श्रीगणेशाय नमः।
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 201–210
ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 201–210
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अधि ० ४ सू ० १३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित ९ १ ६७ वहारं दर्शयति । ' यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् ' ( वृ ० ४।५।१५ ) इत्यादिमा च विवेकिनः कर्तृत्वादिव्यवहाराभावं दर्शयति ॥ १२ ॥
( ४ अन्तराधिकरणम् सू ० १३-१७ ) अन्तर उपपत्तेः ॥ १३ ॥
पदच्छेद पदच्छेद - – अन्तरः अन्तरः,, उपपत्तेः । सूत्रार्थ - ( अन्तरः ) ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते ' इस श्रुतिसे प्रतिपाद्यमान नेत्राभ्यन्तर्गत पुरुष परमात्मा ही है । छायात्मा आदि नहीं, ( उपपत्तेः ) क्योंकि उक्त श्रुति प्रतिपादित आत्मत्व अमृतत्व आदि धर्मोकी परमात्मामें ही उपपत्ति होती है । ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतत् ब्रह्मेति । तद्यद्यप्यस्मि-न्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति ' ( छा ० ४/१५/१ ) इत्यादि श्रूयते । तत्र संशयः--किमयं प्रतिबिम्बात्माऽक्ष्यधिकरणो निर्दिश्यते, अथवा विज्ञानात्मा, उत देवतात्मेन्द्रियस्या-धिष्ठाता, अथवेश्वर इति । किं तावत्प्राप्तम्? छायात्मा पुरुषप्रतिरूप इति । कुतः? तस्य दृश्यमानत्वप्रसिद्धेः । य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते ' इति च प्रसिद्धवदुपदेशात् । विज्ञानात्मनो वाऽयं निर्देश इति युक्तम् । स हि चक्षुषा रूपं पश्यंश्चक्षुषि संनिहितो भवति । आत्मशब्द-श्वास्मिन्पक्षेऽनुकूलो भवति । आदित्यपुरुषो वा चक्षुषोऽनुग्राहकः प्रतीयते; ' रश्मिभिरेषोऽस्मि -न्प्रतिष्ठित ’: ( बृ ० ५।५।२ ) इति श्रुतेः, अमृतत्वादीनां च देवतात्मन्यपि कथंचित्संभवात् । समान अविद्या विषयक ही कर्तृत्वादि व्यवहार दिखलाती है । और ' यत्र त्वस्य ० ' ( परन्तु जहाँ इसके लिए सब आत्मा हो गया है वहाँ किससे किसको देखे ) इत्यादिसे यह श्रुति ब्रह्मवित् कर्तृत्वादि व्यवहारका अभाव दिखलाती है ॥ १२ ॥
' य एषोऽक्षिणि ० ' ( यह जो नेत्रमें पुरुष दिखाई देता है यह आत्मा है ऐसा कहा है यह अमृत, अभय और ब्रह्मस्वरूप है । उस पुरुष के स्थानरूपनेत्रमें यदि घृत वा जल डाले तो वह पलकोंमें ही चला जाता है ) इत्यादि श्रुति है । यहाँ संशय होता है कि नेत्र अधिकरणवाला यह क्या छायात्मा अथवा जीव या इन्द्रियके अधिष्ठाता देवता वा ईश्वरका निर्देश है । तो यहाँ क्या प्राप्त होता है? पूर्वपक्षी - पुरुषके प्रतिबिम्ब - छायात्माका निर्देश है, किससे? इससे कि उसका दृश्यमानत्व प्रसिद्ध है । और ' य एषोऽक्षिणि ० ', ( नेत्रमें यह जो पुरुष दिखाई देता है ) इसप्रकार प्रसिद्ध के समान उपदेश भी है । अथवा जीवात्मा विषयक यह निर्देश युक्त है, क्योंकि वह चक्षुसे रूपको देखता हुआ नेत्रमें सन्निहित ( सम्बन्धित ) होता है । इस पक्ष में श्रुति निर्दिष्ट आत्मशब्द भी अनुकूल संगत होता है । अथवा नेत्रेन्द्रियका अनुग्राहक आदित्य पुरुष प्रतीत होता है, क्योंकि ' रस्मिभिरेषोऽस्मिन् ० ' ( किरणोंके द्वारा यह सूर्य नेत्रमें प्रतिष्ठित है ) ऐसी श्रुति है । और अमृतत्व आदिका देवतात्मामें यथाकथंचित् संभव भी है । परन्तु सत्यानन्दी - दीपिका कठवल्ली वाक्य ही इस अधिकरणका विषयवाक्य है । ऐसा सिद्ध होता है । इसलिए जीव और परमेश्वर इन दोनोंका यहाँ ग्रहण करना युक्त है, जीव और जड़ बुद्धिका नहीं है ॥ १२ ॥
* छान्दोग्योपनिषद् के चतुर्थ अध्यायमें उपकोसलविद्याका प्रकरण है । उसमें सत्यकाम जाबालने. कमलके पुत्र उपकोसलको ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते ' इस श्रुतिसे चाक्षुषपुरुषका उपदेश दिया. है । इस चाक्षुष पुरुषको लेकर संशय होता है कि चाक्षुषपुरुषसे किसका ग्रहण करना युक्त है । क्योंकि छाया, जीव, देवता तथा परमेश्वरके लिङ्ग यहाँ उपलब्ध होते हैं । जैसे गत अधिकरणमें ' ऋतं पिबन्तौ ' इसमें प्रथम श्रुत चेतनत्व के अनुसार चरमश्रुत गुहाप्रवेश आदि लिये गये हैं; वैसे
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१६८ ब्रह्मसूत्र -- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ नेश्वरः, स्थानविशेष निर्देशादित्येवं प्राप्ते ब्रूसः । परमेश्वर एवाक्षिप्यभ्यन्तरः पुरुष इहोपदिष्टइति । करमात्? उपपत्तेः । उपपद्यते हि परमेश्वरे गुणजात मिहोपदिश्यमानम् । आत्मत्वं तावन्मुरयया कृत्या परमेश्वर उपपद्यते ' स आत्मा तत्त्वमसि ' इति श्रुतेः । अमृतत्वा-भयत्वे च तरिमकस कृती श्रयेते । तथा परमेश्वरानुरूपमेतदक्षिरथानम् । यथा हि परमेश्वरः सर्वदोषैरलिप्तः अपहतपारमत्वदिश्रवणात्ः तथाऽक्षि स्थानं सर्वलेपरहितम्प-दिष्टं, ' तद्यद्यप्यरिमन्सपिवेदिकं वा सिञ्चति वर्मनी एव गच्छति ' इति श्रुतेः । संयद्वामत्यादिगुणो-पदेशश्च तरिमन्वव रूपते । ' एतं संग्रहाम इत्याचक्षते, एतं हि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति ' । एष उ एव वामनीरेष हि सर्वाणि वामानि नयति ' । ' एष उ एव भामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति ' ( छा ०
४/१५/२, ३, ४ ) इति च । अत उपपत्तेरन्तरः परमेश्वरः ॥१३ ॥
स्थानादिव्यपदेशाच्च ॥ १४ ॥
पदच्छेद- स्थानादिव्यपदेशात्, च । सूत्रार्थ - और ' यच्चक्षुषि तिष्ठन् ' ध्यानके लिए इसप्रकार स्थान आदिके कथनसे सर्वगत परमेश्वका अक्षिस्थान भी हो सकता है । अत: ' य एषोऽक्षिणि ' यहाँ अक्षिपुरुष परमेश्वर ही है! कथं पुनराकाशवत्सर्वगतस्य ब्रह्मणोऽक्ष्य पं स्थानमुपपद्यत इति? अत्रोच्यते भवे-देषाऽनवक्लप्तिः, यद्येतदेवैकं स्थानमस्य निर्दिष्टं भवेत् । सन्ति हन्यान्यपि पृथिव्यादीनि स्थानान्यस्य निर्दिष्टानि - ' यः पृथिव्यां तिष्टन् ' ( कृ ० ३।७।३ ) इत्यादिना । तेषु हि चक्षुरपि स्थान विशेषके निर्देशसे सर्वगत ईश्वरका ग्रहण सम्भव नहीं है । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर हम कहते हैं - चक्षुके अभ्यन्तर पुरुष शब्दसे यहाँ परमेश्वर ही उपदिष्ट है, किससे? इससे कि प्रतिपादित गुणोंको उसमें उपपत्ति होती है | श्रुतिमें उपदिश्यमान गुण समूह परमेश्वर में ही घटते हैं । ' स आत्मा तत्व-मसि ' ( वह आत्मा है वही तू है ) इस श्रुतिसे उपदिष्ट आत्मत्व मुख्यवृत्तिसे परमेश्वरमें उपपन्न होता है । अमृतत्व और अभयत्व श्रुतिमें परमेश्वरके लिए वार - वार सुने जाते हैं । इसीप्रकार यह अक्षिस्थान परमेश्वर के अनुरूप है । अपहतपाप्मत्व - पापरहितत्व आदिके श्रवणसे जैसे परमेश्वर सब दोषोंसे अलिप्त है, वैसे अक्षिस्थान भी सब लेपोंसे रहित उपदिष्ट है, क्योंकि ' तद्यद्यप्य ० ' ( यदि नेत्रमें घृत या जल डाले तो वह पलकों में ही चला जाता है ) ऐसी श्रुति है । ' एतं संयद्वाम ०, ' ( इसको ' संय-द्वाम ' ऐसा कहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण सेवनीय वस्तुएँ सब ओरसे इसे ही प्राप्त होती हैं ) ' एष उ एव ० ' ( निश्चय यही वामनी है, क्योंकि यही सब प्राणियों के पुण्य फलोंको वहन करता है ) और एप उ एच ० ' ( निश्चय यही अक्षिपुरुष भामनी है; क्योंकि आदित्य, चन्द्र आदिरूपसे यही सब लोकोंमें प्रकाशित होता है ) इसप्रकार संद्वामत्व आदि गुणों का उपदेश भी उस परमेश्वरमें हो उपपन्न होता है, इस उपपत्ति से अक्षि अभ्यन्तर पुरुष परमेश्वर ही है ॥ १३ ॥
आकाशके समान सर्वगत ब्रह्मका नेत्ररूप अल्पस्थान किस प्रकार हो सकता है? इसपर कहते हैं- यदि उस ब्रह्मका यही एक स्थान निर्दिष्ट होता तो यह अनुपपत्ति होती । परन्तु यः पृथिव्यां तिष्टन् ० ' ( जो पृथ्वीमें रहकर पृथ्वीका नियमन करता है, जिसको पृथ्वी भी नहीं जानती ) इत्यादिसे पृथ्वी आदि अन्य स्थान भी उसके लिए निर्दिष्ट हैं । उन स्थानोंमें ' यश्चक्षुषि तिष्ठन् ० ' ( जो चक्षु में सत्यानन्दी - दीपिका ही यहाँ भी ' दृश्यते ' इस लौकिक दर्शनसे छायापुरुषकी अवगति के अनुसार चरमश्रुत अमृतत्व आदि भी ध्यानके लिए लेने चाहिएँ । इसप्रकार दृष्टान्तसंगति से पूर्वपक्ष है । पूर्वपक्षमें छायात्मा उपास्य है और सिद्धान्त ब्रह्म उपास्य है ॥ १३ ॥
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अधि ० ४ सू ० १५ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १६ ९ निर्निम - ' यश्चक्षुपि तिष्टन् ' इति । ' स्थानादिव्यपदेशात् ' इत्यादिग्रहणेनैतदर्शयति- न केवलं स्थानमेवैकमनुचितं ब्रह्मणो निर्दिश्यमानं दृश्यते, किं तर्हि? नामरूपमित्येवं जातीय-कमप्यनामरूपस्य ब्रह्मणोऽनुचितं निर्दिश्यमानं दृश्यते - ' तस्यादिति नाम ', हिरण्यश्मश्रुः ' ( छा ० १२६७,६ ) इत्यादि । निर्गुणमपि सद्द्ब्रह्म नामरूपगतैर्गुणैः सगुणमुपासनार्थं तत्र तत्रोपदिश्यत इत्येतदयुक्तमेव । सर्वगतस्यापि ब्रह्मण उपलब्ध्यर्थं स्थानविशेषो न विरुध्यते, शालग्राम इव विष्णोरित्येतदप्युक्तमेव ॥१४ ॥
सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १५ ॥
पदच्छेद - सुखविशिष्टाभिधानात्, एव, च । सूत्रार्थ -- और ' प्राणो ब्रह्म, कं ब्रह्म, खं ब्रह्म ' इस श्रुतिमें सुख विशिष्ट ब्रह्मका अभिधान है, इससे भी ' य एषोऽक्षिण पुरुषो दृश्यते ' यह नेत्रके अभ्यन्तर पुरुष परमात्मा ही है । * अपि च नैवात्र विवदितव्यम् - किं ब्रह्मास्मिन्वाक्येऽभिधीयते न वेति । सुख-विशिष्टाभिधानादेव ब्रह्मत्वं सिद्धम् । सुखविशिष्टं हि ब्रह्म यद्वाक्योपक्रमे प्रक्रान्तं ' प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म ' इति, तदेवेहाभिहितं; प्रकृतपरिग्रहस्य न्याय्यत्वात् । ' आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता ' ( छा ० ४। १४ । १ ) इति च गतिमात्राभिधानप्रतिज्ञानात् । कथं पुनर्वाक्योपक्रमे सुखविशिष्टं ब्रह्म विज्ञायत इति? उच्यते - ' प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्मखं ब्रह्म ' इत्येतदग्नीनां वचनं श्रुत्वोपकोसल रहता हुआ ) इसप्रकार चक्षुका भी निर्देश है । ' स्थानादिव्यपदेशात् ' इस सूत्र में ' आदि ' पदके ग्रहणसे सूत्रकार यह दिखलाते हैं कि ब्रह्मका निर्दिश्यमान केवल एक ही अनुचित स्थान नहीं दिखाई देता, किन्तु ' तस्योदिति नाम ' ( उसका ' उत् ' ऐसा नाम है अर्थात् सर्वपापोंसे रहित होनेसे परमात्मा-को ' उत् ' कहा गया है ) और ' हिरण्यश्मश्रुः ' ( सुवर्णके समान दाढ़ी मूँछवाला ) इत्यादिसे नाम और रूपसे रहित ब्रह्मका इस प्रकारका निर्दिश्यमान अनुचित नाम, रूप आदि भी दिखाई देता है । ब्रह्म निर्गुण है तो भी नाम तथा रूपगत गुणोंसे सगुणका उपासना के लिए स्थल स्थलपर उपदेश किया जाता है, यह कहा जा चुका है । जैसे उपासना के लिए विष्णुका शालग्राममें उपदेश विरुद्ध नहीं है, वैसे सर्वव्यापक ब्रह्मका भी उपलब्धिके लिए विशेष स्थानमें उपदेश विरुद्ध नहीं है । यह भी पीछे कहा जा चुका है ॥ १४ ॥
और ' य एषोऽक्षिण पुरुषो दृश्यते ' इस वाक्यमें ब्रह्मका अभिधान है अथवा नहीं, इस विषयमें विवाद नहीं करना चाहिए, क्योंकि सुख विशिष्ट के अभिधानसे ही ब्रह्मत्व सिद्ध है । ' प्राणो ब्रह्म ० ' ( प्राण ब्रह्म है, कं ब्रह्म है, खं ब्रह्म है ) इस प्रकार वाक्यके उपक्रममें जो सुखविशिष्ट ब्रह्म प्रस्तुत है उसका ही [ ' य एषोऽक्षिणि ' ] यहाँ अभिधान है, क्योंकि प्रकृतका ग्रहण करना ही उचित है अर्थात् श्रुत्युक्त प्रकृतवाचक ' य: ' शब्द से प्रकृत ब्रह्मका ही ग्रहण करना उचित है । ' आचार्यस्तु ० ' ( आचार्य तुझे [ इनके फलकी प्राप्तिका ] मार्ग बतलायेंगे ) इस प्रकार गतिमात्र के अभिधानकी अग्नियोंने प्रतिज्ञा की है । तो फिर वाक्यके आरम्भ में सुख विशिष्ट ब्रह्मका विज्ञान कैसे होता है? इसपर कहते हैं –‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म ० ' ( प्राण ब्रह्म है, कं ब्रह्म है, खं ब्रह्म है ) इस प्रकार अग्नियोंका यह वचन सुनकर उपकोसलने कहा - ' विजानाम्यहं ० ' ( सूत्रात्मा - प्राण बृहत् होनेसे ब्रह्म है, यह मैं जानता सत्यानन्दी - दीपिका * सिद्धान्ती प्रकरणको लेकर विवादका निराकरण करते हैं—- सुखविशिष्ट ब्रह्म ही ' य एषोऽ-क्षिणि पुरुषो दृश्यते ' इस श्रुतिस्थ सर्वनाम ' य: ' पदसे प्रतिपादित है । अत: नेत्रस्थ पुरुष ब्रह्म ही है । परन्तु प्रकरणसे प्रबल दृश्यत्व लिङ्गसे एवं ' य एष ' इस सर्वनाम पदसे नेत्रस्थ पुरुषशब्दसे छायात्मा-का ही यहाँ ग्रहण करना चाहिए? ऐसा नहीं, क्योंकि उपकोसलके प्रति अग्नियोंके उपदेशसे छायात्मा-
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१७० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ उवाच - ' विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म, कंच खं च तु न विजानामि ' इति । तत्रेदं प्रतिवचनम् -' यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कम् ' ( छा ० ४ | १० | ५ ) इति । तत्र खंशब्दो भूताकाशे निरूढो लोके । यदि तस्य विशेषणत्वेन कंशब्दः सुखवाची नोपादीयेत । तथा सति केवले भूताकाशे ब्रह्मशब्दो नामादिष्विव प्रतीकाभिप्रायेण प्रयुक्त इति प्रतीतिः स्यात् । तथा कंश-ब्दस्य विषयेन्द्रिय संपर्कजनिते सामये सुखे प्रसिद्धत्वात्, यदि तस्य खंशब्दो विशेषणत्वेन नोपादीयेत, लौकिकं सुखं ब्रह्मेति प्रतीतिः स्यात् । इतरेतरविशेषितौ तु कखंशब्दौ सुखा-त्मकं ब्रह्म गमयतः । तत्र द्वितीये ब्रह्मशब्देऽनुपादीयमाने कं खं ब्रह्मेत्येवोच्यमाने कंशब्दस्य विशेषणत्वेनैवोपयुक्तत्वात्सुखस्य गुणस्याध्येयत्वं स्यात्, तन्मा भूदित्युभयोः कखंशब्दयो-ब्रह्मशब्दशिरस्त्वं ' कं ब्रह्म खं ब्रह्म ' इति । * इएं हि सुखस्यापि गुणस्य गुणिवद्धयेयत्वम् । तदेवं वाक्योपक्रमे सुखविशिष्टं ब्रह्मोपदिष्टम् । प्रत्येकं च गार्हपत्यादयोऽग्नयः स्वं स्वं महि-हूँ, किन्तु कं और खं को नहीं जानता अर्थात् विषय और इन्द्रियके संयोगजन्य सुख और खं - भूता-काश ये दोनों अनित्य और जड़ होनेसे किस प्रकार ब्रह्म रूप हैं यह मैं नहीं जानता ) अब इसका यह उत्तर है - ' तद्वाव कं ० ' ( निश्चय जो ' क ' - सुख है वही ' खं ' - आकाश है और जो ' खं ' है वही ' कं ' है ) इस श्रुतिमें निर्दिष्ट ' खं ' शब्द भूताकाशमें रूढ़ है, यह लोक प्रसिद्ध है । यदि उसके विशेषण-रूपसे सुखवाची ' कं ' शब्दका ग्रहण न करें तो नाम आदि प्रतीकोंमें जैसे ब्रह्मका प्रयोग है, वैसे ही प्रतीकके अभिप्राय से केवल भूताकाशमें ब्रह्म शब्द प्रयुक्त है, ऐसी प्रतीति होगी । इसी प्रकार विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे जन्य सदोष सुखमें ' कं ' शब्दकी प्रसिद्धि होनेके कारण यदि उसके विशेषण-रूपसे ' खं ' शब्दका ग्रहण न करें तो लौकिक सुख ब्रह्म है, ऐसी प्रतीति होगी । परन्तु परस्पर एक दूसरेसे विशेषित हुए ' कं ' और ' खं ' शब्द सुखात्मक ब्रह्मकी ही प्रतीति कराते हैं । उसमें यदि ' कं ' शब्दके उत्तर द्वितीय ब्रह्म शब्दका ग्रहण न करें केवल ' कं खं ब्रह्म ' इतना ही कहें तो ' कं ' शब्दका विशेषणरूपसे ही उपयोग ( खं निष्ठ भूतत्वकी व्यावृत्ति करके चरितार्थ ) होने के कारण गुणभूत सुख ध्येय नहीं होगा । ऐसा न हो, इसलिए दोनों ' कं ' और ' खं ' शब्दोंके उत्तर ' ब्रह्म ' शब्दका ' कं ब्रह्म ' ' खं ब्रह्म ' इस प्रकार प्रयोग किया गया है । गुणरूप सुखका भी गुणी ब्रह्मके समान ध्यान करना अभीष्ट है । इसलिए वाक्यके आरम्भ में वही सुख विशिष्ट ब्रह्म उपदिष्ट है । और गार्हपत्य आदि अग्नियोंमें से प्रत्येक अपनी - अपनी महिमाका उपदेश कर ' एष सोम्य ० ' ( हे सोम्य! यह अपनी विद्या और आत्मविद्या हमने तुमसे कही ) इस प्रकार उपसंहार करती हुई पहले ब्रह्मका निर्देश है ऐसा सत्यानन्दी - दीपिका की प्रतीति नहीं होती है । उन्होंने तो नित्य सुखरूप ब्रह्मका ही उपदेश किया है । छाया तो जड़ और अनित्यत्वादि दोषोंसे युक्त है, इसलिए चक्षुस्थ पुरुषसे परमेश्वरका ही ग्रहण करना युक्त है । * उपकोसलका उपाख्यान इस प्रकार है - ' उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्म-चर्यमुवास ' ( छा ० ४।१०।१ ) ( कमलका पुत्र उपकोसल सत्यकाम जाबालके यहाँ ब्रह्मचर्यं ग्रहणकर रहता था ) उसने बारह वर्षतक आचार्य द्वारा स्थापित अग्नियोंकी सेवा की । आचार्यने अन्य ब्रह्मचारियोंका तो समावर्तन संस्कार कर दिया, किन्तु केवल इसीका नहीं किया । विना उपदेश किये आचार्य बाहर चले गये । उपकोसलने मानसिक खेदसे अनशन व्रत किया । उसकी सेवासे प्रसन्न हुई अग्नियोंने मिलकर उसे उपदेश किया ' प्राणो ब्रह्मकं ब्रह्म खं ब्रह्म ' ( प्राण ब्रह्म है, कं ब्रह्म है, खं ब्रह्म है ) तब उपकोसलने कहा, ' विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म ० ' तब वे बोले- जो ' कं है ' वही ' खं ' है और जो ' खं ' है वही ' कं ' है । फिर गार्हपत्यने उपदेश किया - ' पृथ्वी, अग्नि, अन्न और आदित्य ये मेरे चार शरीर - विभूतियाँ हैं, आदित्यके भीतर जो यह पुरुष दिखाई देता है वह मैं हूँ । ' अन्वाहार्यपचन - दक्षि-
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अधि ० ४ सू ० १६ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित १७१ मानमुपदिश्य ' एषा सोम्य तेऽस्मद्विद्यात्मविद्या च ' इत्युपसंहरन्तः पूर्वत्र ब्रह्म निर्दिष्टमिति ज्ञाप-यन्ति । ' आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता ' इति च गतिमात्राभिधानप्रतिज्ञानमर्थान्तरविवक्षां वारयति । ' यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते ' ( छा ० ४। १४ । ३ ) इति चाक्षि-स्थानं पुरुषं विजानतः पापेनानुपघातं ब्रुवन्नक्षिस्थानस्य पुरुषस्य ब्रह्मत्वं दर्शयति । तस्मा-त्प्रकृतस्यैव ब्रह्मणोऽक्षिस्थानतां संयद्वामत्वादिगुणतां चोक्त्याऽर्चिरादिकां तद्विदो गतिं वक्ष्यामीत्युपक्रमते - ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाच ' ( छा ० ४।१५।१ ) इति ॥ १५ ॥
श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ॥ १६ ॥
पदच्छेद- श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानात् च । सूत्रार्थ - और ' अथोत्तरेण तपसा ' इस प्रकार श्रुति और स्मृतिमें सगुण ब्रह्मकी उपासनाका अनुष्ठान करनेवालेकी जो गति अभिहित है वही गति - मार्ग नेत्रस्थ पुरुषको जाननेवालेकी है । अतः अक्षिस्थ पुरुष परमेश्वर ही है । इतश्चाक्षिस्थानः पुरुषः परमेश्वरः, यस्माच्छुतोपनिषत्कस्य श्रुतरहस्यविज्ञानस्य ब्रह्म-विदो या गतिर्देवयानाख्या प्रसिद्धा श्रुतौ - ' अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मान-ज्ञापन कराती हैं ' आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता ' ( आचार्य तो तुझे गति कहेंगे ) गति मात्र अभिधानकी प्रतिज्ञा अन्यार्थको विवक्षाका निवारण करती है अर्थात् आत्मविद्याके फलमात्र अभिधानकी प्रतिज्ञा परमात्मासे भिन्न छायात्माकी विवक्षाका निषेध करती है । ' यथा पुष्करपलाश ० ' ( जैसे कमलपत्र जलसे सम्बन्धित नहीं होता उसी प्रकार जैसे ब्रह्मका मैं उपदेश करूँगा उसे जाननेवालों में पाप कर्मका सम्बन्ध नहीं होता ) इस प्रकार श्रुति अक्षिस्थ पुरुषको जाननेवालेमें पाप सम्बन्धका निषेध करती हुई अस्थि पुरुष ब्रह्मत्व दिखलाती है । ' य एषोऽक्षिणि ० ' ( यह जो नेत्रमें पुरुष दिखाई देता है वह आत्मा है ऐसा कहा ) इससे आचार्य प्रकृत ब्रह्मके ही अक्षिस्थानत्व और संयद्वामत्व आदि गुणों को कहकर उसके जाननेवालेके लिए अर्चि आदि गतिको कहूंगा, ऐसा उपक्रम करते हैं ॥ १५ ॥
इस हेतुसे भी नेत्रस्थ पुरुष परमेश्वर ही है, क्योंकि जिसने उपनिषद् सुना है अर्थात् जिसने सगुण ब्रह्मकी उपासना की है, उस सगुण ब्रह्म उपासक की जो देवयान नामक गति - ' अथोत्तरेण ० ' ( शरीर पातानन्तर स्वधर्मरूप तप, ब्रह्मचर्यं श्रद्धा और विद्यासे आत्माकी खोज करते हुए [ ध्यान कर वे ] उत्तर मार्गके द्वारा आदित्य लोकको प्राप्त होते हैं । यही प्राणोंका आश्रय है, यही अमृत है, सत्यानन्दी - दीपिका णाग्निने उपदेश दिया- ' जल, दिशा, नक्षत्र और चन्द्रमा ये मेरे चार शरीर हैं, चन्द्रमामें जो यह पुरुष दिखाई देता है ' वह मैं हूँ ' । अनन्तर आहवनीय अग्निनेउपदेश किया - ' प्राण, आकाश, द्युलोक और विद्युत् ये मेरे चार शरीर हैं । यह जो विद्युत् में पुरुष दिखाई देता है ' वह मैं हूँ ' इस प्रकार तीनों अग्नियोंने अपनी - अपनी विद्याका उपदेश कर कहा – हे उपकोसल! यह तुझे हमने अपनी - अपनी विद्याका उपदेश किया और हम तीनोंने मिलकर ' प्राणो ब्रह्मकं ब्रह्मखं ब्रह्म ' इस आत्मविद्याका उपदेश किया और आगे उन्होंने कहा कि आचार्यं तुझे गतिका उपदेश करेंगे । उपकोसलसे सारा समाचार ज्ञात होनेपर आचार्य बोले - हे उपकोसल! ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाच ' इस प्रकार आचार्यने उपकोसलको ब्रह्मतत्त्वका उपदेश किया । इस परिस्थितिमें अग्नियाँ ब्रह्मका ' उपदेश करें और आचार्य छायात्माका उपदेश करे यह सर्वथा असंगत है । क्योंकि अग्नियों और आचार्यके उपदेशमें एकवाक्यता प्रतीत होती है । वक्ताके भेदसे अर्थका भेद नहीं होता, अतः अक्षिस्थ पुरुष परमात्मा ही है ॥ १५ ॥
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१७२ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ मन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्ते ' ( प्रश्न ० १।१० ) इति स्मृतावपि --- ' अग्निज्र्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ' ( गीता ० ८।२४ ) इति 1 । सैवेह । क्षिपुरुषविदोऽभिधीयमाना दृश्यते । ' अथ यदु चैवास्मिञ्छय्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेवामिसंभवन्ति ' इत्युपक्रम्य, * ' आदित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते ( छा ० ४ । १५/५ ) इति । तदिह ब्रह्मविद्विषया प्रसिद्धया गत्या IS क्षि-स्थानस्य ब्रह्मत्वं निश्चीयते ॥ १६ ॥
अनवस्थितेरसंभवाच्च नेतरः ॥ १७ ॥
- पदच्छेद -- अनवस्थिते:, असम्भवात्, च, न, इतरः । सूत्रार्थ - ( अनवस्थिते: ) सर्वदा स्थिति न होने से ( च ) और ( असम्भवात् ) अमृतत्वादि गुणोंके असम्भव होनेसे ( इतर: ) ब्रह्म भिन्न छायात्मा आदि अक्षिस्थ पुरुष ( न ) नहीं हो सकते । तत्पुनरुक्तं छायात्मा, विज्ञानात्मा, देवतात्मा वा स्यादक्षस्थान इति । अत्रोच्यते-न छायात्मादिरितर इह ग्रहणमर्हति । कस्मात्? अनवस्थितेः । न तावच्छायात्मनश्चक्षुषि यही अभय है और यही परमगति है, इसको पाकर फिर नहीं लौटते ) इस श्रुतिमें तथा ' अग्निर्ज्यो-तिरह: ० ' ( अग्नि, शुक्ल पक्ष, षट्मास उत्तरायण नामक ये देवता हैं । मरणानन्तर इन देव-ताओंके मार्गसे जानेवाले ब्रह्मोपासक पुरुष ब्रह्मको प्राप्त होते हैं ) इस स्मृति में भी प्रसिद्ध है । ' अथ यदु ० ' ( उपासकके देहपातानन्तर उसके पुत्र - बान्धवादि और्ध्वदेहिक [ शव - संस्कार ] करें अथवा न करें, दोनों दशाओंमें यह उपासक उपासना की महिमासे अर्चि - अभिमानी देवताको ही प्राप्त होता है ) इस प्रकार उपक्रम कर ' आदित्याच्चन्द्रमसं ० ' ( आदित्य से चन्द्रमाको 2 चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होता है | वहाँसे अमानव पुरुष इन उपासकोंको कार्य ब्रह्म के पास पहुँचाता है, यह देवपथ ही ब्रह्मपथ है । इस मार्गसे जानेवाले उपासक इस मानव मण्डलमें नहीं लौटते ) इसप्रकार यहाँ नेत्रस्थ पुरुषको जानने वालोंकी भी वही कही गई गति देखी जाती है जो ब्रह्मोपासक के लिए निर्दिष्ट गति है । इससे यहाँ ऐसा निश्चय होता है कि ब्रह्मविषयक प्रसिद्ध गति से अक्षिस्थ पुरुष परमेश्वर ही है ॥ १६ ॥
अस्थि पुरुष छायात्मा, विज्ञानात्मा अथवा देवतात्मा है, ऐसा जो कहा गया है । उसपर कहते हैं --- परमेश्वरसे भिन्न छायात्मादिका यहाँ ग्रहण करना युक्त नहीं है । किससे? इससे कि उनकी अनव-स्थिति है । प्रतिबिम्बरूप छायाका चक्षुमें नित्य अवस्थान सम्भव नहीं है । जब कोई पुरुष नेत्रके पास आ जाता है तब नेत्रमें पुरुषकी छाया दिखाई देती है । उसके हट जानेपर नहीं दिखाई देती । सत्यानन्दी - दीपिका * अर्चि ( अग्नि ) देवतासे अहर् ( दिन ) देवताको, अहरू से शुक्लपक्ष, शुक्लपक्षसे उत्तरायण, उत्तरायणसे संवत्सर, संवत्सर से देवलोक, पश्चात् वायु, आदित्य, चन्द्र, विद्युत् लोकमें उपासकोंके पहुँचने पर ब्रह्मलोकसे अमानव पुरुष आकर उन्हें ब्रह्मलोक पहुँचाता है । अचिरादि देवोंकी पर-म्परासे विशिष्ट यह मार्ग देवपथ कहलाता है । गन्तव्य ब्रह्म के साथ यह मार्ग सम्बन्ध रखता है, इस-लिए यह ब्रह्मपथ भी कहलाता है । इस कार्यं ब्रह्मको प्राप्त करनेवाले उपासक मनु सृष्टिमें पुन: लौट कर नहीं आते, क्योंकि वहाँपर हिरण्यगर्भके द्वारा उन्हें ' मैं ब्रह्म हूँ ' ऐसा ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान प्राप्त होता है । ब्रह्माके साथ वहाँ रहकर महाप्रलयमें उसके साथ वे भी मुक्त हो जाते हैं । यथा ' ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ' ( मुण्ड ० ३ | २ | ६ ) इसलिए सगुण ब्रह्मोपासकोंके लिए प्रसिद्ध अर्चिरादि मार्गकी जो प्राप्ति कही गई है, वही गति नेत्रस्थ पुरुषको जानने वालोंके लिए कही गई है ॥ १६ ॥
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अधि ० ४ सू ० १७ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १७३ नित्यमवस्थानं संभवति । यदैव हि कश्चित्पुरुषश्चक्षुरासीदति तथा चक्षुषि पुरुषच्छा या दृश्यते, अपगते तस्मिन्न दृश्यते । ' य एषोऽक्षिणि पुरुषः ' इति च श्रुतिः संनिधानात्स्वचक्षुषि दृश्यमानं पुरुषमुपास्यत्वेनोपदिशति । न चोपासना काले छायाकरं कंचित्पुरुपं चक्षुः समीपे संनिधाप्यो-पास्त इति युक्तं कल्पयितुम् । ' अस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति ' ( छा ० ८ / ९ | १ ) इति श्रुति-श्छायात्मनोऽप्यनवस्थितत्वं दर्शयति । * असंभवाच्च तस्मिन्नमृतत्वादीनां गुणानां न छाया-त्मनि प्रतीतिः । तथा विज्ञानात्मनोऽपि साधारणे कृत्स्नशरीरेन्द्रियसंबन्धे सति चक्षुष्येवा-वस्थित्वं वक्तु ं न शक्यम् । ब्रह्मणस्तु व्यापिनोऽपि दृष्ट उपलब्ध्यर्थो हृदयादिदेशविशेष-संबन्धः । समानश्च विज्ञानात्मन्यप्यमृतत्वादीनां गुणानामसंबन्धः । यद्यपि विज्ञानात्मा परमात्मनोऽनन्य एव, तथाप्यविद्याकामकर्मकृतं तस्मिन्मर्त्यत्वमध्यारोपितं भयं चेत्यमृतत्वा-भयत्वे नोपपद्येते । संयद्वा मत्वादयश्चैतस्मिन्ननैश्वर्यादनुपपन्ना एव । देवतात्मनस्तु ' रश्मि-मिरेषोऽस्मिन्प्रतिष्ठितः ' इति श्रुतेर्यद्यपि चक्षुष्यवस्थानं स्यात्तथाप्यात्मत्वं तावन्न संभवति; पराग्रूप-त्वात् । अमृतत्वादयोऽपि न संभवन्ति; उत्पत्तिप्रलयश्रवणात् । अमरत्वमपि देवानां चिर-कालावस्थानापेक्षम् । ऐश्वर्यमपि परमेश्वरायत्तं न स्वाभाविकम् ' भीषाऽस्माद्वातः पवते भीषो-' य एषोऽक्षिणि पुरुषः ' यह श्रुति सन्निहित होनेपर अपने नेत्र में दिखायी देनेवाले पुरुषका उपास्यरूपसे उपदेश करती है । उपासना के समय प्रतिबिम्बके कारणीभूत किसी पुरुषको नेत्रके पास बैठाकर उपासना करे ऐभी कल्पना करना युक्त नहीं है । ' अस्यैव शरीरस्य ० ' ( इसी शरीरके नाशानन्तर यह नष्ट हो जाती है ) इसप्रकार यह श्रुति छायात्माकी अनवस्थिति दिखलाती है । ' असम्भवात् ० ' अमृतत्वादि गुणों के असम्भव होनेसे अक्षिस्थपुरुष छायात्मा नहीं है, क्योंकि अमृतत्वादि गुणोंकी उस छायात्मामें प्रतीति नहीं होती विज्ञानात्माकी केवल चक्षुमें ही उसमें उपलब्र्थं हृदयादि देश विज्ञानात्मामें भी समान है । कर्मसे उसमें मरण और भय होते । संयद्वामत्वादि गुण भी द्वारा यह उसमें प्रतिष्ठित है ) । उसीप्रकार सम्पूर्ण शरीरेन्द्रियके साथ समान सम्बन्ध होनेपर भी अवस्थिति है, ऐसा नहीं कहा जा सकता । ब्रह्म सर्वव्यापी है, तो मी विशेषका सम्बन्ध देखा गया है । और अमृतत्वादि गुणोंका असम्भव यद्यपि विज्ञानात्मा परमात्मासे अनन्य ही है तो भी अविद्या काम अध्यारोपित हैं, इसलिए उसमें अमृतत्व और अभयत्व उपपन्न नहीं ऐश्वर्यके अभाव से उसमें अनुपपन्न ही हैं । ' रश्मिभिरेषो ० ' ( किरणों इस श्रुतिसे यद्यपि देवात्माकी नेत्रमें अवस्थिति हो सकती है, तो भी उसमें आत्मत्व संभव नहीं है, क्योंकि पराग्रूप बाह्य - अनात्मरूप है । उसमें अमृतत्व आदिका भी संभव नहीं है, कारण कि उसके उदय और प्रलय श्रुतिमें कहे गये । देवताओंमें अमृतत्व भी उनके चिर-काल अवस्थितिकी अपेक्षासे । उनका ऐश्वर्यं भी परमेश्वर के अधीन है स्वाभाविक नहीं है, क्योंकि ' मीषास्माद्वातः पवते ० ' ( इस परमेश्वरके भयसे वायु चलता है, इसीके भय से सूर्य उदित होता है सत्यानन्दी -दीपिका. * प्रथम विकल्पका प्रतिषेधकर अब द्वितीय विकल्प - जीवका ' तथा ' आदिसे प्रतिषेध करते 1 जैसे नेत्रवाले पुरुषको ' मैं हूँ ' इस प्रकारका ज्ञान होता है, वैसे जन्मान्त्र पुरुषको भी होता है । यदि जीवात्माका नेत्र ही स्थान माना जाता तो जन्मान्ध पुरुषको ' मैं हूँ ' ऐसा ज्ञान कदापि नहीं होता, अतः नेत्रको जीवात्माका स्थान मानना युक्त नहीं है । इसप्रकार छायात्मा और जीवात्मा अक्षिस्थ पुरुष नहीं हैं । * ' चक्षोः सूर्योऽजायत ' ' सूर्योऽस्तमेति ' ( चक्षुसे सूर्य उत्पन्न होता है, सूर्य अस्त होता है ) इत्यादि श्रुति देवतात्मा - सूर्यके उदय और अस्तको कहती है, और वह अनात्मा है । अत: अक्षिस्थ पुरुष देवता नहीं हो सकता, किन्तु परमेश्वर ही है । शंका- ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते ' यह श्रुति
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१७४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ देति सूर्यः । भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ' ( तै ० २।८ ) इति मन्त्रवर्णात् । तस्मा-त्परमेश्वर एवायमक्षिस्थानः प्रत्येतव्यः । अस्मिश्च पक्षे दृश्यत इति प्रसिद्धवदुपादानं शास्त्राद्यपेक्षं विद्वद्विषयं प्ररोचनार्थमिति व्याख्येयम् ॥ १७ ॥
( ५ अन्तर्याम्यधिकरणम् सू ० १८-२० ) अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १८ ॥
पदच्छेद - अन्तर्यामी, अधिदेवादिषु " तद्धर्मव्यपदेशात् । सूत्रार्थ - ( अधिदैवादिषु ) ' यः पृथिव्यां तिष्ठन् ' इस प्रकार अधिदैवादि में प्रतिपादित ( अन्तर्यामी ) नियामक परमेश्वर ही है, ( तद्धर्मोपदेशात् ) क्योंकि अमृतत्व आदि उसके धर्मोका व्यपदेश है । * ‘ य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयति ' इत्युपक्रम्य श्रूयते-' यः पृथिव्यां तिष्टन्पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ' ( बृह ० ३।७।१, २ ) इत्यादि । अत्राधिदैवतमधिलोकमधिवेदमधियज्ञम-धिभूतमध्यात्मं च कश्चिदन्तरवस्थितो यमयिताऽन्तर्यामीति श्रूयते । स किमधिदैवाद्यभि-मानी देवतात्मा कश्चित्, किंवा प्राप्ताणिमाद्यैश्वर्यः कश्चिद्योगी, किंवा परमात्मा, किंवाड-र्थान्तरं किंचिदित्यपूर्व संज्ञादर्शनात्संशयः । किं तावन्नः प्रतिभाति? संज्ञाया अप्रसिद्धत्वात्सं-तथा इसीके भयसे अग्नि और इन्द्र अपना अपना कार्य करते हैं और पाँचवाँ मृत्यु भी इसके भयसे गतायु लोगोंके पास दौड़ता है ) ऐसा मन्त्र है । अतः यह समझना चाहिए कि अक्षिस्थ पुरुष परमेश्वर ही है । इस पक्षमें ' दृश्यते ० ' ( दिखायी देता है ) यह लौकिक प्रसिद्धकी तरह ग्रहण शास्त्रकी अपेक्षासे है । विद्वद्विषयक है अथवा प्ररोचनार्थक है ऐसी व्याख्या करनी चाहिए ॥ १७ ॥
' य इमं च लोकं ० ' ( ( जो इस लोकका और परलोकका और सब प्राणियोंका भीतर रहकर नियमन करता है ) इस प्रकार उपक्रम कर ' यः पृथिव्यां तिष्ठन् ० ' ( जो पृथ्वीमें रहकर पृथ्वी के भीतर है जिसे पृथ्वी नहीं जानती, जिसका शरीर पृथ्वी है, जो भीतर रहकर पृथ्वीका नियमन करता है यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ) इत्यादि श्रुति कहती है । यहाँ अधिदैव, अधिलोक, अधिवेद, अधियज्ञ, अधिभूत और अध्यात्मके अन्तर रहकर इन सबका नियमन करनेवाला कोई अन्तर्यामी है, ऐसा श्रुति कहती है । वह क्या अधिदैवादिका अभिमानी कोई देवतात्मा है, अथवा अणिमादि ऐश्वर्यको प्राप्त किया हुआ कोई योगी है, अथवा परमात्मा है, अथवा कोई दूसरा ही पदार्थ है? ' अन्तर्यामी ' इस अपूर्व नामके श्रवणसे ऐसा संशय होता है । अतः यहाँ हमें क्या प्रतीत होना चाहिए? सत्यानन्दी -दीपिका ईश्वरमें ' दृश्यते ' इस पदसे ' घटो दृश्यते ' आदिके समान दृश्यत्वका प्रतिपादन करती है जो सर्वथा अयुक्त है, क्योंकि वह अदृश्य है? समाधान - प्रसिद्ध घट आदि लौकिक दर्शनोंकी तरह ' दृश्यते ' यह पद ईश्वरका ज्ञान नहीं कराता, अपितु शास्त्रीय तथा विद्वानोंकी अनुभवकी अपेक्षा करके कराता है अर्थात् उपलब्धिका नाम यहाँ दर्शन है । शास्त्रीयदर्शनका कारण शास्त्र ही होता है । अतः अज्ञानी पुरुषोंकी अभिरुचि के लिए विद्वानोंमें प्रसिद्ध शास्त्रीय दर्शनको ' दृश्यते ' यह पद प्रसिद्ध लौकिक दर्शनकी तरह अनुवाद करता है, इसलिए विरोध नहीं है । अतः अक्षिस्थ पुरुष परमेश्वर ही है । ' य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाच ' इसप्रकार यह उपकोसल विद्यावाक्य उपास्य ब्रह्म में समन्वित होता है ॥ १७ ॥
* पूर्व अधिकरणमें ईश्वरका चक्षु स्थान है इस बातको सिद्ध करनेके लिए दृष्टान्तरूपसे ईश्वरके पृथिव्यादि स्थान मी निर्दिष्ट किये गये हैं - वे दृष्टान्त वाक्य ईश्वरपरक कैसे हैं? ऐसा आक्षेप कर समाधान किया जाता है । इसलिए पूर्व अधिकरणसे इस अधिकरणकी आक्षेपसंगति है ।
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अधि ०५ सू ० १८ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १७५ शिनाप्यप्रसिद्धेनार्थान्तरेण केनचिद्भवितव्यमिति । अथवा नानिरूपितरूपमर्थान्तरं शक्य-मस्तीत्यभ्युपगन्तुम् । अन्तर्यामिशब्दश्चान्तर्यमनयोगेन प्रवृत्तो नात्यन्तमप्रसिद्धः । तस्मा-त्पृथिव्याद्यभिमानी कश्चिदेवोऽन्तर्यामी स्यात् । तथा च श्रूयते - ' पृथिव्येव यस्यायतनमग्नि-र्लोको मनो ज्योतिः ' ( बृ ० ३।९ ।१० ) इत्यादि । स च कार्यकरणवत्त्वात्पृथिव्यादीनन्तस्तिष्ठ-न्यमयतीति युक्तं देवतात्मनो यमयितृत्वम् । योगिनो वा कस्यचित्सिद्धस्य सर्वानुप्रवेशेन यमयितृत्वं स्यात्, नतु परमात्मा प्रतीयते, अकार्यकरणत्वादित्येवं प्राप्त इदमुच्यते - योऽन्त-र्याम्यधिदैवादिषु श्रूयते, स परमात्मैव स्यान्नान्य इति । कुतः? तद्धर्मव्यपदेशात् । तस्य हि परमात्मनो धर्मा इह निर्दिश्यमाना दृश्यन्ते । पृथिव्यादि तावदधिदैवादिभेदभिन्नं समस्तं विकारजातमन्तस्तिष्ठन्यमयतीति परमात्मनो यम यितृत्वं धर्म उपपद्यते; सर्वविकारकारणत्वे सति सर्वशक्तयुपपत्तेः । ' एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः ' इति चात्मत्वामृतत्वे मुख्ये परमात्मन उपपद्येते । ' यं पृथिवी न वेद ' इति च पृथिवीदेवताया अविज्ञे यमन्तर्यामिणं ब्रुवन्देवतात्म-नोऽन्यमन्तर्यामिणं दर्शयति । ' पृथिवी देवता ह्यहमस्मि पृथिवीत्यात्मानं विजानीयात् ' । तथा ' अदृष्टोऽश्रुतः ' इत्यादिव्यपदेशो रूपादिविहीनत्वात्परमात्मन उपपद्यत इति । यत्त्वकार्यक-रणस्य परमात्मनो यमयितृत्वं नोपपद्यत इति । नैष दोषः, यान्नियच्छति तत्कार्यकरणैरेव ' अन्तर्यामी ' नामके अप्रसिद्ध होनेसे अन्तर्यामी नामी भी कोई एक अप्रसिद्ध अन्य पदार्थ होना चाहिए । अथवा जिसका निरूपण नहीं किया गया है ऐसा कोई दूसरा पदार्थ है यह स्वीकार नहीं किया जा सकता । ' अन्तर्यामी ' शब्द तो ' अन्तर्नियमन ' इस व्युत्पत्तिसे प्रवृत्त है, इसलिए अत्यन्त अप्रसिद्ध नहीं है । इसलिए पृथ्वी आदिका अभिमानी कोई एक देवता अन्तर्यामी होना चाहिए । और इसी प्रकार ' पृथिव्येव यस्यायतन ' ( पृथ्वी जिसका आश्रय है और अग्नि नेत्र है, मन- संकल्प ज्योति है ) इत्यादि श्रुति है । वह कार्य करणवाला होनेसे पृथिव्यादिके अन्दर स्थित होकर उनका नियमन करता है, इसलिए देवतात्मा यमयिता हो यह युक्त है । अथवा कोई सिद्ध योगी सर्वानुप्रवेशके द्वारा यमयिता होना चाहिए । परन्तु कार्यं ( शरीर ) करण ( इन्द्रिय ) रहित होने से ' अन्तर्यामी ' पदसे परमात्मा प्रतीत नहीं होता । सिद्धान्ती - ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहते हैं-- अधिदैव आदिमें जो अन्तर्यामिरूपसे सुना जाता है वह परमात्मा ही है दूसरा नहीं, किससे? इससे कि उसके धर्मोका व्यपदेश है । निश्चय ही यहाँ उस परमात्मा के ही निर्दिश्यमान धर्मं देखे जाते हैं । अधिदैवादि भेदसे भिन्न पृथिव्यादि समस्त विकार समुदायके भीतर रहकर उनका नियमन करता है, यह नियमनकर्तृत्व धर्म परमात्मामें ही उपपन्न होता है, क्योंकि वह सब विकारोंका कारण है, इसलिए उसमें सम्पूर्ण शक्तियाँ उपपन्न होती हैं । ' एष त आत्मा ० ' ( यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी और अमृत है ) इस श्रुतिमें निर्दिष्ट मुख्य आत्मत्व और अमृतत्व परमात्मामें ही युक्त हैं । ' यं पृथिवी न वेद ' ( जिसको पृथ्वी अभिमानी देवता नहीं जानता ) यह श्रुति पृथ्वी अभिमानी देवतासे अविज्ञेय अन्तर्यामीको कहकर देवतासे भिन्न अन्तर्यामीको दिखलाती है । यदि पृथ्वीका अधिष्ठातृ देवता ही ' अन्तर्यामी ' हो तो ' मैं पृथ्वी हूँ ' - इस प्रकार अपनेको जानता । उसी प्रकार ' अदृष्टोऽश्रुतः ' ( वह अदृष्ट और अश्रुत है ) इत्यादि व्यपदेश रूपादि रहित होनेसे परमात्मामें ही युक्त है । शरीर और इन्द्रिय रहित परमात्मामें सत्यानन्दी दीपिका ‘ अन्तर् यमयतीति अन्तर्यामी ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार यह ' अन्तर्यामी ' शब्द अनेकोंमें प्रयुक्त होता है । इसलिए संशय होता है कि ' अन्तर्यामी ' शब्दसे किसका ग्रहण किया जाना युक्त है । * नियन्ता शरीर आदिवाला होता है, यह लोक दृष्टिसे कहा गया है । वास्तवमें तो चेतनकी सत्ता मात्रसे जो जड़का व्यापार है वही नियमन है । नियमन शक्तिवाला होनेसे नियन्ता है । यह
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१७६ ब्रह्मसूत्र- शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ तस्य कार्यकरणवत्वोपपत्तेः । तस्याप्यन्यो नियन्तेत्यनवस्थादोषश्च न संभवति भेदाभा-वात् । भेदे हि सत्यनवस्थादोषोपपत्तिः । तस्मात्परमात्मैवान्तर्यामी ॥ १८ ॥
न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात् ॥ १ ९ ॥ पदच्छेदन, च, स्मार्तम्, अतद्धर्माभिलापात् । सूत्रार्थ - ( स्मार्तम् ) सांख्य स्मृति कल्पित प्रधान, ( न ) अन्तर्यामी नहीं हो सकता, ( अतद्ध-मिलापात् ) क्योंकि श्रुतिमें प्रधानसे भिन्न चेतननिष्ठ द्रष्टृत्व, श्रोतृत्व आदि धर्मोका अभिधान है । स्यादेतत् । अदृष्टत्वादयो धर्माः सांख्यस्मृतिकल्पितस्य प्रधानस्याप्युपपद्यन्ते; रूपा-दिहीनतया तस्य तैरभ्युपगमात् । ' अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ' ( मनु ० १।५ ) इति हि स्मरन्ति, तस्यापि नियन्तृत्वं सर्वविकारकारणत्वादुपपद्यते । तस्मात्प्रधानमन्तर्यामिशब्द स्यात् । ‘ ईक्षतेर्नाशब्दम् ' ( ब्र ० १ | १ | ५ ) इत्यत्र निराकृतमपि सत्प्रधानमिहादृष्टत्वादिव्यप-देशसंभवेन पुनराशङ्कयते । अत उत्तरमुच्यते - न च स्मार्त प्रधानमन्तर्यामिशब्द भवि तुमर्हति । कस्मात्? अतद्धर्माभिलापात् । यद्यप्यदृछ्रुत्वा दिव्यपदेशः प्रधानस्य संभवति, तथापि न द्रष्टत्वादिव्यपदेशः संभवतिः प्रधानस्याचेतनत्वेन तैरभ्युपगमात् । ' अदृष्टो द्रष्टाऽश्रुतः श्रोताऽमतो मन्ताऽविज्ञातो विज्ञाता ' ( बृह ० ३।७।२३ ) इति हि वाक्यशेष इह भवति । आत्मत्वमपि न प्रधानस्योपपद्यते ॥ १ ९ ॥ यदि प्रधानमात्मत्वद्रष्टृत्वाद्य संभवान्नान्तर्याम्यभ्युपगम्यते, शारीरस्तर्ह्यन्तर्यामी भवतु । शारीरो हि चेतनत्वाद् द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता च भवति; आत्मा च प्रत्यक्त्वात् । नियामकत्व नहीं हो सकता है ऐसा जो कहा गया है वह दोष नहीं है, क्योंकि जिनका वह नियमन करता है उनके शरीर और इन्द्रियोंसे ही वह शरीर और इन्द्रियोंवाला हो सकता है । उसका भी दूसरा नियन्ता हो, इस प्रकार अनवस्था दोष यहाँ सम्भव नहीं है । क्योंकि वस्तुतः भेदका अभाव है । भेद होनेपर ही अनवस्था दोषकी उपपत्ति होती है । इसलिए परमात्मा ही अन्तर्यामी है ॥ १ ९ ॥ यह ठीक है । परन्तु सांख्यशास्त्र से कल्पित प्रधानमें भी अदृष्टत्व आदि धर्मं उपपन्न होते हैं, क्योंकि सांख्यवादियोंने प्रधानको रूपादि रहित स्वीकार किया है । ' अतर्क्यम ० ' ( जो तर्कका विषय नहीं है, रूप आदि रहित होनेसे नेत्र आदि इन्द्रियोंका विषय नहीं है और जड़ होनेसे चारों दिशाओंमें व्याप्त है ) ऐसा स्मृतिकार भी कहते हैं । सब विकारोंका कारण होनेसे उसमें भी नियन्तृत्व युक्त होता है । इसलिए प्रधान ' अन्तर्यामी ' शब्द वाच्य है । ' ईक्षते ० ' इस सूत्र से यद्यपि प्रधानका निराकरण किया गया है, तो भी यहाँ ( अन्तर्यामिब्राह्मण में ) अदृष्टत्व आदि व्यपदेशका संभव होनेसे पुनः आशंका की जाती है । सिद्धान्ती — इसका उत्तर कहते हैं - सांख्यस्मृति प्रतिपादित प्रधान ' अन्तर्यामी ' शब्द वाच्य नहीं हो सकता है, किससे? इससे कि उसमें यद्यपि दृष्टत्व आदि धर्मोका व्यपदेश- कथन प्रधानमें संभव है, तो नहीं है, क्योंकि उन्होंने प्रधानको अचेतनरूपसे स्वीकार किया है । परन्तु द्रष्टा है, वह अश्रुत है परन्तु श्रोता है, अमत है परन्तु मन्ता
है ) ऐसा यहाँ वाक्यशेष है । प्रधानमें आत्मत्व भी उपपन्न नहीं है ॥
यदि आत्मत्व और द्रष्टृत्व आदि धर्मोके असंभव से अन्तर्यामी नहीं किया जाता तो शारीर अन्तर्यामी हो, क्योंकि जीव चेतन होनेसे सत्यानन्दी - दीपिका न रहने वाले धर्मोका कथन है । भी द्रष्टृत्व आदि व्यपदेश संभव ' अदृष्टो द्रष्टा ० ' ( वह अदृष्ट है है, अविज्ञाता है परन्तु विज्ञाता १ ९ ॥ शब्दसे प्रधानको स्वीकार - ग्रहण द्रष्टा श्रोता, मन्ता और विज्ञाता नियामकत्व अचिन्त्य मायाशक्ति विशिष्ट चिदात्मामें शरीरादिके विना ही उपपन्न है । यहाँ पूर्वपक्षमें देवता या योगी पुरुष उपास्य है और सिद्धान्तमें परमात्मा ॥ १८ ॥