श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 191–200
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 191–200
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अधि ० १ सू ० ८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १५७ सूत्रार्थ - ( सम्भोगप्राप्तिः ) सर्वव्यापक परमात्मामें चेतन होनेके कारण जीवके समान सुख दुःखके सम्भोगकी प्राप्ति हो, ( इति चेन्न ) तो यह कथन युक्त नहीं है, ( वैशेष्यात् ) क्योंकि दोनोंमें वैशेष्य है अर्थात् जीव भोक्ता और परमात्मा अभोक्ता है, इत्यादि भेदके कारण जीव और ब्रह्म भिन्न भिन्न हैं । अतः जीवके भोग से ब्रह्म में भोगका प्रसंग नहीं है । इसलिए मनोमयत्वादि गुणों से युक्त ब्रह्म ही उपाय है । ॐ व्योमवत्सर्वगतस्य ब्रह्मण सर्वप्राणिहृदयसंबन्धात्, चिद्रूपतया च शारीराद-विशिष्टत्वात्, सुखदुःखादिसंभोगोऽप्यविशिष्टः प्रसज्येत, एकत्वाच्च । नहि परस्मादात्मनोऽ-न्यः कश्चिदात्मा संसारी विद्यते, ' नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता ' ( ० ३।७।२३ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तस्मात्परस्यैव ब्रह्मणः संसार संभोगप्राप्तिरिति चेत् - नः वैशेष्यात् । न तावत्सर्वप्राणिहृदय-संबन्धाच्चिद्रूपतया च शारीरवद्ब्रह्मणः संभोगप्रसङ्गः; वैशेष्यात् । विशेषो हि भवति शारीर-परमेश्वरयोः । एकः कर्ता भोक्ता धर्माधर्मादिसाधनः सुखदुःखादिमांश्च । एकस्तद्वि-परीतोऽपहतपाप्मत्वादिगुणः । एतस्मादनयोर्विशेषादेकस्य भोगो नेतरस्य । * यदि च संनिधानमात्रेण वस्तुशक्तिमनाश्रित्य कार्य संवन्धोऽभ्युपगम्येत, आकाशादीनामपि दाहादिप्रसङ्गः । सर्वगतानेकात्मवादिनामपि समावेतौ चोद्यपरिहारौ । यदप्येकत्वाद ब्रह्मण आत्मान्तराभावाच्छारीरस्य भोगेन ब्रह्मणो भोगप्रसङ्गः इति । अत्र वदामः - इदं आकाशके समान सर्वव्यापक ब्रह्मका सब प्राणियोंके हृदय के साथ सम्बन्ध होने तथा चैतन्य-रूप होनेके कारण ब्रह्म और जीवमें भेद नहीं है, इससे जीवके समान ब्रह्म में मी सुखदुःखादि संभोग प्रसक्त होगा । और श्रुति प्रतिपादित एकत्वसे भी ' नान्योऽतो ० ' ( इस - परमात्मासे भिन्न विज्ञाता नहीं है ) इत्यादि श्रुतियोंसे यह निश्चय होता है कि परमात्मासे भिन्न कोई संसारी जीवात्मा नहीं है । अतः ( जीव और ब्रह्मके एक होनेसे ) परब्रह्मको ही संसार संभोगकी प्राप्ति होगी, ऐसा यदि कहो तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जीव और ब्रह्ममें विशेष है । सब प्राणियोंके हृदयके साथ सम्बन्ध होने तथा चैतन्यरूप होने से जीवके समान ब्रह्ममें संभोगका प्रसंग नहीं है, क्योंकि वैशेष्य है । जीव और ब्रह्म में विशेष ही है । एक जीव कर्ता, भोक्ता, धर्म और अधर्मं साधनवाला तथा सुख दुःख आदि वाला है | दूसरा ब्रह्म जीवसे विपरीत पापरहितत्वादि गुणोंसे युक्त है । इस प्रकार इन दोनोंमें विशेष होने के कारण एक जीवको सुख दुःखादिका भोग प्राप्त होता है दूसरेको नहीं । और यदि वस्तुकी सामर्थ्यका आश्रय किये विना केवल सान्निध्यमात्रसे कार्यके साथ सम्बन्ध माना जाय तो आकाश आदिमें भी दाह आदिका प्रसङ्ग उपस्थित होगा । और जिन वादियोंके मतमें जीव सर्वव्यापक तथा अनेक हैं उनके मतमें भी इस प्रकारकी शङ्का और उसका समाधान समान ही होगा । और यह जो कहा कि ब्रह्मके एकत्वसे अन्य आत्माका अभाव है, अतः जीवके भोगसे ब्रह्म में भोगकी प्रसक्ति होगी । इस विषयमें हम कहते हैं - उस अनभिज्ञसे यह पूछना चाहिए कि परमात्मासे अन्य आत्माके अभावका सत्यानन्दी - दीपिका * ‘ नान्योऽतोऽस्ति ' इत्यादि श्रुतियाँ उपाधिसे रहित शुद्ध आत्माको लेकर ही अभेदका प्रति-पादन करती हैं, उपाधिको लेकर नहीं । उपाधिको लेकर तो दोनोंमें कल्पित भेद ही है । इसलिए जीव कर्ता भक्तादि धर्मोसे युक्त है और ब्रह्म अकर्ता अभोक्ता आदि है, अतः ब्रह्ममें जीवके समान सुख दुःख आदि भोगका प्रसंग उपस्थित नहीं हो सकता । * एक ही हृदयमें जीव और ब्रह्म साथ - साथ रहते हैं, इस सान्निध्यसे जीवका भोग ब्रह्ममें होना चाहिए, यह आक्षेप असंगत है, क्योंकि यदि वस्तुकी असंगता आदि शक्तिके विचार किये विना सान्निध्यमात्रसे दोषका उपपादन करोगे तो अग्नि आदिके सान्निध्यसे आकाश में भी दाह आदि
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१५८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ तावद्देवानां प्रियः प्रष्टव्यः । कथमयं त्वयात्मान्तराभावोऽध्यवसीयत इति । ' तत्त्वमसि ' ' अहं ' ब्रह्मास्मि ' ' नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता ' इत्यादिशास्त्रेभ्य इति चेत्, यथाशास्त्रं तर्हि शास्त्रीयोऽर्थः प्रतिपत्तव्यो न तत्रार्धजरतीयं लभ्यम् । शास्त्रं च ' तत्त्वमसि ' इत्यपहतप. मत्वादिविशेषणं ब्रह्म शारीरस्यात्मत्वेनोपदिशच्छारीरस्यैव तावदुपभोक्तृत्वं वारयति । कुतस्तदुपभोगेन ब्रह्मण उपभोगप्रसङ्ग:? * अथागृहीतं शारीरस्य ब्रह्मणैकत्वं तदा मिथ्याज्ञाननिमित्तः शारीरस्योपभोगः, न तेन परमार्थरूपस्य ब्रह्मणः संस्पर्शः । नहि बालैस्तलमलिनतादि-सिव्योम्नि विकल्प्यमाने तलमलिनतादिविशिष्टमेव परमार्थतो व्योम भवति । तदाह - न, वैशेष्यादिति । नैकत्वेऽपि शारीरस्योपभोगेन ब्रह्मण उपभोगप्रसङ्गः, वैशेष्यात् । विशेषो हि भवति मिथ्याज्ञानसम्यग्ज्ञानयोः । मिथ्याज्ञानकल्पित उपभोगः, सम्यग्ज्ञानदृष्टमेकत्वम् । न च मिथ्याज्ञानकल्पितेनोपभोगेन सम्यग्ज्ञानदृष्टं वस्तु संस्पृश्यते । तस्मान्नोपभोग-गन्धोऽपि शक्य ईश्वरस्य कल्पयितुम् ॥ ८ ॥
निश्चय तुमने किस प्राणसे किया? यदि कहो कि ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्माऽस्मि, ' नान्यतोऽतो. ' इत्यादि शास्त्रोंसे किया है तो ( हम कहते हैं कि ) शास्त्र के अनुसार ही शास्त्रीय अर्थं समझना चाहिए, उसमें अर्धजरतीय युक्त नहीं है, ' तत्त्वमसि ' इत्यादि शास्त्र तो पापरहितत्वादि विशेषणोंसे उपलक्षित ब्रह्मका जीवको ( तु ब्रह्म है ) आत्मरूप से उपदेश करता हुआ जीवके ही भोक्तृत्वका निषेध करता है । ऐसी स्थितिमें जीवके उपभोगसे ब्रह्ममें उपभोगका प्रसंग कैसे हो सकता है? यदि जीवका ब्रह्मके साथ अभेदज्ञान गृहीत नहीं हुआ तो मिथ्याज्ञानसे ही जीवमें उपभोग उपपन्न होगा । परमार्थरूप ब्रह्मका उस उपभोगके साथ संस्पर्श - सम्बन्ध नहीं है । अज्ञानी लोग आकाशमें तल और मलिनता आदिकी कल्पना करते हैं, परन्तु इतनेसे ही परमार्थतः आकाश तल, मलिनता आदिवाला नहीं हो जाता, इसलिए सूत्रकार कहते हैं - ' न वैशेष्यात् ' ( जीव ब्रह्मके ) एकत्व होनेपर भी जीवके उपभोगसे ब्रह्ममें उपभोगकी प्रसक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि वैशेष्य है । वस्तुतः मिथ्याज्ञान और सम्यग्-ज्ञानमें विशेष है । उपभोग मिथ्याज्ञानसे कल्पित है और एकत्व सम्यग्ज्ञानसे दृष्ट है । सम्यग्ज्ञानसे अनुभूत वस्तु मिथ्याज्ञान कल्पित उपभोग से सम्बन्ध नहीं रखती, अतः ईश्वरमें लेशमात्र भी उपभोगकी कल्पना नहीं की जा सकती ॥ ८ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका मानने पड़ेंगे । और दूसरी बात यह भी है कि जिनके मत में अनेक जीवात्मा हैं और एक ही साथ सब एक ही देहमें विद्यमान हैं उनके मतमें सब आत्माओं को परस्परके दुःख सुखसे दुःखी सुखी होना पड़ेगा । यदि इस दोषके निवारणार्थं पूर्वपक्षी यह कहे कि जिस जीवसे जो कर्म किये गये हैं वही उस कर्मफलका भागी होगा अन्य नहीं, तो सिद्धान्तमें भी जिस जीवने जो कर्म किया है उसका फल उसे स्वयं ही भोगना पड़ता है वह फल ब्रह्मको प्राप्त नहीं होगा । इस प्रकार हमारे मतमें भी कोई दोष नहीं है | और ' तत्त्वमसि ' ' अहं ब्रह्मास्मि ' इत्यदि श्रुति वाक्योंमें ब्रह्मसे आत्मान्तरका अभाव कहकर फिर ब्रह्ममें भोग प्राप्तिका आक्षेप करते हो, यह अर्धंजरतीय अयुक्त है । क्योंकि उक्त श्रुतिवाक्य तो जीवको ' तू ही ब्रह्म है ' ऐसा आत्मरूप से उपदेश करते हुए जीवमें अनादि अविद्याकृत कर्तृत्व मोक्तृत्व आदिका निषेध करते हैं । तब किस कारण जीवका उपभोग ब्रह्म में प्रसक्त होगा? ' आत्माऽपहत-पाप्मा ' इत्यादि श्रुतियों में ब्रह्म तो पाप आदिसे रहित शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव प्रतिपादित है । ऐसे ब्रह्म में जीवके उपभोगका अवकाश ही कहाँ? * सम्बन्ध द्विष्ट ( ( दोका ) होता है । जब दो पदार्थ सत्य होते हैं तो उनका सम्बन्ध भी सत्य होता है | परन्तु वेदान्त सिद्धान्त में ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इत्यादि श्रुतियोंके आधारपर एक
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अधि ० १ सू ० ९ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १५ ९ ( २ अत्यधिकरणम् । सू ० ९ -१० ) अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ ९ ॥
पदच्छेद - अत्ता, चराचरग्रहणात् । सूत्रार्थ - ( चराचरग्रहणात् ) चराचर ( स्थावर और जंगम ) के ग्रहण होनेसे यहाँ ( अत्ता ) भक्षक परमात्मा ही है अग्नि आदि नहीं । * कठवल्लीषु पठ्यते- - ' यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ' ( १।२।२४ ) इति । अत्र कश्चिदोदनोपसेचन सूचितोऽत्ता प्रतीयते । तत्र ' यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च ० ' ( जिस परमेश्वरका ब्राह्मण तथा क्षत्रियसे उपलक्षित सम्पूर्ण चराचर जगत् ‘ ओदनः ’ भक्षण करने योग्य भात है और सर्वं प्राणिनाशक मृत्यु जिसका उपसेचन ( घी आदि ) है वह जहाँ है उसे कौन [ अज्ञ पुरुष ] इस प्रकार ( उपर्युक्त साधन सम्पन्न अधिकारीके समान ) सत्यानन्दी - दीपिका ब्रह्म ही सत्य है, ' अतोन्यदार्तम् ' ( तदतिरिक्त सब मिथ्या है ) अतः सत्य और मिथ्याका सम्बन्ध भी मिथ्या ही होता है अर्थात् कल्पित पदार्थ के साथ अधिष्ठानका सत्य सम्बन्ध नहीं होता किन्तु कल्पित होता है । यदि कल्पित पदार्थ के साथ अधिष्ठानका सम्बन्ध सत्य मानें तो भ्रान्तिमय जलते मरुस्थल भी गीला होना चाहिए, परन्तु होता नहीं है, क्योंकि ' यत्र यदध्यासस्तत्कृतेन दोषेण गुणेन वाऽणु-मात्रेणापि न सम्बध्यते ' ( जिसका जहां अध्यास होता है तत्कृत दोष या गुणसे वह अणुमात्र भी सम्बन्धित नहीं होता ) ऐसा प्रकरणमें भी समझना चाहिए अर्थात् ब्रह्ममें जीव अविद्यासे कल्पित है अतः कल्पिन वस्तुके कल्पित सम्बन्धसे सत्य अधिष्ठानमें किञ्चित् भी वैलक्षण्य नहीं आता । इससे यह सिद्ध होता है कि हृदयमें ब्रह्मकी स्थितिका कोई बावक नहीं है और मनोमयत्वादि गुणोंसे उपलक्षित परमात्मा ही यहाँ उपास्य है जीव नहीं ॥ ८ ॥
* नचिकेता और यमका संवाद कठोपनिषद् में प्रसिद्ध है । उसमें इस प्रकार प्रश्नोत्तर देखने में आते हैं । ‘ स त्वमग्नि ँ, स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि ० ' ( कठ ० १।१३ ) ( हे मृत्यु! तुम स्वर्गके साधनभूत अग्निको जानते हो उसका वर्णन मुझ श्रद्धालुके प्रति करो । ) ' लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै ० ' ( कठ ० १११५ ) ( तब यमराजने नचिकेताके लिए लोकोंके आदि कारणभूत उस अग्निका उपदेश किया ) यह अग्नि विषयक प्रश्नोत्तर है । ' येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ' ( कठ ० १।२० ) ( मरणानन्तर मनुष्यके विषयमें यह सन्देह है कि परलोकमें शरीरेन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिसे भिन्न देहान्तर सम्बन्धी आत्मा है, ऐसा कुछ लोग मानते हैं, और कुछ लोग मानते हैं कि इनसे भिन्न आत्मा नहीं है ) यह जीव विषयक प्रश्न है । ' अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्माद ० ' ( ' कठ ० १।२ । १४ ( जो धर्मसे पृथक्, अथर्मसे पृथक्, तथा इस कार्य कारणरूप प्रपञ्चसे भी पृथक् है ) यह ब्रह्म विषयक प्रश्न है । ' हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ' ( क ० २।२।६ ) ( हे गौतम! अब मैं तुम्हारे प्रति उस गुह्य और सनातन ब्रह्मका वर्णन करूँगा तथा [ ब्रह्मको न जाननेसे | मरणको प्राप्त होनेपर आत्मा जैसा हो जाता है [ वह भी बतलाऊँगा ] ) यहाँ से जोव और ब्रह्म विषयक उत्तर आरम्भ होता है । इस प्रकरण में ' यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च ' यह मन्त्र उत्तररूपसे आया हुआ है । इसलिए यहाँ सन्देह होता है कि इन तीनोंमें कौन अत्ता है । जैसे गत अधिकरणमें ब्रह्ममें मोक्तृत्वका अभाव कहा गया है, वैसे उसमें कर्तृत्वका भी अमाव है, इस प्रकार यहाँ दृष्टान्त संगतिसे ‘ अग्ने र तेति ' आदिसे पूर्वपक्ष है । इसमें पूर्वपक्षी अन्य श्रुतियोंके बलसे अग्नि अथवा जीवको ही यहाँपर अत्ता सिद्ध करते हैं । पूर्वपक्षमें अग्नि अथवा जीवकी उपासना है, सिद्धान्तमें निर्विशेष ब्रह्मका ज्ञान, इस प्रकार दोनोंमें अन्तर है ।
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१६० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ किमनिरत्ता स्यात्, उत जीवः, अथवा परमात्मेति संशयः । विशेषानवधारणात्, त्रयाणां चाग्निजीवपरमात्मनामस्मिन्ग्रन्थे प्रश्नोपन्यासोपलब्धेः । किं तावत् प्राप्तम्? अग्निरत्तेति । कुतः? ' अग्निरन्नादः ' ( बृ ० १1४/६ ) इति श्रुतिप्रसिद्धिभ्याम् । जीवो वाऽत्ता स्यात्, ' तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति ' इति दर्शनात् । न परमात्मा; ' अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ' ( मुण्ड ० ३।१।१ ) इति दर्शनादित्येवं * प्राप्ते ब्रूमः - अत्ताऽत्र परमात्मा भवितुमर्हति । कुतः? चराचर-ग्रहणात् । चराचरं हि स्थावरजङ्गमं मृत्यूपसेचनमिहाद्यत्वेन प्रतीयते, तादृशस्य चाद्यस्य न परमात्मनोऽन्यः कात्स्यैनात्ता संभवति । परमात्मा तु विकारजातं संहरन् सर्वमत्तीत्यु-पपद्यते । नन्विह चराचरग्रहणं नोपलभ्यते, कथं सिद्धवच्चराचरग्रहणं हेतुत्वेनोपादीयते? नैष दोषः: मृत्यूपसेचनत्वेन सर्वस्य प्राणिनिकायस्य प्रतीयमानत्वत्, ब्रह्मक्षत्रयोश्च प्राधा-न्यात्प्रदर्शनार्थत्वोपपत्तेः । यत्तु परमात्मनोऽपि नात्तृत्वं संभवति; ' अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ' इति दर्शनादिति । अत्रोच्यते - कर्मफलभोगस्य प्रतिषेधकमेतद्दर्शनंः तस्य संनिहितत्वात् । न विकारसंहारस्य प्रतिषेधकं सर्ववेदान्तेषु सृष्टिस्थितिसंहारकारणत्वेन ब्रह्मणः प्रसिद्ध-त्वात् । तस्मात्परमात्मैवेहात्ता भवितुमर्हतीति ॥ ९ ॥
जान सकता है? ) ऐसा कठोपनिषद् में कहा गया है । यहाँ ओदन और उपसेचनसे सूचित कोई एक भक्षक प्रतीत होता है | यहाँ क्या वह भक्षक अग्नि है या जीव अथवा परमात्मा? ऐसा संशय होता है । इस ग्रन्थमें अग्नि, जीव और परमात्मा इन तीनोंके प्रश्नोंका उपन्यास उपलब्ध होता है । तब क्या प्राप्त होता है? ' पूर्वपक्षी - अग्नि ही अत्ता ( मक्षक ) है | क्यों? ' अग्निरन्नादः ' ( अग्नि अन्नको भक्षण करता है ) इस श्रुति और लोक प्रसिद्धिसे यही प्राप्त होता है अथवा जीव भक्षक होना चाहिए, क्योंकि ' तयोरन्यः पिप्पलं ० ' ( उन दोनोंमें एक तो स्वादिष्ट ( मधुर ) पिप्पल ( कर्मफल ). का उपभोग करता है ) ऐसी श्रुति देखी जाती है । परन्तु परमात्मा भक्षक नहीं हो सकता, क्योंकि ' अनश्नन्नन्यो ० ' ( दूसरा न भोगता हुआ साक्षिरूपसे देखता रहता है ) ऐसी श्रुति देखने में आती है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - यहाँ परमात्मा ही अत्ता होना युक्त है । क्यों? क्योंकि श्रुतिमें चराचरका ग्रहण है । चर और अचर - जंगम और स्थावर जगत् - तथा मृत्यु उपसेचन यहाँ मक्ष्यरूपसे प्रतीत होते हैं । ऐसे मक्ष्यका पूर्णरूपसे भक्षक परमात्मा से अन्य नहीं हो सकता । परमात्मा तो सम्पूर्ण विकारका संहार करता हुआ सबको भक्षण करता है, ऐसा उपपन्न होता है । परन्तु श्रुतिमें चर और अचरका ग्रहण तो उपलब्ध नहीं होता, तो फिर सूत्रकारने निश्चित् सा मानकर चराचरका हेतु रूपसे कैसे ग्रहण किया है? यह दोष नहीं है, क्योंकि मृत्युरूपी उपसेच के कथनसे सब प्राणि-समूहकी भक्ष्यरूपसे श्रुतिमें प्रतीति होती है । ब्राह्मण और क्षत्रियको मुख्य होने के कारण उनका श्रुतिमें प्रदर्शन होना ठीक है । [ क्योंकि जगत् में ये दोनों प्रधान हैं अतः उनका ग्रहण ठीक है ], ' अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ० ' ( दूसरा कर्मफल भोगे विना साक्षिरूपसे देखता रहता है ) इस श्रुतिसे मी परमात्मा भक्षक नहीं हो सकता । [ ऐसा जो कहा गया है ] इसपर कहते हैं - यह श्रुति-वाक्य कर्मफलके उपभोगका प्रतिषेध करता है, क्योंकि उसके सन्निहित ( समीप ) है, किन्तु विकारके संहारका प्रतिषेध नहीं करता, कारण कि ब्रह्म सब वेदान्त वाक्यों में सृष्टि, स्थिति और संहारका कारण-. रूपसे प्रसद्ध है । इसलिए यहां परमात्मा ही मक्षक होने योग्य है ॥ ९ ॥
सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्वपक्षी ओदनशब्दसे भोग्य वस्तुका ग्रहण करता है । परन्तु सिद्धान्तमें तो ओदनीय ब्रह्म एवं क्षत्रशब्दों से उपलक्षित कार्य मात्रका ग्रहण किया जाता है । इसलिए सम्पूर्ण प्रपञ्चका संहारक ईश्वर ही हो सकता है दूसरा नहीं ॥ ९ ॥
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अधि ० ३ सू ० १०-११ ] भाषानुवाद- सत्यावन्दी - दीपिकासहित १६१ प्रकरणाच ॥ १० ॥
पदच्छेद – प्रकरणात् च । सूत्रार्थ - ' न जायते ' इस प्रकरणसे और ' क इत्था वेद यत्र सः इस दुर्विज्ञेयरूप लिङ्गसे अत्तृवाक्यमें उक्त अत्ता परमात्मा ही है । इतश्च परमात्मैवेहाऽत्ता भवितुमर्हति, यत्कारणं प्रकरणमिदं परमात्मनः, ' न जायते
म्रियते वा विपश्चित् ' ( काठ ० १ । १ । १८ ) इत्यादि । प्रकृतग्रहणं च न्याय्यम् ।
सः ' इति च दुर्विज्ञानत्वं परमात्मलिङ्गम् ॥१० ॥
( ३ गुहाधिकरणम् ०११-१२ ) गुहां प्रविष्टवात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॥ ११ ॥
पदच्छेद - गुहाम्, प्रविष्टौ आत्मानौ, हि तद्दर्शनात् । सूत्रार्थ - ( गुहां प्रविष्टावात्मानौ एव ) ' ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां इस मन्त्रमें जीव और परमात्मा ही गुहा में प्रवेश किये हुए हैं बुद्धि और जीव नहीं, श्रुतिमें ऐसा ही देखा जाता है । * कठवल्लीष्वेव पठ्यते- -'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ पौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ' ( काठ ० १ | ३ | १ ) इति ' क इत्था वेद यत्र प्रविष्टौ परमे परार्धे ’ ( तद्दर्शनात् ) क्योंकि परमे परार्धे । छाया-। तत्र संशयः-किमिह बुद्धिजी निर्दिष्टौ, उत जीवपरमात्मानाविति । यदि बुद्धिजीवी, ततो बुद्धिप्रधाना-कार्यकरणसंघाताद्विलक्षणो जीवः प्रतिपादितो भवति । तदपीह प्रदिपादयितव्यं, ' येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ ’ इससे भी परमात्मा ही यहाँ अत्ता - भक्षक होना चाहिए, क्योंकि ' न जायते म्रियते ० ' ( मेधावी-आत्मा न उत्पन्न होता है और न मरता है ) इत्यादि प्रकरण परमात्माका ही है । प्रकृतका ग्रहण करना युक्त है । ' क इत्था ० ' ( वह जहाँपर है इस प्रकार उसको [ अधिकारीके विना ] कौन जान सकता है ) ऐसा दुविज्ञानत्व परमात्माका ही लिङ्ग है ॥१० ॥
' ऋतं पिबन्तौ ० ' ( ब्रह्मवेत्ता लोग कहते हैं कि शरीरमें बुद्धिरूप गुहाके भीतर प्रकृष्ट ब्रह्म-स्थानमें प्रविष्ट हुए अपने कर्मफलको भोगनेवाले छाया और घामके समान परस्पर विलक्षण दो [ तत्त्व ] हैं यही बात जिन्होंने तीन वार नाचिकेताग्निका चयन किया है । वे पञ्चाग्नि उपासना करने वाले भी कहते हैं ) ऐसा कठवल्ली में कहा जाता है । इसमें संशय होता है कि क्या यहाँ बुद्धि और जीव निर्दिष्ट हैं अथवा जीव और परमात्मा । यदि बुद्धि और जीव हैं तो बुद्धि जिसमें प्रधान है, ऐसे शरीर इन्द्रिय आदि संघातसे विलक्षण जीव प्रतिपादित होगा । वह भी यहाँ प्रतिपादन करने योग्य है, क्योंकि ' येयं प्रेते ० ' ( मनुष्य के मरनेके अनन्तर कुछ लोग कहते हैं कि आत्मा है और कुछ लोग कहते हैं कि. आत्मा नहीं है, ऐसा संशय होता है, अतः इस विषय में तुमसे निश्चित निर्णय पाकर मैं इस आत्म-विद्याको जान सकूँ, वरोंमें यह मेरा तीसरा वर है ) ऐसा प्रश्न किया गया है । यदि जीव और परमात्मा सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्वं अधिकरणमें मृत्युपद के सान्निध्यसे जैसे ब्रह्म, क्षत्रपद अनित्य वस्तु परक हैं, वैसे गुहा -प्रवेश के सान्निध्यसे ' ऋतं पिबन्तौ ' यह ' पिबत् ' शब्द भी बुद्धि, क्षेत्रज्ञ परक होना चाहिए, इस प्रकार दृष्टान्त संगति से इस अधिकरणका आरम्भ है । ' ऋतं पिबन्तौ ० ' यह इस अधिकरणका विषयवाक्य है । इस श्रुति प्रतिपादित ' ऋतं ' को सेवन करनेवाले इन दोनों ( तत्त्वों ) को ब्रह्मवित् तथा स्वर्ग, मेघ, पृथ्वी, पुरुष और स्त्रीमें अग्निदृष्टि रखनेवाले पञ्चाग्निके उपासक ( पञ्चाग्निवेत्ता ) यमके द्वारा
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१६२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ ( का ० १।१।२० ) इति पृष्टत्वात् । अथ जीवपरमात्मानौ ततो जीवाद्विलक्षणः परमात्मा प्रतिपादितो भवति । तदपीह प्रतिपादयितव्यम्; ' अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद् ॥ ' ( काठ ० १/२/१४ ) इति पृष्टत्वात् । * अत्राहा-क्षेप्ता - उभावप्येतौ पक्षौ न संभवतः । कस्मात्? ऋतपानं कर्मफलोपभोगः; ‘ सुकृतस्य लोके ’ इति लिङ्गात् । तच्चेतनस्य क्षेत्रज्ञस्य संभवति, नाचेतनाया बुद्धे: । ' पिबन्तौ ' इति च द्विव-चनेन द्वयोः पानं दर्शयति श्रुतिः I । अतो बुद्धिक्षेत्रज्ञपक्षस्तावन्न संभवति । अत एव क्षेत्रज्ञ-परमात्मपक्षोऽपि न संभवति, चेतनेऽपि परमात्मनि ऋतपानासंभवात् । ' अरु श्नन्नन्योऽभि-चाकशीति ' ( मु ० ३।१।१ ) इति मन्त्रवर्णादिति । अत्रोच्यते - नैष दोषः छत्रिणो गच्छन्ती-त्येकेनापि छत्रिणा बहूनां छत्रित्वोपचारदर्शनात् । एवमेकेनापि पिवता द्वौ पिबन्तावुच्येते । यद्वा - जीवस्तावत्पिवति, ईश्वरस्तु पाययति । पाययन्नपि पिवतीत्युच्यतेः पाचयितर्यपि हों तो जीवसे विलक्षण परमात्मा प्रतिपादित होता है । यह भी यहाँ प्रतिपादन करने योग्य है, क्योंकि ' अन्यत्र धर्माद ० ' ( जो धर्मसे पृथक्, अधर्मसे पृथक् तथा इस कार्य कारणरूप प्रपञ्चसे भी पृथक् और जो भूत और भविष्यत् से भी अन्य है इस तरह जिसको आप जानते हैं वही मुझसे कहिए ) ऐसा प्रश्न किया गया है । यहाँ शंका करनेवाला यह कहता है कि ये दोनों पक्ष सम्भव नहीं हैं । क्योंकि ' ऋतपान ' का अर्थ कर्मफलका उपभोग है । ' सुकृतस्य लोकं ' ( सुकृत के कार्यं देहमें ) यह लिङ्ग है | यह चेतन क्षेत्रज्ञमें सम्भव है, अचेतन बुद्धिमें नहीं । ' पिबन्तौ ' ( दो पीनेवाले ) इस द्विवचनसे श्रुति दोनोंमें कर्मफलका उपभोग दिखलाती है । अतः बुद्धि और जीवका पक्ष तो सम्भव नहीं है । इस कारण से जीव और परमात्माका पक्ष भी सम्भव नहीं है, कारण कि चेतन परमात्मामें कर्मफलंका सम्भव नहीं है, क्योंकि ' अनश्नन्नन्यो ० ' ( अन्य खाये विना साक्षीरूपसे देखता रहता है ) ऐसी श्रुति है । इसपर कहते हैं कि यह दोष नहीं है । क्योंकि ' छत्रिणो गच्छन्ति ' ( छत्रीवाले जाते हैं. ) इसप्रकार एक छत्रीवाला हो तो भी बहुत छत्रीवाले ऐसा उपचार देखने में आता है । इसीप्रकार एक पान करता हो तो दो पान करते हैं, ऐसा कहा जाता है । अथवा जीव पान करता है ( कर्मफल भोगता हैं ) और ईश्वर पान ( कर्मफलका उपभोग ) कराता है । पान कराते ( उपभोग कराते ) सत्यानन्दी - दीपिका उपदिष्ट विराटरूप अग्निका तीन वार - अध्ययन, ज्ञान तथा अनुष्ठान करनेवाले कर्मी लोग भी जानते हैं । ऋतको सेवन करनेवाले इन दोनोंके सम्बन्धमें संशय होता है कि ये दोनों जीव और बुद्धि हैं ' अथवा जीव और परमात्मा हैं । * ' ऋतं पिबन्तौ ० ' इस श्रुति में कर्मफलका उपभोग दोमें सुना जाता है, क्योंकि श्रुतिमें ' पिबन्तौ ' यह द्विवचन है । यदि बुद्धि और जीवका ग्रहण किया जाय तो बुद्धि जड़ है, उसमें कर्मफलका भोक्तृत्व सम्भव नहीं है । केवल जीवका भी ग्रहण नहीं किया जा सकता, क्योंकि दो कर्मफल भोक्ताओंका श्रवण है । इसलिए प्रथम पक्ष युक्त नहीं है । * ' छत्रिणो यान्ति ' यहाँ जैसे छत्री पदसे अजहल्लक्षणा के द्वारा छत्री युक्त और छत्री रहित दोनोंका साथ साथ ग्रहण होता है, वैसे ही ' पिबन्ती ' इस पदसे भोग करनेवाले और भोग न करने वाले हृदयाकाशमें स्थित दोनोंका ग्रहण होता है । इस पक्ष में गौणरूपसे ईश्वर में भोक्तृत्व माना गया है । और अब अन्य पक्ष में ' यद्वा ' इत्यादि भाष्यसे मुख्यरूपसे ईश्वर में भोगकर्तृत्व दिखलाते हैं । जीव कर्मफल भोगता है और ईश्वर भोग करवाता है । जैसे जीव कर्मफल भोगनेके लिए कृतिवाला होनेसे कर्ता है, ऐसे ही ईश्वर कर्मफलोंका भोग करानेके लिए कृतिवाला होनेसे कर्ता है । जो कराता है वह भी कर्ता होता है, यह न्याय लोक प्रसिद्ध है ॥। ११ ॥
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अधि ० ३ सू ० ११ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित १६३ पक्तृत्वप्रसिद्धिदर्शनात् । बुद्धिक्षेत्रज्ञपरिग्रहोऽपि संभवति करणे कर्तृत्वोपचारात् । एधांसि पचन्तीति प्रयोगदर्शनात् । न चाध्यात्माधिकारेऽन्यौ कौचिद्वावृतं पिवन्तौ संभवतः । तस्माद् बुद्धिजीवौ स्यातां, जीवपरमात्मानौ वेति संशयः । किं तावत्प्राप्तं? बुद्धिक्षेत्रज्ञाविति । कुतः? ' गुहां प्रविष्टौ ' इति विशेषणात् । यदि शरीरं गुहा, यदि वा हृदयं, उभयथापि वुद्धिक्षेत्रज्ञौ गुहां प्रविष्टावुपपद्येते । न च सति संभवे सर्वगतस्य ब्रह्मणो विशिष्टदेशत्वं युक्तं कल्पयितुम् । ' सुकृतस्य लोके ' इति च कर्मगोचरानतिक्रमं दर्शयति । परमात्मा तु न सुकृतस्य वा दुष्कृतस्य वा गोचरे वर्तते; ' न कर्मणा वर्धते नो कनीयान् ' इति श्रुतेः । ' छायातपौ ' इति च चेतनाचेतनयोर्निर्देश उपपद्यते, छायातपवत्परस्पर विलक्षण-त्वात् । तस्माद्बुद्धिक्षेत्रज्ञाविहोच्येयातामित्येवं प्राप्ते ब्रूम - विज्ञानात्मपरमात्मानाविहो-च्येयाताम् । कस्मात्? आत्मानौ हि तावुभावपि चेतनौ समानस्वभावौ । संख्याश्रवणे च समानस्वभावेष्वेव लोके प्रतीतिर्दृश्यते । अस्य गोर्द्वितीयोऽन्वेष्टव्य इत्युक्ते गौरेव द्वितीयोऽन्विष्यते, नाश्वः पुरुषो वा । तदिह ऋतपानेन लिङ्गेन निश्चिते विज्ञानात्मनि द्वितीयान्वेषणायां समानस्वभावश्चेतनः परमात्मैव प्रतीयते । ननूक्तं गुहाहितत्वदर्शनान्न परमात्मा प्रत्येतव्य इति, गुहाहितत्वदर्शनादेव परमात्मा प्रत्येतव्य इति वदामः । गुहा-हितत्वं तु श्रुतिस्मृतिष्वसकृत्परमात्मन एव दृश्यते - ' गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ' ( काठ ० १।२।१२ ) ' यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ' ( तै ० २1१ ) ' आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टम् ' हुए ( ईश्वर ) में भी पान ( उपभोग ) करता है ऐसा कहा जाता है, क्योंकि पकवाने वालेमें भी पाक -कर्तृत्व प्रसिद्धि देखी जाती है । बुद्धि और जीवका भी ग्रहण हो सकता है, क्योंकि करणमें कर्तृत्वका उपचार है । जैसे ' एधांसि पचन्ति ( लकड़ियाँ पकाती हैं ) ऐसा प्रयोग देखनेमें आता है । और अध्यात्मप्रकरणमें दूसरे कोई दो पान करते हैं ( कर्मफल भोगते हैं ) यह सम्भव नहीं है । इसलिए बुद्धि और जीवका उपदेश है अथवा जीव तथा परमात्माका, ऐसा संशय होता है । तब क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - बुद्धि और क्षेत्रज्ञका निर्देश प्राप्त होता है । किससे? ' गुहां प्रविष्टौ ' यह विशेषण है । इससे चाहे शरीररूपी गुहा हो अथवा हृदय गुहा हो, दोनों प्रकारसे बुद्धि तथा जीव गुहा में प्रविष्ट हुए उपपन्न होते हैं । और सम्भव हो अर्थात् गुहामें प्रविष्टरूपसे बुद्धि और जीवका ग्रहण सम्भव हो तो सर्वगत परमात्मामें विशिष्ट देशकी कल्पना करना युक्त नहीं है । ' सुकृतस्य लोके ' यह श्रुतिवाक्य कर्मफलका अनतिक्रम दिखलाता है । परमात्मा तो सुकुत और दुष्कृत विषयक फलमें नहीं रहता । क्योंकि ' न कर्मणा ० ' ( न कर्मसे बढ़ता है और न घटता है ) यह श्रुति है । ‘ छायातपौ ० ’ ( छाया और आपके समान परस्पर विलक्षण हैं ) यह भी चेतन, अचेतनमें निर्देश उपपन्न होता है, क्योंकि छाया और घामके समान परस्पर विलक्षण हैं । इस कारण बुद्धि और जीवको ही यहाँ कहना चाहिए । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं- ' गुहां प्रविष्टौ ' इस प्रसंगमें जीव और परमात्मा कहने चाहिएँ, क्योंकि दोनों आत्मा चेतन और समान स्वभाववाले हैं । संख्यांके श्रवण होनेपर लोकमें समान स्वभाववालोंकी ही प्रतीति देखी जाती है जैसे ' अस्य गो: ' ( इस बैलका दूसरा साथी खोजना चाहिए ) ऐसा कहनेपर बैलके सजातीय दूसरे बैलको ' ही खोजा जाता है उसके विजातीय अश्व अथवा पुरुषको नहीं खोजा जाता । इसलिए यहाँ कर्मफल- भोगरूप लिङ्गसे जीवात्माका निश्चय होनेपर दूसरेकी खोज में समान स्वभावाले चेतन परमात्माकी ही प्रतीति होती है । परन्तु ऐसा जो कहा गया है कि गुहामें प्रविष्टत्व देखनेसे सर्वव्यापक परमात्माको प्रतीति नहीं होनी चाहिए, तो इसपर हम कहते हैं कि गुहा में प्रविष्टत्व दर्शनसे ही परमात्माकी प्रतीति होनी चाहिए । क्योंकि गुहा में प्रवित्व . तो श्रुति, स्मृति में अनेक वार परमात्माका ही देखा गया है, जैसे ' गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणं ० ' ( बुद्धिरूप
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१६४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ इत्याद्यासु । सर्वगतस्यापि ब्रह्मण उपलब्ध्यर्थी देशविशेषोपदेशो न विरुध्यत इत्येतदप्यु-क्तमेव । सुकृतलोकवर्तित्वं तु छत्रित्ववदेकस्मिन्नपि वर्तमानमुभयोरविरुद्धम् । छायात-पावित्यप्यविरुद्धम् । छायातपवत् परस्पर विलक्षणत्वात्संसारित्वा संसारित्वयोः । अविद्या-कृतत्वात्संसारित्वस्य, पारमार्थिकत्वाच्चासंसारित्वस्य । तस्माद्विज्ञानात्मपरमात्मानौ गुहां प्रविष्टौ गृह्येते ॥ ११ ॥
कृतश्च विज्ञानात्मपरमात्मानौ गृह्येते -विशेषणाच्च ॥ १२ ॥
पदच्छेद - विशेषणात्, च । सूत्रार्थ - ' और ' आत्मानं रथिनं विद्धि ' ' सोऽध्वनः पारमाप्नोति ' इस प्रकार गन्ता और गन्त-व्यादि विशेषणों से भी हृदयरूपी गुहामें जीव और परमात्माका ही ग्रहण होता है । * विशेषणं च विज्ञानात्मपरमात्मनोरेव भवति । ' आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ' ( का ० १।३।३ ) इत्यादिना परेण ग्रन्थेन रथिरथादिरूपककल्पनया विज्ञानात्मानं रथिनं संसारमोक्षयोर्गन्तारं कल्पयति । ' सोऽध्वतः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ' ( का ० १1३1 ९ ) इति च परमात्मानं गन्तव्यम् । तथा ' तं दुर्दर्श गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् । अध्या-त्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ' ( का ० १ || २ | १२ ) इति पूर्वस्मिन्नपि ग्रन्थे गुहा में स्थित, अनेक प्रकारके अनर्थोंसे पूर्ण देहमें स्थित है अनादि पुरुष परमात्माको जानकर अधि-कारी पुरुष हर्ष और शोकका त्याग कर देता है ) ' यो वेद निहितं ० ' ( श्रेष्ठ हृदय आकाशमें स्थित, बुद्धिरूपी गुहा में प्रविष्ट ब्रह्मको जो जानता है वह सब कामोंको प्राप्त करता है ) ' आत्मानं ० ' ( बुद्धिरूपी गुहा में स्थित आत्माका विचार करो ) इत्यादि श्रुति और स्मृतियोंमें है । सर्वव्यापक ब्रह्मका भी साक्षात्कार करनेके लिए हृदयादि देश विशेषका उपदेश विरुद्ध नहीं होता, ऐसा पहले कहा गया है । सुकृतके कार्य देहमें रहना तो छत्रित्वके समान एकमें ( जीव में ) कर्मफल भोक्तृत्वादि होनेपर भी दोनों ( जीव और परमात्मा ) में अविरुद्ध है । छाया और आतपके समान यह कथन भी अविरुद्ध है । क्योंकि संसारित्व और असंसारित्व ये छाया और आपके समान परस्पर विलक्षण हैं । संसारित्व अविद्याकृत है और असंसारित्व पारमार्थिक है | अतः गुहामें प्रविष्ट जीवात्मा तथा परमात्माका ही यहाँ ग्रहण किया जाता है ॥ ११ ॥
और किस कारण से विज्ञानात्मा और परमात्माका ग्रहण किया जाता है? गन्ता और गन्तव्य आदि विशेषण भी जीव और परमात्मामें ही सम्भव हैं । ' आत्मानं रथिनं ० ' ( तू आत्माको रथी जान और शरीरको रथ समझ ) इत्यादि उत्तर वाक्य सन्दर्भसे रथी, रथ आदिके रूपकक़ी कल्पना कर यमराज विज्ञानात्मा ( जीवात्मा ) रथी की संसार और मोक्षके प्रति गन्तारूपसे कल्पना करते हैं । और ' सोऽध्वनः पारमाप्नोति ० ' ( वह संसार मार्गसे पार - उस व्यापक परमात्मा के परम पदको प्राप्त कर लेता है ) इससे परमात्माकी गन्तव्यरूपसे कल्पना करते हैं । इसी प्रकार ' तं दुर्दर्श गूढमनु ० ' ( दुर्विज्ञेय, गूढ़ - मायामें प्रविष्ट, गुहा - बुद्धिमें स्थित, गह्वर अनेक अनर्थोंसे व्याप्त देहमें स्थित, चिरन्तन अध्यात्मयोग - विषयोंमेंसे चित्तको हटाकर आत्मा में संलग्न करना, उसकी सत्यानन्दी - दीपिका * ' ऋतं पिबन्तौ ' इस मन्त्रसे पूर्व ' तं दुर्दर्श गूढमनुप्रविष्टं ' इस मन्त्रसे परमात्माका और ' आत्मानं रथिनं विद्धि ' इस अन्तिम मन्त्रसे जीवका ग्रहण किया गया है । इस प्रकार दोनों मंत्र जीव और परमात्माका मन्ता और मन्तव्यरूपसे ज्ञापन कराते हैं । इसलिए दोनोंका ग्रहण करना चाहिए ।
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अधि ० ३ सू ० १२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १६५ मन्तृमन्तव्यत्वेनैतावेव विशेषितौ । प्रकरणं चेदं परमात्मनः । ' ब्रह्मविदो वदन्ति ' इति च वक्तृविशेषोपादानं परमात्मपरिग्रहे घटते । तस्मादिह जीवपरमात्मानावुच्येयाताम् । एष एव न्याय: ' द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया ' ( मुण्ड ० ३ | १ | १ ) इत्येवमादिष्वपि । तत्रापि ह्यध्यात्मा-धिकारान्न प्राकृतौ सुपर्णावुच्येते । ' तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति ' इत्यदनलिङ्गाद्विज्ञानात्मा भवति । ‘ अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ' इत्यनशनचेतनत्वाभ्यां परमात्मा । अनन्तरे च मन्त्रे तावेव द्रष्टृ द्रष्टव्यभावेन विशिनष्टि - ' समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ' ( मुण्ड ३।१।२ ) इति । * अपर आह- ' द्वा सुपर्णा ' इति नेयमृगस्याधिकरणस्य सिद्धान्तं भजते; पैङ्गिरहस्य ब्राह्मणेनान्यथा व्याख्यातत्वात् । ' तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तीति सत्त्वमनश्नन्नन्योऽमिचाकशीतीत्यनश्नन्नन्योऽभिप-श्यति ज्ञस्तावेतौ सध्वक्षेत्रज्ञौ ' इति । सत्त्वशब्दो जीवः, क्षेत्रज्ञशब्दः परमात्मेति यदुच्यते, प्राप्तिसे आत्मका मनन कर धीर पुरुष हर्ष और शोकका त्याग कर देता है ) इस प्रकार पूर्व ग्रन्थ में भीमन्ता और मन्तव्यरूपसे दोनों ही विशेषित किये गये हैं । यह प्रकरण भी परमात्माका है । ' ब्रह्मविदो वदन्ति ' ( ब्रह्मवेत्ता कहते हैं ) इस प्रकार वक्ता विशेषका ग्रहण परमात्माके स्वीकार करनेपर ही संगत होता है । इसलिए यहाँ जीव और परमात्मा ही कहने चाहिएँ । ' द्वा सुपर्णा सयुजा ० ' ( दो सुन्दर पक्षवाले अर्थात् समान धर्मवाले, सदा एकत्र रहनेवाले सहचर, एक ही वृक्ष ( शरीर ) को आश्रय कर रहते हैं ) इत्यादिमें भी ( यही कठवल्लीका ) न्याय है [ ' ऋतं पिबन्तौ ' इस कठ- श्रुतिमें जिन दो का ग्रहण किया गया है उन दोनों ( जोव और परमात्माको ही ) ' द्वा सपुर्णा ' इस मुण्डक श्रुतिमें भी ग्रहण किया गया समझना चाहिए ] वहाँ भी अध्यात्मप्रकरण के कारण लौकिक पक्षियोंका वर्णन नहीं किया गया है । इसमें ' तयोरन्य: पिप्पलं ० ' ( दोनों में एक मधुर [ कर्म ] फलोंका भोग करता है ) इस प्रकार अदन ( भक्षण ) लिङ्गसे जीवात्मा अवगत होता है । और ' अनश्नन्नन्यो अधिचाकशीति ' ( दूसरा न भोगता हुआ प्रकाश करता है ) इन अभक्षण और चेतनत्वरूप लिङ्गोंसे परमात्मा अवगत होता है । उसके आगे मन्त्र में ' समाने वृक्षे पुरुषो ० ' ( एक ही शरीररूपी वृक्षमें मुह्यमान - यह देह मैं हूँ, इस प्रकार देहसे तादात्म्य अभिमानको प्राप्त हुआ दीनभावसे मोहको प्राप्त होकर शोक करता है । जब अनेक योगमार्गोंसे चित शुद्धकर उस परमात्माकी महिमाको जानता है, तब शोक रहित होता है ) इन दोनों को ही द्रष्टा और द्रष्टव्यभावसे विशेषित करते हैं । दूसरे कहते हैं— ' द्वा सुपर्णा ' यह मन्त्र इस अधिकारके सिद्धान्तका प्रतिपादन नहीं करता, क्योंकि पैङ्गिरहस्य-ब्राह्मणमें उसका अन्य प्रकारसे व्याख्यान किया गया है । ' तयोरन्य: पिप्पलं. ' ( उनमें से एक मधुर कर्मफल भोगता है वह सत्त्व ( बुद्धि ) है और दूसरा खाये विना देखता रहता है अर्थात् कर्मफलका उपभोग किये विना देखता रहता है वह ज्ञ - क्षेत्रज्ञ है, ये दो सत्त्व और क्षेत्रज्ञ हैं ) सत्त्वशब्द जीव वाचक है और क्षेत्रज्ञशब्द परमात्मा वाचक है ऐसा जो कहा जाता है, वह युक्त नहीं है, क्योंकि सत्यानन्दी - दीपिका * भाग्य में ' द्वा सुपर्णा ' यहाँ से लेकर ' वीतशोकः ' तक जो अभिप्राय लिखा गया है वह वृत्तिकारका मत है । भाष्यकारके मत में तो ' द्वा सुपर्णा ' यह वाक्य इस अधिकरणका विषयवाक्य नहीं है । आगे ' अपर आह ' से लेकर इसको स्पष्ट करते हैं । * भाष्यमें ' अपरः ' शब्दका अर्थ - ' न पर अपर: ' इस विग्रहके अनुसार स्वयं भाष्यकारका ग्रहण है अर्थात् अपरसे भाष्यकार स्वयं अपना अभिमत उपस्थित करते हैं । यह अधिकरण जीव बीर ईश्वरको सिद्ध करता है, परन्तु ' द्वा सुपर्णा ' यह मन्त्र जीव और ईश्वरका प्रतिपादन नहीं करता, क्योंकि पैङ्गिरहस्यब्राह्मणसे विरोध है, इस ब्राह्मण में तो बुद्धि और क्षेत्रज्ञका ग्रहण किया गया है ।
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१६६ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ तन्न; सत्त्वक्षेत्रज्ञ शब्दयोरन्तःकरणशारीरपरतया प्रसिद्धत्वात् । तत्रैव च व्याख्यातत्वात्-‘ तदेतत्सत्त्वं येन स्वप्नं पश्यति, अथ योऽयं शारीर उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञस्तावेतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ ' इति । नाप्यस्याधिकरणस्य पूर्वपक्षं भजते । नात्र शारीरः क्षेत्रज्ञः कर्तृत्वभोक्तृत्वादिना संसार-धर्मेणोपेतो विवक्ष्यते । कथं तर्हि? सर्वसंसारधर्मातीतो ब्रह्मस्वभावश्चैतन्यमात्रस्वरूपः; ‘ अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ' ' अनश्नन्योऽभिपश्यति ज्ञः ' इति वचनात् । ' तत्त्वमसि ' ‘ क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि ' ( गी ० १३।२ ) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यश्च । तावता च विद्योपसंहारदर्शनमेवमेवाव-कल्पते; ' तावेतौ सत्वक्षेज्ञज्ञौन ह वा एवंविदि किंचन रज आध्वंसते ' इत्यादि । कथं पुनरस्मिन्पक्षे ' तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तीति सत्त्वम् ' इत्यचेतने सत्त्वे भोक्तृत्ववचनमिति? उच्यते - नेयं श्रुतिरचेतनस्य सत्त्वस्य भोक्तृत्वं वक्ष्यामीति प्रवृत्ता । किं तर्हि? चेतनस्य क्षेत्रज्ञस्याभोक्तृ-त्वं ब्रह्मस्वभावतां च वक्ष्यामीति । तदर्थं सुखादिविक्रियावति सत्वे भोक्तृत्वमध्यारोपयति । इदं हि कर्तृत्वं भोक्तृत्वं च सत्त्वक्षेत्रज्ञयोरितरेतर स्वभावाविवेककृतं कल्प्यते । परमार्थतस्तु नान्यतरस्यापि संभवति, अचेतनत्वात्सत्त्वस्य, अविक्रियत्वाच्च क्षेत्रज्ञस्य | अविद्या प्रत्युप-स्थापितस्वभावत्वाच्च सत्त्वस्य सुतरां न संभवति । तथा च श्रुतिः - ' यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत् ' इत्यादिना स्वप्नदृष्टहस्त्या दिव्यवहारवद विद्याविषय एव कर्तृत्वादिव्य-सत्त्व और क्षेत्रज्ञ शब्द अन्तःकरण तथा जीवपरक प्रसिद्ध हैं । और उसीमें ( पैङ्गिरहस्यब्राह्मण में ) ' तदेतत्सत्त्वं ० ' ( जिससे स्वप्न देखता है वह यह सत्त्व है और जो यह शारीर उपद्रष्टा है यह क्षेत्रज्ञ है, ऐसे ये दो सत्त्व और क्षेत्रज्ञ हैं ) ऐसा ही व्याख्यान किया गया है । इस प्रकार यह ऋक् ( द्वा सुपर्णा ) इस अधिकरण के पूर्वपक्ष भाव ( सत्त्व शब्द से बुद्धि और क्षेत्रज्ञ शब्दसे जीवके ग्रहण ) का प्रतिपादन नहीं करती । वस्तुतः कर्तृत्व, भोक्तृत्व, आदि संसारी धर्मोसे युक्त शारीर - क्षेत्रज्ञ यहाँ विवक्षित नहीं है । किन्तु सब संसार धर्मोंसे अतीत ब्रह्मस्वभाव चैतन्यमात्र स्वरूप यहाँ विवक्षित है, क्योंकि ' अनश्नन्न-न्यो ' ' अनश्नन्नन्यो ' ( अन्य परमात्मा न भोगता हुआ देखता रहता है ) ' तत्त्वमसि ' ' क्षेत्रज्ञं चापि ० ' ( क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जान ) इत्यादि श्रुति स्मृतियोंसे भी यही अर्थं युक्त है । केवल मन्त्र व्याख्यानसे ही ‘ तावेतौं ० ' ( वे दो सत्त्व और क्षेत्रज्ञ हैं, इस प्रकार जाननेवाले विद्वानमें अविद्या कुछ भी सम्बन्ध नहीं करती ) इत्यादि ब्रह्मविद्याका उपसंहारदर्शन [ ' तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत् ' ] जीवके ब्रह्मभाव कथनसे ही संगत होता है, परन्तु इस पक्ष में ' तयोरन्यः ' ० ( उन दोनों में एक मधुर कर्मफल भोगता है वह सत्त्व है ) इस प्रकार अचेतन सत्त्वमें भोक्तृत्व वचन कैसे संगत होगा? कहते हैं— अचेतन सत्त्वमें भोक्तृत्व कहूँगी, इसलिए [ द्वा सुपर्णा ] यह श्रुति प्रवृत्त नहीं हुई है, किन्तु चेतन क्षेत्रज्ञ में अभोक्तृत्व और ब्रह्मस्वभावस्य कहूँगो, इसके लिए सुख आदि विक्रिया — विकारवाले सत्त्वमें भोक्तृत्वका अध्यारोप करती है । वस्तुतः कर्तृत्व और भोक्तृत्व तो सत्त्व और क्षेत्रज्ञके परस्पर स्वभाव के अविवेकसे कल्पित हैं | परमार्थसे तो दोनोंमें से एकमें भी कर्तृत्व आदि सम्भव नहीं हैं; क्योंकि बुद्धि अचेतन है और क्षेत्रज्ञ कूटस्थ विकार रहित है । अविद्या से प्रत्युपस्थापित स्वभाववाला होनेसे सत्त्वमें कर्तृत्व भोक्तृत्व सुतरां संभव नहीं हैं । इस प्रकार ' यत्र वा अन्यदिव ० ' ( जहां- अविद्या अवस्थामें द्वैत - सा होता है वहाँ एक दूसरेको देखता है ) इत्यादि से श्रुति स्वप्न में देखे हुए हस्ती आदि व्यवहार के सत्यानन्दी - दीपिका * जैसे स्वप्न पदार्थ मिथ्या होनेपर भी अविद्यासे सत्य प्रतीत होते हैं, ऐसे ही संपूर्ण प्रपञ्च भी मिथ्या होते हुए अविद्या से सत्य प्रतीत होता है अर्थात् दोनों अविद्या कल्पित होनेसे मिथ्या ही हैं, वस्तुतः एक परमात्मा ही सत्य है । किञ्च पैङ्गिरहस्यब्राह्मणके व्याख्यान के अनुसार ' द्वा सुपर्णा ' इत्यादि मुण्डक वाक्य इस अधिकरणका विषयवाक्य नहीं हो सकता । किन्तु ' ऋतं पिबन्तौ ' इत्यादि