श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 151–160
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 151–160
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अधि ० ७ सू ० २० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दोपिकासहित ११७ ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां च ' ( छा ० १।७२६ ) इत्यक्षिपुरुषस्य । नच परमेश्वरस्य मर्यादावदैश्वर्य युक्तम्, ' एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय ' ( वृ ० ४।४।२२ ) इत्यविशेषश्रुतेः । तस्मान्नाक्ष्यादित्ययोरन्तः परमेश्वर * इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः – ' अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ' इति, ' य एषोऽन्तर । दिव्ये ', ' य एषोऽन्तरक्षिणि ' इति च श्रूयमाणः पुरुषः परमेश्वर एव, न संसारी । कुतः? तद्धर्मोपदेशात् । तस्य हि परमेश्वरस्य धर्मा इहोपदिष्टाः । तद्यथा - ' तस्योदिति नाम ' इति श्रावयित्वा तस्यादित्यपुरुषस्य नाम ' स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः ' इति सर्वपाप्मापगमेन निर्वक्ति । तदेव च कृतनिर्वचनं नामाक्षि -पुरुषस्याप्यतिदिशति - ' यन्नाम तन्नाम ' इति । सर्वपाप्मापगमश्च परमात्मन एव श्रूयते- ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' ( छा ० ८।७।१ ) इत्यादौ । तथा चाक्षुषे पुरुषे ' सैवर्तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म ' इत्युक्सामाद्यात्मकतां निर्धारयति । सा च परमेश्वरस्योपपद्यतेः सर्वकारणत्वात्सर्वात्म कत्वोपपत्तेः । पृथिव्यग्न्याद्यात्मके चाधिदैवतं ऋक्सामे, वाक्प्राणाद्यात्मके चाध्यात्ममनु-और जो देवताओंके भोग हैं उनपर शासन करता है ) इस प्रकार आदित्यपुरुषकी मर्यादाकी श्रुति है और ' स एष ० ' ( अक्षिस्य वह यह उत्- अक्षिपुरुष नामक देव जो इस अध्यात्म आत्मासे नीचे के लोक हैं उनका तथा मानवीय कामनाओंका शासन करता है ) इस प्रकार अक्षिपुरुषकी मर्यादाकी श्रुति है । परन्तु परमेश्वरका ऐश्वर्यं सीमित होना युक्त नहीं है, क्योंकि ' एष सर्वेश्वर ० ' ( यह सर्वेश्वर है, यह सब भूतोंका अधिपति है, यह भूतोंका पालक है, लोकोंकी मर्यादा छिन्न - भिन्न न हो इसलिए यह " सारी व्यवस्था करनेवाला सेतु है अर्थात् सेतुके समान नियामक है ) ऐसी अविशेष श्रुति है । इससे सिद्ध होता है कि नेत्र और आदित्य के अन्तर पुरुष परमेश्वर नहीं है । सिद्धान्ती —- ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ' ' य एषो ० ' ( यह जो आदित्यके भीतर है ) य एषो ० ' ( जो यह चक्षु आन्तर है ) इस प्रकार श्रूयमाण परमेश्वर ही है संसारी नहीं, क्यों? ' तद्धर्मो ० ' उस परमेश्वर के धर्मोका ही यहाँ उपदेश किया गया है । जैसे कि ' तस्यो ० ' ( उसका ' उद् ' यह नाम है ) इस प्रकार इस आदित्य पुरुष नामका श्रवण कराके ' स एष ० ' ( वह यह सब पापोंसे मुक्त है ) इस तरह सभी पापोंके अपगमसे ' उत् ' नामका श्रुति निर्वचन करती है । और निर्वचन किये हुए उसी नामका अक्षिपुरुष में ' यन्नाम तन्नाम ' ( जो आदित्य पुरुषका नाम है वही अक्षिपुरुषका नाम है ) यह श्रुति अतिदेश करती है! ' य आत्मा ० ' ( जो आत्मा पाप रहित है ) इत्यादि श्रुतिवाक्योंमें परमात्मा ही सर्वपापरहित सुना जाता है । इसीप्रकार ' सैव ऋक् ० ' ( वही अक्षिपुरुष ऋक्, वही साम, वही उक्थ, वही यजु और वही ब्रह्म है ) यह श्रुति अक्षिपुरुष में ऋक् सामादिकी आत्मकताका निर्धारण करती है । वह सर्वात्मकता परमेश्वरमें ही उपपन्न है, क्योंकि वह सबका कारण होनेसे सर्वात्मक हो सकता है । ऋक् पृथिवी और साम सत्यानन्दी - दीपिका * यद्यपि ' न ह वै देवान्पापं गच्छति ' ( बृह ० ११५/२० ) ( देवोंको कोई पाप नहीं लगता ) इस श्रुतिके आधार पर आदित्य पुरुष आदि भी पाप रहित होनेसे उपास्य हो सकते हैं, तो भी इस श्रुतिका तात्पर्य यह है कि देवत्वकालमें कर्मके अनधिकारी देवोंका क्रियमाण पाप अथवा उसके फलके साथ सम्बन्ध नहीं होता । परन्तु उनके पूर्व जन्म संचित पापोंके होनेसे वे सर्वपाप रहित नहीं हो सकते । यदि वे बिल्कुल पाप रहित हों तो ' तस्मिन्यावत्संपात मुषित्वाथैत मे वाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते ' ( छा ० ५/१०१५ ) ( वहाँ कर्मोके क्षय होने तक रहकर वे पुनः इसी मार्ग से जिस प्रकार गये थे उसीप्रकार लौटते हैं ) इत्यादि श्रुति और ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ' ( गीता ० ९ । २१ ) ( पुण्य कर्म क्षीण होनेपर वे पुनः लौटकर मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं ) स्मृति वचन बाधित हो जाएँगे । अतः ' आमापहतपाप्मा ' यह ठीक ही कहा गया है कि परमात्मा सर्वपाप रहित है और वही उपास्य है ।
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११८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ क्रम्याह - ' तस्यक्चं साम च गेष्णौ ' इत्यधिदैवतम् । तथाऽध्यात्ममपि - ' यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ ' इति । तच्च सर्वात्मन एवोपपद्यते । ' तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात्ते धनसनयः ' ( छा ० १।७।६ ) इति च लौकिकेष्वपि गानेष्वस्यैव गीयमानत्वं दर्शयति । तच्च परमेश्वरपरिग्रहे घटते; ' यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंश-संभवम् ' ( १० | ४१ ) इति भगवद्गीतादर्शनात् । लोककामेशितृत्वमपि निरङ्कुशं श्रूयमाणं परमेश्वरं गमयति । * यदुक्तं हिरण्यश्मश्रुत्वादिरूपश्रवणं परमेश्वरे नोपपद्यत इति, अत्र ब्रूमः - स्यात्परमेश्वरस्यापीच्छावशान्मायामयं रूपं साधकानुग्रहार्थम् । ' माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद । सर्वभूतगुणैर्युक्तं मैवं मां ज्ञातुमर्हसि ' इति स्मरणात् । अपि च यत्र तु निरस्तसर्वविशेषं पारमेश्वरं रूपमुपदिश्यते, भवति तत्र शास्त्रम् - अशब्दम स्पर्शमरूपमव्ययम् ' इत्यादि । सर्वकारणत्वात्तु विकारधर्मैरपि कैश्विद्विशिष्टः परमेश्वर उपारयत्वेन निर्दिश्यते-' सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः ' ( छा ० ३,१४।२ ) इत्यादिना । तथा हिरण्यश्मश्रुत्वा-दिनिर्देशोऽपि भविष्यति । यदव्याधारश्रवणान्न परमेश्वर इति अत्रोच्यते - स्वमहिम-अग्नि है यह अधिदेवत और वाक् प्राणादि आत्मक ऋक्, साम है अर्थात् वाक् ऋक् और प्राण साम है इस तरह अध्यात्मका आरम्भकर श्रुति कहती है- ' तस्य ऋक् च ० ' ( उस आदित्यपुरुष के ऋक् और साम पर्व - अङ्गों की संधियाँ हैं ) यह अधिदैवत है । इसीप्रकार ' यावमुप्य ० ( जो आदित्य-पुरुषके पादपर्व हैं दे अक्षिपुरुषके पादपर्व हैं ) यह अध्यात्म भी है । यह सब सर्वात्मक परमेश्वरमें घट सकता है । ' तद्ये इमे ० ' ( अतः जो ये लोग वीणामें गायन ( स्तुति ) करते हैं वे उस परमेश्वरका ही गायन करते हैं, इसीसे वे धन लाभ करते हैं ) इसप्रकार श्रुति लौकिक गानोंमें भी उसका गान दिखलाती है । यह सब परमेश्वरके परिग्रहसे घट सकता है, क्योंकि ' यद्यद्विभूति ० ' ( हे कौन्तेय! जो जो मी ऐश्वर्यशाली, श्रीयुक्त- कान्तियुक्त, शक्तियुक्त वस्तु है उस उसीको तूं मेरे तेजके अंशसे उत्पन्न हुई जान ) ऐसा भगवद्गीता में देखा जाता है । तथा लोक और भोगपर स्वतन्त्ररूपसे श्रूयमाण स्वामित्व भी परमेश्वरका ही ज्ञान कराता है । जो यह कहा गया है कि हिरण्यश्मश्रुत्वादि रूपका श्रवण परमेश्वरमें उपपन्न नहीं है । इस विषय में हम कहते हैं - साधकोंपर अनुग्रह करनेके लिए इच्छावश परमेश्वर का मायामय रूप हो सकता है, क्योंकि ' माया ह्येषा ० ' ( हे नारद! सब भूतोंके गुणोंसे युक्त जो मुझे देखता है यह मायाका कार्य होनेसे विचित्र मूर्तिरूप माया मेरी उत्पन्न की हुई है, अतः इस प्रकार मुझे जानने के लिए तूं योग्य नहीं है ) ऐसी स्मृति है । और जहाँ सभी उपा-धियोंसे रहित निर्विशेष परमेश्वर के स्वरूपका उपदेश किया जाता है, वहाँ ' अशब्दम ० ' ( वह शब्द-रहित, स्पर्शरहित, रूपरहित और अविनाशी है ) इत्यादि शास्त्र है । सबका कारण होने से कुछ विकारोंके धर्मोसे युक्त परमेश्वरका भी उपास्यरूपसे ' सर्व कर्मा ० ' ( सम्पूर्ण रचनात्मक कर्मवाला, सर्वकामना वाला, सर्व गन्ध युक्त और सर्व रसयुक्त है ) इत्यादि श्रुतिसे निर्देश किया जाता है । इसी प्रकार हिरण्यश्मश्रुत्वादिका निर्देश भी हो जायगा । आधारका श्रवण होनेसे आदित्यपुरुष तथा अक्षिपुरुष परमेश्वर नहीं है, ऐसा जो कहा गया है । उसपर कहते हैं - स्वमहिमा में प्रतिष्ठित परमेश्वर-सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्वपक्षीने पहले ' रूपवत्त्व श्रवणात् ' इस हेतुसे आदित्यपुरुषका और अक्षिपुरुषका ग्रहण किया है, अब उसका ' स्यात्परमेश्वरस्यापि ० ' इत्यादि भाष्यसे खण्डन करते हैं । भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिए मायोपाधिसे परमेश्वर अनेक रूप धारण करते हैं, जैसे कि ' इन्द्रो मायाभिः पुरूरूप ईयते ' ( परमेश्वर ज्ञान, बल और क्रिया रूप मायासे अनेक रूपोंको प्राप्त होता है ) यह श्रुति है ॥२० ॥
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अधि ० ८ सू ० २१-२२- ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ११ ९ प्रतिष्ठस्याप्याधार विशेषोपदेश उपासनार्थो भविष्यति, सर्वगतत्वाद् ब्रह्म णो व्योमवत्सर्वा-न्तरत्वोपपत्तेः । ऐश्वर्य मर्यादाश्रवणमप्यध्यात्माधिदैवत विभागापेक्षमुपासनार्थमेव । तस्मात्परमेश्वर एवाक्ष्यादित्ययोरन्तरुपदिश्यते ॥ २० ॥
भेदव्यपदेशाच्चान्यः ॥ २१ ॥
पदच्छेद - भेदव्यपदेशात्, च, अन्यः । सूत्रार्थ - ( अन्यः ) अक्षि और आदित्यके अन्तर श्रूयमाण अन्तर्यामी पुरुष आदित्य आदि शरीराभिमानी जीवोंसे अन्य है, ( भेदव्यपदेशात् ) क्योंकि ' य आदित्ये तिष्ठन ' इस श्रुतिमें जोव नियम्य और परमेश्वर नियामक इस प्रकार दोनोंके भेदका व्यपदेश है । अस्ति चादित्यादिशरीराभिमानिभ्यो जीवेभ्योऽन्य ईश्वरोऽन्तर्यामी; ' य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्त-यम्यमृतः ' ( बृ ० ३।७।९ ) इति श्रुत्यन्तरे भेदव्यपदेशात् । तत्र हि ' आदित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद ' इति वेदितुरादित्याद्विज्ञानात्मनोऽन्तर्यामी स्पष्टं निर्दिश्यते; स एवेहाप्यन्तरादित्ये पुरुषो भवितुमर्हति श्रुतिसामान्यात् । तस्मात्परमेश्वर एवेहोपदिश्यत इति सिद्धम् ॥ २१ ॥
( ८ आकाशाधिकरणम् । सू ० २२ ) आकाशस्तलिङ्गात् ॥ २२ ॥
पदच्छेद - आकाश:, तल्लिङ्गात् । सूत्रार्थ - ( आकाशः ) ' आकाश इति होवाच ' यहाँ आकाश शब्दसे ब्रह्मका ही ग्रहण हैं, ( तल्लिङ्गात् ) क्योंकि ' सर्वाणि ह वा ' इस प्रकार सभी भूतोंके उत्पत्ति आदि परब्रह्मका ही लिङ्ग है । * इदमामनन्ति — ' अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि का भी आधार विशेष उपदेश उपासना के लिए हो जायगा, क्योंकि आकाशके समान सर्वव्यापक होनेसे ब्रह्म सर्वान्तर हो सकता है । ऐश्वर्यमर्यादाका श्रवण भी अध्यात्म और अधिदेवत विभागकी अपेक्षा रखता हुआ केवल उपासनाके लिए है । इसलिए अक्षि और आदित्य के भीतर परमेश्वरका ही उपदेश है || २० | और आदित्यादि शरीरोंके अभिमानी जीवोंसे अन्य ईश्वर अन्तर्यामी है, क्योंकि ' य आदित्ये ० ' ( जो आदित्य में रहता हुआ आदित्यके भीतर है, जिसे आदित्य नहीं जानता, जिसका आदित्य शरीर है, जो आदित्य के अन्तर रहकर आदित्यका नियमन करता है वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ) इस प्रकार अन्य श्रुतिमें भेदका व्यपदेश है । वहीं ' आदित्य के भीतर है जिसे आदित्य नहीं जानता ' इस प्रकार वेदिता ( प्रमाता ) आदित्य जीवात्मासे अन्य अन्तर्यामी है ऐसा स्पष्ट निर्देश किया जाता है । यहाँ भी वही आदित्य के अन्तर पुरुष होना युक्त है, क्योंकि दोनों स्थलों में श्रुतियाँ समान ( एक प्रकारकी ) हैं । इससे सिद्ध हुआ कि परमेश्वरका ही यहाँ उपदेश है ॥ २१ । छान्दोग कहते हैं - [ शालवत्य - हे जैवलि! ] ' अस्य लोकस्य ० ' ( इस पृथिवी लोकका आधार क्या है? राजा प्रवाहण - आकाश, क्योंकि ये सारे भूत आकाशंसे ही उत्पन्न होते हैं और आकाश-सत्यानन्दी -दीपिका * य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषों दृश्यते ' ( छा ० १२६/६ ) और ' य आदित्ये तिष्टन् ' ( बृह ० ३७१ ९ ) ' यश्चक्षुषि तिष्ठन् ' ( बृह ० ३।७।१८ ) ( जो नेत्रमें रहता हुआ ) इस प्रकार दोनों श्रुतियां एक प्रकारकी हैं और दोनोंका अर्थ एक ही है कि आदित्य और अक्षिस्य उपास्य पुरुष परमेश्वर ही है । पूर्वपक्षमें जीव उपास्य है और सिद्धान्तमें परमेश्वर उपास्य है ॥ २१ ॥ •
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१२० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पाद १ भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ' ( छान्दो ० १1 ९ 1१ ) इति । तत्र संशयः - किमाकाशशब्देन परं ब्रह्माभिधीयत उत भूताकाश-मिति । कुतः संशयः? उभयत्र प्रयोगदर्शनात् । भूतविशेषेतावत्सुप्रसिद्धो लोकवेद योराकाश-शब्दः ब्रह्मण्यपि क्वचित्प्रयुज्यमानो दृश्यते । यत्र वाक्यशेषवशादसाधारणगुणश्रवणाद्वा निर्धारितं ब्रह्म भवति, यथा- - ' ' यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ' ( तै ० २१७ ) इति, ' आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म ' ( छा ० ८/१४ ) १ ) इति चैवमादौ । अतः संशयः किं पुनरत्र युक्तम्? * भूताकाशमिति । कुतः? तद्धि प्रसिद्धतरेण प्रयोगेण शीघ्रं बुद्धिमा-रोहति । न चायमाकाशशब्द उभयोः साधारणः शक्यो विज्ञातुम्, अनेकार्थत्वप्रसङ्गात् । तस्माद ब्रह्मणि गौण एवाकाशशब्दो भवितुमर्हति । विभुत्वादिभिहिं बहुभिर्धर्मैः सदृशमाका-शेन ब्रह्म भवति । नच मुख्यसंभवे गौणोऽर्थो ग्रहणसर्हति । संभवति चेह मुख्यस्यैवाका-शस्य ग्रहणम् । ननु भूताकाशपरिग्रहे वाक्यशेषो नोपपद्यते - ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्या-काशादेव समुत्पद्यन्ते ' इत्यादिः । नैष दोषः भूताकाशस्यापि वाय्वादिक्रमेण कारणत्वोपपत्तेः । विज्ञायते हि - ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः ' ( तै ० २।१ ) इत्यादि । ज्यायस्त्वपरायणत्वे अपि भूतान्तरापेक्षयोपपद्ये ते भूताकाशस्यापि । तस्मादाकाश-को ही लय होते हुए प्राप्त होते हैं; आकाश ही इन सभीसे महान् और आकाश ही आश्रय है ) यहाँ संशय होता है कि क्या आकाश शब्दसे परब्रह्मका अभिधान किया जाता है अथवा भूताकाशका? संशय क्यों होता है? इससे कि दोनोंमें आकाश शब्दका प्रयोग दिखाई देता है । लोक और वेदमें आकाश शब्द भूताकाशमें तो सुप्रसिद्ध है । कहीं ब्रह्ममें भी प्रयुक्त हुआ देखा जाता है । जहाँ वाक्य-शेषके बलसे अथवा असाधारण गुणके श्रवणसे ब्रह्म निर्धारित होता है, जैसे कि ' यदेष आकाश - ' ( यदि यह आनन्दरूप आकाश न हो ) और ' आकाशो वै ० ' ( आकाश ही इस प्रसिद्ध नाम और रूपको प्रकट करने वाला है, वे जिसके आन्तर हैं वह ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतियोंमें है । अतः संशय होता है, तो यहाँ युक्त क्या है? पूर्वपक्षी - यहाँ आकाशशब्दसे भूताकाशका ग्रहण है, क्यों, भूताकाश ही अतिप्रसिद्ध प्रयोग होनेसे बुद्धिमें शीघ्र आरुढ होता है । और यह आकाश शब्द दोनोमें साधारण है ऐसा नहीं जाना जा सकता, क्योंकि ऐसा माननेसे एक शब्दके अनेक अर्थ होने का प्रसङ्ग हो जायगा । इससे ब्रह्ममें आकाश शब्द गौण होना युक्त है, कारण कि विभुत्वादि अनेक धर्मोसे युक्त होनेके कारण ब्रह्म आकाश के सदृश है । मुख्य अर्थका संभव हो तो गौण अर्थका ग्रहण युक्त नहीं है, अतः यहाँ मुख्य भूताकाशका ही ग्रहण संभव है । भूताकाशका ग्रहण करें तो ' सर्वाणि ह वा ० ' ( निश्चय ये सारे भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि वाक्यशेष उपपन्न नहीं होगा? यह दोष नहीं है, क्योंकि भूताकाश भी वायु आदि क्रमसे कारण हो सकता है, और ' तस्माद्वा ० ' ( शास्त्र-प्रसिद्ध परोक्ष आत्मा यही माया विशिष्ट आत्मा है उससे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि उत्पन्न होते हैं ) इत्यादि श्रुतियोंसे आकाशकी कारणता ज्ञात होती है । अन्य वायु आदि भूतोंकी ' सत्यानन्दी - दीपिका * गत अधिकरणमें ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' इत्यादि श्रुतियोंके आधारपर पापरहितत्वादि अव्यभिचारी ब्रह्मके लिंगोंसे रूपवत्त्वादि दुर्बल लिङ्गोंकी व्यवस्था उपाधि द्वारा की गई है । परन्तु यहाँ ' अस्य लोकस्य का गतिः ' यह छान्दोग्य श्रुति लिंगसे बलवती है, अतः यहाँ श्रुतिस्थ आकाश शब्दकी अन्य व्यवस्था नहीं की जा सकती अर्थात् यह आकाश शब्द ब्रह्मपरक न होकर भूताकाश परक है । इसप्रकार प्रत्युदाहरण संगति से पूर्वपक्ष उपस्थित होनेपर उसके उत्तरमें ' आकाशस्तल्लिङ्गात् ' इस सूत्रका आरम्भ है । ' अस्य लोकस्य ' यह छान्दोग्य श्रुति इस अधिकरणका विषयवाक्य है ।
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अधि ० ८ सू ० २२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १२१ शब्देन भूताकाशस्य ग्रहणमित्येवंप्राप्ते ब्रूमः - ' आकाशस्तल्लिङ्गात् ' अकाशशब्देन ब्रह्मणो ग्रहणं युक्तम् । कुतः? तल्लिङ्गात् । परस्य हि ब्रह्मण इदं लिङ्गम् - ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेवसमुत्पद्यन्ते ' इति । परस्माद्धि ब्रह्मणो भूतानामुत्पत्तिरिति वेदान्तेषु मर्यादा । ननु भूताकाशस्यापि वाय्वादिक्रमेण कारणत्वं दर्शितम् । सत्यम्, दर्शितम् । तथापि मूल-कारणस्य ब्रह्मणोऽपरिग्रहादाकाशादेवेत्यवधारणं, सर्वाणीति च भूतविशेषणं नानुकूलं स्यात् । * तथा ‘ अकाशं प्रत्यस्तं यन्ति ' इति ब्रह्मलिङ्गं ' आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ' इति चज्यायस्त्वपरायणत्वे । ज्यायस्त्वं ह्यनापेक्षिकं परमात्मन्येवैकस्मिन्नाम्नातम् -'ज्या-यान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ' ( छा ० ३ | १४ | ३ ) इति । तथा पराय णत्वमपि परसकारणत्वात्पमात्मन्येवोपन्नतरम् । श्रुतिश्च - ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातेर्दातुःपरायणम् अपेक्षा भूताकाशमे श्रेष्ठत्व और आश्रयत्व भी उपपन्न है, इसलिए आकाश शब्दसे भूताकाशका ग्रहण युक्त है । सिद्वान्ती — ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - ' आकाशस्तलिङ्गात् ' आकाश शब्दसे ब्रह्मका ग्रहण करना युक्त है, क्योंकि उसका लिङ्ग हैं | परब्रह्म के ग्रहण करने में ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि ' यह लिङ्ग प्रमाण है । वेदान्त वाक्योंमें यह मर्यादा है कि परब्रह्म से ही भूतोंकी उत्पत्ति होती है । परन्तु भूताकाश भी वायु आदि क्रमसे कारण दिखलाया गया है? ठीक, दिखलाया गया है, तो भी मूल कारण ब्रह्मके अपरिग्रहसे ' आकाशादेव ' ( आकाश से ही ) ' एव ' अवधारण और ' सर्वाणि ' ( सब ) यह भूतों का विशेषण अनुकूल ( संगत ) न होगा । उसी प्रकार ' आकारां ० ' ( आकाशमें लीन होते हैं ) यह ब्रह्मका लिङ्ग है । ' आकाशो ० ( आकाश इनसे महान् है और आकाश परमाश्रय है ) इस प्रकार ज्यायस्त्व और परमाश्रयत्व भी ब्रह्म के लिङ्ग हैं । ' ज्यायान्पृथिव्या ० ' ( यह मेरा आत्मा पृथिवीसे बड़ा अन्तरिक्षसे बड़ा द्युलोकसे बड़ा इन सब लोकोंसे बड़ा है ) यह श्रुति केवल एक पर-मात्मा में ही अपेक्षा रहित ज्यायस्त्व कहती है । तथा परमाश्रयत्व भी परम कारण होनेसे परमात्मामें ही युक्त है । ' विज्ञानमानन्दं ० ' ( ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है, वह धन देने वाले ( कर्म करने * पूर्वपक्षी - ' अस्य लोकस्य ' इस छान्दोग्य श्रुतिमें पठित आकाश शब्दसे भूताकाशका ग्रहण करना चाहिए ब्रह्मका नहीं, यदि ' यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ' इत्यादि श्रुतिके आधारपर आकाश शब्दसे ब्रह्मका ग्रहण करें. तो एक आकाश शब्दके भूताकाश और ब्रह्म दो अर्थं मानने पड़ेंगे, ऐसा मानने से सर्वत्र एक शब्दके अनेक अर्थ माननेका प्रसंग उपस्थित होगा जो सर्वथा अयुक्त है । यदि ऐसा है तो ' यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ' इत्यादि श्रुतियोंमें ब्रह्मके लिए आकाश शब्द प्रयोग क्यों किया गया है? इसलिए कि ' आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः ' ( ब्रह्म आकाशके समान सर्वगत और नित्य है ) इसप्रकार आकाशके समान विभूत्वादि अनेक धर्मं ब्रह्ममें श्रुति प्रतिपादित हैं, इस समानता के कारण ब्रह्ममें आकाश शब्दका गौण प्रयोग किया गया है । * ` यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ' इत्यादि श्रुतियोंके आधारपर आकाश शब्दसे ब्रह्मका ही ग्रहण करना ठीक है, भूताकाशका नहीं, क्योंकि ' सर्वाणि ह वा इमानि ० ' इत्यादि श्रुतियों में ब्रह्म ही सब भूतों का कारण कहा गया है । यदि भूताकाशको कारण मानें तो तेज आदिकी उत्पत्तिमें वायु आदिको भी कारण मानना पड़ेगा । यदि आकाश शब्दसे ब्रह्मका ग्रहण न करें तो ' आकाशादेव ' इस श्रुतिमें अवधारणार्थक ' एव ' का बाध होगा । ' सर्वाणि ह वा इमानि ० ' इस श्रुतिमें ' सर्व ' पद आकाश ( ब्रह्म ) से भिन्न सव भूतोंकी उत्पत्ति ब्रह्मसे ही कहता है । यदि ' सर्व ' पदसे आकाशको छोड़कर वायु आदि शेष भूतोंका ग्रहण करें तो सर्वपदमें अर्थका संकोच करना पड़ेगा जो सर्वथा अयुक्त है, अतः ' सर्व ' पदसे आकाशका भी ग्रहण है ।
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१२२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ ( बृ ० ३।९ ।२८ ) इति । अपि चान्तवत्त्वदोषेण शालावत्यस्य पक्षं निन्दित्वा, अनन्तं किंचि-द्वक्तुकामेन जैवलिना आकाशः परिगृहीतः, तं चाकाशमुद्गीथे संपाद्योपसंहरति- ‘ स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः ' ( छा ० १।९ ।२ ) इति । तच्चानन्त्यं ब्रह्मलिङ्गम् । यत्पुनरुक्तं भूताकाशं प्रसिद्धिबलेन प्रथमतरं प्रतीयत इति, अत्र ब्रूमः - प्रथमतरं प्रतीतमपि सत् वाक्यशेष गतान्ब्रह्मगुणान्दृष्ट्वा न परिगृह्यते । दर्शितश्च ब्रह्मण्यप्याकाशशब्दः - ' आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ' इत्यादौ । तथाकाशपर्यायवाचिनामपि ब्रह्मणि प्रयोगो दृश्यते - ' ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः ' ( ऋ ० सं ० १।१६४।३ ९ ) सैषा मार्गवी वारुणी वाले यजमानकी परमगति है अर्थात् कर्म फलका दाता है ) ऐसी श्रुति भी है । और उसी प्रकार अन्तवात्त्वदोषसे शालावत्यके पक्षकी निन्दाकर किसी अविनाशी वस्तुको कहनेकी इच्छा करनेवाले राजा जैवलिने आकाशका ग्रहण किया है । उस आकाशका उद्गीथ में संपादनकर ' स एष ० ' ( वह यह उद्गीथ परसे पर परम उत्कृष्ट है और यह अनन्त है ) ऐसा उपसंहार किया है । वह आनन्त्य ब्रह्मका लिङ्ग है । और जो पुनः यह कहा गया है कि प्रसिद्धिके वलसे आकाश शब्दसे प्रथम भूताकाश प्रतीत होता है । इस विषय में हम कहते हैं- आकाश पदसे प्रथम भूताकाश प्रतीत होता हुआ भी वाक्यशेषगत ब्रह्म गुणों को देखकर उसका ग्रहण नहीं किया जाता । और ' आकाशो ० ' ( आकाश ही नाम और रूपको प्रकट करनेवाला है ) इत्यादि श्रुतियोंमें ब्रह्ममें भी आकाश शब्दका प्रयोग दिखलाया गया है । तथा आकाशके पर्यायवाची शब्दोंका भी ब्रह्म में प्रयोग ' ऋचोऽक्षरे ० ' ( उत्कृष्ट, कूटस्थ इस आकाश ( ब्रह्म ) में सब वेद प्रमाण हैं और उसीमें देव अधिष्ठित हैं ) ' सैषा भार्गवी ० ' सत्यानन्दी - दीपिका * छान्दोग्योपनिषद् अध्याय १ खण्ड ८ - दालभ्य, शालावत्य ब्राह्मण और राजा जैवलि ये तीनों उद्गीथविद्यामें कुशल थे, परस्पर विचार आरम्भ किया कि उद्गीथकी प्रतिष्ठा क्या है? दालभ्य-ओंकाररूप उद्गीथका कारण स्वर ( ध्वनि ) है, उसका कारण? प्राण ( बल ) है, उसका कारण? अन्न है, अन्नका कारण? जल- वर्षा है, उसका कारण? स्वर्ग ( अन्तरिक्ष ) है, उसका कारण? कोई नहीं, स्वर्गस्थ देवगण प्रसन्न होकर यथासमय वृष्टि करते हैं, उससे अन्न, अन्नसे प्राण ( बल ), प्राणसे ध्वनि ( बोलने की शक्ति ) और ध्वनिसे ओंकार रूप उद्गीथ । इस प्रकार परम्परासे ओंकार-रूप उद्गीथकी प्रतिष्ठा स्वर्ग है । यह सुनकर शालावत्यने कहा- हे दालभ्य! स्वर्गकी प्रतिष्ठा यह रथान्तर साम ( पृथ्वी ) है, क्योंकि यहाँ यज्ञादि कर्म होते हैं, जिससे स्वर्गस्थ देवगण जीवित रहते हैं अथवा सन्तुष्ट होते हैं । इसलिए उद्गीथकी प्रतिष्ठा रथान्तर साम है अर्थात् पृथ्वी लोक है, उसका कारण कोई नहीं । राजा जैवलि - ' अन्तवद्वैकिल ते शालावत्य साम ' ( छा ० १२८८ ) ( हे शालावत्य! निश्चय, यह तेरा साम अन्तवाला है अर्थात् यह पृथ्वी लोक परिच्छिन्न और नाशवान् है ) तुमने यह मिथ्या कहा कि उद्गीथकी प्रतिष्ठा पृथ्वी लोक है, इस अपराधके कारण यदि कोई ऐसा कह देता कि तेरा मस्तक गिर जाय तो तेरा मस्तक गिर जाता । तब भयभीत होकर शालावत्य बोला - ' हे जैवलि! ‘ अस्य लोकस्य का गतिः ' ( इस पृथ्वी लोककी प्रतिष्ठा क्या है? ) जैवलि - ' आकाश इति सोवाच ' ( यह आकाश है ऐसा कहा ) इस प्रकार जैपलिने विनाशित्व और परिच्छिन्नत्व दोष देकर शालावत्य के पक्षकी निन्दाकी और उद्गीथकी प्रतिष्ठा आकाश कहा, अतः यहाँ अनन्त आकाश - ब्रह्मका ग्रहण है । ' उद्गीथ आकाश ही है ' इस प्रकार उद्गीथमें आकाशका संपादन करनेसे आकाशके अनन्त आदि गुणोंसे युक्त उद्गोथमें आकाशदृष्टिकर उपासना करनी चाहिए । यद्यपि आकाश शब्दसे सहसा भूताकाश ही प्रतीत होता है, तो भी ' आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ' इस वाक्यशेषके बलसे आकाश शब्दसे ब्रह्मका ही ग्रहण करना युक्त है ।
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अधि ० ९ सू ० २३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १२३ विद्या परमे व्योमन्प्रतिष्ठिता ' ( तै ० ३।६ ) ' ॐ कं ब्रह्म खं ब्रह्म ' ( छा ० ४।१०।५ ) ' खं पुराणम् ' ( वृ ० ५/१ ) इति चैवमादौ । वाक्योपक्रमेऽपि वर्तमानस्याकाशशब्दस्य वाक्यशेषवशाद्युक्ता ब्रह्मविषयत्वावधारणा | ' अग्निरधीतेऽनुवाकम् ' इति हि वाक्योपक्रमगतोऽप्यग्निशब्दो मानव-कविषयो दृश्यते । तस्मादाकाशशब्द ब्रह्मति सिद्धम् ॥२२ ॥
( ९ प्राणाधिकरणम् । सू ० २३ ) अत एव प्राणः ॥२३ ॥
पदच्छेद - अतः, एव, प्राणः । सूत्रार्थ - ( अतएव ) पूर्व सूत्रोक्त उत्पत्ति आदि लिङ्गोंसे ( प्राणः ) ' प्राण इति होवाच ' इस श्रुतिस्थ प्राण परमात्मा ही है । * उद्गीथे - ' प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता ' ( छा ० १1१०1 ९ ) इत्युपक्रम्य श्रुयते-' कतमासा देवतेति प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणम-भ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता ' ( छा ० १1११1४,५ ) इति तत्र संशयनिर्णय पूर्ववदेव द्रष्टव्यौ । ' प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः ' ( छा ० ६।८।२ ) ' प्राणस्य प्राणम् ' ( वृ ० ४।४।२८ ) इति ( यह मार्गवी वारुणी विद्या परब्रह्ममें प्रतिष्ठित है ) ' ॐ कं ब्रह्म ० ' ( ॐ क- सुख ब्रह्म है, ख - आकाश-व्यापक -ब्रह्म है ) और ' खं पुराणम् ० ' ( ख पुराण है ) इत्यादि श्रुतियोंमें देखा जाता है । वाक्यके आरम्भमें भी वर्तमान आकाश शब्दका वाक्यशेषके बलसे ब्रह्मविषयक निश्चय करना युक्त है । [ इसमें उदाहरण देते हैं ] ' अग्निरधीते ' ( अग्नि अनुवाक - वेदभाग का अध्ययन करता है ) इस वाक्यके आरम्भमें प्राप्त अग्नि शब्द भी माणवक विषयक देखा जाता है । इससे यह सिद्ध हुआ कि आकाश शब्द ब्रह्मविषयक है ॥ २२ ॥
सामवेदीय उद्गीथ प्रकरण में ' प्रस्तोतर्या देवता ० ' ( हे प्रस्तोता! जो देवता प्रस्ताव में अनुगत है ) ऐसा आरम्भकर ' कतमा सा ० ' ( वह प्रस्ताव अधिष्ठातृ देवता कौन है? चाक्राण - प्राण है, ऐसा कहा, क्योंकि ये सभी भूत प्राण में ही प्रवेश कर जाते हैं अर्थात् लीन हो जाते हैं, प्राणसे ही उत्पन्न होते हैं, वह यह प्राण देवता ही प्रस्तावमें अनुगत है ) ऐसा श्रुति कहती है । उसमें संशय और निर्णय पहले के समान ही समझने चाहिएँ । ' प्राणबन्धनं ' ( हे प्रिय! मन उपाधिसे उप-लक्षित जीव प्राण बन्धन वाला है अर्थात् प्राणोपलक्षित ब्रह्म के साथ सुषुप्ति में एक होता है ) और ' प्राणस्य ० ' ( जो उसे प्राणका प्राण जानते हैं ) इत्यादि श्रुतिवाक्यों में प्राणशब्द ब्रह्मविषयक देखा सत्यानन्दी - दीपिका * छान्दोग्यादि उपनिषदोंमें ' कं ब्रह्म, खं ब्रह्म ' ' खं ब्रह्म, खं पुराणम् ' ' परमे व्योमन् ' इसप्रकार आकाशके पर्यायवाची ' ख व्योम ' आदि शब्दों का प्रयोग ब्रह्ममें देखा जाता है । और आनन्दके पर्यायवाची कं शब्दका प्रयोग ब्रह्म में किया गया है, किन्तु लोक प्रसिद्ध भूताकाशमें नहीं, क्योंकि वह जड़ है | और उत्पद्यमान होनेसे ' खं पुराणम् ' वह अनादि भी नहीं है, इसलिए ' आकाश इति होवाच ' इस श्रुतिमें आकाश शब्द ब्रह्मपरक ही है । पूर्वपक्ष में भूताकाश दृष्टिसे उद्गीथकी उपासना है, सिद्धान्त में ब्रह्मदृष्टिसे ॥ २२ ॥
* भगवान् सूत्रकार आकाश वाक्यमें उक्त न्यायका ' प्राण इति होवाच ' इस वाक्यमें अति-देश करते हैं अर्थात् ' आकाश इति होवाच ' जैसे यहां आकाश शब्द ब्रह्मपरक है, वैसे ही ' प्राण इति होवाच ' इस वाक्यगत प्राणशब्द भी ब्रह्मपरक है । इसप्रकार अतिदेश संगतिसे ' अत एव प्राणः ' इस सूत्रका उल्लेख करते हैं । एक समय दुर्भिक्ष से पीड़ित उषस्त्रि नाम चक्रका पुत्र चाक्रायण धन-कामनासे राजाके यज्ञमें गया, वहां ऋत्विजों में से पहले प्रस्तोता से प्रश्न किया - ( हे प्रस्तोता! जो
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१२४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० चैवमादौ ब्रह्मविषयः प्राणशब्दो दृश्यते; वायुविकारे तु प्रसिद्धतरो लोकवेदयोः, अत इह प्राणशब्देन कतरस्योपादानं युक्तिमिति भवति संशयः । किं पुनरत्र युक्तम्? वायुविकारस्य पञ्चवृत्तेः प्राणस्योपादानं युक्तम् । तत्र हि प्रसिद्धतरः प्राणशब्द इत्यवोचाम | ननुपूर्ववदिहापि तलिङ्गाद्ब्रह्मण एव ग्रहणं युक्तम् । इहापि वाक्यशेषेभूतानां संवेशनोद्गमनं पारमेश्वरं कर्म प्रतीयते । न, मुख्येऽपि प्राणे भूतसंवेशनोद्गमनस्य दर्शनात् एवं । ह्याम्नायते -'यदा वै पुरुषः स्वपिति प्राणं तर्हि वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं मनः ' ' स यदा प्रबुध्यते प्राणादेवाधि पुनर्जायन्ते ' ( श ० ब्रा ० १० | ३ | ३ | ६ ) इति । प्रत्यक्षं चैतत्, स्वापकाले प्राणवृत्तावपरिलुप्य-मानायामिन्द्रियवृत्तयः परिलुप्यन्ते, प्रबोधकाले च पुनः प्रादुर्भवन्तीति । 8 इन्द्रियसारत्वाच्च भूतानामविरुद्धो मुख्ये प्राणेऽपि भूतसंवेशनोद्गमनवादी वाक्यशेषः । अपि चादित्योऽन्नं जाता है । देहमें चलने वाले वायुके विकार प्राण में तो लोक और वेदमें प्राण शब्द अतिप्रसिद्ध है । इसलिए यहाँ प्राण शब्दसे किसका ग्रहण करना युक्त है, ऐसा संशय होता है । तो यहाँ किसका ग्रहण युक्त है? वायुके विकार पाँच वृत्तिवाले प्राणका ग्रहण करना युक्त है, क्योंकि उसमें ही प्राणशब्द विशेषरूप से प्रसिद्ध है, ऐसा हम कह चुके हैं । यदि कहो कि पूर्व अधिकरण के समान इस अधि-करणमें भी ब्रह्म के लिङ्गोंसे ब्रह्मका ही ग्रहण युक्त है । क्योंकि यहाँ भी वाक्य शेष [ सर्वाणि ह वा इमानि ] में भूतोंका लय और उद्गम परमेश्वरका कर्म प्रतीत होता है । तो यह ठीक नहीं है, कारण कि मुख्यप्राण में भी भूतोंके लय और उद्गम देखे जाते हैं । श्रुति ऐसा कहती है कि ' यदा वै ० ' ( निश्चय जब पुरुष सोता है तब वाणी प्राणमें ही लीन होती है, चक्षु प्राणमें, श्रोत्र प्राणमें और मन प्राण में लीन होता ) । और यह प्रत्यक्ष है कि सुपुप्ति कालमें प्राणव्यापारके अलुप्त होनेपर भी इन्द्रियों के व्यापार लुप्त हो जाते हैं और जाग्रत् कालमें प्रकट होते हैं साररूप हैं, इसलिए भूतोंके लय और उद्गमका प्रतिपादक वाक्यशेष मुख्य है । किञ्च प्रस्तावदेवता प्राणके कथनानन्तर उद्गीथ और प्रतिहारके देवता निर्देश है । जैसे ये दोनों ( आदित्य और अन्न ) ब्रह्म नहीं है, वैसे ही उनके सत्यानन्दी - दीपिका देवता प्रस्ताव - भक्ति में अनुगत है, यदि तू उसे विना जाने प्रस्तवन करेगा जायगा ) इसीप्रकार उद्गाता और प्रतिहर्तासे भी कहा । यहाँ विशेष ज्ञातव्य । और इन्द्रियाँ भूतोंकी प्राण में भी विरुद्ध नहीं आदित्य और अन्नका सादृश्यसे प्राण भी ब्रह्म तो तेरा मस्तक गिर यह है कि ' पञ्च भक्तिकं साम सप्तभक्तिकं सामेति ' ' पाँच भक्ति साम और सात भक्ति साम इसप्रकार सामके दो भेद हैं । ' यहाँ भक्तिशब्द अवयव वाचक है अर्थात् सामवेदके भागको भक्ति कहते हैं । हिंकार, ओंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार, उपद्रव और निधन । इनमेंसे प्रस्तावका गायन करनेवाला प्रस्तोता, उद्गीथ-का गायन करनेवाला उद्गाता और प्रतिहारका गायन करनेवाला प्रतिहर्ता कहलाता है । उपद्रव और निधन दोनोंको तीनों मिलकर गायन करते हैं । और ओंकारको यहाँ पृथक् नहीं कहा गया है । तब प्रस्तोताने चक्रायणसे कहा कि ' प्रस्ताव में अनुगत वह देवता कौन है? उषस्ति - ' प्राण इति होवाच ' ( वह प्राण है, ऐसा कहा ) । इसमें प्राणको ही सभी भूतोंकी उत्पत्ति और लयका कारण कहां गया है । इस कारण प्राणशब्दसे ब्रह्मका ग्रहण हो सकता है वायुके विकार प्राण में भी लोक और वेदमें प्राण शब्द प्रसिद्ध है, तो इससे सन्देह होता है कि यहां प्राण शब्दसे किसका ग्रहण करना युक्त है? * समाधान - ' इंद्रियसारत्वाच्च ' ' त्यस्य ह्येष रस: ' बृह ० ( २ | ३ | ५ ) ( इन्द्रियाँ त्यत् आका- -शादिका सार हैं ) इससे यह स्पष्ट होता है कि इन्द्रियाँ अपञ्चीकृत भूतोंकी साररूप हैं ) उनके लयादि के कथन से भूतोंके भी लयादि प्राण में सिद्ध होते हैं, इसप्रकार ' सर्वाणि हवा ' यह वाक्यशेष भी संगत है । उसी प्रसंगमें उद्गाताने चाक्रायणसे पूछा ' कतमा सा देवता ' ( छा || ११ | ६ ) ( उद्गीथमें
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अधि ० ९ सू ० २३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित १२५ चोदगीथप्रतिहारयोर्देवते प्रस्तावदेवतायाः प्राणस्यानन्तरं निर्दिश्येते । न व तयोर्ब्रह्माचमस्ति, तत्सामान्याच्च प्राणस्यापि न ब्रह्मत्वमित्येवं प्राप्ते सूत्रकार आह— ' अत एव प्राणः ' इति । ' तल्लिङ्गात् ' इति पूर्वसूत्रे निर्दिष्टम् । अत एव तल्लिङ्गात्प्राणशब्दमपि परं ब्रह्म भवितुमर्हति । प्राणस्यापि हि ब्रह्मलिङ्गसंबन्धः श्रूयते - ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते ( छा ० १।११।५ ) इति । प्राणनिमित्तौ सर्वेषां भूतानामुत्पत्तिप्रलयावुच्यमानौ प्राणस्य ब्रह्मतां गमयतः । ननूक्तं मुख्यप्राणपरिग्रहेऽपि संवेशनोद्गमनदर्शनमविरुद्धं; स्वाप प्रबोधयोदर्शनादिति । अत्रोच्यते - स्वापप्रबोधयोरिन्द्रियाणमेव केवलानां प्राणाश्रयं संवेशनोद्गमनं दृश्यते, न सर्वेषां भूतानाम् । इह तु सेन्द्रियाणां सशरीराणां च जीवा-विष्टानां भूतानां; ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि ' ( छा ० १।११।५ ) इति श्रुतेः! यदापि भूत-श्रुतिर्महाभूत विषया परिगृह्यते, तदापि ब्रह्मलिङ्गत्वमविरुद्धम् । ननु सहापि विषयरिन्द्र-याणां स्वापप्रवोधयोः प्राणेऽप्ययं प्राणाच्च प्रभवं शृणुमः - ' यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्य-नहीं है । सिद्धान्ती --- ऐसा प्राप्त होनेपर भगवान् सूत्रकार कहते हैं— ' अत एव प्राण: तल्लिङ्गात् ' ऐसा पूर्व सूत्रमें निर्देश किया गया है, इससे उसके लिङ्गोंसे प्राणशब्द वाच्य परब्रह्म होना चाहिए, क्योंकि ' सर्वाणि ह वा इमानि ' यह श्रुति प्राणका भी ब्रह्मलिङ्गके साथ सम्बन्ध कहती है । इसमें प्राण निमित्तक सभी भूतोंके कहे हुए उत्पत्ति और प्रलय प्राण में ब्रह्मत्वका बोध कराते हैं । परन्तु जो यह कहा गया है कि मुख्य प्राणका परिग्रह होनेपर भी लय और उत्पत्तिका दर्शन विरुद्ध नहीं है, क्योंकि सुषुप्ति और जाग्रत् में ऐसा देखने में आता है । इसपर कहते हैं- सुषुप्ति और प्रबोध कालमें केवल इन्द्रियों के ही प्राणाश्रय लय और उद्गम देखे जाते हैं सब भूतोंके नहीं, परन्तु यहाँ तो इन्द्रिय सहित, शरीर सहित और जीवसे सम्बद्ध भूतोंके प्राणाश्रय लय और उद्गम हैं, क्योंकि ' सर्वाणि ह वा इमानि ' ऐसी श्रुति है | यदि यह भूतश्रुति महाभूत विषयक गृहीत हो तो भी ब्रह्मलिङ्गत्वमें कोई विरोध नहीं हैं । परन्तु इसप्रकार हम सुनते हैं कि सुषुप्ति और जाग्रत् कालमें विषयों सहित इन्द्रियोंका प्राण में लय और प्राणसे उद्भव होता है, क्योंकि ' यदा सुप्तः ० ' ( जब सोता हुआ पुरुष कुछ स्वप्न नहीं सत्यानन्दी - दीपिका कौन देवता अनुगत है? ) चाक्रायण - ' आदित्य इति होवाच ' ( छा ० १1११1७ ) ( आदित्य है, ऐसा कहा ) प्रतिहर्ता - ' कतमा सा देवता ' ( प्रतिहारमें कौन देवता अनुगत है? ) ' अन्नमिति होवाच ' ( छा ० १।११।९ ) ( वह देवता अन्न है, ऐसा कहा ) इसप्रकार प्रस्ताव देवताके कथनानन्तर उद्गीथके देवता आदित्य और प्रतिहारके देवता अन्नका कथन किया गया है । इस प्रश्नोत्तरमें जैसे आदित्य और अन्न ब्रह्म नहीं हैं, वैसे ही यहाँ आदित्य और अन्नके सन्निहित पठित होनेसे प्राण भी ब्रह्म नहीं है । इसलिए ' प्राण इति होवाच ' यहाँ प्राण शब्दसे वायुके विकार पाँच वृत्तिवाले प्राणका ग्रहण करना युक्त है । * ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते ' ( छा ० १।९ ।१ ) ( ये सब भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं ) इस श्रुतिमें जैसे भूतों का विशेषण ' सर्व ' पद आकाशमें ब्रह्मत्वका बोधक लिङ्ग है, वैसे ही ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि ' ( छा ० १1११।५ ) इस श्रुतिमें भी भूतोका विशेषण ' सर्व ' पद प्राण में ब्रह्मत्वका बोधक लिङ्ग है । इससे ' प्राण इति होवाच ' यहाँ प्राण शब्द ब्रह्मपरक है । किच ' सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि ' यह श्रुति सब भूतोंके साथ वायुकी भी उत्पत्ति कहती है, और ' आकाशाद्वायुः ' ( आकाशसे वायु उत्पन्न होता है ) इस अन्य श्रुतिमें भी वायुकी उत्पत्ति कही गई है । इससे जब प्राणका कारण भूतं वायु भी सब भूतोंके लय और उद्गमका कारण नहीं तो वायुका विकार प्राण सब भूतोंके लय और उद्गमका कारण हो यह कथन केवल साहस मात्र है ।
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१३६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० पा ० १ थास्मिन्प्रण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति ' ( कौ ० ३ | ३ ) इति । तत्रापि तल्लिङ्गात्प्राणशब्दं ब्रह्मैव । यत्पुनरुक्तम् - अन्नादित्यसंनिधानात्प्राणस्याब्रह्मत्वमिति, तद-युक्तम्; वाक्यशेषवलेन प्राणशब्दस्य ब्रह्मविषयतायां प्रतीयमानायां संनिधानस्याकिंचित्क-रत्वात् । यत्पुनः प्राणशब्दस्य पञ्चवृत्तौ प्रसिद्धतरत्वं तदाकाशशब्दस्येव प्रतिविधेयम् । तस्मात्सिद्धं प्रस्तावदेवतायाः प्राणस्य ब्रह्मत्वम् । अत्र केचिदुहारन्ति - ' प्राणस्य प्राणम् ' ( वृ ० ४।४।१८ ) ' प्राणत्र धनं हि सोम्य मनः ' ( छा ० ६८१२ ) इति च - तदयुक्तं शब्द भेदात्प्रकरणाच्च संशयानुपपत्तेः । यथा पितुः पितेति प्रयोगेऽन्यः पिता षष्ठीनिर्दिष्टोऽन्यः प्रथमानिर्दिष्टः पितुः पितेति गम्यते, तद्वत् ' प्राणस्य प्राणम् ' इति शब्दभेदात्प्रसिद्धात्प्राणा-दन्यः प्राणस्य प्राण इति निश्चीयते । नहि स एव तस्येति भेदनिर्देशार्हो भवति । यस्य च प्रकरणे या निर्दिश्यते नामान्तरेणापि स एव तत्र प्रकरणी निर्दिष्ट इति गम्यते । यथा देखता तब यह प्राण में ही एक होता है और उसी समय उसमें सभी नामोंके साथ वाणी लीन होती है ) यह श्रुति है | इसमें भी ब्रह्मके लिंगोंसे प्राणशब्द वाच्य ब्रह्म ही है । और जो यह कहा गया है कि अन और आदित्यकी संनिधिसे प्राण ब्रह्म नहीं है, वह अयुक्त है, क्योंकि वाक्यशेषके बलसे प्राण शब्द ब्रह्मविषयक प्रतीत होनेपर सन्निधान प्रयोजन रहित है । पुनः यह भी कहा गया है कि प्राणशब्द पाँच वृत्तिवाले मुख्य प्राणमें अतिप्रसिद्ध है, उस आक्षेपका परिहार आकाश शब्दके समान समझना चाहिए | इससे यह सिद्ध हुआ कि प्रस्तावका देवता प्राण ब्रह्म है । यहाँ वृत्तिकार ' प्राणस्य प्राणम् ' ' प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः ' ( हे सोम्य! मन उपहित जीव प्राण - ब्रह्मके साथ सुषुप्ति में एक होता है ) इसप्रकार श्रुतिका उदाहरण देते हैं । वह ठीक नहीं है, क्योंकि शब्द भेदसे और प्रकरणसे संशय नहीं हो सकता । यथा ' पितुः पिता ' ( पिताका पिता ) इस प्रयोग में षष्ठी विभक्तिसे निर्दिष्ट पिता अन्य है और प्रथम निर्दिष्ट पिता अन्य है, इससे ' पितुः पिता ' ऐसा अवगत होता है । वैसे ही ' प्राणस्य प्राणम् ' ( प्राणका प्राण ) इसमें शब्दभेदसे प्रसिद्ध मुख्य प्राणसे भिन्न प्राणका प्राण है ऐसा निश्चित होता है, क्योंकि एक ही पदार्थ ' तत् से कहा हुआ ' तस्य ' ( उसका ) इसप्रकार भेद निर्देशके योग्य नहीं होता अर्थात् प्रथमासे कहे हुए पदार्थको भेदरूप षष्ठीसे कहना युक्त नहीं है । जिसके प्रकरण में जो निर्दिष्ट होता है उस प्रकरण में अन्य नामसे भी वही प्रकरणी ( प्रकृत ) निर्दिष्ट होता है, ऐसा ज्ञात होता है । जैसे ज्योतिष्टोमके प्रकरण में ' वसन्ते वसन्ते ० ' ( प्रति वसन्त ऋतुमें ज्योति: याग करे ) सत्यानन्दी - दीपिका ** किञ्च अन्न और आदित्यकी संनिधिमें पठित होनेसे भी प्राण ब्रह्म नहीं है, क्योंकि वाक्यान्तर-निधिक अपेक्षा स्ववाक्यावगत लिंग बलवान् होता है ' हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिसंस्थितः । उदानः कण्ठदेशे स्याद् व्यानः सर्वशरीरगः । ' ( हृदयमें प्राण, गुदा में अपान, नाभिमें समान, कण्ठ-देशमें उदान और व्यान सारे शरीर में है ) इसप्रकार पाँच वृत्तिवाला शरीरान्तः संचारी वायुका विकार प्राण यहाँ प्राणशब्दसे ग्राह्य नहीं है । आकाशशब्द लोकप्रसिद्ध भूतकाशमें अतिप्रसिद्ध होनेपर भी जैसे ' आकाश इति होवाच ' यहाँ ब्रह्मपरक है, वैसे ही प्राण शब्द अध्यात्म मुख्य प्राण में अतिप्रसिद्ध होनेपर भी ' प्राण इति होवाच ' यहाँ ब्रह्मपरक ही है । वृत्तिकार ' प्राणस्य प्राणम् ' को इस अधिकरणका विषय वाक्य मानते हैं, परन्तु भगवान् भाष्यकारने शब्दभेद और प्रकरण इन दो हेतुओंसे उसका खण्डन किया है । परन्तु ' पुरुषस्य चैतन्यम् ' ' राहोः शिरः ' जैसे यहां अभेदमें मी षष्ठी और प्रथमा विभक्तिका निर्देश है, वैसे ' प्राणस्य प्राणम् ' यहाँ भी होना चाहिए? परन्तु यहाँ तो दोनों शब्दोंसे निर्दिष्ट पदार्थों में भेद है ।