श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 11–20
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 11–20
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( ९ ) शाङ्करभाष्यको भाषा सरल एवं अर्थं अत्यन्त गम्भीर है । यद्यपि अर्थको सरल और स्पष्ट करने के लिए संस्कृतभाषामें अनेक टीकाएँ लिखी गयी हैं, तथापि कालक्रमसे वे भी व्याख्यासाध्य हो गयी हैं । हिन्दी में भी जो व्याख्याएँ की गयी हैं उनके भी अप्राप्य या दुर्बोध होनेसे वेदान्तप्रेमियों की कठिनाई दूर नहीं हो सकी । अतः जनताकी ओरसे किसी ऐसी व्याख्याकी माँग बढ़ती ही गयी जो उपर्युक्त सब कठिनाइयों को दूरकर सके । उपर्युक्त परिस्थितिको दृष्टिगत रखते हुए तथा कतिपय विद्वानों और वेदान्तप्रेमियोंसे प्रेरित होकर सम्पूर्ण शाङ्करभाष्यपर सुन्दर सरल हिन्दी भाषामें अनुवाद करनेके अनन्तर भाष्य के अभिप्रायको स्पष्ट करने के लिए अनेक दर्शनों एवं पञ्चपादिका, भामती, रत्नप्रभा, न्यायनिर्णय आदि अनेक टीकाग्रन्थोंके आधारपर यथामति विवेचनात्मक सुन्दर सरल हिन्दी भाषा में ' सत्यानन्दी - दीपिका ' व्याख्या प्रस्तुत की गई है । वाराणसी आदिके विशिष्ट विद्वानोंने इस नवीन रचनाको अत्यधिक पसन्द किया है । आशा है इससे दार्शनिकप्रेमियोंका अधिक उपकार होगा | विद्यार्थियोंके लिए तो यह विशेष उपयोगी सिद्ध होगी । यदि कहीं किसी प्रकारकी त्रुटि पाठकों के दृष्टिगोचर हो तो अवश्य सूचित करनेकी कृपा करें । जिससे अग्रिम संस्करणमें उन त्रुटियोंका परिमार्जन किया जा सके । जिन्होंने इस महान् पवित्र ज्ञानयज्ञमें जो भी सहयोग दिया है, उन सबको मैं हार्दिक धन्यवाद देता हूँ । माननीय पाठकोंके समक्ष ' ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्य - भाषनुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित ' का यह द्वितीय संस्करण प्रस्तुत करते महान् हर्ष हो रहा है । इस संस्करणके प्रकाशनमें पाठकों का उत्साह ही हेतु है । पाठकोंकी इसके प्रति अभिरुचि ही इस ग्रन्थ रचनाकी उत्तमत्ता व उपादेयता सिद्ध करती है । इस संस्करण में शुद्धि आदि पर अधिक ध्यान दिया गया है । तत् तत् स्थलोंमें बावश्यक टिप्पणी मी दी गई है । प्रचार व प्रसारकी दृष्टि से मँहगाईके अनुपातसे मूल्य भी कम रखा गया है । सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे मद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ॥ इतिशम् । स्वामी सत्यानन्द सरस्वती
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॥ ॐ तत्सत् ॥ प्रास्ताविक वक्तव्यकी सूची ( १ ) मङ्गलाचरणम् ( ८ ) द्वैतवाद समालोचना ( २ ) ब्रह्मसूत्रम् ( ९ ) विशिष्टाद्वैतवाद समालोचना ( ३ ) शाङ्करमाध्यम् ( १० ) द्वैताद्वैतवाद समालोचना ( ४ ) शङ्करभाष्यकी अनेक व्याख्याएँ ( ११ ) शुद्धाद्वैतवाद समालोचना ( ५ ) शाङ्कर - सिद्धान्त ( १२ ) अभिनव - अद्वैतवादी मत समालोचना ( ६ ) सत्य और मिथ्याकी परिभाषा ( १३ ) मायावादी कौन हो सकता है । ( ७ ) जीवो ब्रह्मैव नापर: ( १४ ) उपसंहार * प्रास्ताविकं वक्तव्यम् श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य दार्शनिक सार्वभौम - विद्यावारिधि न्याय मार्तण्ड-वेदान्तवागीश स्वामी श्रीमहेश्वरानन्द जी महाराज महामण्डलेश्वर । ( १ ) मंगलाचरणम् यदज्ञातं जीवैर्बहुविधजगद्विभ्रमधरं वियद्यद्वद्वालैस्तलमलिनतायोगिक लितम् । तदुन्मुद्रज्ञानप्रततसुखसद्ब्रह्म परमं नमस्यामः प्रत्यक् श्रुतिशतशिरोभिः प्रकटितम् ।
नमः श्रुतिशिरः पद्म - पण्ड मार्तण्डमूर्तये । बादरायण संज्ञा मुनये शमवेश्मने ॥
उद्धृत्य वेदपयसः कमलामिवाब्धेः, आलिङ्गिताखिलजगत्प्रमवैकमूर्तिम् ।
विद्यामशेषजगतां सुखदामदाद् यः, तं शङ्करं विमलभाष्यकृतं नमामि ॥
उस परब्रह्मको हम नमस्कार करते हैं, जिसको असंख्य उपनिषत् श्रुतियोंने प्रकट किया हैं । वह प्रत्यगात्मासे अभिन्न है, सर्वत्र विकसित - ज्ञानरूप - विस्तृत - अनन्त सुखरूप एवं त्रिकालाबाधित सद्रूप है | जिसने अपनी अनिर्वचनीय माया द्वारा अपनेमें ही बहु प्रकारके नामरूपात्मक - जगद्रूप द्रप - - ि विभ्रमको धारण किया है । मायामोहित जीव जिसको रहित आकाशको तलरूप आकारवाला एवं अधिष्ठान ब्रह्मको अशुद्ध - अध्यस्त - जगद्रूपसे विकसित करनेवाले सूर्यमूर्तिरूप कृष्णद्वैपायन प्रणेता व्यासमुनिको मैं नमस्कार करता हूँ । क्षीरसागर से लक्ष्मीके तुल्य वेदरूपी विद्याने समस्त जगत् के उत्पत्त्यादिकी हेतुभूत नहीं जानते हैं । जिस प्रकार अज्ञजन निराकार एवं रूप मलिन - श्यामरूपवाला देखते हैं, उस प्रकार मूढ़जन विशुद्ध देखते हैं । उपनिषत् वेदान्त श्रुतिरूपी कमल समूहको बादरायण नामक परम शान्तिके भण्डार वेदान्त - ब्रह्मसूत्रके महासागरसे जिसने ब्रह्मविद्याका उद्धार किया है । जिस एक अद्वय ब्रह्ममूर्तिका ही आलिङ्गन किया है । जो विद्या निखिल जगत्को पारमार्थिक शाश्वत सुखका प्रदान करती है । उस ब्रह्मविद्याके उद्धारक - विमल माष्यकार आचार्य जगद्गुरु श्रीशङ्करको मैं नमस्कार करता हूँ । ( २ ) ब्रह्मसूत्रम् महर्षि कृष्णद्वैपायन बादरायण प्रणीत ब्रह्मसूत्र - वेदान्त दर्शन सांख्य, योग, न्यायादि सभी दर्शनोंमें बड़ा ही महत्त्वपूर्ण दर्शन है जिसमें थोड़ेसे शब्दोंके द्वारा अतीव संक्षिप्तरूपसे परब्रह्मके स्वरूप, उसकी प्राप्तिके साधन उसकी उपासना एवं विज्ञानके फलका साङ्गोपाङ्ग निरूपण किया गया है
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( ११ ) इसलिए इसका नाम ब्रह्मसूत्र है ' सूचनात् सूत्रमित्याहु: ' इस आप्तवचनद्वारा वह परब्रह्मका सूचक है । यह ऋगादि वेदोंके अन्तिम सिद्धान्तका दर्शन कराता है, अतः इसे ' वेदान्त दर्शन ' भी कहते I उपनिषदें इस वेदान्तदर्शनकी मूल आधार हैं । अतः आचार्य श्रीशङ्कर ने कहा है- ' वेदान्तवाक्य-कुसुमग्रथनार्थत्वाद् ब्रह्मसूत्राणाम् ' अर्थात् जैसे सूत्रसे पुष्पोंको गूंथकर सुन्दरमाला बनायी जाती है, वैसे ब्रह्मसूत्रोंके द्वारा वेदान्त - वाक्यरूपी कुसुमों का ग्रथनकर सर्वोत्तम ब्रह्मसूत्ररूप मनोहर मालाका निर्माण किया गया है, तात्पर्य यह है - ब्रह्मसूत्रोंके द्वारा उपनिषद् वाक्योंके ही यथार्थ अभिप्रायका प्रकाशन किया जाता है । अतएव उपनिषत् प्रतिपाद्य अद्वैत ब्रह्म ही अनन्यलभ्य अबाधित, निर्दोष एवं सप्रयोजन होने से ‘ सत्यं शिवं सुन्दरम् ' है । ' अनन्यलभ्यो हि शब्दार्थ: ' इस मीमांसान्याय से यह सिद्ध होता है कि ब्रह्म ही प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणोंसे विज्ञेय नहीं है । एकमात्र वेदान्तप्रमाणद्वारा ही विज्ञेय होने के कारण वह अनन्यलभ्य कहा जाता है । ऐसे अनन्यलभ्य, अद्वय, परब्रह्मरूप अर्थ में ही वेदान्तों का तात्पर्य निश्चित होता है । द्वैत तो सभोको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे लभ्य है, अतः शास्त्र लोकसिद्ध अर्थ का कभी मी तात्पर्यरूपसे प्रतिपादन नहीं करता । उसका तो केवल अपवादके लिए ही आरोपमात्र करता है | इसके लिए- ' अध्यारोपापवादभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्चयते । ' यह न्याय कहा गया है । द्वैत-प्रपञ्चका अज्ञानद्वारा वधिष्ठान ब्रह्ममें अध्यारोप होता है अर्थात् अज्ञोंको निष्प्रपञ्च विशुद्ध; ब्रह्म सप्रपञ्चरूप प्रतीत होता है, विज्ञोंको वही सप्रपञ्च ब्रह्म अपवादद्वारा निष्प्रपञ्च - अद्वय ब्रह्मरूप मासित होता है । एवं वह अद्वैत किसी भी प्रमाणद्वारा कदापि बाधित नहीं होता, ब्रह्मसाक्षात्कार दशामें कोई भी बाधका कारण अवशिष्ट नहीं रहता, अतः वह अबाधित ही है । स्वतः प्रमाणभूत - उपनिषदों के द्वारा विदित होनेसे वह निर्दोष कहा गया है । उसके ' साक्षात्कारसे निखिल दुःखोंकी अत्यन्त निवृत्ति एवं परमानन्दकी प्राप्तिरूप प्रयोजनको सिद्धि होती है, अतः वह सप्रयोजन है । इसलिए न्यायरत्नावली में स्वामी ब्रह्मानन्द ने कहा है- ' वेदान्तदर्शनं दर्शनेषु सर्वेषु दर्शनीयतमं दर्शनम् । ' अर्थात् सांख्य, योग, न्याय, मामांसादि सभी दर्शनशास्त्रों में अद्वैतवेदान्तदर्शन ही अतीव दर्शन करनेयोग्य समझने योग्य प्रशस्तम दर्शन है । इस ब्रह्मसूत्रको उत्तरमीमांसा भी कहते हैं । महर्षि जैमिनि प्रणीत पूर्वमीमांसा वेदके पूर्वभागमें प्रतिपादित कर्मकाण्डका प्रतिपादन करती है और वेदके उत्तरभागमें प्रतिपादित ज्ञानकाण्डका प्रतिपादक होनेसे ब्रह्मसूत्रको उत्तरमीमांसा कहते हैं । इस मीमांसा में उत्तरत्व- अन्तिमत्व यही है कि जिस अद्वय ब्रह्मा विचारद्वारा अनुभव प्राप्त कर लेनेवर अन्य कुछ भी ज्ञातव्य परिशिष्ट नहीं रहता । अतएव श्री भगवान् कृष्णने गोतामें यही कहा है- ' यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यद् ज्ञातव्यमवशिष्यते । ' ( गी ० ७।२ ) ( जिसको जान लेनेपर अन्य कुछ भी जानना शेष नहीं रहता, यानी ज्ञातव्यकी समाप्ति हो जाती है, साथमें कर्तव्यको भी ) ' तस्य कार्यं न विद्यते । ' ( गी ० ३।१७ ) ' अर्थात् वह द्रह्मवित् कृतकृत्य एवं धन्य हो जाता है । ' एवं वेदोंके उत्तर यानी अन्तिम भागकी उपनिषत् श्रुतियोंकी मीमांसा करनेसे भी इसको ' उत्तरमीमांसा ' कहते हैं । मीमांसा यानी पूजित विचार | श्रीमद्भगवद्गोत के ' ऋषिमि -बहुधा गीतम् ' ' ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः । ( गी ० १३।४ ) इस श्लोक में ' हेतुमत् ' विशेषण सहित ब्रह्मसूत्रका नाम आया है, इससे भी इस ग्रन्थकी अति प्राचीनता सिद्ध होती है । ' बादरायण मुनि ' यह नाम पुराण कालसे ही श्री वेदव्यासजी के लिए व्यवहृत होता आया है । अतएव ' ब्रह्मसूत्र ' वेदव्यासजोकी ही रचना है ब्रह्मसूत्रकारने अपने उस प्रशस्त ग्रन्थको चार अध्यायों और सोलह पादों में विभक्त किया है । पहले अध्यायमें बताया गया है कि सभी वेदान्तवाक्योंका एकमात्र अद्वय प्रत्यगभिन्न ब्रह्म के ही प्रतिपादनमें अन्वय है, इसलिए उसका नाम समन्बयाध्याय है । इस
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( १२ ) अध्याय के प्रथमपादमें स्पष्ट ब्रह्मज्ञापक श्रुतियोंका - द्वितीय और तृतीय पादमें अस्पष्ट ब्रह्मभाव सूचक श्रुतियोंका विचार है अर्थात् द्वितीयमें उपास्य ब्रह्म और तृतीय में ज्ञेय ब्रह्म विषयक विचार है और चतुर्थं पादमें संदिग्ध अजा, अव्यक्त आदि शब्दार्थं विषयक विचार है । द्वितीय - अध्याय में सब प्रकार के विरोधाभासोंका निराकरण किया गया है, इसलिए उनका नाम ' अविरोधा-ध्याय ' है । इसके प्रथमपादमें स्वसिद्धान्त प्रतिष्ठापन के लिए स्मृति, तर्कादि विरोधोंका परिहार किया गया है, द्वितीय पादमें विरुद्ध मतोंमें दोषारोपण कर उनका खण्डन किया गया है, तृतीय पादमें एकमात्र ब्रह्मसे ही आकाशादि - विविध तत्त्वों की उत्पत्ति कही गई है और जीव विषयक श्रुतियोंके विरोधका परिहार किया गया है । एवं चतुर्थपादमें इन्द्रियादि विषयक श्रुतियोंका विरोध परिहार किया गया है । फलतः इस अध्यायमें विरोधी न्यायादि दर्शनोंका खण्डन कर युक्ति और प्रमाणोंसे वेदान्त सिद्धान्तका अविरोध कहा गया है । तृतीय अध्यायका नाम साधनाध्याय है । इसमें ' तत् ' और ' त्वम् ' पदार्थ शोधन विचारकर जीव और ब्रह्मके स्वरूपका निर्देश कर ब्रह्मसाक्षात्कार के बहिरङ्ग - - यज्ञादि य और शम, दम, निदिध्यासनादि अन्तरङ्ग साधनोंका विचार किया गया है । ब्रह्मविद्या तथा चित्त-स्थैर्यं सम्पादक अन्यान्य उपासनाओं के विषय में भी विचार किया गया है । चतुर्थं अन्यायका नाम फलाध्याय है । इसमें जीवन्मुक्ति, विदेहमुक्ति, जोबकी उत्क्रान्ति, पितृयान, देवयानमागं, सगुण और निर्गुण ब्रह्मकी उपासना के फलोंके तारतम्यपर मी विचार किया गया है । मान्यकरने सूत्रोंके निगूढ़ अर्थोंको समझाने के लिए कई प्रकारको संगतियाँ भी इसमें प्रदर्शित की हैं । प्रधानतया तीन प्रकारकी संगतियां हैं --- शास्त्र संगति, अध्याय संगति तथा पादसंगति | अधिकरण संगति- आक्षेप, प्रत्युदाहरण, दृष्टान्त: प्रसङ्ग, अपवाद आदि भेदसे भिन्न भिन्न हैं । इन्हें अवान्तर संगति भी कहते हैं । प्रत्येक अधिकरण में पाँच अवयव होते हैं - विषय, संशय, संगति, पूर्वपक्ष, तथा सिद्धान्त । ( ३ ) शाङ्करभाष्यम् - शारीरक भाष्यम् – ब्रह्मसूत्रपर महेश्वर परावतार भगवत्वादजगद्-गुरु आचार्य शङ्कर स्वामीने अतीव गौरवशाली प्रशस्त शारीरकमाष्यकी रचना की है । शारीरक यानी इस कुत्सित- दृश्य जड़ परिच्छिन्न शरीरमें अत्यन्त विशुद्ध व्यविकृत प्रकाशकरूपसे वर्तमान द्रष्टा चेतन महान् विभु परमात्मा, उसका विशदरूपसे वर्णन करनेवाला व्याख्यान शारीरक माध्य माना जाता है | अतएव विद्वानोंने भाष्यका यही लक्षण किया है-' सूत्रार्थी वर्ण्यते यत्र पदै. सूत्रानुसारिभिः । स्वपदानि च वर्ण्यन्ते माध्यं माष्यविदो विदुः ॥ ' ' अर्थात् सूत्रानुसारी पदोंद्वारा जिसमें संक्षिप्त सूत्रोंका विस्तृत वर्णन किया जाता है, और साथ ही सूत्रोंके जैसे अपने संक्षिप्त पदोंका जिसमें वर्णन किया जाता है, वह भाष्य माना जाता है । ' पाँचदर्शन व्याख्यानकार महाविद्वान् वाचस्पतिमिश्रने मी शाङ्करमाध्यकी भूरि - भूरि प्रशंसा की है । और इसके ऊपर ' भामती ' नामक विद्वज्जन प्रशंसनीय सुप्रसिद्ध टोका की । उसमें ये— ' नत्वा विशुद्ध विज्ञानं शङ्करं करुणाकरम् । भाष्यं प्रसन्नगम्भीरं तत्प्रणीतं विभज्यते ॥ ' जाचार्य शङ्करकी दो विशेषणों द्वारा मुक्तकण्ठसे प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि आचार्य शङ्करका वेदान्त विज्ञान विशुद्ध एवं भ्रम, वित्रलिप्सा आदि दोषोंसे विनिर्मुक्त है, उन्होंने माध्य की ` रचना अपनी प्रसिद्धि एवं विद्वत्ता प्रदर्शन के लिए नहीं की है, किन्तु मुमुक्षुजनों के समुद्धारकी प्रशस्त कामनासे प्रेरित करुणाके वशीभूत होकर ही की है । इसलिए आचार्य शङ्कर करुणाके निधान हैं । अतः वे नमस्करणीय हैं । माध्यकी प्रशंसा के लिए वे दो विशेषण देते हैं- प्रसन्न एवं गम्भीर अर्थात् वह शब्दतः प्रसन्न है, सरल है, सुगम है एवं अर्थतः गम्मीर है यानी पुनः पुनः श्रद्धा एवं एकाग्रता से चिन्तन और मनन योग्य है । माध्यके प्रणेता विशुद्धविज्ञान, कृपानिधान उन आचार्य शङ्करको मैं वाचस्पतिमिश्र नमस्कार करता हूँ I । आचार्य वाचस्पतिमिश्र दार्शनिक सार्वभौम - महाविद्वान् होने कारण कुछ अपने वैदुष्यकी अहंता मी रखते हैं । उनकी यह अहंता न्यायदर्शनके वात्स्यायन
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( १३ ) मायके उद्योतकराचायके वार्तिकग्रन्थके ऊपर तात्पर्यटीका लिखते समय प्रकट हो जाती है । वे प्रारम्भमें कहते हैं --- ' उद्योतकरगवीनामतिजरतीनां समुद्धरणाद् अहं पुण्यमुपचिनोमि । ' ' अर्थात् उद्योतकराचार्यका वार्तिक ग्रन्थ अतीव जीर्ण शीर्ण है, अनेक त्रुटियों से पूर्ण है, अतः मैं अपनी तात्पयं टोका द्वारा इन सभी त्रुटियोंका निवारण कर उस ग्रन्थका उद्धार कर पुण्य संपादन कर रहा हूँ अर्थात् मैं उस वार्तिक ग्रन्थपर बड़ा उपकार कर रहा हूँ । जैसे कि कोई कीचड़ में फँसी हुई बूढ़ो गायका उद्धार करते यशस्वी बनता है, इसप्रकार की अहता प्रकट करनेवाला वह महाविद्वान् वाचस्पति-मिश्र जब शाङ्करभाष्यके समक्ष जाता है, उसकी प्रसन्नता एवं गम्भीरताका अवलोकन कर सुग्ध हो जाता है, तब उसकी समग्र अहंता तेजधूपमें बरफके समान सर्वथा गल जाती है । ओर वह शाङ्कर-भाष्यकी प्रशस्त गौरवशालिनी वाणीको गङ्गाजल के समान स्वच्छ, पवित्र एवं मधुर मानता हुआ उसके समक्ष अपनी मामती टोका रूपी वाणीका वर्षाकालसे बहनेवाले पनालेके अपवित्र जलकी तुलना करता हुआ करता है--' आचार्यकृति निवेशनमप्यवधूतं वचोऽस्मदादीनाम् । रथ्यदोकमिव गङ्गाप्रवाहपातः पवित्रयति ॥ ' जैसे पनालेका अपवित्र जल पावन गङ्गाजल में मिलकर उसके समान ही प्रग्रस्त हो जाता है, वैसे मेरी निकृष्ट वाणी भी सर्वोत्कृष्ट पावन शाङ्करभाष्य वाणी के साथ संयुक्त होकर उसके समान प्रशस्त गौरवशालिनी हो जायगी । ( ४ ) शाङ्करभाष्यकी अनेक व्याख्याएँ - अद्वैत संप्रदाय में शाङ्करभाष्यके दो प्रस्थान माने जाते हैं - एक विवरण प्रस्थान तथा द्वितीय मामती प्रस्थान । शाङ्करभाष्य पर सर्वप्रथम वाचायं श्री शङ्कर स्वामी के प्रधान शिष्य श्री पद्मपादाचार्यंने ' पञ्चपादिका ' नामकी व्याख्या लिखी थी । इस नामसे ही विदित होता है कि पद्मपादाचार्यने समन्वयाध्यायके चार पाद तथा अविरोधाध्याय के प्रथम पाद इन पांच पादोंपर हो व्याख्या लिखी थी । परन्तु बहुसमय से हो प्रथम चार सूत्रोंपर ही उनकी व्याख्या उपलब्ध होती है, शेष सारो व्याख्या दुर्दैववश लुप्त हो गई है । पञ्चपादिकाकार श्री पद्मपादाचार्य ने अपनी व्याख्या प्रारम्भमें अपने पूज्य गुरुदेव भाष्यकार आचार्य श्री शङ्कर स्वामो का महत्त्व बतलाते हुए इसप्रकार नमस्कार किया है-नमाम्य भोगिपरिवारसम्पदं निरस्तभूतिमनुमार्धविग्रहम् । अनुप्रमुन्मृदितकाललाञ्छनं विना विनायकमपूर्वशङ्करम् ॥ इस प्रकार वेदान्त कल्पतरुकारने भी--वेदान्तार्थ - तदा मास - क्षीरनीरविवेकिनम् । नमामि भगवत्पादं परमहंसधुरन्धरम् ॥ इस मङ्गल श्लोद्वारा आचार्य श्रीशङ्करको सर्वोत्तम परम पूज्य परमहंस मानकर नमस्कार किया है | भगवत्पाद आचार्य शङ्कर एक महान् वन्दनीय परमहंस हैं । जिस प्रकार हंस क्षीरसे नीरको पृथक् करता है, इस प्रकार इस परमहंसने वेदान्तोंके वास्तविक अर्थों को उन प्रतिवादियोंके मिथ्या छर्थोंसे पृथक् कर प्रदर्शित किया है । विवरणाचार्य प्रकाशात्म श्रीचरण स्वामीने इन चार सूत्रोंकी पञ्चपादिका व्याख्यापर ही अपना प्रसन्न गम्भोर विवरण ग्रन्थ लिखा है । अद्वैत सम्प्रदाय में यह ग्रन्थ मी अतीव मान्य एवं अवश्य पठनीय माना गया है । इस विवरण ग्रन्थको ही आधार बनाकर संस्कृत के विद्वानों में विख्यात अद्वैत सम्प्रदाय के महारथी पञ्चदशी आदि अनेक वेदान्त ग्रन्थोंके प्रणेता आचार्य श्रीविद्यारण्य स्वामी ' विवरणप्रमेयसंग्रह ' नामका ग्रन्थ लिखा है । विवरण ग्रन्थके ऊपर तत्त्व-दीपन, विवरणोपन्यास आदि अनेक निबन्ध व्याख्यानरूपसे लिखे गए हैं । द्वितीय मामती प्रस्थानके प्रणोता हैं आचार्य वाचस्पतिमिश्र । वे सवं दर्शनोंके बड़े धुरन्धर विद्वाद् और अपने समयके अद्वैत सम्प्रदाय के सर्वं प्रधान आचार्य थे । शाङ्कर- माध्यपर उन्होंने जो ' मामती ' टीका लिखी है उसका अध्ययन आचार्य शङ्करके सिद्धान्तोंको समझने के लिए अनिवार्य एवं आवश्यक समझा जाता है ।
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( १४ ) आचार्य वाचस्पति मिश्र ने शाङ्करभाष्यपर ' भामती ', सुरेश्वराचायं कृत ' ब्रह्मसिद्धि ' ग्रन्थपर ' ब्रह्मतत्त्व-समीक्षा ', ईश्वरकृष्ण प्रणांत सांख्यकारिका पर ' तत्त्वकौमुदी ' पातञ्जल योगदर्शनपर ' तत्त्ववैशारदी ', न्यायदर्शन पर ' वार्तिकतात्पर्यटीका ' पूर्वमीमांसा दर्शनपर ' न्यायसूवी- निबन्ध ' कुमारिल भट्टमत पर ' तत्त्व बिन्दु ' तथा पूर्वमीमांसक मण्डन मिश्र के ' विधिविवेक ' पर ' न्यायकणिका ' नामकी टीकाओंकी रचना की है । इस प्रकार यद्यपि वाचलाते मिश्रने पाँच दर्शनोंकी व्याख्याएं लिखी हैं, उनमें तत्त-सिद्धान्तों का निष्पक्ष मावसे समर्थन किया है, तथापि उनका प्रधान लक्ष्य आचार्य शङ्करका मद्वैत सिद्धान्त ही है, अतः भामती व्याख्या अद्वैतवादका एक प्रामाणिक ग्रन्थ कहा गया है । भामती व्याख्या पर वाचायं अमलानन्द स्वामीने ' वेदान्त - कल्पतरु ' नामका प्रशस्त व्याख्यान लिखा है । इसकी भाषा प्राञ्जल एवं भाव प्रसन्न गम्भीर है । इन्होंने ' शास्त्रदर्पण ' नामक एक अन्य ग्रन्थ भी लिखा है, जिसमें ब्रह्मसूत्र के अधिकरणों का विवेचन किया गया है तथा ' पञ्चपादिकादर्पण ' नामका एक अन्य ग्रन्थ भी लिखा है । जिसमें पद्मपादाचार्यको पञ्चपादिकाकी अपने ढंगको प्रशस्त व्याख्या की है । ' वेदान्त-कल्पतरु ' पर आचार्यं अप्पय्य दीक्षितने ' परिमल ' नामका व्याख्या- निबन्ध लिखा है । उन्होंने ब्रह्मसूत्रके ऊपर शाङ्कर सिद्धान्तानुसारी ' न्यायरक्षा मणि ' नामक स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखा है जो केवल प्रथमाध्याय पर ही उपलब्ध है । संस्कृत के विद्वानों में प्रसिद्ध ' सिद्धान्तलेश ' यादि अनेक ग्रन्थोंके वे प्रणेता थे । यद्यपि उन्होंने ब्रह्मपूत्रपर शैवसम्प्रदाय के मतानुसार जो श्रीकण्ठमाध्य है उसपर ' शिवाकंमणि-दीपिका ' नामकी प्राञ्जल विस्तृत व्याख्या लिखकर शैवविशिष्टाद्वैतवाद के पक्षका समर्थन किया है, तथापि परिमल, सिद्धान्तलेश, न्यायरक्षामणि आदि ग्रन्थ लिखकर केवलाद्वैत सिद्धान्तको पूर्णतया रक्षा एवं श्री अभिवृद्धिका है । इसलिए वे अद्वैत सम्प्रदायके वाचस्पतिमिश्र, श्रीहर्ष एवं मधुसूदन सरस्वती के समकक्ष महान् याचार्य माने गये हैं । इस प्रकार आचार्य अद्वैतानन्दबोधेन्द्र स्वामीने ब्रह्मसूत्रपर ' ब्रह्मविद्यामरण ' नामका विशद पाण्डित्यपूर्ण व्याख्यान लिखा है । विद्वद्वण इसे शाङ्करभाष्यकी विवृत्ति कहते हैं । आबायं सर्वज्ञात्ममुनिने ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्यके आधार पर ' संक्षेपशारीरक ' नामका वेदान्त काव्य ढंगका यद्यरूपसे सुन्दर ग्रन्थ लिखा है । आचार्य मारतीतोर्थने शाङ्कर-माण्यानुसार ब्रह्मसूत्रका तात्पर्य समझानेके लिए ' वैयासकन्यायमाला ' नामक एक उपयोगी ग्रन्थकी सरल एवं सुबोध भाषा में रचना की है । आचार्य आनन्दगिरि स्वाभीने ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्यपर ' न्यायनिर्णय ' नामकी प्रशस्त व्याख्या लिखी है | आचार्य शङ्कर स्वामी के जितने भी उपनिषद्, गीता आदिके माध्य हैं उन सभी पर इनकी विशद टीकाएँ हैं, माध्यके यथार्थं भावको हृदयंगम कराने में इनकी टीकाएं बहुत ही सहायक हैं । आचार्य आनन्दगिरि एक सफल टीकाकार, दार्शनिक सार्वभौम एवं माध्वरहस्यवित् विद्वान् थे इसमें सन्देह नहीं । आचार्य स्वामी गोविन्दानन्दजीने शारीरक-' माष्यपर ' रत्नप्रमा ' नामकी व्याख्या लिखी है । इसमें माध्यके प्रायः प्रत्येक पदकी व्याख्या है । सर्व साधारण के लिए माष्यको हृदयंगम कराने में यह टीका बहुत ही उपयोगी है । जो लोग मामती, कल्पतरु आदि गम्भीर टीकाओंके समझने में असमर्थ हैं, उन्हींके लिए यह व्याख्या लिखी गयी हैं, ऐसा उन्होंने स्वयं कहा है-' विस्तृतग्रन्थवीक्षायामलसं यस्य मानसम् । व्याख्या तदर्थमाख्धा माष्यरत्नप्रभाभिधा ॥ ब्रह्मसूत्र शाङ्कर भाष्यको विशदरूपसे समझने के लिए आचार्य रघुनाथसूरिने ' शङ्करपाद भूषण ' नामका बहुत ही प्राज्ञ्जल उपयोगी एवं विस्तृत निबन्ध लिखा है । इसमें प्रतिवादियोंके द्वारा आरोपित अनेक कुतर्कोंका खण्डन किया गया है । ब्रह्मसूत्रपर स्वामी शङ्करानन्द, सदाशिवेन्द्र सरस्वती, स्वामी ब्रह्मानन्द यदि विद्वानोंकी अद्वैत सिद्धान्तानुसारिणी छोटी बड़ी अनेक वृत्तियाँ हैं । जो ब्रह्मसूत्र भावार्थको समझने के लिए बड़ी उपयोगी हैं ।
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( १५ ) ( ५ ) शाङ्कर - सिद्धान्त -- भगवत्पाद आचार्य श्रीशङ्करके संक्षिप्त मुख्य सिद्धान्तको समझने के लिए यह श्लोक सर्वत्र विख्यात है-' श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं प्रन्थकोटिभिः । ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ॥ ' अर्थात् जो निर्णय विस्तारसे करोड़ों - ग्रन्थोंके द्वारा कहा गया है उसको मैं संक्षेपसे अर्ध - श्लोक द्वारा कहूँगा । एकमात्र सर्वात्मा ब्रह्म ही त्रिकालाबाधित सत्य है, नामरूपात्मक यह जगत् मिथ्या है, वस्तुतः अविद्यमान होते हुए भी प्रतीयमान है । और यह जीव परमार्थतः ब्रह्म ही है, ब्रह्मसे अन्य नहीं है । ( ६ ) सत्य और मिथ्याकी परिभाषा - परमार्थं सत्य वह है - ' यत्स्यात् सर्वत्र सर्वदा ' ( चतुःश्लोकी भागवत ) अर्थात् जो सभी कालोंमें विद्यमान हो, किसी भी कालमें जिसका बाघ न हो एवं जो सर्वत्र अवस्थित हो, वह त्रिकालाबाधित सर्वानुगत सत्य है । जैसे ५ + ५ = १० ही होता है, किसी मो समय में एवं किसी भी देश - विशेष में ५५ न तो ९ होता है, न ११, वैसे वह सर्वात्म परमार्थं सत्य ब्रह्म भी भूत, भविष्यत् एवं वर्तमान तीनों कालमें जगत्के आदि मध्य एवं अन्तमें, तथा सभी प्रदेशों में समस्त पदार्थोंयें अखण्ड - एकरस अविकृत रूप से अवस्थित है । यदि उस परमार्थं सत्यको कोई भी व्यक्ति छोड़ना चाहे या उससे पृथक् या विमुख होना चाहे, तो हो नहीं सकता, क्योंकि उसका समीके साथ तादात्म्यसम्बन्ध है | भेद संहिष्णु बभेद सम्बन्धका नाम तादात्म्य है अर्थात् जिसमें वास्तविक अभेद एवं काल्पनिक भेद हो, जैसे सुवर्णके साथ आभूषणोंका । वह ब्रह्म सर्वदा कालपरिच्छेदसे रहित है, सर्वत्र होने से देशपरिच्छेदसे एवं सबका आत्मा होनेसे वस्तु परिच्छेदसे रहित है | अतः वह श्रुति द्वारा ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' कहा गया है । मिथ्या वह है जो कभी रहे, या कमी न रहे, यहाँ रहनेका अभिप्राय केवल प्रतीतिसे है । कल्पित - पदार्थ मध्यमें मासित होनेपर भी वह वस्तुतः आदि एवं अन्तकी तरह मध्य में भी व्यविद्यमान ही है । अतएव माण्डूक्योपनिषत् - कारिका-कार श्रीगौडपादाचार्यजीने कहा है- ' आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा । ' ' वेदान्त - डिण्डिम ' नामके लघुग्रन्थ में आचार्यं नृसिंह सरस्वतीने कहा है- -' यदस्त्यादौ यदुस्त्यन्ते यन्मध्ये माति तत्स्वयम् । ब्रह्मैवैकमिदं सत्यमिति वेदान्तडिण्डिमः ॥ यन्नादौ यच्च नास्त्यन्ते तन्मध्ये भातमप्यसत् । अतो मिथ्या जगत् सर्वमिति वेदान्तडिण्डिमः ॥ जो आदिमें है, अन्त में है, एवं मध्यमें भी स्वयं मासित होता है, वह एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है, यह वेदान्तका fsfus म घोष है । जो आदिमें नहीं अन्त में भी नहीं, वह मध्य में मासित होनेपर मी असत् - मिथ्या ही माना गया है । अतः यह जगत् मिथ्या ही है, ऐसा वेदान्तका डिण्डिम घोष है । अतएव श्रीभगवान्ने गीता में भी सत् एवं असत्से विलक्षण जो अनिर्वचनीय है वही मिथ्या है, जगत् परमार्थं सत्य इसलिए नहीं है कि उसका ब्रह्म साक्षात्कार दशामें वाघ होता है, असत् इसलिए नहीं है कि उसकी व्यवहारदशा में प्रतीति होती है, अतः वह सत् एवं असत् से विलक्षण है, इसका निरूपण बड़े अच्छे ढंग से किया है— ' नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ' सत्का कमी बाध नहीं होता एवं असत्की कभी भी बन्ध्यापुत्रके समान प्रतीति नहीं होती । इस श्लोकमें मावका अर्थ सत्ता अस्तित्व नहीं है, क्योंकि ' असत् ' शब्द से ही सत्ताका निषेध सिद्ध होता है, अतः सत्ता रहित असत् की सत्ता नहीं है, ऐसा कहना पुनरुक्त - सा प्रतीत होता है । अतः भावका अर्थ ' मवति प्रभवति उत्पद्यते इति भावः ' इस व्युत्पत्तिसे उत्पत्ति ही मानना चाहिए । ' भावः सत्तास्वभावाभिप्राय चेष्टात्मजन्मसु । ' इस कोशके अनुसार भी मावशब्द उत्पत्तिका ही बोधक है । एवं उत्पत्ति - अर्थवाले भावके प्रतिद्वन्द्विरूप से अमादका अर्थ विनाश भी मानना उचित है । इससे यह ज्ञात होता है कि जो पदार्थ
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( १६ ) शशशृङ्गादिके समान अस्त है, उसकी उत्पत्ति नहीं होती है, अमाव पदके संयोजनसे उसका विनाश भी नहीं होता । इस प्रकार जो परमार्थं सत् पदार्थ है, उसकी भी उत्पत्ति एवं विनाश नहीं देखे गये । अतः ' यथा असतो भावोऽभावश्च न विद्येते, तथा सतोऽपि अभावो भावश्च न विद्येते । ' ऐसा पदोंका अन्वय सिद्ध होता है अत जगत् यदि परमार्थं ब्रह्म के समान सर्वथा सत् हो एवं वन्ध्यापुत्रके समान सर्वथा असत् हो तो उसकी उत्पत्ति एवं विनाश नहीं हो सकते । परन्तु हमारे वेद उपनिषत् - स्मृति-पुराण आदि समस्त शास्त्रों में जगत्की उत्पत्ति कही गई है, एवं उसके विनाश- प्रलयका भी वर्णन किया गया है । अतः जगत् सत् एवं असत् नहीं किन्तु सत् एवं असत् से विलक्षण - अनिर्वचनीय- मिथ्या ही है उसकी व्यावहारिकसत्ता माननेपर भी ब्रह्मके समान परमार्थ- सत्य नहीं है । इसप्रकार तत्त्वदर्शी विद्वानों ने सत् एवं असत्का यथार्थनिर्णय किया है । अतः संक्षेप शारीरकाचार्यं सर्वज्ञात्ममुनिने कहा है-' जगन्महिम्ना न जगत्प्रसिद्धिः न चिन्महिम्नाऽपि जगत्प्रसिद्धिः । न च प्रमाणाज्जगतः प्रसिद्धिः, स्वतोऽस्य मायामयताप्रसिद्धिः ॥ ' जगत् की महिमा जगत्को प्रसिद्धि नहीं है, चेतन ब्रह्मकी महिमासे भी जगत् की प्रसिद्धि नहीं है प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे मी जगत् की प्रसिद्धि नहीं है, अतः इस जगत् की अनिर्वचनीय मायामयतारूपसे ही प्रसिद्धि प्रतीति माननी चाहिए ।
' जडत्वहेतोर्नजगन्महिम्ना, न चिन्महिम्ना तदसङ्गभावात् ।
न च प्रमाणात्तदकारकत्वात् कृतस्य जाड्यादजड जनेश्च ॥
as होने के कारण जगत्को महिमासे जगत्की प्रसिद्धि नहीं हो सकती, जडपदार्थ अपने आपको प्रसिद्ध नहीं कर सकता, चेतनके द्वारा ही उसकी प्रसिद्धि होती है । परन्तु चेतनकी महिमा से मी जगत् की प्रसिद्धि नहीं होती, क्योंकि चेतन, असंग, निर्लेप एवं निर्विशेष है । प्रत्यक्षादि प्रमाणों से भी जगनुको प्रसिद्धि नहीं होती, क्योंकि प्रमाण कारक नहीं होते, प्रसिद्धिरूपी क्रिया के जनक नहीं होते । जन्य वस्तु जड़ होती है और बजड़, चेतन वस्तुको उत्पत्ति नहीं होती है अर्थात् नाम - रूपात्मक जगत्को प्रसिद्धिमें - प्रतीति में जिज्ञासा होती है कि जगत् की प्रसिद्धि स्वतः ही होती है, या चेतन-आत्मासे, या प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे? जगत् स्वयं जड़ है, जड़से जड़की प्रसिद्धि होती ही नहीं, अतः प्रथम पक्ष तो सर्वथा अयुक्त है । द्वितीयपक्ष भी संगत नहीं, क्योंकि चेतन आत्मा असंग है, उसका जगत् से कोई वास्तविक सम्बन्ध ही नहीं, विना सम्बन्धके कोई प्रकाशक किसीको प्रसिद्धि नहीं कर सकता । तीसरा पक्ष अर्थात् प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे भी जगत् की प्रसिद्धि नहीं हो सकती, 1 क्योंकि कोई मी प्रमाण जड़ पदार्थविषयक संवित् प्रकाशकका कारण उत्पादक नहीं हो सकता । बाराय यह है कि जगत्को प्रकाशरूप संवित् नित्य आत्मस्वरूप ही है, उसे प्रत्यक्षादि प्रमाण उत्पन्न नहीं कर सकते | और जो अन्य पदार्थ है, वह जड़ है, उसे प्रकाश या संवित् मानना उचित नहीं । इसलिए अनिर्वचनीय, मिथ्या, देह, गेह, कलत्र, पुत्रादि जगत्को कोई कितना मी परमार्थसत्य माने, तो भी वह सत्य नहीं हो सकता । अतः नाम - रूपात्मक जगत्को तो तत्त्वदर्शियोंने स्वप्न समान केवल प्रतीति-मात्र ही माना है । आचार्य भगवत्पादने भी कहा है- --' संसारः स्वप्नतुल्यो हि रागद्वेषादिसंकुलः । स्वकाले सत्यवद्भाति, प्रबोधेऽसत्यवद्भवेत् ॥ ' यह प्रतीयमान संसार स्वप्नके समान है । राग, द्वेषादि दोषोंसे सम्बद्ध है । जैसे स्वप्न निद्रा-कालमें भासित होता है । और जाग्रत्कालमें बाधित हो जाता है, वैसे यह संसार मी अज्ञानकालमें प्रतीत होता है और बोध होनेपर बाधित हो जाता है । ' द्दष्टे भवति प्रभवति न भवति किं? भवति-रस्कार: ' ( षट्पटी ) हे भगवन्! अधिष्ठानरूप सर्वात्मा आप परब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर क्या इस द्वैतप्रपञ्चका तिरस्कार नहीं होता? अवश्य ही हो जाता है । अधिष्ठान के साक्षात्कार से उसमें आरोपितका बाघ ही हो जाता है, यह सर्वजनविदित न्याय है ।
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( १७ ) ( ७ ) जीवो ब्रह्मैव नापर: - यह जीवात्मा वस्तुतः देह नहीं है, किन्तु देव है, जड नहीं है, किन्तु चेतन है, दृश्य नहीं है, किन्तु द्रष्टा है, परिच्छिन्न नहीं है, किन्तु अपरिच्छिन्न ( विभु ) है | tara इसकी मी ब्रह्मके समान त्रिकालाबाधित पारमार्थिक ही सत्ता है । यह स्वयं प्रकाश स्वतः सिद्ध ज्ञानस्वरूप है । अतएव कठोपनिषत् एवं गीता में मो कहा है-' महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति । ( क ० १।१।२२ ) अविनाशितु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । ' गी ० २।१७ ) अर्थात् उस महान् विभु आत्माका मनन एवं ध्यान करके धीर यानी अविकृत प्रज्ञावाला महापुरुष शोकसे रहित हो जाता है । हे अर्जुन! उस अपने स्वस्वरूपभूत आत्माको तू अविनाशी जान । वह सर्वव्यापक है, उससे यह समग्र जगत् अन्तर - बाहर व्याप्त है । आत्माको जो अणु परिमाण एवं मध्यम परिमाणवाला मानते हैं, उनका मत इन वचनोंसे खण्डित हो जाता है । एवं वह आत्मा आनन्दस्वरूप है, उसकी आनन्दरूपता सुषुप्ति में एवं समाधिमें अनुभूत होती है । दुःख आदि तो मनके धर्म हैं, मनके साथ तादात्म्याध्यास होनेसे वे धर्मं विशुद्ध आत्मामें आरोपित हैं । जैसे जपाकुसुमकी लालिमा स्फटिकमें आरोपित होती है, जैसे लालिमाके आरोपसे उसकी स्वाभाविक शुक्लता तिरोहित हो जाती है, वैसे ही मनके दुःखादि धर्मोके आरोपसे उस अन्तरात्माको स्वाभाविक आनन्दरूपता अभिभूत हो जाती है । इसलिए मैं चिदात्मा वस्तुतः सद्रूप, चिद्रूप, आनन्दरूप, परिपूर्ण अविनाशी - भूमा ब्रह्म ही हूं, ऐसी दृढ भावना मुमुक्षु सदा करता रहे । अतः आचार्य मधुसूदन सरस्वतीने अद्वैतसिद्धि में कहा है-' अनादिसुखरूपता निखिल दृश्य निर्मुक्तता, निरन्तरमनन्तता स्फुरणरूपता च स्वतः । त्रिकालपरमार्थता त्रिविधभेदशून्यात्मता, मम श्रुतिशतार्पिता तदहमस्मि पूणों हरि ॥ ' अर्थात् मेरी अनादि शाश्वत सुख पूर्णता, निखिल देहादि दृश्य द्वैवप्रपञ्चसे विमुक्तता, सदा अनन्त - अपरिच्छिन्नवा - व्यापकता, स्वयं स्फूर्तिरूप - चैतन्य ज्योतिरूपता, त्रिकालाबाधित परमार्थता, सजा-तीय, विजातीय एवं स्वगत भेदशून्यता, स्वतः प्रमाण सैकड़ों श्रुतियोंके द्वारा प्रतिपादित है, अतः मैं पूर्णहरि हूँ । ' आचार्य श्रीनृसिंहसरस्वतीने ' वेदान्तडिण्डिम ' में सरल सहज एवं सुगम भाषामें कहा है-सच्चिदानन्दरूपत्वाद् ब्रह्मैवात्मा न संशयः । श्रुतिप्रमानुसंधानादिति न जीवब्रह्मणोर्भेदः सत्तारूपेण विद्यते । सत्ताभेदे न मानं स्यादिति न जीवब्रह्मणोदः स्फूर्तिरूपेण विद्यते । स्फूर्तिभेदे न मानं स्यादिति न जीवब्रह्मणोर्भेदः प्रियरूपेण विद्यते । प्रियभेदे न मानं स्यादिति न जीवब्रह्मणोर्भेदो नाम्ना रूपेण विद्यते । नाम्नो रूपस्य मिथ्यात्वादिति न जीव ब्रह्मणोर्भेदः पिण्ड ब्रह्माण्ड भेदतः । व्यष्टेः समष्टेरेकत्वादिति अभेददर्शनं मोक्षः संसारो भेददर्शनम् । सर्ववेदान्तसिद्धान्त इत्ति वेदान्तडिण्डिमः ॥ वेदान्तडिण्डिमः ॥ वेदान्तडिण्डिमः ॥ वेदान्तडिण्डिमः ॥ वेदान्तडिण्डिमः ॥ वेदान्तडिण्डिमः ॥ वेदान्तडिण्डिमः ॥ जीवो ब्रह्मात्मना ज्ञेयो ज्ञेयं जीवात्माना परम् । मुक्तिस्तदैक्य विज्ञानादिति वेदान्तडिण्डिम ॥ सत्, चित् एवं आनन्दरूप होनेके कारण यह जीवात्मा वस्तुतः ब्रह्म ही है, इसमें लेशमात्र मी सन्देह नहीं है, यह सिद्धान्त श्रुति प्रमाणोंके श्रवणद्वारा एवं प्रत्यगभिन्न अद्वय ब्रह्मतत्त्वके सतत मनन एवं निदिध्यासन द्वारा स्पष्ट ही अनुभूत होता है । यही सर्वजन सुखाय सर्वजनहिताय वेदान्तका प्रामाणिक डिण्डिम घोष है । सत्तारूपसे मी जीव एवं ब्रह्मका भेद नहीं हो सकता, क्योंकि सत्तापूर्ण एक अखण्डित व्यापक पदार्थ है, उसमें किसी प्रकार से भी कोई भेद नहीं कर सकता । इस प्रकार स्फूर्ति चैतन्यरूप से भी जीव ब्रह्मका भेद नहीं हो सकता, अतः जीव चैतन्य एवं ब्रह्म चैतन्यमें किसी भी प्रकारकी विभिन्नता नहीं है, क्योंकि चैतन्य स्फूर्ति भी पूर्ण एकरस निराकार अखण्ड एवं सवंगत है और सत्तासे अभिन्न है । इस प्रकार परम प्रिय आनन्दरूपसे भी जीव ब्रह्मका भेद नहीं हो सकता,
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( १८ ) क्योंकि आनन्द भी विभु व्यापक है सर्वत्र विद्यमान है, सत्ता एवं स्फूर्ति से अभिन्न है, अतः उसका भी कोई विभाजन नहीं कर सकता । यद्यपि वैषयिक आनन्द शब्दादि विषयोंके भेदसे भिन्न - सा प्रतीत होता है, तथापि विषयोपाधि रहित विशुद्ध निर्विषय निरतिशय निरवच्छिन्न शाश्वत आनन्दमें किसी भी प्रकारका भेद नहीं है, यह वेदान्तका स्वतः प्रमाण उपनिषदोंका डिण्डिम घोष है । नामोंके भेदसे एवं औपाधिक रूपोंके भेदने मी जीव ब्रह्मका भेद नहीं है, क्योंकि नाम एवं रूप मिथ्या है, कल्पित नाम रूप वास्तविक जीव ब्रह्मकी एकताका प्रतिरोध नहीं कर सकते । इस प्रकार पिण्ड एवं ब्रह्माण्डके भेदसे भी जीव ब्रह्मका भेद नहीं हैं, क्योंकि कार्यं कारणकी अनन्यता के सिद्धान्त के अनुसार आभूषण एवं सुवर्णकी तरह पिण्ड एवं ब्रह्मण्डमें भी भेद नहीं है, अतः यह वेदान्तोंका यथार्थं अविचलित निश्चय है कि जीव एवं ब्रह्मके अभेदानुभवका ही नाम मोक्ष है । अविद्याकृत भेद दर्शन ही संसार-दुःखमय बन्धन है । जीव ब्रह्मस्वरूप ही है एवं जीवात्मरूपसे परब्रह्म ही भासित होता है, ऐसा दृढ़ श्रद्धा से समझना चाहिए । जीव ब्रह्मके अभेद विज्ञानसे ही मोक्षकी प्राप्ति होती है, ऐसा वेदान्तका घोष है । ( ८ ) द्वैतवाद - समालोचना - वेदान्त - उपनिषद् आदि शास्त्र द्वैतका - जीवेश्वरादिके भेद का ही प्रतिपादन करते हैं, अद्वैतका नहीं ऐसा कहते हुए कुछ मतावलम्बी ऋग्वेदसंहिताकी इस प्रसिद्ध श्रुतिको प्रस्तुत करते हैं-' द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥ ' ( ऋ. १।१६४ २ ० ) ( मु.उ. ३।१।१ ) ' शरीररूपी एक ही वृक्षमें जीव एवं ईश्वररूपी परस्पर मिलकर एक दूसरे के हितकर सखा हुए दो हंस पक्षी रहते हैं । इन दोनोंमें जीवरूपी पक्षी शरीरवृक्ष के स्वाद - मोगरूपी फलोंको भोगता और दूसरा ईश्वररूपी पक्षी मोगोंको भोगता तो नहीं है, किन्तु केवल देखता रहता है अर्थात् जीव मोक्ता है और ईश्वर द्रष्टा है । ' इस मन्त्र में एकका मोक्तारूपसे एवं दूसरेका द्रष्टा रूपसे भेद ही बतलाया है । इसप्रकारकी - ' पृथगात्मानं प्रेरितारञ्च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति । ( वे ० १६ ) इस श्वेताश्ववर श्रुतिने मी ' पृथक् ' पदसे जीवात्माका उसके प्रेरयिता ईश्वरसे भेदका ही वर्णन किया है । जीवात्मा जब उस परमेश्वरका श्रद्धा भक्ति से सेवन करता है, तभी वह अमृतत्व ( मोक्ष ) को प्राप्त होता है । एवं-' जीवेश्वरौ भिन्नौ विरुद्ध धर्माक्रान्तत्वात् दहनतुहिनवत् | ' इत्यादि अनुमान प्रमाण मी जीव एवं ईश्वर के भेदको ही सिद्ध करता है, क्योंकि जीव अल्पज्ञत्व, अल्पशक्तित्वादि एवं ईश्वर सर्वज्ञत्व, सर्व-शक्तित्वादि परस्पर विरुद्ध धर्मोसे बरफ एवं अग्निकी तरह अक्रान्त हैं, अतः उनका अभेद नहीं हो सकता । और सभी जीवोंको मैं महान् सुखपूर्ण ईश्वर नहीं हूँ, किन्तु सुखी दुःखो हूँ ' ऐसा प्रत्यक्ष होता है, अतः जीव एवं ईश्वरका भेद ही मानना चाहिए । अब यहाँ उक्त द्वैतवादी द्वारा प्रदर्शित इन श्रुत्यादि पर क्रमशः विचार किया जाता है । ' द्वा सुपर्णा ' इस श्रुतिका पूर्वाधं जीव एवं ईश्वरके भेदका प्रतिपादन नहीं करता । तब वह भेद पारमार्थिक है, औपाधिक नहीं, ऐसा वह द्वैतवादी कैसे कह सकता है? क्योंकि किसी भी पद एवं वाक्यसे भेदका बोध ही नहीं होता । शङ्का – ' द्वो ' इस पदके द्वारा श्रुति द्वित्वका प्रतिपादन करती है, और यह द्वित्व भेदमें ही होता है, अभेद में नहीं । अतः यह द्वित्व ही जीव एवं ईश्वरके भेदका बोधक है । समाधान - - किसोको कभी सदोष चक्षुसे दो चन्द्रमा दिखाई देते हैं, इसमें प्रतीयमान द्वित्व काल्पनिक भेदका ही बोधक है पारमार्थिक भेदका नहीं, इस प्रकार द्वित्व गम्य भेद प्रत्यक्षादि प्रमाण सिद्ध काल्पनिक औपाधिक भेदका ही अनुवाद करता है । और ' तत्त्वमसि ' आदि महावाक्य श्रुतियोंसे प्रतिपादित परमार्थं अभेदके साथ विरुद्ध होनेके कारण वह भेद पारमार्थिक नहीं है । पूर्वोक्त श्रुतिके पूर्वार्धमें निर्दिष्ट ' सुपणों, ' सखायो, एवं