श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 161–170
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 161–170
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अधि ० १० सू ० २४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १२७ ज्योतिष्टोमाधिकारे - ' वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत ' इत्यत्र ज्योतिःशब्दो ज्योतिष्टोम विषयो भवति, तथा परस्य ब्रह्मणः प्रकरणे ' प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः ' ( छा ० ६।८।२ ) इति श्रुतः
प्राणशब्दो वायुविकारमात्रं कथमवगमयेत्? अतः संशयाविषयत्वान्न तदुदाहरणं युक्तम् ।
प्रस्तावदेवतायां तु प्राणे संशय पूर्वपक्षनिर्णया उपपादिताः ॥२३ ॥
( १० ज्योतिश्चरणाधिकरणम् सू ० २४-२७ ) ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॥२४ ॥
परिच्छेद - ज्योतिः, चरणाभिधानात् । सूत्रार्थ - ( ज्योतिः ) ' यदतः परो दिवो ' यहां ज्योतिः शब्दसे ब्रह्म ही ग्राह्य है, ( चरणाभि-धानात् ) क्योंकि ' पादोऽस्य ' इस पूर्ववाक्यमें पदका अभिधान है । * इदमामनन्ति - ' अथ यदतः परो दियो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्टेषु सर्वतः पृष्टेष्वनुत्तमे-पूत्तमेषु लोकेच्विदं वाच तद्यदिदमस्मिन्नन्तःपुरुषेः ज्योति: ' ( छा ० ३।१३।७ ) इति । तत्र संशयः -किमिह ज्योतिःशब्देनादित्यादिकं ज्योतिरभिधीयते किंवा परमात्मेति । अर्थान्तरविषयस्यापि शब्दस्य तल्लिङ्गाद्ब्रह्मविषयत्वमुक्तम्, इह तु तल्लिङ्गमेवास्ति नास्तीति विचार्यते । किं ताव-त्प्राप्तम्? 8 आदित्यादिकमेव ज्योतिःशब्देन परिगृहात इति । कुतः? प्रसिद्धेः । तमो यहाँ ज्योतिः शब्द ज्योतिष्टोम विषयक है, वैसे ही परब्रह्म के प्रकरण में ' प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः ' इसमें श्रुत प्राणशब्द केवल वायुके विकारमात्रका कैसे बोध करायेगा? अतः संशयका विषय न होनेसे यह उदाहरण ठीक नहीं है । प्रस्तावके देवता प्राणमें तो संशय, पूर्वपक्ष और निर्णयका उपपादन किया गया है ॥ २३ ॥
छान्दोग कहते हैं— ' अथ यदतः ० ', ( तथा इस द्युलोक से परे जो परम ज्योति विश्वके पृष्ठ पर अर्थात् सबके ऊपर जिससे उत्तम कोई दूसरा लोक नहीं है ऐसे उत्तम लोकोंमें प्रकाशित हो रही है वह निश्चय यही है जो कि इस पुरुष ( देह ) के भीतर ज्योति है ) यहाँ संशय होता है कि श्रुतिमें ज्योतिः शब्दसे आदित्यादि ज्योतिका अभिधान है अथवा परमात्मा का? अन्य अर्थ विषयक शब्द भी ब्रह्मलिङ्गसे ब्रह्मविषयक कहा गया है । परन्तु यहाँ ब्रह्मका लिङ्ग है अथवा नहीं, ऐसा विचार किया जाता है, तो क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - ज्योतिः शब्दसे आदित्यादिका ही परिग्रह होता है, क्यों? क्योंकि उनमें ज्योतिः शब्दकी प्रसिद्धि है । अन्धकार और ज्योति ये दो शब्द परस्पर विरोधी अर्थों में प्रसिद्ध हैं । सत्यानन्दी - दीपिका 8 यद्यपि ' प्राण इति होवाच ' यहाँ एक प्राणशब्द मुख्यप्राणका वाचक है अथवा परब्रह्मका ऐसा संशय हो सकता है, तथापि ' प्राणस्य प्राणम् ' इस श्रुति वाक्यमें भिन्न - भिन्न अर्थोके प्रतिपादक दो प्राण शब्द हैं । इनमें प्रथमाविभक्ति निर्दिष्ट द्वितीय प्राणशब्द ब्रह्मपरक है; इसलिए इस वाक्यसे संशय के असंभव से पूर्वपक्षका भी अभाव है । इसकारण ' प्राणबन्धनं ' इत्यादि श्रुति वाक्योंका उदाहरणरूपसे उल्लेख करना वृत्तिकारको युक्त नहीं है । अतः यहाँ आकाशशब्द के समान प्राणशब्द भी ब्रह्मपरक है । पूर्वपक्ष में प्रस्तावमें लोक प्रसिद्ध मुख्यप्राणदृष्टिसे उपासना है और सिद्धान्त में ब्रह्मदृष्टिसे उपासना है ॥ २३ ॥
* ' आकाश इति होवाच ' ' प्राण इति होवाच ' इन दोनों श्रुति वाक्योंमें जैसे आकाश शब्द और प्राणशब्द ब्रह्मवाचक हैं, वैसे ' यदतः परो दिवो ' इस श्रुतिमें पठित ज्योति: शब्द मी ब्रह्मवाचक है, इसे दिखलाने के लिए यह अधिकरण आरम्भ किया जाता है । यथा आकाशशब्द और प्राणशब्द ब्रह्म-बोधक लिङ्गसे ब्रह्मविषयक हैं, वैसे इस ज्योतिः वाक्यमें ब्रह्म बोधक लिङ्ग दृष्टिगोचर नहीं होता, इससे यह ' ज्योति ' शब्द ब्रह्म परक नहीं है, इस प्रकार प्रत्युदाहरणसंगति से इस अधिकरणका आरम्भ है ।
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१२८. ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ ज्योतिरिति हीमौ शब्दौ परस्परप्रतिद्वन्द्विविषयौ प्रसिद्धौ । चक्षुर्वृत्तेर्निरोधकंशार्वरादिकं तम उच्यते । तस्या एवानुग्राहकमादित्यादिकं ज्योतिः । तथा ' दीप्यते ' इतीयमपि श्रुतिरादित्यादि-विषया प्रसिद्धा । नहि रूपादिहीनं ब्रह्म ' दीप्यते ' इति मुख्यां श्रुतिमर्हति । द्युमर्यादत्वश्रुतेश्च । नहि चराचरबी जस्य ब्रह्मणः सर्वात्मकस्य द्यौर्मर्यादायुक्ताः कार्यस्य तुज्योतिषः परिच्छिन्नस्य द्यौर्मर्यादा स्यात् । ' परो दिवो ज्योतिः ' इति च ब्राह्मणम् । ननु कार्यस्यापि ज्योतिषः सर्वत्र-गम्यमानत्वादद्युमर्यादावत्त्वमसमञ्जसम् । अस्तु तर्ह्यत्रिवृत्कृतं तेजः प्रथमजम् । न; अत्रि-वृत्कृतस्य तेजसः प्रयोजनाभावादिति । इदमेव प्रयोजनं यदुपास्यत्वमिति चेत्, -न; प्रयोज-नान्तरप्रयुक्तस्यैवादित्यादेरुपारयत्वदर्शनात् । ' तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणि ' ( छा ० ६! ३।३ ) इतिचाविशेषश्रुतेः । नचात्रिवृत्कृतस्यापि तेजसो द्युमर्यादत्वं प्रसिद्धम् । अस्तु तर्हि त्रित्कृत-भेव नत्तेजो ज्योतिःशब्दम् । ननूक्तमर्वागपिदिवोऽवगम्यतेऽग्न्यादिकं ज्योतिरिति । नैष दोषः; सर्वत्रापि गम्यमान ज्योतिषः ' परो दिवः ' इत्युपासनार्थः प्रदेशविशेषपरिग्रहो न विरुध्यते । न तु निष्प्रदेशस्यापि ब्रह्मणः प्रदेशविशेषकल्पना भागिनी । ' सर्वतः पृष्टेष्वनुत्तमेषूत्त-चक्षुवृत्तिका निरोधक रात्रि आदिका अन्धकार तम कहलाता है और उसी व्यापारका सहायक आदित्यादि ज्योति: कहलाता है । उसी प्रकार ' दीप्यते ' ( प्रकाशित होता है ) यह श्रुति भी आदित्यादि विषयक प्रसिद्ध है, और रूपादि रहित ब्रह्ममें ' दीप्यते ' यह श्रुति मुख्यरूपसे नहीं घटती, क्योंकि द्युलोक ज्योतिकी सीमा है, ऐसी श्रुति है । चर और अचर सृष्टिके बीज भूत सर्वात्मक ब्रह्मकी द्युलोक मर्यादा युक्त नहीं है, परन्तु कार्यरूप परिच्छिन्न ज्योतिमें द्युलोक मर्यादा युक्त है; कारण कि ' परो दिवो ज्योतिः ' इस प्रकार ब्राह्मण ग्रन्थ भी है । यदि कहो कि [ ब्रह्मके समान ] कार्यरूप ज्योति भी सर्वत्र गम्यमान ( विद्यमान ) है, अतः द्युलोक उसकी मर्यादा है यह कथन असंगत है, तो प्रथम उत्पन्न हुए केवल अत्रिवृत्कृत ( तीनों भागों में अविभक्त, अन्न, जलसे असम्बद्ध ) तेजको ज्योतिः मानो, ऐसा नहीं, क्योंकि अत्रिवृत्कृत तेजका प्रयोजन नहीं है । यदि कहो कि यही प्रयोजन है जो वह ( अत्रिवृत्कृत तेज ) उपास्य है, तो यह ठोक नहीं है ) कारण कि अन्य प्रयोजन में ( अन्धकारकी निवृत्ति में ) प्रयुक्त आदित्य आदि उपास्य देखनेमें आते हैं । और ' तासां त्रिवृतं ० ' ( उनमें एक एकको त्रिवृत त्रिवृत करूँ ) यह अविशेष श्रुति है । अत्रिवृत्कृत तेजकी द्युमर्यादा प्रसिद्ध नहीं है, तब तो त्रिवृत्कृत वह तेज ही ज्योतिः शब्द वाच्य होगा । परन्तु जो यह कहा गया है कि द्युलोकसे नीचे भी अग्नि आदि ज्योतिः अवगत होती है, यह दोष नहीं है, सर्वत्र गम्यमान ज्योतिका भी ' परो दिवः ' ( चुसेपर ) इस प्रकार उपासनाके लिए प्रदेश विशेषका ग्रहण विरुद्ध नहीं है परन्तु प्रदेशरहित ब्रह्म में प्रदेश विशेषकी कल्पना युक्त नहीं सत्यानन्दी - दीपिका यदि कहो कि अज्ञान रूपी अन्धकारका विरोधी ज्ञान स्वरूप ब्रह्म भी ज्योतिः शब्द वाच्य हो सकता है, तो ऐसा नहीं, क्योंकि चक्षु वृत्तिका निरोधक नीला और पदार्थोंका आवर्तक अन्धकार ही तम है, उसका ब्रह्म विरोधी ( निवारक ) नहीं है, क्योंकि दोनोका परस्पर विरोध ही नहीं है । इसलिए ज्योतिः शब्दसे आदित्यादिका ग्रहण युक्त है । * ' दासा तिवृतं ' तिवृत इसप्रकार है - तेज, जल और पृथिवी इन तीनोंमें से एक एकके दो दो भाग, एक आधा आधा भाग अलगकर दूसरे आधे आधे भागके फिर दो दो भाग । आधा भाग अपना और दो भाग दूसरेके अर्थात् तेजको आधा भाग अपना और चतुर्थांश चतुर्थांश जल और पृथ्वीके, इसीप्रकार तेज आदि त्रिवृत्कृत होते हैं, जिस प्रकार रस्सी तीनगुणवाली होती है, उसी प्रकार हिरण्यगर्भने त्रिवृत्कृत स्थूलसृष्टिका आरम्भ किया । इस त्रिवृत्करण के विना तेज और उसकी सीमा प्रसिद्ध नहीं है तो त्रिवृत्कृत तेजकी ही ज्योतिः शब्द वाच्य मानना चाहिए ।
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अधि ० १० सू ० २४ ] भाषानुवाद - सलानन्दी - दीपिकासहित १२ ९ मेषु लोकेषु ' इति चाधारव हुत्वश्रुतिः कार्ये ज्योतिष्युपपद्यतेतराम् । ' इदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः-पुरुषे ज्योतिः ' ( छा ० ३।१३।७ ) इति च कौक्षेये ज्योतिषि परं ज्योतिरध्यस्यमानं दृश्यते । सारूप्यनिमित्ताश्चाध्यासा भवन्ति । यथा - तस्य भूरिति शिर एकं शिर एकमेतदक्षरम् ' ( बृ ० ५/५/३ ) इति । कौक्षेयस्य तु ज्योतिषः प्रसिद्धमब्रह्मत्वम्; ' तस्यैषा दृष्टिः ' ‘ तस्यैषा श्रुतिः ’ ( छा ० ३।१३।८ ) इति चौष्ण्य घोषविशिष्टत्वस्य श्रवणात् । * ' तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत ' इति च श्रुतेः ' चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद ' ( छा ० ३।१३।८ ) इति चाल्पफलश्रवणादब्रह्मत्वम् । महते हि फलाय ब्रह्मोपासनमिष्यते । नचान्यदपि किंचित्स्ववाक्ये प्राणाकाशवज्ज्योतिषोऽ-स्ति ब्रह्मलिङ्गम् । नच पूर्वस्थिन्नपि वाक्ये ब्रह्म निर्दिष्टमस्ति; ' गायत्री वा इदं सर्वं भूतम् ' इति छन्दोनिर्देशात् । अथापि कथंचित्पूर्वस्मिन्वाक्ये ब्रह्म निर्दिष्टं स्यात्, एवमपि न तस्येह प्रत्यभिज्ञानमस्ति । तत्र हि ' त्रिपादस्यामृतं दिवि ( छा ० ३।१२।१, ६ ) इति द्यौरधिकरणत्वेन श्रूयते, अत्र पुनः ' परो दिवो ज्योतिः ' इति द्यौर्मर्यादात्वेन । तस्मात्प्राकृतं ज्योतिरिह ग्राह्य है | ‘ सर्वतः पृष्टेष्वनु ० ' ( भू आदि सभी लोकोंसे ऊपर जिससे ऊपर उत्तम कोई दूसरा लोक नहीं है ऐसे उत्तम लोकोंमें ) इस तरह बहुतसे आधारोंकी प्रतिपादिक यह श्रुति कार्य ज्योतिमें अधिक संगत होगी । ' इदं वाव ० ' ( वह निश्चय यही है जो कि इस पुरुष ( देह ) के भीतर ज्योति है ) इससे कुक्षिस्थ ज्योतिमें परज्योतिका आरोप किया हुआ देखा जाता है और सादृश्यनिमित्तक अध्यास होते हैं । जैसे ' तस्य भूरिति शिर एकं ० ' ( उस पुरुषका भूः यह शिर है, क्योंकि शिर एक है और यह भूः अक्षर भी एक है ) परन्तु यह प्रसिद्ध है कि कुक्षिस्थ ज्योति: ( जठराग्नि ) ब्रह्म नहीं है, क्योंकि ' तस्यैषा दृष्टिः ० ’ ( यह उस हृदयस्थ पुरुषकी दृष्टि - दर्शनोपाय है और यह उसकी श्रुति श्रवणोपाय है अर्थात् देहको स्पर्श करनेसे उष्णताका ज्ञान जठराग्निका दर्शनोपाय है और श्रोत्रको बन्द करनेसे शब्द विशेषका श्रवण जठराग्निका श्रवणोपाय है ) इसप्रकार उष्णता और घोषविशिष्टत्वकी यह श्रुति है । ' तदेतद्द्दष्टं २० ' ( वह ज्योति दृष्ट और श्रुत है इसप्रकार उपासना करे ) इस श्रुतिसे और ' चक्षुप्य श्रुतो ० ' ( जो उपासक ऐसा जानता है, वह दर्शनीय और विख्यात होता है ) इस अल्पफलके श्रवण ( श्रुति ) से ज्योति ब्रह्म नहीं है । निश्चय ब्रह्मकी उपासना महान् फलके लिए अभीष्ट है । प्राण एवं आकाशके समान ज्योति ब्रह्म है, ऐसा दिखलाने वाले स्ववाक्यमें ब्रह्मका बोधक अन्य कोई भी लिङ्ग नहीं है । पूर्ववाक्यमें भी चतुष्पाद् ब्रह्म निर्दिष्ट नहीं है, क्योंकि ' गायत्री वा इदं ० ' ( वह सब भूत गायत्री ही हैं ) इसप्रकार छन्दका निर्देश है । यदि पूर्वं वाक्यमें किसी प्रकार ब्रह्म निर्दिष्ट है ऐसा मान भी लें तो भी यहाँ उसका प्रत्यभिज्ञान नहीं होता, क्योंकि उसमें ' त्रिपादस्य ० ' ( इसके तीन पाद अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित हैं ) इसप्रकार द्युलोक आधाररूपसे श्रुत है । और यहाँ तो ' परो दिवो ० ' ( ज्योति द्युलोकसे परे है ) द्युलोक मर्यादारूपसे सुना जाता है । इसलिए सत्यानन्दी - दीपिका * उपासना प्रायः अध्यारोप मूलक होती है और अध्यारोपका हेतु सादृश्य है । जैसे भूः इस व्याहृति में प्रजापतिके शिरकी दृष्टिका विधान है, वैसे कुक्षिस्थ ज्योतिः ( जठराग्नि ) में आदित्यादि परज्योतिका अध्यारोप कर उसकी उपासनाका विधान है अर्थात् जठराग्नि आदित्यादि ज्योति है, ऐसा मानकर जठराग्निक आदित्यरूपसे उपासना करनी चाहिए, क्योंकि दोनोंमें जड़त्व, तेजस्त्व समान है । ब्रह्म तो शब्दादि रहित है, अतः जठराग्नि ब्रह्म नहीं है । * पूर्वपक्षी - ' तदेतद्दृष्टं च ' आदिसे दूसरेका उल्लेख करते हैं । ' ब्रह्मविदाप्रोति परम् ' इस प्रकार ब्रह्मोपासनाका तो मोक्षरूप महान् फल कहा गया है । अल्प और महान् फलके भेदसे भी
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१३० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ मित्येवं प्राप्ते ब्रूमः -- ज्योतिरिह ब्रह्म ग्राह्यम् । कुतः? चरणाभिधानात् । पादाभिधाना-दित्यर्थः । पूर्वस्मिन्हि वाक्ये चतुष्पाद्ब्रह्मनिर्दिष्टम् - ' तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पुरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ' ( छा ० ३ | १२ | ६ ) इत्यनेन मन्त्रेण । तत्रयच्चतुष्पदो ब्रह्मणस्त्रिपादमृतं संबन्धिरूपं निर्दिष्टं तदेवेह घुसंबन्धान्निर्दिष्टमिति प्रत्यभिज्ञायते । तत्परित्यज्य प्राकृतं ज्योतिः कल्पयतः प्रकृतहाना प्रकृतप्रक्रिये प्रसज्येयाताम् । न केवलं ज्यो तिर्वाक्य एक ब्रह्मानुवृत्तिः परस्यामपि शाण्डिल्यविद्यायामनुवर्तिष्यते ब्रह्म । तस्मादिह ज्योतिरिति ब्रह्म प्रतिपत्तव्यम् । यत्तृक्तम्- ' ज्योतिदप्यते ' इति चैतो शब्दौ कार्ये ज्योतिषि प्राकृत ( कार्य ) ज्योतिका यहाँ ग्रहण करना चाहिए । ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - इस श्रुतिमें ' ज्योतिः ' शब्दसे ब्रह्मका ग्रहण करना चाहिए, किससे? इससे कि चरणका अभिधान है - पादका अभिधान है, ऐसा अर्थ है ‘ तावानस्य ' ' ( उतनी इस - गायत्र्याख्य ब्रह्मकी महिमा है अर्थात् सारा जगत् इसकी विभूति है, तथा निर्विकार पुरुष इससे भी उत्कृष्ट है, सभी भूत इसका एकपाद ( एक अंश ) हैं और इसका ( पुरुष संज्ञक ) त्रिपाद अमृत प्रकाशरूप स्वात्मामें स्थित हैं ) इस मन्त्रसे पूर्ववाक्य में ' चतुष्पाद् ब्रह्म निर्दिष्ट है । उसमें चतुष्पाद् ब्रह्मके जो त्रिपाद अमृत सम्बन्धिरूप निर्दिष्ट है लोक सम्बन्धसे यहाँ निर्दिष्ट है ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है । उसका परित्यागकर प्राकृत ज्योतिकी कल्पना करनेवालेको प्रकृतकी हानि और अप्रकृत प्रक्रिया प्रसक्त होगी । ज्योति वाक्य में केवल पूर्व-वाक्यसे ही ब्रह्मकी अनुवृत्ति हो यह बात नहीं है, किन्तु आगे कही जानेवाली शाण्डिल्यविद्या में भी ब्रह्मकी अनुवृत्ति है, इसकारण यहाँ ( मध्यमें ) भी ज्योति ब्रह्म ही है ऐसा समझना चाहिए । जो सत्यानन्दी - दीपिका ज्योति ब्रह्म नहीं है । ' परो दिवो ज्योति: ' इस ज्योति वाक्य में ' पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ' ( छा ० ३।१२।६ ) ( सम्पूर्ण भूत इसका एक पाद है और इसका त्रिपाद अमृत प्रकाशमय स्वात्मामें स्थित है ) इस पूर्व वाक्ममें भी चतुष्पाद् ब्रह्मका निर्देश नहीं है, किन्तु ' गायत्री वा ० ' ( छा ० ३।१२।१ ) इत्यादि श्रुतिवाक्यों में सर्वात्मकरूपसे गायत्री छन्दका निर्देश है । तथा ' सैषा चतुष्पदा षडूविधा गायत्री ' ( वह यह गायत्री चार पादवाली और छ: प्रकारकी है ) चतुष्पाद् मी गायत्री छन्द ही कहा गया है । यदि छन्दद्वारा ब्रह्मका ग्रहण करें तो भी ' त्रिपादस्यामृतं दिवि ' यहां अधिकरणर्थक सप्तमी है और ' परो दिवो ज्योति: ' इस अन्य श्रुतिमें अवधि अर्थ में पञ्चमी है । इसप्रकार विभक्ति भेदसे भी ब्रह्मकी प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती, क्योंकि प्रत्यभिज्ञामें समान विभक्तिकी अपेक्षा होती है । जैसे ' तदेवेदम् ' ' सोऽयम् ' इत्यादि, वह यहाँ नहीं है, इसलिए ज्योतिः शब्दसे आदित्यादि कार्य ज्योतिका ग्रहण करना युक्त है । * यहाँ ज्योतिःशब्दसे ब्रह्म ही ग्राह्य है, क्योंकि ब्रह्मको चतुष्पाद् कहा गया है । इस विषयमें ' विष्टभ्याहमिदं कृत्स्रमैकांशेन स्थितो जगत् ' ( म ० गी ० १०।४२ ) ( मैं इस सम्पूर्ण जगत्को एक अंशसे व्याप्तकर स्थित हूँ ) यह स्मृति प्रमाण भी है । इस बातको स्पष्ट करनेके लिए भगवान् भाष्य-: कार ' न केवलम् ' इत्यादिसे संदंश न्यायका आश्रयण करते हैं । संदंश ( संडसी ) से किसी वस्तु के दो भाग गृहीत होते हैं, मध्यभाग उसके साथ सम्बधित न होनेपर भी अन्य भागोंके साथ गृहांत हो जाता । इसीप्रकार किसी पदार्थके पूर्वोत्तर भागका ग्रहण करनेसे मध्यभागके ग्रहणकी जहाँ विवक्षा हो वहां यह न्याय प्रवृत्त होता है । जब ' तावानस्य महिमा ' इस पूर्व वाक्य और शाण्डिल्य विद्या में पठित ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' इस उत्तर वाक्य में ब्रह्मको अनुवृत्ति है तो ' यदतः परो दिवो ' इस मध्य वाक्यमें भी ज्योतिः शब्दसे अनुवृत्त ब्रह्मका ग्रहण ही युक्त है, अन्यथा उक्त दोषकी प्रसक्ति होगी । इसलिए यहां ज्योति ब्रह्म ही है ।
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अधि १० सू ० २४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १३१ प्रसिद्धाविति । नायं दोषः; प्रकरणाद्ब्रह्मावगमे सत्यनयोः शब्दयोरविशेषकत्वात् । दीप्यमान-कार्यज्योतिरुपलक्षिते ब्रह्मण्यपि प्रयोगसंभवात् । ' येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः ' ( तै ० ब्रा ० ३।१२ । ९ ७ ) इति च मन्त्रवर्णात् । यद्व - नायं ज्योतिःशब्दश्चक्षुर्वृत्ते रेवानुग्राहके तेजसि वर्तते; अन्यत्रापि प्रयोगदर्शनात् । ' वाचैवायं ज्योतिषास्ते ' ( वृ ० ४।३।५ ), ' मनो ज्योतिर्जुषताम् ' ( तै ० ब्रा ० १।६।३।३ ) इति । तस्माद्यद्यत्कस्यचिदवभासकं तत्तज्ज्योतिः शब्देनाभिधीयते । तथा सति ब्रह्मणोऽपि चैतन्यरूपस्य समस्त जगदवभासहेतुत्वादुपपन्नो ज्योतिः शब्दः । ‘ तमेव भ्रान्त-मनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ' ( कौ ० २।५।१५ ) ' तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपा-सतेऽमृतम् ' ( वृ ० ४।४।१६ ) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । यदप्युक्तं - घुमर्यादत्वं सर्वगतस्य ब्रह्मणो नोपपद्यत इति । अत्रोच्यते - सर्वगतस्यापि ब्रह्मण उपासनार्थः प्रदेशविशेषपरिग्रहो न विरुध्यते । ननूक्तं विष्प्रदेशस्य ब्रह्मणः प्रदेशविशेषकल्पना नोपपद्यत इति । नायं दोषः; निष्प्रदेशस्यापि ब्रह्मण उपाधि विशेष संबन्धात्प्रदेशविशेष कल्पनोपपत्तेः । तथा हि- आदित्ये, चक्षुषि, हृदये, इति प्रदेशविशेष संबन्धीनि ब्रह्मण उपासनानि श्रूयन्ते । एतेन ' विश्वतः पृष्ठेषु ' यह कहा गया है कि ' ज्योतिः और दीप्यते ' ये शब्द कार्य ज्योतिमें प्रसिद्ध हैं, यह दोष नहीं है, क्योंकि प्रकरण से ब्रह्मका ज्ञान होनेपर ये दोनों शब्द ब्रह्मके व्यावर्तक न होनेके कारण प्रकाश्यमान कार्य ज्योतिसे उपलक्षित ब्रह्ममें मी उन दोनों शब्दों का प्रयोग संभव है, कारण कि इसमें ' येन सूर्यस्तपति ० ' ( जिस तेजोमय चैतन्य आत्मासे दीप्त - प्राकशित सूर्य तपता - जगत्को प्रकाश करता है ) यह मन्त्र है | अथवा यह ज्योतिः शब्द चक्षु वृत्तिके अनुग्राहक तेजमें रूद्र नहीं है, क्योंकि ' वाचैवायं ० ' ( वाणीरूप ज्योतिसे ही यह पुरुष गाढ अन्धकारमें स्वव्यापार करता है ) ' मनो ज्योति ० ' ( ( घी सेवन करनेवालोंका प्रकाशक होता है ) इस प्रकार अन्य अर्थों में भी ज्योतिः शब्दका प्रयोग देखने में आता है । इस-लिए जो जो किसी वस्तुका प्रकाशक है उस उसका ज्योतिः शब्दसे अभिधान होता है । ऐसा होनेपर सम्पूर्ण जगत् के प्रकाशका हेतु होनेसे चैतन्यरूप ब्रह्म में भी ' तमेव भान्तम ० उस ब्रह्मके प्रकाशमान होनेपर ही सभी प्रकाशित होते हैं, उसके प्रकाशसे ये सब आदित्यादि प्रकाशित होते हैं ) और ' तद्देवा ० ( चन्द्रादि देवगण उस पूर्ण ब्रह्मकी ज्योतियों के ज्योतिरूपसे, आयुरूपसे एवं अमृतरूपसे उपासना करते हैं ) इत्यादि श्रुतियोंसे ज्योतिः शब्दका प्रयोग युक्त है । जो यह कहा गया है कि सर्वगत ब्रह्मको द्युलोक तक सीमित करना युक्त नहीं है । इसपर कहते हैं - उपासनाके लिए सर्वगत ब्रह्ममें भी प्रदेश विशेषका परिग्रह विरुद्ध नहीं है । परन्तु जो यह कहा गया है कि प्रदेश रहित ब्रह्म में भी प्रदेश विशेषकी कल्पना युक्त नहीं है, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि प्रदेश रहित ब्रह्म में भी उपाधि विशेषके सम्बन्धसे प्रदेश विशेषको कल्पना हो सकती है । जैसे कि ' आदित्यमें, नेत्रमें, हृदय में, इस प्रकार प्रदेश विशेष सम्बन्धी ब्रह्मकी उपासनाएँ मुनी जाती हैं । इससे ' विश्वतः पृष्ठेषु ' सत्यानन्दी - दीपिका * ज्योतिः शब्द ब्रह्म विषयक है, इसको ' प्रकरणाद् ' इत्यादिसे सिद्ध करते हैं कि ज्योतिः शब्द-का मुख्य अर्थ आदित्यादि कार्यं ज्योति है, ब्रह्म तो लाक्षणिक अर्थ है । अब ' यद्वा ' इत्यादिसे मुख्यार्थं कहते हैं— ज्योति शब्दका मुख्यार्थं ब्रह्म ही है, क्योंकि ' तमेव भान्तम ' ' अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः ' ' ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ' ( म ० गी ० १३।१७ ) ( यह तो आदित्यादि ज्योतियों की मी ज्योति और तमसे - अज्ञानान्धकारसे परे है ऐसा कहा जाता है ) इत्यादि श्रुति और स्मृतिमें ज्योतिः शब्दसे ब्रह्म ही प्रतिपादित है । इसलिए ज्योतिः शब्दका मुख्यार्थं ब्रह्म ही है । * ‘ तं यथा यथोपासते तथा तथा फलं भवति ' ( जिस - जिस गुण विशिष्ट उस परमेश्वरकी उपासना करता है उस उस रूपद्वारा ब्रह्म ही उपासना के अनुसार फल देता है ) यह श्रुति ब्रह्मको मी
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१३२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ इत्यधारबहुत्वमुपपादितम् । यदप्येतदुक्तं -औष्ण्य घोषाभ्यामनुमिते कौक्षेये कार्ये ज्योति-ष्यध्यस्यमानत्वात्परमपि दिवः कार्यं ज्योतिरेव - इति, तदप्ययुक्तम्; परस्यापि ब्रह्मणो-नामादिप्रतीकत्ववत्कौक्षेयज्योतिष्प्रतीकत्वोपपत्तेः । ' दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत ' इति तु प्रतीक-द्वारकं दृष्टत्वं च भविष्यति । यदप्युक्तमल्पफलश्रवणान्न ब्रह्मेति, - - तदनुपपन्नम् । नहि इयते फलाय ब्रह्माश्रयणीयं इयते नेति नियमहेतुरस्ति । यत्र हि निरस्त सर्वविशेष संबन्धं परं ब्रह्मात्मत्वेनोपदिश्यते, तत्रैकरूपमेव फलं मोक्ष इत्यवगम्यते, यत्र तु गुणविशेषसम्बन्धं प्रतीकविशेषसम्बन्धं वा ब्रह्मोपदिश्यते, तत्र संसारगोचराण्येवोच्चावचानि फलानि दृश्यन्ते- ' अन्नादो वसुदानो विदन्ते वसु य एवं वेद ' ( बृ ० ४।४।२४ ) इत्याद्यासु श्रुतिषु । यद्यपि न स्ववाक्ये किंचिज्ज्योतिषो ब्रह्मलिङ्गमस्ति, तथापि पूर्वस्मिन्वाक्ये हृदयमानं ग्रहीतव्यं भवति । तदुक्तं सूत्रकारेण - ' ज्योतिश्चरणाभिधानात् ' इति, * कथं पुनर्वाक्या-न्तरगतेन ब्रह्मसंनिधानेन ज्योतिः श्रुतिः स्वविषयाच्छक्या प्रच्यावयितुम्? नैष दोषः; ( विश्व प्राणिवर्गके ऊपर ) बहुत आधारोंका उपपादन हुआ समझना चाहिए । जो यह कहा गया है । कि उष्णता और घोष ( अन्तर्नाद ) से अनुमित कुक्षिस्य कार्य ज्योतिमें अध्यस्यमान होनेके कारण द्युलोकसे पर कार्य ज्योति ही है । वह भी अयुक्त है, क्योंकि नामादि प्रतीकोंके समान कुक्षिस्थ कार्यं ज्योति भी परब्रह्मका प्रतीक हो सकता है । ' दृष्टं च श्रुतं ' ( वह दृष्ट और श्रुत है ऐसी उपासना करे ) इस प्रकार प्रतीकद्वारा ब्रह्म दृष्ट और श्रुत हो - जायेगा! जो यह कहा गया है कि अल्पफलके श्रवण ( श्रुति ) से ज्योति ब्रह्म नहीं है, वह मो युक्त नहीं है, क्योंकि इतने फलके लिए ब्रह्मका आश्रयण करना चाहिए इतने फलके लिए नहीं, इस नियममें कोई हेतु नहीं है । जहाँ सम्पूर्ण विशेषों के सम्बन्धसे रहित परब्रह्मका आत्मरूप से उपदेश किया जाता है, वहाँ एकरूप - तारतम्यसे रहित निरतिशय मोक्ष ही फल है, ऐसा अवगत होता है । और जहां गुणविशेषके सम्बन्धसे अथवा प्रतीकविशेषके सम्बन्धसे ब्रह्मका उपदेश किया जाता है वहाँ नाना प्रकार के उत्तम, मध्यम और कनिष्ट संसार विषयक ' फल ' अन्नादो ० ' ( परमेश्वर जीवरूपसे अन्न खाता है अथवा देता है, अत: ' अन्नाद ' है, कर्म फल अथवा धन देता है, अत: ' वसुदान ' है । इन दोनों गुणोंसे जो परमेश्वरकी उपासना करता है वह पुरुष अन्न : खानेवाला और धनवान् होता है ) इत्यादि श्रुतियोंमें देखे जाते हैं । यद्यपि [ यदतः परो ] स्ववाक्यमें ज्योति विषयक कुछ भी ब्रह्मलिङ्ग नहीं है, तो भी पूर्ववाक्यमें दृश्यमान ब्रह्मलिङ्गका ग्रहण करना चाहिए । इसलिए सूत्रकारने ' ज्योतिश्चरणाभिधानात् ' ऐसा कहा है । परन्तु अन्य वाक्योंमें प्राप्त ब्रह्मके सत्यानन्दी - दीपिका अल्पफलका हेतु कहती है । ज्ञेय और उपास्य भेदसे ब्रह्मके दो रूप शास्त्रों में कहे गये हैं, निरुपाधिक ब्रह्म ज्ञेय है और सोपाधिक ब्रह्म उपास्य । ज्ञेय ब्रह्म एक है, अतः उसके ज्ञान ( ब्रह्मात्मैक्यज्ञान ) का मोक्ष फल भी एक ही है, उसमें अन्य फलोंके समान तारतम्य नहीं है । उपाधिके सम्बन्धसे वही निर्गुण ब्रह्म नानाकी तरह सगुण सर्वज्ञ - सा होता है । ' अन्नादः, वसुदानः, सत्यकामः, सत्य संकल्पः ' इत्यादि गुणों के सम्बन्धसे उसकी उपासना होती है । ' स यो वाचं ब्रह्मेत्युपासते ' ( छा ० ७ २ २ ) ( वह जो वाणीकी ' यह ब्रह्म है ' ऐसी उपासना करता है ) इत्यादि श्रुतियाँ प्रतीकोपासना के उदाहरण हैं, इन श्रुतियों में प्रतीकोपासनाओंके तारतम्यसे भिन्न - भिन्न फल कहे गये हैं । इसलिए उपाधिभेदसे ब्रह्ममें अल्पफलकी श्रुति सर्वथा युक्त है । यद्यपि ' अथ यदतः परो ' इस स्ववाक्यमें ज्योति ब्रह्म है, ऐसा कोई लिङ्ग नहीं है, तथापि ' तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः ' ( छा ० ३।१२।६ ) इस पूर्ववाक्यमें ' उसका एक पाद सम्पूर्ण भूत हैं और तीन पाद अमृतरूप द्युमें हैं ' इस प्रकार ब्रह्मका लिङ्ग उपलब्ध होता है, उसका ही यहाँ ग्रहण करना युक्त है । इसलिए सूत्रकारने ' ज्योतिश्चरणाभिधानात् ' इस सूत्रका उल्लेख किया है ।
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अधि ० १० सू ० २५ 1 भाषानुवाद - सत्यानन्दो -दीपिका सहित १३३ ' खदतः परो दिवो ज्योतिः ' इति प्रथमतरपठितेन यच्छन्देन सर्वनाम्ना संवन्धात्प्रत्यभिज्ञाय-माने पूर्ववाक्यनिर्दिष्टे ब्रह्मणि स्वसामर्थ्येन परामृष्ठे सत्यर्थाज्ज्योतिः शब्दस्यापि ब्रह्म-विषयत्वोपपत्तेः । तस्मादिह ज्योतिरिति ब्रह्म प्रतिपत्तव्यम् ॥ २४ ॥
छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोर्पणनिगदात्तथा हि दर्शनम् ॥ २५ ॥
पदच्छेद -- – छन्दोऽभिधानात् न, इति, चेत्, न, तथा, चेतोर्पणनिगदात्, तथा, हि, दर्शनम् । सूत्रार्थ - ( छन्दोऽभिधानात् ) ' गायत्री वा इदं सर्वं भूतम् ' इस श्रुतिमें छन्द – गायत्रीका अभिधान है; अतः गायत्री ही चतुष्पाद् है, ( न ) ब्रह्म नहीं, ( इति चेन्न ) तो यह ठीक नहीं, क्योंकि ( तथा ) श्रुतिमें गायत्री छन्दद्वारा गायत्री में अनुगत ब्रह्ममें ( चेतोर्पणनिगदात् ) चित्तकी एकाग्रताका अभिधान है, अतः ब्रह्म ही चतुष्पाद कहा गया है । और ( तथा हि दर्शनम् ) उसी प्रकार ' एतं ह्येव ' दि स्थलों में भी विकारद्वारा ब्रह्मकी ही उपासना देखो गई है । अथ यदुक्तम् - पूर्वस्मिन्नपि वाक्ये न ब्रह्माभिहितमस्ति, ' गायत्री वा इदं सर्वं भूतं बदिदं किंच ' ( छा ० ३।१२।१ ) इति गायत्र्याख्यस्य छन्दसोऽभिहितत्वादिति, तत्परिहर्तव्यम् । कथं पुनश्छन्दोभिधानान्न ब्रह्माभिहितमिति शक्यते वक्तुं?, यावता ' तावानस्य महिमा ' इत्येतस्यामृचि चतुष्पाद्ब्रह्म दर्शितम् । नैतदस्ति; ' गायत्री वा इदं सर्वम् ' इति गायत्रीमुपक-म्य तामेव भूतपृथिवी शरीर हृदय वाक्प्राणप्रभेदैर्व्याख्याय ' सैषा चतुष्पदा षडविधा गायत्री तदेत-सान्निध्यसे ज्योति: श्रुति स्वविषय: ( अपने अर्थ ) से कैसे दूर की जा सकती है? यह दोष नहीं है । ‘ यदतः परो दिवो ज्योतिः ' इस श्रुति में सबसे पहले पठित सर्वनाम ' यत् ' शब्द अपनी सामर्थ्य से ब्रह्मका परामर्श करता है, इसीसे सम्बन्धसे पूर्ववाक्य में निर्दिष्ट ब्रह्म के प्रत्यभिज्ञायमान होनेपर ज्योतिः शब्द मी अर्थतः ब्रह्म विषयक हो सकता है । इसलिए यहाँ ज्योति ब्रह्म है ऐसा समझना चाहिए ॥ २४ ॥
परन्तु जो यह कहा गया है कि पूर्ववाक्य में मी ब्रह्मका अभिवान नहीं है, क्योंकि ' गात्री वा ० ' ( यह सब प्राणिवर्ग और यह जो कुछ भी है, वह सब गायत्री ही है ) इसमें गायत्री नामक छन्दका अभिधान है, तो इसका परिहार करना चाहिए । जबकि ' तावावस्य महिमा ' ( इतनी इसकी महिमा है ) इस ऋचामें चतुष्पाद् ब्रह्म दिखलाया गया है, तो छन्दके अभिधानसे ब्रह्म अभिहित नहीं है, यह कैसे कह सकते हो? पू ० ~~~~ यह ठीक नहीं है, क्योंकि ' गायत्री वा इदं सर्वम् ' इस प्रकार गायत्रीका उपक्रम कर उसीका भूत, पृथ्वी, शरीर, हृदय, वाणी और प्राण के भेदोंसे व्याख्यानकर उसी व्याख्यातरूप गायत्रीके विषय में ' सैषा चतुष्पदा ० ' ( वह यह गायत्री छः छ: अक्षरोंसे चतुष्पाद् और भूत, पृथ्वी आदि भेदसे छः प्रकारकी है, वह यह ( गायत्र्याख्य ब्रह्म ) इस ऋचासे प्रकाशित किया गया है कि सत्यानन्दी - दीपिका * प्रकरणसे ज्योतिः शब्द ब्रह्मपरक दिखलाकर अब सन्निधिसे भी दिखलाते हैं । परन्तु इससे पहले ' कथं पुनः ' से पूर्व पक्षका अनुवाद करते हैं । सन्निधिसे श्रुति बलवती होती है, अतः ' यदतः परो ' यहाँ ज्योतिः शब्दसे सूर्यादि कार्य ज्योतिका ग्रहण करना युक्त है । सि ० – सर्वनाममें यह सामर्थ्य होती है कि वह अपने पूर्वका परामर्श करे । इसलिए ' यदतः परो ' इसमें पठित सर्वनाम ' यत् ' पद अपनी सामर्थ्य से ज्योतिः शब्दसे ' तावानस्य महिमा ' इस पूर्व वाक्यमें निर्दिष्ट ब्रह्मका परामर्श करता है । इस प्रकार पूर्व निर्दिष्ट और सन्निहित ब्रह्मका ग्रहण होनेपर द्युलोकका सम्बन्ध तथा पूर्वं वाक्यमें ब्रह्मकी प्रत्यभिज्ञा आदि ब्रह्मके लिङ्ग सिद्ध होते हैं, इसलिए यहाँ ज्योतिः शब्दसे ब्रह्मका ही ग्रहण करना चाहिए । पूर्वपक्ष में जठराग्निको आदित्यादि कार्यं ज्योतिरूपसे उपासना है और सिद्धान्तमें ब्रह्मदृष्टि से, यह दोनोंमें अन्तर ॥ २४ ॥
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१३४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ दृचाभ्यनूक्तं तावानस्य महिमा ' इति तस्यामेव व्याख्यातरूपायां गायत्र्यामुदाहृतो मन्त्रः कथम-कस्माद्ब्रह्म चतुष्पादभिदध्यात्? योऽपि तत्र ' यद्वै तद्ब्रह्म ' ( छा ० ३ | १२ | ५, ६ ) इति ब्रह्मशब्दः, सोऽपि छन्दसः प्रकृतत्वाच्छन्दोविषय एव ' य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ' ( छा ० ३।११।३ ) इत्यत्र हि वेदोपनिषद् मिति व्याचक्षते, तस्माच्छन्दोभिधानान्न ब्रह्मणः प्रकृतत्वमिति चेत्, नैष दोषः; ' तथा चेतोर्पगनिगदात् ' तथा गायत्र्याख्यच्छन्दोद्वारेण तदनुगते ब्रह्मणि चेतसोऽ-र्पणं चित्तसमाधानमनेन ब्राह्मणवाक्येन निगद्यते - ' गायत्री वा इदं सर्वम् ' इति । नहाक्षर-संनिवेशमात्राया गायन्याः सर्वात्मकत्वं संभवति । तस्माद्यद्गायत्र्या ख्यविकारे ऽनुगतं जग-त्कारणं ब्रह्म, तदिह सर्वमित्युच्यते । यथा ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' ( छा ० ३ | १४ | १ ) इति । कार्य च कारणादव्यतिरिक्तमिति वक्ष्यामः - ' तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ' ( ब ० २।१।१४ ) इत्यत्र । · तथान्यत्रापि विकारद्वारेण ब्रह्मण उपासनं दृश्यते - ' एतं ह्येव बहवृचा महत्युक्थे मीमांसन्त. एतमग्नावध्वर्यव एवं महाव्रते छन्दोगाः ' ( ऐ ० आ ० ३ | २ | ३ | १२ ) इति । तस्मादस्ति छन्दोभिधा-नेऽपि पूर्वस्मिन्वाक्ये चतुष्पाद्ब्रह्म निर्दिष्टम् । तदेव ज्योतिर्वाक्येऽपि परामृश्यत उपासना-न्तरविधानाय । 8 अपर आह - साक्षादेव गायत्रीशब्देन ब्रह्म प्रतिपाद्यते; संख्यासामा-न्यात् । यथा गायत्री चतुष्पदा षडक्षरैः पादैः, तथा ब्रह्म चतुष्पात् । तथान्यत्रापि छन्दोभि-इसकी इतनी महिमा है ) उदाहरण रूपसे दिया गया यह मन्त्र दिना किसी कारण के चतुष्पाद् ब्रह्मका किन प्रकार अभिधान करेगा । उसी प्रकरण में ' यद्वै तद्ब्रह्म ० ' इस श्रुतिमें जो ब्रह्म शब्द है, वह भी छन्दके प्रकरणमें पठित होनेसे छन्द विषयक ही है, क्योंकि ' य एतामेवं ० ' ( जो इस प्रकार इस ब्रह्मो-पनिषद् – वेदरहस्यमय मधु विद्याको जानता है ) इस श्रुतिमें ब्रह्मोपनिपदको वेदोपनिषद् कहते हैं । इसलिए छन्द के अभिधानसे ब्रह्म प्रकृत नहीं है, सिद्धान्ती - ऐसा यदि कहो, तो यह दोष नहीं है, क्योंकि ' तथा चेतोर्पणनिगदात् ' गायत्री नामक छन्द द्वारा उसमें अनुगत ब्रह्म में चेतसोऽर्पणं - चित्तकी एकाग्रता ' गायत्री वा इदं सर्वम् ' इस ब्राह्मण वाक्यसे कही गई है । वस्तुतः अक्षर मिलनात्मक गायत्री सर्वात्मक नहीं हो सकती । इसलिए गायत्री नामक विकारमें अनुगत जगत्का कारण जो ब्रह्म है वही यहाँ सर्वं शब्दसे कहा जाता है, जैसे कि ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' ( यह सब ब्रह्म ही है ) इस श्रुतिमें है । कार्य कारणसे अनन्य है, यह ' तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ' इस सूत्र में कहेंगे । इसी प्रकार ' एतं ० ' ( ऋग्वेदी उस महान् उक्थ ( शस्त्र ) रूप उपाधिमें अनुगत उसी परमात्मा की उपासना करते हैं अर्थात् उक्थकी परमात्मदृष्टिसे उपासना करते हैं, यजुर्वेदी - अध्वर्युं अग्निरूप उपाधिमें उसीकी उपासना करते हैं, सामवेदी महाव्रतरूप यागमें उसीकी उपासना करते हैं ) इत्यादि अन्य स्थलों में भी कार्यद्वारा ब्रह्मकी उपासना देखो जाती है । इससे यह सिद्ध हुआ कि पूर्ववाक्य ( पादोऽस्य ) में छन्दका अभिधान होनेपर भी उसके द्वारा चतुष्पाद् ब्रह्म ही निर्दिष्ट है । अन्य उपासनाका विधान करने के लिए ज्योति वाक्यमें भी उसीका परामर्श है । दूसरे एकदेशी कहते हैं - गायत्री शब्दसे साक्षात् ही ब्रह्मप्रतिपादित है, क्योंकि संख्याकी समानता है । जैसे गायत्री छः अक्षरोंवाले पादोंसे चतुष्पदा है, वैसे ही ब्रह्म भी चतुष्पाद है । इसी प्रकार अन्य स्थलोंमें मी छन्दका अभिधान करनेवाला सत्यानन्दी - दीपिका * अभी तक गायत्री शब्द अजहल्लक्षणा द्वारा ब्रह्मरूप अर्थका प्रतिपादक कहा गया है । अब भगवान् भाष्यकार ' अपर आह ' से वृत्तिकारकी व्याख्याका अनुसरणकर गौणरूपसे गायत्रीरूप वाच्यार्थके ग्रहण किए विना ही गायत्रीशब्द ब्रह्मका प्रतिपादक कहते हैं । संख्याकी समानता में एक श्रौत उदाहरण है ' तौ वा एतौ द्वौ संवर्गों वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ' ( छान्दो ० ४।३।४ ) ( वे ये दो ही संवर्ग हैं— देवों में वायु और इन्द्रियों में प्राण ) ' संग्रहण अथवा संग्रसन करनेसे वायु और मुख्य-
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अधि ० १० सू ० २६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दो- दीपिकासहित १३५ धायी शब्दोऽर्थान्तरे संख्या सामान्यात्प्रयुज्यमानो दृश्यते । तद्यथा - ' ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतम् ' इत्युपक्रम्याह ' सैषा विराडन्नादी ' ( छा ० ४ | ३ | ८ ) इति । अस्मिन्पक्षे ब्रह्मैवाभिहितमिति न छन्दोभिधानम् । सर्वथाप्यस्ति पूर्वस्मिन्वाक्ये प्रकृतं ब्रह्म ॥२५ ॥
भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् ॥ २६ ॥
पदच्छेद - भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः च एवम् । सूत्रार्थ - ( भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः ) ' गायत्री वा इदं सर्वम् इस श्रुतिमें भूत आदि पादोंका व्यपदेश ब्रह्ममें उपपन्न होता है, अतः गायत्रीशब्दसे गायत्री में अनुगत ब्रह्मका ही बोध होता है । ( च ) और ( एवम् ) ' विष्टभ्याऽहमिदम् ' यह स्मृति भो ब्रह्म में सर्वात्मता दिखलाती है । * इतश्चैवमभ्युपगन्तव्यमस्ति, पूर्वस्मिन्वाक्ये प्रकृतं ब्रह्मेति । यतो भूतादीन्पादा-शब्द संख्या की समानतासे अन्य अर्थ में प्रयुक्त हुआ देखा जाता है, जैसे कि ' ते वा एते पञ्चान्ये ० ' ( ये वे [ अग्नि आदि और वायु ] पाँच [ वागादिसे ] अन्य हैं, तथा इनसे [ वागादि और प्राण ] ये पांच अन्य हैं; इस प्रकार ये सब दस होते हैं ये दश कृत - कृतात्मक पासेसे उपलक्षित द्यूत हैं ) ऐसा आरम्भ कर ' सैषा विराडन्नादी ० ' ( वह यह अन्न भक्षक विराड ही है ) इस तरह कहा है । इस पक्ष में ब्रह्मका ही अभिधान है छन्दका अभिधान नहीं है । पूर्वं वाक्य में भी रर्वथा ब्रह्म ही प्रकृत है ॥ २५ ॥
इस कारण से भी पूर्ववाक्यमें ब्रह्म ही प्रकृत है यह स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि श्रुति भूत आदि पादोंका व्यपदेश करती है । भूत, पृथ्वी, शरीर और हृदयका निर्देशकर श्रुति ' सैषा चतुष्पदा ० ' सत्यानन्दी - दीपिका प्राणको संवर्ग कहा गया है । देवताओं में अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा और जल ये वायुमें लीन होते हैं, अत: यह अधिदेव संर्ग है और शरीर में वाणी, चक्षु, श्रोत्र और मन मुख्य प्राण में लीन होते हैं यह अध्यात्म संवर्ग है! ' ते वा एते पञ्चान्ये ' ( वे ये अन्य पाँच आधिदैवत और अन्य पाँच आध्यात्मिक ये सब मिलकर ' दश ' कृत कहलाते हैं ) । वस्तुतः द्यूत क्रीड़ा में कृत, त्रेता, द्वापर और कलि नामके चार पासे होते हैं, वे क्रमशः चार, तीन, दो और एक अंकके होते हैं । कृत - ४, त्रेता - ३, द्वापर -२ और कलि -१ । इस चार संख्या से युक्त कृत दश संख्याका होता है; क्योंकि चारमें तीनका तीनमें दोका और दोमें एकका अन्तर्भाव होनेसे दस होते हैं । वायु आदि भी दस हैं । इस प्रकार संख्याकी समानतासे कृतत्वका उपचार है । इसप्रकार वायु आदिके कृतत्वका उपक्रमकर कहते हैं ' सैषा ० ' इत्यादि । यह विराड् शब्द छन्दका वाचक है, क्योंकि ' दशाक्षरा विराड् ( दस अक्षरों वाला छन्द विराड़ होता है ) ऐसी श्रुति है । दशत्वकी समानतासे वायु आदि विराड् कहलाते हैं । इसप्रकार दशत्वद्वारा वायु आदिमें कृतत्व और विरात्वका ध्यान करना चाहिए | उनमें विराड्के ध्यानसे उपासकके लिए सब अन्न होते हैं, क्योंकि ' अन्नं विराड् ' यह श्रुति है | और वायु आदिमें कृतत्व के ध्यानसे अन्न भक्षक होता है, कारण कि कृत - द्यूत अन्नभक्षक है । कृत अपने चार अङ्कोंमें शेष तीन अङ्कोंका अपने में अन्तर्भाव करता है, अतः अन्नभक्षक - सा ज्ञात होता है । इसी कारण श्रुतिमें कृत-पासेकी जीतसे शेष अन्य पासे जीते जाते हैं इससे कृतद्यूतको भक्षक कहा गया है । इस तरह वायु आदि दशात्मक होकर कृतनामक विराडु अन्न है और कृतत्वके कारण अन्नभक्षक कहलाता है । इसी प्रकार इस पक्ष में मी. चतुष्पाद् संख्याको समानताको लेकर ब्रह्मका ही प्रतिपादन है छन्दका नहीं । सर्वत्रकारसे लक्षक अथवा गौणरूप से ' पादोऽस्य सर्वा भूतानि ' इस पूर्ववाक्यमें ब्रह्म ही प्रकृत है, छन्द नहीं । वस्तुतः यह वृत्तिकारका मत ठीक नहीं है, क्योंकि ' चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री त्रिपदा भवति ' अर्थात् गायत्री २४ अक्षर और तीन पाद वाली होती है, अतः इसका चतुष्पाद् ब्रह्मके साथ साक्षात् संख्या के द्वारा सादृश्य नहीं है ॥ २५ ॥
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१३६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ न्व्यपदिशति श्रुतिः । भूतपृथिवीशरीर हृदयानि हि निर्दिश्या- ' सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री ' इति । नहि ब्रह्मानाश्रयणे केवलस्य छन्दसो भूतादयः पादा उपपद्यन्ते । अपि च ब्रह्माना-श्रयणे नेयमृक् संबध्येत- ' तावानस्य महिमा ' इति । अनया हि ऋचा स्वरसेन ब्रह्मैवाभि-धीयते, ' पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ' ( छा ० ३ | १२ | ५ ) इति सर्वात्मत्वोपपत्तेः । पुरुषसूक्तेऽपीयमुग्ब्रह्म परतयैव समाग्नायते । स्मृतिश्च ब्रह्मण एवंरूपतां दर्शयति- ' विष्ट-भ्याहमिदं कुत्स्त्रमेकांशेन स्थितो जगत् ' ( गी ० १४२ ) इति । यद्वै तद्ब्रह्म ' ( छा ० ३ | १२ | ८ ) इति च निर्देशः । एवं सति मुख्यार्थ उपपद्यते । ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः ' ( छा ० ०।१३।६ ) इति च हृदय-सुपिषु ब्रह्मपुरुषश्रुतिर्ब्रह्मसंबन्धितायां विवक्षितायां संभवति । तस्मादस्ति पूर्वस्मिन्वाक्येब्रह्म प्रकृतम् । तदेव ब्रह्म ज्योतिर्वाक्येद्युसंबन्धात्प्रत्यभिज्ञायमानं परामृश्यत इति स्थितम् ॥२६ ॥
उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ २७ ॥
पदच्छेद – उपदेशभेदात्, न, इति चेत्, न, उभयस्मिन्, अपि, अविरोधात् । सूत्रार्थ - ' त्रिपादस्यामृतं दिवि ' और ' यदतः परोदिवो ज्योतिर्दीप्यते ' इसप्रकार ( उपदेशभेदात् ) उपदेशके भेदसे ( न ) प्रकृत ब्रह्मकी प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती, ( इतिचेन्न ) ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ( उभयस्मिन्नपि ) दोनों वाक्यों में भी ( अविरोधात् ) प्रत्यभिज्ञाका विरोध नहीं है | ( वह यह गायत्री चार पादवाली और छः प्रकार की है ) ऐसा कहती है । यदि ब्रह्मका ग्रहण न करें, तो भूत आदि केवल छन्द पाद उपपन्न नहीं होते । किञ्च ब्रह्मका ग्रहण न करें तो ' तावानस्य-महिमा ० ' ( उतनी हो इस [ गायत्र्याख्य ब्रह्म ] की महिमा है ) यह ऋचा समन्वित नहीं हो सकती । वस्तुतः इस ऋचाद्वारा मुख्यरूपसे ब्रह्मका ही अभिधान होता है, क्योंकि ' पादोऽस्य सर्वा भूतानि ' इस प्रकार सर्वात्मता उपपन्न होती है । पुरुष सूक्तमें भी यह ऋचा ब्रह्मारत्वसे ही अभिहित है । ' विष्टभ्याह-मिदं ० ' ( एक अंशसे इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके मैं स्थित हूँ ) यह स्मृति भी ब्रह्ममें सर्वात्मता दिखलाती है । पूर्ववाक्यमें ब्रह्मके स्वीकार करनेसे हो ' यद्वैतद्ब्रह्म ' ( जो भी वह [ त्रिपाद् अमृतरूप ] ब्रह्म है वह यही हैं ) यह श्रुतनिर्देश मुख्यार्थ में उपपन्न होता है । ' ते वा एते ० ' ( वे ये पाँच ब्रह्मपुरुष [ स्वर्गलोकके द्वारपाल ] हैं ) और इसप्रकार हृदय के छिद्रोंमें ब्रह्मपुरुष प्रतिपादक यह श्रुति भी ब्रह्म के साथ सम्बन्धित है ऐसा विवक्षित होनेपर ही संगत होती है । इससे यह सिद्ध हुआ कि पूर्ववाक्य में ब्रह्म प्रकृत है, और द्युसम्बन्धसे प्रत्यभिज्ञायमान उसी ब्रह्मका ज्योतिर्वाक्यमें परामर्श होता है || २६ || सत्यानन्दी - दीपिका * ' गायत्री वा इदं सर्वम् ' इस वाक्यशेषमें सर्वात्मत्वका श्रवण अक्षरोंकी आनंपूर्वी मिलनात्मक गायत्री छन्दमें कथंचिदपि सम्भव नहीं है, इसलिए गायत्रीमें अनुगत ब्रह्ममें लक्षणा अवश्य माननी चाहिए, इसी अर्थको भगवान् सूत्रकार भी ' भूतादिपाद ' इस सूत्र से दिखलाते हैं । ब्रह्मपद गायत्री छन्द वाची है यह जो पहले कहा गया है उसका ' यद्वैतद्ब्रह्म ' इससे निराकरण करते हैं । गायत्री उपाधिवाले ब्रह्मके हृदयरूपी नगरमें प्राण आदि देवताओंसे सुरक्षित पाँच छिद्र हैं । स्वर्गप्राप्तिके द्वार होनेसे इन्हें देवसुषि कहते हैं अर्थात् हृदयरूपी नगर में पूर्व; दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और ऊर्ध्वं इन पांच छिद्ररूपी द्वारोंमें प्राण, व्यान, अपान, समान और उदान अथवा चक्षु, श्रोत्र, वाक् मन और प्राण इन पाँच द्वारपालोंकी श्रुतिद्वारा कल्पना की गई है । किश्व हृदयरूपी नगरमें गात्री उपाधिवाले ब्रह्मकी उपासना के लिए ब्रह्मके द्वारपाल होनेसे प्राण आदि अथवा चक्षु आदि ब्रह्मपुरुष कहलाते हैं, इससे ‘ ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः ' यह् श्रुति भी संगत होती है । वर्णोंकी मिलनात्मक छन्दरूप गायत्रीमें हृदयस्थ प्राण आदि पाँच ब्रह्मपुरुषोंका सम्बन्ध नहीं घट सकता है । इन पाँच ब्रह्म-पुरुषोंकी उपासना तथा फल ( छा ० ३ | १३ | १, २, ३, ४, ५ ) में द्रष्टव्य है ॥ २६ ॥