श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) — पृष्ठ 211–220

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् (सत्यानन्दी-दीपिकया समलङ्कृतम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 211–220

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अधि ० ५ सू ० २० ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १७७ अमृतश्च, धर्माधर्मफलोपभोगोपपत्तेः । अदृष्टत्वादयश्च धर्माः शारीरे प्रसिद्धाः, दर्शनादि-क्रियायाः कर्तरि प्रवृत्तिविरोधात् । ' न दृष्टेष्टारं पश्येः ' ( वृ ० ३।४।२ ) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । तस्य च कार्यकरणसंघातमन्तर्य मयितुं शीलम्; भोक्तृत्वात् । तस्माच्छारीरोऽन्तर्यामी-त्यत उत्तरं पठति-शारीरभये s पि हि भेदेनैनमधीयते || २० || पदच्छेद – शारीरः, च, उभये, अपि, हि, भेदेन, एनम्, अधीयते । सूत्रार्थ - ( शारीरः ) जीव भी अन्तर्यामी नहीं है, ( हि ) यत: - क्योंकि ( उभयेऽपि ) काण्व और माध्यन्दिन शाखावाले भी अन्तर्यामीसे नियम्य होनेके कारण ( एनम् ) जीवको ( भेदेन ) अन्तर्यामी से भिन्न ( अधीयते ) कहते हैं । इसलिए अधिदैवादि श्रुतियोंमें प्रतीयमान अन्तर्यामी परमात्मा ही है | नेति पूर्वसूत्रादनुवर्तते । शारीरश्च नान्तर्यामीष्यते । कस्मात्? यद्यपि द्रष्टृत्वादयो धर्मास्तस्य संभवन्ति, तथापि घटाकाशवदुपाधिपरिच्छिन्नत्वान्न कात्स्न्येन पृथिव्यादि-ष्वन्तरवस्थातुं नियन्तुं च शक्नोति । अपि चोभयेऽपि हि शाखिनः काण्वा माध्यंदिनाश्चा-न्तर्यामिणो भेदेनैनं शारीरं पृथिव्यादिवदधिष्ठानत्वेन नियम्यत्वेन चाधीयते - ' यो विज्ञाने तिष्ठन् ( बृ ० ३।७।२२ ) इति काण्वाः । ' य आत्मनि तिष्टन् ' इति माध्यंदिनाः । ' य आत्मनि तिष्ठन् ' इत्यस्मिंस्तावत्पाठे भवत्यात्मशब्दः शारीरस्य वाचकः । ' यो विज्ञाने तिष्ठन् ' इत्यस्मिन्नपि पाठे विज्ञान शब्देन शारीर उच्यते । विज्ञानमयो हि शारीरः । तस्माच्छारीरादन्य ईश्वरोऽन्तर्या-मीति सिद्धम् । कथं पुनरेकस्मिन्देहे द्वौ द्रष्टारावुपपद्येते? यश्चायमीश्वरोऽन्तर्यामी यश्चाय-मितरः शारीरः । का पुनरिहानुपपत्तिः? ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' इत्यादि श्रुतिवचनं विरुध्येत । है, और प्रत्यक् - अभ्यन्तर होनेसे वह आत्मा भी है, और धर्म और अधर्मके फलोपभोगकी उपपत्ति से वह अमृत है अर्थात् नाशरहित होनेसे कर्मफलका उपभोग हो सकता है, अदृष्टत्व आदि धम भी जीवमें सुप्रसिद्ध हैं | क्योंकि ' न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्ये: ' ( बुद्धि परिणामरूप दृष्टिके द्रष्टाको तुम उस दृष्टिसे नहीं देख सकोगे ) इत्यादि श्रुतियोंसे दर्शन आदि क्रियाकी प्रवृत्तिका कर्ता में विरोध प्रतिपादित है अर्थात् दर्शनकर्ता दर्शनक्रियाका विषय नहीं होता है । शरीर और इन्द्रिय समूहका नियमन करना उसका स्वभाव है, क्योंकि वह भोक्ता है, इससे जीवात्मा ही अन्तर्यामी है । इसके उत्तरमें कहते हैं— इस सूत्र में ' न ' की पूर्वसूत्रसे अनुवृत्ति ( अध्याहार ) है । शारीर ( जीव ) का अन्तर्यामी होना इष्ट नहीं है, क्योंकि यद्यपि द्रष्टृत्वादि धर्म उसमें सम्भव हैं, तो भी घटाकाशके समान उसमें उपाधि-शरीरादिसे परिच्छिन्न होनेके कारण सब प्रकार से पृथिवी आदिके भीतर रहने की अथवा उनका नियमन करने की सामर्थ्य नहीं है । दूसरी बात यह भी है कि काण्व और माध्यन्दिन दोनों शाखावाले अन्तर्यामीसे भिन्नरूपसे जीवका पृथिवी आदिके समान अधिष्ठान ( आश्रय ) रूपसे एवं नियम्यरूपसे अध्ययन करते हैं । काण्व ' यो विज्ञाने तिष्ठन् ० ' ( जो विज्ञानमें रहकर ) और माध्यन्दिन ' य आत्मनि तिष्ठन् ॰ ' ( जो आत्मामें रहकर ) इसप्रकार अध्ययन करते हैं । ' य आत्मनि तिष्ठान् ० ' इस पाठमें तो आत्मशब्द जीवका वाचक है । ' यो विज्ञाने तिष्ठन् ' इस पाठमें मी विज्ञानशब्दसे शारीर ( जीव ) का कथन है, कारण कि शारीर विज्ञानमय है । इससे यह सिद्ध होता है कि शारीरसे भिन्न अन्तर्यामी ईश्वर है । परन्तु जो यह ईश्वर अन्तर्यामी और दूसरा जो यह शरीरादि संघातका स्वामी जीव ये दोनों द्रष्टा एक शरीरमें कैसे रह सकते हैं? यदि सिद्धान्ती कहे कि दोनों द्रष्टाओंके एक शरीरमें रहनेमें क्या अनु-पपत्ति है । पूर्वपक्षी— अनुपपत्ति यह है कि ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' ( इससे भिन्न द्रष्टा नहीं है ) इत्यादि श्रुति वचनोंसे विरोध होगा, क्योंकि श्रुति प्रकृत अन्तर्यामी से भिन्न द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता

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१७८ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ अत्र हि प्रकृतादन्तर्यामिणोऽन्यं द्रष्टारं श्रोतारं मन्तारं विज्ञातारं चात्मानं प्रतिषेधति । नियन्त्रन्तरप्रतिषेधार्थमेतद्वचनमिति चेत् - नः नियन्त्रन्तराप्रसङ्गादविशेषश्रवणाच्च । अत्रो-च्यते - अविद्याप्रत्युपस्थापितकार्य करणोपाधिनिमित्तोऽयं शारीरान्तर्यामिणोर्भेदव्यपदेशो न पारमार्थिकः । एको हि प्रत्यगात्मा भवति, न द्वौ प्रत्यगात्मानौ संभवतः । एकस्यैव तु भेद-व्यवहार उपाधिकृतः, यथा घटाकाशो महाकाश इति । ततश्च ज्ञातृज्ञेयादिभेदश्रुतयः प्रत्य-क्षादीनि च प्रमाणानि संसारानुभवो विधिप्रतिषेधशास्त्रं चेति सर्वमेतदुपपद्यते । तथा च श्रुतिः - ' यत्र हि द्वैतमिव मवति तदितर इतरं पश्यति ' इत्यविद्याविषये सर्व व्यवहारं दर्शयति । ' यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तात्केन कं पश्येत् ' इति विद्याविषये सर्व व्यवहारं वारयति || २० || ( ६ अदृश्यत्वाधिकरणम् सू ० २१-२३ ) अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ॥२१ ॥

पदच्छेद - अदृश्यत्वादिगुणकः, धर्मोक्तेः । सूत्रार्थ - ( अदृश्यत्वादिगुणक: ) ' यत्तददेश्यमग्राह्यम ' इत्यादि श्रुतिमें उक्त अदृश्यत्व आदि गुणवाला भूतयोनि परमात्मा ही है, प्रधानादि नहीं, ( धर्मोक्ते: ) क्योंकि ' य: सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि श्रुतिमें उसके धर्मोका ही कथन है । * ' अथ परा यया पादं नित्यं विभुं सर्वगतं इति श्रूयते । तत्र संशयः आत्माका निषेध करती है । कहो तो यह युक्त नहीं है, श्रवण भी नहीं है अर्थात् किया गया है, किन्तु अन्य तदक्षरमधिगम्यते ' ' यत्तदद्वेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः श्रोत्रं तदपाणि-सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीरा: ' ( मुण्ड ० १।१।५, ६ ) किमयमद्रे श्यत्वादिगुणको भूतयोनिः प्रधानं स्यात्, उत शारीरः, ईश्वरसे भिन्न दूसरे नियन्ताके प्रतिषेधके लिए यह वचन हैं । ऐसा यदि क्योंकि यहाँ दूसरे नियन्ताका प्रसंग नहीं है और किसी विशेष नियन्ताका ' नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ' इस श्रुतिमें साधारणरूपसे अन्य द्रष्टाका निषेध नियन्ताका निषेध नहीं किया गया है । सिद्धान्ती - इसपर कहते हैं - जीव और अन्तर्यामीका यह भेदव्यपदेश अविद्यासे उपस्थापित शरीर, इन्द्रियरूप उपाधिको अपेक्षासे है ' परमार्थतः नहीं है । वस्तुतः प्रत्यागात्मा एक ही है, दो प्रत्यागात्माओंका सम्भव नहीं है । एकमें ही भेदव्यवहार उपाधिकृत है । यथा घटाकाश और महाकाशमें उपाधिकृत भेद व्यवहार होता है । इस कल्पित उपाधिसे ज्ञाता, ज्ञेयकी भेद प्रतिपादिक श्रुतियाँ, प्रत्यक्षादि प्रमाण, संसारानुभव, विधि प्रतिषेध शास्त्र यह सब उपपन्न होते हैं । उसीप्रकार ' यत्र हि द्वैतमिव ० ' ( जहाँ द्वैत - सा होता है यहाँ स्वयं अन्य होकर अन्यको देखता है ) यह श्रुति अविद्या विषयमें सब व्यवहारोंको दिखलाती है । और ' यत्र त्वस्य सर्व ० ' ( जिस ज्ञानकालमें आत्मज्ञानीको सब आत्मा ही हो गया वहाँ कौन द्रष्टा किस करणसे किस विषयको देखे ) यह श्रुति विद्याविषयमें सब व्यवहारोंका निषेध करती है ॥ २० ॥

' अथ परा यया ० 3. ( अपर विद्याके कथनानन्तर अब परा विद्या कही जाती है जिससे वक्ष्य-माण विशेषण विशिष्ट उस अक्षरका ज्ञान प्राप्त होता है ) ' यत्तददेश्यम ० ' ( वह जो अदृश्य - ज्ञाने-न्द्रियका अविषय, अग्राह्य - कर्मेन्द्रियका अविषय, अगोत्र, अवर्ण - ब्राह्मणत्वादि जातिरहित अथवा शुक्लत्व आदि वर्णरहित, चक्षु और श्रोत्ररहित, अपाणिपाद - कर्मेन्द्रियरहित, नित्य, विभु, सर्वगत, सुसूक्ष्म, दुर्विज्ञेय, अविनाशी है, विद्वान् लोग भूतोंके कारणरूपसे उसे देखते हैं ) यह श्रुति है । यहाँ संशय होता है कि सत्यानन्दी - दीपिका * पूर्व अधिकरण में प्रधान विरोधी द्रष्टृत्व आदि धर्मोसे प्रधानमें अन्तर्यामित्वका निषेध किया गया है । परन्तु इस अधिकरण में विरोधी धर्मोके न होने और अदृश्यत्व आदि अनुकूल धर्मं होनेसे प्रधान भी भूतयोनि हो सकता है, इससे यहाँ प्रत्युदाहरणसंगति है ।

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अधि ० ६ सू ० २१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १७ ९ आहोस्वित्परमेश्वर इति । तत्र प्रधानमचेतनं भूतयोनिरिति युक्त; अचेतनानादेव तद्दृष्टान्त-त्वेनोपादानात् ।‘यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति । यथा सतः पुरुषा-स्केशलोमानि तथाऽक्षरात्संभवतीह विश्वम् ' ( मुण्ड ० १।१।७ ) इति । ननूर्णनाभिः पुरुषश्च चेतना-विह दृष्टान्तत्वेनोपात्तौ । नेति ब्रूमः । नहि केवलस्य चेतनस्य तत्र सूत्रयोनित्वं केशलोमयो-नित्वं वास्ति । चेतनाधिष्टितं ह्यचेतन मूर्णनाभिशरीरं सूत्रस्य योनिः " पुरुषशरीरं च केशलो-नामिति प्रसिद्धम् । अपि च पूर्वत्रादृष्टत्वाद्यभिलापसंभवेऽपि द्रष्टृत्वाद्यभिलापासंभवान्न प्रधानमभ्युपगतम् । इह त्वदृश्यत्वादयो धर्माः प्रधाने संभवन्ति । नचात्र विरुध्यमानो धर्मः कश्चिदभिलप्यते । ननु ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' ( मुण्ड ० १ | १ | ९ ) इत्ययं वाक्यशेषोऽचेतने प्रधाने न संभवति, कथं प्रधानं भूतयोनिः प्रतिज्ञायत इति । अत्रोच्यते- ' यया तदक्षरमधिगम्यते ' ' यत्तदद्देश्यम् ' इत्यक्षरशब्देना दृश्यत्वादिगुणकं भूतयोनिं श्रावयित्वा पुनरन्ते श्रावयिष्यति-‘ अक्षरात्परतः परः ' ( मुण्ड ० २।१२ ) इति । यत्र यः परोऽक्षराच्छ्रुतः, स सर्वज्ञः सर्ववित्सं-भविष्यति । प्रधानमेव त्वक्षरशब्द निर्दिष्टं भूतयोनिः । यदा तु योनिशब्दो निमित्तवाची, अदृश्यत्व आदि गुणवाला भूतयोनि क्या प्रधान है, या जीव है अथवा परमेश्वर? पूर्वपक्षी—- इन तीनोंमें से अचेतन प्रधान भूतयोनि हो यह युक्त है, क्योंकि जगत्के कारण भूतयोनि में अचेतनोंका ही दृष्टान्तरूपसे ग्रहण किया गया है । ' यथोर्णनाभि: ० ' ( जिस प्रकार मकड़ी जालेको बनाती और निगल जाती है, जैसे पृथ्वीमें औषधियाँ उत्पन्न होती हैं और जैसे जीवित पुरुषसे केश एवं लोभ उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार उस अक्षरसे यह सारा विश्व प्रकट होता है ) परन्तु मकड़ी और पुरुष इन दो चेतनोंका यहाँ दृष्टान्तरूपसे ग्रहण किया गया है । पू ० - यह नहीं, ऐसा हम कहते हैं— केवल चेतन ही यहाँ तन्तुका अथवा केश लोमका कारण नहीं है, किन्तु चेतनसे अधिष्ठित अचेतन मकड़ीका शरीर ही तन्तुका कारण है और पुरुष शरीर केश लोमोंका कारण है यह प्रसिद्ध है । किञ्च पूर्वाधि-करणमें अदृष्टत्व आदि धर्मोका कथन प्रधान में सम्भव होनेपर भी द्रष्टृत्व आदि धर्मोका कथन असम्भव होनेके कारण प्रधान स्वीकार नहीं किया गया, परन्तु यहाँ तो अदृश्यत्व आदि धर्मं प्रधानमें सम्भव हैं और किसी भी विरुद्ध धर्मका अभिधान नहीं है । यदि कहो कि ' य सर्वज्ञः सर्ववित् ' यह वाक्यशेष अचेतन प्रधानमें सम्भव नहीं है, तो प्रधान भूतयोनि ( सम्पूर्ण भूतोंका कारण ) है यह प्रतिज्ञा कैसे हो सकती है? उत्तरमें पूर्वपक्षी कहते हैं - ' यया तदक्षरमधिगम्यते ' ( जिससे वह अक्षर अधिगत- ज्ञात होता है ) ' यत्तदद्देश्यम् ' ( जो वह अदृश्य है ) इस प्रकार ' अक्षर ' शब्द से अदृश्यत्वादि गुण विशिष्ट भूतयोनिका श्रवण कराके अन्तमें पुन: श्रुति ' अक्षरात्परतः परः ' ( सबसे उत्कृष्ट उस अक्षर से भी जो उत्कृष्ट है ) इस प्रकार श्रवण करायेगी । इस मन्त्रमें जो अक्षरसे पर श्रुत है वह . सर्वज्ञ सर्ववित् हो सकेगा । ' अक्षर ' शब्दसे निर्दिष्ट भूतयोनि तो प्रधान ही है । यदि ' योनि ' शब्द निमित्तवाचक मानें तो शारीर ( जीवात्मा ) भी भूतयोनि हो सकता है, क्योंकि उसके धर्म अधर्मसे सत्यानन्दी - दीपिका * ' अक्षरात्परतः परः ' इस श्रुतिमें अपने कार्यकी अपेक्षा प्रधान पर ( श्रेष्ठ ) है और नष्ट . न होनेसे वह अक्षर है और प्रधानसे भी पर ( उत्कृष्ट ) परमेश्वर है, ऐसा प्रतिपादित है । वही सर्वज्ञ खोर सर्ववित् है । सर्वज्ञत्वादि धर्म अचेतन प्रधान में सम्भव नहीं हैं, किन्तु चेतन परमेश्वरमें ही सम्भव है, अतः प्रधानको भूतयोनि कहने में कोई दोष नहीं है । और योनि ( कारण ) शब्दको यदि निमित्त-कारण याची मानें तो जीव ही धर्माधर्मरूप अदृष्ट के द्वारा शरीर आदि कार्योंके प्रति निमित्तकारण सकता है, क्योंकि अदृष्टको भी कार्यमात्र के प्रति निमित्तकारण माना गया है । अतः ' योनि ' सबसे जीवका भी ग्रहण हो सकता है । इससे यहाँ भूतयोनि परमेश्वर नहीं है ।

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१८० ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ तदा शारीरोऽपि भूतयोनिः स्यात्, धर्माधर्माभ्यां भूतजातस्योपार्जनादिति । एवं प्राप्तेऽ भिधीयते - योऽयमदृश्यत्वादिगुणको भूतयोनिः स परमेश्वर एव स्यान्नान्य इति । कथमेत-दवगम्यते? धर्मोक्तः । परमेश्वरस्य हि धर्म इहोच्यमानो दृश्यते- ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इति । नहि प्रधानस्याचेतनस्य शारीरस्य वोपाधिपरिच्छिन्नदृष्टेः सर्वज्ञत्वं सर्ववित्त्वं वा संभवति । नन्वक्षरशब्द निर्दिष्टा भूतयोनः परस्यै वैतत्सर्वशत्वं सर्ववित्त्वं च न भूतयोनिविषयमित्युक्तम् । अत्रोच्यते - नैवं संभवति । यत्कारणं ' अक्षरात्संभवतीह विश्वम् ' इति प्रकृतं भूतयोनिमिह जायमान प्रकृतित्वेन निर्दिश्यानन्तरमपि जायमान प्रकृतित्वेनैव सर्वज्ञं निर्दिशति - ' यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ' इति । तस्मान्निर्देशसाम्येन प्रत्यभिज्ञायमानत्वात्प्रकृतस्यैवाक्षरस्य भूतयोनेः सर्वज्ञत्वं सर्ववित्त्वं च धर्म उच्यत इति गम्यते ' अक्षरात्परतः परः ' इत्यत्रापिन प्रकृताद्भूतयोनेरक्षरात्परः कश्चिदभिधीयते । कथ-मेतदवगम्यते? ' येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ' ( मुण्ड ० १।२।१३ ) इति भूत समूहकी सृष्टि होती है । सिद्धान्ती – ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं - अदृश्यत्वादि गुणवाला जो भूतोंका कारण है वह परमेश्वर ही है अन्य नहीं । यह कैसे जाना जाय? धर्मोक्त से । यहाँ ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इस वाक्यशेषसे परमेश्वरके ही धर्मं ( सर्वज्ञत्वादि धर्मं ) कहे हुए देखे जाते हैं । अचेतन प्रधानमें अथवा उपाधिसे परिच्छिन्न दृष्टिवाले जीव में सर्वज्ञत्व तथा सर्ववेत्तृत्व सम्भव नहीं हैं! परन्तु अक्षरशब्द से निर्दिष्ट भूतोंके भूतयोनिसे पर ( परमेश्वर ) में ही वह सर्वज्ञत्व, सर्ववैत्तृत्व है भूतयोनिमें नहीं अर्थात् सर्वज्ञत्व और सर्ववेत्तृत्व भूतयोनि विषयक नहीं हैं, ऐसा पीछे कहा गया है । इसपर कहते हैं - ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि ' अक्ष रसे यह विश्व उत्पन्न होता है ' इसप्रकार यहाँ प्रकृत भूतयोनिका उत्पद्यमान प्रपञ्चके प्रति कारणरूपसे निर्देश कर उसके आगे भी ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ० ' ( जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है, जिसका ज्ञानमय तप है, उससे यह कार्य ब्रह्म [ हिरण्यगर्भ ] और यज्ञदत्त देवदत्तादि नाम, शुक्ल नीलादिरूप और व्रीहि यव आदि अन्न उत्पन्न होता है ) इसप्रकार श्रुति उत्पद्यमान प्रपञ्चके प्रति कारणरूप से ही सर्वज्ञका निर्देश करती है । इससे प्रतीत होता है कि समान-निर्देशसे प्रत्यभिज्ञाका विषय होनेके कारण प्रकृत अक्षर भूतयोनिके ही सर्वज्ञत्व और सर्ववेत्तृत्व धर्म कहे गये हैं । यहाँपर भी प्रकृत भूतयोनि अक्षरसे पर कोई अभिहित नहीं है । यह कैसे जानते हो? ' येनाक्षरं ० ' ( जिस विद्यासे शिष्य सत्य और अक्षर पुरुषको जाने उस ब्रह्मविद्याको आचार्यं यथार्थ-सत्यानन्दी - दीपिका * ' संदिग्धे तु वाक्यशेषात् ' ( जिस अर्थ में सन्देह हो उसका निर्णय वाक्यशेषसे करना चाहिए ) इस न्यायसे सिद्धान्त कहते हैं - भूत योनि परमेश्वर ही है प्रधानादि नहीं, क्योंकि ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इस वाक्यशेषसे सर्वज्ञत्वादि धर्मं वस्तुतः परमेश्वर में ही घटते हैं, जड़ प्रधान अथवा अविद्या उपाधिविशिष्ट परिच्छिन्न अल्पज्ञ जीवमें नहीं । तथा ' अक्षरात् संभवतीह विश्वम् ' इस मुण्डकवाक्यसे शौनकके प्रति अंगिराने जायमान प्रपञ्चके प्रति कारणरूप भूतयोनिको कहकर आगे भी उत्पद्यमान प्रपञ्चका कारणरूप भूतयोनि शब्द से ही ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इत्यादि श्रुतिवाक्यसे सर्वज्ञ तथा सर्व-वितका वर्णन किया है । ' तथा अक्षरात् ' यहाँ जैसे अक्षररूप भूतयोनि में जगत्की कारणता प्रति-पादित है, वैसे ही ' यः सर्वज्ञः सर्ववित् ' इस मन्त्र में भी सर्वज्ञत्वादि विशिष्टमें जगत्को कारणता निर्दिष्ट है । इन दोनों वाक्योंमें समान निर्देश होनेसे भूतयोनिकी प्रत्यभिज्ञा होनेके कारण यह निश्चय होता है कि अक्षररूप भूतयोनिमें सर्वज्ञत्वादि धर्म निर्दिष्ट हैं, अतः सर्वज्ञ परमात्मा ही अक्षररूप भूतयोनि है । 8 तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योति-मिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ( मु ० १।११५ ) ( उनमें ॠग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद,

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अधि ० ६ सू ० २१ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित १८१ प्रकृत्य तस्यैवाक्षरस्य भूतयोनेरदृश्यत्वादिगुणकस्य वक्तव्यत्वेन प्रतिज्ञातत्वात् । कथं तर्हि ‘ अक्षरात्परतः परः ' इति व्यपदिश्यते? इति; उत्तरसूत्रे तद्वक्ष्यामः । अपि चात्र द्वे विद्ये वेदितव्ये उक्त - – ' परा चैवापरा च ' इति । तत्रापरामृग्वेदादिलक्षणां विद्यामुक्त्वा ब्रवीति-‘ अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ' इत्यादि । तत्र परस्या विद्याया विषयत्वेनाक्षरं श्रुतम् | यदि पुनः परमेश्वरादन्यददृश्यत्वादिगुणकमक्षरं परिकल्प्येत, नेयं परा विद्या स्यात् । परापर-विभागो ह्ययं विद्ययोरभ्युदयनिःश्रेयसफलतया परिकल्प्यते । नच प्रधानविद्या निःश्रेयसफला केनचिदभ्युपगम्यते | तिस्रश्च विद्याः प्रतिज्ञायेरन् त्वत्पक्षेऽक्षराद्भूतयोने परस्य परमा-त्मनः प्रतिपाद्यमानत्वात् । द्वे एव तु विद्ये वेदितव्ये इह निर्दिष्टे । ' कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं मवति ' ( मु ० १।१।३ ) इति चैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानापेक्षणं सर्वात्मके ब्रह्मणि विवक्ष्य-माणेऽवकल्प्यते, नाचेतन मात्रैकायतने प्रधाने, भोग्यव्यतिरिक्ते वा भोक्तरि । अपि च ' स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ' ( मुण्ड ० १ | १ | १ ) इति ब्रह्मविद्यां प्राधान्ये-नोपक्रम्य परापरविभागेन परां विद्यामक्षराधिगमनीं दर्शयंस्तस्या ब्रह्मविद्यात्वं दर्शयति । रूपसे कहे ) इसप्रकार प्रकृत भूतयोनि अदृश्यत्वादि गुणोंसे सम्पन्न अक्षर के वक्तव्यरूपसे प्रतिज्ञा की है अर्थात् इससे ज्ञात होता है कि भूतयोनि अक्षरसे पर कोई नहीं है । तब ' अक्षरात्परतः परः ' यह व्यपदेश कैसे किया जाता है? इसको अगले सूत्रमें कहेंगे । किंच यहाँ दो विद्याएँ जानने योग्य कही गई हैं- परा और अपरा । इनमें ऋग्वेदादिको अपराविद्या कहकर ' अथ परा यया ० ' ( अपरा के निरू-पणानन्तर परा विद्या कहते हैं, जिससे वह अक्षर अधिगत होता है ) इत्यादि कहते हैं । वहाँ पराविद्या के विषयरूपसे अक्षर सुना जाता है । यहाँ यदि परमेश्वरसे भिन्न अदृश्यत्वादि गुण विशिष्ट अक्षरकी कल्पना करें तो यह पराविद्या न होगी । निश्चय अभ्युदय और निःश्रेयसके फलकी अपेक्षा विद्याओं में यह परा और अपरा विभागकी कल्पना की गई है । प्रधानविद्या मोक्ष फलवाली है ऐसा किसीने भी स्वीकार नहीं किया है और तुम्हारे मतमें भूतयोनि अक्षरसे पर परमात्माका प्रतिपादन किया जाता है, इससे तुम्हें तीन विद्याओंकी प्रतिज्ञा करनी चाहिए । परन्तु यहाँ जानने योग्य दो ही विद्याएँ निर्दिष्ट हैं । ‘ कस्मिन्नु मगवो ० ' ( शौनक - हे भगवन्! किसको जाननेसे यह सब जाना जाता है? ) इस प्रकार एकके विज्ञानसे सर्वविज्ञानकी अपेक्षा सर्वात्मक ब्रह्मकी विवक्षा करनेपर सम्भव हो सकती है, अचेतन मात्रके एक आश्रय प्रधान अथवा भोग्यसे भिन्न भोक्ताको विवक्षा होनेपर सम्भव नहीं है । और ' स ब्रह्मविद्यां ० ' ( उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वाको समस्त विद्याओंकी आश्रयभूत ब्रह्मविद्याका उपदेश किया ) इसप्रकार ब्रह्मविद्याका प्रधानरूपसे आरम्भकर पर और अपरका विभागकर परा-विद्याको अक्षरका ज्ञान करानेवाली दिखलाते हुए वह ब्रह्मविद्या है ऐसा [ श्रुति ] दिखलाती है । सत्यानन्दी - दीपिका अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष यह अपरा है तथा जिससे उस अक्षर परमात्माका ज्ञान होता है वह परा है ) कर्म प्रतिपादक ऋग्वेदादिरूप अपरा विद्याका अभ्युदय ( स्वर्गादि ) फल अनित्य है, इसलिए उसकी निन्दाकर आचार्यने मोक्ष अभिलाषी योग्य शिष्यको ब्रह्मविषयक परा विद्याका उपदेश किया । ब्रह्मरूप नित्य मोक्ष फलको कहनेवाली विद्या पराविद्या और अनित्य स्वर्गादि फल प्रतिपादक विद्या अपराविद्या है । इस प्रकार फलभेदसे परा और अपरा विद्याका विभाग किया गया है । * एक ऋग्वेदादि रूप अपरा विद्या, दूसरी प्रधानविषयक विद्या, और तीसरी अक्षर भूतयोनिसे पर परमात्मविषयक विद्या, इस प्रकार तुम ( पूर्वपक्षी ) को तीन विद्याएँ माननी पड़ेंगी, जब कि श्रुतिमें दो का ही निर्देश है । जैसे ' कस्मिन्नु भगवो ' इस श्रुतिमें एकके विज्ञानसे जो सर्वं विषयक

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II ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ सा च ब्रह्मविद्यासमाख्या तदधिगम्यस्याक्षरस्याब्रह्मत्वे बाधिता स्यात् । * अपरर्वेदादि-लक्षणा कर्मविद्या ब्रह्मविद्योपक्रमे उपन्यस्यते ब्रह्मविद्याप्रशंसायै । ' प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म । एतच्छु यो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति ' ( मुण्ड ० १।२।७ ) इत्येवमादिनिन्दावचनात् । निन्दित्वा चापरां विद्यां ततो विरक्तस्य पर विद्याधिकारं दर्श-यति ' परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्स-मित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्टम् ' ( मुण्ड १२ १२ ) इति । * यत्तूक्तम् अचेतनानां पृथिव्यादीनां दृष्टान्तत्वेनोपादानाद्दान्तिकेनाप्यचेतनेन भूतयोनिना भवितव्यमिति । तदयुक्तम्; नहि दृष्टान्तदार्शन्तिकयोरत्यन्तं साम्येन भवितव्यमिति नियमोऽस्ति । अपि च स्थूलाः पृथिव्या-और उस विद्यासे अधिगम्य अक्षरको यदि ब्रह्म स्वीकार न करें तो उसका ' ब्रह्मविद्या ' यह नाम बाधित हो जायगा । ऋग्वेदादि अपरा कर्मविद्याका ब्रह्मविद्या के उपक्रममें ब्रह्मविद्याकी प्रशंसाके लिए उपन्यास किया गया है, क्योंकि ' प्लवा ह्येते अदृढा ० ' ( जिनमें [ ज्ञान बाह्य होनेसे ] अवर— निकृष्ट कर्म आश्रित कहा गया है वे [ सोलह ऋत्विक् तथा यजमान और यजमान पत्नी ] ये अठारह यज्ञरूप ( यज्ञके साधन ) अस्थिर एवं नाशवान् बतलाये गये हैं । जो मूढ ' यही श्रेय है ' इस प्रकार इनका अभिनन्दन करते हैं, वे फिर भी जरा मरणको प्राप्त होते रहते हैं ) इत्यादि निन्दाका कथन है | और ' परीक्ष्य लोकान् ० ' ( कर्मसे संपादित लोकोंकी परीक्षा कर ब्राह्मण निर्वेद [ वैराग्य ] को प्राप्त हो, क्योंकि संसारमें नित्य पदार्थ नहीं है और कृत - अनित्यसे प्रयोजन क्या है? अतः उस नित्य वस्तुका ज्ञान प्राप्त करने के लिए वह मुमुक्षु पुरुष हाथमें समिधा लेकर श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुके पास जावे ) यह श्रुति इस प्रकार अपराविद्याको निन्दा कर उससे विरक्त पुरुषका पराविद्या में अधिकार दिखलाती है । जो यह कहा गया है कि पृथ्वी आदि अचेतन पदार्थोंका दृष्टान्तरूपसे ग्रहण करनेपर दान्तिक भी अचेतन भूतयोनि होना चाहिए, वह ठीक नहीं है, क्योंकि दृष्टान्त और दाष्टन्तिकको सर्वांश में पूर्ण रूपसे समानता हो, ऐसा नियम नहीं है । स्थूल पृथ्वी आदि दृष्टान्तरूपसे ग्रहण किये गये हैं । सत्यानन्दी -दीपिका विज्ञानका प्रश्न किया गया है वह तो सर्वात्मक ब्रह्मके ग्रहण करनेसे ही संगत हो सकता है अ प्रधान आदि ग्रहण करनेसे नहीं, क्योंकि प्रधानके ज्ञानसे उसके कार्यमात्रका ज्ञान भले हो किन्तु उसके अकार्यभूत भोक्ता जीवोंका ज्ञान नहीं होगा, तथा जीवके ज्ञान होनेपर भी उसके अकार्यरूप भोग्यवर्गका ज्ञान नहीं होगा, इस प्रकार प्रधान तथा जीवके ज्ञान होनेपर सर्वविषयक ज्ञान न होनेके कारण एकके ज्ञानसे सर्व विषयक ज्ञानकी प्रतिज्ञा बाधित हो जायगी । इससे भूतयोनि ब्रह्म ही है । उद्गाता, प्रस्तोता, प्रतिहर्ता और सुब्रह्मण्य ये उद्गातृगण हैं । अध्वर्युं प्रतिप्रस्थाता, ष्ट और उन्नेता ये अध्वर्युगण हैं । होता, मैत्रावरुण, अच्छावाक और ग्रावस्तुत् ये होतृगण हैं । ब्रह्मा, ब्राह्मणच्छंसि, आग्निधर और पोता ये ब्रह्मगण हैं । ये १६ ऋतुमें यज्ञ करानेसे ऋत्विज कहलाते हैं | यज्ञ करनेवाला यजमान व उनकी पत्नी ये सब मिलकर १८ होते हैं । यज्ञके द्वारा निरूपितं होनेसे अथवा यज्ञका उनके द्वारा सम्पादन होने से इनको यज्ञरूप कहा गया है । ये यज्ञरूप कर्म कर और उसके अनित्य फलको पाकर प्रसन्न होते हैं । परन्तु श्रुति कर्म और कर्मफलकी निन्दाकर मोक्षकी साधनभूत पराविद्याका उपदेश करती है । इसलिए परब्रह्मविषयक विद्या पराविद्या है । * ' कार्य अपने उपादान कारणसे भिन्न नहीं, किन्तु अभिन्न ही होता है ' केवल इतने अंशको दिखलानेके लिए यहाँ पृथ्वी आदिका दृष्टान्तरूपसे ग्रहण किया गया है । किञ्चिद् समान अंशको लेकर दृष्टान्त दिये जाते हैं । कार्यं जगत् अपने उपादानकारण भूतयोनि अक्षर ब्रह्मसे भिन्न नहीं

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अधि ० ६ सू ० २२ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिकासहित १८३ दयो दृष्टान्तत्वेनोपात्ता इति न स्थूल एव दान्तिको भूतयोनिरभ्युपगम्यते । तस्माद-दृश्यत्वादिगुणको भूतयोनिः परमेश्वर एव ॥ २१ ॥

विशेषण भेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥ २२ ॥

पदच्छेद - विशेषणभेदव्यपदेशाभ्याम्, च, न, इतरौ । सूत्रार्थ -- ( विशेषणभेदव्यपदेशाभ्याम् ) विशेषण और भेदके व्यपदेश - कथनसे भूतयोनि परमात्मा है, ( च नेतरौ ) इतर जीव और प्रधान नहीं । इतश्च परमेश्वर एव भूतयोनिर्नेतरौ - शारीरः प्रधानं वा । कस्मात्? विशेषणभेदव्य-पदेशाभ्याम् । विशिनष्टि हि प्रकृतं भूतयोनिं शारीराद्विलक्षणत्वेन - ' दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः ' ( मुण्ड ० २।१।२ ) इति । नह्येतद्दिव्यत्वादिविशेषण-विद्याप्रत्युपस्थापितनामरूपपरिच्छेदाभिमानिनस्तद्धर्मान्स्वात्मनि कल्पयतः शारीरस्यो-पपद्यते । तस्मात्साक्षादौपनिषदः पुरुष इहोच्यते । तथा प्रधानादपि प्रकृतं भूतयोनिं भेदेन व्यपदिशति - ' अक्षरात्परतः परः ' इति । अक्षरमव्याकृतं नामरूपवीजशक्तिरूपं भूतसूक्ष्ममीश्व-राश्रयं तस्यैवोपाधिभूतं सर्वस्माद्विकारात्परो योऽविकारस्तस्मात्परतः पर इति भेदेन व्यप-देशात्परमात्मानमिह विवक्षितं दर्शयति । नात्र प्रधानं नाम किंचित्स्वतन्त्रं तत्त्वमभ्युपगम्य तस्माद्भेदव्यपदेश उच्यते । किं तर्हि? यदि प्रधानमपि कल्प्यमानं श्रुत्यविरोधेनाव्याकृतादि-इसलिए दान्तिक भूतयोनि मी स्थूल ही हो, ऐसा नहीं माना जा सकता । इस पूर्वोक्त रीतिसे अदृश्यत्वादि गुणवाला भूतयोनि परमेश्वर ही है ॥ २१ ॥

और इस हेतुसे भी परमेश्वर ही भूतयोनि है, अन्य दो जीव तथा प्रधान नहीं हैं, किससे? इससे कि विशेषण और भेदका व्यपदेश ( कथन ) है । ' दिव्यो ह्यमूर्तः ० ' ( वह अक्षर ब्रह्म निश्चय ही दिव्य, अमूर्त, पुरुष, बाहर - भीतर विद्यमान, अजन्मा, अप्राण, मनरहित, विशुद्ध एवं श्रेष्ठ अक्षरसे मी उत्कृष्ट है ) यह श्रुति प्रकृत भूतयोनिको जीवसे विलक्षणरूपसे विशेषित करती है । निश्चय ये दिव्य-त्वादि विशेषण अविद्यासे उपस्थापित नाम - रूप परिच्छिन्न में अभिमान करनेवाले और उनके जड़त्वादि धर्मोकी अपनेमें कल्पना करनेवाले जीवमें उपपन्न नहीं होते, इसलिए साक्षात् उपनिषद् प्रतिपाद्य पुरुष ही यहाँ कहा जाता है । इसीप्रकार ' अक्षरात्परतः परः ' यह श्रुति प्रधानसे भी प्रकृत भूतयोनिका भिन्नरूपसे व्यपदेश करती है । जो अव्याकृत नामरूप ( जगत् ) के कारणभूत ईश्वरकी शक्तिरूप है, जिसमें भूतोंके संस्कार विद्यमान हैं, चिन्मात्र ईश्वर जिसका आश्रय है, उसीका उपाधिभूत सर्व विकारसे परे जो अविकार -अक्षर है, उस परसे पर ईश्वर है । इसप्रकार श्रुति भेदसे व्यपदेश होने के कारण परमात्माको हो यहाँ विवक्षितरूपसे दिखलाती है । यहाँ प्रधान नामवाला कोई स्वतन्त्र पदार्थ मानकर उससे पृथक् ईश्वरका व्यपदेश है, ऐसा नहीं कहा गया है । तब क्या कहा गया है? यदि कल्प्यमान प्रधानकी श्रुतिके अविरोधसे अव्याकृत आदि शब्द वाच्यभूत सूक्ष्मरूपसे कल्पना की जाती सत्यानन्दी -दीपिका किन्तु अभिन्न है । ऐसा मानने पर एकके ज्ञानसे सबका ज्ञान होता है, यह प्रतिज्ञा भी सिद्ध हो सकती है, अतः अदृश्यत्व आदि गुणवाला परमेश्वर ही है ॥ २१ ॥

* जीव पक्षका खण्डनकर अब प्रधान पक्षका खण्डन करते हैं - ' कार्यात्मना प्रधीयते इति प्रधानम् ' ( कार्यरूपसे जो परिणामको प्राप्त हो वह प्रधान अर्थात् अज्ञान है ) यदि इस प्रकारकी कल्पना की जाय तो सिद्धान्तमें कोई विरोध नहीं है, क्योंकि इस अज्ञानसे भिन्न प्रधानमें कोई प्रमाण नहीं है । ' अश्नोति व्याप्नोति स्वविकारजातं इति अक्षरम् ' ( अपने विकार समूहको जो व्याप्त करे उसका नाम अक्षर है ) इससे अक्षर शब्दका अर्थ अविनाशी नहीं है किन्तु इस व्युत्पत्तिसे अनादि

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१८४ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ शब्दवाच्यं भूतसूक्ष्मं परिकल्प्येत, परिकल्प्यताम् । तस्माद्भेदव्यपदेशात्परमेश्वरो भूतयोनिरित्येतदिह प्रतिपाद्यते ॥ २२ ॥

कुतश्च परमेश्वरो भूतयोनिः -रूपोपन्यासाच्च ॥ २३ ॥

पदच्छेद - रूपोपन्यासात्, च । सूत्रार्थ - ' अग्निर्मूर्धा ' इत्यादि श्रुतिसे सर्वात्मकत्व के उपन्याससे भी भूतयोनि परमेश्वर ही है । * अपि च ' अक्षरात्परतः परः ' इत्यस्यानन्तरम् ' एतस्माज्जायते प्राणः ' इति प्राणप्रभृतीनां पृथिवी पर्यन्तानां तत्त्वानां सर्गमुक्त्वा तस्यैव भूतयोनेः सर्वविकारात्मकं रूपमुपन्यस्यमानं पश्याम: - ' अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्व-मस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ' ( मुण्ड २ | १ | ४ ) इति । तच्च परमेश्वरस्यैवोचितम्; सर्व-विकारकारणत्वात् । न शारीरस्य तनुमहिम्नः । नापि प्रधानस्यायं रूपोपन्यासः संभवति; सर्वभूतान्तरात्मत्वासंभवात् । तस्मात्परमेश्वर एव भूतयोनिर्नेतराविति गम्यते । * कथं पुन-भूतयोनेरयं रूपोपन्यास इति गम्यते? प्रकरणात्, ' एषः ' इति च प्रकृतानुकर्षणात् । भूतयोनिं हि प्रकृत्य ' एतस्माज्जायते प्राणः ' ' एष सर्वभूतान्तरात्मा ' इति वचनं भूतयोनिविषयमेव भवति । यथोपाध्यायं प्रकृत्यैतस्मादधीष्वैष वेदवेदाङ्गपारग इति वचनमुपाध्याय विषयं भवति, तद्वत् । है तो ऐसी कल्पना करो । इस भेदव्यपदेशसे भूतयोनि परमेश्वर ही है ऐसा यहाँ श्रुति और स्मृतिमें प्रतिपादन किया गया है ॥ २२ ॥

और परमेश्वर भूतयोनि कैसे है? और ' अक्षरात्परतः परः ' इसके अनन्तर ' एतस्माज्जायते प्राणः ' ( इस- अक्षरपुरुषसे प्राण उत्पन्न होता है ) इसप्रकार प्राणसे लेकर पृथिवी पर्यन्त सब तत्त्वोंकी सृष्टि कहकर उसी भूतयोनिके सर्वविकारात्मक उपन्यस्यमान ( कथनका विषय ) रूपको ' अग्निर्मूर्धा ० ' ( अग्नि- द्युलोक जिसका सिर है, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं, दिशाएँ श्रोत्र हैं, प्रसिद्ध वेद वाणी है, वायु प्राण है, विश्व हृदय है और जिसके चरणोंसे पृथिवी प्रकट हुई है अर्थात् पाद पृथिवी है, वह देव सब भूतोंका अन्तरात्मा है ) इस प्रकार हम देखते हैं । यह कथन परमेश्वरमें ही युक्त है, क्योंकि वह सब विकारोंका कारण है । अल्पमहिमावाले जीवात्मामें यह रूपोपन्यास संभव नहीं है । प्रधानमें भी यह रूपोपन्यास सम्भव नहीं है, क्योंकि इन दोनोंमें सर्वभूतान्तरात्मत्व सम्भव नहीं है । इससे ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर ही भूतयोनि है अन्य दो - शारीर और प्रधान भूतयोनि नहीं हैं । परन्तु यह कैसे ज्ञात हो कि यह भूतयोनिका रूपोपन्यास है? प्रकरणसे, क्योंकि ' एषः ' इसप्रकार प्रकृतका अनुकर्षण ग्रहण है । भूत-योनिको प्रस्तुतकर ‘ एतस्माज्जायते प्राणः ' ' एष सर्वभूतान्तरात्मा ' यह श्रुति वचन भूतयोनि विषयक ही है । जैसे उपाध्यायको प्रस्तुत ( उद्देश्य ) कर कहा गया ' एतस्मादधीष्व ' ' एष वेदवेदाङ्गपारगः ' ( उसके सत्यानन्दी - दीपिका अव्याकृतको यहाँ अक्षर कहा गया है । अक्षरशब्द वाच्य यह अव्याकृत माया ( अज्ञान ) परमात्माकी शक्ति ही जगत्का परिणामी उपादान है । यह माया शक्ति भी शक्तिमान् परमात्मामें आरोपित होनेसे मिथ्या है, इसलिए वस्तुतः सबका अधिष्ठान होकर परमात्मा ही भूतयोनि सिद्ध होता है || २२ || * वृत्तिकारके मतानुसार यह प्रश्न और प्रतिवचन है अर्थात् वृत्तिकार मत के अनुसार पहले सूत्रकी व्याख्या है । जैसें कोई ब्रह्मवित् सर्वात्मत्वकी विवक्षा से ' अहमन्नमहमन्नादः ' इसप्रकार साम गायन करता है, अपने में अन्नकी विवक्षासे नहीं, वैसे प्रकरणमें मी समझना चाहिए ।

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अधि ० ६ सु ० २३ ] भाषानुवाद - सत्यानन्दी - दीपिका सहित १८५ कथं पुनरश्यत्वादिगुणकस्य भूतयोनेर्विग्रहवद्रूपं संभवति? सर्वात्मात्वविवक्षयेद-मुच्यते, नतु विग्रहवत्त्वविवक्षयेत्यदोषः । ' अहमन्नमहमन्नादः ' ( तै ० ३।१०१६ ) इत्यादिवत् । * अन्ये पुनर्मन्यन्ते- नायं भूतयोने रूपोपन्यासः जायमानत्वेनोपन्यासात् । ' एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ' इति हि पूर्वत्र प्राणादि पृथिव्यन्तं तत्त्वजातं जायमानत्वेन निरदिक्षत् । उत्तरत्रापि च ' तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः ' इत्येवमादि ' अतश्च सर्वा ओषधयो रसाश्च ' इत्येवमन्तं जायमानत्वेनैव निर्देक्ष्यति । इहैव कथम-कस्मादन्तराले भूतयोने रूपमुपन्यसेत्? सर्वात्मत्वमपि सृष्टि परिसमाप्योपदेक्ष्यति -' पुरुष एवेदं विश्वं कर्म ' ( मुण्ड ० २।१।१० ) इत्यादिना । * श्रुतिस्मृत्यो त्रैलोक्यशरीरस्य प्रजापतेर्जन्मादि निर्दिश्यमानमुपलभामहे - ' हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । सदाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ' ( ऋ ० सं ० १० १२१1१ ) इति । पास अध्ययन करो, यह वेद और वेदाङ्गका पारंगत विद्वान् है ) यह वचन उपाध्याय विषयक होता है, वैसे ही । परन्तु अदृश्यत्व आदि गुणवाले भूतयोनिका मूर्तिमान रूप कैसे संभव है? सर्वात्मत्व की विवक्षासे यह कहा गया है विग्रहवत्त्व ( शरीरवाला ) की विवक्षासे नहीं, इसलिए दोष नहीं है । ' अहमन्नम ० ' ( मैं अन्न हूँ, मैं अन्न मक्षक हूँ ) इत्यादिके समान । पुनः दूसरे ऐसा मानते हैं— यह भूतयोनिका रूपोपन्यास नहीं है, क्योंकि इसका जायमानरूपसे उपन्यास है । ' एतस्माज्जायते प्राणः ' ( इस अक्षर पुरुषसे प्राण, मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल और विश्वको धारण करनेवाली पृथिवी उत्पन्न होती है ) इसप्रकार पूर्वमन्त्र में प्राणसे लेकर पृथिवी पर्यन्त तत्त्व समूहका जायमानरूपसे श्रुतिने निर्देश किया है । और आगे भी ' तस्मादग्निः ० ' ( सूर्य जिसकी समिधा है वह अग्नि- द्युलोक उस पुरुषसे उत्पन्न हुआ है ) यहाँसे लेकर ' अतश्च ० ' ( और इसीसे सम्पूर्ण ओषधियाँ और रस उत्पन्न हुए ) यहाँ तक जायमानरूपसे ही निर्देश करेगी । तो यहीं मध्यमें अकस्मात् विना कारण भूतयोनिका रूपोपन्यास कैसे किया? ' पुरुष एवेदं ० ' ( यह सारा प्रपच और कर्म पुरुष ही है ) इत्यादिसे श्रुति सृष्टिकी परिसमाप्तिकर सर्वात्मत्वका भी उपदेश करेगी । हम श्रुति और स्मृति में त्रिभुवन शरीरवाले प्रजापतिके निर्दिश्यमान जन्मादिको ' हिरण्यगर्भः ० ' ( पहले हिरण्यगर्भं उत्पन्न हुआ, उत्पन्न होकर वह भूतसमूहका एकमात्र अधिष्ठाता हुआ । उसने द्युलोक और पृथिवीको धारण किया उस एक प्रजापतिदेवकी हविसे परिचर्या करें ) इस प्रकार उपलब्ध करते हैं । इस श्रुतिस्थ ' समवर्तत ' सत्यानन्दी - दीपिका * सिद्धान्ती - वृत्तिकारका मत दिखाकर अब स्वाभिमतको ' अन्ये पुनर्मन्यन्ते ' आदिसे अभिव्यक्त करते हैं— ' एतस्माज्जायते प्राणः ' इत्यादि पूर्वमन्त्र तथा ' तस्मादग्निः ' इत्यादि उत्तर मन्त्र भी भूतयोनिसे सृष्टिका प्रतिपादन करते हैं । परन्तु मध्य में ' अग्निर्मूर्धा ' इत्यादि मन्त्र अकस्मात् भूतयोनिका रूपो-पन्यास कैसे करेगा? अर्थात् यह मन्त्र भी पूर्वोत्तर मन्त्रोंके समान भूतयोनिसे ही सृष्टिको कहता है । * पूर्वकल्पमें उत्कृष्ट उपासना और कर्मोंके समुच्चय अनुष्ठानसे इस कल्पमें सब प्राणियोंके व्यष्टि लिङ्गों में व्यापक, सब प्राणियोंके अन्तर्गत, एवं ज्ञानेन्द्रिय कर्मेन्द्रिय और प्राणात्मक समष्टिरूप लिङ्ग शरीर उत्पन्न होता है । लिङ्गशरीर सतरह तत्त्वोंका होता है -- जिसमें पांच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, मन और बुद्धि होते हैं । व्यष्टि और समष्टि भेदसे लिङ्गशरीर दो प्रकारका है । व्यष्टि लिङ्ग शरीरके अभिमानीको तैजस् और समष्टि लिङ्ग शरीराभिमानीको हिरण्यगर्भ सूत्रात्मा कहते हैं । सूत्रात्मा सम्पूर्ण व्यष्टि लिंगोंका अधिष्ठाता है, इसलिए हिरण्यगर्भ सर्वान्तर होनेसे सब भूतोंका ' अन्तरात्मा ' है । यदि इस पक्षको स्वीकार किया जाय तो ' पुरुष एवेदं विश्वं कर्म ' इस मन्त्रसे प्रतिपाद्य परमेश्वरके रूप.. ( सर्वात्मत्व ) का उपन्यास केवल परमात्माकी प्रतिपत्ति के लिए है अर्थात् श्रुति, स्मृति प्रति-

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१८६ ब्रह्मसूत्र - शाङ्करभाष्य [ अ ० १ पा ० २ समवर्ततेत्यजायतेत्यर्थः । तथा ' स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते । आदिकर्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तते ' ॥ इति च । विकारपुरुषस्यापि सर्वभूतान्तरात्मत्वं संभवति प्राणात्मना सर्वभूतानामध्यात्ममवस्थानात् । अस्मिन्पक्षे ' पुरुष एवेदं विश्वं कर्म ' इत्यादिसर्वरूपो-पन्यासः परमेश्वरप्रतिपत्तिहेतुरिति व्याख्येयम् ॥ २३ ॥

( ७ वैश्वानराधिकरणम् । सू ० २४-३२ ) वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॥ २४ ॥

पदच्छेद- वैश्वानरः, साधारणशब्दविशेषात् । सूत्रार्थ - ( वैश्वानरः ) ' यस्त्वेतमेवं ' इत्यादि श्रुतिमें प्रतीयमान वैश्वानर परमात्मा ही है, ( साधारण शब्दविशेषात् ) क्योंकि यद्यपि यह साधारण वैश्वानर शब्द जठराग्नि, भूताग्नि और सूर्यका प्रतिपादक है एवं आत्मशब्द जीव तथा परमात्माका प्रतिपादक है, तो भी ' मूधैव सुतेजाः ' यह विशेष परमात्मा में ही सम्भव है । * ‘ को न आत्मा किं ब्रह्म ' इति, ' आत्मानमेवेमं वैश्वानरं संप्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहि ' ( छा ० ५११११, ६ ) इति चोपक्रम्य सूर्यवाय्वाकाशवारिपृथिवीनां सुतेजस्त्वादिगुणयोगमेकैको-पासननिन्दया च वैश्वानरं प्रत्येषां मूर्धा दिभावमुपदिश्याम्नायते -'यस्स्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभि-विमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति तस्य ह वा एतस्या-पदका उत्पन्न हुआ ऐसा अर्थ है । तथा ' स वै शरीरी ० ' ( निश्चय ही वह सृष्टिके आदिकालमें उत्पन्न कारण प्रथम शरीरी एवं प्रथम पुरुष कहलाता है । भूतोंका आदि कर्ता वह ब्रह्मा पहले पहल उत्पन्न हुआ ) । विकार पुरुष ( हिरण्यगर्भ ) ही सब भूतोंका अन्तरात्मा हो सकता है, क्योंकि वह प्राणरूपसे सब भूतोंके शरीरमें स्थित है । इस पक्ष में ' पुरुष एवेदं विश्वं कर्म ' ( पुरुष ही यह समस्त प्रपञ्च, कर्म, तप [ ज्ञान ] और इसका फलरूप है ) इत्यादि सर्वात्मकत्व का उपन्यास परमेश्वरकी प्रतिपत्ति के लिए है, ऐसी व्याख्या करनी चाहिए ॥ २३ ॥

' को न आत्मा ० १ ' ( हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्म क्या है ) ऐसा और ' आत्मानमेवेमं ० ' ( इस समय आप वैश्वानर आत्माको जानते हैं । उसीका आप हमारे प्रति वर्णन कीजिए ) ऐसा उपक्रमकर द्यु, सूर्य, वायु, आकाश, जल और पृथिवीमें से सुतेजस्त्वादिगुण विशिष्ट एक - एक उपा-सनाकी निन्दा कर और वैश्वानरके प्रति इनके मूर्धादिभावका उपदेश कर श्रुति ' यस्त्वेतमेवं ० ' ( जो कोई ' यही मैं हूँ ' इसप्रकार अभिमानका विषय होनेवाले इस प्रादेशमात्र वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह समस्त लोकोंमें समस्त प्राणियोंमें और समस्त आत्माओं में अन्न भक्षण करता है । सत्यानन्दी - दीपिका पाद्य फलसहित सब कर्म, तप और समस्त विश्व पुरुष ही है, इस सर्वात्मकत्वके उपन्याससे परमात्मा ही भूतयोनि है । अतः भूतयोनिरूप ज्ञेय ब्रह्ममें ही ' अग्निर्मूर्धा ' इत्यादि पूर्वोक्त वाक्योंका समन्वय है । पूर्वपक्ष में प्रधानादिकी उपासना है, सिद्धान्तमें निर्विशेष ब्रह्मका ज्ञान, इस प्रकार दोनोंमें अन्तर है ॥२३ ॥

* ' प्राचीनशाल औपमन्यवः ० ' ( छा ० ५।११ ) ( उपमन्युका पुत्र प्राचीनशाल, पुलुषका पुत्र सत्ययज्ञ, मल्लविके पुत्रका पुत्र इन्द्रद्युम्न, शर्कराक्षका पुत्र जन और अश्वतराश्व का पुत्र बुडिल एकत्रित होकर परस्पर विचार करने लगे कि ' को न आत्मा किं ब्रह्म ' • जब स्वयं निश्चय न कर सके, तो निश्चय करनेके लिए अब अरुणपुत्र उद्दालकके पास आये, किन्तु वह स्वयं भी ठीक - ठीक नहीं जानते थे, अतः उद्दालकके साथ औपमन्यव आदि पाँचों मुनि राजा अश्वपतिके पास गये और उससे वैश्वानर आत्माकी जिज्ञासा व्यक्त की । तब दूसरे दिन प्रातःकाल सबको सन्मुख बैठाकर अश्व-पतिने उनमेंसे प्रत्येकसे अलग - अलग यह प्रश्न किया, तुम किस आत्माकी उपासना करते हो?