श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 141–150

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 141–150

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अधि ० ६ सू ० १७ ]. भापानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित १०७ भेदव्यपदेशाच्च ॥ १७ ॥

पदच्छेद – भेदव्यपदेशात्, च । सूत्रार्थ - और ' रसह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति ' यह श्रुति जीव और आनन्दभयका भेदसे व्यपदेश करती है, अतः आनन्दमय परमात्मा ही है । * इतश्च नानन्दमयः संसारी, यस्मादानन्दमयाधिकारे — ' रसो वै सः । रसह्येवायं लब्ध्वाऽनन्दी भवति ' ( तै ० २७ ) इति जीवानन्दमयौ भेदेन व्यपदिशति । नहि लब्धैव लब्धव्यो भवति । कथं तर्हि ' आत्मान्वेष्टव्यः ', ' आत्मलाभान्न परं विद्यते ' इति श्रुतिस्मृती? यावता न लब्धैव लब्धव्यो भवतीत्युक्तम् ॥ वाढम् तथाप्यात्मनोऽप्रच्युतात्मभावस्यैव सतस्तत्त्वानवबोधनिमित्तो मिथ्यैव देहादिष्वनात्मस्वात्मत्वनिश्चयो लौकिको दृष्टः । तेन देहादिभूतस्यात्मनोऽप्यात्माऽनन्विष्टोऽन्वेष्टव्योऽलब्धो लब्धव्योऽश्रुतः श्रोतव्योमतो मन्तव्योऽविज्ञातो विज्ञातव्य इत्यादिभेदव्यपदेश उपपद्यते । प्रतिषिध्यत एव तु पर-मार्थः सर्वज्ञात्परमेश्वरादन्यो द्रष्टा श्रोता वा ' नान्योऽतोऽस्ति दृष्टा ' ( वृ ० ३।७।२३ ) इत्यादिना । परमेश्वरस्त्वविद्याकल्पिताच्छारी रात्कर्तुर्भोक्तुर्विज्ञानात्माख्यादन्यः । यथा मायाविनश्चर्म इस कारण भी आनन्दमय संसारी नहीं है, क्योंकि आनन्दमयके प्रकरणमें ' रसो वै ० ' ( निश्चय, वह रस है, इसको पाकर ही यह जीव आनन्दी होता है ) यह श्रुति जीव और आनन्दमयका भेदसे व्यपदेश करती है । जब लब्धा हीं लब्धव्य नहीं होता, तब ' आत्मान्वेष्टव्यः ० ' ( आत्माकी खोज करनी चाहिए ) ' आत्मलाभाज ० ' ( आत्मला ससे बढ़कर कुछ नहीं है ) यह श्रुति और स्मृति कैसे उपपन्न होंगी? जब कि लब्धा ही लब्धव्य नहीं होता, ऐसा कहा गया है । यद्यपि यह ठीक है, तथापि ( अभेद होनेपर भी ) जिस आत्माका आत्मभाव नष्ट नहीं हुआ है अर्थात् अखण्ड एकरस आत्माके यथार्थ स्वरूपके अज्ञानके कारण देहादि अनात्मपदार्थ में भ्रमरूप आत्मत्व निश्चय लोक में देखा गया है । उस ( मिथ्याज्ञान ) से देहादिरूप आत्माका भी आत्मा अनन्विष्ट होता हुआ अन्वे-ष्टव्य, अलब्धा होता हुआ लब्धव्य, अश्रुत होता हुआ श्रोतव्य, अमत होता हुआ मन्तव्य, अविज्ञात होता हुआ विज्ञातव्य है इत्यादि भेद व्यपदेश युक्त ही है । परमार्थते तो सर्वज्ञ परमेश्वर से अन्य द्रष्टा, श्रोताका ' नान्योऽत ० ' ( उस परमेश्वरसे अन्य द्रष्टा नहीं है ) इत्यादि श्रुतिसे प्रतिषेध किया जाता है । परमेश्वर तो अविद्यासे कल्पित शारीर कर्ता, भोक्ता विज्ञानात्मासे अन्य है । जैसे ढाल और खड्ग सत्यानन्दी - दीपिका * ' रसो चै सः ' आदि श्रुतिमें प्रकृत आनन्दमयको ' सः ' ( वह ) शब्द से कहा गया है और इस रसरूप आनन्दमयको प्राप्त करने वाला जीव है । इसलिए लब्धा जीव लब्धव्य आनन्दमय परमात्मा कदापि नहीं हो सकता । यदि लब्धा और लब्धव्य में मेद मानें तो ' आत्मान्वेष्टव्यः ' ' आत्मलाभान्न परं विद्यते इत्यादि श्रुति, स्मृतिका बाध होगा अर्थात् लब्धा और लब्धव्य दोनोंके अभेदमें ही ये संगत होती हैं अन्यथा नहीं । यह ठीक है, परन्तु आत्मा ही आत्मासे लभ्य है यह कथन तो अभेद में ठीक नहीं है, अतः मानना होगा कि यह सब कथन कल्पित भेदको लेकर है । अखण्ड एक रस चिद्रूप आत्माका ' मैं आत्मा हूँ ' इसप्रकार यथार्थ ज्ञान न होनेके कारण अनात्मदेहादिमें ' मैं मनुष्य हूँ '. ऐसा अज्ञानसे भ्रमरूप आत्मत्व निश्चय होनेपर अपनेको परमात्मासे भिन्न समझता है । इसप्रकार अभिन्न सद्रूप आत्मामें जीव और ईश्वरके कल्पित भेदको लेकर लब्धा और लब्धव्यादि श्रुति, स्मृति -में कहे गये हैं । अतः जीव और आनन्दमयका पारमार्थिक अभेद होनेपर भी कोई दोष नहीं है । * शंका — ‘ नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' इत्यादि श्रुतिके आधारपर यदि परमेश्वरसे जीव भिन्न नहीं है तो मिथ्या जीवके साथ अभेद होनेके कारण परमेश्वर भी मिथ्या हो जायगा? समाधान - जैसे

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१०८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ खङ्गधरात्सूत्रेणाकाशमधिरोहतः स एव मायावी परमार्थरूपो भूमिष्ठोऽन्यः । यथा वा घटाकाशादुपाधिपरिच्छिन्नादनुपाधिर परिच्छिन्न आकाशोऽन्यः । ईदृशं च विज्ञानात्म-परमात्मभेदमाश्रित्य ' नेतरोऽनुपपत्तेः ', ' भेदव्यपदेशाच्च ' इत्युक्तम् ॥ १७ ॥

कामाच्च नानुमानापेक्षा ॥ १८ ॥

पदच्छेद - कामात् च, न, अनुमानापेक्षा: सूत्रार्थ - ( कामात् ) ' सोऽकामयत ' इसप्रकार कामयितृत्वका श्रवण है, अतः ( नानुमाना-पेक्षा ) अनुमानगम्य प्रधानकी आनन्दमय शब्द से अपेक्षा नहीं हो सकती । आनन्दमयाधिकारे च ' सोऽकामयत ' बहु स्यां प्रजायेय ' ( तै ० २।६ ) इति कामयितृत्व-निर्देशान्नानुमानिकमपि सांख्यपरिकल्पितमचेतनं प्रधानमानन्दमयत्वेन कारणत्वेन वाऽ-पेक्षितव्यम् । ' ईक्षतेनशब्दम् ' ( ब ० १।१।५ ) इति निराकृतमपि प्रधानं पूर्वसूत्रोदाहृतां कामयितृत्वश्रुतिमाश्रित्य प्रसङ्गात्पुनर्निराक्रियते गतिसामान्यप्रपञ्चनाय ॥ १८ ॥

अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १ ९ ॥ पदच्छेद - अस्मिन् अस्य, च, तद्योगम्, शास्ति । सूत्रार्थ - ' यदा ह्येवैष ' इत्यादि श्रुति ( अस्मिन् ) इस प्रकृत आनन्दमय आत्मामें ( अस्य ) प्रतिबुद्ध जीवकी ( तद्योगम् ) तद्भावापत्ति- मुक्तिका ( शास्ति ) उपदेश करती है, इसलिए जीव अथवा प्रधान आनन्दमय नहीं है, किन्तु परमात्मा ही है । इतश्च न प्रधाने जीवे वानन्दमयशब्दः । यस्मादस्मिन्नानन्दमये प्रकृत आत्मनि प्रतिबुद्धस्याऽस्य जीवस्य तद्योगं शास्ति । तदात्मना योगस्तद्योगः, तद्भावापत्तिः, मुक्ति-रित्यर्थः । तद्योगं शास्ति शास्त्रम् ' यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां धारणकर सूत्रद्वारा आकाशमें आरुढ मायावी नटसे भूमिस्थ परमार्थरूप वही मायावी भिन्न है । अथवा जैसे घटरूप उपाधिसे परिच्छिन्न आकाशसे उपाधि रहित महाकाश भिन्न है, वैसे ही विज्ञानात्मा और परमात्माके कल्पित भेदका आश्रयणकर ' नेतरोऽनुपपत्तेः ' ' भेदव्यपदेशाच्च ' ये सूत्र कहे गये हैं ॥ १७ ॥

और आनन्दमयके प्रकरण में ' सोऽकामयत ० ' ( उसने कामना की बहुत होऊँ उत्पन्न होऊँ ) इसप्रकार कामयितृत्वका निर्देश होनेसे अनुमानगम्य सांख्य परिकल्पित अचेतन प्रधान भी आनन्द-मयरूपसे अथवा कारणरूपसे अपेक्षितव्य ग्राह्य नहीं है । ' ईक्षतं ० ' इस सूत्रसे यद्यपि प्रधानका निराकरण किया गया है, तो भी सब वेदान्तवाक्यों से अवगति ( कारणज्ञान ) समान है ऐसा विस्तारसे दिखलानेके लिए पूर्वसूत्र ( ईक्षतेर्नाशब्दम् ) में उदाहृत कामयितृत्व श्रुतिको लेकर प्रसंगसे पुनः निराकरण किया जाता है ॥ १८ ॥

इस कारण भी प्रधानमें अथवा जीवमें आनन्दमय प्रयोग नहीं हो सकता, क्योंकि शास्त्र इस प्रतिबुद्ध जीवका इस प्रकृत आनन्दमय आत्मामें तद्योग - अभेद बतलाता है । तद्रूपसे योग तद्योग-तद्भावापत्ति अर्थात् मुक्ति ऐसा अर्थ है । ' यद्वा ह्येवैष ० ' ( जब यह साधक इस अदृश्य, अशरीर, अनिर्वाच्य और निराधार ब्रह्ममें अभयस्थिति प्राप्त करता है तब वह अभयको प्राप्त हो जाता है, जब सत्यानन्दी - दीपिका शुक्तिमें आरोपित रजत शुक्तिसे भिन्न नहीं है तथा आरोपित रजत से अभिन्न होनेपर भी शुक्ति मिथ्या नहीं है, क्योंकि शुक्ति आरोपित रजतका अधिष्ठान होनेसे उससे भिन्न है, वैसे ही अविद्या में प्रति-बिम्बरूपसे कल्पित जीवसे परमेश्वर भिन्न है, इससे वह मिथ्या नहीं है । यद्यपि कल्पित वस्तु अधि-ष्ठानने भिन्न नहीं होती, फिर भी अधिष्ठानका उससे भेद है ॥ १७ ॥

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अधि ० ६ सू ० १ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १० ९ विन्दते । अथ सोऽभयं गतो भवति । यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते । अथ तस्य भयं भवति ' ( तै ० २।७ ) इति । एतदुक्तं भवति - यदेतस्मिन्नानन्दमयेऽल्पमप्यन्तरमतादात्म्यरूपं पश्यति तदा संसारभयान्न निवर्तते । यदा त्वेतस्मिन्नानन्दमये निरन्तरं तादात्म्येन प्रतितिष्ठति तदा संसारभयान्निवर्तत इति । तच्च परमात्मपरिग्रहे घटते, न प्रधानपरिग्रहे जीवपरिग्रहे वा । तस्मादानन्दमयः परमात्मेति स्थितम् । इदं त्विह वक्तव्यम् -'स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः ' । ‘ तस्माद्वा एतस्मादन्तरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः ' तस्मात् ' अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः ' तस्मात् ' अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः ' ( तै ० २२१,२,३,४ ) इति च विकारार्थे मयट् प्रवाहे सत्यानन्दमय एवाकस्मादर्धजरतीयन्यायेन कथमिव मयटः प्राचुर्यार्थित्वं ब्रह्मविषयत्वं चा-श्रीयत इति? मान्त्रवर्णिकब्रह्माधिकारादिति चेत् - नः अन्नमयादीनामपि तर्हि ब्रह्मत्व-प्रसङ्ग । अत्राह - – युक्तमन्नमयादीनामब्रह्मत्वं तस्मात्तस्मादान्तरस्यान्तरस्यान्यस्यान्य-स्यात्मन उच्यमानत्वात्; आनन्दमयात्तु न कश्चिदन्य आन्तर आत्मोच्यते, तेनानदमयस्य ब्रह्मत्वम्, अन्यथा प्रकृतहान प्रकृतप्रक्रियाप्रसङ्गादिति । अत्रोच्यते - यद्यप्यन्नमयादिभ्य इवानन्दमयादन्योऽन्तर आत्मेति न श्रूयते, तथापि नानन्दमयस्य ब्रह्मत्वं यत आनन्दमयं प्रकृत्य श्रूयते — ' तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । यह उस ब्रह्ममें थोड़ी सी भी भेददृष्टि करता है तब इसे मय प्राप्त होता है ) यह शास्त्र तद्योग ( अभेद ) का उपदेश करता है । इसका तात्पर्य यह है कि जब इस आनन्दमय परमात्मामें किञ्चित्. भी भेद अतादात्म्यरूप देखता है तब संसारभयसे निवृत्त ( मुक्त ) नहीं होता, जब इस आनन्दमयमें निरन्तर तादात्म्यरूपसे प्रतिष्ठित होता है तब संसारभयसे निवृत्त हो जाता है | श्रुतिका यह तात्पयं आनन्दमयशब्दसे परमात्माका ग्रहण करनेपर ही घटता है । प्रधानका परिग्रह अथवा जीवका परिग्रह करने में नहीं घटता । इससे यह सिद्ध होता है कि आनन्दमय परमात्मा है । परन्तु यहाँ यह कहना चाहिए कि ' स वा एष ० ' ( वह पुरुष अन्न रसमय है ) ' तस्माद्वा ० ), ( उस अन्न रसमय स्थूल शरीरसे अन्य आन्तर आत्मा प्राणमय है ) ' तस्मादन्यो ० ' ( उससे अन्य आन्तर आत्मा मनोमय है ) ' तस्मादन्यो ० ', ( उससे अन्य आन्तर आत्मा विज्ञानमय है ) इस प्रकार विकारार्थक मयट् प्रवाह में विना किसी कारण अर्धजरतीय न्यायसे + आनन्दमय में मयट् प्रत्यय प्राचुर्यार्थक है और आनन्दमय ब्रह्म विषयक है यह कैसे आश्रय लेते हो? यदि कहो कि मन्त्रमें वर्णित ब्रह्मके प्रकरण होनेसे ऐसा लिया गया है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर तो अन्नमयादिमें भी ब्रह्मत्व प्रसङ्ग होगा । वृत्तिकार इसपर कहते हैं - अन्नमयादि ब्रह्म नहीं है यह युक्त है, क्योंकि उससे आन्तर अन्य, उससे आन्तर अन्य, इस प्रकार आत्मा कहा गया है, किन्तु आनन्दमयके आन्तर अन्य कोई आत्मा नहीं कहा गया है, इससे आनन्दमय ब्रह्म है, अन्यथा प्रकृतकी हानि और अप्रकृत प्रक्रियाकी प्रसक्ति होगी । सिद्धान्ती-इसपर कहते हैं —–— यद्यपि अन्नमयादिके समान आनन्दमय से अन्य आन्तर आत्मा ऐसा श्रुति नहीं कहती, तो भी आनन्दमय ब्रह्म नहीं है, क्योंकि आनन्दमयको प्रस्तुतकर ' तस्य प्रियमेव शिरः ० ' ( प्रिय ही उसका शिर है, मोद दक्षिण पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष है, आनन्द आत्मा है ब्रह्म पुच्छ सत्यानन्दी - दीपिका * अब भगवान् भाष्यकार ' इदं त्विह वक्तव्यम् ' आदि भाष्यसे वृत्तिकारके मतका खण्डन करते हैं । + टि ० - जैसे एक ही स्त्रीका कुछ भाग युवती और कुछ भाग वृद्धा होना अयुक्त है, वैसे ही प्रकारणमें भी एक ही मयट् प्रत्ययका कहीं विकार और कहीं प्रचुर अर्थ मानना अयुक्त है I

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११० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० पा ० १ ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' ( तै ० २१५ ) इति । तत्र यद्ब्रह्म मन्त्रवर्णे प्रकृतम् - ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इति, तदिह ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इत्युच्यते । तद्विजिज्ञापयिषयैवान्नमयादय आनन्दमयपर्यन्ताः पञ्चकोशाः कल्यन्ते । तत्र कुतः प्रकृतहानाऽप्रकृतप्रत्रि. याप्रसङ्गः? 8 नन्वानन्दमय-स्यावयवत्वेन ' ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा ' इत्युच्यते, अन्नमयादीनामिव ' इदं पुच्छं प्रतिष्ठा ' इत्यादि । तत्र कथं ब्रह्मणः स्वप्रधानत्वं शक्यं विज्ञातुम्? प्रकृतत्वादिति ब्रूमः । नन्वानन्दमयाक्यव त्वेनापि ब्रह्मणि विज्ञायमाने न प्रकृतत्वं हीयते, आनन्दमयस्य ब्रह्मत्वादिति । अत्रोच्यते-तथा सति तदेव ब्रह्मानन्दमय आत्माऽवयवी, तदेव च ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठावयव इत्यसा-मञ्जस्यं स्यात् । अन्यतरपरिग्रहे तु युक्तं ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इत्यत्रैव ब्रह्मनिर्देश आश्रयितुं, ब्रह्मशब्दसंयोगात्: नानन्दमयवाक्ये ब्रह्मशब्दसंयोगाभावादिति । अपि ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा ' इत्युक्त्वेदमुच्यते- ' तदप्येष श्लोको भवति । असनेत्र स भवति । असद्ब्रह्मेति वेद् चैत् । प्रतिष्ठा है ) ऐसा श्रुति कहतो है । जो ब्रह्म सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' उस मन्त्र में प्रकृत हैं, वही यहाँ ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' ऐसा कहा जाता है । उसे जानने की इच्छा से ही अन्नमयादि आनन्दमय पर्यन्त पाँच कोशोंकी कल्पना की गई है, तो ऐसी स्थिति में प्रकृतकी हानि और अप्रकृत प्रक्रियाका प्रसङ्ग कैसे होगा? परन्तु जैसे अन्नमयादिके अवयवरूपसे ' इदं पुच्छं प्रतिष्ठा ' ( यह पुच्छ प्रतिष्ठा है ) कहा गया है, वैसे ही आनन्दमय के अवयवरूप से ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' ( ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा हैं ) कहा जाता है, तो उसमें ब्रह्म स्वप्रधान है यह कैसे जाना जा सकता है? ब्रह्म प्रकृत हैं, अतः हम ऐसा कहते हैं । परन्तु आनन्दमयके अवयवरूपसे ब्रह्मके जान लेनेपर भी उसका प्रकृतत्व नष्ट नहीं होता, क्योंकि आनन्द-मय ब्रह्म ही है | सिद्धान्ती - इसपर कहते हैं—– यदि ऐसा माना जाय तो वही ब्रह्म आनन्दमय आत्मा अवयवी और वही ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठारूप अवयव होगा, इससे यह कथन अयुक्त होगा । दोनों में एक्का ग्रहण करें तो ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इसमें ही ब्रह्मनिर्देश आश्रयण करना युक्त है, क्योंकि इस वाक्य में ब्रह्मशब्दका सम्वन्ध है । आनन्दमय वाक्यमें ब्रह्म निर्देश ग्रहण करना युक्त नहीं है, कारण कि उसमें ब्रह्म शब्दका सम्बन्ध नहीं है । किञ्च ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' ऐसा कहकर ' तदप्येष ० ' ( उसमें और यह

श्लोक है, ब्रह्म असत् है ऐसा जो जानता है स्वयं भी वह असत् ही हो जाता है, यदि ऐसा जानता है

कि ब्रह्म है तो ब्रह्मवे लोग उसे सत् समझते हैं ) यह कहा जाता है । इस मन्त्रमें आनन्दमयकी अनुवृत्ति किये बिना ब्रह्म के ही भाव और अभावके ज्ञानसे गुण और दोषका अभिधान है, अत: ' ब्रह्म सत्यानन्दी - दीपिका * वृत्तिकार मतमें आनन्दमयोऽभ्यासात् ' इस सूत्र का यथाश्रुत अर्थ किया गया है, इसलिए आनन्दमयमें मयट् प्रत्ययको प्राचुर्यार्थिक मानकर आनन्दमयको ब्रह्म सिद्ध किया गया है । यद्यपि आनन्दमयका अभ्यास किसी श्रुतिमें नहीं है, किन्तु ' आनन्दं ब्रह्मणो ' ( तै ० २।९ ) ' आनन्द ब्रह्मेति व्यजानात् ' ( तै ० ३।६ ) आदि श्रुतियों में आनन्दका ही अभ्यास है, तो भी सूत्र के अनुसार आनन्दको आनन्दमय परक मानकर आनन्दमय ब्रह्म है ऐसा कहा गया है । भगवान् माष्यकारने इस सूत्रका यथाश्रुत अर्थं न कर लाक्षणिक किया है, अतः आनन्दमयको ब्रह्म न मानकर आनन्दमयकी ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' में लक्षणा की है कि आनन्दमयकें पुच्छ प्रतिष्ठारूपसे जो प्रकृत है वही ब्रह्म है, किन्तु आनन्दमय ब्रह्म नहीं है । इस आशयका स्पष्टीकरण करनेके लिए भगवान् भाष्यकार ' अत्रोच्यते ' इत्यादिसे इस सूत्र की व्याख्या करते हैं । * वृत्तिकारके मतमें इस अधिकरणका विषय वाक्य ' अन्योऽत्तर आत्मानन्दमयः ' है, पहले उसके अनुसार इस अधिकरणकी व्याख्या की गई है । भगवान् भाष्यकारके मत में इस अधिकरणका विषयवाक्य ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' है । इसपर पूर्वपक्षी ' ननु ' आदिसे शंका करते हैं ।

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अधि ० ६ स्क्रू १ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १११ अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद । सन्तमेनं ततो विदुरिति ' ( तै ० २६ ) अस्थि लोकेऽननुभ्यामन्देवयं ब्रह्मण एव भावाभाववेदनयोर्गुणदोषाभिधानाद्गस्यते ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इत्यत्र ब्रह्मण एव स्वप्रधानत्वमिति । न चानन्दमयस्यात्मनो भावाभावशङ्का युक्ताः प्रियमोदादिविशेषस्या-सर्वलोकप्रसिद्धत्वात् । कथं पुनः स्वप्रधानं सद्ब्रह्म, आनन्दमयस्य पुच्छत्वेन नन्दमयस्य निर्दिश्यते— ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इति? नैष दोषः; पुच्छवदुच्छं, प्रतिष्टां परायणमेकनीडं लौकिकस्थानन्दजातस्य ब्रह्मानन्द इत्येतदनेन विवक्ष्यते, नावस्वत्थम्; ' एप्तरयैवानन्दस्या-न्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ' ( बृह ० ४।३।३२ ) इति श्रुत्यन्तरात् । अपि च आनन्दमयस्य ब्रह्मत्वे प्रियाद्यवयवत्वेन सविशेषं ब्रह्माभ्युपगन्तव्यम्, निर्विशेषं तु ब्रह्म वाक्यशेषे श्रूयते; वाङ्मनसयोरगोचरत्वाभिधानात् - ' यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न विभेति कुतश्चनेति ' ( तै ० २।९ ) । अपि च आनन्दप्रचुर इत्युक्तेऽपि दुःखास्ति-त्वमपि गम्यतेः प्रातुर्यस्य लोके प्रतियोग्यल्पत्वापेक्षत्वात् । तथा च सति ' यत्र नान्यच्छ्रुष्योति ' नान्यद्विजानाति स भूमा ' ( ७।२४।१ ) इति भूम्नि ब्रह्मणि तद्व्यतिरिक्ताभावश्रुतिरुपरुध्येत । प्रतिशरीरं च प्रियादिभेदादानन्दमयस्यापि भिन्नत्वम्, ब्रह्म तु न प्रतिशरीरं भिद्यते; ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' ( तैत्ति ० २1१ ) इत्यानन्त्यश्रुतेः, ' एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्व-पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस वाक्यमें ब्रह्मका ही स्वप्रधानत्व ज्ञात होता है | आनन्दमय आत्मा के भाव और अमाव विषयक शंका युक्त नहीं है, क्योंकि प्रिय मोद आदि विशेष युक्त आनन्दमय सर्वलोक प्रसिद्ध है । तो फिर स्वप्रधान होते हुए ब्रह्मका ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस प्रकार आनन्दमयके पुच्छरूपसे निर्देश कैसे किया गया है? यह दोष नहीं है । पुच्छ - पुच्छसदृश, प्रतिष्ठा - वासस्थान अर्थात् लौकिक आनन्द समूहका ब्रह्मानन्द परस्थान- एक अधिष्ठान है इससे यह अर्थ विवक्षित है, किन्तु अवयवरूप अर्थ नहीं; क्योंकि ' एतस्यैव ० ' ( इसी आनन्दके अंशको लेकर अन्य प्राणी जीवित रहते हैं अर्थात् अविद्याद्वारा प्रस्तुत इंद्रिय और विषय के सम्बन्धरो उत्पन्न आनन्दकी मात्राको लेकर अन्य प्राणी आनन्दित होते हैं ) यह दूसरी श्रुति है । और यदि आनन्दमयको ब्रह्म मानें तो उसके प्रियादि अवयवोंके होने से सगुण ब्रह्मको स्वीकार करना होगा, परन्तु वाक्यशेषमें निर्गुण ब्रह्म सुना जाता है, क्योंकि ' यतो वाचो ० ' ( जहाँ से मनके साथ वाणी उसे प्राप्त न कर लौट आती है, ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला किसीसे मयमीत नहीं होता ) इस प्रकार वाणी और मनका अविषय कहा गया है । और ' आनन्द प्रचुर ' ऐसा कहनेपर दुःखका अस्तित्व भी ज्ञात होता है, क्योंकि लोकमें प्राचुर्यको अपने प्रतियोगी अल्पत्वकी अपेक्षा रहती है, ऐसा होनेपर ' यत्र नान्यत्प ० ' ( सनत्कुमार - हे नारद! जहाँ अन्य कुछ नहीं देखता, अन्य कुछ नहीं सुनता, अन्य कुछ नहीं जानता वह भूमा ब्रह्म है ) इस प्रकार भूमा ब्रह्म में उससे अन्य वस्तुके अभावकी प्रतिपादक श्रुति बाधित होगी । प्रत्येक शरीर में प्रियादिके भेदसे आनन्दमय भी भिन्न है, परन्तु ब्रह्म प्रतिशरीर में भिन्न नहीं है, क्योंकि ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' यह आनन्त्य श्रुति है, और ' एको देवः ० ' ( सभी प्राणियोंमें गूढ सर्वव्यापक और सभी भूतोंका अन्तरात्मा एक देव है ) यह सत्यानन्दी - दीपिका ' विप्रमयो ग्रामः ' ( यह ग्राम विप्रप्रचुर है ) जैसे यहाँ ब्राह्मणोंका बाहुल्य अन्यकी अल्पता प्रयुक्त है, वैसे आनन्द प्रचुर ब्रह्म है, इस कथन से ब्रह्ममें आनन्द बहुत और दुःख अल्प सिद्ध होगा । इस तरह यदि ब्रह्ममें अल्प दुःख मानें तो ' यत्र नान्यत्पश्यति ' यह श्रुति बाधित होगी, क्योंकि यह श्रुति आनन्दस्वरूप ब्रह्म दुःखादि द्वैतका निषेध करती है, अतः आनन्दमयका अर्थ आनन्द प्रचुर नहीं, किन्तु अन्नमयादिके समान यहाँ भी मयट्का अर्थ विकार है । अतः आनन्दमय ब्रह्म नहीं है अपितु जीव है । इसलिए प्रियादि वृत्तिभेदसे प्रतिशरीर में आनन्दमय भिन्न - भिन्न है ।

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११२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ भूतान्तरात्मा ' ( श्वे ० ६।११ ) इति च श्रुत्यन्तरात् । नचानन्दमयस्याभ्यासः श्रूयते, प्रातिपदि-कार्थमात्रमेव हि सर्वत्राभ्यस्यते – ' रसो वै सः, रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति को ह्येवा-न्यात्कः प्राण्यात्, यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ' । ' सैषाऽऽनन्दस्य मीमांसा भवित । ' ' आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्वनेति ' ( तै ० २७,८, ९ ) ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ' ( तै ० ६।६ ) इति च । यदि च आनन्दमयशब्दस्य ब्रह्मविषयत्वं निश्चितं भवेत्, तत उत्तरेष्वानन्दमात्र-प्रयोगेष्वप्यानन्दमयाभ्यासः कल्प्येत । नत्वानन्दमयस्यं ब्रह्मत्वमस्ति, प्रियशिरस्त्वादिभि-हेतुभिरित्यवोचाम । तस्माच्छ्रुत्यन्तरे ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ( वृ ० २।९ ।२४ ) इत्यानन्दप्राति-पदिकस्य ब्रह्मणि प्रयोगदर्शनात् । ' यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ' इत्यादिर्ब्रह्मविषयः प्रयोगो नत्वानन्दमयाभ्यास इत्यवगन्तव्यम् । यस्त्वयं मयडन्तस्यैवानन्दशब्दस्याभ्यासः — ‘ एतमा-नन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति ' ( तै ० २।८ ) इति, न तस्य ब्रह्मविषयत्वमस्ति विकारात्मना -मेवान्नमयादीनामनात्मनामुपसंक्रमितव्यानां प्रवाहे पतितत्वात् । * नन्वानन्दमयस्योप-संक्रमितव्यस्यान्नमयादिवदब्रह्मत्वे सति नैव विदुषो ब्रह्मप्राप्तिः फलं निर्दिष्टं भवेत् । नैष दोषः आनन्दमयोपसंक्रमणनिर्देशेनैव पुच्छप्रतिष्ठाभूत ब्रह्मप्राप्तेः फलस्य निर्दिष्टत्वात् । ' तदप्येष श्लोको भवति । यतो वाचो निवर्तन्ते ' इत्यादिना च प्रपंच्यमानत्वात् । या त्वानन्द-मयसंनिधाने ' सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति ' इयं श्रुतिरुदाहृता, सा ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' दूसरी श्रुति भी है । और आनन्दमयके अभ्यासकी श्रुति नहीं है, क्योंकि सर्वत्र प्रातिपदिकार्थं मात्रका अभ्यास है, जैसे कि ‘ रसो बै सः ० ' ( निश्चय वह रस - सार है रसको पाकर ही यह आनन्दी होता है, यदि हृदयाकाशमें स्थित आनन्द रूप आत्मा न होता तो कौन व्यक्ति अपान क्रिया करता और कौन प्राणन क्रिया करता यही तो उन्हें आनन्द देता है, अब इस ब्रह्मके आनन्दकी मीमांसा है, ब्रह्मके आनन्दका अनुभव करनेवाला विद्वान् किसीसे भयभीत नहीं होता ) ' आनन्द ब्रह्म है ऐसा जाने ' इत्यादि श्रुतियोंमें स्पष्ट है । यदि आनन्दमय शब्द ब्रह्म विषयक निश्चित हो तो आगे आनन्दमात्र प्रयोगवाले वाक्योंमें मी लक्षणांसे आनन्दमयके अभ्यासकी कल्पना होती । परन्तु प्रिय शिरस्त्वादि हेतुओंसे आनन्दमय ब्रह्म नहीं है ऐसा हमे कह चुके हैं । इसलिए ' विज्ञानं ० ' ( ब्रह्म विज्ञान स्वरूप और आनन्द स्वरूप है | ) इस दूसरी श्रुतिमें प्रातिपदिक आनन्दशब्दका ब्रह्ममें प्रयोग देखा जाता है, इससे ' यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ' इत्यादि श्रुतिमें ब्रह्म विषयक आनन्दशब्दका प्रयोग है किन्तु आनन्दमयका अभ्यास नहीं है, ऐसा समझना चाहिए । ' एतमानन्दमय ० ' ( इस आनन्दमय आत्माका बाध करता है ) इसमें यह जो मयट् प्रत्ययान्त आनन्द शब्दका अभ्यास है वह ब्रह्म विषयक नहीं है, क्योंकि बाध के योग्य विकारात्मक - अन्नमयादि अनात्मवस्तुओंकी परम्परा में पठित है । परन्तु अन्नमयादिके समान यदि प्राप्तव्य आनन्दमयको ब्रह्म न मानें तो ब्रह्मवित् विद्वान्को ब्रह्मप्राप्ति रूप निर्दिष्ट फल न होगा? सि ० --- यह दोष नहीं है, क्योंकि आनन्दमयके बाधके निर्देशसे ही पुच्छ एवं प्रतिष्ठा भूत ब्रह्मकी प्राप्ति रूप फलका निर्देश है । ‘ तदप्येष ' ( उसमें यह भी मन्त्र है ) ' यतो वाचो निवर्तन्ते ' इत्यादिसे उनका विस्तार किया गया है | आनन्दमयके संनिधान में ' सोऽकामत ' यह जो श्रुति उदाहृत है, वह ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस अत्यन्त संनिहित ब्रह्मके साथ सम्बद्ध होती हुई आनन्दमयमें ब्रह्मत्वका बोध नहीं कराती, सत्यानन्दी - दीपिका * ' आनन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति ' यहाँ संक्रमणका अर्थ बाध है प्राप्ति नहीं, क्योंकि ' एत-मन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति ' इस तरह अन्नमयादिमें भी संक्रमणका अर्थ बाध किया गया है । इससे ' रसो वै सः ' इत्यादि श्रुति वाक्य आनन्दमयको विषय नहीं करते, किन्तु ' ब्रह्म पुच्छं. प्रतिष्ठा ' इस श्रुतिमें प्रतिपादित ब्रह्मको विषय करते हैं, क्योंकि वह संनिहित है, अतः आनन्दमय ब्रह्म नहीं है ।

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अधि ० ६ सू ० १ ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ११३ इत्यनेन संनिहिततरेण ब्रह्मणा संबध्यमाना नानन्दमयस्य ब्रह्मतां प्रतिबोधयति । तदपेक्षत्वा-श्च्चोत्तरस्य ग्रन्थस्य ‘ रसो वै सः ' इत्यादेर्नानन्दमयविषयता । ननुः ' सोऽकायमत ' इति ब्रह्मणि पुंलिङ्ग निर्देशो नोपपद्यते । नायं दोषः ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः ' इत्यत्र पुंलि-ङ्गेनाप्यात्मशब्देन ब्रह्मणः प्रकृतत्वात् । ' या तु भार्गवी वारुणी विद्या ' ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ' इति, तस्यां मयडश्रवणात्, प्रिय शिरस्त्वाद्यश्रवणाच्च युक्तमानन्दस्य ब्रह्मत्वम् । तस्मादणु-मात्रमपि विशेषमनाश्रित्य न स्वत एव प्रियशिरस्त्वादि ब्रह्मण उपपद्यते । नचेह सविशेषं ब्रह्म प्रतिपिपादयिषितं वाङ्मनसगोचरातिक्रमश्रुतेः । तस्मादन्नमयादिष्विवानन्दमयेऽपि विकारार्थ एव मयविज्ञेयो न प्राचुर्यार्थः । सूत्राणि त्वेवं व्याख्येयानि - ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इत्यत्र किमानन्दमयावयवत्वेन ब्रह्म विवक्ष्यत उत स्वप्रधानत्वेनेति । पुच्छशब्दादवयवत्वे-नेति प्राप्त उच्यते- ' आनन्दमयोऽभ्यासात् ' आनन्दमय आत्मेत्यत्र ' ब्रह्म पुर्छ प्रतिष्ठा ' इति स्वप्रधानमेव ब्रह्मोपदिश्यते; अभ्यासात् । ' असन्नेव स भवति ' इत्यस्मिन्निगमनश्लोके ब्रह्मण एव केवलस्याभ्यस्यमानत्वात् । 8 ' विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ' । विकारशब्देनावयव-और ' रसो वै सः ' इत्यादि उत्तरग्रन्थको उसको अपेक्षा है, इससे यह आनन्दमय विषयक नहीं है । परन्तु - ' सोऽकामयत ' ( उसने कामनाकी ) इस प्रकार ब्रह्ममें पुंलिङ्ग ( स ) शब्दका निर्देश युक्त नहीं है? सिद्धान्ती – यह दोष नहीं है, क्योंकि ' तस्माद्वा ० ' ( उस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इस श्रुतिमें पुंलिङ्ग आत्मशब्द से भी ब्रह्म प्रकृत है । ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ' यह जो मार्गवी वारुणी विद्या है उसमें मयट् प्रत्ययका श्रवण नहीं है और प्रियशिरस्त्वादि अवयवोंका भी श्रवण नहीं है, इसलिए आनन्द ब्रह्म है यह कथन युक्त है, अतः अणुमात्र भी विशेषका आश्रय किये विना अपने आप ही प्रियशिरस्त्वादि ब्रह्ममें युक्त नहीं है । यहाँ सगुण ब्रह्मका प्रतिपादन इष्ट नहीं है, क्योंकि इसी प्रकरण में ब्रह्म वाणी और मनका अविषय है ऐसी श्रुति है, इसलिए अन्नमयादिके समान आनन्दमयमें भी मयट् प्रत्यय विकारार्थक ही समझना चाहिए प्राचुर्यार्थक नहीं । सूत्रोंका व्याख्यान तो इस प्रकार करना चाहिए कि ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इसमें क्या आनन्दमयके अवयवरूपसे ब्रह्म विवक्षित है अथवा स्वप्रधानरूपसे? पुच्छशब्द के प्रयोगके कारण ब्रह्म अवयव रूपसे विवक्षित है, ऐसा प्राप्त होनेपर सूत्रकार कहते हैं - ' आनन्दमयोऽभ्यासात् ' आनन्दमय आत्मा है, इसमें ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस तरह स्वप्रधानरूपसे ही ब्रह्म उपदिष्ट है, क्योंकि उसका अभ्यास है । कारण कि ' असन्नेव स भवति ' ( वह असत् ही होता है ) इस उपसंहार श्लोकमें केवल ब्रह्म ही अभ्यष्यमान है । ' विकारशब्दान्नेति ० ' ( सू ० १३ ) इसमें विकारशब्दसे अवयव शब्द अभिप्रेत है । ' पुच्छं ' इस अवयवशब्दसे ब्रह्म स्वप्रधान नहीं है, ऐसा जो कहा गया है, उसका परिहार करना चाहिए । इसपर कहते हैं - यह दोष नहीं है, सत्यानन्दी - दीपिका * यद्यपि ' सोऽकायमत ' इस श्रुतिमें ब्रह्मवाची ' सः ' शब्द पुंलिङ्ग है, जब कि ब्रह्म वाचक ' ब्रह्मन् ' शब्द नपुंसक है, अत: उसमें पुलिङ्ग ' सः ' शब्दका प्रयोग युक्त नहीं है, तथापि ' तस्मा एतस्मादात्मन ' इत्यादि श्रुतिमें प्रकृत ब्रह्मका ही पुंलिङ्ग आत्मशब्दसे निर्देश किया गया है, वैसे ही ' सोऽकायमत ' में भी समझना चाहिए । ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ' यहाँ भी पुलिङ्ग आनन्द-शब्दसे ब्रह्मका निर्देश है, अतः आनन्द ब्रह्म है, ' वेदसून्नयोर्विरोधे गुणेत्वन्यायकल्पनेति ' ( वेद और सूत्रमें विरोध हो तो गुणे - जहाँ प्रधान और अप्रधान दो विषयोंमें विरोध हो, यदि अप्रधान विषयके अनुसार प्रधान विषयका समन्वय करें तो वहाँ इस न्यायकी प्रवृत्ति होती है ) इस न्यायसे सूत्रों का अर्थं वेदार्थानुसार करना चाहिए न कि सूत्रार्थके अनुसार वेदार्थकी कल्पना करनी चाहिए, इस आशय को लेकर भगवान् माष्यकार अब वेदार्थं अनुसार ' सूत्राणि ' इससे सूत्रोंकी व्याख्या करते हैं ।

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११४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ शब्दोऽभिप्रेतः । पुच्छमित्यवयवशब्दान्न स्वप्रधानत्वं ब्रह्म इति यदुक्तम्, तस्य परिहारो वक्तव्यः । अत्रोच्यते- नायं दोषः प्राचुर्यादप्यवयवशब्दोपपत्तेः । प्राचुर्य प्रायापत्तिः; अवयवप्राये वचनमित्यर्थः । अन्नमयादीनां हि शिरआदिषु पुच्छान्तेष्ववयवेषूक्तेष्वानन्द-मयस्यापि शिरआदी न्यवयवान्तराण्युक्त्वाऽवयवप्रायापत्त्या ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इत्याह, नावयवविवक्षया । यत्कारणमभ्यासादिति स्वप्रधानत्वं ब्रह्मणः समर्थितम् । ' तद्धेतुव्य-पदेशाच्च ' । सर्वस्य हि विकारजातस्य सानन्दमयस्य कारणत्वेन ब्रह्म व्यपदिश्यते-' इदँ सर्वमसृजत । यदिदं किंच ' ( तै ०२।६ ) इति । नच कारणं सत् ब्रह्म स्वविकारस्थानन्दमयस्य मुख्यया वृत्त्याऽवयव उपपद्यते अपराण्यपि सूत्राणि यथासंभवं पुच्छवाक्यनिर्दिष्टस्यैव ब्रह्मण उपपादकानि द्रष्टव्यानि ॥ १ ९ ॥ क्योंकि प्राचुर्यसे भी [ ब्रह्ममें ] अवयव शब्दकी उपपत्ति हो सकती है । प्राचुर्य - प्राय: आपत्ति - अवयव क्रमी बुद्धि प्राप्ति, अवयव प्रायमें वचन अधिकतासे अवयवोंके प्रतिपादक प्रकरण में कहा हुआ वचन, ऐसा अर्थ है, क्योंकि अन्नमयादिके शिर आदिसे लेकर पुच्छ पर्यन्त अवयव कथन के अनन्तर आनन्दमयके भी शिरादि अन्य अवयव कहकर अवयव क्रमकी प्राप्ति होनेसे ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' ऐसा कहा है । अवयवकी विवक्षासे नहीं, इस कारण ' अभ्यासात् ' अभ्याससे ब्रह्म में स्वप्रधानत्वका समर्थन किया है । ' तद्धेतुव्यपदेशाच्च ' आनन्दमय सहित सब कार्य समुदायके कारणरूपसे ' इदं सर्वम ० ' ( उसने यह सब उत्पन्न किया जो यह कुछ है ) इस प्रकार ब्रह्मका कथन किया है । कारण होकर ब्रह्म मुख्य-वृत्ति अपने कार्य आनन्दमयका अवयव हो यह युक्त नहीं है । + दूसरे सूत्र भी यथासम्भव पुच्छ वाक्यमें निर्दिष्ट ब्रह्मके ही उपपादक समझने चाहिएँ ॥ १ ९ ॥ सत्यानन्दी - दीपिका * ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इस प्रकृत ब्रह्मकें ज्ञानके लिए यहाँ अन्नमयादि पाँच कोशोंकी पक्षी-रूपसे कल्पना की गई है । परन्तु उनके पक्षीरूपमें श्रुतिका तात्पर्य नहीं है । ' तस्य प्रियमेव शिरः ' ० ( तै ० २१५ ) ( प्रिय ही उसका शिर है, मोद दक्षिण पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष है ) इस प्रकार जब आनन्दमयके अन्य अवयव कहे गए हैं तो अवशिष्ट पुच्छ स्थानीय अवयवकी जिज्ञासाको पूर्ण करते हुए प्रकृत ब्रह्मको ही पुच्छरूपसे कहा गया है, क्योंकि जैसे पक्षीका आधार पुच्छ है, वैसे ही आनन्दमयका अधिष्ठान ब्रह्म है इसलिए ब्रह्मका प्रधानरूपसे प्रतिपादन है । किश्व ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ' इत्यादि श्रुतियोंमें भी केवल आनन्दका ही अभ्यास उपलब्ध होता है आनन्दमयका नहीं । इसलिए ' सोऽकामयत ' इत्यादि श्रुतियाँ और ' आनन्दमयोऽभ्यासात् ' इत्यादि सूत्र ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस श्रुति वाक्यसे निर्दिष्ट ब्रह्मके ही उपपादक हैं । अतएव ' आन ' दमयोऽ-' भ्यासात् ' इस सूत्रस्थ आनन्दमय शब्दसे लक्षणा द्वारा निर्गुण ब्रह्मका ही बोध कराया गया है । पूर्वपक्ष में सगुण ब्रह्मकी उपासना है और सिद्धान्तमें निर्गुण ब्रह्मका ज्ञान है ॥ १ ९ ॥ + टि ० अन्य सूत्र भी यथा सम्भव ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस श्रुति वाक्य में निर्दिष्ट ब्रह्मके उपपादक हैं । यथा ‘ तद्धेतुव्यपदेशाच्च ' ( ब्र ० सू ० १ | १ | १४ ) ' इदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्च ' ( तै ० २।६ ) इस श्रुति वाक्यसे जब यह स्पष्ट होता है कि ब्रह्म कार्यमात्रका हेतु है तब वह प्रिय शिरस्त्वादि विशिष्ट आनन्दमय कार्यका मुख्यवृत्तिसे अवयव कदापि नहीं हो सकता । ' मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ' ( ब्र ० सू ० १।१।१५ ), ब्रह्मविदामीति परम् ' जिस ब्रह्मके ज्ञानसे कैवल्य मुक्ति कही गई है और जो ब्रह्म ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इस मन्त्र में निर्दिष्ट है, वही ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' इस श्रुति वाक्य में प्रतिपादित है, क्योंकि ब्रह्मपद संनिहित है । ' नेतरोऽनुपपत्ते: ' ( ब ० सू ० १।१।१६ )

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अघे ० ७ सू ० २० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ११५ ( ७ अन्तरधिकरणम् । २०-२१ ) अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ २० ॥

पदच्छेद - अन्तः, तद्धर्मोपदेशात् । सूत्रार्थ - ( अन्तः ) ' य एषोऽन्तरादित्ये ' ' य एषोऽन्तरक्षिणि ' इस श्रुतिमें आदित्यमण्डलादिके अन्तर श्रूयमाण पुरुष संसारी नहीं है किन्तु परमेश्वर है, ( तद्धर्मोपदेशात् ) क्योंकि पापशून्यत्वादि उसके धर्मो का उपदेश है । * इदमाम्नायते - ' अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरणमयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आ प्रणखात्सर्वं एव सुवर्णः ' ' तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ' ' इत्यधिदैवतम् ' ( छा ० १।६।६, ७, ८ ) । श्रुति यह कहती है- ' अथ य एषो ० ' ( आदित्यमण्डल के अन्तर्गत सुवर्ण - सा ज्योतिर्मय सा जो यह पुरुष दिखाई देता है जो सुवर्णके समान डाढी, मूछोंवाला और सुवर्णके सदृश केशोंवाला तथा जो नख पर्यन्त साराका सारा सुवर्ण - सा ही है ) ' तस्य यथा ० ' ( वानरके बैठनेके स्थानके सदृश विकसित अरुण वर्णवाले पुण्डरीक कमलके समान उस पुरुषके दोनों नेत्र हैं, उसका ' उत् ' ऐसा नाम है, क्योंकि वह सब पापोंसे ऊपर गया हुआ है अर्थात् सब पापोंसे मुक्त है जो ऐसे गुणों से सम्पन्न ' उत् ' नामक देवकी यथोक्त प्रकारसे उपासना करता है वह निश्चय ही सब पापोंसे मुक्त हो सत्यानन्दी - दीपिका * पहले अधिकरणमें ‘ अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः ' ( तै ० २१५ ) ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ' ( तै ० ३।६ ) ' ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा ' ( तै ० २।५ ) इत्यादि श्रुतिवाक्योंमें आनन्दमय, आनन्द और ब्रह्म शब्दों से जो निर्गुण ब्रह्म निर्दिष्ट है, वही उपाधि विशिष्ट होकर उपास्य है । अब इस अधिकरण में अधिकारीके भेद से उपासना तथा उसके अनुरूप देवताका निरूपण किया जाता है । यद्यपि ब्रह्म व्यापक है, तो भी उपासना के लिए स्थान विशेषकी अपेक्षा होती है, इसलिए उपासना द्वारा फल इतर - आनन्दमय जीव यहाँ प्रतिपाद्य नहीं है, क्योकि उसमें सर्वसृष्टिकर्तृत्व अनुपपन्न है । ' भेद-व्यपदेशाच्च ' ( ब्र ० सू ० १।१।१७ ) ' रसो वै सः रस ह्येवायं लब्ध्वानन्दो भवति ' इसप्रकार ब्रह्म और आनन्दमय में भेद है । ' आनन्दमयो ब्रह्म तैत्तिरीयकपञ्चमस्थानस्थत्वात् भृगुवल्लीस्थानन्दवत् ' ( आन दमय ब्रह्म है, क्योकि ब्रह्मवल्लीके पाँचवें स्थानमें है, भृगुवल्लीमें स्थित आनन्दके समान ) ऐसी अनुमानकी शंकाकर कहते हैं- ' कामाच्च नानुमानापेक्षा ' ( ब्र ० सू ० १ | १ | १८ ) ( काम्यत इति काम आनन्दः ' सबके द्वारा आनन्दकी ही कामना की जाती है, अतः काम आनन्द है । इसलिए जैसे भृगुवल्लीमें आनन्द ब्रह्म है वैसे ब्रह्मवल्लीमें स्थित आनन्दमय भी ब्रह्म है, ऐसी अनुमानकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यहाँ आनन्दय के साथ विकारार्थक मयट् होनेसे विरोध है । विकार-रूप आनन्दमय में निरतिशय आनन्दकी प्राप्ति नहीं हो सकती, अतः आनन्दमय ब्रह्म नहीं है । यहाँ यदि भेदका उपदेश है तो सगुण ब्रह्म ही भेदरूपसे प्रतिपादित हुआ? यह शंका युक्त नहीं है, क्योंकि ' अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ' ( ब्र ० सू ० १ | १ | १ ९ ) गुहानिहित है, अतः प्रत्यक् और पुच्छ वाक्य में निर्दिष्ट ब्रह्म वह एक ही है, ऐसा उपसंहार होनेपर ' मैं ही पर ब्रह्म हूँ ' इस प्रकार प्रबोध विशिष्ट आनन्दमय जीवका ' यदा ह्येवैष ' ( तै ० २१७ ) इस श्रुतिमें ब्रह्मभावरूपसे उपदेश किया गया है । इसकारण निर्गुण ब्रह्मैक्य ज्ञानके लिए जीवभेदका अनुवाद मात्र है, अतः आनन्द ब्रह्म है ।

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११६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ अथाध्यात्ममपि ' अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते ( छा ० १।७।१,५ ) इत्यादि । * तत्र संशयः- किं विद्याकर्मातिशयवशात्प्राप्तोत्कर्षः कश्चित्संसारी सूर्यमण्डले चक्षुषि चोपास्यत्वेन श्रूयते, किंवा नित्य सिद्धः परमेश्वर इति । किं तावत्प्राप्तम्? संसारीति । कुतः? रूपवत्त्व-श्रवणात् । आदित्यपुरुषे तावत् ' हिरण्यश्मश्रुः ' इत्यादि रूपमुदाहृतम् । अक्षिपुरुषेऽपि तदेवा-तिदेशेन प्राप्यते - ' तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुध्य रूपम् ' इति । नच परमेश्वरस्य रूपवत्त्वं युक्तम्, ‘ अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम् ' ( का ० १ | ३ | १५ ) इति श्रुतेः, आधारश्रवणाच्च - य एषोऽ-न्तरादित्ये ’, ‘ य एषोऽन्तरक्षिणि ' इति । नानाधारस्य स्वमहिमप्रतिष्ठस्य सर्वव्यापिनः परमे श्वरस्याधार उपदिश्येत । ' स भंगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि ' ( छा ० ७।२४।१ ) इति । ‘ आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः ' इति च श्रुती भवतः । ऐश्वर्यमर्यादाश्रुतेश्च । स एष ये चामुष्मात्प-राञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां च ' ( छा ० १।६।८ ) इत्यादित्यपुरुषस्यैश्वर्यमर्यादा । स एष जाता है ) यह अधिदैवत है । अब ' अथ य ० ' ( जो यह नेत्रके मीतर पुरुष दिखाई देता है ) इत्यादि श्रुति से अध्यात्म कहा जाता है । यहाँ संशय होता है कि क्या अतिशय विद्या और कर्मके प्रभावसे उत्कर्ष प्राप्त करनेवाला कोई संसारी सूर्य मण्डलमें तथा चक्षुमें उपास्यरूपसे श्रुत है अथवा नित्य सिद्ध परमेश्वर? तब क्या प्राप्त होता है? पू ० - यहाँ संसारी उपास्यरूपसे निर्दिष्ट है, क्योंकि रूपवत्त्वका श्रवण है । आदित्यपुरुष में ' हिरण्य ( सुवर्ण ) सो मुछे हैं ' इत्यादि रूपका उदाहरण है । और ' तस्यैतस्य ० ' ( इस अक्षिपुरुपका वही रूप है जो कि आदित्यपुरुषका रूप है ) इस श्रुति से अक्षिपुरुष में भी अतिदेशसे वही रूप प्राप्त होता है । परन्तु परमेश्वरका रूपवत्त्व होना युक्तं नहीं है, क्योंकि ' अशब्दम ० ' ( वह शब्द रहित, स्पर्श रहित, रूपरहित और अविनाशी है ) ऐसी श्रुति है । क्योंकि ' य एषोऽन्तरादिव्ये ' ' य एषोऽन्तरक्षिणि ' ( जो यह आदित्य मण्डलमें है, जो यह अक्षिके अन्तर है ) इस प्रकार आधारका श्रवण है । किन्तु आधार रहित स्वमहिमा में प्रतिष्ठित सर्वव्यापी परमेश्वरका आधार उपदेश नहीं किया जाता, कारण कि ' स भगवः ० ' ( नारद - हे भगवन्! वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है? सनत्कुमार — वह अपनी महिमा में प्रतिष्ठित है ) और ' आकाशवत् ० ' ( आकाशके समान सर्वव्यापक और नित्य है ) ऐसी श्रुतियाँ हैं । क्योंकि आदित्यपुरुष और अक्षिपुरुषकी ऐश्वर्यं -मर्यादाकी श्रुति हैं । ' स एष ० ' ( वह यह उत् नामक देव, जो इस आदित्यलोकसे ऊपरके लोक हैं सत्यानन्दी - दीपिका सिद्धयर्थं शास्त्रों में आदित्यमण्डलादिका विधान किया गया है । देवोंका आश्रय कर किया गया विधान अधिदैवत है और देहादिका आश्रय कर किया गया विधान अध्यात्म है । आदित्यमण्डलमें जो उपास्य है वही देहसे सम्बन्धित होकर अध्यात्मरूपसे भी कहा गया है । पूर्वं अधिकरणमें ब्रह्मपद, आनन्दमय पद और आनन्दका अभ्यास इन तीनों प्रमाणों तथा अन्य प्रमाणोंसे जैसे निर्गुण ब्रह्मका निर्णय किया गया है, वैसे रूपवत्त्वादि अनेक प्रमाणोंसे जीव हिरण्यमय है, इस प्रकार पूर्वं अधिकरण सिद्धान्त से दृष्टान्तसंगतिद्वारा पहले सामान्यतः सिद्ध निर्गुण ब्रह्मसमन्वयके अपवादार्थं ‘ संसारी ' इत्यादिसे पूर्वपक्ष करते हैं । ' हिरण्यश्मश्रुः ' इस श्रुतिसे आदित्य-पुरुषमें तथा ' तदेव रूपं ' इस + अतिदेश श्रुतिसे अक्षिपुरुषमें रूपका श्रवण होता है । इससे आदित्यमण्डलस्थ एवं अक्षिस्य संसारी पुरुष उपास्य सिद्ध होता है रूपादि रहित परमेश्वर नहीं । + टि ० - एकत्र श्रुतस्यान्यत्र सम्बन्धोऽतिदेशः ' ( एकत्र श्रुतका अन्य स्थल में श्रवण या सम्बन्ध अतिदेश है, जैसे यहाँ आदित्य पुरुषके रूपका अक्षिपुरुषमें श्रवण है । अथवा ' तद्वदिदं कर्तव्यमतिदेशः ' ' उसके समान यह करना चाहिए वह अतिदेश है । '