श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 91–100

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 91–100

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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५७ तम्यं तत्साधनतारतम्यं च शास्त्रात् ' यावत्संपातमुषित्वा ' ( छान्दो ० ५/१०/५ ) इत्यस्माद् गम्यते । तथा मनुष्यादिषु नारकस्थावरान्तेषु सुखलवश्चोदनालक्षणधर्मसाध्य एवेति गम्यते तारतम्येन वर्तमानः । तथोर्ध्वगतेष्वधोगतेषु च देहवत्सु दुःखतारतम्यदर्शनात्त-द्धेतोरधर्मस्य प्रतिषेधचोदनालक्षणस्य तदनुष्ठायिनां च तारतम्यं गम्यते । एवमविद्यादि-रहकर वे फिर इसी मार्ग से जिस प्रकार गये थे उसी प्रकार लौटते हैं ) इस शास्त्रसे स्पष्ट अवगत होता है । इस प्रकार मनुष्य आदिसे लेकर नारकीय एवं स्थावर पर्यन्त जीवोंमें तारतम्यसे वर्तमान सुख लव चोदनात्मक धर्मसे ही जन्य ज्ञात होता है । इसी प्रकार ऊर्ध्वगत तथा अधोगत देहधारी जीवोंमें दु: खका तारतम्य देखनेसे उसके हेतु भूत प्रतिषेध चोदनात्मक ( प्रतिषेध प्रवर्तक वाक्योंसे बोधित ) अधर्मका और उसके अनुष्ठान करनेवालोंका तारतम्य ज्ञात होता है । एवं अविद्या आदि दोष विशिष्ट जीवोंके धर्म और अधर्मके तारतम्यसे शरीर ग्रहण पूर्वक सुख सत्यानन्दी - दीपिका अग्निस्वात् आदि पितर, आजानदेव, कर्मदेव, देव, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति पर्यंन्त पूर्वं पूर्व से उत्तरोत्तर सौ गुना आनन्द प्राप्त होता है । ' ते ये शतं प्रजापतेरानन्दः । स एको ब्रह्मण आनन्दः श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ' ( तै ० २।८।४ ) ( प्रजापतिके जो सौ आनन्द हैं वही ब्रह्मोका एक आनन्द है और वह अकामहत ब्रह्मनिष्ठ श्रोत्रियको भी प्राप्त है ) इस प्रकार मनुष्यसे लेकर ब्रह्मा पर्यन्त आनन्दका तारतम्य श्रुतिमें कहा गया है । मोक्ष फल तो नित्य निरतिशय आनन्द स्वरूप एक है और मोक्षका साधन तत्त्वज्ञान भी एक ही है । इस प्रकार कर्म और विद्याके फलोंमें महान् अन्तर है । मोक्षका साधन चतुष्टय सम्पन्न अधिकारी भी एक ही प्रकारका है । किन्तु कर्म अनेक, उनके फल अनेक तो स्वभावतः उसके अधिकारी भी अनेक हैं । किञ्च याग तथा पञ्चाग्नि विद्याके उपासक अर्चि मार्गद्वारा ब्रह्मलोकको जाते हैं । कल्पपर्यंन्त फिर इस मानव लोकको प्राप्त नहीं होते । ‘ अग्निहोत्रं तपस्सत्यं वेदानां चानुपालनम् । आतिथ्यं वैश्वदेवं च इष्टमित्यभिधीयते ॥१ ॥

वापीकूपतडागादिदेवतायतनानि च । अन्नप्रदानमारामः पूर्तमित्यभिधीयते ॥ २ ॥

शरणागतसंत्राणं भूतानां चाप्यहिंसनम् । बहिर्वेदि च यद्दानं दत्तमित्यभिधीयते ॥३ ॥

( अग्निहोत्र, तप, सत्य, वेदोंका संरक्षण, अतिथि सत्कार और वैश्वदेव ' इष्ट ' कहलाता है । बावड़ी, कुआँ, तालाब, देवालय और बाग बनवाना तथा अन्नदान करना ' पूर्त ' कहलाता है । शरणा-गतकी रक्षा करना, प्राणियोंको पीड़ा न पहुँचाना और वेदीके बाहर दान देना ' दत्त ' कहलाता है ) इत्यादि कर्मोंका कर्ता देह त्यागके अनन्तर " धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते " ( गी ० ८।२५ ) ( धूम आदि मार्ग द्वारा धूमसे रात्रि, कृष्ण-पक्ष, दक्षणायन, षण्मास, पितृलोक, आकाशसे चन्द्रलोकको प्राप्त होता है ) इस प्रकार मनुष्य लोकसे ऊपर - ऊपर लोकोंमें गये जीवोंमें सुखका उत्तरोत्तर उत्कर्ष दिखलाकर अब इससे निम्नतर लोकोंमें गये जीवों में सुखका तारतम्य ' तथा ' इत्यादिसे कहते हैं । * जैसे मनुष्य से लेकर ब्रह्मा पर्यन्त तारतम्यसे वर्तमान सुख धर्मके तारतम्यसे है, वैसे मनुष्यसे लेकर नरक पर्यन्त तारतम्यसे वर्तमान सुख भी धर्मसे ही है । विषयेन्द्रिय जन्य सुख तो नारकीय जीवोंको भी उपलब्ध है । अब ' तथोर्ध्वम् ' इत्यादि भाष्यसे दुःख, उसका हेतु और उसके अनुष्ठान करनेवालोंका भेद कहते हैं । अब द्विविध कर्म फलोंका उपसंहार करते हैं- अविद्या, अस्मिता ( अहंकार ), राग, द्वेष और अभिनिवेश ( मृत्युभय ) आदि दोष युक्त जीव धर्म और अधर्मके

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५८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ दोषवतां धर्माधर्मतारतम्यनिमित्तं शरीरोपादानपूर्वकं सुखदुःखतारतम्यमनित्यं संसार-रूपं श्रुतिस्मृतिन्यायप्रसिद्धम् । तथा च श्रुतिः - ' न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपह-तिरस्ति ' ( छान्दो ० ८।१२।१ ) इति यथावर्णितं संसाररूपमनुवदति । * ' अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ( छान्दो ० ८ | १२ | १ ) इति प्रियाप्रियस्पर्शनप्रतिषेधाच्चोदनालक्षणधर्म-कार्यत्वं मोक्षाख्यस्याशरीरत्वस्य प्रतिषिध्यत इति गम्यते । धर्मकार्यत्वे हि प्रियाप्रियस्पर्श-नप्रतिषेधो नोपपद्यते । अशरीरत्वमेव धर्मकार्यमिति चेन्न; तस्य स्वाभाविकत्वात् । ' अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ' ( काठ ० १।२।२१ ) ' अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः ' ( मुण्ड ० २।१।२ ) ' असङ्गो ह्ययं पुरुष: ' ( बृह ० ४ | ३ | १५ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अत एवानुष्ठेयकर्मफलविलक्षणं मोक्षाख्यमशरीरत्वं नित्यमिति सिद्धम् । * तत्र किंचित्परिणा-मिनित्यं यस्मिन्विक्रियमाणेऽपि तदेवेदमिति बुद्धिर्न विहन्यते; यथा पृथिव्यादिजगन्नित्य-त्ववादिनाम् । यथा च सांख्यानां गुणाः * इदं तु पारमार्थिकं कूटस्थनित्यं व्योम-दुःखका तारतम्य अनित्य संसाररूप है, ऐसा श्रुति, स्मृति और न्यायमें प्रसिद्ध है । इसी प्रकार ' न ह वै सशरीरस्य ० ' ( निस्सन्देह उस सशरीर आत्माके सुख दुःखका विनाश नहीं होता ) यह श्रुति यथावर्णित संसाररूपका अनुवाद करती है । ' अशरीरं वाव ० ' ( देहादि अभिमान रहित आत्माको मिथ्या देह सम्बन्धी सुख - दुःखं स्पर्श नहीं करते ) इस श्रुतिसे प्रिय और अप्रिय सम्बन्ध के प्रतिषेधसे मोक्ष नामक शरीर रहित अवस्था चोदनात्मक धर्मका कार्य है इसका प्रतिषेध किया गया है, ऐसा अवगत होता है । मोक्षको धर्मका कार्य मानें तो उसमें प्रियाप्रिय स्पर्शका प्रतिषेध अनुपपन्न है । यदि कहो कि अशरीरत्व ही धर्मका कार्य हो तो यह युक्त नहीं हैं ' क्योंकि ' अशरीरं ० ' ( जो देवादि शरीरोंमें शरीर रहित तथा अनित्योंमें नित्य स्वरूप है, उस महान् और सर्वं व्यापक आत्माको [ मैं ब्रह्म हूँ ] जानकर विद्वान् शोक नहीं करता ) ' अप्राणो ० ' ( प्राण रहित, मन रहित, शुद्ध है ) ' असङ्गो ० ' ( यह पुरुष असङ्ग है ) इत्यादि श्रुतियों से ज्ञात होता है कि अशरीरत्व उसका स्वभाव है । अतएव अनुष्ठेय कर्मफलसे विलक्षण मोक्ष नामक अशरीरत्व नित्य है, यह सिद्ध हुआ । [ नित्य भी दो प्रकारका होता है परिणामी नित्य तथा पारमार्थिक नित्य ] इन दोनोंमें परिणामी नित्य वह है जिसके विकृत होनेपर भी ' वही यह है ' ऐसी प्रतिज्ञारूप बुद्धिका नाश नहीं होता । जगत् को नित्य माननेवालोंके मतमें जैसे पृथ्वी आदि परिणामी नित्य हैं । और सांख्योंके मतमें जैसे गुण परिणामी नित्य हैं । परन्तु यह ( ब्रह्म ) सत्यानन्दी - दीपिका तारतम्यसे शरीर ग्रहण द्वारा अनित्य संसारको प्राप्त कर सुख दुःखका अनुभव करता है । ' तस्मि -न्यावत्संपात ' इत्यादि श्रुति, " क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति " इत्यादि स्मृति और कारणके नाशसे कार्यका नाश होता है, जैसे वृक्षके नाशसे फल, छायादिका नाश होता है, वैसे धर्माधर्मके नाश होने से तज्जन्य शरीर और शरीरद्वारा भोग्य सुख दुःख आदिका भी नाश हो जाता है, इत्यादि न्यायमें प्रसिद्ध है । किन्तु मोक्ष नित्य, निरतिशय, अतीन्द्रिय और शोकादिसे रहित है, अतः वह कर्मका फल नहीं है । * ' यत्सत्त्वे यत्सत्त्वं यदभावे यदभावः ' यह अन्वयव्यतिरेक है अर्थात् शरीर आदि अनात्मा-मिमान हो तो सुख - दुःखादि हों, शरीर आदि अनात्माभिमान न हो तो सुख दुःखादि भी न हों, यह अभिप्राय श्रुति में प्रतिपादित है । आत्मरूप मोक्ष नित्य होनेपर भी. परिणामी होनेके कारण धर्मका कार्यं हो सकता है, ऐसी शङ्काके होनेपर ' तत्र ' इत्यादिसे नित्यका भेद दिखलाते हैं । * जो परिणामी और नित्य हो वह परिणामी नित्य कहलाता है । पूर्वं रूपका परित्याग कर दूसरे रूपको प्राप्त करनेका नाम परिणाम है । जैसे पृथ्वी किसी समय घास, वृक्षादि अवस्थाको प्राप्त

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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ५ ९ वत्सर्वव्यापि, सर्वविक्रियारहितम्, नित्यतृप्तम्, निरवयवम्, स्वयञ्ज्योतिः स्वभावम् । यत्र धर्माधर्मौ सह कार्येण कालत्रयञ्च नोपावर्तेते । तदेतदशरीरत्वं मोक्षाख्यम् । ' अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च ' ( कठ ० २।१४ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अतस्तद्ब्रह्म यस्येयं जिज्ञासा प्रस्तुता, तद्यदि कर्तव्यशेषत्वेनोपदिश्येत, तेन च कर्तव्येन साध्यश्चेन्मोक्षोऽभ्युपगम्येत, अनित्य एव स्यात् । तत्रैवं सति यथोक्तकर्मफलेष्वेव तार-तम्यावस्थितेष्वनित्येषु कश्चिदतिशयो मोक्ष इति प्रसज्येत । नित्यश्च मोक्षः सर्वैर्मोक्षवा-दिभिरभ्युपगम्यते, अतो न कर्तव्यशेषत्वेन ब्रह्मोपदेशो युक्तः । अपि च ' ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ' तो पारमार्थिक, कूटस्थ, नित्य, आकाशके समान सर्वव्यापक, सभी विक्रियाओंसे रहित, नित्य तृप्त, निरवयव और स्वयं प्रकाश स्वरूप है । जिस परमात्मामें धर्माधर्मं, सुख दुःखं रूप कार्यके साथ तीनों कालोंमें भी सम्बन्ध नहीं रख सकते । ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( जो धर्माधर्म, कार्यं कारण, भूत भविष्यत् से भिन्न है ) इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध मोक्ष नामक अशरीरत्व है । इसलिए कर्मफलसे विलक्षण होने के कारण वह अशरीर मोक्ष ब्रह्म है जिसकी यह जिज्ञासा प्रस्तुत है । यदि वह ( ब्रह्म ) कार्य के अङ्गरूपसे उपदिष्ट हो और उस कार्य से मोक्ष साध्य स्वीकृत किया जाय तो वह अनित्य ही होगा । मोक्ष अनित्य सिद्ध होनेपर तारतम्य ( न्यूनाधिक ) से वर्तमान यथोक्त अनित्य कर्मफलोंमें से कोई अतिशय मोक्ष है ऐसा मानना पड़ेगा । परन्तु सब मोक्षवादी यह स्वीकार करते हैं कि मोक्ष नित्य है । इस कारण कार्यके अङ्गरूपसे ब्रह्मका उपदेश युक्त नहीं है । और ' ब्रह्म वेद ० ' ( ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म सत्यानन्दी - दीपिका होकर पुनः उनके विनाश होनेपर मृत्तिका आदिकी अवस्था प्राप्त करती है । उत्पत्ति और विनाश दोनों अवस्थाओंमें ' पृथ्वी है ' ऐसी बुद्धि बनी रहती है, इसलिए पृथ्वी परिणामी नित्य है । इसी प्रकार प्रायः सब द्रव्य पदार्थं परिणामी नित्य समझने चाहिए | क्या उस वस्तुका सर्वात्मना परिणाम है अथवा एक देशका? यदि सर्वात्मना परिणाम मानें तो मूल वस्तुका ही नाश हो जायगा । यदि एक देश रूपसे मानें तो वह मूल वस्तुसे भिन्न है कि अभिन्न? यदि भिन्न है तो उसका परिणाम कैसे होगा? क्योंकि अन्यके परिणामसे अन्यका परिणाम नहीं होता । यदि मानें तो अतिप्रसङ्ग होगा । यदि अभिन्न है तो मूल वस्तुका ही नाश हो जायगा, इसलिए परिणामी नित्यता वास्तविक नहीं है । सांख्यमतमें सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण प्रलयमें साम्यावस्थामें रहकर प्रधान कहलाते हैं, सृष्टिकालमें गुणोंकी विषमता तथा स्वप्रधानताके अनुसार सुख - दुःख मोहादि प्रपञ्चरूपसे परिणामभावको प्राप्त होते हैं, इसलिए दोनों अवस्थाओं में गुण अनुस्यूत हैं अर्थात् सत्त्व गुण स्वप्रधानतासे सुखाकार, रजोगुण स्व-प्रधानतासे दुःखाकर और तमोगुण स्वप्रधानतासे मोहाकार परिणामको प्राप्त होते हैं । * आत्माको कूटस्थ, नित्य, व्यापक आदि कहकर उत्पत्ति आदि सब विक्रियाओं ( विकारों ) का निषेध किया गया है । उत्पाद्य, प्राप्य विकार्य तथा संस्कार्य ये क्रियाके फल हैं । कूटस्थ शब्दसे उत्पाद्यका सर्वव्यापी शब्दसे आप्यका, सर्व विक्रिया रहित शब्दसे विकार्यका तथा निरवयव शब्दसे संस्काका क्रमशः निषेध किया गया है । क्योंकि यह सब परिच्छिन्न सावयवमें होते हैं । ' व्योमवत् ० ' यह दृष्टान्त परमत ( न्यायमत ) को लेकर कहा गया है, वेदान्त सिद्धान्तमें तो आकाश मी कार्य होनेसे अनित्य है I । मोक्षावस्थामें आत्माको जड़ माननेवालेके मतका ' स्वयं ज्योतिः ' शब्दसे खण्डन किया गया है । क्योंकि ' अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः ' इत्यादि श्रुति ब्रह्मको स्वप्रकाश स्वरूप कहती है । इस प्रकार कर्मके अनित्य फलसे भिन्न मोक्षरूप फल नित्य ब्रह्मस्वरूप है जिसको जिज्ञासा करनी चाहिए ।

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६० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ ( मुण्ड ० ३।२।९ ) ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ( मुण्ड ० २।२।८ ) । ' आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कुतश्चन ' ( तैत्ति ० २।९ ) ' अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि ' ( बृह ० ४।२1४ ) । ' तदात्मा-नमेवावेदेदं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सर्वमभवत् ' ( वाजसनेयिब्राह्मणोप ० १ | ४ | १० ) ' तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ' ( ईशा ० ७ ) इत्येवमाद्याः श्रुतयो ब्रह्मविद्यानन्तरं मोक्षं दर्शयन्त्यो मध्ये कार्यान्तरं वारयन्ति । तथा ' तद्वैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्च ' ( बृह ० १।४।१० ) इति ब्रह्मदर्शन सर्वात्मभावयोर्मध्ये कर्तव्यान्तरं वारणायोदाहार्यम् । यथा तिष्ठन्गायतीति तिष्ठतिगायत्योर्मध्ये तत्कर्तृकं कार्यान्तरं नास्तीति गम्यते । ' त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसि ' ( प्रश्न ० ६।८ ) ' श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्म-विदिति सोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्छोकस्य पारं तारयतु ' ( छान्दो ० ७।१।३ ) ' तस्मै मृदित-कषायाय तमसः पारं दर्शयति भगवान्सनत्कुमारः ' ( छान्दो ० ७।२६।२ ) इति चैवमाद्याः श्रुतयो मोक्षप्रतिबन्धनिवृत्तिमात्रमेवात्मज्ञानस्य फलं दर्शयन्ति । तथा चाचार्यप्रणीतं न्यायोप-ही होता है ) क्षीयन्ते चास्य ० ' ( उस परावर ब्रह्मका साक्षात्कार कर लेनेपर इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं ) ' आनन्दं ० ' ( ब्रह्मके आनंदको जाननेवाला विद्वान् किसीसे भयभीत नहीं होता ) ' अभयं ० ' ( याज्ञवल्क्य - हे जनक! तू निश्चय अभयको प्राप्त हो गया है ) ' तदात्मन ० ' ( अज्ञानके निवृत्त होने के कारण जीव संज्ञक ब्रह्मने गुरुके उपदेशसे अपनेको ही ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा जाना, अत: वह सर्व हो गया ) ' तत्र को मोहः ० ' ( उस समय एकत्वका अनुभव करनेवाले उस विद्वान्को क्या शोक और क्या मोह हो सकता है ) इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्मज्ञानके अनन्तर मोक्ष दिखलाती हुई ब्रह्मज्ञान और मोक्षके मध्यमें कार्यान्तरका निषेध करती हैं । इसी प्रकार ' तद्वैतत् ० ' ( वह ब्रह्म मैं - प्रत्यगात्मा हूँ, ऐसा ज्ञान प्राप्तकर मुनीन्द्र वामदेव शुद्ध ब्रह्मस्वरूप हुए अर्थात् उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषिवामदेवने जाना - मैं मनु हुआ और सूर्य मी ) इस श्रुतिको ब्रह्मदर्शन तथा सर्वात्मभाव के मध्य में अन्य कर्तव्यका निषेध करनेके लिए उदाहरणरूपसे समझना चाहिए । जैसे ' खड़ा होकर गायन करता है ' इसमें खड़े होने और गायन क्रियाके मध्य में तत्कर्तृक अन्य कार्य नहीं है, ऐसा ज्ञात होता है । [ सुकेश भारद्वाज आदि छः ऋषियोंने पिप्पलाद गुरुसे कहा - ] ' त्वं हि ० ' ( तुम ही तो हमारे पिता हो जो हमें अविद्या के परपार पहुँचा दिया है ) ' श्रुतं ह्येव ० ' ( मैंने भगवत् तुल्य आप जैसोंसे सुना है कि आत्मवित् शोकको पार कर लेता है अर्थात् शोकसे मुक्त हो जाता है, और हे भगवन्! मैं शोक करता हूँ, ऐसे मुझको आप शोकसे पार- मुक्त कर दीजिए ऐसा नारदने कहा ) ' तस्मै ० ' ( भगवान् सनत्कुमारने उस दग्ध पाप नारदको अज्ञानरूपी अन्धकारसे पार ( ब्रह्म ) दिखलाया ) इत्यादि श्रुतियाँ दिखलाती हैं कि मोक्ष के प्रतिबन्ध ( अज्ञान ) की निवृत्तिमात्र आत्मज्ञानका फल है । सत्यानन्दी - दीपिका ब्रह्मज्ञान और कर्मज्ञानमें अन्तर यह है कि केवल कर्मज्ञानसे स्वर्ग आदि फलकी प्राप्ति नहीं होती, किन्तु कर्मज्ञान और उसके फलके मध्य में अनुष्ठेय याग आदि कर्म करने पड़ते हैं । उनका फल कालान्तर वा जन्मान्तरमें होता है । परन्तु यहाँ तो इसके विपरीत है, जैसे प्रदीपसे अन्धकारकी निवृत्तिरूप दृष्ट फल में अन्य कर्तव्य अवशेष नहीं है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान और मोक्षरूपी दृष्ट फलके मध्यमें भी कुछ अन्य कर्त्तव्य नहीं है । ब्रह्मज्ञानका फल मोक्ष यदि कालान्तरमें माना जाय तो ' ब्रह्म-विद् ब्रह्मैव भवति ', ' अत्र ब्रह्म समश्नुते ' इत्यादि श्रुतियोंका बाध होगा, जो सर्वथा असङ्गत है । ' एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थि विकिरती सोम्य ० ' ( मुण्ड २ | १ | १० ) ( जो इस गुहा में

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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ६१ बृंहितं सूत्रम् -'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः ' ( न्या ० सू ० १।१।२ ) इति । मिथ्याज्ञानापायश्च ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानाद्भवति । न चेदं ब्रह्मात्मै-कत्वविज्ञानं संपद्रूपम्, यथा ' अनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वेदेवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ' ( बृह ० ३ | १ | ९ ) इति । न चाध्यासरूपम्, यथा ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत् ' ( छान्दो ० ३ | १८1१ ) ' आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः ' ( छान्दो ० ३ | १ ९ | १ ) इति च मन आदित्यादिषु ब्रह्मदृष्ट्यध्यासः । * नापि विशिष्टक्रियायोगनिमित्तं ' वायुर्वाव संवर्ग: ' ( छान्दो ० ४।३।१ ) ' प्राणो वाव संवर्ग: ' उसी प्रकार ( दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, धर्म, अधर्म, दोष एवं मिथ्याज्ञान इनमें कारणरूप उत्तर - उत्तरका नाश होनेसे उसके पूर्व - पूर्व कार्यका नाश होकर मोक्ष प्राप्त होता है ) इस प्रकार युक्तियोंसे पुष्ट आचार्य गौतम प्रणीत यह सूत्र है । मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानसे होती है । यह ब्रह्मात्मैकत्व विज्ञान सद्रूप नहीं है, जैसे अनन्तं वै ० ' ( मन अनन्त है और विश्वेदेव भी अनन्त हैं ) इसलिए मनमें अनन्त विश्वे -देवोंकी दृष्टि करने के कारण वह अनन्तलोकको जीतता - प्राप्त करता है ), यह ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञान अध्यासरूप भी नहीं है, जैसे ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ' ( मन ब्रह्म है, ऐसी उपासना करे ) ' आदित्यो ब्रह्म ० ' ( आदित्य ब्रह्म है, ऐसा आदेश है ) इस प्रकार मन और आदित्यादिमें ब्रह्मदृष्टि अव्यासरूप है । ' वायुर्वाव ० ' ( वायु ही सत्यानन्दी - दीपिका स्थित गुप्त ब्रह्मको जानता है, हे सोम्य! वह अविद्याकी गाँठ ( चिद् - जड़ ग्रन्थि ) को तोड़ता है ) | • मोक्षका प्रतिबन्धक अज्ञान है, वह तत्त्वज्ञानसे ही निवृत्त होता है । अतः मोक्ष के प्रतिबन्धक अज्ञानकी निवृत्ति करना ही आत्मज्ञानका प्रयोजन है अन्य नहीं, क्योंकि आत्मा तो स्वयं प्रकाशरूप है । इस ' विषयमें मुनि गौतमके सूत्रको उद्धृत करते हैं । * इस गौतम सूत्रमें जन्म ही साक्षात् दुःखका कारण कहा गया है, क्योंकि जन्म होनेसे ही सुख-दुःखका अनुभव होता है । विषय जन्य सुख भी परिणाममें दुःखका कारण है । [ ' ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ' ( गी ० ५।२२ ) ( जो इन्द्रिय तथा विषयोंके संयोग से उत्पन्न होनेवाले सब भोग हैं वे दुःख ही हेतु हैं ) अतः सुखको भी दुःख शब्दसे वर्णित किया है । जन्मका कारण धर्माधर्म-रूप प्रवृत्ति है | धर्माधर्मकी प्रवृत्ति राग द्वेषादि दोषोंसे होती है, दोष मिथ्याज्ञानसे होते हैं । मिथ्या-ज्ञान ही राग द्वेषादि दोषोंद्वारा संसारका मूल कारण है । मिथ्याज्ञानकी निवृत्ति तत्त्वज्ञानसे होती है । ‘ तत्त्वज्ञानात् निःश्रेयसाधिगमः ' ( गौ ० सू ० १।१।२ ) ( तत्त्व ज्ञानसे ही मोक्ष होता है अर्थात् पुनर्जन्म नहीं होता ) इतने अंशमें ही सूत्रकी सम्मति दी गई है । गौतम अभिमत तत्त्वज्ञान और मोक्ष वेदान्त-सिद्धान्त में स्वीकृत नहीं है, क्योंकि वे प्रमाण, प्रमेय आदि षोडश पदार्थोंके ज्ञानको तत्त्वज्ञान मानते हैं । * पूर्ववक्षी—- जैसे ' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानैव पश्यति ' इस श्रुतिमें भेदज्ञान मृत्युका कारण प्रतिपादित होने से प्रमा नहीं है, वैसे ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान प्रमा न होकर सम्पदादि ( उपासना ) रूप है, अत: वह भ्रान्ति रूप है । ' आरोप्य प्रधाना संपत् ' ( आलम्बनको अविद्यमान - सा मानकर आरोप्य प्रधान सम्पत् उपासना कहलाती है ) जैसे कि काम, सङ्कल्प आदि अनन्त वृत्तिवाला होनेसे मन अनन्त कहा जाता है, वैसे विश्वेदेवता भी अनन्त हैं । इस प्रकार दोनोंमें आनन्त्य समान है । इससे विश्वेदेवता ही मन है । मनकी विश्वेदेवतारूपसे उपासना करनेसे उपासकको अनन्त लोककी प्राप्ति होती है । वैसे चैतन्य धर्म जीव और ब्रह्म में समान है, इसलिए अल्प जीवको महान् ब्रह्मरूप सम्पादनकर जीवरूप आलम्बनको अविद्यमानकर प्रधानरूपसे ब्रह्मका ' मैं ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार अनु-चिन्तन करने से अमृतत्व फल प्राप्त होता है, अतः जीव ब्रह्मका एकत्वं ज्ञान भी सम्पद्रूप है । सम्पत्

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६२ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ ( छान्दो ० ४ | ३ | ३ ) इतिवत् । नाप्याज्यावेक्षणादिकर्मवत्कर्माङ्गसंस्काररूपम् | संपदादि-रूपे हि ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेऽभ्युपगम्यमाने ' तत्त्वमसि ' ( छान्दो ० ६।८।७ ) ' अहं ब्रह्मास्मि ’ ( बृह ० १।४।१० ) ' अयमात्मा ब्रह्म ' ( बृह ० २।५।१ ९ ) इत्येवमादीनां वाक्यानां ब्रह्मात्मैकत्व-वस्तुप्रतिपादनपरः पदसमन्वयः पीड्येत । * ' भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ' ( मुण्ड ० संवर्ग है ) ' प्राणो बम ' ( प्राण ही सवर्ग है ) इसके समान विशिष्ट क्रिया सम्बन्ध निमित्तक भी नहीं है, और आज्यावेक्षण आदि कर्मके समान कर्माङ्गका संस्काररूप भी नहीं है, क्योंकि ब्रह्मात्मैकत्व विज्ञानको सम्पदादिरूप माननेपर ' तत्त्वमसि अहं ब्रह्मास्मि ' ' अयगात्मा ब्रह्म ' इत्यादि वाक्योंका ब्रह्मात्मैकत्व वस्तु प्रतिपादन परक पद समन्वय बाधित हो जायगा । ' भिद्यते ० ' ( ब्रह्मका साक्षात्कार कर सत्यानन्दी - दीपिका उपासनामें आरोप्य प्रधान और आलम्बन ( आधार ) गौण होता है । ' आलम्बनप्रधानः प्रतीकः ' ( जहाँ आलम्बन प्रधान और आरोप्य गौण हो वह प्रतीकोपासना कहलाती है ) उसको अध्यास भी कहते हैं । यथा ' मनो ब्रह्मेत्युपासीत ' ( ब्रह्म भावनासे मनकी और आदित्यकी उपासना करे ) यह प्रतीको-पासना है । जैसे शालिग्रामको विष्णुरूपसे, शिवलिङ्गकी शङ्कररूपसे, ॐ की ब्रह्मरूपसे उपासना प्रतीकोपासना के उदाहरण हैं । जैसे विष्णुके अभाववाले शालिग्राल शिला आदिमें विष्णु बुद्धि अध्यास ही है । ' अतस्मिन् तद्बुद्धिरध्यासः ' ( अत में तबुद्धिको ही अध्यास कहा जाता है ) यह अध्यासका लक्षण इन सब स्थलोंमें घटता है, अतः वे अध्यासरूप ही है । परन्तु ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान सम्पद्रूप तथा अध्यास रूप नहीं है । * जैसे ' वायुर्वाव संवर्गः ' प्रलयकाल में अग्नि, सूर्य चन्द्रमा और जल ये सब वायुमें विलीन होते हैं, इन सबका वायु ही ग्रसन करता है । यह अधिदैवत संवर्ग है । ' अध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गो यदा वै पुरुषः स्वपिति ' ( शरीरान्तर संचारी अध्यात्म प्राण संवर्ग है, जब पुरुष सोता है तब वाक्, चक्षु, श्रोत्र और मन आदि सब इन्द्रियाँ प्राणमें लीन होती हैं ) ' तौ वा एतौ द्वौ संवर्गों वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ' ( छा ० ४।३।४ ) ( ये दो संवर्ग हैं, अग्नि आदि देवोंमें वायु और वागादि इन्द्रियोंमें प्राण ) इसलिए वायु और प्राणमें संहरणरूप क्रियाका योग समान होनेपर दोनों में संवर्गत्व समान है । इस प्रकार वायु और प्राणकी संवर्गरूपसे अभेद उपासना करनी चाहिए । वैसे ही वृद्धिरूप क्रियाके योगसे ' जीव ब्रह्म है ' यह अभेदज्ञान अमृतत्व फलके लिए है । वास्तव में जीव और ब्रह्मका भेद ही है अभेद नहीं । जो अभेद मानते हैं वे भ्रान्त है । अब अन्य मतका उल्लेख करते हैं, जैसे ' पत्न्यवेक्षितमाज्यं भवति ' दर्शपूर्णमास यागके प्रकरणमें उपांशु यागके अङ्गभूत घृतको यजमानकी पत्नी देखे । यहाँ यजमानकी पत्नीद्वारा घृत देखनेका विधान है, क्योंकि उसके देखनेसे घृतका संस्कार हुआ माना जाता है । इससे घृतमें विशेष गुणका आधान होता है अर्थात् अदृष्ट विशेष उत्पन्न होता है । यह वैदिक उदाहरण है । लौकिक उदाहरण भी है— बीज पूरकुसुम ( अन्नारका फूल ) लाख के रससे अविसिक्त होनेसे लाखके समान रक्तवर्णं विशिष्ट फलको उत्पन्न करता है । यहाँ बीजपूर कुसुममें गुणाधानरूप संस्कार माना जाता है । वैसे ' आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः ' इत्यादि मन्त्र यागके अङ्गरूप कर्ता में ब्रह्मात्मैकत्व विज्ञानरूप संस्कारका विधान करते हैं अर्थात् आत्माके संस्कारके लिए ब्रह्मज्ञानका विधान है । परन्तु पूर्वपक्षका यह कथन युक्त नहीं है, यदि अभेदज्ञानको संस्काररूप गुण, सम्पद्रूप तथा अध्यास ( प्रतीकोपासना ) विशिष्ट क्रिया योग निमित्त मानें तो ' तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि श्रुति वाक्योंका ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानमें जो निश्चित तात्पर्य है वह बाधित हो जायगा ।

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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६३ २।२।८ ) इति चैवमादीन्यविद्यानिवृत्ति फलश्रवणान्युपरुध्येरन् । ' ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ' ( मुण्ड ० ३।२।९ ) इति चैवमादीनि तद्भावापत्तिवचनानि संपदादिपक्षे न सामञ्जस्येनोपपद्येरन् । तस्मान्न संपदादिरूपं ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानम् । अतो न पुरुषव्यापारतन्त्रा ब्रह्मविद्या । किं तर्हि? प्रत्यक्षादिप्रमाणविषयवस्तु ज्ञानवद्व स्तुतन्त्रा । एवंभूतस्य ब्रह्मणस्तज्ज्ञानस्य च न कयाचिद्युक्त्या शक्यः कार्यानुप्रवेशः कल्पयितुम् । * न च विदिक्रियाकर्मत्वेन कार्यानु प्रवेशो ब्रह्मणः, ' अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि ' ( केन ० १३ ) इति विदिक्रियाकर्मत्व-प्रतिषेधात्, ' येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात् ' ( बृह ० २।४।१३ ) इति च । तथोपास्ति-क्रियाकर्मत्वप्रतिषेधो ऽपि भवति - ' यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते ' इत्यविषयत्वं ब्रह्मण उपन्यस्य, ' तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ' ( केन ० १४ ) इति । अविषयत्वे ब्रह्मणः शास्त्रयोनित्वानुपपत्तिरिति चेत् " नः अविद्याकल्पितभेदनिवृत्तिपरत्वाच्छास्त्रस्य । न हि शास्त्रमिदंतया विषयभूतं ब्रह्म प्रतिपिपादयिषति । किं तर्हि? प्रत्यगात्मत्वेनाविषयतया प्रतिपादयदविद्याकल्पितं वेद्य - वेदित- वेदनादिभेदमपनयति । तथा च शास्त्रम् - ‘ यस्याऽमतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ' ( केन ० २।३ ) ' न दृष्टेर्द्रष्टारं लेनेपर इसकी हृदय ग्रन्थि टूट जाती है और सब संशय नष्ट हो जाते हैं ) इत्यादि अज्ञान निवृत्तिरूप फलके बोधक श्रुतिवाक्य बाधित हो जायँगे । और ' ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ' इत्यादि ब्रह्मभाव प्राप्ति प्रतिपादक श्रुतिवाक्य संपदादि पक्षमें मुख्यरूपसे उपपन्न नहीं होंगे । इसलिए ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान संपदादिरूप नहीं है । अत: ( ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान विधेय न होने के कारण ) ब्रह्मविद्या पुरुष व्यापारके अधीन नहीं है । किन्तु प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके विषय वस्तु ज्ञानके समान वस्तुके ही अधीन है । ऐसे ब्रह्म और उनके ज्ञानको किसी भी युक्तिसे कार्यके साथ सम्बन्धकी कल्पना नहीं की जा सकती । विदि ( जानना ) क्रियाके कर्मरूपसे भी कार्यके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि ' अन्यदेव ० ' ( यह विदित ( कार्य ) से अन्य और अविदित ( कारण ) से भी अन्य है ) और ' येनेदं ० ' ( जिसके द्वारा इस सबको जानता है उसे किससे जाने ) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्ममें विदिक्रिया कर्मत्वका निषेध किया गया है । उसी प्रकार ' यद्वाचा ० ' ( जो वाणी ( शब्द ) से प्रका-शित नहीं होता किन्तु जिससे वाणी प्रकाशित होती हैं ) इसप्रकार ब्रह्मको इन्द्रियोंका अविषय कह-कर ‘ तदेव ० ' ( उसीको तुं ब्रह्म जान, जिसकी लोक उपासना करते हैं वह ब्रह्म नहीं है ) इस श्रुतिसे उपास्ति ( उपासना ) क्रिया के कर्मत्वका भी ब्रह्ममें प्रतिषेध है । यदि कहो कि इन्द्रियादिका अविषय होनेसे ब्रह्ममें शास्त्र प्रमाणकत्व अनुपपन्न होगा? तो ऐसा नहीं, क्योंकि शास्त्र तो अविद्यासे - कल्पित भेदकी निवृत्ति के लिए है । शास्त्र इदं रूपसे विषयभूत ब्रह्मका प्रतिपादन करना नहीं चाहता, किन्तु ब्रह्म प्रत्यगात्मरूपसे अविषय है ऐसा प्रतिपादन करता हुआ शास्त्र अविद्या से कल्पित वेद्य ( ज्ञेय ) वेदितृ ( ज्ञाता ), वेदना ( ज्ञान ) आदि भेदको निवृत्त करता है । जैसे ' यस्यामतं ० ' ( जिसको ऐसा सत्यानन्दी - दीपिका * संपदादि भेद घटित होनेसे भ्रान्तिरूप हैं । इसलिए उनसे अज्ञानकी निवृत्ति कदापि नहीं होगी । अज्ञानकी निवृत्ति तो यथार्थ ज्ञान - ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञानसे होती है । इसलिए एकत्व ज्ञान संपदादि -रूप नहीं है । * शंका – ज्ञानार्थक सकर्मक ' विद् ' धातुसे विद्या शब्द निष्पन्न हुआ है, तब तो ब्रह्म कर्म होगा? समाधान – क्या ब्रह्म विदि क्रियांका कर्म है अथवा उपासनाका? प्रथम पक्ष तो ' अन्यदेव ' ' येनेदं ' इत्यादि श्रुतिसे बाधित है । द्वितीय पक्ष भी ' तदेव ' आदि श्रुतिसे बाधित है |

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६४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ पश्येः ', ' न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः ' ( बृह ० ३ | ४ | २ ) इति चैवमादि । अतोऽविद्याकल्पित-संसारित्वनिवर्तनेन नित्यमुक्तात्मस्वरूपसमर्पणान्न मोक्षस्यानित्यत्वदोषः । * यस्य तूत्पाद्यो मोक्षस्तस्य मानसं, वाचिकं कायिकं वा कार्यमपेक्षत इति युक्तम् । तथा विकार्यत्वे च; तयोः पक्षयोर्मोक्षस्य ध्रुवमनित्यत्वम् । * न हि दध्यादि विकार्य उत्पाद्यं वा घटादि निश्चय है कि ब्रह्म ज्ञात नहीं है उसे ब्रह्म ज्ञात है अर्थात् उसने ब्रह्मस्वरूपको जाना है और जो ऐसा समझता है कि ' मुझे ब्रह्म ज्ञात है ' उसने ब्रह्मको जाना ही नहीं, क्योंकि जिसे ब्रह्मज्ञान हो गया है, उसके लिए ब्रह्म अविज्ञात - विषय से अज्ञात है, कारण कि ब्रह्म ज्ञानका विषय नहीं है और जो अज्ञानी हैं, उनके लिए ब्रह्म विषयरूपसे ज्ञात है, क्योंकि ब्रह्मको ज्ञानका विषय समझकर मैंने ब्रह्म-को जाना है, ऐसा कहते हैं अर्थात् अज्ञानियोंके मत में ब्रह्म विषय है ) और ' न दृष्टे: ० ' ( दृष्टि-इन्द्रिय वृत्तिके साक्षीभूत आत्माको तुम चक्षु आदि इन्द्रियोंसे देख नहीं सकते और बुद्धि वृत्तिके साक्षीको तुम बुद्धिवृत्ति से नहीं जान सकते ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । अतः शास्त्र तत्त्वज्ञानसे अविद्यासे कल्पित संसारित्वका निवर्तनकर नित्य मुक्त आत्माका यथार्थ स्वरूप समर्पण होने के कारण मोक्ष में अनित्यत्व दोष नहीं है । जिसके मतमें मोक्ष उत्पाद्य है, उसके मतमें मोक्ष मानसिक या वाचिक अथवा कायिक क्रियाओंकी अपेक्षा रखता है, यह ठीक है । इसी प्रकार विकार्यत्व पक्ष में भी, इन दोनों पक्षों में मोक्षका अनित्यत्व निश्चित है । लोकमें विकार्यं दधि आदि एवं उत्पाद्य घटादिमें नित्यत्व नहीं सत्यानन्दी - दीपिका * शंका - यदि ब्रह्मको इन्द्रियोंका विषय नहीं मानें तो तृतीय सूत्रद्वारा ब्रह्ममें शास्त्र प्रामाण्य-की प्रतिज्ञा बाधित हो जायगी? समाधान -- जीव ब्रह्म एक है, परन्तु उनका अविद्यासे कल्पित भेद प्रतीत होता है । ' तत्त्वमसि ', ' अहं ब्रह्मास्मि ' इसप्रकार वेदान्त और आचार्यके उपदेशसे उत्पन्न हुई ब्रह्माकारवृत्ति, जिसे विद्या कहा जाता है उसीसे अविद्याकी निवृत्ति होती है । अविद्या निवृत्त्यात्मक फलवाली होने से ब्रह्ममें शास्त्र - प्रामाणिकता निर्विवाद है । वृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यकी विषयताका नाम इदन्ता है, इदन्ता माने यह ब्रह्म है । इसप्रकार " इक्षुक्षीर-गुडादीनां माधुर्यस्यान्तरं महत् । तथापि न तदाख्यातुं सर्वशक्त्याऽपि शक्यते ” ( काव्यादर्श - दण्डी ) ( साधारण ईख, दूध, गुड़ आदि पदार्थों के माधुर्य आदि रसोंमें महान् अन्तर है । उनका भी इदन्तारूपसे वर्णन करनेकी सामर्थ्यं शब्दमें नहीं है ) ' यतो वाचो निवर्तन्तेऽप्राप्य मनसा सह ' ( तै ०: | ४ | १ ) ( मनके साथ वाणी भी जिसे न प्राप्तकर लौट आती है ) ' अतद्व्यावृत्त्यायं चकित-ममिधत्ते श्रुतिरपि ' ( शिव ० म ० ) ( अतद्की व्यावृत्तिकर यह श्रुति जिसका चकित होकर अभिधान करती है ) ' नेति नेति ' इत्यादि शास्त्र भी जो ब्रह्म नहीं है, जैसे जड़त्व दुःखत्व, अनित्यत्वादि, उसका ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि कहकर वारण करते हैं । शंका - यद्यपि अविद्याकी निवृत्ति करनेसे शास्त्र में प्रामाणिकता सिद्ध होती है तो भी अविद्याकी निवृत्तिसे जन्य होनेके कारण मोक्ष अनित्य हो जायगा? समाधान -- तत्त्वज्ञानसे जो अविद्याका ध्वंस ( नाश ) होता है वह नित्य है, नैयायिक ध्वंसका ध्वंस नहीं मानते, क्योंकि उनके मतमें ध्वंसका ध्वंस भावरूप है । वेदान्त सिद्धान्तमें कल्पितकी निवृत्ति अधिष्ठानस्वरूप मानी जाती है, इसलिए अविद्याका ध्वंस नित्य आत्मस्वरूप है । जैसे- रज्जुके ज्ञानसे मिथ्याज्ञानसे कल्पित सर्पको निवृत्ति रज्जुसे अतिरिक्त नहीं है I | शास्त्रसे उत्पन्न तत्त्वज्ञानसे अविद्या तथा अविद्यासे कल्पित संसारित्वादिकी निवृत्तिरूप नित्यमुक्त आत्मस्वरूपका आविर्भाव ही तो मोक्ष है, अतः मोक्ष में अनित्यत्व दोष असम्भव है ।

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अधि ० ४ सू ० ४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ६५ नित्यं दृष्टुं लोके । नचाप्यत्वेनापि कार्यापेक्षाः स्वात्मस्वरूपत्वे सत्यनाप्यत्वात् । स्वरूप-व्यतिरिक्तत्वेऽपि ब्रह्मणो नाप्यत्वम्, सर्वगतत्वेन नित्याप्त स्वरूपत्वात्सर्वेण ब्रह्मणः, आकाश-स्येव । * नापि संस्कार्यो मोक्षः, येन व्यापारमपेक्षेत । संस्कारो हि नाम संस्कार्यस्य गुणाधानेन वा स्याद्दोषापनयनेन वा? न तावद्गुणाधानेन संभवति; अनाधेयातिशय-ब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य । नापि दोषापनयने न; नित्यशुद्धब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य । स्वात्मधर्म एव संस्तिरोभूतो मोक्षः क्रिययात्मनि संस्क्रियमाणेऽभिव्यज्यते, यथाऽऽदर्शे निघर्षण-क्रियया संस्क्रियमाणे भास्वरत्वं धर्म इति चेत् - नः क्रियाश्रयत्वानुपपत्तेरात्मनः । यदाश्रया क्रिया तमविकुर्वती नैवात्मानं लभते । यद्यात्मा स्वाश्रयक्रियया विक्रियेत, अनित्यत्वमात्मनः देखा गया है । ब्रह्मज्ञान से प्राप्य होनेपर भी उसको कार्यकी अपेक्षा नहीं है, क्योंकि वह स्व आत्म-स्वरूप होनेके कारण प्राप्य ही नहीं है । यदि ब्रह्मको स्वरूप ( आत्मा ) से भिन्न मानें तो भी वह प्राप्य नहीं है । कारण- आकाशके समान सर्व व्यापक होनेके कारण ब्रह्म सबको नित्य प्राप्त स्वरूप ही है । और मोक्ष संस्कार्य भी नहीं है, जिससे वह व्यापारकी अपेक्षा करे । संस्कार्य पदार्थ में विशेष गुण लाने अथवा दोष हटाने से संस्कार होता है । मोक्ष में गुणाधान ( विशेष गुणका लाना ) से संस्कारका संभव नहीं है, क्योंकि मोक्ष तो आधेयातिशय ( अतिशयको लाना ) से रहित ब्रह्म स्वरूप है । दोषा-पनयनसे भी उसका संस्कृत होना संभव नहीं है, क्योंकि मोक्ष नित्य शुद्ध ब्रह्मस्वरूप है । यदि ऐसा कहो कि जैसे घर्षण क्रियासे दर्पण संस्कृत होनेपर अपने भास्वरत्व धर्मंसे अभिव्यक्त होता है, वैसे उपासनादि क्रिया से आत्माके संस्कृत होनेपर उसका अविद्यादि मलसे तिरोहित हुआ अपना मोक्षरूप धर्मं अभिव्यक्त होता है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि आत्मामें क्रियाका आश्रयत्व अनुपपन्न है । जिस आश्रयमें क्रिया रहती है उसको विकृत किये विना वह अपने स्वरूपको प्राप्त नहीं कर सकती । यदि आत्मा स्वाश्रित क्रियासे विकृत हो तो आत्मामें अनित्यत्व प्रसक्त होगा । ' अविकार्योऽयमुच्यते ' ( यह आत्मा सत्यानन्दी - दीपिका * उत्पत्ति, आप्ति, विकृति तथा संस्कृति इस भेदसे क्रिया चार प्रकारको है, इसके अनुसार क्रिया जन्य उत्पाद्य, आप्य, विकार्य तथा संस्कार्यं इन चतुर्विध प्रकारोंसे भिन्न होनेके कारण मोक्ष उपासना साध्य नहीं है, इसलिए वह अनित्य भी नहीं है । बौद्ध मतमें क्षणिक विज्ञान आत्मा है । उसकी विशुद्ध विज्ञानरूपसे उत्पत्तिको वे मोक्ष मानते हैं, इससे उसके मतमें मोक्ष उत्पाद्य है । जैन मतावलम्बी संसाररूप अवस्थाका त्यागकर कैवल्य अवस्थाकी प्राप्तिको मोक्ष मानते हैं, अतः वह विकाररूप है | वटादिके समान क्रियाद्वारा उत्पन्न होनेसे दोनों प्रकारके मोक्ष अनित्य हैं । मोक्ष प्राप्य भी नहीं है, क्योंकि वह स्व आत्मस्वरूप होनेसे नित्य प्राप्त है । इसके अतिरिक्त मोक्षको उत्पाद्य आदि माननेवालोंसे हम पूछते हैं कि ब्रह्म जीवसे अभिन्न है कि भिन्न? इसको ' स्वात्मस्वरूपत्वे ' आदिसे कहते हैं । * जिनके मतमें मोक्ष संस्कार्य है । उनके लिए कहते हैं - संस्कार दो प्रकारसे होता है । एक गुणाधान और दूसरा दोषापनयनसे, जैसे यागमें ' ब्रीहीन् प्रोक्षति ' ( धानका प्रोक्षण करे अर्थात् जलका छींटा दे ) प्रोक्षण करने से ब्रीहिमें गुणाधानरूप संस्कार होता है और मलिन वस्त्र, दर्पणादिका जलादिसे मलकी निवृत्तिरूप संस्कार होता है । इन दोनोंका ' न तावत् ' इत्यादिसे निषेध करते हैं । यदि कहो कि ब्रह्मात्मस्वरूप मोक्ष अनादि अविद्यामलसे आवृत है उपासना से निवृत्त होनेपर ब्रह्मस्वरूप मोक्ष अपने स्वरूप से अभिव्यक्त होता है किन्तु उत्पन्न नहीं होता । तो आत्मामें मल सत्य

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६६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ प्रसज्येत । ‘ अविकार्योऽयमुच्यते ' ( भ ० गी ० २।२५ ) इति चैवमादीनि वाक्यानि बाध्येरन् । तच्ा-निष्टम् । तस्मान्न स्वाश्रया क्रिया SS त्मनः संभवति । अन्याश्रयायास्तु क्रियाया अविषय-त्वान्न तयाऽऽत्मा संस्क्रियते । * ननु देहाश्रयया स्नानाचमनयज्ञोपवीतधारणादिकया क्रियया देही संस्क्रियमाणो दृष्टः । नः देहादिसंहतस्यैवाविद्यागृहीतस्यात्मनः संस्क्रिय-माणत्वात् । प्रत्यक्षं हि स्नानाचमनादेर्देहसमवायित्वम् । तया देहाश्रयया तत्संहत एव कश्चिदविद्ययात्मत्वेन परिगृहीतः संस्क्रियत इति युक्तम् । यथा देदाश्रयचिकित्सानिमित्तेन धातुसाम्येन तत्संहतस्य तदभिमानिन आरोग्यफलम्, ' अहमरोग ' इति यत्र बुद्धिरुत्पद्यते, एवं स्नानाचमनयज्ञोपवीतादिना ' अहं शुद्धः संस्कृत ' इति यत्र बुद्धिरुत्पद्यते स संस्क्रियते । कार्य कहा जाता है ) इत्यादि वाक्य बाधित होंगे, वह युक्त नहीं है । इसलिए आत्मा में स्वाश्रय क्रियाका संभव नहीं है । अन्य पदार्थ आश्रय क्रियाका आत्मा विषय - सम्बन्धी नहीं है, अतः उससे आत्मा संस्कृत नहीं हो सकता । परन्तु देहाश्रय स्नान, आचमन, यज्ञोपवीत धारण आदि क्रियाओंसे जीवात्मा संस्कृत होता देखा गया है? ऐसा नहीं, क्योंकि देहादि संघात युक्त अविद्यामें प्रतिबिम्बित आत्माका संस्कार होता है । स्नान, आचमन आदि क्रियाओंका सम्बन्ध देहके साथ तो प्रत्यक्ष ही है । जो कोई अविद्यासे देहादि संघातको आत्मरूप से गृहीत करता है, उसका उस देहाश्रित क्रियासे संस्कृत होना युक्त है । जैसे देहके आश्रित चिकित्सा निमित्तक धातुओंकी समताद्वारा जिस देहाभिमानी आत्मामें ' मैं अरोग हूँ ' ऐसी बुद्धि उत्पन्न होती है, देहादिके साथ सम्बन्ध और उसमें ' मैं, मेरा ' अभिमान रखनेवाला आरोग्य फल पाता है, वैसे ही स्नान, आचमन, यज्ञोपवीतादिसे ' मैं शुद्ध हूँ, संस्कृत हूँ, ऐसी बुद्धि जिसमें उत्पन्न हो वही संस्कृत होता है । वह तो देहके साथ सम्बद्ध ही है । ‘ तयोरन्यः ० ’ ( उसमें एक तो स्वादिष्ट कर्म फलको भोगता है और दूसरा न भोगता हुआ साक्षी -रूपसे रहता है अर्थात् प्रकाशित करता है ) ' आत्मेन्द्रिय ० ' ( शरीर, इन्द्रिय और मनसे युक्त आत्माको विद्वान् भोक्ता कहते हैं ) इत्यादि श्रुति वाक्योंसे यह स्पष्ट होता है कि ' अहं ' प्रतीति के विषयभूत प्रत्ययी अहंकर्तासे ही सम्पूर्ण क्रियाएँ सिद्ध होती हैं और उनका फल वही भोगता है । सत्यानन्दी - दीपिका है अथवा कल्पित? यदि कल्पित है तो उसकी निवृत्ति अधिष्ठान के ज्ञानसे होती है, जैसे कल्पित सर्पकी निवृत्ति अधिष्ठान रज्जुके ज्ञानसे होती है, किसी अन्य क्रियासे नहीं, इसी प्रकार कल्पित अविद्याकी निवृत्ति भी अधिष्ठान ब्रह्मात्मज्ञानसे होगी उपासनादि क्रियासे नहीं । यदि अविद्यामल सत्य है तो वह तत्त्वज्ञानसे निवृत्त नहीं होगा अपितु उपासनारूप क्रियासे, तो वह उपासनारूप क्रिया आत्मामें रहती है अथवा आत्मासे भिन्न अन्य वस्तुमें? पहला पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि निष्क्रिय आत्मामें क्रियाका संभव नहीं । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि अन्य पदार्थके आश्रित क्रियासे आत्माका सम्बन्ध न होनेसे उसका संस्कार संभव नहीं है । ' असङ्गो न हि सज्जते ' ' असङ्गो ह्ययं पुरुषः ' इत्यादि श्रुति वाक्य आत्मामें क्रियादि सम्बन्धका निषेध करते हैं, अतः मोक्ष संस्कार्यं नहीं है । * शंका -- अन्याश्रित क्रियासे भी अन्यका संस्कार देखने में आता है । जैसे देहाश्रित स्नानादि क्रियाओंसे आत्मामें ‘ मैं शुद्ध हुआ हूँ ' ऐसा संस्कार देखा गया है । समाधान —— देहादिसघातमें तादात्म्याध्याससे आत्मबुद्धि करनेसे ऐसा व्यवहार होता है वस्तुतः यह भ्रान्ति है । किञ्च अविद्या-मलको जो सत्य माना गया है वह तो उपासनादि क्रियाओंसे कदापि निवृत्त नहीं होगा, उसकी निवृत्ति के विना मोक्ष भी सिद्ध नहीं होगा । यदि उसकी उपासनादिसे निवृत्ति मानें तो वह सत्य नहीं होगा, यह अन्य दोष भी है ।