श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 131–140
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 131–140
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अधि ० ५ सू ० १० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो -दीपिका सहित स्वपितिनामनिर्वचनेन दर्शयति । नच चेतन आत्माऽचेतनं प्रधानं स्वरूपत्वेन प्रतिपद्येत । यदि पुनः प्रधानमेवात्मीयत्वात्स्वशब्देनैवोच्येत, एवमपि चेतनोऽचेतनमप्येतीति विरुद्ध-मापद्येत । श्रुत्यन्तरं च - ' प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम् ' ( बृह ० ४।३।२१ ) इति सुषुप्तावस्थायां चेतनेऽप्ययं दर्शयति । अतो यस्मिन्नप्ययः सर्वेषां चेतनानां तच्चेतनं सच्छब्दवाच्यं जगतः कारणं न प्रधानम् ॥ ९ ॥
कुतश्च न प्रधानं जगतः कारणम्? गतिसामान्यात् ॥ १० ॥
सूत्रार्थ - सभी वेदान्तोंमें कारण ज्ञान समान है । अतः चेतन ही जगत्का कारण है, प्रधान नहीं । यदि तार्किकसमय इव वेदान्तेष्वपि भिन्ना कारणावगतिर भविष्यत्क्वचिच्चेतनं ब्रह्म जगतः कारणं, क्वचिदचेतनं प्रधानं क्वचिदन्यदेवेति, ततः कदाचित्प्रधानकारणवादानुरो-धेनापीक्षत्यादिश्रवणम कल्पयिष्यत । नत्वेतदस्ति; समानैव हि सर्वेषु वेदान्तेषु चेतनकार -णावगतिः । ' ' यथाऽग्नेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्टेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः सर्वे प्राणा यथाय-इसी अर्थको श्रुति ' स्वपिति ' शब्द के निर्वचन से दिखलाती है । और इसप्रकार चेतन आत्मा अचेतन प्रधानको अभेदरूपसे प्राप्त नहीं होगा । यदि आत्मीय होनेके कारण प्रधानको ही स्वशब्दसे कहा जाय तो भी चेतन अचेतनमें लीन होता है, यह कथन विरुद्ध ही होगा । ' प्राज्ञेनात्मना ० ' ( प्राज्ञ आत्मा के साथ ऐक्यको प्राप्त हुआ यह पुरुष न किसी बाह्य वस्तुकों और न किसी आन्तर वस्तुको ही जानता है ) यह दूसरी श्रुतिमी सुषुप्ति अवस्था में चेतनमें जीवका लय दिखलाती है । अतः जिसमें सभी चेतनोंका लय होता है वही चेतन सत् शब्द वाच्य और जगत्का कारण है प्रधान नहीं ॥। ९ ॥ और किस कारण से प्रधान जगत्का कारण नहीं है? तार्किक सिद्धान्त के समान यदि वेदान्तों में भी भिन्न - भिन्न कारण ज्ञान होता, कहीं चेतन ब्रह्म, कहीं अचेतन प्रधान और कहीं अन्य ( परमाणु आदि ) ही जगत्का कारण होता, तो कदाचित् प्रधान कारणवादके अनुरोधसे प्रधानके विषयमें ' ईक्षति ' आदि श्रुतियोंकी कल्पना की जा सकती, परन्तु ऐसा नहीं है, क्योंकि सभी वेदान्तोंमें कारण ज्ञान समान ही है । ' यथाऽग्नेर्ज्वलतः ० ' ( जैसे प्रज्वलित अग्निसे निकली हुई चिनगारियाँ सभी दिशाओंमें फैलती हैं, वैसे ही इस आत्मासे सभी प्राण सत्यानन्दी - दीपिका है । जाग्रत् अवस्थामें अनुभूत पदार्थोंके अनुरूप संस्कारों सहित मनसे युक्त होकर जीव अविद्या के परिणामात्मक स्वप्न पदार्थों को देखता हुआ ' सोम्य तन्मनः ० ' ( हे सोम्य! वह मन है ) इसप्रकार श्रुति प्रतिपादित मन शब्दसे वाच्य होता है अर्थात् ' अहं कर्ता, अहं भोक्ता ' इसप्रकार मनरूप उपाधि के साथ ऐक्यरूप भ्रान्तिको प्राप्त हुआ आत्मा स्वप्नावस्थामें ' तेजस ' नामवाला होता है । सुषुप्ति अवस्थामें स्थूल और सूक्ष्म दोनों उपाधियोंका कारणमें विलय होनेसे ' मैं मनुष्य हूँ, कर्ता भोक्ता हूँ ' इत्यादि विशेष अभिमानके अभाव होनेके कारण केवल अविद्योपाधिक होकर जीव अपनेमें लीनकी तरह कहा जाता है । ' स्वं ह्यपितो भवति ' इसप्रकार लय गुणके योगसे प्राज्ञ आत्मा का नाम ' स्वपिति ' है । * जैसे मे उक्त सारी व्युत्पत्तियाँ यथार्थ हैं, वैसे ही ' स्वमात्मानमपीतो भवतीति स्वपिति ' यह व्युत्पत्ति भी यथार्थं | यहाँ श्रुति स्व शब्दसे अचेतन प्रधानका ग्रहण नहीं करती अपितु आत्माका ही ग्रहण करती है ॥ ९ ॥
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९ ८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ तनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः ' ( कौ ० ३।३ ) इति । ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' ( तै ० २।१ ) इति । ' आत्मन एवेदं सर्वम् ' ( छा ० ७ | २६ । १ ) इति । ' आत्मन एष प्राणो जायते ' ( प्र ० ३ | ३ ) इति चात्मनः कारणत्वं दर्शयन्ति सर्वे वेदान्ताः । आत्मशब्दश्च चेतनवचन इत्यवोचाम | महच्च प्रामाण्यकारणमेतद्यद्वेदान्तवाक्यानां चेतनकारणत्वे समानगतित्वम्, चक्षुरादीनामिव रूपादिषु । अतो गतिसामान्यात्सर्वज्ञं ब्रह्म कुतश्च सर्वज्ञं ब्रह्म जगतः कारणम्? श्रुतत्वाच्च ॥ ११ ॥
पदच्छेद- - श्रुतत्वात् च । सूत्रार्थ - और ' स कारणम् ' इसप्रकार श्रुति में स्वशब्दसे कहा गया है । अतः सर्वज्ञ ब्रह्म ही जगत्का कारण है । * स्वशब्देनैव च सर्वज्ञ ईश्वरो जगतः कारणमिति पनिषदि सर्वज्ञमीश्वरं प्रकृत्य - ' स कारणं करणाधिपाधिपो न जगतः कारणम् ॥ १० ॥
सर्वज्ञ ब्रह्म ही जगत्का कारण श्रूयते श्वेताश्वतराणां मन्त्रो-चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ' ( श्वे ० ६।९ ) इति । तस्मात्सर्वज्ञं ब्रह्म जगतः कारणम्, नाचेतनं प्रधान मन्यद्वेति सिद्धम् ॥११ ॥
( इन्द्रियाँ ) यथा स्थान ( गोलक ) में प्रादुर्भूत होते हैं, प्राणोंसे तदुपकारक सूर्य आदि देवता प्रकट होते हैं, तदनन्तर देवोंसे लोक ( इन्द्रियोंके रूप आदि विषय ) उत्पन्न होते हैं और ' तस्माद्वा ० ( इस सद्रूप आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) ' आत्मन ० ' ( आत्मांसे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ ) ' आत्मन ० ' ( आत्मा से प्राण उत्पन्न होता है ) इस प्रकार सभी वेदान्त ' आत्मा कारण है ' यह दिखलाते हैं । आत्मशब्द चेतन वाचक है यह हम कह चुके हैं । जैसे चक्षु आदि इन्द्रियोंमें रूप · आदि विषयक ज्ञान समान है, वैसे ही वेदान्त वाक्योंका चेतन कारणत्वमें जो समान ज्ञान है यही प्रामाण्य होनेमें महान् कारण है । इस कारण - वेदान्त वाक्योंसे चेतन कारणत्व अवग्रति समान होनेके कारण सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्का कारण है ॥ १० ॥
और किस कारण सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्का कारण है? सर्वज्ञ ब्रह्म जगत्का कारण है ऐसा स्वशब्द ( ईश्वर वाचक शब्द ) से ही श्रुति कहती है, क्योंकि श्वेताश्वेतरोंके मन्त्रोपनिषद् में सर्वज्ञ ईश्वरको प्रस्तुतकर ' स कारण ० ' ( वह सर्वज्ञ परमेश्वर समीका कारण है और इन्द्रियाधिष्ठाता जीवका स्वामी है । उसका न कोई उत्पत्तिकर्ता है और न कोई स्वामी है ) ऐसा कहा गया है । इसलिए यह सिद्ध हुआ कि सर्वज्ञ ब्रह्म ही जगत्का कारण है अचेतन प्रधान अथवा अन्य कोई नहीं ॥ ११ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * यद्यपि ' तदैक्षत ' ( उसने ईक्षण किया ) इत्यादि श्रुतिसे कारण में केवल ईक्षण मात्र प्रति-पादित है । सर्वज्ञत्व नहीं, तो भी ईक्षण कर्ता में अपना चेतन वाचक ' सर्ववित् ' शब्द भी है । स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनिर्शः कालकालो गुणी सर्वविद्यः । ( वह विश्वका कर्ता, आत्मयोनि ( स्वयंभु ) ज्ञाता, कालका प्रेरक, अपहतपाप्मत्वादि गुणवान् और सभी विद्याओंका आश्रय और जो सर्ववित् है ) ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' ' अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपा: ' ( मुण्ड ० २।१।९ ) ( उस परमेश्वरसे ही सभी समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं, इसीसे गङ्गा, सिन्धु आदि विविध नदियाँ बहती हैं ) इसप्रकार सभी उपनिषदोंमें यही सिद्ध होता है कि सर्वज्ञ, सर्वशक्ति ब्रह्म ही जगत्का कारण है, जड़ प्रधान अथवा परमाणु आदि नहीं । पूर्वपक्ष में जीवका प्रधानके साथ अभेद मानकर उपासना करना फल है और सिद्धान्तमें ब्रह्म तथा प्रत्यगात्माका अभेदरूपसे साक्षात्कार फल है ॥। ११ ॥
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अधि ० ५ सू ० १२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ९९ ( ६ आनन्दमयाधिकरणम् । सू ० १२-१६ ) ' जन्माद्यस्य यतः ' इत्यारभ्य ' श्रुतत्वाच्च ' इत्येवमन्तैः सूत्रैर्यान्युदाहृतानि वेदान्त-वाक्यानि तेषां सर्वज्ञः सर्वशक्तिरीश्वरो जगतो जन्मस्थितिलयकारणमित्येतस्यार्थस्य प्रति-पादकत्वं न्याय पूर्वकं प्रतिपादितम् । गतिसामान्योपन्यासेन च सर्वे वेदान्ताश्चेतन कारण-वादिन इति व्याख्यातम् - अतः परस्य ग्रन्थस्य किमुत्थानमिति । उच्यते, -द्विरूपं हि ब्रह्मावगम्यते, नामरूपविकार भेदोपाधिविशिष्टं, तद्विपरीतं च सर्वोपाधिविवर्जितम् । ' यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् ' ( बृह ० ४।५।१५ ) ' यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजा-नाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम् ' ( छान्दो ० ७ | २४ | १ ) ' सर्वाणि रूपाणि विचित्य धोरो नामानि कृत्वाऽभिवदन्यदास्ते ' ( तै ० आ ० ३।१२।७ ) ' निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् | अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ' ( इवे ० ६ । १ ९ ) ' नेति नेति ' ( बृ ० ‘ जन्माद्यस्य यतः ' सूत्रसे लेकर ' श्रुतत्वाच्च ' पर्यंन्त सूत्रोंसे जो वेदान्त वाक्य उदाहृत किए गए हैं वे सर्वज्ञ सर्वशक्ति ईश्वर जगत् के जन्म स्थिति और लयका कारण है इसी अर्थके प्रतिपादक हैं, यह बात युक्तिपूर्वक कही गई है । सभी वेदान्त वाक्योंमें कारण विषयक अवगति समान है, इस कथनसे सारे वेदान्त वाक्य चेतनवादी हैं, ऐसा व्याख्यान किया गया है, तो अग्रिम ग्रन्थका आरम्भ क्यों किया जाता है? इसपर कहते हैं - नाम रूपात्मक विकार विशेष उपाधिसे युक्त और उससे विपरीत सभी उपाधियोंसे रहित, इसप्रकार ब्रह्मके दो रूप अवगत होते हैं । जैसे कि ' यत्र हि ० ' ( जहाँ-अविद्यावस्था में द्वैत - सा होता है वहीं अन्य अन्यको देखता है किन्तु जहाँ - विद्यावस्था में उस विद्वान् के लिए सब आत्मा ही हो गया तो उस समय किस करणसे किस विषयको कौन देखे ) ) और ' यत्र ० ' ( सनत्कुमार -- जहाँ व्यापक आनन्दस्वरूप आत्मामें स्थित हुआ विद्वान् अपने से भिन्न कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता, कुछ और नहीं जानता वह भूमा व्यापक ब्रह्म है और जहाँ अपने से भिन्न कुछ और देखता है कुछ और सुनता है, कुछ और जानता है वह अल्प - परिच्छिन्न है, जो भूमा है वही अमृत है और जो अल्प है वह मर्त्य - मरणशील है ) ' सर्वाणि ० ' ( जो परमेश्वर सब देव, मनुष्यादि शरीरोंको उत्पन्नकर यह देव है, यह मनुष्य है, इत्यादि नाम रखकर उन नामोंसे स्वयं व्यवहार करता है ) ' निष्कलं ० ' ( कला रहित अवयवरहित, निष्क्रिय, शान्त, रागादि दोष रहित, निर्लेप - पापादि रहित, अमृतत्वका उत्कृष्ट सेतु और जिसका ईन्धन जल चुका है उस धूम रहित सत्यानन्दी - दीपिका * वेदान्त शास्त्रमें सगुण तथा निर्गुण ब्रह्मके प्रतिपादक अनेक वाक्य देखनेमें आते हैं, उनमें कौन - से सगुणकी उपासना द्वारा निर्गुण ब्रह्ममें समन्वित होते हैं और कौन - से साक्षात् निर्गुण ब्रह्ममें समन्वित होते हैं । इस प्रकारकी जिज्ञासा अग्रिम ग्रन्थके आरम्भमें हेतु है । भगवान् भाष्यकारने सगुण और निर्गुण ब्रह्मके प्रतिपादक ' यत्र हि द्वैतमिव ' ' यत्र नान्यत्पश्यति ' इत्यादि अनेक वाक्य उद्धृत किये हैं । माया उपाधि विशिष्ट सगुण ब्रह्म और दूसरा माया उपाधिसे रहित निर्गुण ब्रह्म इस प्रकार ब्रह्मके दो रूप हैं । यद्यपि ब्रह्म एक ही है, फिर भी उपाधिके भाव और अभावके कारण ब्रह्मके दो रूप श्रुतियोंमें कहे गये हैं । इसलिए उपाधि सहित सगुण ब्रह्म निर्गुण ब्रह्मसे भिन्न परिच्छिन्न तथा मिथ्या है, क्योंकि उसकी उपाधि परिच्छिन्न तथा मिथ्या है, इससे उसे भी ऐसा ही कहा जाता है । इस प्रकार ब्रह्मके दो रूप माननेमें कोई विरोध नहीं है । ' निष्कलं ' इस श्रुतिमें सेतु शब्द लौकिक सेतुके समान ' तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि वेदान्त वाक्योंसे उत्पन्न ब्रह्माकार वृत्तिमें स्वयं स्थित या प्रति-बिम्बित ब्रह्म संसार सागरसे पार ले जाने ( मोक्ष प्राप्ति ) में एक मात्र साधन है ।
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१०० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ २।३।६ ) ‘ अस्थूलमनणु ' ( बृ ० ३।८।८ ) इति, ' न्यूनमन्यत्स्थानं संपूर्णमन्यत् ' इति चैवं सहस्रशो विद्याविद्याविषयभेदेन ब्रह्मणो द्विरूपतां दर्शयन्ति वेदान्तवाक्यानि । * तत्राविद्यावस्थायां ब्रह्मण उपास्योपासकादिलक्षणः सर्वो व्यवहारः । तत्र कानिचिद्ब्रह्मण उपासनान्य-भ्युदयार्थानि कानिचित्क्रममुक्त्यर्थानि कानिचित्कर्मसमृद्धयर्थानि । तेषां गुणविशेषोपा-धिभेदेन भेदः । एक एव तु परआत्मेश्वरस्तैस्तैर्गुणविशेषैर्विशिष्ट उपास्यो यद्यपि भवति, तथापि यथा गुणोपासनमेव फलानि भिद्यन्ते । ' तं यथा यथोपासते तदेव मवति ' इति श्रुतेः, ' यथाक्रतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति ' ( छा ० ३ | १४ | १ ) इति च । स्मृतेश्च - ' यं यं वापि स्मरन्मावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ' ( गी ० ८ | ६ ) अग्निके समान ( देदीप्यमान ) देवकी मैं शरण लेता हूँ ) । ' नेति ० ' ( यह नहीं, यह नहीं, ऐसा ) ' अस्थूलम ० ' ( जो न स्थूल है और न सूक्ष्म है ) ' न्यून ० ' ( एक न्यून - अल्प स्थान है और दूसरा सम्पूर्ण स्थान है अर्थात् सोपाधिक सगुण ब्रह्म अल्प और उपाधिरहित निर्गुण ब्रह्म पूर्ण व्यापक है ) ऐसे सहस्र वाक्य विद्या और अविद्या के विषय भेदसे ब्रह्मके दो रूप दिखलाते हैं । उसमें अविद्या -वस्थामें उपास्य उपासक आदि लक्षण सभी व्यवहार ब्रह्म में होते हैं । उपासनाओंमें ब्रह्मकी कई एक उपासनाएँ अभ्युदयके लिए हैं, कई एक ( दहरादि ) उपासनाएँ क्रममुक्तिके लिए हैं और कई एक कर्म समृद्धिके लिए हैं । गुणविशेषसे तथा उपाधिभेदसे उनका परस्पर भेद है । यद्यपि उन - उन गुणविशेषोंसे विशिष्ट एक ही ईश्वर परमात्मा उपास्य है, तथापि जिस गुणकी उपासना होती है । तदनुसार भिन्न - भिन्न फल होते हैं, क्योंकि ' तं तथा ० ' ( उसकी जिस - जिस रूपसे उपासना करता है वैसे ही रूपको प्राप्त होता है ) और ' यथा ऋतु ० ' ( इसलोकमें पुरुष जैसे निश्चयवाला होता है वैसे ही यहाँ से मर कर जानेपर होता है ) इस प्रकारकी श्रुति और ' यं यं ० ' ( हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य जिस-जिस भी भावका स्मरण करता हुआ अन्तकालमें शरीर छोड़ता है, उस भावकी भावनावाला वह पुरुष उस - उस भावको ही प्राप्त होता है ) ऐसी स्मृति है । यद्यपि एक ही आत्मा जड़ और चेतन सभी सत्यानन्दी -दीपिका. ** अब भगवान् माष्यकार ' तत्र ' इत्यादिसे अविद्या विषयक विचार करते हैं - निर्गुण ब्रह्मके ज्ञानके लिए कल्पित प्रपञ्चका आश्रयकर उसके बाध होनेसे पहले ' गुड़ जिह्वा न्याय ' से तत् तत् फलके लिए उपासनाओंका विधान किया गया है । उनका भी चित्तकी एकाग्रता द्वारा ब्रह्मज्ञान ही मुख्य फल है, इसलिए इनका भी महातात्पर्य ब्रह्ममें ही है । उपासनाओंका अवान्तर फल इस प्रकार है- -' स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते ' ( छा ० ७।१।५ ) ( जो कोई उपासक ' नाम ' ब्रह्म है, ऐसी उपासना करता है उसको जहाँ तक नामका विषय है वहाँ तक यथेष्ट कामाचार रूप फल प्राप्त होता है ) इस प्रकारकी प्रतीकोपासनाओं का फल अभ्युदय है । दहरादि उपासनाओंका फल क्रममुक्ति है अर्थात् दहर उपासना के बलसे ब्रह्मलोकमें पहुँचकर वहाँ ब्रह्माद्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्तकर मुक्त हो जाता है । इस उपासनाका विशेष विवरण ( ० सू ० १।३।१४ ) में द्रष्टव्य है । ' उद्गीथमुपासीत ' ( छा ० १1१1१ ) ( उद्गीथके अवयव भूत वर्णात्मक ॐ ( ओंकार ) की उपासना करे ) इस प्रकार उद्गीथादि उपासनाओंका फल कर्म समृद्धि हैं । विधेय होनेसे इन उपासनाओंका विधान यद्यपि कर्मकाण्डमें ही उपयुक्त था, फिर भी उपासना ( ध्यान ) मानसिक है और ज्ञानका अन्तरङ्ग साधन है, इसलिए उनका ज्ञानकाण्ड में विधान किया गया है । यद्यपि परमेश्वर एक है तथापि सत्यकामादि गुण अनेक हैं, ध्यान करने योग्य हृदय, आदित्य आदि उपाधियाँ - स्थान अनेक हैं । इस तरह उपाधियोंके भेदसे उपहित भी भिन्न - भिन्न होता है, अतः जिस - जिस गुण सहित परमेश्वरका जिस जिस उपाधिरूप स्थानमें ध्यान किया जाता है, उस उस गुण तथा उस उस उपाधिके भेदसे उपास्यका भेद, उपास्यभेदसे उपासनाका भेद,
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अधि ०५ सू ० १२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित १०१ इति । यद्यप्येक आत्मा सर्वभूतेषु स्थावरजङ्गमेषु गूढः, तथापि चित्तोपाधिविशेषतार-तस्यादात्मनः कूटस्थनित्यस्यैकरूपस्याप्युत्तरोत्तरमाविष्कृतस्य तारतम्यमैश्वर्यशक्ति विशेषैः श्रूयते - ' तस्य य आत्मानमाविस्तरां वेद ' ( ऐ ० आ ० २।३।२।१ ) इत्यत्र । स्मृतावपि - ' यद्यद्वि-भूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥ ' ( गी ० १०१४१ ) इति यत्र यत्र विभूत्याद्यतिशयः स स ईश्वर इत्युपास्यतया चोद्यते । एवमिहाप्यादित्यमण्डले हिरण्मयः पुरुषः सर्वपाप्मोदयलिङ्गात्पर एवेति वक्ष्यति । एवं ' आकाशस्तलिङ्गात् ' ( ब्र ० १।१।२२ ) इत्यादिषु द्रष्टव्यम् । एवं सद्योमुक्तिकारणमध्यात्मज्ञानमुपाधिविशेषद्वारेणोप-दिश्यमानमप्यविवक्षितोपाधिसंबन्धविशेषं परापरविषयत्वेन संदिह्यमानं वाक्यगतिपर्या-लोचन या निर्णेतव्यं भवति । यथेहैव तावत् ' आनन्दमयोऽभ्यासात् ' इति । एवमेकमपि ब्रह्मा-पेक्षितोपाधिसंबन्धं निरस्तोपाधिसंबन्धं चोपास्यत्वेन ज्ञेयत्वेन च वेदान्तेषूपदिश्यत इति प्रदर्शयितुं परो ग्रन्थ आरभ्यते । यच्च ' गतिसामान्यात् ' इत्यचेतनकारणनिराकरणमुक्तम्, तदपि वाक्यान्तराणि ब्रह्मविषयाणि व्याचक्षाणेन ब्रह्मविपरीतकारणनिषेधेन प्रपञ्चयते-भूतोंमें गूढ ( छिसा हुआ ) है, तथापि चित्तरूपी उपाधिविशेषके तारतम्यसे उत्तरोत्तर अभिव्यक्त, कूटस्थ नित्य एकरूप आत्माका ऐश्वर्य शक्तिविशेषसे तारतम्य ' तस्य ० ' ( उस उक्थरूप पुरुषके शरीरमें वर्तमान चिद्रूप आत्माको जो पुरुष अतिशय जानता है— उपासना करता है ) इस श्रुतिमें सुना जाता है । और ‘ यद्यद् ० ' ( इसलिए हे अर्जुन! जो - जो ऐश्वर्यं शाली कान्तियुक्त एवं उत्कृष्ट वस्तु है उस - उसको तुम मेरे तेजके अंशसे ही उत्पन्न हुई जान ) इस प्रकार स्मृतिमें भी है । जहाँ - जहाँ विभूति आदिका अतिशय है वह वह ईश्वर है, इस प्रकार उसका उपास्यरूपसे विधान किया जाता है । इस प्रकार यहाँ ( सूत्र में ) भी आदित्यमण्डल में हिरण्यमय पुरुष है वह सब पापोंसे रहित होनेके कारण परमात्मा ही है, ऐसा ( ब्र ० सू ० १ | १ | २० ) सूत्र में कहेंगे । इस प्रकार ( ब्र ० सू ० १।१।२२ ) इत्यादि सूत्रोंमें भी समझना चाहिए । इस प्रकार विदेह मुक्तिका कारण आत्मज्ञान भी उपाधि विशेष द्वारा उपदिश्यमान होनेपर भी और उपाधि सम्बन्ध विशेष विवक्षित न होनेसे पर विषयक है अथवा अपर विषयक है ऐसा सन्देह होता है, अतः तात्पर्यका पर्यालोचनकर उसका निर्णय करना चाहिए | जैसे कि यहीं ‘ आनन्दमयोऽभ्यासात् ' सूत्रमें किया है । इस प्रकार एक ही ब्रह्म उपाधि सम्बन्धकी अपेक्षा उपास्यरूपसे और उपाधि सम्बन्ध रहित ज्ञेयरूपसे वेदान्त वाक्योंमें उपदिष्ट है, यह दिखलानेके लिए अग्रिम ग्रन्थका आरम्भ किया जाता है । ' गतिसामान्यात् ' वेदान्त वाक्योंसे ब्रह्म कारणविषयक ज्ञान समान होनेसे अचेतन कारणका जो निराकरण कहा गया है, उसका भी ब्रह्म विषयक अन्य वाक्योंका व्याख्यान करनेकी इच्छावाले सूत्रकार ब्रह्मसे भिन्न कारणके निषेधसे विस्तार करेंगे— सत्यानन्दी - दीपिका उपासना भेदसे फलका भेद होता है । इस विषय में श्रुति और स्मृति भी उद्धृत किये गये हैं । लोग राजाकी उपासनाकी तरह परमात्माकी जिस - जिस रूपसे उपासना करते हैं उस उस रूपको प्राप्त करना ही उनके लिए फल होता है । * बुद्धि आदि उपाधिकी शुद्धिके तारतम्यसे ऐश्वर्य, ज्ञान आदिका तारतम्य विशेष होता है । इस भेदसे एक रूप आत्माका मनुष्य आदिसे लेकर हिरण्यगर्भ पर्यन्त उत्तरोत्तर ऐश्वर्यादिके उत्कर्षका आविर्भाव सुना जाता है । उपास्य उपासक भावमें भी अल्प उपाधिवाला आत्मा उपासक और उत्कृष्ट उपाधिवाला आत्मा उपास्य है । इस तरह उपाधिको लेकर यह सारा तारतम्य है । ' आदित्यं ब्रह्मेत्यु-पासीत ' यहाँ आदित्य आदि भी जीवरूपसे उपास्य नहीं हैं किन्तु ईश्वररूपसे उपास्य हैं, इसमें भगवान् माष्यकार ‘ आकाशस्तलिङ्गात् ' इत्यादिसे भगवान् सूत्रकारकी सम्मति देते हैं कि इस सूत्रमें आकाश शब्द से भी परमेश्वरका ही ग्रहण किया गया है ।
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१०३ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १२ ॥
पदच्छेद - आनन्दमयः, अभ्यासात् । सूत्रार्थ - ( आनन्दमयः ) ' अन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमय: ' इस श्रुतिमें आनन्दमय परमात्मा ही है जीव नहीं, ( अभ्यासात् ) क्योंकि आनन्द शब्दका ब्रह्मके लिए अनेक वार अभ्यास देखा गया है । * तैत्तिरीयकेऽन्नमयं प्राणमयं मनोमयं विज्ञानमयं चानुक्रम्याम्नायते - ' तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात् । अन्योऽन्तर आत्मानन्दमय: ' ( तै ० २।५ ) इति । तत्र संशयः - किमिहा-नन्दमयशब्देन परमेव ब्रह्मोच्यते यत्प्रकृतम् ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तै ० २1१ ) इति; किंवा ऽन्नमयादिवद्ब्रह्मणोऽर्थान्तरमिति । किं तावत्प्राप्तं? * ब्रह्मणोऽर्थान्तरममुख्य आत्मानन्दमयः स्यात् । कस्मात्? अन्नमयाद्य मुख्यात्मप्रवाहपतितत्वात् । अथापि स्यात्स-वन्तरत्वादानन्दमयो मुख्य एवात्मेति न स्यात्प्रियाद्यवयवयोगाच्छारीरत्वश्रवणाच्च । मुख्यश्वेदात्मानन्दमयः स्यात्, न प्रियादिसंस्पर्शः स्यात् । इह तु ' तस्य प्रियमेव शिरः ' इत्यादि श्रूयते । शारीरत्वं च श्रूयते - ' तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य ' इति । तस्य पूर्वस्य विज्ञान-मयस्यैष एव शारीर आत्मा य एष आनन्दमय इत्यर्थः । नच सशरीरस्य सतः प्रिया-प्रियसंस्पर्शो वारयितुं शक्यः । तस्मात्संसार्येवानन्दमय आत्मेत्येवं प्राप्ते, * इदमुच्यते-तैत्तिरीयक उपनिषद् में क्रमशः अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, और विज्ञानमयका आत्मरूप से उपक्रमकर ‘ तस्माद्वा ० ' ( उस विज्ञानमयसे भिन्न उसके अन्तर आत्मा आनन्दमय है ) ऐसा श्रुति कहती है । इससे सन्देह होता है कि क्या यहाँ आनन्दमय शब्दसे परब्रह्म ही कहा जाता है, जो ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इस प्रकार प्रकृत है अथवा अन्नमयादिके समान ब्रह्मसे भिन्न पदार्थ? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - आनन्दमय ब्रह्मसे भिन्न पदार्थ अमुख्य आत्मा होना चाहिए, क्योंकि अन्नमयादि मुख्य आत्मा प्रवाह ( परम्परा ) में पठित है । परन्तु सर्वान्तर होने से आनन्दमय मुख्य आत्मा ही होना चाहिए? ऐसा नहीं हो सकता, कारण कि उसमें प्रिय आदि अवयवोंका योग तथा शारीरत्वका श्रवण है | आनन्दमय यदि मुख्य आत्मा होता तो उससे प्रियादिका सम्बन्ध न होता । परन्तु यहाँ तो ' तस्य ० ' ( उसका प्रिय ही शिर है ) इत्यादि श्रुति है । और ' तस्यैष ० ' ( यह जो आनन्दमय है यही उस पूर्वका शारीर आत्मा है ) यह शारीरत्वकी श्रुति है । उस पूर्व विज्ञानमयका यही शारीर आत्मा है जो यह आनन्दमय है, ऐसा अर्थ है । सशरीर होनेपर प्रिय और अप्रियके सम्बन्धका निवारण नहीं किया जा सकता, इसलिए आनन्दमय संसारी जीवात्मा है । इस प्रकार प्राप्त होनेपर उसके निरा-सत्यानन्दी - दीपिका * ' तस्माद्वा ' यह तैत्तिरीयक वाक्य इस अधिकरणका विषय वाक्य है । इस उपनिषद् में प्रतिपादित विज्ञानमय से भिन्न उसके आन्तर आनन्दमय आत्मा है अर्थात् अज्ञानी पुरुषोंकी अन्नमयादि कोशोंमें जो आत्मबुद्धि है उसे पूर्व - पूर्व कोशोंसे हटाती हुई अन्तमें विज्ञानमय कोश में से आत्मबुद्धिका निरा-करण करती हुई श्रुति आनन्दमय में आत्मबुद्धि कराती है । यहाँ अन्नका विकार प्रसिद्ध यह स्थूल शरीर अन्नमय है । समष्टि प्राण, मन और बुद्धि हिरण्यगर्भ रूप हैं व्यष्टि प्राण, मन तथा बुद्धि क्रमसे प्राणमय, मनोमय तथा विज्ञानमय कहे जाते हैं । जो बिम्ब चैतन्य आनन्दरूप ईश्वर है उसका प्रतिबिम्ब जीव आनन्दमय है । इस प्रकार क्रमसे अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय पाँच कोश कहे जाते हैं । अब यहाँ ' किमिह ' से संशय उपस्थित करते हैं । * यहाँ वृत्तिकारके मतानुसार आनन्दमय ही ब्रह्म है, पहले इसपर विचार किया जाता है-आनन्दशब्दसे ' मयट् ' प्रत्यय होकर आनन्दमय शब्द सिद्ध हुआ है । ' मयट् ' प्रत्ययका अर्थ विकार
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अघि ५ सू ० १२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १०३ ' आनन्दमयोऽभ्यासात् । ' पर एवात्माऽऽनन्दमयो भवितुमर्हति । कुतः? अभ्यासात् । परस्मि-नैव ह्यात्मन्यानन्दशब्दो बहुकृत्वोऽभ्यस्यते । आनन्दमयं प्रस्तुत्य ' रसो वै सः ' ( तै ० २।६ ) इति तस्यैव रसत्वमुक्त्वोच्यते - ' रस " ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति ' इति, ' को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात् । यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् । एष ह्येवानन्दयाति ' ( तै ० २।७ ) ' सैषानन्दस्य मीमांसा भवति ', ‘ एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति ', ' आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन ' ( तैत्ति ० २।८, ९ ) इति । ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ( तैत्ति ० ३।६ ) इति च । श्रुत्यन्तरे च ‘ विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ( बृ ० ३।९ ।२८ ) इति ब्रह्मण्येवानन्दशब्दो दृष्टः । एवमानन्दशब्दस्य बहुकृत्वो ब्रह्मण्यभ्यासादानन्दमय आत्मा ब्रह्मेति गम्यते । * यत्तूक्तमन्नमयाद्य मुख्यात्म-प्रवाहपतितत्वादानन्दमयस्यान्यमुख्यत्वमिति, नासौ दोष:, आनन्दमयस्य सर्वान्तरत्वात् । करणार्थ ' आनन्दमयो ० ' यह सूत्र कहा जाता है । परमात्मा ही आनन्दमय हो सकता है । क्योंकि उसमें उसका अभ्यास है । परमात्मामें ही आनन्द शब्दका वार - वार अभ्यास है । आनन्दमयको प्रस्तुत कर ' रसो वै ० ' ( निश्चय वह आनन्द है ) इस प्रकार उसीका रसत्व कहकर ' रस " ह्येवायं ० ' ( यह पुरुष रसको प्राप्त कर ही आनन्द युक्त होता है ) ' को ह्येवान्यात्कः ० ' ( यदि आकाश - हृदया-काशमें स्थित यह आनन्दरूप आत्मा न होता तो कौन व्यक्ति अपान व्यापार ( निःश्वास ) करता और कौन प्राण व्यापार ( उच्छ्वास ) करता, अतः यह आत्मा ही सबको आनन्दित करता है ) ' सैषा ० ' ( यह आनन्दका विचार होता है ) ' एतम ० ' ( विद्वान् उस आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है ) ' आनन्दं ब्रह्मणो ० ' ( ब्रह्म के आनन्दको जाननेवाला किसीसे भयभीत नहीं होता ) ' आनन्दो ० ' ( आनन्द ब्रह्म है, ऐसा भृगुने जाना ) ऐसा श्रुति कहती है । ' विज्ञानम ० ' ( विज्ञान आनन्द ब्रह्म है ) इसप्रकार अन्य श्रुतिमें भी ब्रह्ममें ही आनन्द शब्द देखा गया है । इस तरह आनन्द शब्दका ब्रह्ममें बहुत वार अभ्यास होनेसे आनन्दमय आत्मा ब्रह्म है । ऐसा ज्ञात होता है । जो यह कहा गया है कि अन्नमयादि अमुख्य आत्मा के प्रवाहमें पठित होनेसे - आनन्दमय भी अमुख्य आत्मा है । यह दोष नहीं है, क्योंकि आनन्दमय सबके आन्तर है । मुख्य आत्माका ही उपदेश सत्यानन्दी - दीपिका तथा प्राचुर्य ( बहुत ) है गत ' ईक्षिति ' अधिकरणमें गौण और मुख्य ईक्षण दोनोंके तुल्य न होनेसे संशय नहीं होता, क्योंकि गौण प्राय पाठ निश्चायक नहीं होता । परन्तु यहाँ ' आनन्दमय ' में तो मयट् प्रत्यय विकार और प्राचुर्यं दोनोंमें मुख्य होनेसे संशय होनेपर अन्नमयादि विकारोंके प्रवाह में आनन्द-. मयका पाठ होनेसे यह निश्चय होता है कि आनन्दका विकार जीव आनन्दमय है । इस प्रकार प्रत्यु -दाहरण संगति से ' किं तावत् ' से पूर्वपक्ष करते हैं अब पूर्वपक्षी पर कोई शङ्का करते हैं – सर्वान्तर होनेसे आनन्दमय मुख्य आत्मा ही है । पूर्वपक्षी ' न स्यात् ' आदिसे कहता है । * यहां आनन्दमय शब्दसे परमात्माका ही ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि उसमें अनेक वार आनन्द शब्दका प्रयोग किया गया हैं । यद्यपि आनन्दशब्द वार वार ब्रह्ममें प्रयुक्त है तो इससे आनन्दमय शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता है तो भी ' वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत ' जैसे यहां ज्योतिष्टोमके प्रकरण में पठित ' ज्योति ' शब्दका अर्थ ज्योतिष्टोम है, वैसे ही आनन्दमयके प्रकरण में पठित आनन्दपद भी आनन्दमयका वाचक है, इसलिए आनन्दशब्दका अभ्यास आनन्दमयमें ब्रह्मत्वका साधक है । * ‘ आनन्दमयः मुख्यात्माभवितुमर्हति सर्वान्तरत्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा अन्नमयादि ' ' आनन्दमय मुख्य आत्मा हो सकता है, क्योंकि वह सर्वान्तर है, जो सर्वान्तर नहीं है वह आत्मा नहीं हो सकता जैसे अन्नमयादि । ' इस अनुमान से भी आनन्दमय मुख्य आत्मा सिद्ध होता है ॥ १२ ॥
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१०४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ मुख्यमेव ह्यात्मानमुपदिदिक्षु शास्त्रं लोकबुद्धिमनुसरत्, अन्नमयं शरीरमनात्मानमत्यन्त-मूढानामात्मत्वेन प्रसिद्धमनूद्य मूषानिषिक्तद्रुतताम्रादिप्रतिमावत्ततोऽन्तरं ततोऽन्तर-मित्येवं पूर्वेण पूर्वेण समानमुत्तरमुत्तरमनात्मानमात्मेति ग्राहयत्, प्रतिपत्तिसौकर्यापेक्षया सर्वान्तरं मुख्यमानन्दमयमात्मानमुपदिदेशेति लिष्टतरम् । यथारुन्धतीनिदर्शने बह्वीष्वपि तारास्वमुख्यास्वरुन्धतीषु दर्शितासु याऽन्त्या प्रदर्श्यते सा मुख्यैवारुन्धती भवति, एवमिहाप्यानन्दमयस्य सर्वान्तरत्वान्मुख्यमात्मत्वम् । यत्तु वृषे, प्रियादीनां शिरस्त्वादिकल्पनाऽनुपपन्ना मुख्यस्यात्मन इति, अतीतानन्तरोपाधिजनिता सा, न स्वाभाविकीत्यदोषः । शारीरत्वमत्यानन्दमयस्यान्नमयादिशरीर परम्परया प्रदर्यमा -नत्वात्, न पुनः साक्षादेव शारीरत्वं संसारिवत्, तस्मादानन्दमयः पर एवात्मा ॥१२ ॥
विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ॥ १३ ॥
पदच्छेद - विकारशब्दात् न, इति } चेत्, न, प्राचुर्यात् । सूत्रार्थ - ( विकारशब्दात् मयट् प्रत्यय विकारार्थका वाचक है, अत: ( न ) ब्रह्म आनन्दमय शब्दका अर्थ नहीं है । ( इति चेन्न ) ऐसा यदि कहो तो यह ठीक नहीं है, ( प्राचुर्यात् ) कारण कि प्राचुर्यार्थमें मयट् प्रत्ययका विधान है, अतः आनन्दमय परमात्मा ही है । * अन्नाह – नानन्दमयः पर आत्मा भवितुमर्हति । कस्मात्? विकारशब्दात् । प्रकृतिवचनादयमन्यः शब्दो विकारवचनः समधिगतः, आनन्दमय इति मयटोविकारार्थ-त्वात् । तस्मादन्नमयादिशब्दवहि कार विषय एवानन्दमयशब्द इति चेत्, नः प्राचुर्यार्थेऽपि मयटः स्मरणात् । ' तत्प्रकृतवचने मयटू ' ( पा ० ५/४/२१ ) इति हि प्रचुरतायामपि मयट् स्मर्यते । करने की इच्छावाले शास्त्रने लोकबुद्धिका अनुसरण कर अत्यन्त मूढ पुरुषोंमें आत्मरूप से प्रसिद्ध अनात्मा अन्नमय शरीरका अनुवादकर सांचेमें ढाले हुए द्रवीभूत ताम्बे आदिकी प्रतिमाके समान उसके अभ्यन्तर, उसके अभ्यन्तर इस प्रकार पूर्व- पूर्वके समान उत्तर, उत्तर अनात्माका आत्मरूप से ग्रहण कराके अनन्तर ज्ञान सौकर्यकी अपेक्षा सबके आन्तर मुख्य आनन्दमय आत्माका उपदेश किया है, यह सर्वथा युक्त है । जैसे अरुन्धती दृष्टान्तमें बहुत अमुख्य ताराओं ( नक्षत्रों ) को अरुन्धती रूपसे दिखलाए जाने पर जो अन्तका तारा दिखलाया जाता है वह मुख्य अरुन्धती ही होता है, वैसे ही यहाँ आनन्दमय सबके आन्तर होने के कारण मुख्य आत्मा ही है । किन्तु यह जो कहते हो कि मुख्य आत्माके प्रियादिमें शिरस्त्वादिकी कल्पना अयुक्त है, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि आनन्दमय से पूर्व एवं मनोमय के पश्चात् विज्ञानमय उपाधि से वह कल्पना उत्पन्न हुई है स्वाभाविक नहीं है । आनन्दमयका शारीरत्व भी अन्नमयादि शरीर परम्परासे दिखलाया गया है । संसारीके समान साक्षात् शारीरत्व नहीं है, अतः आनन्दमय परमात्मा ही है ॥ १२ ॥
यहाँ पूर्वपक्षी कहता है कि आनन्दमय परमात्मा नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ विकार वाचक ' मयट् ' प्रत्ययका प्रयोग किया गया है, इसलिए प्रकृति वचन आनन्दसे भिन्न यह शब्द विकार वाचक जाना गया है, कारण कि ' आनन्दमय ' इसमें मयट् विकारार्थक है । अतः अन्नमयादि शब्द के समान आनन्दमय शब्द भी विकारार्थक ही है । ऐसा यदि कहो तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि प्राचुर्यार्थमें भी ' मयट् ' का प्रयोग होता है । ' तत्प्रकृत ० ' ( प्राचुर्य से प्रस्तुत जो प्रकृत तद्वाचक शब्दसे मयट् प्रत्यय सत्यानन्दी - दीपिका * ' मयड्वैतयोर्भाषायामभक्षाऽऽच्छादनयो: ' ( पा ० ४।३।१४३ ) इस सूत्र से प्रकृति मात्रमें विकार और अवयवके अर्थ में मयट् प्रत्ययका विकल्पसे विधान किया गया है । अत: इस सूत्र के
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अधि ० ६ सू ० १४-१५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १०५ यथा ‘ अब्रमयो यज्ञ ' इत्यन्नप्रचुर उच्यते, एवमानन्दप्रचुरं ब्रह्मानन्दमय उच्यते । आनन्द-प्रचुरत्वं च ब्रह्मणो मनुष्यत्वादारभ्य तस्मिन्नुत्तरस्मिन्स्थाने शतगुण आनन्द इत्युक्त्वा
ब्रह्मानन्दस्य निरतिशयत्वावधारणात् । तस्मात्प्राचुर्यार्थे मयट् ॥ १३ ॥
तद्धेतुव्यपदेशाच्च ॥ १४ ॥
पदच्छेद - तद्धेतुव्यपदेशात्, च । सूत्रार्थ - ' एष ह्येवानन्दयाति ' इस श्रुतिमें सब जीवोंके आनन्द के प्रति ब्रह्म ही कारण कहा गया है, अतः आनन्दमय परमात्मा ही है । इतश्च प्राचुर्यार्थे मयट् । यस्मादानन्द हेतुत्वं ब्रह्मणो व्यपदिशति श्रुतिः - ' एष ह्येवा-नन्दयाति ' इति । आनन्दयतीत्यर्थः । यो हान्यानानन्दयति स प्रचुरानन्द इति प्रसिद्धं भवति । यथा लोके योऽन्येषां धनिकत्वमापादयति स प्रचुरधन इति गम्यते, तद्वत् तस्मात्प्राचुर्यार्थेऽपि मयटः संभवादानन्दमयः पर एवात्मा ॥१४ ॥
मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॥ १५ ॥
पदच्छेद - मान्त्रवणिकम्, एव, च, गीयते । सूत्रार्थ - ( मान्त्रवणिकमेव च ) ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इस मन्त्र में ( गीयते ) ' अन्योऽन्तर आत्मानन्दमय: ' इस ब्राह्मणवाक्यमें कथन है, क्योंकि आनन्दमय परमात्मा ही है । * इतश्चानन्दमयः पर एवात्मा । यस्मात् ' ब्रह्मविदाप्नोति परम् ' निर्धारित ब्रह्मका ही वही प्रकृत है, अतः इत्युपक्रम्य ‘ सत्यं होता है ) इस सूत्र से प्राचुर्यार्थमें भी मयट् प्रत्यय होता है । जैसे अन्न प्रचुर याग अन्नमय यज्ञ कह-लाता है, वैसे ही आनन्द प्रचुर होनेसे ब्रह्म आनन्दमय कहा जाता है । मनुष्यसे लेकर उत्तरोत्तर स्थान में सौ - सौ गुना आनन्द है यह कहकर ब्रह्मानन्द निरतिशय है ऐसा निश्चय होनेसे ब्रह्म आनन्द-प्रचुर है । इस कारण प्राचुर्यार्थमें मयट् प्रत्यय है ॥ १३ ॥
और इसकारण मी मयट् प्रचुर अर्थ में है, क्योंकि ' एष ह्येवानन्दयाति ' ( निश्चय यही आनन्द देता है ) यह श्रुति ब्रह्मको आनन्दका हेतु कहती है | आनन्दयाति अर्थात् आनन्दयति - आनन्द देता है ऐसा अर्थ है । जो अन्योंको आनन्द देता है वह प्रचुर आनन्द है यह प्रसिद्ध है । जैसे लोकमें जो अन्य निर्धन पुरुषोंको धनी बना देता है वह प्रचुरधन युक्त है, ऐसा ज्ञात होता है । इसकारण प्राचुर्यार्थमें भी मयट्का प्रयोग सम्भव है, अतः आनन्दमय परमात्मा ही है ॥ १४ ॥
और इस कारण भी आनन्दमय परमात्मा ही है, क्योंकि ' ब्रह्मविदा ० ' [ ब्रह्मवित् परब्रह्मको सत्यानन्दी - दीपिका अभिप्रायसे पूर्वपक्षी ' आनन्दस्य विकार: ' ऐसा विग्रहकर कहता है कि यह मयट् प्रत्यय विकारार्थक है । इसलिए आनन्दके विकार जीवात्माका यहाँ ग्रहण करना चाहिए । परन्तु यह कथन युक्त नहीं है, क्योंकि ' तत्प्रकृत ' इस पाणिनीय सूत्रसे प्राचुर्य अर्थमें भी मयट्का विधान है । अतः आनन्द प्रचुर होनेसे ब्रह्म आनन्द प्रचुर कहा जाता है । परन्तु यहाँ दुःख लवको लेकर मानन्द प्राचुर्यं नहीं कहा गया है; किन्तु सुख लवको लेकर, क्योंकि ' सैषानन्दस्य मीमांसा भवति ' ( तैत्ति ० २।८।१ ) ' ते ये शतं प्रजापतेरानन्दः ' ( तैत्ति ० २२८१४ ) ( पूर्वोक्त आनन्दसे प्रजापतिके जो सौ आनन्द हैं, वह ब्रह्माका एक आनन्द है ) इसप्रकार तैत्तिरीय श्रुतिने मनुष्यसे लेकर हिरण्यगर्भ पर्यन्त क्रमशः सौ सौगुना उत्तरोत्तरं आनन्दको कहकर ब्रह्म निरतिशय आनन्द है ऐसा कहा है, इसलिए यहाँ प्रचुर अर्थमें ही मयट् प्रत्ययका प्रयोग है ॥ १३ ॥
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१०६ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाय्य [ अ ० १ पा ० १ ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तै ०२।१ ) इत्यस्मिन्मन्त्रे यत्प्रकृतं ब्रह्म सत्यज्ञानानन्तविशेषणैर्निर्धारितम्, यस्मादाकाशादिक्रमेण स्थावरजङ्गमानि भूतान्यजायन्त, यच्चभूतानि सृष्ट्रा तान्यनुप्रविश्य गुहायामवस्थितं सर्वान्तरं यस्य विज्ञानाय ' अन्योऽन्तर आत्माऽन्योऽन्तर आत्मा ' इति प्रक्रान्तम्, तन्मान्त्रवर्णिकमेव ब्रह्मेह गीयते ' अन्योऽन्तर आत्मानन्दमय: ' ( तै ० २।५ ) इति । मन्त्रब्राह्मणयोश्चैकार्थत्वं युक्तम्, अविरोधात् । अन्यथा हि प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रिये स्याताम् । न चान्नमयादिभ्य इवानन्दमयादन्योऽन्तर आत्माऽभिधीयते । एतन्निष्ठैव च
' सैषा भार्गवी वारुणी विद्या ' ( तै ० ३।६ ) तस्मादानन्दमयः पर एवात्मा ॥ १५ ॥ ॥
नेतरोऽनुपपत्तेः ॥ १६ ॥
पदच्छेद - न, इतरः, अनुपपत्तेः । सूत्रार्थ - ( इतर: ) जीव ( न ) आनन्दमय नहीं है । ( अनुपपत्तेः ) क्योंकि ' सोऽकामयत ' इसप्रकार सृष्टिसे पहले श्रूयमाण कामयितृत्व आदि धर्मोकी उसमें उपपत्ति नहीं है । अतः आनन्दमय परमात्मा ही है । इतश्चानन्दमयः पर एवात्मा, नेतरः । इतर ईश्वरादन्यः संसारी जीव इत्यर्थः । न जीव आनन्दमयशब्देनाभिधीयते । कस्मात्? अनुपपत्तेः । आनन्दमयं हि प्रकृत्य श्रूयते-' सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । इदमसृजत । यदिदं किञ्च ' ( तै ० २।६ ) इति । तत्र प्राक्शरीराद्युत्पत्तेरभिध्यानं, सृज्यमानानां च विकाराणां स्रष्टुव्यतिरेकः 9 सर्वविकार सृष्टिश्च न परस्मादात्मनोऽन्यत्रोपपद्यते ॥ १६ ॥
प्राप्त होता है ऐसा आरम्भकर ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इस मन्त्रमें सत्य, ज्ञान और अनन्त रूप विशेषणोंसे जो प्रकृत ब्रह्म निर्धारित है, जिससे आकाशादि क्रमसे स्थावर और जंगम भूत उत्पन्न हुए हैं तथा जो भूतोंको उत्पन्नकर उनमें प्रवेशकर बुद्धिरूप गुहामें अवस्थित और सबके अन्तर है और जिसके ज्ञानके लिए ' दूसरा अन्तर आत्मा है, दूसरा अन्तर आत्मा है ' ऐसा वर्णन किया है । पूर्व मन्त्रमें वर्णित वह ब्रह्म ही यहाँ ' अन्योऽन्तर आत्मानन्दमय: ' इस श्रुतिमें कहा गया है । मन्त्र और ब्राह्मणका एकार्थत्व होना युक्त है, क्योंकि उनमें विरोध नहीं है । अन्यथा - दोनों को एकार्थक न मानें तो प्रकृतहान और अप्रकृतप्रक्रियाकी कल्पना ( प्रकृत अर्थको छोड़कर अप्रकृत अर्थक कल्पना ) प्रसक्त होगी । जैसे अन्नमयादिसे अन्य आत्माका अभिधान है, वैसे आनन्दमय से अन्य आत्माका अभिधान नहीं किया गया है । ' सैषा ० ' ( यह जो भृगुको वरुणद्वारा प्राप्त विद्या है वह मी आनन्दमय में ही पर्यवसित है ) अतः आनन्दमय परमात्मा ही है ॥ १५ ॥
और इसकारण भी आनन्दमय परमात्मा ही है इतर नहीं । इतर अर्थात् ईश्वरसे अन्य संसारी जीव, ऐसा अर्थ है | आनन्दमय शब्दसे जीवका अभिधान नहीं है, क्योंकि उसमें आनन्द-मयत्वको उपपत्ति नहीं है । आनन्दमयको प्रस्तुतकर ' सोऽकामयत ० ' ( उसने कामना की कि मैं बहुत हो जाऊँ उत्पन्न होऊँ उसने तप किया, उसने तप कर यह जो कुछ है वह सब उत्पन्न किया ) ऐसी श्रुति है । इस श्रुतिमें प्रतिपादित शरीरादिकी उत्पत्ति के पहले कामना, सृज्यमान विकारोंका स्रष्टासे अभेद एवं सब विकारोंकी सृष्टि यह सब परमात्मासे अन्यमें उपपन्न नहीं होता ॥ १६ ॥
सत्यानन्दी I - दीपिका * प्रथम सूत्रोंसे लिङ्गरूप वेदान्त वाक्योंको लेकर आनन्दमय ब्रह्म कहा गया है । अब प्रकरणको लेकर कहा जाता है - ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ' यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ' इत्यादि मन्त्रों में प्रतिपादित ब्रह्म ही ' अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः ' इस ब्राह्मण वाक्य में कहा गया है । इसप्रकार मन्त्र और ब्राह्मण वाक्य एकार्थक हैं, क्योंकि दोनोंमें विरोध नहीं है । इसलिए आनन्दमय परमात्मा ही है ॥ १५ ॥