श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 111–120

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 111 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ४० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित II इवसवागवागिव समना अमना इव सप्राणोऽप्राण इव ' इति च । स्मृतिरपि च- ' स्थितप्रज्ञस्यका भाषा ' ( भग ० गी ० २।५४ ) इत्याद्या स्थितप्रज्ञ लक्षणान्याचक्षाणा विदुषः सर्वप्रवृत्त्यसम्बन्धं दर्शयति । तस्मान्नावगतब्रह्मात्मभावस्य यथापूर्व संसारित्वम् । यस्य तु यथापूर्व संसारित्वं नासाववगतब्रह्मात्मभाव इत्यनवद्यम् । यत्पुनरुक्तं श्रवणात्पराचीनयो मेनननिदिध्यास-नयोदर्शनाद्विधिशेषत्वं ब्रह्मणो न स्वरूपपर्यवसायित्वमिति । नः अवगत्यर्थत्वान्मनन-निदिध्यासनयोः । यदि ह्यवगतं ब्रह्मान्यत्र विनियुज्येत भवेत्तदा विधिशेषत्वम् । नतु तदस्ति; मनननिदिध्यासनयोरपि श्रवणवदव गत्यर्थत्वात् । तस्मान्न प्रतिपत्तिविधिविषय-तया शास्त्रप्रमाणकत्वं ब्रह्मणः संभवतीत्यतः स्वतन्त्र मेव ब्रह्म शास्त्रप्रमाणकं वेदान्तवाक्य-सहित - सा मन रहित भी मन सहित सा, प्राण रहित भी प्राण सहित -सा है ) यह श्रुति ब्रह्मवित्के सम्बन्धमें है । ' स्थितप्रज्ञस्य ० ' ( जिसको प्रज्ञा स्थित है उसकी भाषा ( लक्षण ) क्या है ) इत्यादि स्मृति भी स्थितप्रज्ञका लक्षण कहती हुई यह दिखलाती है कि विद्वान्का सर्व प्रवृत्तिके साथ सम्बन्ध नहीं रहता है । इसलिए ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार ब्रह्मात्मभाव साक्षात्कार करनेवाला विद्वान् पूर्वके समान संसारी नहीं रहता । जो पूर्वके समान संसारी है मानो उसने ब्रह्मात्मभावका साक्षात्कार ही नहीं किया है । इस कारण वेदान्तशास्त्र निर्दोष है । पहिले जो यह कहा गया है कि श्रवणान्तर मनन और निदिध्यासन देखनेमें आते हैं, इसलिए ब्रह्म विधिका अङ्ग है स्वरूप पर्यवसायी नहीं, यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि श्रवणके समान मनन, निदिध्यासन भी ब्रह्मके साक्षात् ज्ञानके लिए हैं । यदि ज्ञात ब्रह्मा कहीं कर्मादिमें विनियोग होता तो विधिका अङ्ग भी होता, परन्तु ऐसा नहीं है अर्थात् वेदान्त श्रवण विना ब्रह्म अज्ञात है । श्रवणके समान मनन निदिध्यासन भी ज्ञानके लिए हैं । इसलिए उपासना विधिक विषयतारूपसे ब्रह्म शास्त्र प्रमाणक है यह संभव नहीं है । अतः वेदान्त वाक्योंके समन्वयसे ब्रह्म स्वतन्त्र शास्त्र प्रमाणक है, यह सिद्ध हुआ । ऐसा होनेसे ही ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' सत्यानन्दी - दीपिका उसमें रहता हुआ भी न रहेके समान होता है अर्थात् देहादिमें मिथ्याज्ञान मूलक आत्माभिमान निवृत्त होनेपर विद्वान् शरीरमें रहते भी अशरोर है, क्योंकि ' ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति ' इत्यादि श्रुति ब्रह्म ब्रह्मस्वरूप प्रतिपादित करती है । ब्रह्म मशरीर है, अतः ब्रह्मवित् भी अशरीर है । परन्तु - व्यवहारमें वह ' सचक्षुरचक्षुरिव ' ( चक्षु आदि इन्द्रियोंसे रहित होता हुआ भी चक्षु आदि इन्द्रियों सहित - सा प्रतीत होता है ) जिसने आत्मसाक्षात्कार कर लिया है उसके लिए ही शास्त्र आरोपित संसारित्वका निषेध करता है; अन्यके लिए नहीं, इसलिए शास्त्र सर्वथा दोष रहित है । * ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोनव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य: ' ( बृह ० २ | ४ | ५ ) इस श्रुति में श्रवणके अनन्तर मनन और निदिध्यासनकी विधि देखने में आती है । इसलिए ब्रह्म विधिका अङ्ग है, क्योंकि श्रवणमात्रसे अपने स्वरूप में निश्चित तात्पर्यवाला नहीं होता । परन्तु यह ठीक नहीं है, कारण कि श्रवणके समान मनन निदिध्यासन भी ब्रह्मज्ञानके लिए हैं । इनका श्रवणसे पृथक् प्रयोजन नहीं है । ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति ही सबका एकमात्र प्रयोजन है । ब्रह्मज्ञानका ब्रह्मसाक्षात्कार ही फल है । जब वह सोम यागादिके समान विधेय ही नहीं तो विधिका अङ्ग कैसे? विधिका अङ्ग वह होता है जो प्रथम ज्ञात हो और स्वयं फल न हो । परन्तु ब्रह्म तो वेदान्त श्रवणके पूर्व अज्ञात है और ब्रह्मात्मज्ञान होनेपर स्वयं फलरूप है । इसलिए ब्रह्म किसी भी विधिका अङ्ग नहीं हैं, तो उपासना विधिका विषयरूपसे शास्त्र प्रमाणक हो यह कथन भी असंगत है । अतः ब्रह्ममें स्वतन्त्र

पृष्ठ 112

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 112 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

७८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ १ पा ० १ समन्वयादिति सिद्धम् । एवं च सति ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इति तद्विषयः पृथक्शास्त्रा-रम्भ उपपद्यते । प्रतिपत्तिविधिपरत्वे हि ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' इत्येवारब्धत्वान्नपृथक्शास्त्र-मारभ्येत् । आरभ्यमाणं चैवमारभ्येत - अथातः परिशिष्टधर्मजिज्ञासा ' इति, ' अथातः क्रत्वर्थ-पुरुषार्थयोर्जिज्ञासा ' ( जै ० ४।१।१ ) इतिवत् । ब्रह्मात्मैक्यावगतिस्त्वप्रतिज्ञातेति तदर्थो युक्तः शास्त्रारम्भ; - ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इति । तस्मादहं ब्रह्मास्मीत्येतदवसाना एव सर्वे विधयः सर्वाणि चेतराणि प्रमाणानि । नाहयानुपादेयाद्वै तात्मावगतौ निर्विषयाण्यप्रमातृकाणि च प्रमाणानि भवितुमर्हन्तीति । अपि चाहु: - गौण मिथ्यात्मनोऽसत्त्वे पुत्रदेहादिबाधनात् । सद्ब्रह्मात्मा-इसप्रकार ब्रह्म विषयक पृथक् शास्त्रका आरम्भ युक्त है । वेदान्त यदि उपासना विधि परक होते तो ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' इसीसे आरब्ध हो जानेके कारण ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इस पृथक् शास्त्रका आरम्भ न होता । यदि कदाचित् आरम्भ भी किया जाता तो ' अथातः क्रत्वर्थ: ० ' ( अब अवशिष्ट धर्मकी जिज्ञासा ) इस प्रकार प्रारम्भ होता । ब्रह्म आत्मा के एकत्व ज्ञानकी प्रतिज्ञा पूर्व मीमांसा में नहीं है, इस कारण उसके लिए ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इस अपूर्व शास्त्रका आरम्भ युक्त है । इससे ' मैं ब्रह्म हूँ ' इसप्रकार के ज्ञान पर्यन्त सबं विधियाँ और अन्य सव प्रमाण हैं, क्योंकि हेयोपादेयसे अद्वैत आत्मावगति होनेपर निर्विषयक प्रमाता रहित प्रमाण नहीं हो सकते । ब्रह्मवेत्ता लोग कहते हैं— ' गौणमिथ्यात्मनो ० ' ( अबाधित सत्, चित् आनन्दस्वरूप ब्रह्म मैं हूँ, ऐसा ज्ञान होनेपर पुत्र देहादिका बाध होता है अर्थात् यह सब मायामात्र है वास्तविक नहीं, ऐसा निश्चय हो जाता है | उसमें गौणमिथ्यात्मा - पुत्र, दार, देहादिमें आत्माभिमान निवृत्त हो जानेपर विधि निषेधादि सब व्यवहार कैसे हो सकता है? गौण और मिथ्याभेदसे आत्माभिमान दो प्रकारका है । पुत्र दारां आदिमें ' मैं पुत्र हूँ, यह मेरा है ' इत्यादि आत्माभिमान गौण है, क्योंकि दोनोंका भेद ज्ञात है । उनके सुख दुःखसे अपनेको सुखी दुःखी अनुभव करता है । अपने देहादिमें ' मैं मनुष्य हूँ, कर्ता सत्यानन्दी - दीपिका रूपसे शास्त्र प्रमाण है, क्योंकि ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि वेदन्त वाक्योंका तात्पर्य ब्रह्ममें ही है । * यदि वेदान्त भी उपासना विधिका अङ्ग होता तो ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' इस शास्त्र के प्रथम आरब्ध हो जानेके कारण इससे पृथक् शास्त्रका आरम्भ न होता, क्योंकि दोनोंका विषय एक ही होता । यदि पूर्व आरब्ध विषयका आरम्भ करते हो ऐसा वर्णन करते कि जो धर्म पूर्व मीमांसा में प्रतिपादित है उस शेष धर्मके लिए जिज्ञासा करनी चाहिए तब तो इस शास्त्रके आरम्भमें ही भगवान् सूत्रकार भी ऐसी प्रतिज्ञा करते । किन्तु ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' इस सूत्र से पूर्वोक्त मीमांसा सूत्रसे विलक्षण ब्रह्मजिज्ञासाकी प्रतिज्ञा की है । इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्म और वेदान्त किसी भी विधिके अङ्ग नहीं हैं, अपितु स्वतन्त्र ही हैं । जैमिनि आचार्यने अपने पूर्वमीमांसा शास्त्र में कर्म, कर्मका फल, इतिकर्तव्यता का वर्णन किया है । उनके सिद्धान्तमें ब्रह्मको नहीं माना गया है इससे वहाँ जीव ब्रह्मकी एकताके विचारका अवकाश ही नहीं है । ' मैं ब्रह्म हूँ ' इसप्रकार ब्रह्मसाक्षात्कार जब तक नहीं होता तब तक ' यजेत, जुहोति दद्यात्, उपासीत ' इत्यादि विधियाँ तथा प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय इत्यादि सब उपपन्न होते हैं अर्थात् व्यावहारिक सत्यरूपसे उपयुक्त होते हैं । ' तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि, अयमात्मा ब्रह्म, सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' इत्यादि वेदान्तवाक्योंके श्रवणादिसे जब ब्रह्मरूपसे आत्माका साक्षात्कार हो जाता है तब प्रमाता, प्रमाण, प्रमेयरूप सब द्वैत बाधित हो जाता है, जैसे जागने पर स्वप्न पदार्थों का बाध हो जाता है ॥ ४ ॥

चतुः सूत्री समाप्ता ।

पृष्ठ 113

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 113 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो - दोपिकासहित ७ ९ हमित्येवं बोधे कार्यं कथं भवेत् ॥ अन्वेष्टव्यात्मविज्ञानात्प्राक्प्रमातृत्वमात्मनः । अन्विष्टः स्यात्प्रमातैव पाप्मदोषादिवर्जितः ॥ देहात्मप्रत्ययोयहृत्प्रमाणत्वेन कल्पितः । लौकिकं तदेवेदं प्रमाणं त्वाऽऽत्म-निश्वयात् ' इति ॥ ४ ॥

इति भाष्ये चतुःसूत्री समाप्ता । ( ५ ईक्षत्यधिकरणम् सू०५-११ ) * एवं तावद्वेदान्तवाक्यानां ब्रह्मात्मावगतिप्रयोजनानां ब्रह्मात्मनि तात्पर्येण समन्वितानामन्तरेणापि कार्यानुप्रवेशं ब्रह्मणि पर्यवसानमुक्तम् । ब्रह्म च सर्वज्ञं सर्वशक्ति जगदुत्पत्तिस्थितिनाशकारणमित्युक्तम् । सांख्यादयस्तु परिनिष्ठितं वस्तु प्रमाणान्तर-गम्यमेवेति मन्यमानाः प्रधानादीनि कारणान्तराण्यनुमिमानास्तत्परतयैव वेदान्त-वाक्यानि योजयन्ति । सर्वध्वेव वेदान्तवाक्येषु सृष्टिविषयेष्वनुमानेनैव कार्येण कारणं भोक्ता हूँ ' यह मिथ्याभिमान है । ये दोनों प्रकारके अभिमान बाधित हो जानेपर विधि निषेध आदि सब व्यवहार कैसे हो सकता? अर्थात् नहीं हो सकता ॥ ‘ अन्वेष्टव्यः ० ’ ( जो आत्मा सर्वपापरहित, जरा, मृत्यु, शोक आदिसे रहित है उसकी खोज करनी चाहिए ) इस आत्मज्ञानसे पूर्व ही चिद्रूप आत्मामें प्रमातृत्व रहता है । प्रमाताके यथार्थं स्वरूपका ज्ञान होनेपर पाप पुण्य रागद्वेष, जन्मादिसे रहित परमात्मस्वरूप हो जाता है । यहाँ शंका होती है कि यदि प्रमाता कल्पित है तो प्रमाताके आश्रित प्रमाणमें प्रमाणता कैसे सिद्ध होगी? समाधान - ' देहात्म ० ' ( जिसप्रकार ' मैं देह हूँ ' यह ज्ञान कल्पित होनेपर भी प्रमाण माना जाता है, उसीप्रकार प्रत्यक्षादि लौकिक प्रमाण भी आत्मसाक्षात्कार पर्यन्त प्रमाण हैं ) वेदान्त तीनों कालमें बाधरहित ब्रह्मात्मैकत्वका बोध करता है, अत: इसको तत्त्वका बोध करानेवाला प्रमाण कहा जाता है । पूर्वं पक्षमें मुमुक्षुकी वेदान्तोंमें प्रवृत्तिकी अनुपपत्ति है, सिद्धान्तमें प्रवृप्तिकी सिद्धि है, इसप्रकार दोनोंमें अन्तर है ॥ ४ ॥

चतुःसूत्री समाप्ता । इस प्रकार यह कहा गया कि वेदान्त वाक्योंका कार्यके साथ सम्बन्ध के विना भी एक अद्वितीय ब्रह्ममें पर्यवसान होता है, इन वाक्योंका प्रयोजन " यह आत्मा ब्रह्म है " ऐसा अपरोक्ष ज्ञान कराना है और वे ब्रह्मात्मामें तात्पर्यसे समन्वित हैं । और श्रुतिमें यह भी कहा गया है कि सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ब्रह्म ही जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और नाशका कारण है । परन्तु सांख्य आदि तो ऐसा मानते हैं कि सिद्ध वस्तु अन्य प्रमाणसे ही अवगत होती है । और प्रधान आदि अन्य कारणोंका अनुमान करके तत्परत्व ( प्रधानादि परत्व ) से ही वेदान्त वाक्योंकी योजना करते हैं । सृष्टि विषयक सम्पूर्ण वेदान्त वाक्यों में अनुमान द्वारा ही कार्यसे कारणके लक्षण बतानेकी चेष्टा की गई है । और सांख्य ऐसा मानते हैं कि प्रधान, पुरुष और उनका संयोग नित्य अनुमेय हैं । कणादके अनुयायी तो सत्यानन्दी - दीपिका * किञ्च सूत्रकारने " अथातो ब्रह्मजिज्ञासा " इस मूत्रसे जो ब्रह्मविषयक जिज्ञासाकी प्रतिज्ञा की है, वह ब्रह्म क्या वस्तु है? इस शंकाके समाधानमें सूत्रकारने “ जन्माद्यस्य यतः " इस द्वितीय सूत्रसे लेकर “ तत्तु समन्वयात् ” इस चतुर्थ सूत्र तक सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् तथा जगत्‌को उत्पत्ति, स्थिति और नाशका जो कारण है वही ब्रह्म है, यद्यपि ऐसा सूचित किया है, तथापि सूत्रकारने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया कि ब्रह्म चेतन ही इस जगत् का उपादान कारण है अथवा अचेतन? इसलिए तो यहाँ सन्देह होता है कि क्या जगत्का उपादानकारण चेतन है अथवा अचेतन? इस विषयमें सांख्य कहते हैं - ब्रह्म, कूटस्थ और विकाररहित है, उसका परिणाम होना तो असम्भव है, क्योंकि यह

पृष्ठ 114

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 114 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ लिलक्षयिषितम् । प्रधानपुरुषसंयोगा नित्यानुमेया इति सांख्या मन्यन्ते । * काणादास्त्वे-तेभ्य एव वाक्येभ्य ईश्वरं निमित्तकारणमनुमिमते, अणूंश्च समवायिकारणम् । एवमन्येपि तार्किका वाक्याभासयुक्त्या भासावष्टम्भाः पूर्वपक्षवादिन इहोत्तिष्ठन्ते । तत्र पदवाक्य-प्रमाणशेनाचार्येण वेदान्तवाक्यानां ब्रह्मात्मावगति परत्वदर्शनाय वाक्याभासयुक्त्याभास-उन्हीं वाक्योंसे ऐसा अनुमान करते हैं कि ईश्वर सृष्टिका निमित्त कारण है और अणु समवायिकारण हैं । इसी प्रकार अन्य तार्किक भी वाक्याभास और युक्त्याभासका अवलम्बन लेते हुए पूर्वपक्षी बनकर उपस्थित होते हैं । उक्त विवाद उपस्थित होनेपर वेदान्त बाक्योंका प्रयोजन ब्रह्मका अपरोक्षज्ञान कराना है, यह दिखलानेके लिए वाक्याभास और युक्त्याभासके आधारपर उपस्थित विरोधोंको पुर्वपक्ष बनाकर पद, वाक्य और प्रमाणके ज्ञाता आचार्य ( व्यास ) उनका निराकरण करते हैं । सत्यानन्दी - दीपिका अनुभव सिद्ध भी है कि कार्य कारणमें विकार लाए बिना उत्पन्न ही नहीं होता अर्थात् अपने अस्तित्वको सिद्ध नहीं कर पाता । इसलिए " सर्गाद्यं कार्यं जड़ प्रकृतिकं कार्यत्वात् घटवत् " ( सृष्टि आदि कार्य कार्य ( जन्य ) होनेके कारण जड़ प्रकृतिवाला है, जैसे घट । ) इस अनुमानसे प्रधान आदि जड़ कारणोंकी सिद्धि होती है ' यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि जगत् के उत्पत्ति आदिके प्रतिपादक वेदान्तवाक्य भी अनुमानद्वारा कार्यसे कारणका ज्ञान कराते हुए प्रधान आदि जड़ कारणोंका प्रतिपादन करते हैं । प्रलयकाल में सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणकी साम्यावस्थाको वे प्रधान कहते हैं । वही प्रधान, पुरुष और इनका संयोग नित्य अनुमेय हैं । यथा “ यज्जडं तच्चेतनसंयुक्तं यथा रथादि ” ) जो जड़ होता है वह चेतनसे युक्त होता है, जैसे रथ सारथिसे युक्त होता है, वैसे ही जड़ प्रधान भी चेतन पुरुषसे युक्त होना चाहिए ) । इस प्रकार पुरुष, प्रधान और इनका संयोग नित्य अनुमेय ही हैं । * वेदान्तमतमें सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् ब्रह्म जगत्‌का अभिन्ननिमित्तोपादान करण है और सांख्य मतमें प्रधान कर्तृकारण है । अब भगवान् माष्यकार इस उक्त मतके विरोधी अन्य मतका ' काणादास्तु ' इत्यादिसे उल्लेख करते हैं । कणाद के अनुयायी ऐसा मानते हैं कि " यत्कार्यं तत्बुद्धिसकर्तृकम् ” ( जो कार्य है वह बुद्धिमान् कर्तासे जन्य है, जैसे घट । ) क्योंकि चेतन कर्ता में कार्यानुकूल ज्ञान, इच्छा तथा प्रयत्न होते हैं, किन्तु जड़ प्रधान आदिमें कार्यानुकूल ज्ञान आदि नहीं होते, अतः जड़ प्रधानको जगत्का कर्तृकारण मानना अयुक्त है, किन्तु चेतनको ही इस जड़ जगत्का कर्तृकारण मानना चाहिए । यद्यपि बुद्धि आदि गुणोंसे युक्त जीव चेतन है और घट आदि कार्यका कर्ता भी है, फिर भी अल्पज्ञ और अल्प शक्ति आदि युक्त होने से इस विचित्र, विशाल संसार के निर्माण आदि करनेमें वह सर्वथा असमर्थ है । अतः ‘ यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ' ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि श्रुतिवाक्योंके आधारपर जगत्के उत्पत्ति आदिका निमित्तकारण सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् ईश्वर है । वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी के परमाणु इस कार्य जगत् के प्रति उपादान कारण हैं । शून्यवादी बौद्ध - " असदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् " ( छा ० ६।२।१ ) ( आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय असत् ही था ) इत्यादि श्रुति वाक्योंके आधारपर इस जगत्‌का उपादान कारण शून्यको मानते हैं । और " यत् वस्तु तत् शून्यावसानं यथा दीपः " जो वस्तु है वह अन्त में शून्यमें लीन होती है, जैसे दीपक । इस प्रकार वाक्याभास और युक्त्याभासोंका अवलम्बनकर वादी भिन्न - भिन्न मतोंके द्वारा विरोध

पृष्ठ 115

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 115 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ५ सू ० ५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८१ विप्रतिपत्तयः पूर्वपक्षीकृत्य निराक्रियन्ते । * तत्र सांख्या ः प्रधानं त्रिगुणमचेतनं जगतः कारणमिति मन्यमाना आहुः- यानि वेदान्तवाक्यानि सर्वज्ञस्य सर्वशक्त ब्रह्मणो जगत्का-रणत्वं प्रदर्शयन्तीत्यवोचंस्तानि प्रधानकारणपक्षेऽपि योजयितुं शक्यन्ते । सर्वशक्तित्वं तावत्प्रधानस्यापि स्वविकारविषयमुपपद्यते । एवं सर्वज्ञत्वमप्युपपद्यते । * कथम्? यत्तु ज्ञानं मन्यसे स सत्त्वधर्मः, ' सत्वात्संजायते ज्ञानम् ' ( गी ० १४।१७ ) इति स्मृतेः । तेन च सत्त्व-धर्मेण ज्ञानेन कार्यकरणवन्तः पुरुषाः सर्वज्ञा योगिनः प्रसिद्धाः । सत्त्वस्य हि निरतिशयो-उनमें त्रिगुणात्मक अचेतन प्रधान जगत्‌का कारण है, यह माननेवाले सांख्यमतावलम्बी कहते हैं-तुमने कहा है कि जो वेदान्त वाक्य सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् ब्रह्ममें जगत् की कारणताको दिखलाते हैं, वे प्रधान कारण पक्ष में भी लगाए जा सकते हैं । स्वकार्यकी अपेक्षा प्रधानमें भी सर्वशक्तित्व उपपन्न है, एवं सर्वज्ञत्व भी उपपन्न है । प्रधान सर्वज्ञ कैसे हो सकता है? जिसे तुम ज्ञान मानते हो वह सत्त्व-गुणका धर्म है, क्योंकि ' सत्त्वात्संजायते ज्ञानम् ' ( सत्त्वगुणसे ज्ञान उत्पन्न होता है ) यह स्मृति है । उस सत्त्वगुणके धर्मरूप ज्ञानसे कार्य ( देह ) करण ( इन्द्रिय ) वाले पुरुष योगी सर्वज्ञ प्रसिद्ध हैं । सत्यानन्दी - दीपिका प्रदर्शित करते हैं । तब पद ( व्याकरण ) वाक्य ( मीमांसा ) प्रमाण ( न्याय ) आदि शास्त्रों में पारंगत भगवान् विष्णुके ज्ञानशक्ति अवतार + आचार्य भगवान् व्यास वेदान्त वाक्य ब्रह्म परक हैं, यह दिखलाने के लिए उन विरोधों का उल्लेख करते हैं । अब भगवान् भाष्यकार उनमें से प्रथम ' तत्र ' आदिसे सांख्यमतका उल्लेख करते हैं । * ' मूलप्रकृतिरविकृतिमहदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥ ' ( सां ० का ० ३ ) ( मूल प्रकृति - प्रधान सबका मूलकारण है वह किसीका कार्य नहीं है अर्थात् इसका कोई कारण नहीं है । सृष्टिकालमें सर्वप्रथम प्रकृतिसे महद् उत्पन्न होता है, महदसे अहंकार, अहंकारसे मन, पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं । महद्, अहंकार और पाँच तन्मात्राएँ ये सात कार्यं और कारण उभयात्मक हैं, अर्थात् महद् प्रधानका कार्य है और अहंकारका कारण भी है, अहंकार महदका कार्य है और एकादश इन्द्रियों और पाँच तन्मात्राओं ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ) का कारण भी है । शब्द आदि पाँच तन्मात्राओंसे आकाश आदि पाँच भूत उत्पन्न होते हैं, इसलिए ये उक्त तन्मात्राएँ आकाश आदि पाँच भूतोंके कारण हैं । एकादश इन्द्रियाँ और आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी ये पाँच स्थूलभूत, ये सोलह केवल कार्यं हैं अर्थात् ये तत्त्वान्तरको उत्पन्न नहीं करते, अतः कारण नहीं हैं और चेतन पुरुष तो न कार्य है और न कारण ) इस प्रकार सांख्यमतमें पच्चीस तत्त्व हैं । प्रधान चेतन पुरुषके संयोगसे महदसे लेकर इस सम्पूर्ण प्रपञ्चको उत्पन्न करता है, इससे स्वकार्यकी अपेक्षा प्रधान में सर्वशक्तिमत्त्व है इसी प्रकार सर्वज्ञत्व भी, अतः वेदान्तवाक्योंकी ' प्रधान जगत्का कारण है ' इस पक्षमें योजना हो सकती है । * जितना जितना सत्त्वगुणका उत्कर्ष होता है अर्थात् रज़ो और तमोगुणसे जितना जितना अनभिभूत - शुद्ध सत्त्व होता है उतना उतना ज्ञानका भी उत्कर्ष होता है । इस आधारपर योगदर्शन में भी कहा गया है कि ' तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ' ( योग ० १।२५ ) ( उसमें सत्त्वगुणकी निरतिशयता-अत्यन्तशुद्धता - रजो और तमोगुणसे अनभिभूतता ही सर्वज्ञताका कारण है ) ' सत्त्वं लघुप्रकाशकम् ' ( सां ० का ० १३ ) ( सत्त्व गुण लाघव युक्त और प्रकाशक है ) और यह लोकप्रसिद्ध भी है कि सत्त्व-टि ०: - + आचिनोति च शास्त्रार्थं आचारे स्थापयत्यपि । स्वयमाचरते यस्मादाचार्यः स उदाहृतः ॥

पृष्ठ 116

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 116 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ त्कर्षे सर्वज्ञत्वं प्रसिद्धम् । न केवलस्याकार्यकरणस्य पुरुषस्योपलब्धिमात्रस्य सर्वज्ञत्वं किंचिज्ज्ञत्वं वा कल्पयितुं शक्यम् । * त्रिगुणत्वात्तु प्रधानस्य सर्वज्ञानकारणभूतं सत्त्वं प्रधानावस्थायामपि विद्यत इति प्रधानस्याचेतनस्यैव सतः सर्वज्ञत्वमुपचर्यते वेदान्त-वाक्येषु । अवश्यं च त्वयापि सर्वज्ञं ब्रह्माभ्युपगच्छता सर्वज्ञानशक्तिमत्त्वेनैव सर्वज्ञत्वमु-पगन्तव्यम् । नहि सर्वदा सर्वविषयं ज्ञानं कुर्वदेव ब्रह्म वर्तते । तथाहि - ज्ञानस्य नित्यत्वे ज्ञानक्रियां प्रति स्वातन्त्र्यं ब्रह्मणो हीयेत । अथानित्यं तदिति ज्ञानक्रियाया उपरमेतापि ब्रह्म तदा सर्वज्ञानशक्तिमत्त्वेनैव सर्वज्ञत्वमापतति । अपि च प्रागुत्पत्तेः सर्वकारकशून्यं सत्त्वका निरतिशय उत्कर्ष होनेपर सर्वज्ञत्वं प्रसिद्ध है । देह और इन्द्रिय रहित केवल ज्ञानस्वरूप पुरुषमें सर्वज्ञत्व अथवा अल्पज्ञत्वकी कल्पना नहीं की जा सकती । प्रधान त्रिगुणात्मक है, इसलिए तो सब ज्ञानोंका कारणभूत सत्त्वगुण प्रधान - अवस्थामें विद्यमान है । इस कारण अचेतन होनेपर भी प्रधानका ही वेदान्त वाक्यों में सर्वज्ञत्व उपचरित है अर्थात् गौणवृत्तिसे प्रतिपादित है । सर्वज्ञ ब्रह्म है, ऐसा स्वीकार करनेवाले तुमको भी अवश्य सर्वज्ञानशक्तिमत् होनेसे ही ब्रह्म में सर्वज्ञत्व मानना चाहिए, क्योंकि ब्रह्म सदा ही सर्व विषयक ज्ञान करता हुआ नहीं रहता । यदि ज्ञान नित्य है तो ज्ञान क्रियाके प्रति ब्रह्मकी स्वतन्त्रता नष्ट हो जायगी, यदि वह अनित्य है तो ज्ञानक्रिया के न रहनेपर कदाचित् ब्रह्म उससे उपरत भी हो जायगा । इससे तो यह सिद्ध होता है कि सर्वज्ञान शक्तिमत्त्वसे ही ब्रह्म में भी सर्वज्ञत्व प्राप्त होगा । किञ्च उत्पत्तिके पूर्व तुम ब्रह्मको सर्वकारकोंसे रहित मानते हो, तो ज्ञानके साधन शरीर, इन्द्रियादिके अभाव में ज्ञानकी उत्पत्ति किसीके मतमें भी युक्त नहीं है । सत्त्व, रज सत्यानन्दी - दीपिका गुणके अत्यन्त उत्कर्षं होनेपर देह और इन्द्रिययुक्त पुरुष योगी सर्वज्ञ होते हैं । उस सत्त्वगुणका अत्यन्त उत्कर्ष प्रधानमें तो है, अतः उसमें सर्वज्ञता मानना युक्त है । * सि ० - अब यहाँ शंका होती है कि जब सांख्यमत से प्रलयकालमें तीनों गुणोंकी साम्यावस्था ही प्रधान है तो उस अवस्थामें रज और तम दोनों गुणोंकी समानरूपसे विद्यमानता होनेपर सत्त्व-गुणका अत्यन्त उत्कर्ष कैसे हो सकता है और तदाश्रित प्रधानमें सर्वज्ञता किस प्रकार हो सकती है? पू ० — उस अवस्थामें प्रधान त्रिगुणात्मक है इस कारण उसमें सम्पूर्ण ज्ञानका कारणभूत सत्त्वगुण भी है, अतः अचेतन प्रधानमें वेदान्तवाक्योंद्वारा गौणवृत्तिसे सर्वज्ञता कही जा सकती है I । किञ्च वेदान्त प्रतिपाद्य सर्वज्ञब्रह्मको अङ्गीकार करनेवाले तुमको भी ब्रह्मको सर्वज्ञ इसकारण स्वीकार करना होगा कि उसमें सर्वविषयक ज्ञान करनेकी शक्ति है । क्योंकि ब्रह्म सदा ही सब विषयोंका ज्ञान करता हुआ नहीं रहता । प्रलयकालमें अनित्य ज्ञानका तो नाश हो जाता है । किन्तु सत्त्वगुण में सर्वज्ञताकी स्वरूप योग्यता रहती है, अतः उसका उत्कर्ष होनेपर ईश्वर सर्वज्ञता प्राप्त कर लेगा । इसलिए सत्त्व-सर्वज्ञताकी शक्ति अवश्य माननी चाहिए । * सांख्यमतमें जड़ प्रधान ही जगत्का कर्तृकारण है और पुरुष पुष्करपलाशवत् निर्लेप है । पुरुषके भोग तथा अपवर्ग ( मोक्ष ) के लिए प्रधान सृष्टि करनेमें प्रवृत्त होता है । प्रधान जड़ है, अतः एकाकी कुछ करनेमें समर्थ नहीं है और पुरुष असंग है, वह भी एकाकी कारण नहीं हो सकता । इसलिए प्रधान पुरुषके संयोगसे सृष्टि करनेमें प्रवृत्त होता है । जैसे सभा में नर्तकी अपना नृत्य दिखाकर हट जाती है, वैसे प्रधान भी पुरुषको अपना प्रपञ्च दिखाकर अर्थात् भोग और अप-वर्ग संपादन कर निवृत्त हो जाता है । ' असङ्गो ह्ययं पुरुषः ' वस्तुतः पुरुष असंग होनेसे बन्ध और

पृष्ठ 117

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 117 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ५ सू ० ५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८३ ब्रह्मेष्यते त्वया । न च ज्ञानसाधनानां शरीरेन्द्रियादीनामभावे ज्ञानोत्पत्तिः कस्यचिदुप-पन्ना । अपि च प्रधानस्यानेकात्मकस्य परिणाम संभवात्कारणत्वोपपत्तिर्मृदादिवत्, नासं-हृतस्यैकात्मकस्य ब्रह्मण इत्येवं प्राप्त इदं सूत्रमारभ्यते— ईक्षतेनशब्दम् || ५ || पदच्छेद - ईक्षतेः, न, अशब्दम् । सूत्रार्थ - ( अशब्दम् ) श्रुति अप्रतिपादित होनेके कारण प्रधान जगत्का कारण ( न ) नहीं है, ( ईक्षतेः ) क्योंकि ' तदक्षत ' श्रुतिमें जगत्का कारण ईक्षण कर्ता कहा गया है, जड़ प्रधानमें ईक्षणकर्तृत्व नहीं है । न सांख्यपरिकल्पितमचेतनं प्रधानं जगतः कारणं शक्यं वेदान्तेष्वाश्रयितुम् । अशब्दं हि तत् । कथमशब्दत्वम्? ईक्षतेः - ईक्षितृत्वश्रवणात्कारणस्य । कथम्? एवं हि श्रूयते - ' सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ' ( छान्दो ० ६ । २ ।१ ) इत्युपक्रम्य ' तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत ' ( छान्दो ० ६।२।३ ) इति । तत्रेदं शब्दवाच्यं नामरूपव्याकृतं जगत्प्रा-गुत्पत्तेः सदात्मनावधार्य तस्यैव प्रकृतस्य सच्छन्दवाच्यस्येक्षण पूर्वकं तेजः प्रभृतेः स्रष्टृत्वं दर्शयति । तथान्यत्र - ' आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् । नान्यत्किंचन मिषत् । स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति । स इमॉलोकानसृजत ' ( ऐत ० १1१1१ ) इतीक्षा पूर्विकामेव सृष्टिमाचष्टे । और तम इस भेदसे अनेकात्मक प्रधानका परिणाम सम्भव है, अतः वह मृत्तिकादिके समान कारण हो सकता है । परन्तु सङ्घात रहित असङ्ग अद्वितीय ब्रह्म नहीं । इसप्रकार पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर इस सूत्रका आरम्भ किया जाता है--सांख्य परिकल्पित अचेतन प्रधान जगत्का कारण वेदान्तोंमें नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह श्रुति सिद्ध नहीं है । यदि कहो कि श्रुति सिद्ध क्यों नही है? इससे कि कारणमें ईक्षणकर्तृत्व सुना जाता है । कैसे? ' सदेव सोम्य ० ' ( हे प्रियदर्शन! आरम्भ में यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था ) ऐसा आरम्भ कर आगे कहा है- ' तदेक्षत ० ' ( उसने ईक्षण किया कि मैं अनेक हो जाऊँ अर्थात् अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ, इसप्रकार ईक्षणकर उसने तेज उत्पन्न किया ) यह श्रुति ' इदम् ' शब्द वाच्य नाम - रूपसे अभिव्यक्त जगत् का उत्पत्तिके पूर्व सद्रूपसे निश्चयकर उसी प्रकृत सत् शब्द वाच्य ( ब्रह्म ) में ईक्षण पूर्वक तेज आदिका स्रष्टृत्व दिखलाती है । इसीप्रकार अन्य स्थलपर ' आत्मा वा ० ' ( आरम्भमें एकमात्र आत्मा ही था, उसके सिवा अन्य कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं थी, उसने ईक्षण किया कि लोकों की रचना करूँ, उसने अम्भ, मरीचि, मर और आप इन लोकोंकी रचना की ) इसप्रकार यह श्रुति ईक्षण पूर्वक सृष्टिको कहती है । कहीं पर षोडशकल पुरुषको प्रस्तुत कर सत्यानन्दी - दीपिका मोक्षसे रहित है । धर्म, अधर्म, ज्ञान, अज्ञान, वैराग्य, अवैराग्य, ऐश्वर्य और अनैश्वर्य इन स्वभाव सिद्ध भावोंसे युक्त प्रधानका ही बन्ध और मोक्ष है, केवल पुरुषमें उनका व्यवहार मात्र होता है । जैसे सेवकके जय, पराजयका स्वामीमें गौण व्यवहार होता है, वैसे ही प्रधानके बन्ध और मोक्षका पुरुषमें केवल गौण व्यवहार होता है । इससे यह सिद्ध हुआ कि जगत्‌का कारण प्रधान है । गत अधिकरणमें सर्ववेदान्त प्रतिपाद्य ब्रह्मको ही जगत्का कारण कहा गया है, परन्तु वह कूटस्थ होने के कारण जगत्का कारण नहीं हो सकता, अपितु ज्ञान क्रिया शक्ति युक्त त्रिगुणात्मक प्रधान ही जगत् का कारण है, इसप्रकार आक्षेपसङ्गतिसे पूर्वपक्ष होनेपर इस अधिकरणका आरम्भ किया जाता है । * कलाओंसे रहित वह निष्फल पुरुष मायारूप उपाधिसे कलावान्की तरह प्रतीत होता है । ' ईक्षांचक्रे ' ( उपाधियुक्त उस षोडशकल पुरुषने ईक्षण किया कि किस कर्ता विशेषके देहसे उत्क्रमण

पृष्ठ 118

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 118 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पाद १ कचिश्च षोडशकलं पुरुषं प्रस्तुत्याह - ' स ईक्षांचक्रे । स प्राणमसृजत ' ( प्रश्न ० ६ । ३ ) इति । ईक्षतेरिति च धात्वर्थनिर्देशोऽभिप्रेतः, यजतेरितिवत् । न धातुनिर्देशः । तेन ' यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ' ( मुण्ड ०१1१1 ९ ) इत्येवमादी-न्यपि सर्वज्ञेश्वरकारणपराणि वाक्यान्युदाहर्तव्यानि । यसूक्तं सत्त्वधर्मेण ज्ञानेन सर्वज्ञं प्रधानं भविष्यतीति; तन्नोपपद्यते । नहि प्रधानावस्थायां गुणसाम्यात्सत्त्वधर्मो ज्ञानं संभवति । ननूक्तं सर्वज्ञानशक्तिमत्त्वेन सर्वज्ञं भविष्यतीति । तदपि नोपपद्यते । यदि गुणसाम्ये सति सवव्यपाश्रयां ज्ञानशक्तिमाश्रित्य सर्वज्ञं प्रधानमुच्येत, कामं रजस्तमो-व्यपाश्रयामपि ज्ञान प्रतिबन्धकशक्तिमाश्रिस्य किंचिज्ज्ञमुच्येत । अपि च नासाक्षिका सत्त्व-वृत्तिनातिनाऽभिधीयते । न चाचेतनस्य प्रधानस्य साक्षित्वमस्ति । तस्मादनुपपन्नं प्रधानस्य सर्वज्ञत्वम् । योगिनां तु चेतनत्वात्सत्त्वोत्कर्षनिमित्तं सर्वज्ञत्वमुपपन्नमित्यनुदा ' स. ईक्षांचक्रे ० ' ( उसने ईक्षण किया अर्थात् नाम रूपात्मक जगत्की उत्पत्तिका सङ्कल्प किया, उसने प्राणको उत्पन्न किया ) ऐसा कहा है । ' यजति ' के समान यहाँ ' ईक्षति ' से धातुके अर्थका निर्देश अभिप्रेत है, धातु मात्रका निर्देश नहीं । इससे ' यः सर्वज्ञः ० ' ( जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है जिसका ज्ञानमय ही तप है, उससे यह हिरण्यगर्भ, नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होता है ) इत्यादि सर्वज्ञ ईश्वर कारण परक वाक्य भी उदाहरणरूपसे देने चाहिएँ । जो यह कहा गया है कि सत्त्वगुणके धर्मरूप ज्ञानसे प्रधान सर्वज्ञ होगा, यह कथन युक्त नही है, क्योंकि प्रधानावस्था में गुणोंका साम्य होनेसे सत्त्वगुणका धर्मरूप ज्ञान हो ही नहीं सकता । परन्तु जो यह कहा गया कि सर्वज्ञानके शक्तिमत्त्वसे प्रधान सर्वज्ञ होगा? वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि गुणोंके साम्य होनेपर भी यदि सत्त्वगुणके व्यपाश्रय ज्ञानशक्तिका आश्रयणकर प्रधानको सर्वज्ञ कहो तो रजो और तमोगुण व्यपाश्रय ज्ञान प्रतिबन्धक शक्तिका आश्रयणकर ( प्रधानको ) अल्पज्ञ भी कहना होगा । और साक्षी रहित सत्त्वगुणकी वृत्तिका ' ज्ञा ' धातुसे विधान नहीं किया जा सकता । अचेतन प्रधान साक्षी नहीं है, इस कारण प्रधानमें सर्वज्ञत्व अनुपपन्न है । योगी तो चेतन हैं, अतः उनमें सत्त्वगुणके उत्कर्षके कारण सर्वज्ञत्व युक्त है, इसलिए इस स्थल में यह उदाहरण ठीक नहीं है । जैसे अयःपिण्डादिमें दग्धृत्व अग्निनिमित्तक है, सत्यानन्दी - दीपिका करनेपर मैं भी देहसे उत्क्रमण कर जाऊँगा और जिसके देहमें स्थित रहनेपर मैं भी देह में स्थित रहूँगा ) इसप्रकार पुरुषने ईक्षणकर ' सं प्रणमसृजत प्राणाच्छ्राद्धां खं वायुर्ज्येतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च ' ( प्रश्न ० ६।८ ) ( उस पुरुषने प्राण ( हिरण्यगर्भ ) की सृष्टिकी, फिर प्राणसे श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन और अन्नको तथा अन्नसे वीर्य, तप, मन्त्र ( ऋग्वेदादि ), कर्म ( अग्निहोत्रादि ) और लोकोंको एवं लोकोंमें ( देवदत्तादि ), नामको उत्पन्न किया ) यह षोडशकला विषयक श्रुति है । यद्यपि ' इक्तिपौ धातुनिर्देशे ' ( इक् और तिप् प्रत्यय धातुके निर्देशमें होते है ) इस कात्यायन वचनके अनुसार ' तिप् ' प्रत्ययान्त ' ईक्षति ' शब्द ' ईक्ष ' धातुका वाचक है, तथापि ' इतिकर्तव्यताविधेः यजतेः पूर्व-वत्त्वम् ' ( ' ७ | ४ | १ ) जैमिनिसूत्र में जैसे ' यजति ' पद ' यज ' धातुको न कहकर लक्षणा से धात्वर्थं यागका बोध है, वैसे यहाँ भी ' ईक्षति ' पद ' ईक्ष ' धातु को न कहकर धात्वर्थ ईक्षणका बोधक है । * प्रधानमें सत्त्वगुणका उत्कर्षं तब होता जब उसके प्रतिबन्धक रजो और तमोगुण समान रूपसे विद्यमान न होते । इतना होनेपर भीं यदि अभिनिवेश से प्रधानको सर्वज्ञ कहो तो अवश्य

पृष्ठ 119

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 119 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अधि ० ५ सू ० ५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८५ हरणम् । * अथ पुनः साक्षिनिमित्तमीक्षितृत्वं प्रधानस्य कल्प्येत, यथाग्निनिमित्तमयः-पिण्डादेर्दग्धृत्वम्; तथा सति यन्निमित्तमीक्षितृत्वं प्रधानस्य तदेव सर्वज्ञं मुख्यं ब्रह्म जगतः कारणमीति युक्तम् । यत्पुनरुक्तं - ब्रह्मणोऽपि न मुख्यं सर्वज्ञत्वमुपपद्यते, नित्यज्ञान क्रियत्वे ज्ञान क्रियां प्रति स्वातंत्र्यासंभवादिति । अत्रोच्यते - इदं तावद्भवान्प्रष्टव्यः, कथं नित्यज्ञान-क्रियत्वे सर्वज्ञत्वहानिरिति । यस्य हि सर्वविषयावभासनक्षमं ज्ञानं नित्यमस्ति सोऽसर्वज्ञ इति विप्रतिषिद्धम् । अनित्यत्वे हि ज्ञानस्य कदाचि जानाति कदाचिन्नजानातीत्य सर्वज्ञत्वमपि स्यात् । नासौ ज्ञाननित्यत्वे दोषोऽस्ति । ॐ ज्ञाननित्यत्वे ज्ञानविषयः स्वातन्त्र्यव्यपदेशो नोपपद्यत इति चेन्न, प्रततौष्ण्यप्रकाशेऽपि सवितरि दहति प्रकाशयतीति स्वातन्त्र्यव्यपदेश-वैसे ही प्रधानमें ईक्षितृत्व साक्षी निमित्तक है ऐसी यदि कल्पना करो तो प्रधानमें ईक्षितृत्वका जो निमित्त है वही सर्वज्ञ मुख्य ब्रह्म जगत्का कारण है, यह युक्त है । और यह जो कहा गया है कि ब्रह्ममें भी मुख्य सर्वज्ञत्व उपपन्न नहीं है, क्योंकि ब्रह्मकी नित्य ज्ञानक्रिया होनेके कारण ज्ञानक्रिया के प्रति उसकी स्वतन्त्रता असम्भव है । इस विषय में कहते हैं - परन्तु पहले तो आप यह बताइए कि नित्य ज्ञानक्रिया के होनेपर सर्वज्ञ ताकी हानि किसप्रकार होगी? सब पदार्थोंके प्रकाश करनेकी सामर्थ्य रखने वाला जिसका ज्ञान नित्य है और वह स्वयं असर्वज्ञ है, यह कथन विरुद्ध है! यदि ज्ञानको ही अनित्य मानें तो कभी जानता है और कभी नहीं जानता है इसप्रकार ब्रह्म असर्वज्ञ भी होगा? परन्तु ज्ञानके नित्यत्व पक्ष में यह दोष नहीं है । यदि कहो कि ज्ञानको नित्य माननेपर ज्ञानविषयक ( ब्रह्म में ) स्वातन्त्र्य व्यपदेश अनुपपन्न है, तो यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि निरन्तर स्थायी सत्यानन्दी - दीपिका अल्पज्ञ भी कहना होगा, क्योंकि प्रलय में प्रवर्तक रजोगुण और आवरक तमोगुणका भी तो समान उत्कर्ष है । ऐसी परिस्थिति में अल्पज्ञता और सर्वज्ञता परस्पर विरुद्ध दोनों धर्मं युगपत् प्रधानमें कैसे रहेंगे? यदि कहो कि प्रधानावस्था में केवल सत्त्वगुणका ही उत्कर्ष होता है अन्य गुणोंका नहीं, तो यह कथन केवल साहसमात्र है, क्योंकि इसमें कोई नियामक नहीं । साक्षोके विना केवल सत्त्वगुणकी वृत्ति भी ज्ञान नहीं होती, कारण कि वह जड़ है । साक्षी चेतनसे प्रतिबिम्बित चित्तवृत्तिको ज्ञान कहा जाता है और उसीसे वस्तुका ज्ञान होता है । अचेतन प्रधान भी साक्षी नहीं है, इस कारण प्रधान में सर्वज्ञत्त्व भी असंभव है । योगी पुरुष तो चेतन हैं, अतः उनमें सत्त्वगुणके उत्कर्ष और अन्य गुणोंके अपकर्षके कारण सर्वज्ञता हो सकती है । इसलिए प्रधानके विषय में सत्त्व उत्कर्ष युक्त योगी पुरुष सर्वज्ञ होते हैं, यह उदाहरण ठीक नहीं है, क्योंकि प्रधान अचेतन है और योगी पुरुष चेतन हैं । * अब ईश्वरवादी पातञ्जलमतका ' अथ पुनः ' इत्यादिसे दिग्दर्शन कराते हुए भगवान् भाष्यकार निराकरण करते हैं । * सर्वज्ञत्वका अर्थं सर्वविषयक ज्ञान है ज्ञानकर्तृत्व नहीं अर्थात् सभी पदार्थोंको जानना ही सर्वज्ञता है, क्योंकि ईश्वर ज्ञानको किसी करण ( प्रयत्न ) द्वारा उत्पन्न नहीं करता प्रत्युत वह तो नित्य है । नित्यत्वके साथ व्यापकत्वका अविनाभाव सम्बन्ध है । ज्ञान नित्य होनेके कारण ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वकी हानि कदापि नहीं हो सकती । यदि ज्ञानको अनित्य मानें तो ब्रह्म में असर्वज्ञता आ सकती है जैसे संसारी जीवोंमें देखी जाती है । परन्तु ज्ञानके नित्य होनेसे ब्रह्ममें अल्पज्ञता दोष भी नहीं है । * शंका – - यदि ज्ञानको नित्य मानें तो नित्य ज्ञानके प्रति ब्रह्म स्वतन्त्र नहीं होगा, इसके साथ ' सर्वं जानातीति सर्वज्ञः ' ( जो सभीको जानता है वह सर्वज्ञ है ) यह सर्वज्ञताकी सर्वमान्य i

पृष्ठ 120

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्), पृष्ठ 120 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ दर्शनात् । ननु सवितुर्दाह्यप्रकाश्यसंयोगे सति दहति प्रकाशयतीति व्यपदेशः स्यात्, न तु ब्रह्मणः प्रागुत्पत्ते ज्ञनिकर्म संयोगोऽस्तीति विषमो दृष्टान्तः । * नः असत्यपि कर्मणि सविता प्रकाशत इति कर्तृत्वव्यपदेशदर्शनात् । एवमसत्यपि ज्ञानकर्मण ब्रह्मणः ' तदैक्षत ' ( छान्दो ० ६ || ३ ) इति कर्तृत्वव्यपदेशोपपत्तेर्न वैषम्यम् । कर्मापेक्षायां तु ब्रह्मणीक्षितृत्वश्रुतयः सुतरामुपपन्नाः । किं पुनस्तत्कर्म, यत्प्रागुत्पत्तेरीश्वरज्ञानस्य विषयो भवतीति? तच्चान्य-त्वाभ्यामनिर्वचनीये नामरूपे अव्याकृते व्याचिकीर्षिते इति ब्रूमः । यत्प्रसादाद्धि योगिनाम-व्यतीतानागतविषयं प्रत्यक्षं ज्ञानामिच्छन्ति योगशास्त्रविदः, किमु वक्तव्यं तस्य नित्यसिद्धस्ये श्वरस्य सृष्टिस्थितिसंहृतिविषयं नित्यज्ञानं भवतीति । यदप्युक्तं प्रागुत्पत्ते ब्रह्मणः शरीरादि-उष्णता और प्रकाश से युक्त सूर्यमें भी जलाता है प्रकाश करता है इसप्रकार स्वतन्त्र शब्द व्यवहार देखा जाता है | यदि कहो कि सूर्यका दाह्य तथा प्रकाश्य पदार्थोंके साथ संयोग होनेपर जलाता है प्रकाश करता है ऐसा व्यपदेश होता है, तो यहां जगत्की उत्पत्तिके पहले ब्रह्मके ज्ञानका कर्मके साथ संयोग ( सम्बन्ध ) ही नहीं है, इससे यह दृष्टान्त विषम है । यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि कर्मके न होनेपर अर्थात् कर्मके अविवक्षित होनेपर भी ' सूर्य प्रकाश करता है ' जैसे सूर्यमें कर्तृत्व व्यपदेश हो सकता है, वैसे ही ज्ञानका कर्म न होनेपर भी ' तदैक्षत ' इसप्रकार ब्रह्ममें कर्तृत्व व्यपदेश हो सकता है । इसलिए सूर्यके दृष्टान्तसे कोई वैषम्य नहीं है । कर्मकी अपेक्षामें तो ब्रह्म में ईक्षण-कर्तृत्व प्रतिपादक श्रुतियाँ सुतरां उपपन्न हैं । यदि पूछो कि वह कर्म क्या है जो कि उत्पातके पहले ईश्वरके ज्ञानका विषय होता है? हम कहते हैं - जो सत् और असत्से विलक्षण अनिर्वचनीय है, और है तो अव्याकृत ( अव्यक्त ) परन्तु व्याकृत ( अभिव्यक्त ) करने के लिए इष्ट है वह नाम, रुप ही तो कर्म है । योग शास्त्रवेत्ता भी यही कहते हैं कि जिस ईश्वरके प्रसादसे ही योगी पुरुषोंको भी जब भूत और भविष्यत् विषयक प्रत्यक्ष ज्ञान होता है तो उस नित्य स्वयं सिद्ध ईश्वरका जगत्की उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार विषयक ज्ञान नित्य हो, इस विषय में तो फिर कहना ही क्या है । जो यह सत्यानन्दी - दीपिका व्युत्पत्ति है | यदि ब्रह्ममें ज्ञानकर्तृत्व मानें तो यह व्युत्पत्ति कैसे सिद्ध होगी? समाधान - यद्यपि शुद्ध प्रकाशस्वरूप ज्ञान नित्य है, तथापि जैसे नैयायिक आकाशको नित्य मानते हुए भी अनित्य घटादि उपाधि अनित्य मानते हैं, क्योंकि ' घटाकाशो जातः ' ऐसा व्यवहार होता है, वैसे तत्, तत् विषयरूप उपाधियोंसे युक्त होनेके कारण ब्रह्मस्वरूपसे उसमें भेदकी कल्पनाकर अनित्यत्वका गौण व्यवहार होता है । इसप्रकार अनित्यज्ञान के प्रति ब्रह्म में कर्तृत्व व्यवहार हो सकता है । जैसे सदा ही उष्ण और प्रकाशरूप होनेपर भी सूर्यमें दाह और प्रकाशरूप क्रियाके प्रति कर्तृत्व व्यवहार होता है, ठीक वैसे ही ज्ञानस्वरूप ब्रह्ममें भी ' तदैक्षत ' यह ईक्षणरूप ज्ञानकर्तृत्व व्यवहार माना जाता है । * इसप्रकार निरीश्वरवादी सांख्यके प्रति ब्रह्ममें सर्वज्ञत्व सिद्धकर अब ईश्वरवादी पातञ्जल मतावलम्बियोंके प्रति ब्रह्ममें सर्वज्ञत्व सिद्ध किया जाता है । पातञ्जल मतानुसार ' क्लेशकर्मविपाकाश-यैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वर: ' ( यो ० सू ० १।२४ ) ( अविद्या, अस्मिता ( अहंकार ) राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच क्लेश हैं, ये क्लेश - दुःख देते हैं, अतः क्लेश कहे जाते हैं, शुभ, अशुभ और मिश्रित भेदसे कर्म तीन प्रकारके हैं, विपाक - कर्मफल ( जन्म, आयु और भोग ) | कर्म फलोंसे चित्त में उत्पन्न वासना - संस्कार - आशय हैं, इन सभीसे असम्बन्धित संसारी पुरुषोंसे विलक्षण ईश्वर है ) यह ईश्वरका लक्षण है । ' ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ' ( यो ० सू ० १।२ ९ ) ईश्वर के प्रणि-