श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 171–180
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 171–180
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अधि ० ११ सू ० २८ ] भाषानुवाद सत्यानन्दी- दीपिकासहित १३७ * यदप्येतदुक्तं पूर्वत्र - ' त्रिपादस्यामृतं दिवि ' इति सप्तम्या द्यौराधारत्वेनोपदिष्टाः इह पुनः ' अथ यदतः परो दिवः, इति पञ्चम्या मर्यादात्वेन तस्मादुपदेशभेदान्न तस्येह प्रत्यभिज्ञानमस्तीति तत्परिहर्तव्यम् । अत्रोच्यते- नायं दोषः उभयस्मिन्नप्य विरोधात् । उभयस्मिन्नपि सप्तम्यन्ते पञ्चम्यन्ते चोपदेशे न प्रत्यभिज्ञानं विरुध्यते । यथा लोके वृक्षाग्र संबद्धोऽपि श्येन उभयथोपदिश्यमानो दृश्यते, वृक्षाग्रे श्येनो वृक्षाग्रात्परतः श्येन इति च । एवं दिव्येव सद्ब्रह्म दिवः परमित्युपदिश्यते । अपर आह - यथा लोके वृक्षा-ग्रेणासंबद्धोऽपि श्येन उभयथोपदिश्यमानो दृश्यते, वृक्षाग्रे श्येनो वृक्षाग्रात्परतः श्येन इति च । एवं च दिवः परमपि सब्रह्म दिवीत्युपदिश्यते । तस्मादस्ति पूर्वनिर्दिष्टस्य
ब्रह्मण इह प्रत्यभिज्ञानम् । अतः परमेव ब्रह्म ज्योतिःशब्दमिति सिद्धम् ॥२७ ॥
( ११ प्रतर्दनाधिकरणम् । सू ० २८-३१ ) प्राणस्तथाऽनुगमात् ॥ २८ ॥
पदच्छेद - प्राणः, तथा, अनुगमात् । सूत्रार्थ - ( प्राण: ) ' प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा ' इस श्रुतिमें पठित प्राण परमात्मा ही है, वायु नहीं, क्योंकि ( तथा ) पूर्वापर वाक्योंका पर्यालोचन करनेपर ( अनुगमात् ) उक्त श्रुतिवाक्यमें आनन्द आदि पदोंका समन्वय ब्रह्मपरक ही उपलब्ध होता है । यह जो कहा गया है कि ' त्रिपादस्या ० ' इस श्रुति वाक्यमें सप्तमी विभक्ति द्वारा ' धु ' आधार-रूप से उपदिष्ट है और ' अथ यदतः परो ० ' इस श्रुतिवाक्यमें पंचमी विभक्ति द्वारा ' द्यु ' मर्यादारूपसे उपदिष्ट है, अत: उपदेशके भेदसे उसका ( ब्रह्मका ) यहां प्रत्यभिज्ञान नहीं है, उसका परिहार करना चाहिए । इसपर कहते हैं - यह दोष नहीं है । क्योंकि दोनों वाक्योंमें विरोध नहीं है । दोनोंमें भी सप्तम्यन्त और पंचम्यन्त उपदेशों में भी प्रत्यभिज्ञानका विरोध नहीं है । जैसे लोकमें वृक्षके अग्र-भागसे सम्बद्ध श्येन ( बाजपक्षी ) ' वृक्ष के अग्रभागमें श्येन है ' ' वृक्षके अग्रभागसे परे श्येन है ' इस तरह दोनों प्रकारसे उपदेश किया हुआ देखा जाता है । वैसे ही ' द्यु में ही होता हुआ ब्रह्म से परे है ' ऐसा उपदेश किया जाता है । दूसरे कहते हैं- जैसे लोकमें वृक्षके अग्रभागसे श्येनका सम्बन्ध न होनेपर भी ' वृक्ष के अग्र भागपर श्येन है ' ' वृक्षके अग्रभागसे परे श्येन है ' इसतरह दोनों प्रकारसे उपदेश किया हुआ देखा जाता है । इसीप्रकार से परे भी होता हुआ ब्रह्म ' द्युमें ' ऐसा उपदेश-किया जाता है । इसलिए पूर्वनिर्दिष्ट ब्रह्मका यहां प्रत्यभिज्ञान है । इससे यह सिद्ध हुआ कि ज्योतिः शब्द परब्रह्मका ही वाचक है ॥ २७ ॥
सत्यानन्दी -दीपिका * विभक्तिके भेदसे कथित अर्थ भेद युक्त नहीं है, क्योंकि जो आधार होता है वह कथंचित् मर्यादा भी हो सकता है । जैसे वृक्षके अग्रभागमें श्येनके पाद आदि जितने अवयव संयुक्त रहते हैं उतने अवयवोंका वह आधार होता हुआ ही उससे पक्ष आदि से असंयुक्त अवयवोंको लेकर श्येनकी मर्यादा होता है । उसीप्रकार छु, सूर्य अथवा हृदयाकाशरूप मुख्य आधारमें ब्रह्म है, उस आधारसे भिन्न आकाशावच्छिन्न ब्रह्मका वह आधार ( मर्यादा ) होता है, इसप्रकारकी कल्पनाकर ' ब्रह्म घुसे परे है ' ऐसा कहा गया है । अब ' अपर आह ' इत्यादि भाष्यसे मर्यादाको मुख्य मानकर कहते हैं अर्थात् निरुपाधिक ब्रह्मको लेकर पंचमीका मुख्यार्थं कहें तो यहां ' दिवि ' में सप्तमीका अर्थं लक्षणासे सामीप्य होगा । ' गङ्गायां घोष: ' जैसे यहाँ गंगापदसे संयुक्त सप्तमीका अर्थं लक्षणासे सामीप्य होता है, उसी प्रकार ' दिवि ' यहां लक्षणासे सामीप्य अर्थको लेकर आधार कहना होगा और पंचमीका अर्थ i
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१३८ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ * अस्ति कौषीतकिब्राह्मणोपनिषदीन्द्रप्रतर्दनाख्यायिका -- प्रतर्दनो ह वै दैवोदासरि-न्द्रस्य प्रियं धामोपजगाम युद्धेन च पौरुपेण च ' इत्यारभ्याम्नाता । तस्यां श्रूयते— ' स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमित्युपास्स्व ' इति । तथोत्तरत्रापि ' अथ खलु प्राण एव प्रज्ञामेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति ' ( कौ ० ३।१, २, ३ ) इति । तथा ' न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् ' इति । अन्ते च स एष प्राण एव. प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृतः ' ( कौ ० ३1८ ) इत्यादि । * तत्र संशयः - किमिह प्राणशब्देन वायुमात्रमभिधीयते, उत देवतात्मा, उत जीवः, अथवा परं ब्रह्मेति । ननु ' अत एव प्राणः ' इत्यत्र वर्णितं प्राणशब्दस्य ब्रह्मपरत्वम् । इहापि च ब्रह्मलिङ्ग-मस्ति— आनन्दोऽजरोऽमृतः ' इत्यादि । कथमिह पुनः संशयः संभवति? अनेक लिङ्गदर्शना-' प्रतर्दनो ह वै ० ' ( दिवोदासका पुत्र प्रतर्दन युद्ध और पराक्रमसे इन्द्रके प्रियधाम - स्वर्गको गया ) इसप्रकार आरम्भकर कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद् में इन्द्र और प्रतर्दनकी आख्यायिका कही गई है | उसमें ' स होवाच प्राणोऽस्मि ० ' ( उस इन्द्रने कहा— मैं प्राण हूँ, प्रज्ञात्मा हूँ, उस मेरी आयु तथा अमृतरूपसे उपासनाकर ) ऐसा श्रुति कहती है । उसीप्रकार आगे भी ' अथ खलु प्राण एव ० ' ( वाग् आदि इन्द्रियोंकी शरीर धारण करनेमें सामर्थ्य नहीं है ऐसा निश्चय होनेके अनन्तर निश्चय प्रज्ञात्मा प्राण ही इस देहको अहंता - ममतासे स्वीकारकर शयन, आसन आदिसे उठाता है ) उसीप्रकार आगे भी ' न वाचं ० ' ( वाणीको जाननेकी इच्छा न करे वक्ताको जाने ) इत्यादि श्रुति है । और अन्तमें ' स एष प्राण एव ० ' ( वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनन्द, अजर और अमृत है ) इत्यादि श्रुति है । यहाँ यह संशय होता है क्या यहाँ प्राणशब्दसे वायु मात्र अभिहित है अथवा देवतात्मा अथवा जीव अथवा परब्रह्म? परन्तु ' अत एव प्राण: ' इस सूत्र में तो प्राणशब्द ब्रह्मपरक है, ऐसा वर्णन किया जा चुका है और यहाँ भी ' आनन्द, अजर और अमृत हैं ' इत्यादि ब्रह्म के लिङ्ग हैं, तो फिर यहाँ संशय ही कैसा हो सकता है? अनेक लिङ्गों के दर्शनसे यहाँ संशय हो सकता है, ऐसा हम कहते सत्यानन्दी - दीपिका मर्यादा, इस तरहसे दोनों वाक्य ब्रह्मकां ही प्रतिपादन करते हैं, क्योंकि आधार और मर्यादा दोनों औपाधिक होनेसे ब्रह्ममें कल्पित हैं, अतः ज्योति वाक्यमें ज्योति । शब्द भी ब्रह्मका ही वाचक है || २७ || * राजा प्रतर्दन बुद्धिकौशल आदिसे स्वर्ग में पहुँचा । प्रतर्दनका युद्धकौशल और बुद्धि-कौशल देखकर इन्द्रने कहा, हे प्रतर्दन! मैं तुमपर अतिप्रसन्न हूँ तुम मुझसे अभीष्ट वर माँगो | प्रतर्दन बोला- हे देवराज इन्द्र! मनुष्यके लिए सबसे अधिक हितकारक जो वर हो वही दीजिए । इसपर इन्द्र ने ' प्राणोऽस्मि ' ' मैं प्राण हूँ ' इत्यादि कहा । इन्द्र के इस कथनपर अब विचारणीय यह है कि इस श्रुतिवाक्यमें पठित प्राणशब्दसे कहीं मुख्य प्राणका ग्रहण न हो, अतः यहाँ ' प्रज्ञात्मा ' कहा गया है । सर्व विशेष रहित चेतन ब्रह्मका ग्रहण न हो इसलिए ' तं मां ' पद कहे गए हैं । इन पदोंसे यहाँ प्राणशब्दसे इन्द्र देवताका ही ग्रहण होता है । परन्तु आगे ' अथ खलु प्राण एव ' इस-प्रकार मुख्यप्राणका लिङ्ग भी है । इसीप्रकार ' न वाचं ' इस वाक्यमें प्राणशब्दसे जीवका ग्रहण होता: है, क्योंकि उसमें वक्तृत्वलिङ्ग विद्यमान है । और आगे ' स एष प्राण एवं ' इस श्रुतिवाक्य से प्राण में आनन्द आदि ब्रह्म बोधक लिङ्ग उपलब्ध होते हैं, इससे प्राणशब्दसे ब्रह्मका भी ग्रहण हो सकता है । इसप्रकार मुख्यप्राण, जीव, देवता और ब्रह्म बोधक लिङ्गोंके विद्यमान होनेपर निश्चय करनेके लिए सूत्रकारने इस अधिकरणका आरम्भ किया है । * ' प्राणोऽस्मि ' इससे लेकर ' आनन्दोऽजरोऽमृतः ' यहाँ तक वाक्य समुदाय इस अधिकरण सूत्रके विषय हैं अर्थात् इन वाक्योंको लेकर ही यहाँ विचार किया गया है । गत अधिकरणमें प्रकृत ब्रह्मवाचक ‘ यत् ' शब्दके बलसे ज्योति: श्रुति ब्रह्मपरक कही गई, परन्तु यहाँ प्राण श्रुति के मङ्ग में कोई
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अधि ० ११ सू ० २८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १३ ९ दिति ब्रूमः । न केवलमिह ब्रह्मलिङ्गमेवोपलभ्यते, सन्ति हीतरलिङ्गान्यपि — ' मामेव विजानीहि ' ( कौ ० ३ | १ ) इतीन्द्रस्य वचनं देवतात्मलिङ्गम् । इदं शरीरं परिगृह्योत्थापयती ' ति प्राणलिङ्गम् । ' न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् ' इत्यादि जीवलिङ्गम् । अत उपपन्नः संशयः । तत्र प्रसिद्धेर्वायुः प्राण इति प्राप्त उच्यते- प्राणशब्दं ब्रह्म विज्ञेयम् । कुतः? तथाऽनुगमात् । तथा हि- पौर्वापर्येण पर्यालोच्यमाने वाक्ये पदार्थानां समन्वयो ब्रह्मप्रतिपादनपर उप-लभ्यते । उपक्रमेतावत् ' वरं वृणीष्व ' इतीन्द्रेणोक्तः प्रतर्दनः परमं पुरुषार्थं वरमुपचिक्षेप-' त्वमेव मे वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यसे ' इति । तस्मै हिततमत्वेनोपदिश्यमानः प्राणः कथं परमात्मा न स्यात्? नान्यत्र परमात्मज्ञानाद्धिततमप्राप्तिरस्ति । ' तमेव विदित्वाऽति-मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ( श्वेता ० ३1८ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तथा ' स यो मां वेद न ह ' वै तस्य केनचन कर्मणा लोको मीयते न स्तेयेन न भ्रूणहत्यया ' ( कौ ० ३1१ ) इत्यादि च ब्रह्मपरिग्रहेघटते । ब्रह्मविज्ञानेन हि सर्वकर्मक्षयः प्रसिद्धः क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ' ( मु ० २।२ | ८ ) इत्याद्यासु श्रुतिषु । प्रज्ञात्मत्वं च ब्रह्मपक्ष एवोपपद्यते । नह्यचेतनस्य वायोः प्रज्ञात्मत्वं संभवति । तथोपसंहारेऽपि - ' आनन्दोऽजरोऽमृतः ' इत्यानन्दत्वादीनि न ब्रह्मणोऽन्यत्र सम्यक् संभवन्ति । ' स न साधुना कर्मणा भूयान्मवति नो एवासाधुना कर्मणा कनीया-हैं । यहाँ केवल ब्रह्मका लिङ्ग ही उपलब्ध नहीं होता, अपितु अन्यके लिङ्ग भी हैं । जैसे कि ' मामेव विजानीहि ' ( मुझको ही जान ) यह इन्द्रका वचन देवतात्माका लिङ्ग है । ' इदं शरीरं ० ' ( इस शरीर -को पकड़कर उठाता है ) यह मुख्य प्राणका लिङ्ग है । ' नं वाचं ० ' ( वाणीके जाननेकी इच्छा न करे वक्ताको जाने ) इत्यादि जीवका लिङ्ग है । अतः संशय होना युक्त है । संशय होनेपर प्राणशब्दकी वायु विकार रूप मुख्य प्राण में प्रसिद्धि होनेके कारण यहाँ प्राणशब्दसे मुख्य प्राणका ही ग्रहण करना चाहिए, ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होनेपर कहते हैं - प्राणशब्द ब्रह्मका वाचक समझना चाहिए | क्योंकि श्रुतिसे ऐसा ही अनुगम - अवगम होता है । जैसे कि पूर्वापर वाक्यका पर्यालोचन करनेपर पदार्थोंका समन्वय ब्रह्म प्रतिपादन विषयक उपलब्ध होता है । आरम्भमें तो ' वरं वृणीष्व ० ' ( वर माँग ) इस प्रकार इन्द्रके कहनेपर प्रतर्दनने परम पुरुषार्थरूप वर माँगा ' त्वमेव मे वृणीष्व ' ( आप स्वयं ही विचारकर मुझे वह वर दें, जिसे आप मनुष्य के लिए सबसे बढ़कर हितकर समझते हों ) उस ( प्रतर्दन ) के लिए सबसे बढ़कर हिततमरूपसे उपदिष्ट हुआ प्राण परमात्मा क्यों न हो! परमात्माके ज्ञानके सिवा अन्य साधनोंसे हिततमकी प्राप्ति नहीं होती है, क्योंकि ' तमेव ० ' ( उस परमात्माको ही जानकर पुरुष जन्म मरणरूप संसारसे मुक्त हो जाता है, उसको प्राप्त करनेके लिए परमात्मा के ज्ञानसे भिन्न दूसरा और कोई उपाय नहीं है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । इसी प्रकार ' स यो मां वेद ० ' ( वह जो कोई विद्वान् मुझ ( ब्रह्म ) को साक्षात् अनुभव करता है उसका मोक्ष रूप लोक किसी भी कमसे, स्तेय ( चोरी ) अथवा भ्रूणहत्यासे नष्ट नहीं होता ) इत्यादि श्रुति वाक्य ब्रह्मका ग्रहण करनेसे ही संगत होते हैं । क्योंकि ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ० ' ( उस परात् पर ब्रह्मका ज्ञान होनेपर इस विद्वान् के सम्पूर्ण कर्म क्षीण हो जाते हैं ) इत्यादि श्रुतियोंमें ब्रह्मविज्ञान से हीं सब कर्मोंका क्षय प्रसिद्ध है । और प्रज्ञात्मत्व ( जीवत्व ) मी ब्रह्मपक्ष में ही उपपन्न होता है, अचेतन वायु प्रज्ञात्मा नहीं हो सकता है । उसी प्रकार उपसंहारमें भी ' आनन्दोऽजरोऽमृतः ' ऐसे आनन्दत्व आदि ब्रह्मसे मित्र अन्य में अच्छी तरह सम्भव नहीं हैं । ' स न साधुना ० ' ( वह पुण्य कर्मोंसे महान् नहीं होता और पाप कर्मोंसे घटता सत्यानन्दी - दीपिका बल नहीं है, क्योंकि परस्पर विरुद्ध अनेक लिङ्ग कुछ निश्चय करनेमें समर्थ नहीं हैं, अतः प्रत्युदाहरण-संगति से ' तत्र ' आदिसे पूर्वपक्षका उत्थान करते हैं ।
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१४० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ नेष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते । एष उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमभ्यो लोकेभ्योऽधो निनीषते ' इति ' एष लोकाधिपतिरेष लोकपाल एष लोकेशः ' ( कौ ० ३।८ ) इति च । सर्वमेतत्परस्मिन्ब्रह्मण्याश्रीयमाणेऽनुगन्तुं शक्यते न मुख्ये प्राणे । तस्मात्प्राणो ब्रह्म ॥२८ ॥
न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसंवन्धभूमा ह्यस्मिन् ॥ २६ ॥
पदच्छेदन, वक्तुः, आत्मोपदेशात् इति चेत्, अध्यात्म सम्बन्धभूमा, हि, अस्मिन् । सूत्रार्थ - ऐसा यदि कहो कि ( वक्तुः ) वक्ता इन्द्रने ( आत्मोपदेशात् ) ' मामेव विजानीहि ' इससे अपने आत्माका उपदेश किया है, अतः ' प्राणोऽस्मि ' यहाँ प्राणशब्द परब्रह्मवाचक नहीं है, ( इति चेत् ) ऐसा यदि कहो तो ( अस्मिन् ) इस अध्यायमें ( अध्यात्मसम्बन्धभूमा ) ' प्राण एव प्रज्ञात्मा ' इस प्रकार प्रत्यगात्मसम्बन्धका बाहुल्य उपलब्ध होता है ( हि ) इसलिए यह ब्रह्मका ही उपदेश है, देवताविशेषका नहीं । यदुक्तम्- प्राणो ब्रह्मेति, तदाक्षिप्यते । न परं ब्रह्म प्राणशब्दम् । कस्मात्? वक्तुरात्मो-पदेशात् । वक्ता हीन्द्रो नाम कश्चिद्विग्रहवान्देवताविशेषः स्वमात्मानं प्रतर्दनायाचचक्षे-' मामेव विजानीहि ' इत्युपक्रम्य ' प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा ' इत्यहंकारवादेन । स एष वक्तुरात्मत्वेनो-पदिश्यमानः प्राणः कथं ब्रह्म स्यात्? नहि ब्रह्मणो वक्तृत्वं संभवति, ‘ अवागमनाः ' ( बृह ० ३।८।८ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तथा विग्रहसंबन्धिभिरेव ब्रह्मण्यसंभवद्भिर्धर्मैरात्मानं तुष्टाव -' त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमहनमरुन्मुखान्यतीन्शालावृकेभ्यः प्रायच्छम् ' इत्येवमादिभिः । प्राणत्वं चेन्द्रस्य बलवत्त्वादुपपद्यते । ' प्राणो वै बलम् ' इति हि विज्ञायते । बलस्य चेन्द्रो देवता प्रसिद्धा । ' या च काचिद्बलप्रकृतिरिन्द्रकर्मैव तत् ' इति हि वदन्ति । प्रज्ञात्मत्वमप्य प्रतिहतज्ञानत्वाद्देवतात्मनः नहीं, यही जिसको इन लोकोंसे ऊँचा ले जाना चाहता है उस पुरुषसे पुण्य कर्म कराता है और यही जिसको इन लोकोंसे नीचे ले जाना चाहता है उस पुरुषसे पापकर्म कराता है ) और ' एष लोकाधिपति ० ' ( यह लोकाधिपति है यह लोकपाल, यह लोकेश है ) इत्यादि श्रुतियाँ हैं । ये सब [ धर्म - अधर्मका कराना, सर्वेश्वरत्व आदि धर्म ] पर ब्रह्मका आश्रयण करनेसे ही ठीक - ठीक अनुगत हो सकते हैं, वायुके विकार मुख्य प्राणका आश्रयण करनेसे नहीं । इससे यह सिद्ध हुआ कि प्राण ब्रह्म है अर्थात् प्राणशब्दसे ब्रह्मा ही ग्रहण सर्वथा युक्त है ॥ २८ ॥
प्राण ब्रह्म है, ऐसा जो कहा गया है, उसपर पूर्वपक्षी आक्षेप करते हैं । प्राणशब्द परब्रह्मका वाचक नहीं है, क्योंकि वक्ता अपने आत्माका उपदेश करता है । और यहाँ वक्ता इन्द्र नामका कोई - देहधारी एक देवताविशेष है, उसने ' मामेव ० ' ( मुझको हो जानो ) ऐसा आरम्भ कर ' प्राणोऽस्मि, ' ( मैं प्राण हूँ, प्रज्ञात्मा हूँ ) इस प्रकार अपने आत्माका ही अहङ्कार पूर्वक शब्दों में प्रतर्दनके लिए उपदेश किया है । वक्ताद्वारा आत्मरूपसे उपदेश किया हुआ वही प्राण ब्रह्म किस प्रकार हो सकता है । क्योंकि ' अवागमनाः ' ( बह वाणी और मनसे रहित है ) इत्यादि श्रुतियों से भी यह दिखलाया गया है कि ब्रह्म में वक्तृत्वका सम्भव ही नहीं है । इसी प्रकार ब्रह्म में सम्भव न होनेवाले शरीर सम्बन्धी धर्मोद्वारा इन्द्रने ' त्रिशीर्षाणं ० ' ( त्वष्टाके तीन शिरवाले विश्वनामक पुत्रको मैंने मारा, वेदान्तसे विमुख यतियोंको जंगलके कुत्तोंको खिला दिया ) इत्यादि वचनोंसे अपनी स्तुति की है । बलवान् होनेसे इन्द्रमें प्राणत्व ं उपपन्न होता है, क्योंकि ' प्राणो वै बलम् ' ( प्राण ही बल है ) ऐसा ज्ञात होता है और इन्द्र बलका प्रसिद्ध देवता है । ( जो कोई भी बलका काम है वह इन्द्रका ही कर्म है ) ऐसा सत्यानन्दी - दीपिका पूर्वं पक्षमें प्राण, देवता अथवा जीवकी उपासना है और सिद्धान्तमें ब्रह्मकी उपासना है । इतना दोनों पक्षों में अन्तर हैं ॥ २८ ॥
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अधि ० ११ सू ० ६ ९ -३० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १४१ संभवति । अप्रतिहतज्ञाना देवता इति हि वदन्ति । निश्चिते चैवं देवतात्मोपदेशे हिततमत्वा-दिवचनानि यथासंभवं तद्विषयाण्येव योजयितव्यानि । तस्माद्वक्तुरिन्द्रस्यात्मोपदेशान्न प्राणो ब्रह्मेत्याक्षिप्य प्रतिसमाधीयते - ' अध्यात्मसंबन्धभूमा ह्यस्मिन् ' इति । अध्यात्मसंबन्धः प्रत्यगात्मसंबन्धः, तस्य भूमा बाहुल्यम्, अस्मिन्नध्याये उपलभ्यते । ' यावद्ध्यस्मिञ्शरीरे प्राणो वसति तावदायुः’इति प्राणस्यैव प्रज्ञात्मनः प्रत्यग्भूतस्यायुष्प्रदानोपसंहारयोः स्वातन्त्र्यं दर्शयति, न देवताविशेषस्य पराचीनस्य । तथाऽस्तित्वे च प्राणानां निःश्रेयसमित्यध्यात्ममेवेन्द्रियाश्रयं प्राणं दर्शयति । तथा ' प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति ' ( कौ ० ३।३ ) इति, ' न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् ' इति चोपक्रम्य ' तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नामावरा अर्पिता एवमे-वैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः स एष प्राण एव प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृतः ' इति विषयेन्द्रियव्यवहारारनाभिभूतं प्रत्यगात्मानमेवोपसंहरति । ' सम आत्मेति विद्यात् ' इति चोपसंहारः प्रत्यग त्मपरिग्रहे साधुर्न पराचीनपरिग्रहे । ' अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभुः ' ( बृह.२।५।१ ९ ) इति च श्रुत्यन्तरम् । तस्मादध्यात्मसंबंधबाहुल्याद् ब्रह्मोपदेश एवायं न देवतात्मोपदेशः ॥२ ९ ॥ कथं तर्हि वक्तुरात्मोपदेशः? शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ॥ ३० ॥
पदच्छेद - शास्त्रदृष्ट्या, तु, उपदेशः, वामदेववत् । सूत्रार्थ - ( वामदेववत् ) वामदेवके समान ( शास्त्रदृष्ट्या ) मैं परब्रह्म हूँ, इस शास्त्रदृष्टिसे ( उपदेश: ) ' मामेव विजानीहि ' वक्ता इन्द्रका यह उपदेश प्रतर्दन के प्रति युक्त है, इसलिए ' प्राणोऽस्मि ' यह प्राणशब्द ब्रह्मपरक है । लोग कहते हैं । अप्रतिहत ( अकुण्ठित ) ज्ञानवाला होनेसे देवतात्मा भी प्रज्ञात्मा हो सकता है । देवता अप्रतिहत ज्ञानवाले होते हैं ऐसा [ वेद और लोकमें ] कहते हैं । इस प्रकार देवतात्माका उपदेश निश्चत होनेपर हिततमत्व आदि वचनोंकी यथासंभव उसीमें ही योजना करनी चाहिए । अतः वक्ता इन्द्रका आत्मोपदेश होनेसे प्राण ब्रह्म नहीं है, ऐसा आक्षेप कर ' अध्यात्मसम्बन्धभूमा-ह्यस्मिन् ' इस सूत्र भागसे उसका समाधान करते हैं । अध्यात्मसंम्बन्ध अर्थात् प्रत्यगात्मसम्बन्ध उसका बाहुल्य ( अधिकता ) इस अध्यायमें उपलब्ध होता है । ' यावद्ध्यस्मिन् ० ' ( जब तक इस शरीरमें प्राण रहता है तब तक आयु है ) यह श्रुति वाक्य प्रज्ञात्मा प्रत्यग्भूत प्राणमें ही आयु देने और हरनेकी स्वतन्त्रता दिखलाता है, बाह्यदेवताविशेष में नहीं । उसी प्रकार ' अस्तित्वे ० ' ( प्राणका अस्तित्व होनेसे ही इन्द्रियोंका निःश्रेयस है अर्थात् इस शरीरमें प्राणके विद्यमान होनेपर इन्द्रियों की स्थिति होती है ) यह श्रुति वाक्य इन्दियोंका आश्रय अध्यात्म - प्रज्ञात्मा प्राणको ही दिखलाता है । तथा ' प्राण एव ० ' ( प्राण ही प्रज्ञात्मा इस शरीरको ग्रहणकर उठाता है ), इसप्रकार और ' न वाचं ० ' ( वाणीको जाननेकी इच्छा न करे, वक्ताको जाने ) ऐसा आरम्भकर ' तद्यथा ० ' ( जैसे रथके अरोंमें नेमि लगी रहती है और नाभिमें अर लगे रहते हैं, उसीप्रकार ये भूत और विषय ज्ञान और इन्द्रियोंसे जुड़े हुए हैं, ज्ञान और इन्द्रियाँ प्राणसे जुड़ी हुई हैं वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनन्द, अजर और अमृत है ) इसप्रकार [ यह श्रुति ] विषय और इन्द्रियोंके व्यवहाररूप अरेके नाभिभूत प्रत्यगात्माका ही उपसंहार करती है । और ' स म आत्मेति ० ' ( वह मेरा आत्मा - स्वरूप है ऐसा जाने ) यह उपसंहार प्रत्यगात्माका ग्रहण करनेपर ही संगत होता है, बाह्य देवता के ग्रहण करनेपर नहीं, ' अयमात्मा ० ' ( यह आत्मा ही सबका अनुभव करने वाला ब्रह्म है ) इसप्रकार यह दूसरी श्रुति है । इससे यहाँ प्रत्यगात्माके सम्बन्धका बाहुल्य होने के कारण ब्रह्मका ही यह उपदेश है न कि देवतात्माका उपदेश है ॥ २ ९ ॥ तब वक्ताने अपने आत्माका उपदेश किस प्रकार किया है?
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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ * इन्द्रो नाम देवतात्मानं स्वमात्मानं परमात्मत्वेनाहमेव परं ब्रह्मे त्यार्षेण दर्शनेन यथाशास्त्रं पश्यन्नुपदिशति स्म - - -'मामेव विजानीहि ' इति । यथा ' तद्वैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्व ' इति, तद्वत् । ' तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् ' ( बृ ० १ | ४ | १० ० ) इति श्रुतेः । यत्पुनरुक्तं ' मामेव विजानीहि ' इत्युक्त्वा विग्रहधमैंरिन्द्र आत्मानं तुष्टावत्वावधादिभिरिति, तत्परिहर्तव्यम् । अत्रोच्यते न तावत् त्वाष्ट्रवधादीनां विज्ञेयेन्द्र-स्तुत्यर्थत्वेनोपन्यासः यस्मादेवं कर्माहं तस्मान्मां विजानीहीति । कथं तर्हि? विज्ञानस्तुत्य-र्थत्वेन यत्कारणं त्वाष्ट्रवधादीनि साहसान्युपन्यस्य परेण विज्ञानस्तुतिमनुसंदधाति * ' तस्य मे तंत्र लोम च न मीयते स यो मां वेद न ह वै तस्य केन च कर्मणा लोको मीयते ' इत्यादिना । एतदुक्तं भवति यस्मादीदृशान्यपि क्रराणि कर्माणि कृतवतो मम ब्रह्मभूतस्य लोमापि न हिंस्यते स योऽन्योऽपि मां वेद न तस्य केनचिदपि कर्मणा लोको हिंस्यत इति । विज्ञेयं तु ब्रह्मैव ' प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा ' इति वक्ष्यमाणम् । तस्माद्ब्रह्मवाक्यमेतत् ॥३० ॥
इन्द्र नाम देवताने आर्षदर्शनसे अपने आत्माको परमात्मारूपसे ' मैं ही परब्रह्म हूँ ' इस तरह से यथाशास्त्र जानकर, तदनुसार उसने ' मामेव विजानीहि ' ( मुझको ही जान ) ऐसा उपदेश किया है । जैसे ' तद्वैतत् ० ' ( उसे ( ब्रह्मको ) आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना - मैं मनु हुआ और सूर्य भी ) क्योंकि ' तद्यो यो ० ' ( उसे देवोंमेंसे जिस - जिसने जाना वही तद्रूप हो गया ) ऐसी श्रुति है | और ' मामेव ० ' ( मुझको ही जान ) ऐसा कहकर इन्द्रने त्वष्टाके पुत्र विश्वरूपके हनन आदि देहधर्मो से अपनी स्तुति की ऐसा जो कहा गया है, उसका परिहार ( समाधान ) करना चाहिए । इस विषय कहते हैं कि त्वष्टा के पुत्रके बध आदिका उपन्यास ' मैं ऐसा पराक्रमी हूँ, अतः मेरा ज्ञान प्राप्त करो ' यह विज्ञेय देहवारी इन्द्रकी स्तुति के लिए नहीं है, तो किसके लिए है? विज्ञानकी स्तुति के लिए है । क्योंकि त्वष्टापुत्रके बघ आदिके साहसका उल्लेख कर विज्ञानकी स्तुतिका ‘ तस्य मे तत्र ० ' ( वहाँ मुझ पराक्रमशालीका बाल भी बांका नहीं होता, जो मुझे जानता है उसका मोक्ष किसी भी कर्मसे नष्ट नहीं होता ) इत्यादि उत्तरवाक्यसे अनुसन्धान करता है । तात्पर्य यह है कि इस प्रकार हिंसात्मक क्रूर कर्म करनेपर भी ब्रह्मरूप होनेसे मेरा एक बाल भी नष्ट नहीं हुआ अर्थात् मेरी ब्रह्मरूपतामें बाल भर भी हानि नहीं हुई । वह जो कोई दूसरा भी इसी प्रकार मुझे ब्रह्मरूपसे जानता है अर्थात् अपनेको ' मैं ब्रह्म ही हूँ ' ऐसा अनुभव करता है उसका मोक्षरूप लोक किसी भी कर्मद्वारा नष्ट नहीं होता । अतः ' प्राणोऽस्मि ० ( मैं प्राण हूँ, प्रज्ञात्मा हूँ ) इस प्रकार से वर्णित विज्ञेय
तो वक्ष्यमाण ब्रह्म है । इस कारण यह वाक्य ब्रह्मविषयक है ॥ ३० ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * गर्भस्थ ऋषि वामदेवने ज्ञान प्राप्त किया कि ' मैं ही मनु और सूर्य हुआ ' यह आर्षज्ञान कहलाता है । पूर्व जन्ममें श्रुत वेदान्त महावाक्यार्थकी इस जन्ममें स्वतः सिद्ध आत्मज्ञानरूपसे अभि-व्यक्ति ही आर्षदर्शन है । ** ' तस्य मे तन्त्र ' इत्यादि स्तुति परक सब वाक्य ब्रह्मका ही प्रतिपादन करते हैं । साथ - साथ उनमें ब्रह्मज्ञानकी महिमा भी बताई गई है कि ब्रह्मज्ञान पाकर वह विद्वान् किसी भी पुण्य - पाप से लिप्त नहीं होता । ' आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ' ( गीता ० ४।४१ ) ( हे धनंजय! आत्मज्ञानीको शुभाशुभ कर्म नहीं बाँधते अर्थात् शुभाशुभ फल नहीं देते ) क्योंकि ' ज्ञानाग्निः सर्व -कर्माणि मस्मसात्कुरुते तथा ' ( गी ० ४१३७ ) ( उसी प्रकार ज्ञान अग्नि सब कर्मों को भस्म कर देता है ) ' ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति ' ( ब्रह्मवित् ब्रह्म ही है ) अत: उसका नाश कर्म आदिसे नहीं हो सकता । इसलिए ' प्राणोऽस्मि ' इत्यादि वाक्योंद्वारा ब्रह्म ही विज्ञेय है इन्द्र आदि देवता नहीं ॥ ६० ॥
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• अधि ० ११ सू ० ३१ ] भाषानुवाद सत्यानन्दी - दीपिकासहित १४३ जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात् ॥ ३१ ॥
पदच्छेद -- जीवमुख्यप्रणलिङ्गात्, न इति चेत्, न, उपासात्रैविध्यात्, आश्रितत्वात्, इह, तद्योगात् । सूत्रार्थ - ( जीवमुख्यप्राणलिङ्गात् ) ( वक्तारं विद्यात् ' इस श्रुतिमें जीवलिङ्ग और ' इदं शरीरं ' इसमें मुख्यप्राणलिङ्गके होनेसे ( न ) ' प्राणोऽस्मि ' इस वाक्यमें प्राणशब्दसे केवल ब्रह्मका ही बोध नहीं होता, अपितु जीव और मुख्यप्राणका भी बोध होता है । ( इति चेत्, न ) ऐसा यदि कहो तो युक्त नहीं है, ( उपासात्रैविध्यात् ) क्योंकि ऐसा होनेसे तीन उपासनाएँ माननी पड़ेंगी । उपक्रम और उपसंहारसे एकवाक्यता अवगत होती है, ( आश्रितत्वात् ) और ' प्राण इति होवाच ' इत्यादि स्थलोंमें ब्रह्मलिंग होनेके कारण प्राणशब्दका अर्थं ब्रह्म ही स्वीकार किया गया है | ( इह ) इस श्रतिमें भी ( तद्योगात् ) हिततमत्व आदि ब्रह्मलिंगका योग है । इनसे भी प्राणशब्द से यहाँ ब्रह्मका ही उपदेश ज्ञात होता है । * यद्यप्यध्यात्मसंबन्धभूमदर्शनान्न पराचीनस्य देवतात्मन उपदेशः, तथापि न ब्रह्मवाक्यं भवितुमर्हति । कुतः? जीवलिङ्गान्मुख्य प्राणलिङ्गाच्च । जीवस्य तावदस्मिन्वाक्ये विस्पष्टुं लिङ्गमुपलभ्यते ' न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् ' इत्यादि । अत्र हि वागादिभिः करणैर्व्यापृतस्य कार्यकरणाध्यक्षस्य जीवस्य विज्ञेयत्वमभिधीयते । तथा मुख्यप्राणलिङ्गमपि-' अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति ' इति । शरीरधारणं च मुख्यप्राणस्य धर्मः, प्राणसंवादे वागादीन्प्राणान्प्रकृत्य - तान्वरिष्ठः प्राण उवाच मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्च-वात्मानं प्रविभज्यैतद्वाणमवष्टभ्य विधारयामि ' ( प्र ० २।३ ) इति श्रवणात् । ते तु ' इमं शरीरं परिगृह्य ' इति पठन्ति, ‘ तेषामिमं जीवमिन्द्रियग्रामं वा परिगृह्य ' शरीरमुत्थापयतीति व्याख्येयम् । यद्यपि अध्यात्मसम्बन्धकी अधिकता दिखाई देनेसे बाह्य देवतात्माका उपदेश नहीं है, तो भी यह प्राणवाक्य केवल ब्रह्मविषयक नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ जीवलिङ्ग और मुख्यप्राणके लिङ्ग उपलब्ध होते हैं । ' न वाचं ० ' ( वाणीको जाननेकी इच्छा न करे वक्ताको जाने ) इत्यादि वाक्यमें जीवका लिंग तो स्पष्ट उपलब्ध होता है; क्योंकि यहाँ वाणी आदि इन्द्रियोंसे व्यापार करने वाला, शरीर और इन्द्रियोंका अध्यक्ष- स्वामी जीव विज्ञेयरूपसे अभिहित है । इसीप्रकार ' अथ खलु प्राण एव ' ( निश्चय प्राण ही प्रज्ञात्मा इस शरीरको ग्रहणकर उठाता है ) इस वाक्यमें मुख्य प्राणका भी लिंग ( ज्ञापन ) है | क्योंकि शरीर धारण करना मुख्य प्राणका धर्म है, प्राणसंवादमें वाणी आदि प्राणों- इन्द्रियोंको प्रस्तुतकर ' तान्वरिष्ठ प्राणः उवाच ० ' ( उनमेंसे अत्यन्त श्रेष्ठ प्राणने उन इन्द्रियोंसे कहा तुम मोह - अभिमानको मत प्राप्त हो, क्योंकि मैं ही अपनेको पाँच प्रकारसे विभक्तकर इस शरीर -को आलम्बन देकर धारण करता हूँ ) ऐसी श्रुति है । और जो कोई ' इदं शरीरं ' इस ' इदं ' के स्थानमें ' इमं शरीरं ' ऐसा पाठ स्वीकार करते हैं, उनके मतमें इस जीव, अथवा इन्द्रिय समूहका ग्रहणकर शरीरको उठाता है, ऐसी व्याख्या करनी चाहिए । चेतन होनेके कारण जीवमें प्रज्ञात्मत्व भी युक्त है । सत्यानन्द दीपिका -* प्रश्नोपनिषद् में मुख्य प्राण और चक्षु आदि इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवताओंका संवाद है- - → एक समय वे सब अपनी - अपनी महिमाको प्रकट करते हुए कहने लगे कि हम ही इस शरीरको आश्रय देकर धारण करते हैं, तब उनसे सर्वश्रेष्ठ मुख्यप्राणने कहा – अविवेकके कारण तुम मिथ्या अभि-मान मत करो, क्योंकि अपने प्राण, अपान आदि पाँचवृत्ति भेदकर मैं ही इस शरीरको आश्रय देकर धारण करता हूँ । प्राणके इस कथनपर उन सबने विश्वास नहीं किया । तब प्राण उनके अभिमान निवृत्त्यर्थं ऊपरको निकलने लगा, उसके ऊपर उठनेके साथ शेष सभी खिंचने लगे, तथा उसके
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१४४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ प्रज्ञात्मत्वमपि जीवे तावच्चेतनत्वादुपपन्नम् । मुख्येऽपि प्राणे प्रज्ञासाधनप्राणान्तराश्रयत्वादु-पपन्नमेव । जीवमुख्यप्राणपरिग्रहे च प्राणप्रज्ञात्मनोः सहवृत्तित्वेनाभेदनिर्देशः, स्वरूपेण चभेदनिर्देश इत्युभयथापि निर्देश उपपद्यते - ' यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वै प्रज्ञा स प्राणः सह ह्येतावस्मिञ्शरीरे वसतः सहोत्क्रामतः ' इति । ब्रह्मपरिग्रहे तु किं कस्माद्भिद्येत? तस्मादिह जीवमुख्य प्राणयोरन्यतर उभौ वा प्रतीयेयातां न ब्रह्मेति चेत् — नैतदेवम्; उपासात्रैवि-ध्यात् । एवं सति त्रिविधमुपासनं प्रसज्येत - जीवोपासनं, मुख्यप्राणोपासनं, ब्रह्मोपासनं चेति । न चैतदेकस्मिन्वाक्येऽभ्युपगन्तुं युक्तम् । उपक्रमोपसंहाराभ्यां हि वाक्यैकत्वमव-गम्यते । ' मामेव विजानीहि ' इत्युपक्रम्य ' प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरम्मृतमित्युपास्स्व ' इत्युक्त्वा, अन्ते स एष प्राण एव प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृतः ' इत्येक रूपावुपक्रमोपसंसारौ दृश्येते । तत्रार्थैकत्वं युक्तमाश्रयितुम् । नच ब्रह्मलिङ्गमन्यपरत्वेन परिणेतुं शक्यम् । दशानां भूतमा-त्राणां च ब्रह्मणोऽन्यत्रार्पणानुपपत्तेः आश्रितत्वाच्चान्यत्रापि ब्रह्मलिङ्गवशात्प्राणशब्दस्य ब्रह्मणि प्रवृत्तेः । इहापि च हिततमोपन्यासादिब्रह्मलिङ्गयोगाद्ब्रह्मोपदेश एवायमिति गम्यते । यत्तु मुख्यप्राणलिङ्गं दर्शितम् - ' इदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति ' इति – तदसत् प्राणव्यापार-प्रज्ञा ( ज्ञान ) के साधनभूत अन्य इन्द्रियोंका आश्रय होनेसे मुख्यप्राण में भी प्रज्ञात्मत्व उपपन्न ही है । यदि प्राणशब्दका अर्थ जीव और मुख्यप्राण दोनों मानें तो प्राण और प्रज्ञात्माका एक ही शरीरमें साथ रहनेसे अभेद निर्देश और स्वरूपसे भेद निर्देश इस तरह दोनों प्रकारसे निर्देश उपपन्न होता है, क्योंकि ' यो वै प्राणः सा प्रज्ञा ० ' ( जो प्राण है वह प्रज्ञा है जो प्रज्ञा है वह प्राण है, निश्चय ही ये दोनों इस शरीरमें साथ ही साथ रहते हैं और साथ ही साथ उत्क्रमण करते हैं ) ऐसी श्रुति है । यदि प्राणशब्दका अर्थं ब्रह्म स्वीकार करें, तो यह प्रश्न उपस्थित होगा कि कौन किससे मिन्न होगा? अतः यहाँ जीव और मुख्यप्राण इन दोनोंमें से कोई एक अथवा दोनों ही प्राणशब्दसे प्रतीत होते हैं, ब्रह्म नहीं । यह पूर्वपक्षका अभिप्राय है । यह ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि उपासना तीन प्रकार की होगी । यदि ऐसा माना जाय तो जीवोपासना, मुख्यप्राणोपासना और ब्रह्मोपासना इस तरहसे तीन प्रकारकी उपासनाएँ प्रसक्त होंगी । किन्तु एक वाक्यमें यह सब स्वीकार करना. युक्त नहीं है, कारण कि उपक्रम और उपसंहारसे एकवाक्यता अवगत होती है । ' मामेव विजानीहि ' ऐसा आरम्भ करके ' प्राणोऽरिम प्रज्ञात्मा ' ( मैं प्राण हूँ, प्रज्ञात्मा हूँ उस मेरी आयु और अमृरूपये उपासना करे ) ऐसा कहकर अन्तमें ' स एष प्राण एव ० ' ( वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनन्द, अजर और अमृत है ) तो इसप्रकार उपक्रम और उपसंहार एकरूप दृष्ट होते हैं । अतः यहाँ ( ब्रह्मरूप ) एक अर्थका आश्रय करना ही युक्त है । और ब्रह्मलिंगको अन्यमें ( जीव तथा मुख्यप्राणमें ) परिणत-समन्वित नहीं कर सकता, क्योंकि दस भूतमात्राओं और दस प्रज्ञामात्राओं का ब्रह्मसे भिन्न अन्यमें अपंण ( अधिष्ठानरूप लिङ्गका समन्वय करना युक्त नहीं है, कारण कि ये [ ब्रह्मके ] आश्रित हैं । दूसरे स्थलोंमें मी ब्रह्मलिङ्गके बलसे प्राण शब्दकी ब्रह्ममें प्रवृत्ति है अर्थात् प्राणशब्द ब्रह्मके आश्रित है 1 । और यहाँ भी हिततमत्वका उपन्यास आदि ब्रह्मलिङ्गके योग से यह ब्रह्मका ही उपदेश है, ऐसा ज्ञात होता है । ' इदं शरीरं ० ' ( इस शरीरको ग्रहण कर उठाता है ) यह जो मुख्य प्राणका लिङ्ग सत्यानन्दी - दीपिका स्थित होने पर सब स्थित होने लगे । तब सभी वे मिध्या अभिमानको छोड़कर मुख्यप्राणकी स्तुति की । इसप्रकार यह संवाद मुख्यप्राणका स्पष्ट लिङ्ग है । * किञ्च दस भूतमात्राओं ( आकाश आदि पाँच महाभूत और शब्द आदि पाँच विषय ) और दस प्रज्ञामात्राओं ( शब्द आदि विषयक पाँच ज्ञान और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ) का ब्रह्म से भिन्न अन्य
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अधि ० ११ सू ० ३१ ] भाषानुवाद- सत्यानन्दी - दीपिकासहित १४५ स्यापि परमात्मायत्तत्वात्परमात्मन्युपचरितुं शक्यत्वात्, ' न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ' ( काठ ० २२५/५ ) इति श्रुतेः । यदपि न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् ' इत्यादि जीवलिङ्गं दर्शितं तदपि न ब्रह्मपक्षं निवारयति । नहि जीवो नामात्यन्तभिन्नो ब्रह्मणः ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादिश्रुतिभ्यः । बुद्धवाद्युपाधि-कृतं तु विशेषमाश्रित्य ब्रह्मैव सञ्जीवः कर्ता भोक्ता चेत्युच्यते । तस्योपाधिकृतविशेषपरित्या-गेन स्वरूपं ब्रह्म दर्शयितुं न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् ' इत्यादिना प्रत्यगात्माभिमुखी-करणार्थ उपदेशो न विरुध्यते । ' यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्मत्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ' ( के ० १1४ ) इत्यादि च श्रुत्यन्तरं वचनादिक्रियाव्यापृतस्यैवात्मनो ब्रह्मत्वं दर्शयति । * यत्पुनरेतदुक्तम् - ' सह ह्येतावस्मिञ्शरीरे वसतः सहोत्क्रामतः ' इति प्राणप्रज्ञात्म-नोर्भेददर्शनं ब्रह्मवादे नोपपद्यत इति - नैष दोषः: ज्ञानक्रियाशक्तिद्वयाश्रययोर्बुद्धिप्राणयोः प्रत्यगात्मोपाधिभूतयोर्भेदनिर्देशोपपत्तेः उपाधिद्वयोपहितस्य तु प्रत्यगात्मनः स्वरूपेणाभेद दिखलाया गया है, वह ठीक नहीं है । क्योंकि प्राणका व्यापार भी परमात्मा के अधीन है । अतः परमात्मामें उसक: उपचार ( गौण प्रयोग ) हो सकता है, कारण कि ' न प्राणेन ० ' ( कोई भी प्राणी न तो प्राणसे ही जीवित रहता है और न अपानसे ही, किन्तु वे तो जिसमें ये दोनों आश्रित ( अध्यस्त ) हैं, ऐसे किसी अन्यसे ही जीवित रहते हैं ) ऐसी श्रुति है । और ' न वाचं ० ' ( वाणीके जाननेकी इच्छा न करे किन्तु वक्ताको जाने ) इत्यादिसे जो जीवके लिंग दिखलाए गए हैं वे भी ब्रह्मपक्षका निवारण नहीं करते, क्योंकि ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यादि श्रुतियोंसे यह स्पष्ट होता है कि जीव ब्रह्मसे अत्यन्त भिन्न नहीं है । ब्रह्म ही बुद्धि आदि उपाधिकृत विशेष ( परिच्छिन्नत्वादि ) का आश्रय कर जीव होता हुआ कर्ता और भोक्ता है, ऐसा कहा जाता है । उपाधिकृत विशेषके त्यागसे उसके यथार्थ स्वरूप ब्रह्मेका ज्ञान करानेके लिए, ' न वाचं ० ' इत्यादि श्रुतियों द्वारा उसको प्रत्यगात्माकी ओर अभिमुख करनेके लिए [ यह वक्तृत्व ] उपदेश विरुद्ध नहीं है । ' यद्वाचा ० ' ( जो वाणीसे प्रकाशित नहीं होता किन्तु जिससे वाणी प्रकाशित होती है अर्थात् जिसकी सत्तासे वाणी अपना वदन-शब्द व्यापार करती है, उसको ही तुम ब्रह्म जानो । जिस इस [ देश - कालावच्छिन्न वस्तु ] की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ) इत्यादि दूसरी श्रुति वचन आदि क्रियाओंमें व्यापृत आत्मा ब्रह्म है ऐसा दिखलाती है । ' सह ह्येतावस्मिन् ० ' ( निश्चय ये दोनों -- प्राण और प्रज्ञात्मा इस शरीर में साथ ही साथ रहते हैं और साथ ही साथ निकलते हैं ) इस प्रकार प्राण और प्रज्ञात्माका भेद दर्शन • ब्रह्मवाद में उपपन्न नहीं होता, ऐसा जो कहा गया है, यह दोष नहीं है, क्योंकि प्रत्यगात्माके उपाधिरूप ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिके आश्रय बुद्धि और प्राणका तो भिन्नरूपसे निर्देश युक्त है | परन्तु दोनों उपाधियोंसे उपहित प्रत्यगात्माका तो स्वरूपसे अभेद है । इसलिए ' प्राण एव प्रज्ञात्मा ' ( प्राण सत्यानन्दी - दीपिका कोई अधिष्ठान नहीं हो सकता | ' अतएव प्राण: ' ' प्राण इति होवाच ' इत्यादि स्थलोंमें भी ब्रह्मके बहुत लिङ्ग हैं । और निरतिशय आनन्द ही सबके लिए हिततम है, ' आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् ' ( तै ० ३१६ ) ( आनन्द ब्रह्म है ऐसा भृगुने जाना ) ' विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' ( विज्ञान आनन्द ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्मको ही आनन्द स्वरूप कहती हैं । इसलिए प्राण आदि शब्दसे यहाँ ब्रह्मका ही उपदेश है । जीव तथा मुख्य प्राणका नहीं है । * औपाधिक भेद और स्वरूपतः अभेदको लेकर उक्तदोषका निराकरण किया जाता है । प्रत्य-गात्माकी उपाधिरूप जो ज्ञानशक्तिवाली बुद्धि और क्रियाशक्तिवाला प्राण, इन दोनोंका परस्पर भेद है । इससे तो ‘ सह ं ह्येतावस्मिन् ' इस मन्त्रमें उनका औपाधिक भेद कहा गया है । परन्तु दोनों
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१४६. ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० १ इत्यतः प्राण एव प्रज्ञात्मेत्येकीकरणमविरुद्धम् । 8 अथवा - ' नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात् ' इत्यस्यायमन्योऽर्थः - न ब्रह्मवाक्येऽपि जीवमुख्यप्राणलिङ्गं विरुध्यते । कथम्? उपासात्रैविध्यात् । त्रिविधमिह ब्रह्मोपासनं विवक्षितम्- प्राणधर्मेण, प्रज्ञाधर्मेण, स्वधर्मेण च । तत्र आयुरमृतमुपास्स्वायुः प्राणः ' इति, ' इदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति ' इति, ' तस्मादेतदेवो -क्थमुपासीत ' इति च प्राणधर्मः । ' अथ यथास्यै प्रज्ञायै सर्वाणि भूतान्येकीभवन्ति तद्व्याख्यास्यामः ' इत्युपक्रम्य ‘ वागेवास्या एकमङ्गमदूदुहत्तस्यै नाम परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा प्रज्ञया वाचं समारुह्य वाचा सर्वाणि नामान्याप्नोति ' इत्यादि प्रज्ञाधर्मः । ता वा एता दशैव भूतमात्रा अधिप्रज्ञं दश प्रज्ञामात्रा अधिभूतम् । यद्धि भूतमात्रा न स्युर्न प्रज्ञामात्राः स्युः । यद्धि प्रज्ञामात्रा न स्युर्न भूतमात्राः स्युः । नह्यन्यतरतो रूपं किंचन सिद्ध्येत् । नो एतन्नाना । ' तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नामावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्रा: प्रज्ञामाश्रा स्वर्पिताः प्रज्ञामात्रा प्राणेऽर्पिताः स एष ही प्रज्ञात्मा है ) ऐसा एकीकरण अविरुद्ध है । अथवा ' नोपासावैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात् ' इस सूत्र भागका यह दूसरा अर्थ है - ब्रह्मवाक्यमें मी जीव लिङ्ग तथा मुख्यप्राण लिङ्गका विरोध नहीं है, क्यों? इसलिए कि उपासनाएँ तीन प्रकार की हैं । यहाँ प्राणधर्म, प्रज्ञाधर्म और स्वधर्मंसे ब्रह्मो-पासनाएँ तीन प्रकारकी विवक्षित हैं । उनमें ' आयुस्मृतमुषास्स्वायुः प्राणः ' ( आयुरूपसे, अमृतरूपसे मेरी उपासना करो आयु प्राण है ) ' इदं शरीरं ० ' ( इस ' शरीरको ग्रहणकर उठाता है ) और ' तस्मादेत ० ' ( इसलिए उसकी उक्थरूपसे उपासना करे ) यह प्राणधर्म है । ' अथ यथास्यै प्रज्ञायै ० ' ( अब जिस प्रकार इस प्रज्ञा- जीव में सब भूत एक होते हैं उसका व्याख्यान करेंगे ) ऐसा उपक्रमकर ' वागे-वास्या ० ( वाणीने ही इस प्रज्ञाके एक अंगको देहार्धं मागको पूर्ण किया, उसकी [ चक्षु आदिसे ] ज्ञापित भूतमात्रा दूसरे देहार्धं भागका कारण होती है, बुद्धिद्वारा चिदात्मा वाणीपर आरूढ़ होकर अर्थात् वाणीका प्रेरक होकर सब नामोंको प्राप्त करता है ) इत्यादि प्रशा- जीव धर्म हैं । ' ता वा एता ' वे ये दस ही भूतमात्राएँ मधिप्रज्ञ - प्रज्ञाके अधीन हैं, और दस प्रज्ञमात्राएं अधिभूत - भूतके अधीन । यदि भूतमात्राएँ न हों, तो प्रज्ञामात्राएँ भी न हों और यदि प्रज्ञामात्राएँ न हों, तो भूतमात्राएँ मी न हों, क्योंकि दोनों में से किसी एकके न होनेपर केवल एकसे कोई भी रूप सिद्ध न होगा । यह नाना नहीं हैं । ' जैसे रथके अरोंमें नेमि लगी रहती है और नेमिमें अर जुड़े रहते हैं, इसीप्रकार ये सत्यानन्दी - दीपिका उपाधियों से उपहित प्रत्यगात्माका तो स्वरूपसे अभेद है । इससे ' प्राण एव प्रज्ञात्मा ' यह श्रुतिवाक्य प्राण और प्रज्ञात्माका अभेद निर्देश करता है । सुतरां सिद्धान्त में किसी प्रकारका विरोध नहीं है । * भगवान् माष्यकार ‘ नोपासा त्रैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात् ' सूत्रके इस उत्तरभागका स्वाभिमत व्याख्यानकर अब वृत्तिकारके मतानुसार व्याख्यान करते हैं । ' उत्थापयति इति उक्थम् ' ' शरीरको ग्रहणकर उठाता है इससे प्राण उक्थ है ' तो ये सब प्राणके धर्म हैं । प्रज्ञा पदसे यहाँ अमास सहित बुद्धिरूप जीवका ग्रहण है । जिसमें यह निवास करता है इस शरीरके दो भाग हैं, एक नाम और दूसरा रूप, चिदात्मा बुद्धिद्वारा वागिन्द्रियपर आरूढ होकर अर्थात् उसका प्रेरक होकर वागिन्द्रियद्वारा सम्पूर्ण नाम प्रपञ्चको वक्तव्यरूपसे प्राप्त करता है अर्थात् वक्ता होता है । और नेत्रसे सभी रूपोंको देखता है, इसप्रकार द्रष्टा होता है, इसीप्रकार सभी पदार्थोंका द्रष्टृत्व और चिदात्मा में द्रष्टुत्वके अध्यासका कारण होना यह सब बुद्धिका धर्म है । * भूतमात्राएँ ग्राह्य विषय कहलाती हैं और प्रज्ञामात्राएँ ग्राहक । ग्राह्य भूतमात्राएँ प्रज्ञा-मात्राओं- ज्ञानेन्द्रियोंसे सिद्ध होती हैं, इसलिए प्रज्ञामात्राओंके अधीन हैं, और प्रज्ञामात्राएँ ( ज्ञाने -न्द्रियां और चाक्षुष आदि ज्ञान ) ग्राह्य भूतमात्राओंके अधीन हैं । इसप्रकार ग्राह्य और ग्राहक अपनी