श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 181–190

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 181–190

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अधि ० ११ सू ० ३१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित १४७ प्राण एव प्रज्ञात्मा ' इत्यादिर्ब्रह्मधर्मः । तस्माद्ब्रह्मण एवैतदुपाधिद्वयधर्मेण स्वधर्मेण चैकमु-पासनं त्रिविधं विवक्षितम् । अन्यत्रापि ' मनोमयः प्राणशरीर: ' ( छा ० ३।१४ / २ ) इत्यादावु -पाधिधर्मेण ब्रह्मण उपासनमाश्रितम् । इहापि तद्युज्यते; वाक्यस्योपक्रमोपसंहाराभ्यामे-कार्थत्वावगमात् प्राणप्रज्ञा ब्रह्मलिङ्गावगमाच्च । तस्माद्ब्रह्म वाक्यमेतदिति सिद्धम् ॥ ३१ ॥

इति श्रीमच्छारो रकमीमांसाभाष्ये श्रीशङ्करभगवत्पादकृतौ प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ १ ॥

भूतमात्राएँ प्रज्ञामात्राओंमें अर्पित हैं और प्रज्ञामात्राएँ प्राणमें अर्पित हैं वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा हैं ', इत्यादि ( स्व ) ब्रह्मधर्म हैं । इस कारण ब्रह्मकी ही एक उपासना दोनों [ प्राण तथा प्रज्ञा ] उपाधियों के धर्मसे तथा स्व - धर्मसे तीन प्रकारकी विवक्षित है । अन्य स्थलों में भी ' मनोमयः प्राणशरीरः ' ( प्राण जिसका शरीर है ऐसा मनोमय है ) इत्यादिमें उपाधिके धर्मसे ब्रह्मको उपासनाका आश्रय किया गया है । यहाँ भी अन्यके धर्मसे अन्यकी उपासना युक्त है, क्योंकि उपक्रम और उपसंहारसे वाक्यकी एकार्थता प्रतीत होती है तथा प्राण, प्रज्ञा और ब्रह्मलिङ्गों को अवगति होती है । इस तरहसे यह सिद्ध हुआ कि यह ब्रह्मवाक्य ही है ॥ ३१ ॥

स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत शाङ्करभाष्य- माषानुवादके प्रथम अध्यायका प्रथम पाद समाप्त ॥ १ ॥

सत्यानन्दी- दीपिका अपनी सिद्धिमें एक दूसरेकी अपेक्षा करते हैं । ग्राह्य और ग्राहक परस्पर सापेक्ष होनेसे वस्तुतः मिन्न नहीं हैं, किन्तु चिदात्मामें आरोपित हैं । इस तरह सबका अधिष्ठान और ' आनन्दोऽजरोऽमृतः ' इत्यादि ये सब ब्रह्म धर्म प्रतीत होते हैं । इसलिए ' मनोमयः प्राणशरीरः ' इत्यादि स्थलोंमें प्राण और प्रज्ञाके धर्मोसे भी ब्रह्मकी उपासना हो सकती है । ऐसा माननेसे वाक्यभेद + भी नहीं होगा । यदि वाक्यभेद नहीं है तो फिर उपासनाका भेद क्यों वह इसलिए कि यहाँ प्राण, प्रज्ञा तथा ब्रह्मके मिन्न - भिन्न लिङ्गोंका दर्शन होता है । इससे ब्रह्मविषयक उपासना तीन प्रकारकी हो सकती है, परन्तु वृत्तिकारद्वारा इसप्रकार की गई सूत्रकी व्याख्याको टीकाकारोंने स्वीकार नहीं किया है, क्योंकि ऐसा माननेपर भिन्न - भिन्न रूपसे तीन उपासनाएँ माननी पड़ेंगी । एकवाक्यमें ऐसा मानने से वाक्यभेद प्रसक्त होगा अर्थात् ' स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा ' ' तं मामायुरमृतमित्युपास्स्व ' ( कौ ० ३।२ ) इस एक वाक्य में ' माम् ' अर्थात् प्रज्ञात्मा जीवरूपसे ' आयुः ' अर्थात् प्राणरूप से और ' अमृतम् ' अर्थात् ब्रह्मरूपसे अपने - अपने धर्मसे युक्त तीन उपासनाओंका प्रसंग उपस्थित होगा, एकार्थं प्रतिपादक वाक्यको अनेकार्थ प्रदिपादक मानना ही तो वाक्यभेद रूप दोष है, इससे ' प्राणोऽस्मि ' इस उपक्रम वाक्य और ' आनन्दोऽजरोऽमृतः ' इस उपसंहार वाक्यसे जो एक अर्थकी सिद्धि होती है उसका मङ्ग होगा । यदि मगवान् माष्यकारका अनुसरण करें तो उपक्रम और उपसंहारसे एक ब्रह्मरूप अर्थकी ही सिद्धि होती है प्राण और प्रज्ञात्माकी नहीं । अतः ' प्राणोऽस्मि ' ' मामेव विजानीहि ' ' आनन्दोऽजरोऽ-मृतः ' इत्यादि पूर्वोक्त श्रुतिवाक्य ब्रह्म के ही प्रतिपादक सिद्ध होते हैं । पूर्वपक्ष में तीन उपासनाएँ मानी गई हैं, सिद्धान्त में एक ब्रह्मको ही उपासना है, यह दोनोंमें अन्तर है ॥ ३१ ॥

v.in स्वामी सत्यानन्द सरस्वती कृत ' सत्यानन्दी - दीपिका ' के प्रथम अध्यायका प्रथम पाद समाप्त ॥ १ ॥

+ टि ० - मीमांसाशास्त्रको वाक्य शास्त्र भी कहते हैं । वाक्यसे वाक्यार्थ बोध कैसे होता है? इस विषय में मीमांसकोंकी विचारपद्धतिको सभी भारतीय विद्वानोंने अपनाया है । वाक्यसे वाक्यार्थ बोध उद्देश्य विधेय भावावगाही होता है अर्थात् वाक्यजन्य बोधमें एक पदार्थ उद्देश्यतया मासता है और दूसरा विधेयतया, यह साधारण नियम है । परन्तु उद्देश्यका भेद होने से अथवा विधेयका भेद होने से अर्थात् दो उद्देश्य और दो विधेय होने से वाक्यस्वरूपका मंग हो जाता है । उद्देश्य - विधेय मावावगाही एकापस्थितिजनकता भावनाकी एककर्मवत्ता है अर्थात् भावना में एक ही कर्म होता है

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१४८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ प्रथमाध्याये द्वितीयः पादः । [ अत्रास्पष्टब्रह्मलिङ्गयुक्तवाक्यानामुपास्य ब्रह्मविषयाणां विचारः ] ' इस पादमें उपास्य ब्रह्म विषयक अस्पष्ट ब्रह्म लिङ्ग युक्त वाक्योंका विचार है ' ( १ सर्वत्र प्रसिद्ध्यधिकरणम् सू ० १-८ ) * प्रथमे पादे ' जन्माद्यस्य यतः ' इत्याकाशादेः समस्तस्य जगतो जन्मादिकारणं ब्रह्मेत्युक्तम् । तस्य समस्तजगत्कारणस्य ब्रह्मणो व्यापित्वं नित्यत्वं सर्वज्ञत्वं सर्वशक्तित्वं सर्वात्मत्वमित्येवं जातीयका धर्मा उक्ता एव भवन्ति । अर्थान्तरप्रसिद्धानां च केषांचिच्छ-ब्दानां ब्रह्मविषयत्वहेतुप्रतिपादनेन कानिचिद्वाक्यानि स्पष्टब्रह्मलिङ्गानि संदिद्यमानानि ब्रह्मपरतया निर्णीतानि । पुनरप्यन्यानि वाक्यान्य स्पष्टब्रह्मलिङ्गानि संदिद्यन्ते - किं परं ब्रह्मप्रतिपादयन्त्या होस्विदर्थान्तरं किंचिदिति । तन्निर्णयाय द्वितीय तृतीयौ पादावारभ्येते-सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् ॥ १ ॥

पदच्छेद - सर्वत्र, प्रसिद्धोपदेशात् । सूत्रार्थ - ( सर्वत्र ) सब वेदान्तोंमें ( प्रसिद्धोपदेशात् ) ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' इत्यादि वाक्योंमें जगत्कारणरूप से प्रसिद्ध ब्रह्मका ही ' मनोमयः ' मनोमयत्व आदि धर्मोसे उपदेश है, अतः मनोमय ब्रह्म ही है जीव नहीं । प्रथम पादमें ' जन्माद्यस्य यतः ' इस सूत्र से आकाश आदि सम्पूर्ण प्रपञ्चके जन्म आदिका एकमात्र कारण ब्रह्म है ऐसा कहा जा चुका है । किञ्च समस्त प्रपञ्च के कारणरूप उस ब्रह्मके सर्व-व्यापकत्व, नित्यत्व, सर्वज्ञत्व, सर्वशक्तित्व, सर्वात्मकत्व इस प्रकारके धर्म भी अर्थतः कहे गये ही हैं । तथा ब्रह्मसे भिन्न दूसरे [ आकाश, प्राण, ज्योतिः आदि ] अर्थों में प्रसिद्ध [ आकाश, प्राण, ज्योतिः आदि कुछ शब्दोंका ब्रह्मविषयत्व हेतु प्रतिपादनके द्वारा एवं कुछ ऐसे वाक्य हैं जिनमें ब्रह्मलिङ्ग तो स्पष्ट हैं, परन्तु आपाततः सन्देह होता है कि वे ब्रह्म विषयक हैं अथवा नहीं? वे भी वस्तुतः ब्रह्म विषयक ही हैं ऐसा स्पष्ट निर्णय किया गया है । अब पुनः जिन अन्य वाक्योंमें ब्रह्मलिङ्ग स्पष्ट नहीं है उन वाक्योंके विषयमें सन्देह होता है कि क्या वे भी परब्रह्मका ही प्रतिपादन करते हैं अथवा किसी दूसरे अर्थका, उसके निर्णय के लिए इस द्वितीय और तृतीय पादका आरम्भ किया जाता है— सत्यानन्दी - दीपिका * प्रथमपादमें ब्रह्म तटस्थलक्षण के द्वारा प्रपञ्चके उत्पत्ति आदिका कारण कहा गया है और उसमें कारणत्वसे ही व्यापकत्व आदि धर्म भी स्वत: सिद्ध हुए कहे गये हैं । इस प्रथम पाद में प्रति-पादित विषयको अगले दो पादोंके आरम्भका आधार समझना चाहिए; क्योंकि प्रथम पाद और द्वितीय, तृतीय पादमें परस्पर कार्यकारणभाव संगति स्पष्ट है । प्रथमपादमें आकाश, प्राण आदि शब्द ब्रह्मके लिङ्ग हैं, अतः उनका ब्रह्ममें समन्वय दिखलाया गया है । परन्तु ' तज्जलान्, सत्यसङ्कल्पः ' इत्यादि जिन वाक्यों में ब्रह्मके स्पष्ट लिङ्ग नहीं है उन वाक्योंका ब्रह्ममें समन्वय करनेके लिए द्वितीय एवं तृतीय पादका आरम्भ किया जाता है 1 । द्वितीय पादमें मुख्यरूपसे उपास्य ब्रह्मका निरूपण है और तृतीय पादमें निर्विशेष ज्ञेय ब्रह्मका वर्णन है । यही दोनों पादोंमें अन्तर है । जैसे गत अधिकरणमें जीव आदि लिङ्गका बाधकर उनको परब्रह्म परक माना गया है, वैसे ' मनोमयत्व ' आदि वाक्यों में ब्रह्म लिङ्ग नहीं है, इसलिए गत अधिकरण और इस अधिकरणकी प्रत्युदाहरणसंगति है: और एक ही करण होता है । भेद होनेसे एककर्मवत्ता नष्ट हो जाती है । इसलिए वाक्यभेदको हटाने के लिए कहीं लक्षणा, कहीं गौणी, कहीं अनुषङ्ग, कहीं अध्याहार, विपरिणाम, व्यवधारण आदिका आश्रय लेना पड़ता I

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अधि ० १ सू ० १ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १४ ९ * इदमाम्नायते - ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ', ' मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः ' ( छा ० ३।१४.१, २ ) इत्यादि । तत्र संशयः - किमिह मनोमयत्वादिभिर्धमः शारीर आत्मोपास्यत्वेनोपदिश्यते, आहोस्वित्परं ब्रह्मेति । किं तावत्प्राप्तम्? शारीर इति । कुतः? तस्य हि कार्यकरणाधिपतेः प्रसिद्धो मन आदिभिः संबन्धो न परस्य ब्रह्मणः, ' अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः ' ( मु ० २।१।२ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । ननु ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' इति स्वशब्देनैव ब्रह्मोपात्तं कथमिह शारीर आत्मोपास्य आशङ्कयते? नैष दोषः: नेदं वाक्यं ब्रह्मोपासनाविधिपरम् । किं तर्हि? शमविधिपरम् । यत्कारणं ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ' इत्याह । एतदुक्तं भवति - यस्मात्सर्वमिदं विकार जातं ब्रह्मैव, तज्जत्वा त्तलत्वात्तदनत्वाश्च । नच सर्व-स्यैकात्मत्वेन रागादयः संभवन्ति, तस्माच्छान्त उपासीतेति । नच शमविधिपरत्वे सत्यनेन ' सर्वं खल्विदं ० ' ( निःसंदेह यह सारा जगत् ब्रह्म ही है ) क्योंकि उस ब्रह्मसे ही यह ( जगत् ) उत्पन्न हुआ है, उसीमें लय होता है, उसीमें स्थितिकालमें चेष्टा करता है, अतः शान्त होकर उसीकी उपासना करे, क्योंकि पुरुष निश्चय ही संकल्पमय है, इस लोक में पुरुष जैसे संकल्पवाला होता है मरणोपरान्त वैसे ही होता है । इसलिए पुरुषको संकल्प - ध्यान करना चाहिए । और [ वह ब्रह्म ] मनोमय, प्राण शरीर और प्रकाश स्वरूप है ) इत्यादि श्रुति है । यहाँ संशय होता है कि क्या यहाँ मनोमयत्व आदि धर्मोसे जीवात्माका उपास्यरूपसे उपदेश किया जाता है अथवा परब्रह्मका? तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी — यहाँ जीवात्माका ही उपास्यरूपसे उपदेश है, क्योंकि, शरीर और इन्द्रियोंके स्वामी उस जीवात्माका ही मन आदिके साथ सम्बन्ध प्रसिद्ध है, परब्रह्मका नहीं 1 । ' अप्रागो ० ' ( प्राण रहित मन रहित शुद्ध है ) इत्यादि श्रुतियोंसे मन आदिके साथ परब्रह्म के सम्बन्धका निषेध किया गया है । परन्तु ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' ( निश्चय यह सब ब्रह्म ही है ) इस श्रुतिमें स्व ( ब्रह्म ) शब्दसे हो ब्रह्मका [ उपास्यरूपसे ] ग्रहण किया गया है, तो फिर यहाँ जीवात्माकी उपास्यरूपसे आशंका क्यों की जाती है? यह दोष नहीं है, क्योंकि यह वाक्य ब्रह्मकी उपासनाविधि परक नहीं है, किन्तु शमविधिपरक है, क्योंकि ' सर्वं खल्विदं ० ' ( निश्चय यह सब ब्रह्म ही है, यह जगत् ब्रह्मसे उत्पन्न होता है, उसीमें लीन होता है, उसीमें चेष्टा करता है । इस कारण उपासक उस ब्रह्मका ही रागद्वेषसे रहित होकर ध्यान करके शान्त हो ) यह श्रुति ऐसा कहती है । तात्पर्य यह है कि यह सम्पूर्ण विकारात्मक जगत् भी वस्तुतः ब्रह्म ही है, क्योंकि उससे उत्पन्न होता है, उसमें लीन होता है और उसमें चेष्टा करता है । जब सारा जगत् एकात्मक - एक ब्रह्मरूप ही है तो राग - द्वेष आदिका संभव नहीं है, अतः ब्रह्मोपासकको शान्त होकर उपासना करनी चाहिए । परन्तु शम - विधि परक होनेपर [ शान्त उपासीत ] यह वाक्य सत्यानन्दी दीपिका * ' तस्मात् जायते इति तज्जम् । तस्मिन् लीयते इति तल्लम्, तस्मिन्ननिति स्थितिकाले चेष्टते इति तदनम् । तजम्, तल्लम्, तेदनञ्चेति तज्जलान् । ' यह जगत् ब्रह्मसे उत्पन्न होता है, उसी में लोन होता है, स्थिति कालमें उसीमें चेष्टा करता है ' इसलिए श्रुतियोंमें जगत् को ' तज्जलान् ' कहा गया है । यह सारा जगत् ब्रह्मरूप है, क्योंकि ब्रह्मका विवर्त है । अतात्त्विकोऽन्यथाभावो विवर्तः ' यह विवर्तका लक्षण है । ब्रह्म सत्य है, परन्तु अविद्यासे मिथ्या जगत् के रूपमें प्रतीत होता है, जैसे रज्जु सर्परूपसे प्रतीत होती है । मन और प्राण ब्रह्मको उपाधियाँ हैं । उपाधि ( मनोमयः प्राणशरीरः ) का वर्णन कर चेतनस्वरूप आत्माकी उपासना कही गई है, ' पूर्व पक्षी - ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' ऐसा उपक्रम होनेपर भी राम विधानके लिए ही है, अतः वह गौण है । वस्तुतः यहाँ पर जीवलिङ्ग प्रधान है । इस लिङ्गप्रमाणके बलसे मनोमयत्वादि गुण विशिष्ट जीव ही उपास्य है, ब्रह्म नहीं!

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१५० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ वाक्येन ब्रह्मोपासनं नियन्तुं शक्यते । उपासनं तु ' स क्रतुं कुर्वीत ' इत्यनेन विधीयते । क्रतुः संकल्पो ध्यानमित्यर्थः । तस्य च विषयत्वेन श्रूयते - ' मनोमयः प्राणशरीरः ' इति जीवलिङ्गम् । अतो ब्रूमो जीवविषयमेतदुपासनमिति । ' सर्वकर्मा सर्वकामः ' इत्याद्यपि श्रूयमाणं पर्यायेण जीवविषयमुपपद्यते । ' एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान्त्रीहेर्वा यवाद्वा ' इति च हृदयायतनत्वमणी-यस्त्वं चाराग्रमात्रस्य जीवस्यावकल्पते, नापरिच्छिन्नस्य ब्रह्मणः । ननु ' ज्यायान्पृथिव्या ' इत्याद्यपि न परिच्छिन्ने ऽवकल्पत इति । अत्र ब्रूमः - न तावदणीयस्त्वं ज्यायस्त्वं चोभयमे-कस्मिन्समाश्रयितुं शक्यः विरोधात् । अन्यतराश्रयणे च प्रथमश्रुतत्वादणीयस्त्वं युक्तमाश्र-यितुं, ज्यायस्त्वं तु ब्रह्मभावापेक्षया भविष्यतीति । निश्चिते च जीवविषयत्वे यदन्ते ब्रह्म-संकीर्तनं— ' एतद्ब्रह्म ' ( छा ० ३ | १४ | ४ ) इति, तदपि प्रकृतपरामर्शार्थित्वा जीवविषयमेव । तस्मान्मनोमयत्वादिभिर्धमैर्जीव उपास्य इत्येवं * प्राप्ते ब्रूमः । परमेव ब्रह्म मनोमयत्वादि-भिर्धमैरुपास्यम् । कुतः? सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् । यत्सर्वेषु वेदान्ते षु प्रसिद्धं ब्रह्मशब्दस्या-लम्बनं जगत्कारणम्, इह च ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' इति वाक्योपक्रमे श्रुतं, तदेव मनोमयत्वा-दिधर्मैर्विशिष्टमुपदिश्यत इति युक्तम् । एवं च सति प्रकृतहानाप्रकृतक्रिये न भविष्यतः । ननु ब्रह्मोपासनाका विधायक नहीं हो सकता । उपासनाका तो ' स क्रतुं ० ' ( वह ध्यान करे ) इस वाक्यसे विधान किया जाता है । क्रतु - संकलन अर्थात् ध्यान यह अर्थ है । उस ध्यानका विषयरूपसे ' मनोमयः प्राणशरीर: ' ( मनोमय, प्राण शरीर ) यह जीवलिङ्गको श्रुति है । इस कारण हम ऐग कहते हैं कि यह उपासना जीव विषयक है । ' सर्वकर्मा सर्वकाम: ' ( सर्वकर्मवाला तथा सर्वकामनावाला ) इत्यादि श्रूयमाण विशेषण भी अनेक जन्म परम्परासे जीवविषयक हो सकता है । ' एष म आत्म ० ( यह मेरा आत्मा हृदयके भीतर धान अथवा यवसे मी सूक्ष्म है ) इसप्रकार हृदय स्थान तथा अणीयस्त्व आरके अग्रभाग के समान जीवमें युक्त है, अपरिच्छिन्न ( सर्वगत ) ब्रह्म में नहीं । परन्तु ' ज्यायान्पृथिव्याः ' ( पृथिवीसे महान् है ) इत्यादि भी तो परिच्छिन्न जीव में सम्भव नहीं हैं । इसपर हम कहते हैं - अणुत्व और महत्त्व दोनों एक वस्तुमें नहीं रह सकते, क्योंकि दोनोंका आपसमें विरोध है, यदि दोनोंमें से एकका ही ग्रहण करना हो तो प्रथम श्रुत होनेसे अणीयस्त्वका ही आश्रयण करना ठीक है । [ यद्यपि संसारदशा में जीव में महत्त्वपरिमाण नहीं है तो मी ] मोक्ष दशामें जीवमें ब्रह्म-भाव ( जीव ब्रह्म है ) की अपेक्षा महत्त्व हो ही जायगा और [ ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' इत्यादि वाक्योंमें ] जीव विषयत्वका निश्चय होनेपर अन्तमें ' एतद् ब्रह्म ' ( यह ब्रह्म है ) इस प्रकार जो ब्रह्मका संकीर्तन है वह भी प्रकृत परामर्श के लिए होनेसे जीवविषयक है । इस कारण मनोमयत्व आदि धर्मोसे जीव उपास्य है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - यहाँ मनोमयत्वादि धर्मोंसे परब्रह्म ही उपास्य है । क्योंकि यहाँ सर्वत्र - वेदान्त वाक्यों में प्रसिद्ध ( ब्रह्म ) का ही उपदेश है । ब्रह्मशब्दका आलम्बन, जगत्का कारणरूपसे सम्पूर्ण वेदान्त वाक्योंमें जो प्रसिद्ध है और यहाँ ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' इस वाक्यके आरम्भमें श्रुत है वही ब्रह्म मनोमयत्वादि धर्मोसे विशिष्ट इस श्रुतिमें उपदिष्ट है, यह युक्त है । ऐसा होनेपर प्रकृतकी हानि ( प्रकरणसे प्राप्त ब्रह्ममें सम्भव होनेवाले मनोमय-त्वादि धर्मोका स्वीकार न करना ) एवं अप्रकृत ( जीवमें उन धर्मोकी कल्पना करना ) की प्राप्ति सत्यानन्दी -दीपिका * ‘ सर्वं खल्विदं ब्रह्म ' इत्यादि वेदान्त वाक्यों में प्रसिद्ध ब्रह्मका ही उपास्यरूपसे उपदेश है । यद्यपि ब्रह्म निराकांक्ष है, तथापि ' मनः प्रचुरमुपाधि अस्य, प्राणः शरीरमस्य ' ( मन प्रचुर है उपाधि जिसकी प्राण है शरीर जिसका ) इस तरह समासके अन्तर्गत सर्वनामको सन्निहित विशेषको आकांक्षा होने से ब्रह्मका सम्बन्ध होता है । इसलिए मनोमयत्वादि धर्मोसे विशिष्ट - उपलक्षित ब्रह्म ही सन्निहित

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अधि ० १ सू ० २ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १५१ वाक्योपक्रमे शमविधिविवक्षया ब्रह्म निर्दिष्टं न स्वविवक्षयेत्युक्तम् । अत्रोच्यते - यद्यपि शमविधिविवक्षया ब्रह्म निर्दिष्टं तथापि मनोमयत्वादिषूपदिश्यमानेषु तदेव ब्रह्म सन्निहितं भवति । जीवस्तु न सन्निहितो नच स्वशब्देनोपात्त इति वैषम्यम् ॥ १ ॥

विवक्षितगुणोपपत्तेश्व ॥ २ ॥

पदच्छेद -- विवक्षितगुणोपपत्तेः, च । सूत्रार्थ - उपासना के लिए विवक्षित ( उपदिष्ट ) सत्यसंकल्पत्व, मारूपत्वादि गुणोंकी ब्रह्ममें उपपत्ति ( समन्वय ) हो सकती है, अतः मनोमन ब्रह्म ही है, जीव नहीं । * वक्तुमिष्टा विवक्षिताः । यद्यप्यपौरुषेये वेदे वक्तुरभावान्ने च्छार्थः संभवति, तथा-प्युपादानेन फलेनोपचर्यते । लोके हि यच्छध्दाभिहितमुपादेयं भवति तद्विवक्षितमित्युच्यते, यदनुपादेयं तदविवक्षितमिति । तद्वद्वेदे ऽप्युपादेयत्वेनाभिहितं विवक्षितं भवति, इतर दवि-वक्षितम् । उपादानानुपादाने तु वेदवाक्यतात्पर्यातात्पर्याभ्यामवगम्येते । तदिह ये विव-क्षिता गुणा उपासनायामुपादेयत्वेवोपदिष्टाः सत्यसंकल्पप्रभृतयस्ते परस्मिन्ब्रह्मण्युपप-द्यन्ते । सत्यसंकल्पत्वं हि सृष्टिस्थितिसंहारेष्वप्रतिबद्धशक्तित्वात्परमात्मन एवावकल्पते । भी न होगी । परन्तु वाक्यके आरम्भमें तो शमविधिकी विवक्षा से ही ब्रह्मका निर्देश किया गया है, स्वविवक्षासे नहीं अर्थात् ब्रह्मका विधान करनेकी विवक्षासे ब्रह्मका निर्देश नहीं किया गया है । ऐसा जो [ पूर्वपक्षीद्वारा ] कहा गया है, इसपर कहते हैं - यद्यपि शम विधिकी विवक्षा से ब्रह्मका निर्देश किया गया है, तो भी उपदिश्यमान मनोमयत्वादिमें तो वह ब्रह्म ही सन्निहित है । जीव तो न सन्निहित है और न स्व- शब्दसे गृहीत हो । यही जीव और ब्रह्म के निर्देशमें अन्तर है ॥ १ ॥

जिनका कथन अभीष्ट हो वे विवक्षित कहलाते हैं । यद्यपि अपौरुषेय वेदमें वक्ता न होनेके कारण इच्छा रूप सन् प्रत्ययके अर्थका सम्भव नहीं है, तो भी उपादान ( ग्रहण ) रूप फलसे विवक्षाका उपचार किया जाता हैं । [ क्योंकि इच्छाका फल उपादान है ] जैसे लोकमें भी जिस शब्दसे अभिहित जो पदार्थ उपादेय होता है वह विवक्षित कहलाता है और जो अनुपादेय होता है वह अविवक्षित कहलाता है । इसी प्रकार वेदमें भी उपादेयरूपसे अभिहित पदार्थ विवक्षित और उससे भिन्न अवि-वर्क्षित होता है । उपादान और अनुपादान तो वेदवाक्यके तात्पर्य और अतात्पर्य से अवगत होते हैं । इसलिए यहाँ सत्यसंकल्पत्वादि जो विवक्षित गुण उपासना में उपादेयरूपसे उपदिष्ट हैं वे परब्रह्म में उपपन्न होते हैं । जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयमें अप्रतिहत शक्ति होनेके कारण परमात्मा ही सत्यानन्दी - दीपिका है और उसका ही सर्वनामसे परामर्श होता है । यद्यपि मनोमयत्वादि लिङ्गोंसे जीव भी सन्निहित है तो भी उनसे लोकप्रसिद्ध जीवका सान्निध्यरूपसे ग्रहण नहीं हो सकता, क्योंकि वह प्रकृत नहीं है । और ' सवं खल्विदं ब्रह्म ' जैसे इस शब्दमें ब्रह्म शब्दसे प्रत्यक्ष ब्रह्मका निर्देश है, वैसे वहाँ जीव-वाचक किसी शब्दसे प्रत्यक्ष जीवका निर्देश नहीं है । इस प्रकारकी विषमता यहाँ स्पष्ट ही है । पूर्वपक्ष-में जीव उपास्य है और सिद्धान्तमें ब्रह्म उपास्य है ॥ १ ॥

* ' सजातीयोच्चारणसापेक्षोच्चारणविषयत्वम् ' यही वेदमें अपौरुषेयत्व है अर्थात् ' ईशा-वास्यादि, मन्त्रोंकी जैसी आनुपूर्वी इस समय है ठीक वैसी आनुपूर्वी पहले सृष्टिमें थी और वैसे ही भविष्य में भी रहेगी । इस विषय में ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ' ( ब्रह्माने सूर्य और चन्द्रमाकी पूर्वकल्प के समान रचना की है ) यह श्रुति भी प्रमाण है । सृष्टिके आदिमें पूर्वकल्पीय आनुपूर्वी विशिष्ट वेदका स्मरणकर ईश्वर वेदको रचता है, अतएव ईश्वर वेदका कर्ता नहीं है । इसीलिए वेदमें वक्ता न होने के कारण विबक्षाका अर्थ इच्छा नहीं हो सकता । तो भी उपादानरूप

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१५२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पाद २ परमात्मगुणत्वेन च ' य आत्माऽपहतपाप्मा ' ( छा ० ८1७11 ) इत्यत्र ' सत्यकामः सत्यसंकल्पः ' इति आकाशात्मेत्यादिनाकाशवदात्माऽस्येत्यर्थः । सर्वगतत्वादिभिर्धमः संभवत्याकाशेन साम्यं ब्रह्मणः । ' ज्यायान्पृथिव्याः ' इत्यादिना चैतदेव दर्शयति । यदाप्याकाश आत्मा यस्येति व्याख्यायते, तदापि संभवति सर्वजगत्कारणस्य सर्वात्मनो ब्रह्मण आकाशात्म-त्वम् । अतएव ' सर्वकर्मा ' इत्यादि । एवमिहोपास्यतया विवक्षिता गुणा ब्रह्मण्युपपद्यन्ते । यत्तूक्तं ' मनोमयः प्राणशरीरः ' ( छा ० ३ | १४/२ ) इति जीवंलिङ्गं न तद्ब्रह्मण्युपपद्यत इति, तदपि ब्रह्मण्युपपद्यत इति ब्रूमः 1 । सर्वात्मत्वाद्धि ब्रह्मणो जीवसम्बन्धीनि मनोमयत्वादीन ब्रह्मसम्बन्धीनि भवन्ति । तथा च ब्रह्मविषये श्रुतिस्मृती भवतः - ' त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चास त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ' ( वे ० ४ | ३ ) इति, ' सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्टति ' ( गी ० १३ । १३ ) इति च । ' अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः ' ( मुण्ड ० २।१२ ) इति श्रुतिः शुद्धब्रह्मविषया, इयं तु ' मनोमयः प्राण-शरीरः ' इति सगुणब्रह्मविषयेति विशेषः । अतो विवक्षितगुणोपपत्तेः परमेव ब्रह्महोपास्य-त्वेनोपदिष्टमिति गम्यते ॥ २ ॥

अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥ ३ ॥

पदच्छेद - अनुपपत्तेः, तु, न, शारीरः । सूत्रार्थ - ( अनुपपत्तेः ) उपासना के लिए विवक्षित सत्यसङ्कल्पत्व आदि गुणोंकी [ जीवमें ] उपपत्ति ( समन्वय ) न होने से ( न शारीरः ) जीव उपास्य नहीं है, किन्तु ब्रह्म ( तु ) ही उपास्य है । सत्यसङ्कल्प हो सकता है । ' य आत्मा ० ' ( जो आत्मा पापरहित है ) इस मन्त्रमें सत्यकाम और सत्थ-संकल्प परमात्माके गुणरूप से सुने जाते हैं । ' आकाशात्मा ' इत्यादि श्रुतिका आकाश के समान है आत्मा ( स्वरूप ) जिसका ऐसा अर्थ है । सर्वगतत्वादि धर्मोसे आकाश के साथ ब्रह्मका सादृश्य सम्भव है और ' ज्यायान्पृथिव्या ' इत्यादि मन्त्र भी इसी अर्थको दिखलाते हैं । और जब आकाश है आत्मा जिसका ऐसी व्युत्पत्ति करें तो भी समस्त जगत्‌का कारण सर्वात्मस्वरूप ब्रह्म में आकाशात्मत्व हो सकता है । इसलिए ब्रह्मके लिए ' सर्वकर्मा ' इत्यादिका वर्णन है । इस प्रकार यहाँ उपास्यरूपसे विवक्षित गुण ब्रह्म में ही घटते हैं । ' मनोमयः ' यह जीवका लिङ्ग है, वह ब्रह्म में युक्त नहीं है । यह जो कहा गया है, वह ( जीवलिङ्ग ) भी ब्रह्ममें उपपन्न होता है, ऐसा हम कहते हैं; क्योंकि ब्रह्म सर्वात्मक ही है, अतः जीव सम्बन्धी मनोमयत्व आदि धर्म ब्रह्म सम्बन्धी होते हैं । उसी प्रकार ' त्वं स्त्री ० ' ( तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार अथवा कुमारी है, और तू ही वृद्ध होकर दण्डके सहारे चलता है तथा तू ही [ प्रपञ्चरूपसे ] उत्पन्न होकर अनेकरूप हो जाता है ) ' सर्वतः पाणिपादं ० ' ( परन्तु वह ज्ञेय ब्रह्म ही उपाधिसे सब ओर हाथ पैर वाला एवं सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर वाला है, क्योंकि वह सबका कारण है, अतः संसार में सबको व्याप्तकर स्थित है ) यह श्रुति और स्मृति ब्रह्मविषयक हैं । ' अप्राणो ० ' ( प्राण रहित, मन रहित और पवित्र है ) यह श्रुति शुद्ध ब्रह्म विषयक है और ' मनोमयः प्राणशरीरः ' यह श्रुति तो सगुण ब्रह्म विषयक है, इतना विशेष ( भेद ) है | इससे यह अवगत होता है कि विवक्षित गुणोंकी उपपत्ति से परब्रह्म ही यहाँ उपास्यरूपसे उपदिष्ट है ॥२ ॥

सत्यानन्दी -दीपिका फलसे इच्छाका उपचार किया जाता है । विवक्षाके फलका नाम ही उपादान ( ग्रहण, स्वीकार ) है | इसलिए प्रकृत सत्यसंकल्पत्वादि गुणोंमें विवक्षाका उपचार हो सकता है । अत: उपासनामें जो उपदिष्ट सत्यसंकल्पादि गुण हैं वे परब्रह्ममें ही घट सकते हैं जीवमें नहीं ॥ २ ॥

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अधि ० १ सू ० ३-४ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १५३ * पूर्वेण सूत्रेण ब्रह्मणि विवक्षितानां गुणानामुपपत्तिरुक्ता । अनेन तु शारीरे तेषामनुपपत्तिरुच्यते । तुशब्दोऽवधारणार्थः । ब्रह्मैवोक्तेन न्यायेन मनोमयत्वादिगुणं, नतु शारीरो जीवो मनोमयत्वादिगुणः । यत्कारणं ' सत्यसंकल्पः, आकाशात्मा, अवाकी, अनादरः, ज्यायान्पृथिव्याः ' इति चैचंजातीयका गुणा न शारीरे आञ्जस्येनोपपद्यन्ते । शारीर इति शरीरे भव इत्यर्थः । नन्वीश्वरोऽपि शरीरे भवति । सत्यम्; शरीरे भवति नतु शरीर एव भवति; ' ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षात् ' ( छा ० ३ | १४ | ३ ) ' आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः ' ( गौड ० • ३।३ ) इति च व्यापित्वश्रवणात् । जीवस्तु शरीर एव भवति, तस्य भोगाधिष्ठा-नाच्छरीरादन्यत्र वृत्त्यभावात् ॥ ३ ॥

कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ॥ ४ ॥

पदच्छेद – कर्मकर्तृव्यपदेशात्, च । सूत्रार्थ - ' एतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मि ' इस श्रुतिमें ' एतम् ' पदसे प्रकृत ब्रह्मका कर्मरूपसे व्यपदेश है, और ' अभिसम्भवितास्मि ' इस पदसे जीवका कर्तृरूपसे उपदेश है । इस कारण भी जीव उपास्य नहीं है, किन्तु मनोमयत्व आदि गुणोंसे ब्रह्म ही उपास्य है । * इतश्च न शारीरो मनोमयत्वादिगुणः, यस्मात्कर्मकर्तृव्यपदेशो भवति ' एतमितः प्रेत्या-भिसंभवितास्मि ' ( छा ० ३ | १४ | ४ ) इति एतमिति प्रकृतं मनोमयत्वादिगुणमुपास्यमात्मानं पूर्वसूत्र से विवक्षित गुणों [ सत्यकामत्व आदि ] की ब्रह्ममें उपपत्ति दिखलाई गई है, अब इस सूत्रसे शारीर - जीवमें उन गुणोंकी अनुपपत्ति कही जाती है । सूत्रस्थ ' तु ' शब्दका अर्थ निश्चय है । पूर्वोक्त सर्वात्मत्व - न्याय से ब्रह्म ही मनोमयत्व आदि गुण विशिष्ट है । शारीर- जीव तो मनोमयत्व आदि गुणयुक्त नहीं है, क्योंकि ' सत्यसङ्कल्प, आकाशात्मा, इन्द्रिय रहित, नित्यतृप्त, पृथ्वीसे महान् ' इस प्रकारके के गुण जीवमें मुख्यरूपसे उपपन्न नहीं होते । ' शारीर ' अर्थात् शरीरमें रहनेवाला ऐसा अर्थ है । परन्तु ईश्वर भी तो शरीरमें रहता है? ठीक, शरीरमें रहता है, न कि शरीरमें ही रहता है, क्योंकि ‘ ज्यायान्पृथिव्याः ० ' ( वह परब्रह्म पृथ्वी से भी महान्, अन्तरिक्षसे भी महान् है ) ' आकाशवत् ० ' ( आकाश के समान सर्वगत और नित्य है ) इसप्रकार ब्रह्ममें व्यापकत्वका श्रवण होता है । जीव तो शरीर में ही रहता है, क्योंकि भोगके आश्रयभूत शरीरको छोड़कर अन्य स्थलमें उसकी स्थिति नही होती ॥३ ॥

' एतमितः प्रेत्या ० ' ( इस देहसे छुटकारा पाकर उस परमात्माको प्राप्त करूँगा । इस प्रकार श्रुतिमें कर्म और कर्तृरूप से दो का उपदेश है । इससे भी जीव मनोमयत्वादि गुणोंसे युक्त नहीं है । सत्यानन्दी - दीपिका * शंका – ब्रह्म सर्वात्मक है, इसीलिए जीवगत मनोमयत्व आदि धर्मं उसके हो सकते हैं, तो जीव और ब्रह्मके अभेद होनेसे ब्रह्मगत सत्यकामत्व आदि धर्म भी जीवमें माने जा सकते हैं, इससे सत्यकामत्व आदि गुणोंसे जीव भी ब्रह्मके समान उपास्य हो सकता है? समाधान — जीव ब्रह्ममें कल्पित है, इसलिए कल्पितके धर्म अधिष्ठानमें माने जाते हैं किन्तु अविष्ठानके धर्मं कल्पित वस्तुमें नहीं । किञ्च ब्रह्म के सर्वगतत्व आदि धर्म परिच्छिन्न जीवमें घट भी नहीं सकते, अपितु परिच्छिन्नके धर्म व्यापकमें घट सकते हैं । जीव केवल शरीर में ही रहकर सुख - दु ख आदिका अनुभव कर सकता है शरीरको छोड़कर नहीं, इसलिए इसे ' शारीर ' कहा गया है । ईश्वर तो व्यापक और सबका कारण होनेसे सर्वात्मक है, अतः वह शरीर नहीं हो सकता है, इसलिए मनोमयत्व आदि धर्म भी ब्रह्म ही हैं जीवके नहीं ॥ ३ ॥

* " मामहं जानामि ” यहाँ पर अन्य गतिके न होनेसे एकमें ही कर्म और कर्ताका उपदेश हो सकता है | परन्तु जहाँ ब्रह्मसे कल्पित भेदको लेकर उपास्य उपासकभावरूप गति ( व्यवस्था )

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१५४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ कर्मत्वेन - प्राप्यत्वेन व्यपदिशति । अभिसंभवितास्मीति शारीरमुपासकं कर्तृत्वेन प्रापकत्वेन अभिसंभवितास्मीति, प्राप्तास्मीत्यर्थः । नच सत्यां गतावेकस्य कर्मकर्तृव्यपदेशो युक्तः । तथो-पास्योपासक भावोऽपि भेदाधिष्ठान एव । तस्मादपि न शारीरो मनोमयत्वादिविशिष्टः ॥४ ॥

शब्दविशेषात् ॥ ५ ॥

सूत्रार्थ - शब्द ( विभक्ति ) के भेद होने से भी ब्रह्म ही उपास्य है । इतश्च शारीरादन्यो मनोमयत्वादिगुणः यस्माच्छन्दविशेषो भवति समानप्रकरणे श्रुत्यन्तरे - ' यथा व्रीहिर्वा यवो वा श्यामाको वा श्यामाकतण्डुलो वैवमयमन्तरात्मन्पुरुषो हिरण्मयः ' ( शत ० ब्रा ० १० । ६ । ३ । २ ) इति । शारीरस्यात्मनो यः शब्दोऽभिधायकः सप्तम्यन्तोऽन्तरात्म-निति, तस्माद्विशिष्टोऽन्यः प्रथमान्तः पुरुषशब्दो मनोमयत्वादिविशिष्टस्यात्मनोऽभि-धायकः । तस्मात्तयोर्भेदोऽधिगम्यते ॥ ५ ॥

स्मृतेश्व ॥ ६ ॥

पदच्छेद – स्मृतेः, च । सूत्रार्थ - ' ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ' इस स्मृति से भी जीव और ब्रह्मका भेद दिखलाया गया है, अतः ब्रह्म ही उपास्य है । * स्मृतिश्च शारीरपरमात्मनोर्भेदं दर्शयति- ' ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ' ( गी ० १८/६१ ) इत्याद्या । अत्राह - कः पुनरयं शारीरो नाम परमात्मनोऽन्यः, यः प्रतिषिध्यते ' अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ' इत्यादिना? श्रुतिस्तु-' एतम् ' यह पद प्रकृत मनोमयत्वादि गुणोंसे युक्त उपास्य आत्माका कर्मरूप से प्राप्यरूपसे व्यपदेश करता है । ' अभिसम्भवितास्मि ' यह पद उपासक जीवात्माका कर्तारूपसे - प्रापकरूपसे उपदेश करता है 1 । ' अमिसम्मवितास्मि ' [ उपास्यको ] प्राप्त करूँगा । अन्य गति ( व्यवस्था ) के विद्यमान होनेपर एकमें ही कर्म कर्तृव्यपदेश युक्त नहीं है । उसी प्रकार उपास्य - उपासकभाव भी भेदाश्रित ही है 1 । इससे भी जीव मनोमयत्वादि गुणोंसे युक्त नहीं है ॥ ४ ॥

और इस कारण से भी मनोमयत्वादि गुण विशिष्ट ( ब्रह्म ) जीवसे भिन्न है, क्योंकि ' यथा त्रीहिर्वा ο ' ( जैसे धान, यव, श्यामाक वा श्यामाक तण्डुल है, इसप्रकार अन्तरात्मा में यह हिरण्मय पुरुष है ) इस समान - प्रकरण में- समान अर्थकी प्रतिपादिक अन्य शतपथ श्रुतिमें शब्दका भेद है ' अन्तरात्मन् ' यह सप्तम्यन्त शब्द शारीर ( जीवात्मा ) का प्रतिपादन करता है और उससे भिन्न ' पुरुषः ' यह प्रथमान्त शब्द मनोमयत्वादि गुणविशिष्ट परमात्माका अभिधान करता है, अतः दोनोंमें भेद प्रतीत होता है ॥५ ॥

' ईश्वरः सर्वभूतानां ० ' ( हे अर्जुन! शरीररूपी यन्त्रमें आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी मायासे उनके कर्मोंके अनुसार भ्रमाता हुआ सब भूत प्राणियोंके हृदयमें स्थित है ) इत्यादि स्मृति भी जीव और परमात्मामें भेद दिखलाती है | यहाँ पुर्वपक्षी कहते हैं-सत्यानन्दी - दीपिका हो सकती है, वहाँ कर्म और कर्ताके भेदका ही उपदेश मानना चाहिए । क्योंकि ' एतमितः ' यह श्रुति तो साक्षात् कर्म तथा कर्ताके भेदका प्रतिपादन करती है । अतः मनोमयत्वादि गुण विशिष्ट जीव उपास्य नहीं है ॥ ४ ॥

* ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' इत्यादि श्रुति परमात्मा से भिन्न आत्माका निषेध करती है, तो मनोमयत्वादिके निषेधसे जीवोपासनाका निषेध कैसे हो सकता है? अतः परमात्मा के समान जीव भी मनोमयत्वादि गुणविशिष्ट उपास्य होना चाहिए ॥ ६ ॥

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अधि ० १ सू ० ६-७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १५५ ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता ' ( बृह ० ३।७।२३ ) इत्येवंजातीयका परमात्मनोऽ-न्यमात्मानं वारयति । तथा स्मृतिरपि - ' क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ' ( गी ० १३।२ ) इत्येवंजातीयकेति । अत्रोच्यते - सत्यमेवैतत् पर एवात्मा देहेन्द्रियमनोबुद्धयुपाधिभिः परिच्छिद्यमानो बालैः शारीर इत्युपचर्यते । यथा घटकरकाद्युपाधिवशादपरिच्छिन्नमपि नभः परिच्छिन्नवदवभासते तद्वत् । तदपेक्षया च कर्मकर्तृत्वादिभेदव्यवहारो न विरु-ध्यते; प्राक् ' तत्त्वमसि ' इत्यात्मैकत्वोपदेशग्रहणात् । गृहीते त्वात्मैकत्वे बन्धमोक्षादिसर्व-व्यवहारपरिसमाप्तिरेव स्यात् ॥ ६ ॥

अर्भकौस्त्वात्तद्वयपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च ॥ ७ ॥

पदच्छेद - अर्भकौकस्त्वात् तद्व्यपदेशात् च इति चेत्, न निचाय्यत्वात्, एवम्, व्योमवत् च । सूत्रार्थ - ( अर्भकीकस्त्वात् ) ' एष म आत्मान्तर्हृदये ' इस श्रुतिमें अर्भकौक: -अल्पस्थान ( हृदय ) में स्थिति और ( तद्वयपदेशात् ) ' अणीयान् ' इस शब्दसे परमसूक्ष्मत्व उपदिष्ट है । इससे जीव ही उपास्य है ( न ) परमात्मा नहीं । ( इति चेन्न ) यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि ( एवम् ) अर्भकौकस्त्व, अणीयस्त्व आदि धर्मोसे ( निचाय्यत्वात् ) परमात्मा ही उपास्य है । ( व्योमवत् ) सर्वगत होनेपर भी जैसे आकाश सूईके छिद्रसे परिच्छिन्न होकर अल्पस्थान तथा परमसूक्ष्म कहा जाता है, इसीप्रकार उपाधिके सम्बन्धसे ब्रह्म भी अर्भकोक और अतिसूक्ष्म कहा जाता है, अतः ब्रह्म ही उपास्य है । अर्भकमल्पम्, ओको नीडम्, ' एष म आत्माऽन्तर्हृदये ' ( छा ० ३ | १४ | ३ ) इति परि-च्छिन्नायतनत्वात्, स्वशब्देन च ' अणोयान्त्रीहेर्वा यवाद्वा ' इत्यणीयस्त्वव्यपदेशात्, शारीर एवाराग्रमात्रो जीव इहोपदिश्यते, न सर्वगतः परमात्मेति यदुक्तं तत्परिहर्तव्यम् । अत्रोच्यते-नायं दोषः; न तावत्परिच्छिन्नदेशस्य सर्वगतत्वव्यपदेशः कथमप्युपपद्यते सर्वगतस्य तु सर्व-परमात्मा से भिन्न यह शारीर नामवाला कौन है जिसका कि ' अनुपपत्तेस्तु ० ' इत्यादि सूत्रसे प्रतिषेध किया जाता है? ' नान्योऽतोऽस्ति ० ' ( इस परमात्मासे अन्य द्रष्टा नहीं, और इससे अन्य श्रोता नहीं ) इस प्रकारकी श्रुति तथा ' क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि ० ' ( हे अर्जुन! तुम सब क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ - जीवात्मा भी मुझे ही जानो ) इसप्रकारकी स्मृति भी परमात्मासे अन्य आत्माका निषेध करती है । सिद्धान्ती-इस विषय में कहते हैं - - यह कथन सत्य है । जैसे अपरिच्छिन्न आकाश भी घट, कमण्डलु आदि उपा-धियोंकी अधीनता से परिच्छिन्न - सा मासता है, उसी प्रकार देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धिरूपी उपाधियोंसे परिच्छिन्न हुए परमात्माको ही अज्ञानी लोग जीव ऐसा उपचार करते हैं । उपाधि तथा अज्ञानी की अपेक्षा से ' तत्त्वमसि ' ( वह तू है ) इसप्रकार आत्माके एकत्वके उपदेशके ग्रहणसे पहले कर्मत्व, कर्तृत्व आदि भेद व्यवहार विरुद्ध नहीं है । आत्मैकत्व ( मैं ब्रह्म हूँ ) ज्ञान होनेपर तो बन्ध मोक्ष आदि सब व्यवहारोंकी परिसमाप्ति ही हो जाती है ॥ ६ ॥

' एष म आत्मा ० ' ( यह आत्मा मेरे हृदयके भीतर है ) इसप्रकार हृदयरूप परिच्छिन्न स्थान होनेके कारण अक ( छोटा ) ओक ( स्थान ) अर्थात् छोटे स्थानवाला होनेसे और ' अणीयान् ० ' ( धानसे अथवा यवसे भी सूक्ष्म है ) इसप्रकार [ अल्पवाचक ] स्वशब्दसे अणीयस्त्वका उपदेश होनेसे आरके अग्रभागके समान शारीर - जीवात्माका ही यहाँ उपदेश किया जाता है, सर्वव्यापक परमात्माका नहीं | ऐसा जो कहा गया है, उसका परिहार करना चाहिए । यहाँपर कहते हैं - यह दोष नहीं है । जिसका देश ( स्थान ) परिच्छिन्न है उसमें सर्वगतत्व उपदेश किसी प्रकार भी उपपन्न

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१५६ ब्रह्मसूत्र — शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ देशेषु विद्यमानत्वात्परिच्छिन्न देशव्यपदेशोऽपि कयाचिदपेक्षया सम्भवति । यथा सम-स्तवसुधाधिपतिरपि हि सन्नयोध्याधिपतिरिति व्यपदिश्यते । कया पुनरपेक्षया सर्वगतः सन्नीश्वरोऽर्भकौका अणीयांश्च व्यपदिश्यत इति । निचाय्यत्वादेवमिति ब्रूमः । एवम-णीयरूचादिगुणगणोपेत ईश्वरस्तत्र हृदयपुण्डरीके निचाय्यो द्रष्टव्य उपदिश्यते । यथा शालग्रामे हरिः । तत्रास्य बुद्धिविज्ञानं ग्राहकम् । सर्वगतोऽपीश्वरस्तत्रोपास्यमानः प्रसी-दति । व्योमवच्चैतद्द्रष्टव्यम् । यथा सर्वगतमपि सद्वयोम सूचीपाशाद्यपेक्षयार्भकोकोऽ-णीयश्च व्यपदिश्यते, एवं ब्रह्मापि । तदेवं निचाय्यत्वापेक्षं ब्रह्मणोऽर्भकौ कस्त्वमणीयस्त्वं च न पारमार्थिकम् । तत्र यदाशङ्कयते - हृदयायतनत्वाद्ब्रह्मणो हृदयायतनानां च प्रतिशरीरं भिन्नत्वाद्भिन्नायतनानां च शुकादीनामनेकत्वसावयवत्वानित्यत्वादिदोषदर्श नादब्रह्मणोऽपि तत्प्रसङ्ग इति, तदपि परिहृतं भवति ॥ ७ ॥

संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॥ ८ ॥

पदच्छेद- सम्भोगप्राप्तिः इति चेत् न, वैशेष्यात् । नहीं हो सकता । परन्तु सब जगह विद्यमान होनेसे सर्व व्यापकमें किसीकी अपेक्षा परिच्छिन्न देशका उपदेश भी संभव है । जैसे समस्त पृथ्वीका अधिपति हुआ भी यह अयोध्याका अधिपति है ऐसा व्यपदेश होता है । परन्तु सर्वगत हुआ भी ईश्वर पुनः किसीकी अपेक्षा ' अर्भकोका ' और ' अणीयान् ' कहा जाता है? ध्येय होनेके कारण वह ' अर्भकोका ' और ' अणीयान् ' कहलाता है, ऐसा हम कहते हैं । जैसे शालग्राममें यह विष्णु है ऐसा उपदेश किया जाता है, वैसे ही अणीयस्त्वादि गुणसमुदायसे विशिष्ट ईश्वर उस हृदय कमलमें द्रष्टव्य है, ऐसा उपदेश किया जाता है । वहाँ ( हृदय ) में उस ( परमात्मा ) को ग्रहण करनेवाला बुद्धिविज्ञान ( वृत्ति ) है । ईश्वर सर्वव्यापक होनेपर भी हृदयमें उपास्यमान होनेसे प्रसन्न होता है । और उसको आकाशके समान समझना चाहिए । सर्वव्यापक होते हुए भी जैसे आकाश सूची छिद्र आदिकी अपेक्षा अर्भकौका और अणीयान् व्यपदिष्ट होता हैं, एवं ब्रह्म भी । इस प्रकार ध्यान करनेकी योग्यताकी अपेक्षा ब्रह्ममें अर्भकौकस्त्व और अणीयस्त्व है, परमार्थसे नहीं । यहाँपर जो यह आशंका की जाती है कि ब्रह्मका स्थान हृदय है, और हृदयस्थान प्रत्येक शरीरमें भिन्न - भिन्न है; जैसे भिन्न भिन्न स्थानों में रहनेवाले शुकादिमें अनेकत्व, सावयवत्व, तथा अनित्यत्वादि दोष देखने में आते हैं, वैसे ही ब्रह्ममें भी अनेकत्व, सावयवत्व, तथा अनित्यत्वादि दोषों को प्रसक्ति हो सकती है । परन्तु यह शंका भी उपर्युक्त आकाशके दृष्टान्तसे दूर हो जाती है ॥ ७ । सत्यानन्दी - दीपिका * ' मनो ब्रह्मेत्युपास्ते । आकाशो ब्रह्मेत्युपास्ते । आदित्यं ब्रह्मेत्युपास्ते ' । इसप्रकार वेदोंमें अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव भेदसे अनेक उपासनाएँ अनेक स्थान और अनेक फल कहे गए हैं । इन सब स्थानोंमें - से हृदय ही उत्तम स्थान है, क्योंकि हृदयमें परमात्माकी अभिव्यक्ति होती है । यद्यपि परमात्मा सर्वत्र समानरूपसे व्याप्त है, फिर भी उसका साक्षात्कार महावाक्योंके उपदेश द्वारा विशुद्ध अन्तःकरणसे ही होता है अन्यथा नहीं, क्योंकि ' दृश्यते त्वग्रयया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ' यह कठ श्रुति भी इसका समर्थन करती है । बुद्धिका विशेष स्थान हृदय है । उसमें बुद्धिसे परमात्माक अभिव्यक्ति होती है । अतः हृदयको ध्येयको स्थान कहा गया है । यद्यपि वेदान्त सिद्धान्त में ' आत्मन आकाशः सम्भूतः ' इत्यादि श्रुतिसे वायु आदिके समान आकाशकी मी ब्रह्मसे उत्पत्ति मानी गयी है, तथापि नैय्यायिक आदिके मतानुसार अथवा सापेक्षिक नित्यत्वको लेकर यहाँ आकाशका द्रष्टान्त दिया गया है ॥ ७ ॥