श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 21–30
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 21–30
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( १ ९ ) सयुजी ' ये तीन विशेषण भी जीव एवं ईश्वरके अभेदके ही ज्ञापक हैं, भेदके नहीं । दोनों ही सुपणं हैं, हंस हैं, सजातीय हैं अथवा निरुक्तके मात्रादि विषययादि नियमके अनुसार दोनों ही सुपूणं ही यहाँ सुपर्णं नामसे कहे गये हैं । ' पूर्णमदः पूर्णमिदं ' यह श्रुति मी ' अद: ' यानी परोक्ष ईश्वरतत्त्व भी पूर्ण है, एवं ' इदम् ' यानी अपरोक्ष सन्निकृष्ट जीत्र तत्र मी पूर्ण है । दोनों ही पूर्ण हैं, पूर्ण सत्ता, पूर्ण स्फूर्ति एवं पूर्ण आनन्द से व्याप्त होनेके कारण उनकी पूर्णता में किसी प्रकारका मी तात्त्विक भेद नहीं है घटकारा, महाकाशादिकी तरह केवल औपाधिक हो भेद है । अत एव वे दोनों सखा हैं, इन दानोंका समान ही ख्वान है, ख्यान यानी इन दोनोंकी समानरूपसे- सच्चिदानन्दरूपये प्रतीति है, ऐसा अभेद-भाव यह सखापद बोंधित करता है । वे दोनों बिम्ब प्रतिबिम्ब मावसे या घटाकाश महाकाशरूपसे सदा अविनाभाव सम्बन्धसे संयुक्त हैं यह ' सयुजी ' पद बोधित करता है । इसलिए पूर्वा श्रुति अभेद-भावकी ही ज्ञापक है, अतः उत्तरार्ध में वर्णित अन्यत्व योपाधिक अन्यत्नका ही बोधक है । परमार्थतः तो वे दोनों अनन्य हैं । ' पृथक् आत्मानं प्रेरितारञ्च मत्वा ' यह श्रुति मी पृथक् पदसे जीव एवं ईश्वर के पार्थक्यका प्रतिपादन नहीं करती, अपितु आत्मा देहादि जडवगंसे पृथक् है और चेतन साक्षी होने के कारण जडवर्गका प्रेरक है ऐसा उसका वास्तविक अर्थ है । अतः आत्मा होनेसे अनात्म देहादिसे तादात्म्याध्यास वश अपृथग्रूरूप से प्रतीयमान होनेपर भी वह वस्तुतः पृथक् ही है, विरुद्ध धर्माक्रान्तत्व हेतु मी जीव एवं ईश्वरका पारमार्थिक भेद सिद्ध नहीं करता, क्योंकि अल्पज्ञत्व, सर्वज्ञत्वादि विरुद्ध धर्म पिण्ड, ब्रह्माण्डादि उपाधियों से सम्बन्धसे प्रतीत हो रहे हैं । उपाधिविनिर्मुक्त विशुद्ध स्वरूपमें उनका मान नहीं होता । ' मैं ईश्वर नहीं हूँ यह प्रत्यक्ष मो काल्पनिक भेदका ही अनुवादक है, तात्त्विक भेदका साधक नहीं । ईश्वर अप्रत्यक्ष है अतः तत्प्रतियोगिक भेद भी प्रत्यक्ष नहीं है । इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाणसे जोव ईश्वरका भेद सिद्ध नहीं होता । इस प्रकार जीवों का भी परस्पर तात्त्विक भेद सिद्ध नहीं होता । जैसे जलादिमें प्रतिबिम्बित चन्द्र उपाधियोंके भेदसे अनेकरूपसे प्रतीत होनेपर भी वस्तुतः एक ही है ' तदभिन्नाभिन्नस्य तदभिन्नत्वम् ' यह दर्शनशास्त्रोंका न्याय बिम्बसे अभिन्न एक प्रतिबिम्बका द्वितीय प्रतिबिम्ब से भी अभेद सिद्ध करता है, वैसे जोवात्म ( भो अन्तःकरणादि उपाधियोंके भेदसे सुखी, दुःखी आदि विभिन्नरूपसे प्रतीत होने पर भी शुद्धस्वरूपसे एक ही है श्रुति भी ऐसा ही कहती है । ' एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥ ' ' एक ही निखिल भूतोंका पिण्ड ब्रह्माण्डादि शरोरोंका आत्मा है । परन्तु पृथक् - पृथक् भूत ', मौतिकादि उपाधियोंके भेदसे वह बहुत प्रकारका प्रतीत होनेपर भी जलचन्द्र के समान वस्ततुः एक ही है । ' इस प्रकार ' ब्रह्मैवेदं सर्वम् ' ( नृ ० उ ० ७ ) ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' ( छा ० ३ | १४.१ ) ' वासुदेव: समिति ' ( गी ० ७११ ९ ) ' तदनन्यत्वमा रम्मणशब्दादिभ्यः । ' ( ब्रह्मसूत्र २।३।१४ ) इत्यादि वचनोंके द्वारा जगत्का भी बाधसामानाधिकरण्य न्यायसे परमात्मासे अभेद भाव ही सिद्ध होता है ' वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ' ( छा ० ६ | ४ | १ ) इस श्रुतिके द्वारा घट, शरावादि कार्य वर्गमें धनुगत एकमात्र मृत्तिका — उनका उपादान कारण - ही सत्य है । कार्य वर्ग तो वाणोसे कथन मात्र ही है, इस दृष्टान्तद्वारा परमात्मासे जगत्का अनन्यत्व सिद्ध होता है । ( ९ ) विशिष्टाद्वैतवादसमालोचना कुछ प्रतिवादो लोग कहते हैं— उपनिषदादिका प्रतिपाद्य केवल अद्वैत नहीं है, किन्तु चेतन एवं अचेतन से विशिष्ट ब्रह्म अद्वैत है । जैसे लोक में शरीर एवं शरीरी आत्माका परस्पर अत्यन्त भेद होनेपर मो ' यह एक ही देवदत्त है ' ऐसा जड़ एवं चेतन विशिष्ट एकत्वका व्यवहार होता है, वैसे जड़
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( २० ) पदार्थ एवं जीवोंका अनेकत्व होनेपर मी एवं ब्रह्मसे उन सबका भेद होनेपर भी चित् - अचित्से विशिष्ट ब्रह्म एक है – अद्वैत है, ऐसा मानना अनुचित नहीं है । परन्तु यहाँ विचारणीय यह है कि विशेषण, विशेष्य एवं उनका सम्बन्ध इन तीनोंका नाम विशिष्ट है, यह विशिष्ट पद जब द्वैतको सिद्ध करता है, तब उसका ब्रह्मके साथ अद्वैत कहना वदतोव्याघात दोष है । जैसे कोई यह कहे कि ‘ मम मुखे जिह्वा नास्ति ' अर्थात् मेरे मुखमें जिह्वा नहीं है ' वैसे ही विशिष्ट जब द्वैत है, तब वह अद्वैत हो हो नहीं सकता और ' यह एक देवदत्त है ' यह दृष्टान्त भी विषम है, क्योंकि शरीर के साथ आत्माका एकत्व वस्तुत: हो नहीं सकता, अतः यह एकत्व व्यवहार भ्रममूलक है । अतएव बुद्धिमान् पक्षपात रहित विवेचकोंकी प्रशस्त दृष्टिमें विशिष्ट और अद्वैत इन दोनों पदोंका समन्वय ही नहीं हो सकता, क्योंकि द्वैतके अभावका नाम ही अद्वैत है जिसमें परमार्थतः द्वैत न हो, वह अद्वैत है, अद्वैत में द्वैतरूप विशेषण लगाकर उसको परमार्थतः कौन विशिष्ट कर सकता है? और वह अद्वैत विशिष्ट क्यों हो जायगा? यदि वह वस्तुतः विशिष्ट है तो उसे अद्वैत कहना हो व्यर्थ है । अतः श्रुति, स्मृति, पुराण यदि किसी भी शास्त्र में ' विशिष्टाद्वैत ' ऐसा अनुपुर्वी पद हो उपलब्ध नहीं है, इसलिए ' विशिष्टाद्वैत ' यह मत - वाद शास्त्रानुकूल एवं युक्ति संगत नहीं है । शङ्का – ' यस्य पृथिवी शरीरं यस्थापः शरीरं यस्यात्मा शरीरम् ' ( बृह ० ३ ७१२ -३ ) इत्यादि अश्रुतियोंके द्वारा चित् ( चेतन जीव ) एवं अचित् ( जड़ प्रकृति पृथिव्यादि रूप ) शरोरसे विशिष्ट आत्मा एक है, अद्वैत है, ऐसा निश्चित होता है | समाधान— चेतन जीव और जड़ पृथिव्यादि ये दोनों परमात्मा के वास्तविक शरीर नहीं हो सकते । शुभाशुभ कर्मसे जन्य जो सुख दुःखादि रूप फल है – उसके मोग अनुभवके आश्रयका नाम शरीर है ' भोगायतनं हि शरीरम् ' यह दार्शनिकों को परिभाषा है । विशुद्ध परमात्मा में कर्म बन्धन एवं फल भोगका सम्भव नहीं है । उसमें कर्म एवं मोग स्वीकार करने पर वह जीवके समान भोक्ता हो जायगा अर्थात् परमात्मा न होकर जीव हो जायगा । अतः पृथिवी, आप, आत्मा, शरोरम् ' का अर्थ है स्वरूप | परमात्मा ही अपनी अचिन्त्य अनिर्वचनीय माया शक्ति द्वारा पृथिव्यादिरूपसे प्रतीत होता है, अतः यह सब कुछ उसका ही स्वरूप है, उससे उनकी पृथक् सत्ता नहीं है । ' सवं खल्विदं ब्रह्म ' ( छा ० ३ | १४ | १ ) ' इदं सर्व यदयमात्मा ' ( बृह ० २ | ४ | ५ ) ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ' ( छा ० ६ ८ ७ ) इत्यादि श्रुतियोंके द्वारा भी पूर्वोक्त ही अर्थ निश्चित होता है । लोकमें भी स्वरूप अर्थ में शरीर शब्दका प्रयोग देखा जाता है, जैसे ' शिलापुत्रकस्य शरीरम् ' ' यह पत्थर पुतलेका शरीर है, यानी स्वरूप है । ' अतएव ' विश्वरूपो यतोऽव्ययः ' ( वि ० पु ० १।२२।६८ ) ' द्वे रूपे ब्रह्मणस्तस्य मूर्तं चामूर्तमेव च । ' ( वि ० पु ० १।२२।५३ ) इत्यादि वचनोंमें भी रूप शब्दका प्रयोग पूर्वोक्त निर्णयकी पूर्ण पुष्टि करता है । अतः नेह नानास्ति किञ्चन ' ( बृह ० ४४।१ ९ ) इस श्रुतिके द्वारा उस विश्वाधिष्ठान अद्वितीय ब्रह्म में वस्तुतः किसी भी प्रकारसे नाना द्वैत प्रपञ्च नहीं है, यह सिद्ध होता है । व्यवहार दशामें जो नानात्वकी प्रतीति होती है, वह माया-मात्र है | यह बात श्रीमद्भागवत में भी स्पष्ट कही गई है - ' मायामात्रमिदं राजन्! नानात्वं प्रत्यगात्मनि ' ( मा ० १२: ४।२५ ) ' प्रत्यगात्मा ब्रह्म में प्रतीयमान नानात्व मायामात्र है, अविद्यासे आरोपित है । ( १० ) द्वैताद्वैतवादसमालोचना कुछ मतवादी कहते हैं- दो प्रकारको श्रुतियाँ उपलब्ध होती हैं, १ – द्वैतप्रतिपादिका एवं २ - अद्वैतप्रतिपादिका | ' तुल्यञ्च सांप्रदायिकम् ' अर्थात् सम्प्रदाय यानी गुरुपरम्परासे समधीत सभी श्रुतियाँ-समान हैं, इनमें गोण - मुख्यभाव नहीं हो सकता । ' इस न्यायसे विनिगमकका अभाव होनेके कारण द्वैत एवं अद्वैत दोनों ही श्रुति तात्पर्यके विषय हैं, ऐसा मानना चाहिये । द्वैत एवं अद्वैत दोनों ही श्रुति मूलक हैं, यतः जैसे अद्वैतवादी अद्वैतको पारमार्थिक मानते हैं, वैसे हो द्वैतवादियों को भी अद्वैतको पार
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( २१ ) मार्थिक मानना चाहिए । इसी प्रकार जैसे द्वैतवादी द्वैतको पारमार्थिक मानते हैं, वैसे हो अद्वैतवादियों को भी द्वैतको पारमार्थिक मानना चाहिये । ऐसा मानने पर अद्वैतवादो एवं द्वैतवादो दोनोंके विवाद का शमन हो जायगा तथा द्वैत एवं अद्वैतका सामञ्जस्य ( समन्वय ) हो जायगा । यहाँ विचारकों को यह समझना चाहिये कि यद्यपि विषमसत्तावाले द्वैत एवं अद्वैत का विरोध नहीं । परन्तु समसत्तावाले - द्वैत एवं अद्वैतका प्रकाश पूर्व अन्धकारकी तरह परस्पर विरोध होनेके कारण दोनों ही श्रुति तात्पर्यके विषय हैं, ऐसा सहस्रवदन शेष भगवान् भी नहीं कह सकते । द्वैत प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे अधिगत है, ' नेह नानास्ति किञ्चन ' इत्यादि श्रुतियोंके द्वारा बाधित है, दुःखनिवृत्ति एवं शाश्वत सुख लामरूप प्रयोजनका समर्पक नहीं है, प्रत्युत अनर्थका प्रयोजक होने के कारण श्रुति तात्पर्यका विषय नहीं है । परिशेषात् अनधिगत, अबाधित एवं सप्रयोजन अद्वैत ही श्रुति तात्पर्यका विषय है । अतः अन्य गति न होनेके कारण प्रत्यक्षादिसे अधिगत द्वैतकी प्रतिपादक श्रुतियां अनुवादक होनेसे गौण हैं । द्वैतप्रपञ्च अविद्यासे उद्भासित होनेके कारण अनिर्वचनीय ( मिथ्या ) है अतः उसका शास्त्र प्रतिपादित परमार्थं सत्य अद्वैत के साथ विरोध नहीं है । इस प्रकार द्वैतप्रपञ्च बाधित होने पर मी व्यावहारिक सत्य है एवं सर्वात्मा अद्वैत ब्रह्म अबाधित होनेसे परमार्थं सत्य है । ऐसा मानने में कुछ भी विरोध नहीं है । द्वैतका प्रतिपादन तो श्रुतियाँ केवल अध्यारोप की दृष्टि से अपवाद के लिए ही अपवादाधिगम्य अधिष्ठान परब्रह्म के विज्ञापन के लिए ही करती हैं । अतः ' योग्यं योग्येन सम्बध्यते ' इस न्यायके अनुसार ' तुल्यञ्च साम्प्रदायिकम् ' इस न्यायका किसी भी प्रकारसे बाध नहीं होता । अतः अपनी कपोल कल्पना द्वारा बाधित द्वैतको परमार्थं सत्य एवं श्रुति तात्पर्यका विषय मानना कदापि उचित नहीं है । द्वैतप्रपञ्च की अवास्तविकता ' यत्र हि द्वैतमिव भवति, तदितर इतरं पश्यति । ' ( बृह ० २१४ १४ ) इस श्रतिमें वर्तमान ' इव ' कारके द्वारा स्पष्ट ही ज्ञात होतो है अर्थात् जिस fursa स्था द्वैती तरह होता है, वहाँ अन्य हुआ द्रष्टा अन्य दृश्यको देखता है । जैसे ' इदं सुवर्णमिव विभाति । ' ' यह पदार्थं सुवर्णकी तरह दीखता है ' इसमें वर्तमान ' इव ' कार प्रतीयमान सुवर्णकी वास्तविकताका प्रतिषेध करता हैं । ' यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् । ' ( बृह ० ४५।१५ ) ' जिस ज्ञानकाल में इस तत्त्वदर्शीको यह सब अद्वय बात्मा ही हो गया, तब किस इन्द्रियसे, किस विषय को कौन देखे? क्योंकि त्रिपुटी भेद - द्रष्टा, दृश्य एवं दर्शन -सबका विद्या द्वारा बाध हो जाता हैं । ' ' एवमेवास्य परिद्रष्टुः षोडशकला । पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति, मिद्येते तासां नामरूपे पुरुष इत्येव प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति । ( प्र ० उ ० ६।५ ) इस द्रष्टा आत्मा पुरुषकी श्रद्धा आदि षोडश कलाएँ, पुरुषके ही आश्रित थीं, विद्यादशा में स्वाधिष्ठानभूत पुरुष में ही वे विलीन हो जाती हैं, उनके कल्पित नाम एवं रूप की निवृत्ति हो जाती है, अन्तमें वह एकमात्र कला रहित निष्कल अमृत पुरुष परमात्मा हो परिशिष्ट रह जाता है । ' पूर्णमेवावशिष्यते । ' ( बृह ० ५1१1१ ) ' ब्रह्माद्वयं शिष्यते ' ( मा ० १० | १४ | १८ ) इत्यादि वचनोंसे स्पष्टतः पूर्ण अद्वय ब्रह्म ही परिशिष्ट रह जाता है । इस प्रकार द्वत प्रपञ्च अविद्योद्भासित है, अतः मिथ्या है, इस श्रतिके निर्णयका श्रीमद्भागवतमहापुराणके ये वचन भी समर्थन करते हैं । ' तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपं स्वप्नाम मस्त धिषणं पुरुदुःखदुःखम् । त्वय्येव नित्यसुखबोधतनावनन्ते मायाव उद्यदपि यत् सदिवावभाति ॥ ( भा ० १०।१४।२२ ) इसलिये यह सम्पूर्ण द्वौत जगत् स्वप्न के समान असत्य है, प्रतीयमान होने पर भी वस्तुतः विद्यमान है | अतः इसमें तात्त्विक ज्ञान की विषयता नहीं है और यह दुःखपर दुःख देता रहता है । शाश्वत परमानन्दरूप नित्यज्ञानरूप अनन्त अद्वयरूप आप ब्रह्ममें यह मायासे ही मासित हो रहा है, वस्तुतः यह सत्य नहीं है । तथापि सत्यके समान प्रतीत होता है ।
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( २३ ) न यदिदमग्र आस न भविष्यदतो निघनाद, अनुमितमन्तरा त्वयि विभाति मृषैकरसे । अत उपमीयते द्रविणजाति विकल्पपथैः वितथमनोविला समृतमित्यवयन्त्यबुधाः ॥ ( मा ० १०।७३७ ) वेदस्तुति श्रुतियाँ कह रही हैं - हे भगवन् । वास्तविक बात तो यह है कि यह द्वैत- जगत् उत्पत्तिसे प्रथम नहीं था और प्रलयके बाद भी नहीं रहता, यह मध्यमें एकरस अद्वय आप परमात्मा में मिथ्या ही प्रतोत हो रहा है । इसोसे हम श्रुतियाँ इस जगत्का वर्णन ऐसी उपमा देकर करती हैं कि जैसे मिट्टी में घट शरावादि, लोहेमें शस्त्रादि और सुवर्ण में कुण्डलादि नाम मात्र हैं, वास्तवमें मिट्टी, लोहा और सोना ही सत्य हैं, वैसे ही परमात्मामें प्रतीत यह द्व ेत जगत् नाममात्र है, सर्वथा मिथ्या और मनकी कल्पना मात्र है, इसे दुराग्रही लोग ही सत्य मानते हैं । इसलिए तात्विक द्रव माननेवालेके पक्षमें इन श्रुति पुराणदि वचनोंकी संगति लगाना सर्वथा अशक्य है । इस पक्ष में निरपवाद एवं निश्चितार्थं विज्ञानका लाभ नहीं हो सकता । अतः निष्पक्ष विद्वानोंको शास्त्रप्रतिपादित अपवादकी शून्यता एवं युक्ति - संभावित सुनिश्चित अर्थका बोध द्वैताद्वैतवादमें नहीं मिल सकता । यदि मोक्षदशामें भी अभेदके साथ भेद रहता है तो ' ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति । ' ' जो ब्रह्मको जानता है वह ब्रह्म ही हो जाता है ' इस श्रुतिसे विरोध होता है । अतः जीवात्माका ब्रह्म के साथ सभी दशाओं में नित्य सिद्ध - वास्तविक अभेद है, एवं अविद्यादशा में काल्पनिक ज्ञाननिवयं - भेद है, ऐसा मानना यथार्थ है, इसलिए द्वेता समतवाद मी शास्त्र एवं युक्तिसे अनुकूल नहीं है । विचार-शीलोंकी यह मतवाद मी रुचिकर एवं प्रामाणिक प्रतीत नहीं होता । ( ११ ) शुद्धाद्वैतवाद समालोचना कुछ मतवादी कहते हैं कि - केवल अद्वैत नहीं है, किन्तु शुद्ध अद्वैत है । जीव एवं जगत् अधिकृत शुद्ध ब्रह्मका परिणाम कार्य है । कारण शुद्ध ब्रह्म मायाके सम्बन्ध से रहित है, अतएव वह शुद्ध कहा जाता है । उसका अपने कार्यरूप जीव एवं जगत्से अद्व ेत है । प्रमेय- रत्नाणवं ग्रन्थ में ऐसा कहा भी है- मायासम्बन्धरहितं शुद्धमित्युच्यते बुधैः । कार्यकारणरूपं हि शुद्धं ब्रह्म न मायिकम् ॥ मायाके सम्बन्धसे रहित ब्रह्म शुद्ध है, ऐसा विद्वान् कहते हैं । कार्य एवं कारणरूप हि शुद्ध ब्रह्म है, वह मायिक नहीं है । इस मतमें जीव ब्रह्मका वास्तविक अंशांशिमाव है, घटाकाश, महाकाश की तरह औपाधिक नहीं । अधिकृत ब्रह्मका ही परिणाम भूत यह चराचर जगत् परमार्थं सत्य ही है, मिथ्या नहीं, इस मतवाले श्रीमद्भागवतको परम प्रमाण मानते हैं । यहाँ यह विचार करना चाहिए - निर्विकार, निराकार ब्रह्म का परिणाम कैसे हो सकता है?. परिणामका अर्थ है - विकार - अन्यथामाद | जैसे दूधका दहो ' अस्थूलमनणु ' ( बृह ० २८८ ) ' कूटस्थमचलं ध्रुवम् ' ( गी ० १२/३ ) इत्यादि श्रुति स्मृति, वचनोंसे परमात्मा का स्वरूप, समस्त विकारोंसे रहित, अखण्ड, एकरस, अचल एवं ध्रुव निश्चित होता है । अतः मायाके सम्बन्धसे रहित, अविकृत, परिपूर्ण, निष्क्रिय शुद्ध, अद्वैत, ब्रह्म जीव एवं जगद्रूपसे कैसे एवं किस कारणसे परिणत होगा? अविकृत ब्रह्मका परिणाम माननेपर पुनः वह ब्रह्म अविकृत कैसे कहा जा सकता है? अतः अविकृत ब्रह्म परिणामवाद वदतोव्याघात दोषसे ग्रस्त है । ब्रह्ममें अविकृतत्व एवं विकृतत्व विरुद्ध धर्मद्वयका समावेश दोनोंकी विषमसत्ता माननेपर यानी वास्तविक अविकृतको काल्पनिक विकृति तो मानो जा सकती है, परन्तु दोनोंको सम सत्ता माननेवर यानो पारमार्थिक अविकृतको पारमार्थिक विकृति कमो नहीं हो सकती है । शङ्का - तदात्मानं स्वयमकुरुत ' ( तै ० २.७ ) ' आत्मकृतेः परिणामात् ' ( ब्र ० १।४।२६ ) इस श्रुति वचन एवं सूत्रके द्वारा उस ब्रह्मने माया - सम्बन्धके बिना स्वयं ही अपने ७ आपको जीव एवं जगद्रूपसे परिणत किया, ऐसा अवगत होता है । समाधान - ' मायी सृजते विश्वमे-
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( २३ ) तत् ' ( इवे ० ४।९ ) ' मायिनं तु महेश्वरम् ' ( ६ वे ० ४।१० ) ' इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते ' ( ऋ ० ६ ४७ ॥ १८ ) ' आत्ममायां समाविश्य सोऽहं गुणमयीं द्विज! सृजन् रक्षन् हरन् विश्वं दधे सज्ञां क्रियो-चिताम् ॥ ' ( मा ० ४।७।५१ ) ' सम्भवाम्यात्ममायया । ' ( गो ० ४।६ ) ' मायामत्रं तु कात्स्न्येनान-भिव्यक्तस्वरूपत्वात् ' ( ब्रह्मसूत्र ३।२।३ ) अर्थात् मायावाला परमात्मा इस विश्वका निर्माण करता है । मायावाला महेश्वर है जगत्का नियन्ता है, इन्द्र- परमात्मा मायाओंके द्वारा ही विश्वके बहु-असंख्यरूप हुआ प्रतीत होता है । अपनी सत्त्वादिगुणमयी मायाका आश्रय कर ही मैं इस विश्वका सर्जन, रक्षण एवं संहरण करता हुआ उत्पत्यादि क्रियाओंके अनुरूप ही उत्पादक ब्रह्मा, रक्षक विष्णु एवं संहारक महेश्वर ऐसे नामोंको धारण करता हूँ । मैं निराकार भगवान् अपनी मायाके द्वारा ही साकाररूपसे प्रकट होता हूँ । यह सम्पूर्ण नामरूपात्मक जगत् मायामात्र है, क्योंकि मायाके द्वारा आच्छादित होनेसे इसका मूल अधिष्ठानस्वरूप संपूर्णरूपसे अभिव्यक्त नहीं होता है । इत्यादि श्रुति, स्मृति, सूत्र एवं पुराण आदि सहस्रों वचनोके द्वारा वह माया विशिष्ट ब्रह्म ही जीव - जगद्रूपसे परिणत होता है, ऐसा जाना जाता है । शङ्का - तब वो पूर्वोक्त - शास्त्र वचनोंका परस्पर विरोध होगा? समाधान --- ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' ( तै ० २1१ ) इत्यादि सृष्टि प्रतिपादक वचनोंके द्वारा परमात्मा विश्वका उपादानकारण प्रतिपादित है एवं कहीं ' मायां तु प्रकृति विद्यात् । ' ( श्वे ० ४ | १० ) ' अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपा: ' ( वे ४ | ५ ) ' अर्थात् मायाको विश्वकी प्रकृति - उपादानकारण समझो । वह माया अजन्मा, अनादि, रक्त- रजोगुण, शुक्ल-सत्त्वगुण एवं कृष्ण- तमोगुण युक्त है, अपने समान ही वह त्रिगुणात्मक जड़ चेतन, प्रजाओं का निर्माण करती है, इत्यादि वचनोंसे त्रिगुणमयी माया भी विश्वकी उपादानकारण ज्ञात होती है, सृष्टि प्रतिपादक पूर्वोक्त वाक्य स्थित आत्मादिपद, माया, अजा आदि पदोंसे प्रतिपादित दैवी शक्ति माया विशिष्ट परमात्मा के बोधक हैं, इस प्रकार पूर्वोक्त दोनों प्रकारके वचनोंका समन्वय कर विरोध परिहार किया जाता है, क्योंकि माया एवं परमात्मा दोनोंमें उपादानकारणताका श्रुत्यादिमें वर्णन है । परन्तु इसमें इतना भेद है परमात्मा अविकृत होनेसे. विवतोंपादानकारण है और माया परिणामी उपादानकारण है । केवलाद्वैत सिद्धान्त में यह निर्णीत हुआ है अर्थात् यह जगत् ब्रह्मका विवतं है एवं मायाका परिणाम है । उपादानकारणरूप से अभिप्रेत पदार्थसे विभिन्न सत्तावाला होकर जो अन्यथा प्रतीत हो, वह विवर्त है । जैसे रज्जुमें प्रतीयमान सर्प रस्सीका विवतं है । रस्सीकी व्यावहारिक सत्ता और प्रतीयमान सर्पकी प्रातिभासिक सत्ता है । इस प्रकार उपादान एवं उपादेयकी विवर्तवादमें विषमसत्ता है । उपादानकारणसे जिसकी समान सत्ता हो वह परिणाम है । जैसे दूधसे परिणत दहीकी समान सत्ता है, अतः मायाविशिष्ट ब्रह्म जगत्का उपादानकारण है, ऐसे कथनमें अर्थात् मायामें परिणामी - उपादानकारणता एवं ब्रह्म में विवर्तोपादानकारणता योग्यतानुसार माननी चाहिए । शङ्का — तब ‘ आत्मकृतेः परिणामात् ' श्रीबादरायण मुनिने ब्रह्मसूत्र में ऐसा क्यों कहा है? उसमें हर्षिका है कि जगत्की सत्यता में अभिनिवेश रखनेवाले मनुष्योंकी मति सहसा विवर्तवादमें प्रविष्ट नहीं हो सकती है, इसलिए उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए अरुन्धती - निदर्शन न्यायसे परिणामवाद पूर्वपक्षरूपसे कहा गया है । पश्चात् ' कृत्स्नप्रसक्ति निरवयवत्वशब्दकोपो वा ' ( ब्रह्मसूत्र २।१।२६ ) इस ब्रह्मसूत्रके अधिकरणमें यह विचारकर परिणामवादका खण्डन कर दिया है । यदि संपूर्ण ब्रह्म जगद्रूपसे परिणत हो तो नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव- अद्वय ब्रह्मका अभाव हो जायगा, साथ ही मोक्षकी भी असिद्धि होगी । यदि एकदेशसे ब्रह्म जगद्रूपसे परिणत हो तो निरवयव प्रतिपादक श्रुतिका विरोध होगा । इस प्रकार परिणामवाद में विरोध प्रकट कर महर्षि व्यासने ब्रह्मसूत्रमें ' मात्मनि चैव विवित्राश्च हि ' ( ब्रह्मसूत्र २०१।२८ ) इस सूत्र द्वारा विवर्तवादको सिद्धान्तरूपसे सिद्ध करने के लिए स्वप्नदृष्टान्तसे
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( २४ ) समाधान किया है । जैसे स्वप्नसृष्टि, कल्पित होनेके कारण स्वप्न द्रष्टाके स्वरूपको विकृत न कर मिथ्यारूपसे प्रतीत होती है, वैसे ब्रह्मके विशुद्ध स्वरूपको विकृत न कर मायाद्वारा उस सर्वात्मा अद्वयब्रह्ममें जगत् सृष्टिका प्रदुर्भाव होता है । इस प्रकार बादरायण मुनिने विवर्तवादको ही सिद्धान्त-रूप से माना है । अतएव सर्वज्ञात्ममुनिने संक्षेपशारीरकमें कहा है – ' कृपणधीः परिणाममुदीक्षते क्षपितकल्मषधीस्तु विवर्तताम् । ' ' विवेकहीन अल्पमति वाला परिणामवाद मानता है तो निर्मल-विशाल बुद्धिवाला विवर्तवाद मानता है । ' इसलिए श्रीमद्भागवत में मी जगत् मिथ्या कहा गया है ' ईक्षेत विभ्रममिदं मनसो विलासं दृष्टविनष्टमविलोलमलातचक्रम् | विज्ञानमेकमुरुधेव विमाति माया स्वप्नस्त्रिधागुण विसर्गकृतो विकल्पः ॥ ( मा ० ११।१३।३४ ) नश्वरं गृह्यमाणञ्च विद्धि माया मनो-मयम् । ( मा ० ११।७।७ ) यह नामरूपात्मक जगत् मनकी कल्पनामात्र है । दीखनेपर भी नष्ट प्राय है, अलातचक्र के समान अविद्यमान हो दोख रहा है, अतः भ्रममात्र है । एक अद्वय ज्ञानस्वरूप आत्म ही अनेक - सा हुआ द्वैतरूपसे प्रतीत हो रहा है । यह स्थूल शरीर, इन्द्रिय, और अन्तःकरणरूप तीन प्रकारका विकल्प माया के गुणोंके परिणामकी रचना है और स्वप्नके समान मायामात्र है । स्वप्नकी तरह मनकी कल्पना मात्र है, इसलिए मायामात्र मिथ्या है, ऐसा निश्चय करो ।. इसप्रकार श्रीमद्भागवत में ' ब्रह्मण्यात्मानमाधारे घटाम्बरमिवाम्बरे । ' ( मा ० १ | १३ | ५४ ) ' घंटे मिन्ने यथा ss का | आकाशः स्याद् यथा पुरा । एवं देहे मृते जीवो ब्रह्म संपद्यते पुनः ॥ ' ( मा ० १२।५५ ) ' यद् यज्जनो भगवते विदधीत मानं तच्चात्मने प्रतिमुखस्य यथामुख श्री ॥ ' ( ७१ ९ | ११ ) ' रेमे रमेशो ब्रजसुन्दरीमियंथाऽर्भकः स्वप्रतिबिम्बविभ्रमः । ' ( मा ० १०1३३ | १७ ) अर्थात् महाकाशमें घटाकाशके समान अपने क्षेत्रज्ञ आत्माका ज्ञान ध्यानद्वारा आवरणनिवारण कर अद्वय -ब्रह्ममें विलीन कर दिया । जैसे घड़ा फूट जानेपर आकाश प्रथमकी ही तरह अखण्ड ही रहता है, परन्तु ' घटाकाश ' की निवृत्ति हो जानेसे लोगों को ऐसा प्रतीत होता है कि वह महाकाशसे मिल गया है वास्तव में तो वह मिला हुआ था हो । वैसे ही देहपात हो जानेपर ऐसा ज्ञात होता है मानो यह ब्रह्मवित् जीव ब्रह्म हो गया, वास्तव में तो वह ब्रह्म था ही । उसकी अब्रह्मता तो केवल भ्रममात्र थी, जैसे अपने मुखमें की हुई तिलकादि शोभा दर्पण में दीखनेवाले प्रतिबिम्बमें स्वतः आ जाती है, वैसे ही भक्त अपने मूल बिम्बस्वरूप भगवान् के प्रति जो जो सम्मान प्रकट करता है, वह उसके प्रतिबिम्ब-भूत- अपनेको स्वतः प्राप्त हो जाता है । जैसे नन्हा सा शिशु निर्विकार भावसे अपने प्रतिबिम्ब के साथ खेलता है, वैसे रमारमण भगवान् श्रीकृष्णने ब्रजसुन्दरियोंके साथ क्रीड़ाको । अध्यात्मपक्ष में बुद्धि वृत्तियाँ गोपिकाएं हैं, उनके साथ प्रतिबिम्बरूप विहार समझना चाहिए | इत्यादि अनेक स्थलों पर श्रीमद्भागवत में जीवब्रह्मका घटाकाश महाकाशकी माँति तथा बिम्ब प्रतिबिम्बकी तरह औपाधिक ही अंशांशिभाव माना है, वास्तविक अंशांशिभाव निर्विकार निराकर पूर्ण ब्रह्ममें कदापि संभव नहीं है । अतः उसका वास्तविक अंशांशिवभाव एवं अविकृत ब्रह्मपरिणाम श्रीमद्भागवतसे मी विरुद्ध है । इस लिए ' हमारे मतमें श्रीमद्भागवत परमप्रमाण है, ऐसा उनका कहना सर्वथा प्रवञ्चनामात्र है । ( १२ ) अभिनव - अद्वैतवादीमत- समालोचना कुछ विद्वान् कहते हैं कि केवल ज्ञानसे मुक्ति प्राप्त नहीं होती, किन्तु भक्ति सहित ज्ञानसे ही होती हैं । वे कहते हैं कि समष्टि और व्यष्टिके भेदसे दो प्रकारके बन्ध माने गए हैं । समष्टि बन्घ माया है और व्यष्टि बन्ध अविद्या है । माया और अविद्या दोनों पृथक् पृथक् हैं, अतएव अविद्याका ज्ञानसे नाश हो जानेपर मो मायाके निवारण के लिए मक्तिकी अपेक्षा होती है, भक्तिसे ही मायाको निवृत्ति होती है, ज्ञानसे नहीं । इस विषय में एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि प्राचीन समयमें नगरके चारों बोर दुगं रखनेकी प्रथा थी । रात्रिके समय राजाकी आज्ञासे उसके द्वार बन्द कर सैनिक वहाँ
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( २५ ) पहरा देते रहते थे ताकि बाहरका शत्रु नगरमें प्रविष्ट न हो सके । अब इस दान्तसे तुलना कीजिए, नगर द्वार समष्टि है, जब कि गृहद्वारकी चाबी गृहपति के हाथमें रहती है । वह जब चाहे तब दरवाजा खोलकर बाहर आ जा सकता है । किन्तु नगर द्वार बिना राजाको आज्ञाके किसीके लिए खोला नहीं जा सकता । उसकी चाबी राजपुरुष के हाथमें रहती है । नगरद्वार समष्टि बन्धन माया है, वह राजाधिराज परमेश्वरकी कृशके बिना कभी खुल नहीं सकता, उसके खोलनेका भक्तिप्रसूत भगवत्प्रसाद ही प्रधानतम साधन है । उपनिषत्, गीता, भागवत आदिके अवलोकनसे उपर्युक्त सिद्धान्तको पुष्टि होती है । अब यहाँ यह विचार करना चाहिए कि उपनिषत् - गीता, भागवत आदिके वचनोंके द्वारा क्या भक्ति से मायाको निवृत्ति होती है? तथा माया एवं अज्ञानका क्या भेद भी सिद्ध होता है? निष्पक्ष विद्वान् कहेंगे कि कदापि नहीं । ' श्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवे हि । ' ( कैवल्योपनिषत् १०२ ) श्रद्धा, भक्ति एवं ध्यान योगसे उस परमेश्वरका ज्ञान प्राप्तकर ----' भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन! ज्ञातुं द्रष्टुश्च तत्त्वेन प्रवेष्टुञ्च परंतप! || ( गो ० ११।५४ ) श्रीभगवान् कहते है कि - हे अर्जुन! मैं परमेश्वर हूँ । अनन्य भक्तिके द्वारा ही मेरा साक्षा-त्कार, परमार्थतः ज्ञान तथा मुझमें अभेदभावसे प्रवेश किया जा सकता है । भक्त्या मामभिजानाति यावान्यरचास्मि तत्त्वतः । ततो तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ गो १८।५५ पराभक्तिके द्वारा मुझको तत्त्रत, मलीप्रकार जानता है कि मैं कैसा और किस प्रकारके प्रभाव वाला हूँ | तथा उस भक्ति से मुझे तत्त्वतः जानकर तत्काल ही मुझमें अभेदमावरूप प्रवेश हो जाता है । फिर उसकी दृष्टिमें मुझ वासुदेवके सिवाय और कुछ भी नहीं रहता । ' ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः । ' ( ० २११५ ) तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय । ' ( शु ० य ० ३१ | १८ ) ज्ञानसे ही समस्त बन्धोंकी निवृत्ति होती है, ज्ञानसे ही अविद्या - मृत्युका अतिक्रमण होता है, मोक्ष लाभके लिए ज्ञानको छोड़कर और कोई मार्ग नहीं है । ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः । ( भा ० २७ ४६ ) स्वानुभूत्या तिरोभूतमायागुणविशेषणम् । ब्रह्मण्यवस्थितमतिर्भगवत्यात्मसंश्रये || ( भा ० ३ | ३३ | २५/२६ ) स्त्री, शूद्र, हूण आदि पापी जीव भी भगवद्भक्तिसे भगवान्को जान लेते हैं और देवकी मायाका अतिक्रमणकर मोक्ष लाभ प्राप्त करते हैं । अपने स्वरूपकी अपरोक्षानुभूतिसे ही मायाके गुण आवरण एवं विक्षेपको दूर कर देता है । मायाकी निवृत्ति हो जानेपर जीवात्माकी बुद्धि अधिष्ठानभूत परब्रह्म भगवान् स्थिर हो जाती है अर्थात् वह भगवद्भाव ( ब्रह्मभाव ) प्राप्त कर कृतकृत्य हो जाता है । यतः ' अनन्य प्रेमरूप | भक्तिर्ज्ञानस्यैव साधनम् ज्ञानमेव तु मुक्ति प्रति साधनमिति गीताचार्यस्य भगवतोऽपि मतम् । इसलिए अनन्य प्रेमरूपा भक्ति ज्ञानका ही साधन है, और ज्ञान ही मुक्तिका साधन है, ऐसा गीताचार्य भगवान्का भो सिद्धान्त है । यह बात स्वयं भगवान् कहते हैं तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ ( गी ० १०/१० ) मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते । ( गी ० १३।१८ ) ' उन निरन्तर मेरे ध्यानमें लगे हुए और अनन्य प्रेम पूर्वक मेरा भजन करनेवाले भक्तोंको मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योगका प्रदान करता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं । मेरा भक्त मेरे स्वरूपका यथावत् ज्ञान प्राप्त कर मेरे अद्वय ब्रह्मभावको प्राप्तकर लेता है । ' और अविद्या एवं मायाका समान लक्षण होनेके कारण गीता आदि शास्त्रों में दोनोंके एकत्वका ही वर्णन किया है, अतएव संक्षेपशारीरकाचायं श्रीसर्वज्ञात्ममुनिने कहा है-' अज्ञानमावरणमावरणञ्च माया, सर्वेश्वरेण हरिणा दृढमभ्यधायि । चैतन्य वस्तुन इति प्रतिपद्यमानाः, तत्वं तदेकमिति निश्चयतः प्रतीमः ॥
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( २६ ) सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने दृढ़ शब्दोंमें चैतन्य वस्तुके अज्ञानको आवरण और आवरणको माया कहा है, ऐसा जानकर हमलोग उन दोनों अज्ञान एवं मायाको एकरूपसे निश्चयतः मानते हैं । अत: ‘ आवरकत्व लक्षण अज्ञान एवं मायामें समान होनेसे दोनों एक ही हैं, और अब ' तत्त्वज्ञानेक-निवत्यत्वरूप ' लक्षण भी दोनोंमें समान होनेसे दोनों एक ही हैं, ऐसा श्रीसर्वज्ञात्ममुनि कहते हैं-' ज्ञानं निवर्तकमपि द्वितीयस्य गीतागतः करुणया भगवानुवाच । तेनापि तत्त्वमिदमेकमिति प्रतीति आनीयते कथितलक्षणतुल्यभावात् ॥ गीता में श्रीभगवान्ने करुणासे प्रेरित होकर उन माया और अज्ञान दोनोंका भी निवर्तक एकमात्र ज्ञान ही कहा है, भक्ति आदि नहीं । इसलिए भी ये दोनों माया और अज्ञान एक ही स्वरूप हैं ऐसा निश्चय होता है क्योंकि ' ज्ञानकनिवत्यत्वरूप ' दोनोंमें समान है । उन वचनोंको श्रीसवंज्ञात्म-मुनि बतलाते हैं - ' नाहं प्रकाश इति तावदनेन मायाज्ञानेन चावृतमितीतरदप्यमाणि । मामेव तु परमं पुरुषं प्रपन्नाः, ज्ञानेन तु प्रभृतिना च धिया निवृत्तिः ॥ ' नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । ' ( गी ० ७।२५ ) इस वचनसे श्रीभगवान्ने मायाका आवरकरूपसे वर्णन किया है, और ' अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः । ' ( गी ० ५११५ ) इसवचनके द्वारा भगवान्ने अज्ञानको भी आवरक कहा है । ' मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते । ' ( गी ० ७ | १४ ) इसवचन से मायाको ज्ञान निवत्यं कहा गया है, तथा ' ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । ( गो ० ५।१६ ) इसवचनसे अज्ञान भी ज्ञानवत्यं कहा गया है । शङ्का - ' मामेव ये प्रपद्यन्ते ' इस वचनके द्वारा तो प्रपत्ति - भगवच्छरणा-गति रूप भक्ति से ही मायाका तरण - निवारण कहा गया है, तत्त्वज्ञानसे नहीं? समाधान - ' ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ' ( गी ० ७।१८ ) इत्यादि वाक्यशेषमें ज्ञानकी ही प्रशंसाका वर्णन करनेसे ' प्रपद्यन्ते ' पदसे ज्ञान ही लेना चाहिए, भक्ति नहीं । ' पद ' गतौ धातु ज्ञानार्थंक भी है, ज्ञान, गमन एवं प्राप्ति ये तीन अर्थं गत्यर्थक धातुओंके माने जाते हैं । अत एव वेदान्तके चतुर्थ प्रस्थानरूप श्रीमद्भागवतमें भी माया ज्ञान कनिवत्यं है, ऐसा अनेक स्थलोंपर स्पष्टतः कहा है । जैसे—- ' मायां व्युदस्य चिच्छक्त्या कैवल्ये स्थित आत्मनि । ' ( भ ० १।७२ ) विधूय मायां वयुनोदयेन ' ( भा ० ५।१११५ ) चित् यानी ज्ञान शक्ति से मायाका विध्वंस करके वह स्वस्वरूपावस्थानरूप कैवल्य मोक्षमें अवस्थित हो गया । वयुन यानी ज्ञानके उदयसे उसने मायाका विधूनन - निवारण किया । इस प्रकार शास्त्रोंने एक ही आवरण - विक्षेप शक्तिवाली मायाका प्रकृति, अविद्या, अज्ञान, अक्षर, अव्यक्त, असत्, तम, अव्याकृत आदि अनेक नामोंसे वर्णन किया है । प्रवृत्तिके निमित्तोंके भेदसे एक ही पदार्थका बनेक नामोंके द्वारा वर्णन सर्वत्र किया जाता है । भक्तिरूप ज्ञान एवं ज्ञानरूपा भक्ति ऐसा दोनोंका समुच्चय नहीं, अभेद माननेपर ही आत्मा एवं ब्रह्मका अभेद सिद्ध होता है । यदि भक्ति एवं ज्ञानका भेद माना जाता है तो ज्ञानका विषय आत्मा कोई पृथक् पदार्थ है, एवं भक्तिका विषय ब्रह्म परमात्मा भी कोई पृथक् पदार्थ है, ऐसा सिद्ध होगा । क्योंकि ज्ञानके द्वारा आत्माके बज्ञानकी निवृत्ति होनेपर तथा आत्माका अपरोक्षानुभव होनेपर भी ब्रह्मका अनुभव नहीं होता, क्योंकि वह तो मायासे आवृत्त है, आत्मासे पृथक् है । यदि ब्रह्म आत्मासे अमिन माना जाता है, तो अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर जैसे आत्माका अपरोक्षानुभव हुआ, वैसे तदभिन्न ब्रह्मका भी अपरोक्षानुभव हो जाता है । अतः जो मतवादी अज्ञान एवं मायाको तथा भक्ति एवं ज्ञानको पृथक् मानते हैं - उनके मत में बलात् आत्मा एवं ब्रह्मका वास्तविक भेद सिद्ध हो जाता है, और वे द्वैतवादी बन जाते हैं - अतः उनका यह कहना - ' हम अद्वैतवादी हैं-- जीव ब्रह्मका अभेद मानते हैं, मिथ्या सिद्ध हो होता है ।
' तस्मात् प्रियतमः स्वात्मा सर्वेषामपि देहिनाम् । तदर्थमेव सकलं जगदेतच्चराचरम् ॥
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( २७ ) कृष्णमेन मवेहि त्वं आत्मानमखिलात्मनाम् ॥ ( मा ० १०।१४।५४-५५ ) इससे यह बात सिद्ध होती है कि सभी प्राणी अपने आत्मासे ही सबसे बढ़कर अनन्य प्रेम करते हैं, इसलिये आत्मा ही परम प्रेमास्पद है । और उस आत्माके प्रेमके लिए ही यह समस्त चराचर जगत् उसे प्रिय लगता है । अतः तुम इस श्रीकृष्ण - परमात्माको समस्त जीवात्माओंका आत्मा यानी अभिन्नस्वरूप ही समझो । अतः अपने आत्मामें ही सबको स्वाभाविक अनन्य प्रेम है, आत्मासे परमेश्वरको पृथक् माननेपर उसमें अनन्य ( परा ) भक्ति सिद्ध नहीं हो सकतो । प्रजाका गृह एवं राजाका नगरवाला दृष्टान्त विषम है, उसमें प्रजा एवं राजा पृथक् - पृथक् हैं । उन दोनों के गृहद्वार एवं नगरद्वार भी पृथक् पृथक् हैं । परन्तु दाष्टन्ति में राजा - परमेश्वर एवं प्रजा - जीवात्माका वास्तविक अनन्यत्व है, और यावरण विक्षेप शक्तिवाला अज्ञान एवं मायाका द्वार भी एक ही है । इसलिए महाभारत में ' एकः शत्रुनं द्वितीयोऽस्ति शत्रुः अज्ञानतुल्यो नह्यस्ति ' ' इन जीवोंका एक ही दुःखादिप्रद शत्रु है, उनका द्वितीय कोई शत्रु नहीं है और वह बज्ञान ही है ' । इस वचनसे भी अज्ञान मायाका अभेद ही सिद्ध होता है । इसलिये कुछ विद्वानोंका पूर्वोक्त मतवाद, उपनिषत्, गीता, भागवत आदि शास्त्रोंके निर्णयों से सर्वथा प्रतिकूल है । गृहद्वारकी चाबीके समान आत्मज्ञान सुलभ नहीं है । किन्तु भगवत्प्रसादसे ही उसका लाभ किसी विशेष अधिकारीको ही होता है । ' यततामपि सिद्धानां कश्निन्मां वेत्ति तत्त्वत: ' ( गी ० ७।३ ) ' प्रयत्न करनेवाले सिद्धों में भी कोई विशेष पुरुष ही मुझ सर्वात्मा भगवान्को परमार्थतः जानता है । ' उक्त इस चाबीका दृष्टान्त दाष्टन्तिके अनुकूल नहीं है अतः श्रीमद्भागवत में कहा है-' हृदि स्थिता यच्छति भक्तिपूते ज्ञानं सत्तत्त्वाधिगमं पुराणम् | ' ( मा ० ३।२५।४ ) सभी प्राणियों के हृदयमें साक्षीरूपसे स्थित भगवान् भक्ति द्वारा पवित्र हुए हृदयमें हो दुर्लभ ज्ञानको प्रदान करता है, जिससे उस पूर्ण - अद्वय ब्रह्मके स्वरूपका अपरोक्ष अनुभव हो जाता है । इसलिये पूर्वोक्तदृष्टान्त द्वारा दार्शन्तिका वर्णन करना उपहासास्पद ही प्रतीत होता है । १३ मायावादी कौन हो सकते हैं? कुछ कुतकंव्यसनी द्वैतवादी लोग अद्वैत ब्रह्मवादियोंकी निन्दा के अभिप्रायसे ' ये मायावादी हैं ' ऐसा कह कर आक्षेप करते हुए अद्वैत ब्रह्मवादके प्रति अपना विद्वेष प्रकट करते हैं । परन्तु यहाँ विद्वानोंको विचार करना चाहिये कि मायावादी कौन हो सकते हैं? मायाशब्दके प्रयोगमात्र से एवं उसके शास्त्र - तर्कानुकूल अर्थ - विशेषके माननेमात्र से यदि कोई मायावादी कहा जा सकता है तो तुल्यन्याय से हमारे श्रुति, स्मृति, पुराणादि समस्त शास्त्र भी मायावादी माने मायेंगे । क्योंकि उन शास्त्रोंने माया शब्दका एवं उसके अर्थं विशेषका वर्णन प्रचुरमात्रा में किया है । जैसे-' इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते । ' ( ऋ ० ६४४७।१८ ) ' मायां तु प्रकृति विद्यात्, मायिनं तु महेश्वरम् । ( श्वे ० उ ० ४ । १० ) ' विश्वमायानिवृत्तिः ' ( खे ० १।१० ) ' मम माया दुरत्यया ' ( ग ० ७।१४ ) ' संभवाम्यात्ममायया ' ( गी ० ४०६ ) ' मायामेतां तरन्ति ते ' ( गी ० ७११४ ) ' योगमायासमावृतः ' ( गो ० ८०२५ ) ' एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यन्तकारिणी । ' ( मा ० ११ । ३ । १६ ) ' मायामयुक्ता वस्तु चक्षते । ( भा ० १०७३।११ ) चिन्मात्रमेकमभयं प्रतिषिध्य मायाम् ' ( मा ० ४।७।२६ ) अर्थात्- ' एक ही इन्द्र- परमात्मा मायाशक्तियोंके द्वारा ही बनेक रूपोंसे प्रतीत होता है । ' मायाको प्रकृति यानी विश्वका परिणामी उपादानकारण और मायाके अधिष्ठाता नियन्ताको महेश्वर समझो । विश्वमायाकी निवृत्ति होती है, मेरी माया दुस्तर है, अपनी माया द्वारा अजन्मा मैं जन्म लेता हूं, इस मायाको तर जाते हैं, मैं अपनी योगमायासे समावृत हूँ, भगवान् की यह माया विश्वकी सृष्टि, स्थिति एवं संहार करती है, संसारासक्त - अज्ञानी ही मायाको सत्य वस्तु समझते हैं, मायाका प्रतिषेध करके आप भगवान् ही चिन्मात्र अद्वय अभयरूपसे परिशिष्ट रह जाते हैं । इत्यादि शास्त्र
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( २८ ) वचनोंमें स्पष्टतः माया शब्दका प्रयोग एवं उसके अर्थ विशेषका स्वीकार देखने में आता है । अपरि-च्छिन्न- निष्क्रिय परमात्मा अचिन्त्य शक्तिवालो मायाके विना जगत्को रचना आदि नहीं कर सकता, इसलिए मायाद्वारा ही परमात्मामें जगत्कारणतावाद ही मायावाद है, यह पूर्व प्रदर्शित श्रुति स्मृत्या दि वचनोंसे समुपलब्ध होता है । यहाँ यह समझना चाहिए कि जो लोग ब्रह्मको परमार्थ सत्य मानते हैं ही ब्रह्मवादी कहे जा सकते हैं । एवं जो बौद्धादि ब्रह्मको ही शून्य मानते हैं, वे ब्रह्मवादी नहीं कहे जा सकते | वैसे जो माया एवं तत्कायं द्वैतपञ्चको परमार्थसत्य मानते हैं, वे ही माया एवं तत्कायके पक्षपाती होनेके कारण मायावादी कहे जा सकते हैं अर्थात् मायाको मिथ्या - बाधित-कल्पनामात्र माननेवाले अद्वैत ब्रह्मवादी मायावादी नहीं कहे जा सकते । समस्त शास्त्रों में जगत्की परिणामी उपादानकारणता मायामें सुननेमें आती है, उस कारणताको कोई भी हठवादी इन शास्त्रोंसे निकाल नहीं सकता । जिन शास्त्रोंके वचनोंमें मायाका जैसा निरूपण किया गया है, उन वचनोंको प्रमाण न माननेपर नास्तिकत्ताको प्राप्ति होती है । कुछ विद्वेषी जन इस कपोलकल्पित वचनके द्वारा कहते हैं— मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमुच्यते । ' अर्थात् मायावाद सच्छास्त्र नहीं है, यानी सच्चे शास्त्रोंमें प्रतिपादित नहीं है, अतः यह छिपा हुआ एक प्रकारका बौद्धमत ही है । परन्तु यहाँ यह समझना चाहिए – मायाको परमार्थं सत्य मानना ही मायावाद है, मायाको मिथ्या मानना मायावाद नहीं है । अतः जो द्वैती लोग माया एवं तत्कार्यद्वतप्रपञ्च जो असंख्य अनर्थों से पूर्ण है को परमार्थं सत्य मानकर - सर्वथा अनिवत्यं मानते हैं और जो अद्वैत ब्रह्म सदा विमुख रहते हैं उससे विद्वेष करते रहते हैं वे ही वस्तुतः मायावादी हैं । जो अनन्त - अद्वय - पूर्णं ब्रह्मानन्दके दिव्य रसास्वादमें निमग्न रहते हैं वे निर्द्वन्द्व अलमस्त अद्वैतवादी -जो माया एवं तत्कायं द्वैतप्रपञ्चके मिथ्यात्वके आपादन द्वारा माया तत्कार्य के परमार्थं सत्यत्वका निवारण कहते हैं - वे अद्वैत ब्रह्मवादी कदापि मायावादी नहीं हो सकते । १४- उपसंहार ब्रह्मसूत्र एवं शाङ्करभाष्यके अध्ययन, श्रवण एवं मननसे जिज्ञासु सज्जन, अद्वैत ब्रह्मवादको यथावत् समझकर अपने देवदुर्लभ मानव जीवनको धन्य एवं सफल बना सकते हैं । जो सज्जन मूल संस्कृतके भाष्यादिको समझ नहीं सकते हैं, उनके लिए हमारे ' वेदान्ताचार्य स्वामी सत्यानन्द सरस्वतीजी ' ने बहुत ही परिश्रमकर सूत्र एवं माष्यका राष्ट्रभाषा हिन्दी में अत्युत्तम अनुवाद किया है, और साथ में शङ्करभाष्यकी रत्नप्रभा, भामती, विवरणादि अनेक संस्कृत व्याख्याओंके विशद भावोंको ' सत्यानन्दी - दीपिका ' में सरल एवं सुगम हिन्दी भाषा द्वारा प्रकट किया है, यह हिन्दी प्रेमी तत्त्व-जिज्ञासुओंपर महान् उपकार हुआ है । इस ' सत्यानन्दी - दीपिका के पठन एवं मननद्वारा वे थथावत् अद्वैत सिद्धान्तके रहस्योंको हृदयंगम करके अपने बहुमूल्य जीवनमें परा- शान्ति प्राप्तकर पारमार्थिक ब्रह्मानन्दका सतत अनुभवकर अपनेको धन्य बना सकेंगे । इसलिए ' विद्वद्वर स्वामी सत्यानन्द सरस्वतीजी ' को विशाल अद्वैत संप्रदायकी तरफ से खूब खूब धन्यवाद दिया जाता है । और साथ ही इस पुस्तक प्रकाशनरूप शुभकार्यमें धनद्वारा सहयोग देनेवाले अनेक - उदार धनवान् सज्जनों को भी खूब खूब शुभाशीर्वाद दिया जाता है । इस पुस्तक द्वारा धार्मिक- जिज्ञासु जनतामें महनीय - प्रशस्त अद्वैत ज्ञानका प्रचार होगा । और यह निश्चित है कि विश्वमें इसी अद्वैत ज्ञानके प्रचार द्वारा ही विश्वके समझदार नेताओंके द्वारा अभिलषित सच्ची - शान्ति एवं अहिंसा का सम्राज्य स्थापित होगा, इसमें लेश भी संशय नहीं । ' हरिः ॐ तत्सत्, शिवमस्तु, शिवोऽहं शिवः सर्वम् । -