श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 121–130
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 121–130
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अधि ० ५० ५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८७ शरीरादि सम्बन्धमन्तरेणेक्षितृत्वमनुपपन्नमिति, न तच्चोद्यमवतरति सवितृप्रकाशवद् ब्रह्मणो ज्ञानस्वरूप नित्यत्वे ज्ञानसाधनापेक्षानुपपत्तेः । अपि चाऽविद्यादिमतः संसारिणः शरीराद्यपेक्षा ज्ञानोत्पत्तिः स्यात्, न ज्ञानप्रतिबन्धकारणरहितस्येश्वरस्य । मन्त्रौ चेमावीश्व-रस्य शरीराद्यनपेक्षतामनवरणज्ञानतां च दर्शयतः - ' न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्स-मश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानवलक्रिया च ' ( श्वेता ० ६।८ ) इति । ' अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्ण: । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्रंचं पुरुषं महान्तम् ' ( श्वेता ० ३ | १ ९ ) इति च । ननु नास्ति तावज्ज्ञानप्रतिबन्धकारण-वानीश्वरादन्यः संसारी; ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता ' ( बृह ० ३।७।२३ ) इति श्रुतेः । तत्र किमिदमुच्यते संसारिणः शरीराद्यपेक्षा ज्ञानोत्पत्तिनैश्वरस्येति? अत्रोच्यते-सत्यम्; नेश्वरादन्यः संसारी, तथापि देहाहिसंघातोपाधिसंबन्ध इष्यत एव, घटकरक-गिरिगुहाद्युपाधिसम्बन्ध इव व्योम्नः । तत्कृतश्च शब्दप्रत्ययव्यवहारो लोकस्य दृष्टो घट-कहा गया है कि उत्पत्तिके पहले शरीरादिके साथ सम्बन्धके विना ब्रह्म में ईक्षणकर्तृत्व अनुपपन्न हैं । इस आक्षेपका अवकाश नहीं है, क्योंकि ब्रह्मका ज्ञानस्वरूप सूर्यप्रकाशके समान नित्य है, अत: उसे ज्ञानके लिए साधनोंकी अपेक्षा नहीं हो सकती, और अविद्यादि युक्त संसारी जीवको ज्ञानोत्पत्ति में भले ही शरीरादिकी अपेक्षा हो, परन्तु ज्ञान प्रतिबन्धक कारणोंसे रहित ईश्वरको ज्ञान होनेमें शरीरादि की अपेक्षा नहीं है । क्योंकि ' न तस्य ० ' ( उस परमात्मा के कार्य ( शरीर ), करण ( नेत्रादि इन्द्रिय ) नहीं हैं, उसके समान और उससे अधिक कोई देखने में नहीं आता । उस ईश्वरकी मायारूप पराशक्ति स्वभावसे ही ज्ञान, बल तथा क्रिया भेदसे विविधरूपसे श्रुतियोंमें प्रतिपादित है ) तथा ' अपाणिपादो ० ' ( वह हाथ, पैसे रहित होकर भी अतिवेगवान् और ग्रहण करनेवाला है, नेत्र रहित होकर भी देखता है और श्रोत्र रहित होकर भी सुनता है, वह सम्पूर्ण वेद्यवर्गको जानता है, किन्तु उसे जाननेवाला कोई नहीं उसको प्रथम पुरुष - पूर्णं और महान् कहते हैं ) ये दो मन्त्र ईश्वरको शरीरादिकी अनपेक्षता और अनावरण-ज्ञानता दिखलाते हैं । परन्तु तुम्हारे मतमें तो ईश्वरसे भिन्न ज्ञान प्रतिबन्धक कारणवाला कोई संसारी है ही नहीं, क्योंकि ' नान्यो ० ' ( उससे अन्य द्रष्टा नहीं है उससे अन्य विज्ञाता नहीं है ) ऐसी श्रुति है । तो यह कैसे कहते हो कि जीवको ज्ञानोत्पत्तिमें शरीरादिकी अपेक्षा है और ईश्वरको नहीं? इसपर कहा जाता है - यद्यपि यह सत्य है कि ईश्वरसे अन्य संसारी नहीं है, तो भी जैसे घट, करक ( कमण्डलु ), गिरि गुफा आदि उपाधियोंके साथ आकाशका सम्बन्ध है, वैसे ही देहादि सङ्घातरूप उपाधिके साथ ( ईश्वरका ) सम्बन्ध इष्ट ही है । जैसे आकाशसे अभिन्न होनेपर भी उपाधि सम्बन्ध कृत घदाकाश, करकाकाश आदि शब्द व्यवहार और ज्ञान व्यवहार लोकमें देखे गये हैं और उपाधि सम्बन्ध कृत घटाकाशादि भेदरूप मिथ्याबुद्धि आकाशमें देखी गई है, वैसे यहाँ भी देहादि. सङ्घातरूप सत्यानन्दी - दीपिका धानसे व्याधि आदि विघ्न निवृत्त हो जाते हैं और योगीको अन्तरात्माका दर्शन होता है ) यह ईश्वर उपासनाका फल है । ‘ भक्तिविशेषादावर्जित ईश्वरस्तमनुगृह्णाति ज्ञानवैराग्यादिना ' ( उपासना विशेषसे प्रसन्न हुआ ईश्वर उस योगीपर ज्ञान और वैराग्य आदिसे अनुग्रह करता है ) इसप्रकार जब ईश्वर अनुग्रहसे योगीको इतना ज्ञान प्राप्त होता है तो ईश्वरके नित्यज्ञानमें शंकाका अवकाश ही कहाँ है? * शङ्का — प्रकाशमें अन्धकारके समान अखण्ड चिद्रूप आत्मामें जब अविद्यारूप अविवेक ही सिद्ध नहीं हो सकता, तो फिर अविद्याके अधीन संसारित्वकी सिद्धि कैसे हो सकती है? समाधान -
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८८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ च्छिद्रंकरकादिच्छिद्रमित्यादिराकाशाव्यतिरेकेऽपि तत्कृता चाकाशे घटाकाशादिभेद-मिथ्याबुद्धिदृष्टा । तथेहापि देहादिसङ्घातोपाधिसम्बन्धाविवेककृतेश्वरसंसारिभेदमिथ्या-बुद्धिः । दृश्यते चात्मन एव सतो देहादिसङ्घातेऽनात्मन्यात्मत्वाभिनिवेशो मिथ्या-बुद्धिमत्रेण पूर्वपूर्वेण । सति चैवं संसारित्वे देहाद्यपेक्षमीक्षितृत्वमुपपन्नं संसारिणः । यदप्युक्तं प्रधान स्यानेकात्मकत्वान्मृदा दिवत्कारणत्वोपपत्तिर्नासंहतस्य ब्रह्मण इति, तत्प्र धानस्याशब्दत्वेनैव प्रत्युक्तम् । यथा तु तर्केणापि ब्रह्मण एव कारणत्वं निर्वोढुं शक्यते, न प्रधानादीनां तथा प्रपञ्चयिष्यति - ' न विलक्षणत्वादस्य - ' ( ब्र ० २।१।४ ) इत्येवमादिना ॥ ५ ॥
अत्राह - यदुक्तं नाचेतनं प्रधानं जगत्कारणम्, ईक्षितृत्वश्रवणादिति, तदन्यथाप्यु-पपद्यते; अचेतनेऽपि चेतन वदुपचारदर्शनात् । यथा प्रत्यासन्नपतनतां नद्याः कुलस्यालक्ष्य कूलं पिपतिषती त्यचेतनेऽपि कूले चेतनवदुपचारो दृष्टः, तद्वदचेतनेऽपि प्रधाने प्रत्यासन्न-सर्गे चेतनवदुपचारो भविष्यति ' तदैक्षत ' इति । यथा लोके कश्चिश्चेतनः स्नात्वा भुक्त्वा चापराधे ग्रामं रथेन गमिष्यामीतीक्षित्वानन्तरं तथैव नियमेन प्रवर्तते, तथा प्रधानमपि महदाद्याकारेण नियमेन प्रवर्तते " यस्माच्चेतनवदुपचर्यते । कस्मात्पुनः कारणाद्विहाय उपाधिके साथ सम्बन्धके अविवेकसे उत्पन्न हुई ईश्वर और संसारीकी भेदरूप मिथ्याबुद्धि है । सङ्घातसे अतिरिक्त आत्माका देहादि सङ्घातरूप अनात्मपदार्थोंमें आत्मत्वका अभिनिवेश पूर्वं पूर्व मिथ्याबुद्धिसे ही देखा जाता है । और इस प्रकार संसारित्वके सिद्ध होने पर संसारीमें देहादिकी अपेक्षा करनेवाला ईक्षितृत्व युक्त है । यह जो कहा गया है कि मृत्तिकादिके समान अनेकात्मक होनेसे प्रधान जगत्का कारण हो सकता है, परन्तु अकेला ब्रह्म नहीं, वह तो ' प्रधान श्रुति प्रतिपादित नहीं है ' ६ ससे ही निराकृत हो गया । जिस प्रकार युक्तिसे ब्रह्म ही जगत्का कारण हो सकता है प्रधानादि नहीं, यह सब ' न विलक्षणत्वादस्य ' इत्यादि सूत्रोंद्वारा विस्तारपूर्वक कहेंगे ॥ ५ ॥
इसपर पूर्वपक्षी कहता है— जो यह कहा गया है किं कारणमें ईक्षितृत्वका श्रवण होनेसे अचेतन प्रधान जगत्का कारण नहीं है, वह अन्य प्रकार से भी उपपन्न होता है, क्योंकि अचेतनमें भी गौण-वृत्तिसे चेतनका - सा व्यवहार देखा जाता है । जैसे नदीका तट नीचेसे [ मिट्टीके बह जानेके कारण ] टूटकर जल्दी गिरता देखकर [ कोई कहे ] तट गिरना चाहता है, तो यहाँ अचेतन तटमें जैसे चेतनका-सा व्यवहार देखने में आता है, वैसे ही सृष्टि समीप होनेपर अचेतन प्रधानमें मी ' उसने ईक्षण किया '. इसप्रकार चेतनका - सा व्यवहार हो जायगा । अथवा लोकमें जैसे कोई पुरुष स्नानानन्तर भोजनकर अपराह्न में रथसे ग्राम जाऊँगा, इस प्रकारका ईक्षणकर अनन्तर नियमसे वैसे ही प्रवृत्त होता है, वैसे ही प्रधान भी महद् आदिके आकारसे नियमतः प्रवृत्त ( परिणत ) होता है । इसलिए उसमें चेतनका-सा उपचार किया जाता है । परन्तु प्रधानमें मुख्य ईक्षितृत्व ( ईक्षण कर्तृत्व ) का त्यागकर गौणकी सत्यानन्दी - दीपिका पूर्व पूर्व अनुभवजन्य संस्कारोंद्वारा भ्रान्तिरूप मिथ्याबुद्धिसे देहादि अनात्मपदार्थोंमें ' मैं मनुष्य हूँ ' • इत्यादि जो आत्मत्व अभिमान है वह अविद्यांसे कल्पित है । सामान्य चेतनात्मा अविद्याका विरोधी नहीं, अपितु उसका पोषक है । जैसे सामान्य अग्नि वृक्षादिका पोषक है 1 । विशेषरूप से अभिव्यक्त वही अग्नि वृक्षादिका दाहक है, वैसे ही ' तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्तवाक्योंसे उत्पन्न चेतन-प्रतिबिम्बित ब्रह्माकार अन्तःकरणकी वृत्ति ( विद्या ) अविद्याकी निवर्तिका है, इसलिए आत्मामें अविद्या-रूप अविवेक सिद्ध है । इससे अविद्या में प्रतिबिम्बित चेतनरूप जीव भी सिद्ध है । इस प्रकार ईश्वर से अन्य संसारी सिद्ध होनेसे उसे ईक्षणके लिए देहादि साधनों की अपेक्षा है किन्तु ईश्वरको नहीं ॥ ५ ॥
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धधि ० ५ सू ० ६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ८ ९ मुख्य मिक्षतृत्वमौपचारिकं कल्प्यते? ' तत्तेज ऐक्षत ', ' ता आप ऐक्षन्त ' ( छान्दो ० ६।२।३,४ ) इति चाचेतनयोरप्यते जसोश्चेतनवदुपचारदर्शनात् । तस्मात्सत्कर्तृकमपी क्षण मौपचा-रिकमिति गम्यते, ' उपचार प्राये वचनात् ' इति । एवं प्राप्त इदं सूत्रमारभ्यते-गौणवेन्नात्मशब्दात् ॥ ६ ॥
पदच्छेद - गौणः, चेत्, न, आत्मशब्दात् । सूत्रार्थ - ( गौणः ) प्रधानमें ईक्षितृशब्द गौण है, ( चेन्न ) यदि ऐसा कहो तो यह युक्त नहीं है, ( आत्मशब्दात् ) क्योंकि ' एतदात्म्यम् ' श्रुतिसे जगत् कारणमें आत्मशब्दका प्रयोग किया गया है । इसलिए चेतन ही जगत्का कारण है । यदुक्तं प्रधानमचेतनं सच्छब्दवाच्यं तस्मिन्नौपचारिक ईक्षतिः; अतेजसोरिवेति । तदसत्; कस्मात्? आत्मशब्दात् । ' सदेव सोम्येदमग्र आसीत् ' इत्युपक्रम्य ' तदैक्षत तत्तेजोऽ-सृजत ' ( छान्दो ० ६।२।१, ३ ) इति च तेजोऽबन्नानां सृष्टिमुक्त्वा तदेव प्रकृतं सदीक्षित, तानि च तेजोऽन्नानि, देवताशब्देन परामृश्याह - ' सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि ' ( छान्दो ० ६।३।२ ) इति । तत्र यदि प्रधान-कल्पना क्यों की जाती है? यदि कहो कि ' तत्तेजो ० ' ( उस तेजने ईक्षण किया ) ' ता आप ० ' ( उस जलने ईक्षण किया ) इस प्रकार जैसे अचेतन तेज और जलमें चेतनके समान उपचार देखने में आता है, अतः सत्कर्तृक ईक्षण भी औपचारिक है, ऐसा ज्ञात होता है, क्योंकि उपचार प्रचुर प्रकरणमें उसका कथन है अर्थात् जिस प्रकरणमें बहुत स्थलोंमें गौण अर्थ माना जाता है उसी प्रकरणमें पठित होनेसे इसमें भी गौण ईक्षण होना चाहिए । इसप्रकार पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर इस सूत्र का आरम्भ किया जाता है-जो यह कहा गया है कि अचेतन प्रधान सत् शब्द वाच्य है, उसमें जल और तेजके समान ' ईक्ष ' धातुका प्रयोग औपचारिक है । वह ठीक नहीं है, क्योंकि श्रुतिमें आत्मशब्द है । जैसे ' सदेव सोम्य ० ' ( हे सोम्य! आरम्भमें यह केवल सत् ही था ) ऐसा आरम्भ कर ' तदैक्षत ' ( उसने ईक्षण किया, उसने तेज उत्पन्न किया ) इसप्रकार तेज, जल और अन्नकी सृष्टि कहकर उस ईक्षिता प्रकृत सत्का तथा इन तेज, जल और अन्नका देवता शब्दसे परामर्श कर पुनः ' सेयं देवता ० ' ( उस सत् नामवाले देवताने ईक्षण किया कि अब मैं इस जीवात्मरूपसे इन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेशकर सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे अचेतन तेज और जलमें ईक्षण गौण है, वैसे ही अचेतन प्रधानमें भी ईक्षण गौण है । इस सांख्य मतका भगवान् सूत्रकार और भाष्यकार खण्डन करते हैं- सेयं देवतैक्षत ' इस श्रुतिमें ईक्षण कर्ताको ' अनेन जीवेनात्मना ' इसप्रकार आत्मशब्दसे निर्देश किया गया है । और इसी श्रुति में जगत् की उत्पत्तिका ईक्षण करनेवाले सद्रूप ब्रह्मका तथा तेज, जल और अन्न ( पृथिवी ) का देवता शब्दसे ग्रहण किया गया है । ' सेयं देवतैक्षत ० ' इस श्रुतिमें देवता पदका दो वार निर्देश पाया जाता है ' सेयं देवता ' और ' तिस्रो देवता ' इसका तात्पर्य यह है कि प्रथम देवता शब्दसे सद्रप चैतन्य ब्रह्मका और दूसरे देवता शब्दसे अपंचीकृत तेज, जल और अन्नका ग्रहण है । सृष्टिके पहले अव्या-कृत होने के कारण ये तीनों अस्मदादिसे प्रत्यक्षके अयोग्य थे, अतः जगत् के कारणभूत सद्रूप चेतन देवताने संकल्प किया कि ' अनेन जीवेनात्मना ० ' पूर्व सृष्टिका अनुभव करनेवाला स्वरूपभूत जीवात्म-रूपसे मैं अव्याकृत तेज, जल और अन्न तीनोंमें अनुप्रवेशकर इनको अभिव्यक्त करूँ । इन तीनोंमें जीवात्मरूपसे ब्रह्म देवताका वास होनेके कारण देवता शब्दका गौण प्रयोग किया गया है अथवा मोगके साधन होने से इनका देवताशब्दसे गौण निर्देश किया गया है ।
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ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ मचेतनं गुणवृत्त्येक्षित कल्प्येत, तदेव प्रकृतत्वात्सेयं देवतेति परामृश्येत । न तदा देवता जीवमात्मशब्देनाभिदध्यात् । * जीवो हि नाम चेतनः शरीराध्यक्षः प्राणानां धारयिता; तत्प्रसिद्धेर्निर्वचनाच्च । स कथमचेतनस्य प्रधानस्यात्मा भवेत्? आत्मा हि नाम स्वरूपम् । नाचेतनस्य प्रधानस्य चेतनो जीवः स्वरूपं भवितुमर्हति । अथ तु चेतनं ब्रह्म मुख्यमीक्षित परिगृह्यते, तस्य जीवविषय आत्मशब्दप्रयोग उपपद्यते । तथा स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' ( छान्दो ० ६ | १४ | ३ ) इत्यत्र ' स आत्मा ' इति प्रकृतं सदणिमानमात्मानमात्मशब्देनोपदिश्य ' तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' इति चेतनस्य श्वेतकेतोरात्म-त्वेनोपदिशति । अप्ते जसोस्तु विषयत्वादचेतनत्वम्; नामरूपव्याकरणादौ च प्रयोज्यत्वेनैव नाम और रूपकी अभिव्यक्ति करूँ ) ऐसा कहा है । यदि इस ईक्षण वाक्यमें अचेतन प्रधानको गौण-वृत्तिसे ईक्षणकर्ता माना जाय तो प्रकृत होनेसे ' सेयं देवता ' इस श्रुतिमें उसीका परामर्श होगा? ऐसा मानें तो ' सेयं देवता ' ' अनेन जीवेनात्मना ' वह देवता जीवका आत्मशब्द से अभिधान नहीं करेगा । क्योंकि जीव चेतन शरीरका स्वामी और प्राणोंका धारण करनेवाला है, यह अर्थ लोक प्रसिद्धि और व्युत्पत्ति के अनुसार है । वह चेतन जीव अचेतन प्रधानका आत्मा किस प्रकार होगा? आत्माका अर्थ स्वरूप है, अतः सुतरां चेतन जीव अचेतन प्रधानका स्वरूप नहीं हो सकता । यदि चेतन ब्रह्म मुख्य ईक्षिता ग्रहण किया जाय तो वहाँ उस ( पर देवता ) का जीवविषयक आत्मशब्दका प्रयोग युक्त है । इसी प्रकार ' स य एषो ० ' ( जो यह सद्रूप है वह अतिसूक्ष्म है, एतद्रूप ही यह सब है, वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतु! वह तू है ) इस श्रुतिमें ' वह आत्मा है ' इस प्रकृत सत्संज्ञक अतिसूक्ष्म आत्माका आत्मशब्द से उपदेशकर ' तत्त्वमसि श्वेतकेतो ० ' ( हे श्वेतकेतु! वह तू है ) इसप्रकार श्रुति चेतन श्वेतकेतुको आत्मशब्द से उपदेश करती है । जल और तेजमें विषयता होनेसे अचेतनत्व है । नाम रूपकी सृष्टि आदि करनेमें [ जल और तेजका ] प्रयोज्यरूपसे निर्देश है । सत्यानन्दी - दीपिका * ' जीव प्राणधारणे ' ' जीवति प्राणान्धारयतीति जीवः ' ( जीता है और प्राणोंको धारण करता है वह जीव है ) इस व्युत्पत्ति और लोक प्रसिद्धिके अनुसार जीव चेतन सिद्ध होता है । आत्मा शब्दका अर्थ स्वरूप है, अतः यह स्पष्ट है कि चेतन जीव अचेतन प्रधानका वेदान्त सिद्धान्तमें बिम्ब और प्रतिबिम्बका भेद औपाधिक होनेसे मुखका प्रतिबिम्ब वस्तुतः बिम्बरूप मुखसे भिन्न नहीं है, क्योंकि उसकी पृथक उपाधिकी विद्यमानतासे है, अतः औपाधिक होनेसे दोनोंका भेद कल्पित है, अविद्या उपाधिमें प्रतिबिम्ब जीव है और माया उपाधिमें प्रतिबिम्ब ईश्वर है भेद औपाधिक होने से कल्पित है वास्तविक नहीं, अतः जीव सद्रूप ब्रह्मका कथन सर्वथा युक्त है । ' स आत्मा तत्त्वमसि ' इस श्रुतिमें ' स ' शब्दके द्वारा इस श्रुति वाक्य में ईक्षण कर्ता सत्का परामर्श किया गया है और उसके स्वरूप नहीं हो सकता । कल्पित है । जैसे दर्पण में प्रतीति केवल दर्पणरूप वैसे ही बिम्बरूप ब्रह्मका । इसलिए जीव ब्रह्मका आत्मा ( स्वरूप ) है यह उपक्रममें ' सदेव सोम्य ' लिए यह आत्मशब्दका प्रयोग है, इस कारण सत् शब्दका अर्थ अचेतन प्रधान नहीं है प्रत्युत चेतन है । अत: ' तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' यह श्रुति चेतन श्वेतकेतुको सत् आत्मरूपसे उपदेश करती है । यदि यहाँ ' सत् ' शब्दसे प्रधानका ग्रहण किया जाय तो चेतन श्वेतकेतुको तू अचेतन प्रधानरूप है, ऐसा कहना होगा । परन्तु यह युक्त नहीं है । * चेतन कर्तृक ईक्षण में मुख्यत्वका साधक जैसे आत्मशब्द है, वैसे तेज और जल कर्तृक ईक्षणमें नहीं है, अतः दोनोंका ईक्षितृत्व गौण है । अथवा दोनोंका भी ईक्षितृत्व लक्षणावृत्तिसे
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अधि ० ५ सू ० ७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ९ १ निर्देशात् । न चात्मशब्दवत्किचिन्मुख्यत्वे कारणमस्तीति युक्तं कूलवद् गौणत्वमीक्षितृत्वस्य । तयोरपि च सदधिष्ठितत्वापेक्ष मे वेक्षितृत्वम् । सतस्त्वात्मशब्दान्न गौणमीक्षितृत्वमित्युक्तम् । ६ * अथोच्येत - अचेतनेऽपि प्रधाने भवत्यात्मशब्दः; आत्मनः सर्वार्थकारित्वात्, यथा राज्ञः सर्वार्थकारिणि भृत्ये भवत्यात्मशब्दो ममात्मा भद्रसेन इति । प्रधानं हि पुरुषस्यात्मनो भोगापवर्गी कुर्वदुपकरोति, राज्ञ इव भृत्यः संधिविग्रहादिषु वर्तमानः । अथवैक एवात्म-शब्दश्चेतनाचेतनविषयो भविष्यति भूतात्मेन्द्रियात्मेति च प्रयोगदर्शनात् । यथैक एव ज्योतिः शब्दः क्रतुज्वलनविषयः । तत्र कुत एतदात्मशब्दादीक्षतेर गौणत्वमिति - अत उत्तरं पठति-तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॥ ७ ॥
पदच्छेद - तन्निष्ठस्य, मोक्षोपदेशात् । सूत्रार्थ - ( तनिष्ठस्य ) सत्में निष्ठा रखनेवाले चेतन पुरुषके लिए ही ' अथ संपत्स्ये ' श्रुतिने ( मोक्षोपदेशात् ) मोक्षका उपदेश किया है । * न प्रधानमचेतनमात्मशब्दालम्बनं भवितुमर्हति ' स आत्मा ' इति प्रकृतं सदणि-मानमादाय ' तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' ( छान्दो ० ६।८।७ ) इति, चेतनस्य श्वेतकेतोर्मोक्षयितव्यस्य आत्मशब्दके समान उन ( जल और तेज ) का मुख्य ईक्षितृत्व माननेमें कोई कारण नहीं है । जल और तेजका ईक्षितृत्व तो नदीतटके गिरने की इच्छा के समान गौण होना युक्त है । दोनोंका ईक्षितृत्व भी लक्षणावृत्तिसे सद्रूप अधिष्ठानकी अपेक्षासे ही है, और यह कहा गया है कि आत्मशब्दके प्रयोग-के कारण सत्का ईक्षितृत्व गौण नहीं है ॥ ६ ॥
यदि कहो कि जैसे राजाके सब प्रयोजन सिद्ध करनेवाले सेवकमें ' भद्रसेन मेरा आत्मा है ' इसप्रकार आत्मशब्दका प्रयोग होता है, वैसें अचेतन प्रधानमें भी आत्मशब्दका प्रयोग होता है, क्योंकि वह आत्माके सब प्रयोजन सिद्ध करता है । जैसे सन्धि ( मेल ), विग्रह ( युद्ध ) आदि कार्यमें नियुक्त सेवक राजाका उपकार करता है, वैसे ही पुरुष - आत्माके लिए भोग और मोक्षका सम्पादन करता हुआ प्रधान मी आत्माका उपकार करता है । अथवा जैसे एक ही ' ज्योतिः ' शब्द यज्ञ और अग्निमें प्रयुक्त होता है, वैसे एक ही आत्मशब्द चेतन और अचेतनमें प्रयुक्त होगा, क्योंकि ' भूतात्मा, इन्द्रियात्मा ' ऐसे प्रयोग देखने में आते हैं । तो केवल आत्मशब्द के प्रयोगसे ईक्षति ( ईक्ष् धातु ) मुख्य है यह कैसे माना जाय? इसका उत्तर कहते हैं-अचेतन प्रधान आत्मशब्दका आलम्बन नहीं हो सकता, क्योंकि ' स आत्मा ' ( वह आत्मा है ) इस प्रकार प्रकृत सूक्ष्म सत्को लेकर ' तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' मोक्ष प्राप्त कराने योग्य चेतन श्वेतकेतुको सत्यानन्दी - दीपिका सद्रूप अधिष्ठानकी अपेक्षासे है । इस कारण ' तदैक्षत ' इत्यादि श्रुतियोंका मुख्य ईक्षणकर्तृ चेतन ब्रह्म में ही तात्पर्य है, अतः चेतन ब्रह्म हो जगत्का कारण है अचेतन प्रधान नहीं ॥ ६ ॥
* पूर्वपक्षीने राजा और सेवकका उदाहरण देकर प्रधानमें आत्मशब्द और तत्प्रयुक्त ईक्षण भी गौण सिद्ध किया है । परन्तु अब ' अथवा ' इत्यादिसे प्रधानमें आत्मशब्द और ईक्षितृत्व दोनों मुख्य सिद्ध करता है । * पहले पूर्वपक्षीद्वारा अचेतन प्रधानमें गौण अथवा मुख्यरूपसे आत्मशब्दका प्रयोग सिद्ध करनेके लिए किया गया सारा प्रयास व्यर्थ है, इसे ' न ' आदि भाष्यसे कहते हैं ।
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ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ तन्निष्टामुपदिश्य ' आचार्यवान्पुरुषो वेद, तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये ' ( छान्दो ॰ ६।१४।२ ) इति मोक्षोपदेशात् । यदि ह्यचेतनं प्रधानं सच्छन्दवाच्यं तदसीति ग्राहयेन्मुमुक्षं चेतनं सन्तमचेतनोऽसीति, तदा विपरीतवादि शास्त्रं पुरुषस्यानर्थायेत्यप्रमाणं स्यात् । न तु निर्दोषं शास्त्रमप्रमाणं कल्पयितुं युक्तम् । यदि चाज्ञस्य सतो मुमुक्षोर चेतनमनात्मानमात्मेत्यु-पदिशेत्प्रमाणभूतं शास्त्रम्, स श्रद्दधानतयान्धगोलाङ्गलन्यायेन तदात्मदृष्टि न परित्यजेत्, तद्व्यतिरिक्तं चात्मानं न प्रतिपद्येत, तथा सति पुरुषार्थाद्विहन्येतानर्थं च ऋच्छेत् । * तस्माद्यथा स्वर्गाद्यर्थिनोऽग्निहोत्रादिसाधनं यथाभूतमुपदिशति, तथा मुमुक्षोरपि ' स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' इति यथाभूतमेवात्मानमुपदिशतीति युक्तम् । एवं च सति तप्त-' तू सत्स्वरूप है ' इस प्रकार उपदेशकर ' आचार्यवान् ० ' ( आचार्यवान् पुरुष ही सद्रूप ब्रह्मको जानता है, उस आत्मनिष्ठ पुरुषके मुक्त होनेमें उतना ही विलम्ब है जब तक वह देह ( सूक्ष्म देह ) बन्धन से मुक्त नहीं होता उसके अनन्तर तो वह सत्सम्पन्न ( ब्रह्मको प्राप्त ) हो जाता है ) ऐसा मोक्षका उपदेश किया है । यदि अचेतन प्रधान ही सत् शब्द वाच्य हो तो शास्त्र चेतन मुमुक्षुको ' तदसि ' ( वह तू है ) अर्थात् ' तू अचेतन है ' यदि ऐसा ग्रहण करावे तो इस प्रकार विपरीतवादी शास्त्र पुरुष के अनर्थके लिए होगा, इससे शास्त्र अप्रमाण हो जायगा । परन्तु इस तरह इस निर्दोष शास्त्र में अप्रमाणत्वकी कल्पना युक्त नहीं है । यदि प्रमाणभूत शास्त्र अज्ञ मुमुक्षुको ' अचेतन अनात्म पदार्थको आत्मा है, ऐसा उपदेश करे तो अन्धगोलाङ्गूलन्याय से [ शास्त्रों में ] श्रद्धा रखनेवाला वह पुरुष इस उपदेश से अनात्म पदार्थो में हुई आत्मदृष्टिका कभी त्याग नहीं करेगा और अनात्मपदार्थोंसे भिन्न! शास्त्र सिद्ध ] आत्माको मी प्राप्त नहीं करेगा, इस तरहसे वह पुरुष अपने परम पुरुषार्थसे भ्रष्ट हो आयगा और अनर्थको प्राप्त होगा । इस कारण स्वर्ग आदिकी कामना करनेवाले पुरुषको जैसे अग्निहोत्र आदि उपयुक्त साधनोंका शास्त्र उपदेश करता है, वैसे मुमुक्षुके लिए भी ' स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' इस प्रकार यथार्थ आत्माका ही शास्त्र उपदेश करता है यह युक्त है । ऐसा होनेसे तपाये हुए फरसे के सत्यान - दी - दीपिका * अब भगवान् भाष्यकर एक ऐसा स्पष्टीकरण उपस्थित करते हैं जिससे सुतरां यह निर्णय किया जा सकता है कि आत्मशब्दसे प्रधानका कभी ग्रहण सम्भव नहीं । यह तो मानी हुई बात है कि सांख्यमतमें प्रधान अचेतन है और आत्मशब्दका मुख्यार्थ चेतन हैं । फिर भी यदि सत् शब्दका वाच्यार्थ प्रधानको मानें तो ' तत्त्वमसि ' इसमें ' तत् पदसे अचेतन प्रधानका ही ग्रहण होगा, तब तो चेतन मुमुक्षुको ' त्वमचेतनोऽसि ' अर्थात् ' अचेतन प्रधान तू है ' इस प्रकार विपरीत उपदेश करनेवाला शास्त्र अप्रमाण हो जायगा । और इस प्रकारके उपदेश से अन्धगोलागूल न्यायके समान वह मुमुक्षु अनर्थको ही प्राप्त होगा । ' अन्धगोलाङ्गूलन्याय ' इस प्रकार है -बड़े जङ्गलमें मार्गके निकट अपने बन्धुके नगर में जानेकी कामना करनेवाले एक अन्धेसे किसी दुष्टात्माने पूछा कि तुम यहाँ क्यों पड़े हो? तब उसने नगरमें जानेकी असामर्थ्य प्रकट की । उसे अधिक कष्ट देनेकी भावनांसे उस दुष्टात्माने एक मस्त साँढ लाकर उसकी पूँछ हाथमें पकड़ाकर अन्धेको कहा कि यह बैल तुमको नगर में पहुँचा देगा परन्तु तुम इसकी पूँछ छोड़ना नहीं । अन्धेने मो वैसा ही किया और महान् कष्टका अनुभव किया । * श्वेतकेतुको विशेष समझानेके लिए उद्दालकने ' स्तेयमकार्षीत्परशुमस्मै ततपेति ' ( छा ० ६। १६।१ ) ( इसने चोरीकी है, अतः इसके लिए फरसा तपाओ ) यह दृष्टान्त कहा है । इसका तात्पर्य यह है --- राजपुरुष किसी व्यक्तिको चोरी के सन्देहमें पकड़कर राजाके पास लायें । राजाने कहा कि
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अधि ० ५ सू ० ७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ९ ३ परशुग्रहणमोक्षदृष्टान्तेन सत्याभिसंधस्य मोक्षोपदेश उपपद्यते । अन्यथा ह्यमुख्ये सदात्म-तत्त्वोपदेशे ' अहमुक्थमस्मीति विद्यात् ' ( ऐ ० आर ० २।१।२।६ ) इतिवत्संपन्मात्रमिदमनित्यफलं स्यात् । तत्र मोक्षोपदेशो नोपपद्येत । तस्मान्न सदणिमन्यात्मशब्दस्य गौणत्वम् । भृत्ये तु स्वामिभृत्यभेदस्य प्रत्यक्षत्वादुपपन्नो गौण आत्मशब्दो ममात्मा भद्रसेन इति । अपि च क्वचिद्गौणः शब्दो दृष्ट इति नैतावता शब्दप्रमाणकेऽर्थे गौणी कल्पना न्याय्याः सर्वत्राना-श्वासप्रसङ्गात् । यत्तूतम्- [ -चेतनाचेतनयोः ः साधारण आत्मशब्दः क्रतु - ज्वलन योरिव ज्योतिः-शब्द इति, तन्न, अनेकार्थत्वस्यान्याय्यत्वात् । तस्माच्चेतनविषय एव मुख्य आत्मशब्दश्वेत-नत्योपचाराद्भूतादिषु प्रयुज्यते भूतात्मेन्द्रियात्मेति च । साधारणत्वेऽप्यात्मशब्दस्य न प्रकरणमुपपदं वा किंचिन्निश्चायकमन्तरेणान्यतरवृत्तिता निर्धारयितुं शक्यते । न चात्रा-चेतनस्य निश्चायकं किंचित्कारणमस्ति । प्रकृतं तु सदीक्षित, संनिहितश्चेतनः श्वेतकेतुः । नहि चेतनस्य श्वेतकेतोरचेतन आत्मा संभवतीत्यवोचाम । तस्माच्चेतनविषय इहात्मशब्द पकड़ने से [ चोरीसे ] मुक्त हुए पुरुषकी तरह सत्य में निष्ठा रखनेवाले मुमुक्षुके लिए शास्त्रका मोक्षो-पदेश भी उपपन्न है अन्यथा - सदात्मतत्त्वोपदेशको गौण मानें तो ' अहमुक्थम ० ' ( मैं प्राण हूँ ऐसा जाने ) इसके समान यह केवल संपद्रूप और अनित्य फलवाला होगा । और उससे मोक्षोपदेश उपपन्न नहीं होगा । इसलिए परम सूक्ष्म सत् में आत्मशब्द गौण नहीं है । ' भद्रसेन मेरा आत्मा है ' यहाँ तो सेवकके लिए आत्मशब्द गौण है, यह युक्त है, क्योंकि यहाँ स्वामी और सेवकका भेद प्रत्यक्ष है । और यदि कहीं पर गौण शब्द देखा गया हो तो इतने मात्र से शब्दके प्रामाणिक अर्थ में भी गौणत्वकी कल्पना युक्त नहीं है, क्योंकि इस तरहसे तो सर्वत्र शब्दार्थ के सम्बन्ध में अविश्वास प्रसंग होगा । जो यह कहा गया है कि जैसे ज्योतिः शब्द याग और अग्निमें साधारण है, वैसे ही आत्मशब्द भी चेतन. और अचेतनमें साधारण है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि एक शब्द के अनेक अर्थ मानना अनुचित है | इससे चेतन विषयक ही आत्मशब्द मुख्य है और जो भूतादिमें भूतात्मा, इन्द्रियात्मा इस प्रकार आत्मशब्दका प्रयोग होता है यह तो चेतनत्व के उपचार से होता है । यदि आत्मशब्द चेतन और अचेतनमें साधारण मानें तो प्रकरण अथवा उपपद किसी एक निश्चायकके विना दोनों में से किस अर्थमें आत्मशब्द प्रयुक्त हैं, इसका निश्चय नहीं हो सकता । और यहाँ अचेतनका निश्चायक कोई हेतु नहीं है, प्रत्युत यहाँ प्रकृत ईक्षणकर्तृ संके सन्निकट चेतन श्वेतकेतु । पठित ] है । अचेतन पदार्थ चेतन श्वेतकेतुका आत्मा ( स्वरूप ) नहीं हो सकता, ऐसा हम कह चुके हैं । इसलिए ऐसा निश्चय किया जाता है कि यहाँ आत्मशब्द चेतन विषयक ही है । ज्योतिः शब्द भी लौकिक प्रयोगसे प्रसिद्ध सत्यानन्दी - दीपिका इसके हाथमें तप्त फरसा पकड़ा दो । यदि अचोर होगा तो इसका हाथ न जलेगा और मुक्त कर दिया जायगा अन्यथा दण्डित किया जायगा । वह व्यक्ति चोर नहीं था, अतः हाथमें तप्त फरसा पकड़ने पर हाथके न जलनेसे वह मुक्त कर दिया गया । इस प्रकार हे वत्स! इस सद्रूप ब्रह्म में ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा जो सत्यवादी है वह संसार बन्धन से मुक्त हो जाता है, अन्यथा नहीं । जीवका प्रधानके साथ यदि अभेद मानें तो वह संपद्रूप उपासना होनेसे निश्चित अनित्य फलवाला होगा; तब तो ' तस्य तावदेव चिरं ' यह मोक्ष प्रतिपादक श्रुति बाधित होगी । * ' सदेव सोम्य ' इस श्रुति वाक्यस्थ ' सत् ' पदका तथा ' तत्त्वमसि श्वेतकेतो ' इस श्रुतिस्थ ' तत् ' पदका अर्थ जगत् कारण ईक्षण कर्ता चेतन है । जैसे उसमें आत्मत्वका निश्चायक ' सदेव सोम्य '
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९ ४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य | अ ० १ पा ० १ इति निश्चीयते । ज्योतिः शब्दोऽपि लौकिकेन प्रयोगेण ज्वलन एव रूढः, अर्थवाद कल्पितेन तु ज्वलनसादृश्येन क्रतौ प्रवृत्त इत्यदृष्टान्तः । अथवा - पूर्वसूत्र एवात्मशब्द निरस्तसमस्त-गौणत्वसाधारणत्वशङ्कतया व्याख्याय ततः स्वतन्त्र एव प्रधानकारणनिराकरणहेतुर्व्या-ख्येयः – ‘ तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ' इति । तस्मान्नाचेतन प्रधान सच्छन्दवाच्यम् ॥७ ॥
कुतश्च न प्रधानं सच्छन्दवाच्यम्? हेयत्वावचनाच्च ॥। ८ ॥ पदच्छेद - हेयत्वा वचनात् च । सूत्रार्थ - प्रधानमें निष्ठा रखनेवाला न हो जाय, इससे निषेध वचन भी नहीं कहा गया है, अतः स्थूलारुन्धती न्यायसे भी प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं है । ( च ) शब्द विरोध संग्रहार्थं है । यद्यनात्मैव प्रधानं सच्छन्दवाच्यं ' स आत्मा तत्त्वमसि ' ( छान्दो ० ६ | ८ | ७ ) इतीहो-पदिष्टं स्यात् स तदुपदेशश्रवणादनात्मज्ञतया तन्निष्ठो मा भूदिति मुख्यमात्मानमुपदि-दिक्षुस्तस्य यत्वं ब्रूयात् । यथाऽरुन्धतीं दिदर्शयिषुस्तत्समीपस्थां स्थूलां ताराममुख्यां प्रथममरुन्धतीति ग्राहयित्वा तां प्रत्याख्याय पश्चादरुन्धतीमेव ग्राहयति, तद्वन्नायमात्मेति अग्नि हो मुख्य है, परन्तु अर्थवादसे कल्पित अग्निके सादृश्यसे यागमें प्रवृत्त होता है, अतः यह दृष्टान्त ठीक नहीं है | अथवा [ गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ] इस पूर्व सूत्रमें ही आत्मशब्दका गौणत्व, साधारणत्व विषयक सब शङ्काओं का निराकरण कर व्याख्यान किया गया है । इसलिए ' तन्निष्टस्य ’ यह सूत्र प्रधान कारणवादके निराकरणार्थ स्वतन्त्र हो हेतु है, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए । इससे अचेतन प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं है ॥ ७ ॥
प्रधान सत् शब्दका वाच्यार्थ क्यों नहीं है? यदि अनात्मा प्रधान ही सत् शब्द वाच्य हो तो ' स आत्मा तत्त्वमसि ' इस श्रुति में भी वह उपदिष्ट होता, तब उस उपदेशको सुनकर अनात्मज्ञ होने से वह श्वेतकेतु कहीं अनात्मनिष्ठ न हो जाय, इसलिए मुख्य आत्मा के उपदेशको इच्छा करनेवाले आचार्यको अनात्माको हेयता कहनी चाहिए । जैसे अरुन्धती ताराको दिखलानेकी इच्छा करनेवाला उसके समीपस्थ किसी एक अमुख्य स्थूल ताराको ' यह अरुन्धती है ' पहले ऐसा ग्रहण कराकर पश्चात् उसका निषेधकर मुख्य अरुन्धतीको ही दिखलाता है, वैसे ही यह ( प्रधान ) आत्मा नहीं है, ऐसा कहना चाहिए, परन्तु उसने ऐसा कहा नहीं, केवल सद्रूप आत्माकी ज्ञाननिष्ठा कराने में ही छान्दोग्यके छठे अध्यायकी समाप्ति देखी जाती है । सत्यानन्दी - दीपिका यह प्रकरण और ' श्वेतकेतु ' यह संनिहित पद है, वैसे आत्मशब्द प्रधानका वाचक है इसका निश्चायक न प्रकरण है और न संनिहित पद ही, अतः अचेतन प्रधान चेतन श्वेतकेतुका स्वरूप कदापि नहीं हो सकता, इसलिए आत्मशब्द चेतन ब्रह्म विषयक है । आत्मशब्द प्रधानमें गौण है अथवा अनेकार्थक होनेसे ज्योतिः शब्दकी तरह चेतन और अचेतन दोनोंमें मुख्य है? इस शङ्काके समाधानमें इस सूत्रका आरम्भ ठीक नहीं है । क्योंकि ' गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ' इस पूर्व सूत्रमें ही आत्मशब्दमें गौणत्व तथा अनेकार्थकत्व विषयक सभी शङ्काओं का निराकरण करना उचित था । इस अरुचिसे भगवान् भाष्यकारने ' अथवा ' इत्यादिसे पक्षान्तरका उल्लेख किया है ॥ ७ ॥
- * ' नामधेयं विकारोऽयं वाचा केवलमुच्यते । वस्तुतः कारणाद्भिन्नो नास्ति तस्मान्मृषैव सः ॥ " ( नाम मात्र विकार है, केवलं वाणीसे कहा जाता है, वस्तुतः कारणसे भिन्न नहीं है, इससे वह
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अधि ० ५ सू ० ८ - ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ९ ५ ब्रूयात् । नचैवमवोचत् । सन्मात्रात्मावगतिनिष्ठैव हि षष्टप्रपाठकपरिसमाप्तिर्दृश्यते । * च शब्दः प्रतिज्ञाविरोधाभ्युच्चयप्रदर्शनार्थः । सत्यपि हेयत्ववचने प्रतिज्ञाविरोधः प्रसज्येत् । कारणविज्ञानाद्धि सर्व विज्ञातमिति प्रतिज्ञातम् । ' उत तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ' । ‘ एवं सोम्य स आदेशो भवति ' ( छा ० ६ | १ | १, ३ ) इति वाक्योपक्रमे श्रवणात् । न च सच्छब्दवाच्ये प्रधाने भोग्यवर्गकारणे हेयत्वेनाहेयत्वेन वा विज्ञाते भोक्तवर्गों विज्ञातो भवति; अप्रधानविकार-त्वाद्भोक्तृवर्गस्य । तस्मान्न प्रधानं सच्छब्दवाच्यम् ॥ ८ ॥
कुतश्च न प्रधानं सच्छब्दवाच्यम्? स्वाप्ययात् ॥ ९ ॥
सूत्रार्थ - श्रुति कहती है कि सुषुप्ति में जीव सत् शब्द वाच्य ब्रह्म में ही लीन होता है, अतः सत् शब्द वाच्य चेतन ब्रह्म है, अचेतन प्रधान नहीं । तदेव सच्छब्दवाच्यं कारणं प्रकृत्य श्रूयते - ' यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा संपन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति ' ( छा ० ६।८।१ ) च शब्द प्रतिज्ञामें विरोधका संग्रह दिखलाने के लिए है । यदि प्रधानको हेय भी कहा होता तो भी प्रतिज्ञाका विरोध प्रसक्त होता, क्योंकि कारणके विज्ञानसे ही सबका ज्ञान होता है, ऐसी प्रतिज्ञा की गई है । कारण कि ‘ उत तमादेशम ० ' ( उद्दालक - हे श्वेतकेतु! क्या तुमने आचार्यसे आदेश पूछा है? जिससे अश्रुत श्रुत हो जाता है, अमत मत हो जाता है और अविज्ञात विशेषरूप से ज्ञात हो जाता है । यह सुनकर श्वेतकेतुने बीचमें पूछा ] ' कथं ० ' हे भगवन्! वह आदेश कैसा होता है? उद्दालक-हे सोम्य! जिस प्रकार घटादिके कारण भूत एक ही मृत्पिण्ड ( मृत्तिकाके स्वरूप ) के ज्ञानसे सारे मृन्मय पदार्थों का ज्ञान हो जाता है, विकार केवल वाणीके आश्रय भूत नाममात्र हैं सत्य तो केवल मृत्तिका ही है, ' एवं सोम्य ० ' - हे सोम्य! इसका आदेश भी है ) इस प्रकार वाक्यके उपक्रममें श्रुति है | सम्पूर्ण भोग्य पदार्थोंके कारण भूत सत् शब्द वाच्य प्रधानका हेयत्व अथवा अहेयत्व से ज्ञान होनेपर भी मोक्तृवर्गका ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि भोक्तृवर्गं प्रधानका विकार नहीं है, इसलिए प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं है ॥ ८ ॥
प्रधान सत् शब्द वाच्य क्यों नहीं है? उसी सत् शब्द वाच्य कारणको प्रस्तुतकर श्रुति कहती है- ' यत्रेतत्पुरुषः ० ' ( जिस सुषुप्ति अवस्थामें यह पुरुष स्वपिति - सोता है, ऐसा कहा जाता है उस समय हे सोम्य! वह सद्रूपके साथ सत्यानन्दी - दीपिका मिथ्या है ) कारणसे कार्यकी भिन्न सत्ता न होनेसे कारणके ज्ञानसे कार्यमात्रका ज्ञान होता है, अत: सबका अधिष्ठानत्वेन कारण होनेसे ब्रह्म ही सत्य है । मृत्तिकामें घटादिके समान यह दृश्यमान • आकाशादि सारा प्रपञ्च ब्रह्ममें कल्पित है । सर्वाधिष्ठान ब्रह्मके ज्ञानसे कार्यमात्रका ज्ञान हो जाता है प्रधानके ज्ञानसे भोक्तृवर्गका ज्ञान न होनेसे प्रतिज्ञा बाधित होती है । ब्रह्मके ज्ञानसे मोक्तृवर्गं तथा भोग्यवर्गं सबका ज्ञान हो जाता है, क्योंकि यह सम्पूर्णं भोक्तृवर्ग, भोग्यवर्गं सद्रूप ब्रह्मसे अभिन्न है । इस प्रकार वेदान्तमें उक्त प्रतिज्ञा सर्वथा निर्दोष है, अतः यह सिद्ध हुआ कि प्रधान सत् शब्द वाच्य नहीं है ॥ ८ ॥
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९ ६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ इति । एषा श्रुतिः स्वपितीत्येतत्पुरुषस्य लोकप्रसिद्धं नाम निर्वक्ति । स्वशब्दे नेहात्मोध्यते यः प्रकृतः सच्छब्दवाच्यस्तमपीतो भवत्यपिगतो भवतीत्यर्थः । अपिपूर्वस्यैतेर्लयार्थत्वं प्रसिद्धम्; प्रभवाप्ययावित्युत्पत्तिप्रलययोः प्रयोगदर्शनात् । मनःप्रचारोपाधिविशेषसंवन्धा-दिन्द्रियार्थान्गृह्ण स्तद्विशेषापन्नो जीवो जागर्ति । तद्वासनाविशिष्टः स्वप्नान्पश्यन्मनःशब्द-वाच्यो भवति । स उपाधिद्वयोपरमे सुषुप्तावस्थायामुपाधिकृत विशेषाभावात्स्वात्मनि प्रलीन इवेति ' स्वं ह्यपीतो भवति ' इत्युच्यते । यथा हृदयशब्दनिर्वचनं श्रुत्या दर्शितम्-' स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तं हृद्ययमिति तस्माद्धृदयमिति ' ( छा ० ८ | ३ | ३ ) इति । यथा वाऽशनायोदन्याशब्दप्रवृत्तिमूलं दर्शयति श्रुतिः ' आप एव तदर्शितं नयन्ते, तेज एव तत्पीतं नयते ' ( छा ० ६ / ८ / ३,५ ) इति च, एवं स्वमात्मानं संच्छब्दवाच्यमपीतो भवतीतीममर्थ एक रूप हुआ रहता है अर्थात् वह अपने स्वरूपको ही प्राप्त हो जाता है । इसीसे उसे उस अवस्थामें ' स्वपिति ' ऐसा कहते हैं, क्योंकि वह अपनेमें ही लीन होता है ) यह श्रुति भी पुरुष के स्वपिति ( सोता है ) इस लोक प्रसिद्ध नामका निर्वचन करती है | श्रुतिमें स्वशब्दसे आत्मा कहा जाता है, जो प्रकृत और सत् शब्द वाच्य है । उसमें जीव अपीत होता है अर्थात् लीन होता है ऐसा अर्थ है । अपि पूर्वक ' इण् ' गत्यर्थक धातुका लय अर्थ [ व्याकरणमें ] प्रसिद्ध है, क्योंकि प्रभव और अप्य दोनों शब्द उत्पत्ति और प्रलय अर्थ में प्रयुक्त हुए देखने में आते हैं । मनके प्रचार इन्द्रियों द्वारा अन्तः-करणका परिणाम वृत्तिरूप उपाधिविशेषके सम्बन्धसे विषयोंको ग्रहण करता हुआ उनके साथ ऐक्यकी भ्रान्तिको प्राप्त हुआ [ विश्वसंज्ञक ] जीव जागता है । जाग्रत् अवस्थामें अनुभूत विषयोंकी वासनासे युक्त होकर स्वप्नोंको देखता हुआ मन शब्दसे वाच्य होता है 1 । दोनों उपाधियोंके लंय होने-पर सुषुप्ति अवस्था में उपाधि जन्य विशेषके अमावसे वह स्व स्वरूपमें विलीन - सा होता है, अतः अपने को ही प्राप्त हो जाता है, ऐसा कहा जाता है । ' स वा एष ० ' ( वह यह आत्मा हृदय में है ' हृदि अयम् - हृदयम् ' यह हृदय है । यही इसका निरुक्त ( व्युत्पत्ति ) है । इसीसे यह ( आत्मा ) हृदय कहलाता है ) इसप्रकार हृदय शब्दका निर्वचन जैसे श्रुतिसे दिखलाया गया है । तथा ' आप एव ' ' तेज एव ० ' ( उस समय जल ही उस पुरुषके द्वारा भुक्त अन्नको द्रवीभूतकर ले जाता है अर्थात् रसादिरूपमें परिणत कर देता है, उसके पीये हुए जलको तेज ही ले जाता है अर्थात् तेज जलका शोषणकर उसे रक्त और प्राणरूपमें परिणत कर देता है ) इसप्रकार जैसे ' अशनाया और उदन्या '. शब्दों की प्रवृत्तिका मूल श्रुति दिखलाती है । वैसे ही सत् शब्द वाच्य स्वरूपमें लीन होता है । सत्यानन्दी - दीपिका * यद्यपि ' स्वं ह्यपितो भवति ' ( अपने में ही लीन होता है ) इस छन्दोग्य श्रुतिमें जीवका विलय कथन अयुक्त है, क्योंकि विलय तो उत्पत्तिमद्वस्तुका होता है नित्यका नहीं । जीव तो नित्य है । तो भी श्रुतिमें साक्षात् नित्य जीवका विलय नहीं कहा गया है, किन्तु अनित्य उपाधियोंका कारणमें विलय होनेसे तदुपहित जीवका भी गौणरूपसे विलय कहा गया है । इसका स्पष्टीकरण करनेके लिए भगवान् भाष्यकार ' मनः प्रचार ' इत्यादिसे जाग्रत् और स्वप्नावस्थाओं का वर्णन करते हैं । नेत्रादि इन्द्रियोंद्वारा घट आदि आकारमें परिणत अन्तःकरणकी वृत्तिका नाम ' मनः प्रचार ' है | उन वृत्तिरूप उपाधियोंद्वारा स्थूल घट आदि विशेष पदार्थोंका आत्माके साथ कल्पित सम्बन्ध होता है, इससे नेत्रादि इन्द्रियोंसे रूप आदि अर्थोंका अनुभव करता हुआ स्थूल देह रूप उपाधिके साथ ' मैं मनुष्य हूँ ' इसप्रकार ऐक्यरूप भ्रान्तिको प्राप्त हुआ आत्मा ' विश्व ' नामक होकर जागता