम्पन्न पुरुष भी ज्ञात है । उसको सिंह गुण सम्पन्न पुरुष में सिंह शब्द प्रयोग और सिंह ज्ञान गौण होते हैं | परन्तु जिसको वस्तुका भेद ज्ञात नहीं है उसको नहीं होते । उसको तो दूसरे अर्थ में अन्य शब्द और ज्ञान भ्रान्ति से ही होते हैं गौण नहीं । जैसे मन्द अन्धकारमें ' यह स्थाणु है ' ऐसे विशेष ज्ञानके गृहीत न होनेपर ' पुरुष ' यह शब्द और ज्ञान स्थाणुमें होते हैं, जैसे शुक्तिमें अकस्मात् ' यह रजत है ' यह शब्द और ज्ञान निश्चित होते हैं, वैसे देहादि संघातमें मुख्यरूपसे होनेवाले ' मैं ' ऐसा शब्द और ज्ञान आत्मा अनात्मा विवेक न होनेके कारण उत्पन्न होते हैं, वे गौण कैसे कहे जा सकते हैं? आत्मा, अनात्माका भेद जाननेवाले पण्डितोंको भी भेड़ बकरी पालनेवाले प्राकृत पुरुषोंके समान देहादिमें अपृथक् ग्रूप से शब्द प्रयोग और ज्ञान भ्रान्तिसे उत्पन्न होते हैं । इस कारण आत्माको देहादिसे भिन्न माननेवालोंका अहं प्रत्यय ( मैं ) मिथ्या ही है गौण नहीं | इससे यह सिद्ध हुआ कि सशरीरत्व मिथ्याज्ञानसे होता है और ज्ञान होनेपर जीवितावस्था में आत्मवित्को ही अशरीरत्व प्राप्त होता है । और उसी प्रकार ‘ तद्यथा ० ' ( जिस प्रकार सर्प की काँचुली बाँबीके ऊपर मृत और सर्प द्वारा परित्यक्त हुई पड़ी रहती है, उसी प्रकार विद्वान्, जिसने अभिमान त्याग दिया है उसका शरीर पड़ा रहता है और शरीर में स्थित यह आत्मा अशरीर है, अमृत, प्राण, ब्रह्म है स्वयं प्रकाश ही है ) और ' सचक्षु-रचक्षु ० ' ( वस्तुतः वह नेत्र रहित भी सनेत्रके समान, श्रोत्र रहित भी श्रोत्र सहित -सा, वाणी रहित मी सत्यानन्दी - दीपिका ** जैसे साँप अपनी काँचुली में अपनापन छोड़कर जहाँ चाहे उसे उत्तार फैंक देता है उसमें फिर अहंता ममता नहीं करता, वैसे ही आत्मवित् अपने स्थूल शरीरादिमें अहंता, ममता त्यागकर